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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में 24 सालों कभी नहीं भरे जजों के पूरे पद, लंबित मुकदमों का बोझ बढ़ता जा रहा
05-Dec-2025 1:28 PM
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में 24 सालों कभी नहीं भरे जजों के पूरे पद, लंबित मुकदमों का बोझ बढ़ता जा रहा

स्थापना हुई तो 25 प्रतिशत पद खाली थे, अब 36 प्रतिशत, एक जज पर 2.1 लाख लोगों का भार

छत्तीसगढ़' संवाददाता

बिलासपुर, 5 दिसंबर। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने 4 दिसंबर को राज्यसभा में एक जानकारी दी कि देशभर की निचली अदालतों में 4.80 करोड़ मुकदमे लंबित हैं, जिला अदालतों में 4,885 जज पद खाली पड़े हैं। हाईकोर्टों में भी 297 पद रिक्त हैं। छत्तीसगढ़ में यह संकट हाईकोर्ट की स्थापना के बाद से ही मौजूद है। यहां 24 सालों से कभी भी सभी जज पद भरे नहीं गए। हमेशा रिक्तियां बनी रहीं। राज्य में लंबित मुकदमों की संख्या दिनों दिन बढ़ रही है तो इसके पीछे यह एक बड़ा कारण जजों का पद खाली रहना है।  

छत्तीसगढ़ के दूसरे सबसे बड़े शहर बिलासपुर में हाईकोर्ट की स्थापना 3 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम के तहत हुई। अदालत की क्षमता 22 जजों की है। इसमें 17 स्थायी और 5 अतिरिक्त जज शामिल हैं। लेकिन 24 वर्षों में कभी भी यह संख्या पूरी नहीं हुई। आंकड़ों के अनुसार, अधिकतम जजों की संख्या 2010-2015 के बीच 18 दर्ज की गई थी। उस समय कोर्ट ने कुछ समय के लिए बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन तब भी चार पद खाली ही रहे। वर्तमान स्थिति में कोर्ट में केवल 14 जज कार्यरत हैं, यानी 8 पद जो लगभग 36 प्रतिशत होता है, रिक्त हैं। यह स्थिति तब है जब राज्य की आबादी 3 करोड़ से अधिक हो चुकी है। ऐसी स्थिति में मानकर चलें कि एक जज को औसतन 2.1 लाख लोगों के मामलों का भार संभालना पड़ रहा है।
हाईकोर्ट के आधिकारिक रिकॉर्ड्स और विधि विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि रिक्तियों का सिलसिला लगातार बना हुआ है। 2000-2005 के शुरुआती वर्षों में केवल 10-12 जज थे, जो धीरे-धीरे बढ़े लेकिन कभी 22 तक नहीं पहुंचे। हाल के वर्षों में, 2020-2023 के बीच रिक्तियां 25-30 प्रतिशत के बीच रही हैं, जो अब बढ़कर 36 प्रतिशत हो गई हैं।  

जजों की कमी का सबसे बड़ा असर मुकदमों की लंबित संख्या पर पड़ता है। राष्ट्रीय स्तर पर, 2020-2024 के बीच लंबित मामलों में 20 प्रतिशत वृद्धि हुई, जबकि हाईकोर्टों में 33 प्रतिशत पद खाली हैं। छत्तीसगढ़ में यह संकट और गंभीर है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में 2024 के अंत तक के आंकड़ों के अनुसार लगभग एक लाख से अधिक मुकदमे लंबित हैं, जिनमें से 61 प्रतिशत मामले तीन साल से ज्यादा पुराने हैं।

राज्य के निचली अदालतों में स्थिति और खराब है। लगभग 4.5 लाख मामले लंबित हैं। इनमें से 46 प्रतिशत तीन साल से अधिक पुराने हैं। लोक अदालतों के जरिये अधिक से अधिक मामले सुलझाने की कोशिशें होती है लेकिन जजों की कमी के बिना स्थायी समाधान असंभव है। निचली अदालतों में एक जज को प्रति वर्ष औसतन 5,000-6,000 मामले निपटाने पड़ते हैं। विधि विशेषज्ञों का मानना है कि क्षमता से अधिक मुकदमों से न्याय की गुणवत्ता प्रभावित होती है। दूसरी तरफ फौजदारी मुकदमों में कोई अपराधी जब तक सजा नहीं पाता, जमानत लेकर सालों-साल खुलेआम घूमते हैं। आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों में कानून का डर भी खत्म होने का खतरा होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में रिटायर्ड जजों को अस्थायी तैनाती की सिफारिश की है, यह अमल में लाया जाए तो शायद मुकदमों का बोझ कम हो।
 


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