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बस्ती बसी नहीं, चोरों का धावा-सूचना बोर्ड चोरी, निगरानी पर सवाल
19-Jan-2026 12:14 PM
बस्ती बसी नहीं, चोरों का धावा-सूचना बोर्ड चोरी, निगरानी पर सवाल

कोपरा रामसर साइट पर लापरवाही की शुरुआत!

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

बिलासपुर, 19 जनवरी। छत्तीसगढ़ की पहली और एकमात्र घोषित कोपरा रामसर साइट पर अव्यवस्थाओं की शुरुआत हो चुकी है। हाल ही में लगाए गए सूचना बोर्ड की चोरी और जलाशय से पानी उठाए जाने की घटनाओं ने संरक्षण और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

12 दिसंबर को कोपरा रामसर साइट का उद्घाटन कर जलाशय के किनारे सूचना बोर्ड लगाया गया था। लेकिन कुछ ही दिनों में बोर्ड चोरी हो गया। अब वहां केवल खाली फ्रेम बचा है। आशंका जताई जा रही है कि यदि जल्द सुरक्षा नहीं की गई तो यह फ्रेम भी कबाड़ बनकर चोरी हो सकता है।

रविवार दोपहर सड़क किनारे खड़ा एक टैंकर पाइप के जरिए जलाशय से पानी भरता देखा गया। अनुमान है कि आसपास किसी निर्माण कार्य के लिए पानी लिया जा रहा था। इससे पता चलता है कि रामसर साइट घोषित होने के बावजूद जमीनी स्तर पर नियंत्रण और नियमों का पालन सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है। जलाशय में अभी पक्षियों की संख्या कम है और कमल के फूल भी दिखाई नहीं दे रहे हैं। राज्य वन्यजीव बोर्ड के पूर्व सदस्य प्राण चड्ढा का कहना है कि यदि शुरुआत में ही संरक्षण को लेकर सख्ती नहीं बरती गई, तो आने वाले समय में इस आर्द्रभूमि का पारिस्थितिक संतुलन प्रभावित हो सकता है।

रामसर साइट घोषित होने के बाद सकरी–कानन पेंडारी मार्ग स्थित वन चेतना केंद्र में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें वन विभाग के अधिकारी, जनप्रतिनिधि और विश्वविद्यालय के छात्र शामिल हुए। यह स्थल कोपरा रामसर साइट से लगभग चार किलोमीटर दूर है। यदि आयोजन वास्तविक साइट पर होता, तो प्रतिभागी स्थल की वास्तविक स्थिति को प्रत्यक्ष देख और समझ पाते।

कोपरा रामसर साइट बिलासपुर से केवल 10 किलोमीटर दूर स्थित है, लेकिन निगरानी नहीं हो रही है। शुरुआत में ही इस तरह की घटनाएं हो रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सुरक्षा, जागरूकता और नियमित निगरानी के बिना संरक्षण के उद्देश्य पूरे नहीं हो पाएंगे।

मालूम हो कि रामसर कन्वेंशन एक अंतर-सरकारी संधि है, जिसे 1971 में ईरान के रामसर शहर में अपनाया गया था। इसका उद्देश्य विश्व की महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों का संरक्षण और सतत उपयोग सुनिश्चित करना है। रामसर साइट वह आर्द्रभूमि होती है, जिसे अंतरराष्ट्रीय महत्व का दर्जा मिलता है। इनमें झीलें, नदियां, दलदल, मैंग्रोव या मानव निर्मित जल क्षेत्र शामिल हो सकते हैं, जो जैव विविधता और जलपक्षियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं।


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