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ट्रैप कैमरों ने खोला राज, वन विभाग चुप, ग्रामीणों में उत्साह और चिंता दोनों बढ़ी
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बैकुंठपुर, 8 दिसंबर। कोरिया वन मंडल के बैकुंठपुर परिक्षेत्र के टेमरी बीट के देवगढ़ इलाके में पिछले एक वर्ष से बाघों की गतिविधियों को लेकर चर्चाएं तेज रही हैं। अब यह चर्चा पहली बार ठोस रूप में सामने आई है। वन विभाग के ट्रैप कैमरों में ऐसी तस्वीरें कैद हुई हैं, जिनमें एक बाघिन अपने दो शावकों के साथ दिखाई दे रही है। विभाग ने इन तस्वीरों की वैज्ञानिक जांच के लिए उन्हें देहरादून स्थित विशेषज्ञ संस्थान को भेजा था, जहां से पुष्टि हुई कि तस्वीरों में एक बाघिन के साथ उसके दो शावक मौजूद हैं।
पांच महीने पहले जन्मे थे शावक—अब दिखने लगे पदचिह्न
ग्रामीणों और वनकर्मियों के अनुसार, यह बाघिन पिछले कई महीनों से इसी क्षेत्र में विचरण कर रही थी। अब उसके छोटे-छोटे पदचिह्न भी ट्रैप कैमरों व गश्ती टीमों द्वारा लगातार देखे जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि बाघिन समय-समय पर अपने शावकों के साथ बाहर निकलती है, जबकि दो अन्य नर बाघ भी इसी क्षेत्र में घूमते दिखाई देते हैं।
पिछले एक वर्ष में बाघों द्वारा 150 से अधिक मवेशियों को शिकार बनाए जाने की घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिसके बाद ग्रामीण अब अपने मवेशियों को खुले मैदान या जंगल के किनारे चरने नहीं छोड़ते और उन्हें बांधकर रखने लगे हैं।
ग्रामीण मान रहे उपस्थिति, अधिकारी बयान से बच रहे
देवगढ़ और आसपास के गांवों के निवासियों ने बाघिन और उसके शावकों को कई बार घूमते देखा है। ग्रामीणों का कहना है कि जंगल की घनी झाडिय़ों और घाटियों में अक्सर बाघ के पंजों के निशान और शावकों के छोटे पदचिह्न मिल रहे हैं। हालांकि अधिकारी अभी भी आधिकारिक बयान देने से बच रहे हैं।
वन विभाग द्वारा लगाए गए 15 ट्रैप कैमरों में जब एक साथ दो बाघों और दो शावकों की तस्वीरें आईं, तभी इनकी वैज्ञानिक पुष्टि करवाई गई। रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि यह क्षेत्र अब सक्रिय रूप से बाघों का प्रजनन क्षेत्र बन चुका है।
सूरजपुर और टाइगर रिज़र्व से प्राकृतिक जुड़ाव—क्षेत्र बना बाघों के अनुकूल आवास
देवगढ़ का वन क्षेत्र घने साल व मिश्रित वनों से घिरा हुआ है। इसकी एक तरफ सीमा सूरजपुर जिले से मिलती है, जबकि दूसरी तरफ गुरु घासीदास–तमोर पिंगला टाइगर रिज़र्व का फैला हुआ जंगल है। यह दोनों वनखंड आपस में जुड़े होने के कारण बाघों के सुरक्षित मूवमेंट के लिए आदर्श कॉरिडोर साबित हो रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, इसी प्राकृतिक जोड़ और कम मानवीय हस्तक्षेप के कारण यह क्षेत्र बाघों को विशेष तौर पर पसंद आ रहा है। यही वजह है कि यहां लगातार पदचिह्न, शिकार के अवशेष और ट्रैप कैमरों में बाघों की मौजूदगी दर्ज की जा रही है।
वन विभाग के लिए चुनौती—सुरक्षा और संरक्षण दोनों जरूरी
बाघिन और उसके शावकों की मौजूदगी जहां जिले के लिए गर्व की बात है, वहीं वन विभाग के लिए यह बड़ी जिम्मेदारी भी है। ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षा सुनिश्चित करना, मवेशियों के शिकार की घटनाओं को कम करना, बाघों के प्राकृतिक आवागमन को संरक्षित रखना और वन्यजीवों व मनुष्यों के बीच दूरी बनाए रखना आगामी महीनों में विभाग की प्रमुख चुनौतियों में शामिल होंगे।
बाघों की बढ़ती संख्या इस बात का संकेत है कि कोरिया का जंगल अब भी समृद्ध और सुरक्षित है। लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि ग्रामीणों की सुरक्षा और वन्यजीवों के संरक्षण—दोनों के बीच संतुलन बनाए रखा जाए।



