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‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 29 जनवरी। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने पीजी मेडिकल प्रवेश से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि नियमों में संशोधन और काउंसलिंग प्रक्रिया रद्द होने के बाद किसी भी अभ्यर्थी को पहले से आवंटित सीट पर बने रहने का पूर्ण अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि नियम बदलने के साथ ही पुरानी प्रवेश प्रक्रिया स्वतः प्रभावहीन हो जाती है।
भिलाई निवासी अनुष्का यादव ने राज्य सरकार के 22 और 23 जनवरी 2026 के आदेशों को चुनौती दी थी, जिनके जरिए पहले पूरी हो चुकी काउंसलिंग और सीट आवंटन प्रक्रिया को अचानक निरस्त कर दिया गया था।
अनुश्का यादव का कहना था कि उन्होंने मेरिट के आधार पर भिलाई के एक निजी मेडिकल कॉलेज में रेडियो डायग्नोसिस विषय में पीजी सीट प्राप्त की थी। उन्होंने प्रवेश के बाद 10.79 लाख रुपये फीस जमा की थी, जिसमें 10 लाख रुपये की बैंक गारंटी भी शामिल थी। उनका तर्क था कि पूरी प्रक्रिया संपन्न होने के बाद प्रवेश रद्द करना अन्यायपूर्ण है।
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि काउंसलिंग रद्द करने का फैसला मनमाना नहीं है। यह कदम सुप्रीम कोर्ट के ‘डॉ. तन्वी बहल’ प्रकरण में दिए गए निर्देशों के अनुपालन में उठाया गया। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि पीजी मेडिकल पाठ्यक्रमों में डोमिसाइल आधारित आरक्षण को असंवैधानिक माना गया है और केवल सीमित स्तर पर संस्थागत वरीयता ही दी जा सकती है।
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए छत्तीसगढ़ मेडिकल पोस्ट ग्रेजुएट एडमिशन रूल्स, 2025 के नियम 11 में संशोधन किया। संशोधित नियम के तहत अब 50 प्रतिशत सीटें उन अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित होंगी, जिन्होंने छत्तीसगढ़ से एमबीबीएस किया है, जबकि शेष 50 प्रतिशत सीटें पूरी तरह ‘ओपन मेरिट’ के आधार पर भरी जाएंगी।
मामले की सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की युगल पीठ ने कहा कि नियम 11 में संशोधन और काउंसलिंग प्रक्रिया रद्द होने के बाद किसी भी उम्मीदवार को पहले आवंटित सीट पर बने रहने का पूर्ण अधिकार नहीं रह जाता। अदालत ने स्पष्ट किया कि बदले हुए नियमों की स्थिति में पुरानी काउंसलिंग के आधार पर दिया गया प्रवेश मान्य नहीं माना जा सकता।


