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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : दम तोड़ती दिल्ली का इलाज एक बड़ी सोच वाली लीडरशिप के हाथ
सुनील कुमार ने लिखा है
18-Dec-2025 2:32 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : दम तोड़ती दिल्ली का इलाज एक बड़ी सोच वाली लीडरशिप के हाथ

दिल्ली का वायु प्रदूषण न सिर्फ दिल्ली, बल्कि पूरी दुनिया का दिल दहला रहा है। जिन लोगों को दिल्ली नहीं भी जाना है, उन्हें भी लगता है कि अगर किसी दिन उनके शहर की हालत हिन्दुस्तान की इस राजधानी जैसी हो गई, तो क्या होगा? दिल्ली की ताकत में भला कोई कमी तो थी नहीं कि उसकी कोई अनदेखी हुई। वहां भारत की सरकार बैठती है, संसद वहीं है, और सुप्रीम कोर्ट भी वहीं है। अंग्रेजों के वक्त के बनाए और बसाए हुए दिल्ली के सबसे ताकतवर रिहायशी इलाकों के लालच में देश की तमाम संवैधानिक संस्थाएं भी वहीं हैं। और इन सबके वहां रहने से इनसे जुड़़े हुए केन्द्र सरकार के, या राष्ट्रीय स्तर के सारे दफ्तर और संस्थान भी वहीं हैं। चूंकि सरकार वहीं हैं इसलिए सारे अंतरराष्ट्रीय मिशन वहीं हैं, दुनिया भर के देशों के दूतावास और उच्चायोग भी वहीं हैं। फिर मानो यह काफी न हो, तो दिल्ली देश के दिल में बसी हुई हैं, इस नाते प्रदेशों की आपसी आवाजाही का एक बड़ा हिस्सा दिल्ली या राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्र से होकर गुजरता है। उत्तर भारत का केन्द्र होने के नाते दिल्ली ही सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है, और हर दिन लाखों कारें इस हवाई अड्डे पर आती-जाती हैं।

ऐसी दिल्ली का प्रदूषण आज इतना भयानक है कि वहां कई किस्म की गाडिय़ों का दाखिला रोक देना पड़ा है, निर्माण कार्य रोक दिए गए हैं, इमारतों के भीतर होने वाले कई तरह के दूसरे काम भी रोक दिए गए हैं। दिल्ली के डॉक्टर अपने बुजुर्ग मरीजों और सांस की तकलीफ वालों को दिल्ली छोडक़र कहीं और जाने की सलाह हर बरस कई महीने देते हैं। यह नौबत बहुत ही भयानक इसलिए है कि बाजार में पहुंचने वाले ग्राहक भी घट चुके हैं, लोगों की उत्पादकता घट चुकी है, सिर्फ एक चीज बढ़ी है, वह है इलाज का खर्च। ऐसी दिल्ली में केन्द्र और राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के बार-बार के निर्देशों पर प्रदूषण में कमी लाने की कई तरह की योजनाएं बनाई हैं, जो जाहिर तौर पर पूरी तरह नाकाफी हैं, और इसीलिए प्रदूषण घटने का नाम नहीं ले रहा है। यह भी तब है जब हिन्दुस्तान किसी ज्वालामुखी के मुहाने पर नहीं हैं कि वहां का लावा और धुआं हालत को और तबाह कर दे। यह बिना किसी प्राकृतिक आपदा के पूरी तरह मानवनिर्मित आपदा है, और इससे जूझने के लिए पूरी तरह बुद्धिहीन मानव सत्ता की अपनी ताकत का इस्तेमाल करके कहीं कृत्रिम बारिश करवाने की कोशिश कर रहे हैं, तो कहीं प्रदूषण नापने वाले उपकरणों के आसपास के इलाकों में पानी छिडक़ रहे हैं, ताकि प्रदूषण की रीडिंग कम आए।

वैसे तो सुप्रीम कोर्ट खुद भी परेशान है क्योंकि उसके सारे जजों के फेंफड़े साथ छोड़ रहे हैं, वे अपने बंगलों में भी घूम नहीं पा रहे हैं, और खुले में कहीं भी नहीं जा पा रहे हैं। फिर भी इन जजों की निगरानी में सरकारों की सारी कोशिशें ऐसी कतरा-कतरा हरकतें हैं कि जिनसे प्रदूषण मेें कोई कमी नहीं आनी है, और हो सकता है कि आने वाले बरसों में ऐसी जहरीली हवा से मौतें और बढ़ती चली जाएं, और दिल्ली के लोगों की औसत उम्र घटती चली जाए। आज जरूरत इस अदूरदर्शिता से उबरने की है। इसके लिए भारत को अपने संघीय ढांचे के बारे में सोचना होगा कि क्यों हर चीज दिल्ली में केन्द्रित होनी चाहिए? देश के कम से कम चार अलग-अलग हिस्सों में राज्य सरकारों से प्रस्ताव मांगने चाहिए कि अगर केन्द्र सरकार के दफ्तर दिल्ली के बाहर कहीं ले जाए जाएंगे, तो कौन से राज्य उसके लिए जमीन देने तैयार हैं, और कौन सी सहूलियतें जुटाकर देंगे। लोगों को याद रखना चाहिए कि जब संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय तय होना था, तो अमरीका ने न्यूयॉर्क शहर में उसके लिए न सिर्फ जगह दी, बल्कि अपने कानूनों में उसके कामगारों के लिए कई तरह की छूट भी दी। भारत में किसी प्रदेश में किसी कानूनी छूट की जरूरत नहीं है, लेकिन एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन से आसान पहुंच वाले, प्रदूषणमुक्त, पर्याप्त सडक़ों और बिजली के ढांचे वाले इलाके कौन से प्रदेश केन्द्र सरकार को दे सकते हैं, उसके बारे में राष्ट्रीय स्तर पर तुरंत एक योजना बनानी चाहिए। जब दिल्ली से देश भर के दफ्तर घटेंगे, तो ही दिल्ली की आबादी घटेगी, वहां साधनों और सुविधाओं की खपत घटेगी, सडक़ें सांस ले सकेंगी, और प्रदूषण घटेगा। केन्द्र सरकार और देश की दूसरी संवैधानिक संस्थाओं के बहुत से दफ्तरों को देश के अलग-अलग हिस्सों में ले जाना एक दूरदर्शिता की बात होगी, और उससे दस-बीस बरस बाद बढऩे वाला खतरा खत्म हो जाएगा। इससे देश के संघीय ढांचे को भी एक मजबूती मिलेगी, और लोगों की महज दिल्ली आवाजाही देश के कई हिस्सों की आवाजाही में बदलेगी।

अब जब सरकारों का सारा कामकाज ई-फाइलिंग से हो रहा है, एक ही इमारत में अगल-बगल के कमरों में बैठे हुए बाबू और अफसर भी कम्प्यूटरों पर ही एक-दूसरे के साथ काम कर रहे हैं, तो ऐसे में देश के अलग-अलग हिस्सों में बिखरे हुए दफ्तरों में कामकाज में शारीरिक आवाजाही वैसे भी गैरजरूरी हो चुकी है। यह भी हो सकता है कि दफ्तरों के ढांचों को विखंडित करके देश भर में बांटने से नए दफ्तर इतने बड़े-बड़े नहीं बनाने पड़ेंगे, और कम्प्यूटरों पर चलने वाले दफ्तरों के छोटे आकार का रखरखाव भी बिजली बचाएगा, पर्यावरण भी। सुप्रीम कोर्ट और केन्द्र सरकार को पानी छींटने, और निर्माण रोकने जैसे कामचलाऊ और अधकचरे काम काफी नहीं मानना चाहिए। उसे एक दीर्घकालीन योजना बनानी चाहिए जिससे दिल्ली हर बरस और अधिक जहरीली होना थमे। दिल्ली को एक शहर मानकर उसकी समस्या हल करने के बजाय देश को एक ईकाई मानकर उसकी संभावनाओं को देखना चाहिए। जिन दफ्तरों का एक साथ रहना जरूरी नहीं है, उन्हें देश के अलग-अलग प्रदेशों में भेजा जा सकता है, और उनसे इन सारे प्रदेशों का ढांचा भी और अधिक विकसित होगा। दिल्ली की जो दुर्गति आज एक सघन जमावड़े की वजह से हुई है, उसे ढीला और खाली करना जरूरी है। अगर यह सोच दिमाग में बैठ जाए, तो आज देश के बहुत सारे प्रदेश केन्द्रीय दफ्तरों, और संवैधानिक संस्थाओं की मेजबानी करने के लिए मुफ्त में उपनगर की जगह देने के लिए तैयार हो जाएंगे। दरअसल सत्ता के इर्द-गिर्द जमावड़े का मोह किसी से छूटता नहीं है, वरना ऐसी कोई वजह नहीं है कि हर दफ्तर दिल्ली में ही रहे। आज देश में एक-डेढ़ दर्जन प्रदेश केन्द्र पर सत्तारूढ़ गठबंधन की सरकारों के ही हैं। केन्द्र सरकार समान भाव से सभी प्रदेशों से प्रस्ताव मांग सकती है, और एनडीए की सरकारों वाली प्रदेश तो केन्द्र की मर्जी के प्रस्ताव तुरंत ही भेज सकते हैं। इस देश में कम से कम चार उपराजधानियां बनानी चाहिए, और दिल्ली की दम तोड़ती हुकूमत को एक नई जिंदगी देनी चाहिए। दिल्ली के इलाज में और भी दर्जनों चीजों की जरूरत है, और उनकी चर्चा यहां पर न करके हम किसी का भी महत्व कम नहीं आंक रहे हैं, लेकिन बाकी तमाम पहलुओं पर खूब बात होती रहती है, हम इस एक अलग नजरिए को आज यहां पेश करते हुए, सिर्फ इसी पर फोकस करना चाहते हैं। दिल्ली को अपने दिल के टुकड़े दूसरे प्रदेशों के साथ बांटने चाहिए। दिल्ली के लोगों की औसत उम्र इस प्रदूषण के कारण शायद आठ बरस तक घट रही है, उनका इलाज नामुमकिन सा होते जा रहा है, और देश की राजधानी में बसी आबादी अपनी जिंदगी की सबसे बुरी निराशा से जूझ रही है। इसका इलाज इस विशाल देश के संघीय ढांचे में आसानी से हो सकता है, बस इसके लिए एक विहंगम दूरदृष्टि वाली लीडरशिप की जरूरत है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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