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नयी दिल्ली, 25 जनवरी। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने विभिन्न महाद्वीपों में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच रविवार को कहा कि भारत विश्व में शांति का संदेश फैला रहा है, जो मानवता के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
मुर्मू ने 77वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और महिला सशक्तीकरण समेत विभिन्न मुद्दों पर बात की और वंदे मातरम् तथा देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था जैसे विषयों पर भी चर्चा की।
राष्ट्रपति मुर्मू ने शांति के ‘‘संदेशवाहक’’ के रूप में भारत की स्थिति को रेखांकित करते हुए सार्वभौमिक सद्भाव के प्रति प्राचीन सभ्यतागत प्रतिबद्धता को सुदृढ़ किया।
उन्होंने कहा, ‘‘हमारी परंपरा में, समस्त सृष्टि में शांति के बने रहने की प्रार्थना की जाती रही है। पूरे विश्व में शांतिपूर्ण व्यवस्था स्थापित होने से ही मानवता का भविष्य सुरक्षित रह सकता है। विश्व के अनेक क्षेत्रों में व्याप्त अशांति के वातावरण में, भारत द्वारा विश्व-शांति का संदेश प्रसारित किया जा रहा है।’’
अपने संबोधन के दौरान, राष्ट्रपति ने सीमा पार आतंकी ढांचे को नष्ट करने वाले सटीक हमले, ऑपरेशन सिंदूर की हालिया सफलता पर प्रकाश डालते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता को भी रेखांकित किया।
मुर्मू ने कहा, ‘‘पिछले वर्ष, हमारे देश ने, ऑपरेशन सिंदूर के द्वारा, आतंकवाद के ठिकानों पर सटीक प्रहार किया। आतंक के अनेक ठिकानों को ध्वस्त किया गया तथा बहुत से आतंकवादियों को उनके अंजाम तक पहुंचाया गया।’’
उन्होंने कहा, ‘‘सुरक्षा के क्षेत्र में हमारी आत्मनिर्भरता से ऑपरेशन सिंदूर की ऐतिहासिक सफलता को शक्ति मिली।’’
सशस्त्र बलों की ताकत पर विचार करते हुए, राष्ट्रपति ने सियाचिन बेस कैंप की अपनी व्यक्तिगत यात्राओं और सुखोई और राफेल में की गई उड़ानों को याद किया।
मुर्मू ने कहा, ‘‘सियाचेन बेस कैंप पहुंचकर मैंने बहादुर सैनिकों को अत्यंत विषम परिस्थितियों में भी देश की रक्षा के लिए पूरी तरह तत्पर और उत्साहित देखा। भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमानों, सुखोई और राफेल में उड़ान भरने का अवसर भी मुझे मिला। मैं वायु सेना के युद्ध-कौशल से अवगत हुई।’’
उन्होंने कहा, ‘‘मैं नौसेना की पनडुब्बी आईएनएस वाघशीर में समुद्र की गहराइयों तक गई। थल-सेना, वायु-सेना और नौसेना की शक्ति के आधार पर, हमारी सुरक्षा-क्षमता पर देशवासियों को पूरा भरोसा है।’’
अपने संबोधन में राष्ट्रपति मुर्मू ने नारी शक्ति के उदय को 2047 तक भारत के एक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में भारत की यात्रा का आधारशिला बताया।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ‘‘देश के विकास के लिए महिलाओं की सक्रिय और सशक्त भागीदारी बहुत महत्वपूर्ण है’’।
मुर्मू ने कहा कि महिलाएं, खेत-खलिहानों से लेकर अंतरिक्ष तक, स्व-रोजगार से लेकर सेनाओं तक, अपनी प्रभावी पहचान बना रही हैं।
उन्होंने कहा कि पंचायती राज संस्थाओं में महिला जन-प्रतिनिधियों की संख्या लगभग 46 प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि महिलाओं के राजनैतिक सशक्तीकरण को नयी ऊंचाई देने वाले ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ से, महिलाओं के नेतृत्व द्वारा विकास की सोच को ‘‘अभूतपूर्व शक्ति’’ मिलेगी।
राष्ट्रपति ने कहा कि पिछला वर्ष वैश्विक मंच पर भारतीय महिलाओं के लिए एक ‘‘स्वर्ण अध्याय’’ साबित हुआ और उन्होंने खेलों में भारत की बेटियों के प्रभुत्व पर विशेष गर्व व्यक्त किया, विशेष रूप से आईसीसी महिला क्रिकेट विश्व कप में ऐतिहासिक जीत और टी20 दृष्टिबाधित महिला विश्व कप में जीत का उल्लेख किया।
राष्ट्रपति मुर्मू ने इस बात पर प्रकाश डाला कि महिलाएं सशस्त्र बलों, अंतरिक्ष अनुसंधान और उद्यमिता में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। उन्होंने कहा कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान से देशभर में बेटियों की शिक्षा को प्रोत्साहन मिला है।
राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘महिलाओं के बढ़ते योगदान के साथ, हमारा देश महिला-पुरुष समानता पर आधारित एक समावेशी गणराज्य का उदाहरण प्रस्तुत करेगा।’’
उन्होंने गरीबी उन्मूलन में भारत की अभूतपूर्व प्रगति पर भी जोर दिया और कहा कि दशकों से गरीबी के साथ जूझ रहे करोड़ों देशवासियों को, गरीबी की सीमा-रेखा से ऊपर लाया गया है।
मुर्मू ने कहा कि 'अंत्योदय' की भावना को मूर्त रूप देते हुए, सरकार का ध्यान यह सुनिश्चित करने पर केंद्रित है कि ये नागरिक "गरीबी के जाल" में वापस न फंसें।
उन्होंने कहा, ‘‘विश्व की सबसे बड़ी योजना, ‘पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना’ इस सोच पर आधारित है कि 140 करोड़ से अधिक आबादी वाले हमारे देश में कोई भी भूखा न रहे। इस योजना से लगभग 81 करोड़ लाभार्थियों को सहायता मिल रही है।’’
राष्ट्रपति ने इस बात पर जोर दिया कि 'विकसित भारत' का मार्ग समावेशी होना चाहिए और आदिवासी और हाशिए पर रहने वाले समुदायों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, "गरीबों के कल्याण के लिए किए गए ऐसे प्रयास महात्मा गांधी के सर्वोदय (सभी के लिए प्रगति) के आदर्श को मूर्त रूप देते हैं।"
राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि भारत का संविधान अब आठवीं अनुसूची में सूचीबद्ध सभी भाषाओं में उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि इस उपलब्धि का उद्देश्य "संवैधानिक राष्ट्रीयता" को बढ़ावा देना है, जिससे नागरिकों को राष्ट्र के मूलभूत दस्तावेज से अपनी मातृभाषा में जुड़ने का अवसर मिलेगा।
उन्होंने कहा कि यह पहल आपसी विश्वास पर आधारित "सुशासन" की दिशा में एक व्यापक बदलाव का हिस्सा है, जहां प्रौद्योगिकी और विधायी सुधारों के माध्यम से सरकार और आम जनता के बीच की खाई को व्यवस्थित रूप से पाटा जा रहा है।
मुर्मू ने कहा कि अभूतपूर्व जनभागीदारी के माध्यम से अब राष्ट्रीय लक्ष्य प्राप्त किए जा रहे हैं, जिससे सरकारी अभियान जन आंदोलनों में परिवर्तित हो रहे हैं।
उन्होंने इस "क्रांतिकारी बदलाव" का एक प्रमुख उदाहरण डिजिटल अर्थव्यवस्था में भारत का वैश्विक नेतृत्व है। उन्होंने कहा कि आज दुनिया के आधे से अधिक डिजिटल लेनदेन भारत में ही होते हैं।
मुर्मू ने कहा कि इस बात पर जोर दिया कि एक विकसित भारत का निर्माण एक ‘‘साझा जिम्मेदारी" है। उन्होंने प्रत्येक गांव और शहर में स्थानीय संस्थानों से प्रगतिशील परिवर्तन के साधन के रूप में कार्य करने का आह्वान किया।
राष्ट्रपति ने कहा कि आज का भारत अपनी गौरवशाली परंपराओं और "ज्ञान भारतम्" (ज्ञानवान भारत) दृष्टिकोण में गहराई से निहित नए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है।
मुर्मू ने भारत के विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में उभरने की सराहना की और इसका श्रेय गहन संरचनात्मक सुधारों और आत्मनिर्भरता के प्रति प्रतिबद्धता को दिया। उन्होंने कहा कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के बावजूद, भारत निकट भविष्य में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर मजबूती से अग्रसर है।
इस आर्थिक परिवर्तन की आधारशिला माल एवं सेवा कर (जीएसटी) रही है, जिसे राष्ट्रपति ने स्वतंत्रता के बाद से आर्थिक एकीकरण के लिए सबसे महत्वपूर्ण निर्णय बताया है।
उन्होंने कहा, ‘‘तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में यात्रा में आत्म-निर्भरता और स्वदेशी हमारे मूलमंत्र हैं और सरकार द्वारा विश्व स्तरीय अवसंरचना और श्रम सुधारों पर ध्यान केंद्रित करने से उद्यमों के विकास में और तेजी आने की उम्मीद है।’’
राष्ट्रपति ने 'वंदे मातरम्' की रचना के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में जारी समारोहों पर भी प्रकाश डाला।
अपने संबोधन में उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कैसे 'वंदे मातरम' ने भाषाई बाधाओं को पार करते हुए स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जनता को एकजुट किया। उन्होंने कहा कि विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद होने से यह गीत एकता के सार्वभौमिक प्रतीक के रूप में और भी मजबूत हो गया है।
उन्होंने कहा, ‘‘उत्तर से लेकर दक्षिण तक तथा पूर्व से लेकर पश्चिम तक, हमारी प्राचीन सांस्कृतिक एकता का ताना-बाना हमारे पूर्वजों ने बुना था। राष्ट्रीय एकता के स्वरूपों को जीवंत बनाए रखने का प्रत्येक प्रयास बहुत सराहनीय है।’’ (भाषा)


