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कागजों में बढ़ रहा जंगल, धरातल में घट रहा
04-Mar-2022 1:07 PM
कागजों में बढ़ रहा जंगल, धरातल में घट रहा

फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट पर सीएसई और विशेषज्ञों ने उठाए सवाल, कहा- सही नहीं हो रही डेटा रिकॉर्डिंग
'छत्तीसगढ़' न्यूज डेस्क
निमली/ नई दिल्ली, 4 मार्च।
भारत में वनों की स्थिति को लेकर फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया हर दो साल में अपनी स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट जारी करता है। इस बार 13 जनवरी 2022 को यह रिपोर्ट जारी की गई। इस रिपोर्ट में एफएसआई ने देश में 2019 के मुकाबले 0.2 फीसदी और 1.6 लाख हैक्टेयर फॉरेस्ट कवर बढऩे का दावा किया है। लेकिन अनिल अग्रवाल डायलॉग के दौरान स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2021 और ग्रीन इंडिया को लेकर आयोजित चर्चा में रिपोर्ट में दिए गए आंकडों को लेकर विशेषज्ञों ने बड़े सवाल खड़े किए हैं।

सीएसई की डायरेक्टर जनरल सुनीता नारायण ने रिपोर्ट पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि रिपोर्ट में भारत में 7.753 करोड़  हेक्टेयर भूमि वन क्षेत्र होने का दावा किया गया है। इसमें से 2.587 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है कि इस क्षेत्र में वन हैं या नहीं। उन्होंने बताया कि यह क्षेत्र देश के सबसे बड़े राज्यों में से एक उत्तरप्रदेश के बराबर है और इसके बारे में रिपोर्ट में जिक्र नहीं किया गया है। उन्होंने बताया कि भारत में 70 फीसदी अति सघन वन क्षेत्रों में से 73 फीसदी क्षेत्र आदिवासी क्षेत्रों में आते हैं। सुनिता नारायण ने कहा कि खोये हुए 2.587 करोड़ हैक्टेयर वन क्षेत्र को पुन: उगाने के लिए प्रयास करने चाहिए। नारायण ने कहा कि विदेश से लकड़ी के आयात को कम करते हुए हमें देश में मौजूद संसाधनों का सही उपभोग करना चाहिए। हमें वुड बेस्ड इकॉनॉमी की ओर जाना चाहिए और जंगलों को जरूरतों के हिसाब से काटते हुए उन्हें पुर्नजीवित करते रहना चाहिए।

नेशनल सेंटर फार बायोलॉजिकल सांइस की आबिद सिद्दीकी और चेयर इन कल्चर आफ सांइस के एमडी मधुसूदन ने स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों को वास्तविक्ता से दूर बताया। उन्होंने रिपोर्ट पर सवाल खड़े करते हुए उदाहरण दिया कि रिपोर्ट के अनुसार सोनितपुर वन में 33 हजार 800 हेक्टेयर में वन क्षेत्र बढ़ा है, जबकि उनके शोध में इस क्षेत्र में 34 हजार 400 हेक्टेयर भूमि में वन क्षेत्र को नुकसान पहुंचा है। स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट में कई क्षेत्र ऐसे हैं जिन्हें वन क्षेत्र दर्शाया गया है, जबकि वास्तविकता में वहां अब शहर हैं और लोगों की घनी आबादी है। रिपोर्ट में रेगिस्तान को भी घने वन के रूप में दर्शाया गया है। मधुसूदन ने स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों को दूसरी संस्थाओं के आंकड़ों के साथ तुलनात्मक स्टडी की और इसमें भी एफएसआई की रिपोर्ट के आंकड़ों में भारी अंतर होने का दावा किया। उन्होंने एफएसआई को दूसरी संस्थाओं के साथ मिलकर काम करने की सलाह दी ताकि सही डेटा तैयार हो सके और रिपोर्ट की खामियों को कम किया जा सके। इसके अलावा उन्होंने एफएसआई को वनों की सही परिभाषा को समझने की जरूरत पर भी बल देने की बात कही। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में चाय के बागानों, सेब के बागों, नारियल के पेड़ों को भी जंगलों की श्रेणी में रखा गया है।

भूतपूर्व अतिरिक्ति पीसीसीएफ डॉ प्रमोद कांत ने डायलॉग के दौरान भारत में वुड बेस्ड इकॉनमी की मांग की चुनौतियों को लेकर कहा कि भारत में निर्माण क्षेत्र में लकड़ी का प्रयोग कम होता जा रहा है। जबकि कागज और फर्नीचर के लिए लकड़ी की जरूरत लगातार बढ़ रही है। इसपर उन्होंने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि भारत में अब लोग घर बनाने के लिए लकड़ी का कम प्रयोग कर रहे हैं और दूसरे मेटेरियल का प्रयोग कर रहे हैं। उन्होंने आंकडों में बताया कि वर्ष 2026 में निर्माण के लिए लकडी़ का प्रयोग 30.15 मिलियन क्यूबिक मीटर लकड़ी का प्रयोग हुआ था जो वर्ष 2020 में घटकर 24.27 एमसीएम रह गया है। जबकि प्लाईबोर्ड में यह 9.44 से बढ़कर 11.83 और फर्नीचर में 6.83 से 8.49 एमसीएम तक बढ़ गया है।

डॉ कांत ने भी भारत में वुड बेस्ड इकॉनॉमी को बढ़ावा देने की बात कही और बाहर से आयात होने वाली लकड़ी को कम करने की बात कही। उन्होंने कहा कि हमें जंगलों से सही पेड़ को सही समय पर काटकर प्रयोग में लाना चाहिए। उन्होंने बताया कि जंगलों में सूखे पेड़ों को समय-समय पर हटाना चाहिए और अति घने जंगलों में जरूरत के हिसाब से छंटनी भी करनी चाहिए ताकि पेड़ों की प्रतिस्पर्धा कम हों और वे अच्छे से बढ़ सकें।

सीएसई के जलवायु परिवर्तन कार्यक्रम की उप कार्यक्रम प्रबंधक अवंतिका गोस्वामी ने जंगलों की जलवायु परिवर्तन में भूमिका और कार्बन उत्सर्जन को कम करने में योगदान को लेकर जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भारत की ओर से नेट जीरो एमिशन को लेकर अलग-अलग आयाम तय किए गए हैं। कार्बन डाईऑक्साइड के उत्सर्जन को कम करना भी इसमें एक अहम आयाम है। उन्होंने बताया कि इसे कम करने के लिए अलग-अलग तरीके से काम किया जा रहा है लेकिन एविएशन क्षेत्र या अन्य यातायात के क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें कई प्रयासों के बाद भी कार्बन उत्सर्जन को कम करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए पेड़ों के माध्यम से कार्बन उत्सर्जन को कम करने के रूप में प्रयोग में लाया जाता है। गोस्वामी ने कहा कि भारत में 300 मिलियन लोगों की निर्भरता जंगलों पर है और हमें जंगलों का दोहन बहुत ही सोच समझकर भविष्य की जरूरतों को देखते हुए करना चाहिए।


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