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अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प पर लिखते हुए एक समानार्थी कोष लेकर यह देखना पड़ता है कि नीचता और कमीनेपन के लिए और कौन-कौन से शब्द हैं ताकि लिखने में विविधता बनी रहे। इन्हीं दोनों शब्दों पर टिके रहने से लिखना बड़ा बोझिल होने लगता है। जब कभी आप यह सोचते हुए सोएं कि यह आदमी अब इससे और अधिक घटिया नहीं हो सकता, अगली सुबह वह उससे बुरा रिकॉर्ड बनाकर दिखाता है। इसलिए ट्रम्प के ओछेपन और घटियापन के किसी भी ताजा रिकॉर्ड को लंबी जिंदगी नहीं मिल पाती है, एक-दो दिन गुजरते हैं, और वह अपनी ही पुरानी नीचता पार करके गटर में और गहराई तक डुबकी लगाकर दिखाने लगता है।
अभी अमरीकी वाणिज्य मंत्री ने अमरीका और भारत के बीच व्यापार समझौता न होने की वजह औपचारिक रूप से बताई कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ट्रम्प को फोन नहीं किया था, इसलिए यह डील फाइनल नहीं हो सकी। अभी हालत यह है कि बाकी देशों के मुकाबले भारतीय सामानों पर अमरीका में 25 फीसदी अधिक टैरिफ लगा है, क्योंकि वह रूस से तेल खरीद रहा है। अब ट्रम्प अमरीकी संसद में एक ऐसा बिल ला रहा है जिसके तहत रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर पांच सौ फीसदी तक टैरिफ लगाया जा सकेगा, और इसका बड़ा निशाना भारत और चीन होंगे। इसका यह मतलब भी होगा कि भारत का कोई भी सामान अमरीका जा ही नहीं सकेगा, और भारत के निर्माताओं और निर्यातकों के पेट पर एक जबर्दस्त अमरीकी लात पड़ेगी। दूसरी तरफ भारत ने औपचारिक रूप से यह साफ किया है कि 2025 में प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रम्प से 8 बार फोन पर बात की है। इन दोनों बातों में एक फासला यह दिख रहा है कि अमरीकी वाणिज्य मंत्री का कहना शायद दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच व्यापारिक बातचीत के बीच या बाद मोदी का ट्रम्प से बात न करना है, और भारतीय प्रवक्ता ने पूरे साल भर की बातचीत गिनाई है, लेकिन इस नाजुक मौके की बातचीत नहीं गिनाई है जिसके बारे में भारत के एक पूर्व राजनयिक के.सी.सिंह ने लिखा है कि ट्रम्प से बातचीत में दो दिक्कतें रहती हैं, उनकी अजीबोगरीब मांगें, और उनकी यह उम्मीद कि लोग उनके अहंकार को सहलाएं, और बाद में वे इनमें से हर चीज को सार्वजनिक भी कर देते हैं।
भारतीय प्रधानमंत्री आज अमरीका के मुकाबले टक्कर की बातें करने की हालत में नहीं हैं। भारत का विपक्ष प्रधानमंत्री से बार-बार यह कहता है कि वे ट्रम्प के बेजा बयानों से भारत के हो रहे अपमान पर बयान दें, और ट्रम्प को जवाब दें, लेकिन मोदी लगातार चुप्पी साधे हुए हैं। पिछले करीब एक बरस में ट्रम्प की हर बदतमीजी, और उसके हर उकसावे पर भी मोदी शांत दिखते हैं, क्योंकि शायद अमरीका से आज तुर्की-ब-तुर्की उलझना भारत के हित में नहीं है। दो बददिमाग नेताओं के बीच लड़ाई देखने में कई लोगों को मजा आ सकता है, लेकिन किसी समझदार नेता को अपने देश के व्यापक हित देखते हुए ऐसे टकराव से बचना चाहिए। आज भारत के लाखों लोग अमरीका में काम कर रहे हैं, ट्रम्प जैसा सनकी तानाशाह किसी भी देश के लोगों को वहां से निकाल दे रहा है, किसी भी देश के लोगों को आने की इजाजत दे रहा है, और वहां के विश्वविद्यालयों में भारतीय छात्रों की मौजूदगी वैसे भी बुरी तरह घट गई है। ये ही वे नौजवान रहते हैं जो वहां पढऩे के बाद वहां काम पाते हैं, और भारत अपने घर कमाई भेजते भी हैं। फिर टैरिफ नाम की तलवार को ट्रम्प जिस अंदाज में किसी की भी गर्दन काटने के लिए घुमाते रहता है, उसे देखते हुए उसके सामने न पडऩा ही ठीक है। जब तक भारत की सुरक्षा पर ट्रम्प कोई खतरा न बने, तब तक बिफरे हुए ट्रम्प के सामने खुद होकर पडऩा समझदारी नहीं है, और एक देश के रूप में भारत की मजबूरी भी नहीं है। जब दो देशों के बीच व्यापारिक लेन-देन में एक संतुलन न हो, जब तक एक देश की जरूरत दूसरे देश के मुकाबले अधिक हो, तब तक जरूरतमंद देश को सब्र रखना चाहिए। आज भारत का चुप रहना ही उसकी जीत है, और ट्रम्प से जुबान लड़ाने के दाम भारत के नेताओं की जेब से नहीं जाएंगे, भारत के कामगारों और कारोबारियों को नुकसान की शक्ल में जाएंगे।
ट्रम्प का अमरीका न सभ्य है, न न्यायप्रिय है। उससे अधिक उम्मीद नहीं की जा सकती। वह तो आज दुनिया के अलग-अलग देशों पर हमले करने को भी अपना हक मान रहा है। जो देश उससे असहमत रहते हैं, उन पर हमला तो वह शौकिया और मजा लेने के लिए करते दिख रहा है, लेकिन इसके साथ-साथ वह नाटो गठबंधन के देशों पर भी हमला करने की खुली मुनादी कर रही है। डेनमार्क के हिस्से ग्रीनलैंड को फौजी कार्रवाई से ही कब्जा कर लेने की उसकी बात बहुत ही भयानक है, और मित्र देशों के साथ उसकी ऐसी गुंडागर्दी दुनिया के इतिहास में पहली बार ही दर्ज हो रही है। ऐसे में ट्रम्प की बकवास का जवाब देकर उससे और उलझने, और उसके दानवाकार अहंकार को चोट लगाकर भारत के निर्यात पर और टैरिफ ठुकवाने, भारतीय कामगारों की संभावना खत्म करने में कोई समझदारी नहीं होगी। जब सडक़ पर कोई बिफरा हुआ जानवर चारों तरफ तबाही फैलाने पर आमादा हो, उस वक्त किसी समझदार को सडक़ पर चलने के अपने हक का दावा नहीं करना चाहिए, चुपचाप किनारे किसी महफूज जगह पर जान बचाकर खड़े रहना चाहिए। जिस ट्रम्प के लिए उसके दोस्त और दुश्मन पल-पल बदल रहे हैं, जो लोगों के एक-एक शब्द पर बावलों की तरह भडक़ रहा है, उसकी तरफ से आए सच या झूठ का भी कोई जवाब देने में समझदारी नहीं है, और हम ऐसी हिंसक बददिमागी का मुकाबला करने का ताव भारतीय प्रधानमंत्री को नहीं देंगे। आज का वक्त बराबरी के हक का नहीं है, ट्रम्प किसी अंडरवल्र्ड डॉन की तरह ओवरवल्र्ड डॉन बना हुआ है, ऐसे में लोगों को अपने देश और अपने लोगों के हित की परवाह करना चाहिए, अगर उसी में कामयाबी मिल जाए, तो ही वह इज्जत है, ट्रम्प से बहस में उलझने में तो इज्जत उसी की बच सकती है जो कि ट्रम्प और अमरीका के मुकाबले अधिक ताकतवर हो। गैरबराबरी की लड़ाई में दुनिया के सबसे बड़े मवाली के साथ उलझना कोई समझदारी की बात नहीं है।
ट्रम्प को देखते हुए एक हिन्दी फिल्म के एक डायलॉग की याद आती है- ‘‘हमसे लडऩे की हिम्मत तो कर लोगे, लेकिन मेरे जैसा कमीनापन कहां से लाओगे।’’ बरसों पहले जिसने यह लिखा होगा, उसने उसी वक्त ट्रम्प की कल्पना कर ली होगी। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


