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‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 16 दिसंबर। असम के काजीरंगा नेशनल पार्क से रेस्क्यू की गई बाघिन रागिनी ने सोमवार सुबह 9 बजे कानन पेंडारी जूलॉजिकल पार्क में अंतिम सांस ली। लगभग 22 वर्ष की आयु पार करने के बाद उसका जीवन समाप्त हुआ। वृद्धावस्था के कारण वह लंबे समय से पर्यटकों की नजरों से दूर रही और जू के अस्पताल के केज में ही उसका जीवन बीता।
रागिनी के के-नाइन दांत नहीं थे, जिसके चलते वह कच्चा मटन नहीं खा सकती थी। उसे प्रतिदिन 5 से 6 किलो बारीक कुटा हुआ मटन (कीमा) दिया जाता था। इसी आहार पर वह सात साल तक जीवित रही।
11 अगस्त 2018 को नंदनवन जंगल सफारी, रायपुर से एक्सचेंज के तहत रागिनी को कानन पेंडारी जू लाया गया था। इसके बदले में जंगल सफारी को सफेद बाघ और बाघिन दिए गए थे। जांच के दौरान ही स्पष्ट हो गया था कि रागिनी पहले से ही उम्रदराज है।
रागिनी को ऑटोपोरोसिस नामक बीमारी थी, जिसमें हड्डियों का आकार बदल जाता है। उसे लगातार निगरानी में रखा गया और पशु चिकित्सकों ने उपचार किया। मृत्यु के बाद जिला स्तरीय समिति ने पोस्टमार्टम किया, जिसमें जू प्रशासन और नेचर क्लब बिलासपुर के प्रतिनिधि मौजूद रहे।
रागिनी को उसके तीन साथियों के साथ काजीरंगा नेशनल पार्क से रेस्क्यू किया गया था। इन बाघों ने उस क्षेत्र में भारी आतंक फैला रखा था। पकड़े जाने के बाद उन्हें गुवाहाटी जू भेजा गया। रागिनी के साथ लाए गए बाघ शिवा की उम्र वर्तमान में 15 वर्ष बताई जा रही है।


