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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बढ़ती उम्र, बढ़ते रिटायरमेंट, और देश में क्षमता-विकास..
सुनील कुमार ने लिखा है
04-Feb-2026 7:47 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : बढ़ती उम्र, बढ़ते रिटायरमेंट, और देश में क्षमता-विकास..

जापान में अभी बढ़ती हुई बूढ़ी आबादी और घटते हुए कामगारों की वजह से रिटायरमेंट की उम्र 70 बरस तक कर दी गई है। दुनिया के अलग-अलग देश अपनी आबादी में जवान और बूढ़ों का अनुपात बदलने के साथ-साथ कभी-कभी ऐसी जरूरत महसूस करते हैं। इसकी एक से अधिक वजहें रहती हैं, और हर देश को अपने संदर्भ में कामकाज की उम्रसीमा तय करने में इसे सोचना पड़ता है। दिलचस्प बात यह भी है कि कई देशों को अपनी मौजूदा अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखकर फैसला लेना पड़ता है, और इसके साथ-साथ, या इसके अलग भी राजनीतिक-चुनावी नफा-नुकसान भी नजरिया तय करने में एक बड़ा मुद्दा रहता है। हर देश में आबादी में अलग-अलग उम्र, वर्ग का अनुपात देखकर ही वहां के बारे में बात की जा सकती है, लेकिन एक बात पूरी दुनिया में एक सरीखी है कि विश्व और अलग-अलग देशों, तकरीबन सभी में लोगों की औसत उम्र बढ़ती जा रही है, उनमें अधिक उम्र तक काम करने की ताकत बची रहती है, और अब अधिक लोग अधिक उम्र तक काम करना चाहते भी हैं। यह समझ दुनिया के औसत आंकड़ों को लेकर है, और इस तथ्य और तर्क को खारिज करने वाले लोग अपने आसपास के कुछ ऐसे सुविधाभोगी कर्मी ढूंढ सकते हैं, जो समय के पहले रिटायरमेंट लेकर बाकी जिंदगी आराम करना चाहते हंै, क्योंकि उन्हें पेंशन की सहूलियत रहती है।

हमने कुछ देशों के ऐसे आंकड़ों को देखा, तो 1970 में पूरी दुनिया के आंकड़े बताते थे कि 60 साल की उम्र के बाद लोगों के पास 13 से 15 साल की जिंदगी और बचती थी, यही जिंदगी रिटायर्ड वक्त रहता था। दूसरी तरफ आज दुनिया की हालत यह है कि 60 बरस के लोग 17 से 20 साल और जीने वाले हैं, यानी पहले के मुकाबले 5 बरस अधिक। दुनिया के संपन्न देशों में लोगों की औसत सेहत भी बेहतर खानपान, बेहतर इलाज, और सहूलियत की जीवनशैली की वजह से पहले के मुकाबले ज्यादा अच्छी हैं। इसलिए भी वे अधिक काम करने की हालत में रहते हैं। फिर इस बात को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए कि दुनिया में बहुत से काम अभी भी ऐसे हैं जहां दफ्तर या कामकाज की दूसरी किस्म की जगहों में माहौल पहले के मुकाबले अधिक आरामदेह और सेहतमंद रहता है, और इसलिए भी लोग अधिक उम्र तक काम करने का हौसला कर सकते हैं। कुछ अलग-अलग देशों की मिसालें देखें, तो जर्मनी में अभी धीरे-धीरे बढ़ते हुए रिटायरमेंट की उम्र 67 साल पहुंची है, फ्रांस में 62 से 64 हुई है, ब्रिटेन में 2028 तक इसके 67 साल होने का अंदाज है, डेनमार्क में 2035 तक 69 साल तक लोग काम करेंगे, ऐसा वहां अंदाज लगाया जा रहा है। भारत में केन्द्र सरकार के अधिकतर कर्मचारियों-अधिकारियों के लिए यह उम्रसीमा 60 साल है, लेकिन शिक्षण संस्थाओं में पढ़ाने वाले, चिकित्सा विज्ञान के लोग, और वैज्ञानिक संस्थाओं के लोगों के लिए यह सीमा अभी भी 62 से 65 साल है, और हर कुछ बरस में इसके बढऩे का एक अंदाज है।

अब इसके पीछे के कई तर्कों में से एक यह भी है कि अनुभवी कर्मचारी को रिटायर करने पर उनके काम की उत्पादकता शून्य हो जाती है, और पेंशन में तनख्वाह का करीब आधा हिस्सा तो देना ही पड़ता है। मतलब यह कि बाकी आधा हिस्सा देकर सरकार कुछ और बरस तक एक अनुभवी अधिकारी या कर्मचारी से काम ले सकती है। इसके खिलाफ एक दूसरा नजरिया यह है कि कुछ लोगों का यह सोचना है कि अगर लोग रिटायर नहीं होंगे, तो नौजवान बेरोजगारों के लिए जगह कहां बनेगी? दूसरी बात यह भी रहती है कि अगर सीनियर कुर्सियों पर बैठे लोगों का रिटायर होना आगे बढ़ता है, तो उनके नीचे के लोगों के प्रमोशन की संभावना कम या खत्म हो जाती है, और ऐसे में उनके लिए उत्साह से काम करने की वजह नहीं रहती। ऐसा तब भी होता है जब सरकारें अपने पसंदीदा अफसरों को उपकृत करने के लिए, या उनकी कोई खास क्षमता या खूबी देखते हुए उन्हें अपवाद की तरह एक सेवा विस्तार देती हैं। ऐसे में भी उनके नीचे के लोगों को निराशा होती है। विश्व बैंक की कुछ रिपोर्ट, और चीन के साथ-साथ योरप के कुछ देशों में हुए अध्ययन बताते हैं कि रिटायरमेंट की उम्र बढऩे से बेरोजगारों के लिए अवसर पैदा होने पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता। भारत के बारे में यह समझना जरूरी है कि यहां पर आबादी के भीतर कामकाज शुरू करने वाली, 35 बरस से कम उम्र की आबादी 65 फीसदी से ज्यादा है, अब इसे अलग-अलग नजरियों से देखा जा सकता है कि क्या रिटायरमेंट आगे बढ़ाने से इतनी बड़ी नौजवान आबादी के मौके घटेंगे? क्योंकि कुर्सियां पुराने लोगों से ही भरी रह जाएंगी!

जनसंंख्या और सरकारी कामकाज के विशेषज्ञ लोग इस बारे में बेहतर विश्लेषण कर सकते हैं, लेकिन हम आज यहां पर इतनी लंबी भूमिका के बाद एक छोटी सी बात पर आ रहे हैं। किसी भी समाज में लोगों के रिटायर होने की संख्या और तारीख तो हमेशा तैयार रहती हैं। ऐसे में सरकार और समाज के पास यह हिसाब रहता है कि किस-किस खूबी, क्षमता, और हुनर के कितने लोग किस-किस तारीख को खाली होने जा रहे हैं, और एआई के बहुत मामूली इस्तेमाल से भी सरकारी रिकॉर्ड से यह निकल सकता है कि इन लोगों की सेहत का क्या हाल रहेगा। आज सरकार और समाज, इन दोनों में ही कई किस्म के कामकाज के लिए पूर्णकालिक कर्मचारियों या अधिकारियों की जरूरत नहीं है, लेकिन मामूली भत्ता या मेहनताना देकर समाज की कुछ जरूरतों के लिए कुछ खास किस्म के हुनरमंद लोगों को व्यस्त रखा जा सकता है, जिससे कि रिटायरमेंट के बाद भी उनकी उत्पादक-क्षमता का इस्तेमाल समाज और देश के लिए किया जा सके। अब मिसाल के लिए हम एक छोटी सी बात कहना चाहेंगे कि आज देश के बहुत से प्रदेशों में बेरोजगारों को अंग्रेजी का ज्ञान नहीं है, वे कम्प्यूटर पर काम करना नहीं जानते, और ऐसे दोनों हुनर सिखाने के लिए रिटायर लोगों में हर शहर-कस्बे में कई लोग निकल सकते हैं। अगर पूरे देश के स्तर पर इस तरह का एक पोर्टल केन्द्र और राज्य सरकारें बनाएं जिस पर तरह-तरह के हुनरमंद रिटायर्ड लोग अपनी क्षमता, काम के प्रस्तावित घंटे, मेहनताने की उनकी उम्मीद लिख सकें, तो एआई पल भर में किसी भी शहर के लिए अंग्रेजी और कम्प्यूटर से परे भी, योग, खेलकूद, खानपान जैसी बहुत सी जानकारी और ट्रेनिंग के लिए लोगों की लिस्ट बनाकर समाज या सरकार को दे सकता है, और स्थानीय जरूरत के मुताबिक रिटायर्ड लोगों की अब तक बाकी ऐसी क्षमता काम में लाई जा सकती है। हमने आज की बात शुरू तो रिटायरमेंट की उम्र से की है, लेकिन लोग की औसत उम्र, और उनकी सेहत रिटायरमेंट उम्र के मुकाबले अधिक बढ़ रही है। ऐसे में समाज और देश की उत्पादकता के लिए उसका एक बेहतर इस्तेमाल हो सकता है। अभी एक-दो दिन पहले ही हमने या तो इसी पेज पर, या अपने यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल पर भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय संभावनाओं की राह पर ऐतिहासिक चुनौतियों का भी जिक्र किया था। भारत में कौशल विकास के नाम पर देश के इतिहास का एक सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा होने की खबरें अभी आई हैं, सरकारी पैसे में भ्रष्टाचार, और उसका बेजा इस्तेमाल सत्यवादी राजा हरिशचन्द्र के निधन के बाद से शुरू हुआ है, और बढ़ते ही चल रहा है। इसलिए सरकार को कम लागत में, स्थानीय स्तर पर, स्थानीय क्षमताओं का इस्तेमाल करके कौशल विकास या व्यक्तित्व विकास का काम करना चाहिए, जिसमें भ्रष्टाचार का खतरा कुछ कम हो। इस तरह रिटायर्ड लोगों में बची हुई चिंगारी समाज मेें बेहतर और अधिक उत्पादकता की रौशनी बिखेर सकती है। जो देश ऐसी अतिरिक्त क्षमताओं का इस्तेमाल नहीं करेंगे, वे वैश्विक मुकाबलों में पीछे भी रह जाएँगे।

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