ताजा खबर

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव: तीन चरण के मतदान के बाद कैसी नज़र आ रही है सियासी तस्वीर
21-Feb-2022 6:36 PM
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव: तीन चरण के मतदान के बाद कैसी नज़र आ रही है सियासी तस्वीर

इमेज स्रोत,UP BJP@TWITTER


-रामदत्त त्रिपाठी

उत्तर प्रदेश की अठारहवीं विधानसभा चुनाव के लिए मतदान गंगा और यमुना के उपजाऊ इलाक़ों से होता हुआ अब गोमती तट पर आ पहुँचा है. अब अवध और सरयूपार करके पूर्वांचल में चुनावी घमासान और तेज़ तथा कटुतापूर्ण होगा.

अखिलेश यादव अपने विधान सभा क्षेत्र करहल में मतदान निबटाकर अब बाक़ी जगह ध्यान देंगे, जबकि योगी आदित्यनाथ को अभी बाक़ी जगह के साथ-साथ अपने विधानसभा क्षेत्र गोरखपुर पर भी नज़र रखनी है.

एक बात पर राजनीतिक प्रेक्षक सहमत हैं कि इस बार चुनाव सीधे-सीधे योगी बनाम अखिलेश है. बसपा और कांग्रेस सरकार बनाने के खेल में शामिल नहीं हैं. गठबंधन दमदार तरीक़े से बीजेपी को चुनौती दे रहा है. मगर बीजेपी भी 'नई पहचान' के दम पर चुनौती का सामना कर रही है.

तीन चरणों की 172 सीटों पर जहॉं अब तक मतदान हो चुका है, पिछली बार भाजपा को 140 सीटें मिली थीं. केवल 32 सीटें विपक्ष को मिली थीं.

राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार दुबे का मानना है कि ''इस बार डबल इंजन की सरकार में भाजपा को डबल ऐंटी इंकम्बेंसी का सामना करना पड़ रहा है. इसमें दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी की छवि धीरे-धीरे चंद अडानी-अंबानी जैसे पूँजीपतियों के समर्थकों की हो गई है. अब वह ग़रीबों-पिछड़ों के मसीहा नहीं रहे और न ही गुजरात मॉडल में आकर्षण बचा है.''

''मोदी समर्थक सिर्फ़ इस बात से संतोष कर रहे हैं कि उन्होंने और योगी ने मुसलमानों को सत्ता से दूर और दबाकर रखा है, भले महंगाई बढ़ी या विकास नहीं हुआ पर वह भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने को प्रयत्नशील हैं.''

वहीं उत्तरप्रदेश का चुनावी दौरा कर रहे वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी इस बार एक नई पहचान के दम पर मैदान में चुनौती दे रही है.

वो कहते हैं,"राज्य में चुनाव दो अस्मिताओं पर होते थे और वो थी जाति और धर्म. जब भी जाति की अस्मिता ज्यादा प्रभावी होती थी बीजेपी रेस से बाहर हो जाती थी और धार्मिक अस्मिता प्रभावी होती थी तो बीजेपी को फायदा होता था. लेकिन इस बार चुनाव में नई पहचान जुड़ी है और वो है लाभार्थी."

वो कहते हैं,"साल 2017 में लोगों को उम्मीद थी कि बीजेपी अच्छा करेगी. ऐसे में साल 2017 का चुनाव उम्मीद का चुनाव था और 2022 का चुनाव भरोसे का चुनाव है कि सरकार ने जो कहा था वो करके दिखाया."

छह महीने या साल भर पहले तक सबको लगता था कि उत्तर प्रदेश में विपक्ष बहुत कमज़ोर और निष्क्रिय है और भाजपा सरकार फिर बनेगी. लेकिन एक के बाद एक घटनाक्रम इतनी तेज़ी से बदला कि आज भाजपा की जीत को लेकर संशय भी जताया जाता है.

उत्तर प्रदेश का राजनीतिक माहौल बदलने का श्रेय सबसे ज़्यादा पश्चिम में भारतीय किसान यूनियन नेता राकेश टिकैत और पूरब में योगी सरकार में मंत्री रहे सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर को दिया जा सकता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृषि बिल वापस तो लिया, लेकिन पूरे यूपी में किसान आंदोलनकारियों पर चले दमन चक्र के कारण उसका लाभ नहीं हुआ. राकेश टिकैत के आंसू और जयंत चौधरी पर पुलिस की लाठी से पश्चिम उत्तर प्रदेश में बहुतायत जाट किसान इस बार भाजपा के ख़िलाफ़ लामबंद हो गए.

राष्ट्रीय लोकदल और महान दल से समाजवादी पार्टी का गठबंधन हो गया. फिर ओम प्रकाश राजभर स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान और धर्म सिंह सैनी को तोड़कर सपा के साथ लाने में कामयाब हो गए. लालजी वर्मा, राम अचल राजभर, इंद्रजीत सरोज, त्रिभुवन दत्त और पिछड़े तथा दलित समुदाय के कई अन्य नेता पहले ही बहुजन समाज पार्टी छोड़कर समाजवादी पार्टी में आ गए थे.

पिछड़े वर्गों में भाजपा से नाराज़गी का एक कारण जातीय जन गणना से इनकार है. सरकारी कंपनियों का निजीकरण भी आरक्षित वर्गों के लिए चुनाव का मुद्दा है.

उत्तर प्रदेश चुनाव
अखिलेश यादव के पक्ष में क्या है

इस सबका परिणाम यह हुआ कि सामाजिक न्याय वाली राजनीतिक ताक़तें यानी पिछड़ी जातियों का एक बड़ा हिस्सा एक अरसे बाद समाजवादी पार्टी के साथ फिर गोलबंद हो गया.

पहले इन ताक़तों को भाजपा ने यह समझाकर अपने पाले में किया था कि पिछड़े वर्गों के सारे लाभ यादव ले जाते हैं. इसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा का सामाजिक आधार काफ़ी सिकुड़ गया.

न केवल पिछड़े वर्ग का मोहभंग हुआ बल्कि भाजपा समर्थक ऊँची जातियों में भी ब्राह्मण समुदाय को शिकायत है कि मुख्यमंत्री योगी राजपूत ठाकुर बिरादरी को ज़्यादा महत्व दे रहे हैं. हिन्दुस्तान टाइम्स की स्थानीय संपादक सुनीता एरन को योगी का यह जवाब बहुत चर्चित रहा कि 'उन्हें अपने राजपूत होने पर गर्व है'.

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि इस चुनाव में ऐसे तमाम ग़ैर राजनीतिक संगठन और सिविल सोसायटी के लोग भाजपा के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं जिन्हें लगता है कि मोदी और योगी की जोड़ी देश में लोकतंत्र और सामाजिक सद्भाव के लिए ख़तरा है.

जब अखिलेश यादव ने पूर्वांचल के ग़ाज़ीपुर से रथयात्रा शुरू की तो उसको अपार जन समर्थन मिला. अखिलेश यादव सुबह चार बजे लखनऊ पहुँचे और उन्हें सुनने के लिए रात भर लोग पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे पर डटे रहे.

वरिष्ठ पत्रकार सीमा चिश्ती ने मतदाताओं की नब्ज़ टटोलने के लिए कई ज़िलों का दौरा किया. उनका कहना है , "तीन बातें साफ़ हैं एक तो यह कि भाजपा के वोट बैंक में बढ़त नहीं दिखी. फिर, दो तरफ़ा चुनाव है सीधे-सीधे. यह बसपा और कांग्रेस का वोटर भी समझ रहा है. तीसरा यह कि कैंडिडेट की बात हो रही है और आर्थिक मुद्दों से जनता परेशान है. ये मुद्दे हैं- महंगाई और बेरोज़गारी. भाजपा, जिसके पास 2017 में कहने को बहुत था, प्रभावी कैंपेन था, इस समय कहानी की तलाश में दिख रही है, अगर मुस्लिम विरोधी बयानों को एक तरफ़ रखा जाए."

नोटबंदी और लॉकडाउन से असंगठित क्षेत्र का चौपट होने से सरकारी भर्तियाँ रोज़गार का सहारा हैं, लेकिन भाजपा सरकार में लाखों पद ख़ाली होना बड़ा मुद्दा रहा है, यद्यपि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का दावा रहा है कि उन्होंने साढ़े चार लाख लोगों को नौकरियाँ दीं.

पूरे उत्तर प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों में लोग छुट्टा जानवरों से बेहद परेशान हैं. साँड़ों ने फ़सल नुक़सान के अलावा बहुत लोगों की जानें भी ले लीं. लोग रात-रात भर जागकर फ़सल की रखवाली में परेशान हैं. मुख्यमंत्री योगी ने गाय-बैलों को पकड़कर गोशालाओं में रखने की स्कीम चलायी, लेकिन यह योजना भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गयी. चारा पानी के अभाव में बड़ी संख्या में गायें इन गोशालाओं में मरीं .

मंत्रियों पर आर्थिक भ्रष्टाचार का आरोप
समाजवादी पार्टी ने भाजपा से नाराज़ सरकारी कर्मचारियों को पुरानी पेंशन का वादा कर दिया जिसके बाद से कई कर्मचारी और शिक्षक संगठन इस बार खुलकर सपा गठबंधन को वोट देने की अपील कर रहे हैं .

विपक्ष ने अभी तक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर निजी तौर पर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगाया हैं. मुख्यमंत्री ने ईमानदार अधिकारियों को संरक्षण भी दिया, लेकिन यह बात आम चर्चा में है कि उनकी सरकार के अनेक मंत्रियों ने दोनों हाथ से पैसा लूटा है और हर विभाग में रिश्वत के रेट बढ़ गये हैं. इन सब कारणों से सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बना है.

बुंदेलखंड के दलित बहुल इलाक़े जालौन के पत्रकार अनिल शर्मा कहते हैं कि ''बहुजन समाज पार्टी के बारे में यह धारणा बनी कि अगर ज़रूरत पड़ी तो सुश्री मायावती फिर भाजपा से हाथ मिला सकती हैं. इसके अलावा दलित वर्ग के बुद्धिजीवियों का मायावती से मोहभंग हो चुका है. बसपा के तमाम नेता पार्टी छोड़कर सपा में शामिल हो गए हैं. इसके बावजूद माना जाता है कि बसपा का आधारभूत जाटव वोट अब भी हाथी के साथ है. हालाँकि ग़ैर जातव दलित मतदाता बसपा से खिसक चुके हैं.''

बसपा ने बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए, लेकिन अल्प संख्यक समुदाय का रुझान उनकी ओर नहीं हुआ. इसी तरह बसपा ने बड़ी संख्या में ब्राह्मण उम्मीदवार खड़े किए, पार्टी महामंत्री सतीश मिश्र ने राम मंदिर में पूजा कर चुनाव अभियान शुरू किया. लेकिन सत्ता की दौड़ में न दिखायी देने से बसपा के प्रति इस समुदाय का रुझान नहीं हुआ.

कांग्रेस कहां है
प्रियंका गांधी की तमाम मेहनत के बावजूद कांग्रेस इतनी कमजोर है कि मुस्लिम समुदाय की पसंद नहीं बन सकी. पर कांग्रेस इस बार सभी विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव लड़कर आगे के लिए अपनी चुनाव मशीनरी दुरुस्त कर लेगी और उसके कुछ मतदाता भाजपा से वापस भी आ सकते हैं.

10 फ़रवरी को पहले दौर के मतदान में दिखा कि मुस्लिम समुदाय मुज़फ़्फ़रनगर दंगों का दर्द भुलाकर जाट किसानों के साथ लोक दल और समाजवादी पार्टी गठबंधन के साथ खड़ा रहा. दूसरे दौर में तो मुस्लिम मतदाताओं की तादाद वैसे भी ज़्यादा थी. इसलिए यहाँ भी भाजपा को पहले जीती तमाम सीटें गँवानी पड़ सकती हैं.

20 फ़रवरी को तीसरे चरण के मतदान में झाँसी, जालौन आदि बुंदेलखंड के एक बड़े हिस्से में वोट पड़े. पिछली बार भाजपा ने बुंदेलखंड की सभी 19 सीटें जीती थीं, लेकिन पत्रकार अनिल शर्मा का आकलन है कि यहाँ भी भाजपा को आधी सीटों का नुक़सान है.

तीसरे दौर में यादवलैंड के नाम से मशहूर इटावा, फ़िरोज़ाबाद, मैनपुरी, एटा आदि में भी वोट पड़ा. यहीं करहल से अखिलेश यादव पहली बार विधान सभा चुनाव लड़े. भाजपा ने केंद्रीय मंत्री एस पी सिंह बघेल को उतार कर करहल में अखिलेश यादव को घेरने की कोशिश की. लेकिन मुलायम सिंह यादव ने पूरे कुनबे के साथ दौरा करके अखिलेश यादव की जिताने की भावनात्मक अपील की, जिसका असर अगल-बगल के इलाक़ों पर भी पड़ा.

हालाँकि किसानों की नाराज़गी के सवाल पर प्रदीप सिंह कहते हैं कि किसान कभी भी वोट बैंक नहीं रहे हैं.

वो कहते हैं,"किसानों के सबसे बड़े नेता रहे हैं चौधरी चरण सिंह और उनको कभी बहुमत नहीं मिला है. जैसे ही चुनाव आता है वो या तो जाति पर बंटता है या धर्म पर बंट जाता है."

मतदान प्रतिशत का मतलब
तीनों दौर के मतदान में एक बात यह देखने को मिली कि ग्रामीण इलाक़ों और सपा गठबंधन के इलाक़ों में वोट का प्रतिशत ज़्यादा रहा, लेकिन शहरों और भाजपा समर्थक इलाक़ों में मतदान के प्रति उत्साह कम रहा. कानपुर जैसे महानगर में न केवल भाजपा नेताओं की सभाओं और रोड शो में भीड़ कम रही, बल्कि मतदान भी कम रहा.

भारतीय जनता पार्टी के नेता भी अनौपचारिक बातचीत में मानते हैं कि मतदान कम होने से भाजपा का नुक़सान होगा. उनका कहना है भाजपा कार्यकर्ता लोगों से मतदान कराने के प्रति उत्साहित नहीं है. समझा जाता है कि भाजपा आला कमान को इस बात का एहसास है कि इस बार हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण पहले जैसा नहीं हो पाया है.

अमर उजाला के पूर्व संपादक कुमार भवेश चंद्र के अनुसार, ''इसीलिए अब भाजपा मतदाताओं को डरा रही है कि अगर अखिलेश यादव वापस सत्ता में आ गये तो गुंडे बदमाश और मुसलमान फिर सत्ता में प्रभावी हो जायेंगे.''

कुमार भवेश चंद्र विशेषकर रविवार को हरदोई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण का हवाला देते हैं. अहमदाबाद बम धमाकों में जिन अड़तीस लोगों को अदालत ने सज़ा सुनायी है उसमें से कुछ आज़मगढ़ ज़िले से हैं जहॉं से इस समय अखिलेश यादव लोक सभा सदस्य हैं .

अदालत के इस फ़ैसले का हवाला देकर प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि ''गुजरात के आतंकवादियों ने सपा के चुनाव निशान साइकिल पर बम रखे थे. उन्होंने बनारस के संकट मोचन मंदिर और कई अन्य स्थानों पर बम धमाकों का उल्लेख करते हुए कहा कि मैं हैरान हूँ आतंकवादियों ने साइकिल को क्यों पसंद किया. प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी सभा में लोगों को उस महिला की भी याद दिलाई जिसने कहा था कि मोदी का नमक खाया है.''

भारतीय जनता पार्टी अपने समर्थकों में यह धारणा बनाने में काफ़ी हद तक कामयाब रही है कि अपराधी सपा सरकार में हावी हो जाते हैं और यह कि योगी आदित्यनाथ का बुलडोज़र ही इनको क़ाबू कर सकता है.

दूसरा, प्रधानमंत्री मोदी ने बड़े सुनियोजित ढंग से मतदाताओं को सीधे लाभ पहुँचाने वाली योजनाएँ चलायीं जिनमें गैस चूल्हा, फ़्री राशन , तेल, नमक, मकान, किसान सम्मान राशि आदि शामिल हैं.

बीजेपी की रणनीति
राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार दुबे इतना बड़ा लाभार्थी मतदाता मंडल तैयार करने को मोदी की नयी पोलिटिकल टेक्नोलॉजी कहते हैं. आम तौर माना जाता है कि भाजपा इन्हीं योजनाओं की बदौलत चुनाव जीतने की उम्मीद लगाये है.

लेकिन अभी यह देखना बाक़ी है कि क्या सपा गठबंधन का समर्थन करने वाले मुस्लिम और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं पर भी फ़्री राशन का प्रभाव काम करेगा.

इटावा में तो बीजेपी उम्मीदवार सरिता भदौरिया भरी सभा में अपने वोटरों को कोस रही थीं कि पैसा भी ले लिया, फ़्री का राशन भी ले लिया, मकान भी ले लिया पर नमक का हक़ अदा नहीं कर रहे हैं और नमस्कार का जवाब तक नहीं दे रहे हैं.

तमाम मतदाताओं को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि यह सब जनता को टैक्स के पैसे से मिला है न कि भाजपा नेताओं की जेब से.

दूसरा रसोई गैस, सरसों तेल, पेट्रोल डीज़ल का लगातार महँगा होते जाना मतदाताओं को बहुत खल रहा है.

प्रदीप सिंह कहते हैं,"कुछ लोग ऐंटी इंकम्बेंसी की बात कर रहे हैं पर आप ये देखिए कि अगर सत्ताधारी पार्टी के किसी भी कार्यक्रम या योजना के बारे में विरोधी बात करें तो ये प्रो इंकम्बेंसी है."

" यहां राज्य के करीब 15 करोड़ लोगों को दो बार राशन मिल रहा है, 40 लाख से ज्यादा लोगों को मकान मिले हैं . बिजली 24 घंटे आ रही है. जो पहले केवल पांच वीआईपी ज़िलों में आती थी हर ज़िले में आ रही है. ग्रामीण इलाकों में 22 घंटे मिल रही है और शहरों में 24 घंटे मिल रही है. तो ये परिवर्तन है लोगों को दिख रहा है."

प्रदीप सिंह ये भी कहते हैं कि 'राज्य का मुसलमान जो साफ कहता है कि हम बीजेपी को वोट नहीं देंगे वो भी मानते हैं कि घर उनके सबसे ज्यादा मिले, राशन उनको मिल रहा, दूसरी योजनाओं का लाभ मिल रहा है'.

बेरोज़गारी और महंगाई
बेरोज़गारी और महंगाई के मुद्दे राम मंदिर और काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर के निर्माण पर भारी पड़ते दिख रहे हैं.

भारतीय जनता पार्टी विश्व की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करती है और उसे संघ परिवार के विशाल कार्यकर्ता समूहों का गुमान है, लेकिन क्या कारण है कि ये सब मिलकर भी सत्ता विरोधी रुझान को रोक नहीं पा रहे हैं.

एक कारण तो यह बताया जाता है कि मोदी युग में भाजपा अपने कार्यकर्ताओं से ज़्यादा वेतनभोगी आईटी सेल की फ़ौज और विज्ञापन से ख़रीदे अथवा कॉरपोरेट मीडिया पर भरोसा करती है और दूसरे सरकार चलाने में निर्वाचित जन प्रतिनिधियों के बजाय नौकरशाही पर भरोसा करती है.

मुख्यमंत्री योगी के हर रोज़ के प्रेस नोट में अफ़सरों की टीम के एवेन्यू का ज़िक्र होता था. मंत्रिमंडल के लोगों से भी सलाह-मशविरा का अभाव बताया जाता है.

पहली बार ऐसा हुआ कि सत्तारूढ़ दल के सौ से ज़्यादा विधायक विधानसभा के अंदर मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ धरने पर बैठे. भाजपा आला कमान चाहकर भी नेतृत्व परिवर्तन नहीं कर पाया क्योंकि योगी के बाग़ी हो जाने का डर था.

हर तरह से योगी को कंट्रोल करने में नाकाम होने पर प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली से एक रिटायर हो रहे आईएएस अफ़सर दुर्गा शंकर मिश्र को ठीक चुनाव से पहले चीफ़ सेक्रेटरी बनाकर भेजा. उन्होंने काम संभालते ही छुट्टा जानवरों की समस्या पर ध्यान केंद्रित किया, लेकिन तब तक भूखी-प्यासी गौमाता भाजपा की राजनीतिक फ़सल चर गयी थीं.

भाजपा के बड़े नेताओं मोदी और योगी की सभाओं में भीड़ नहीं जुटी. पूरे यूपी में लगभग सौ स्थानों से खबरें आयी हैं कि लोगों ने भाजपा के विधायकों और उम्मीदवारों को अपने गाँवों में प्रचार भी नहीं करने दिया. ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया.

क्या योगी का बुलडोज़र बाधा दूर कर पाएगा?
कुल मिलाकर विपरीत परिस्थितियों के बावजूद औरैया इटावा के शिवा त्रिपाठी की तरह बहुत से भाजपा नेता कहते हैं कि आयेंगे तो योगी ही, यानी भाजपा अकेले या जोड़-तोड़ से सरकार बना लेगी.

दूसरी तरफ़ लखनऊ निवासी दिल्ली के पूर्व उप-राज्यपाल नज़ीब जंग ने करन थापर और आशुतोष से इंटरव्यू में खुलकर कहा कि उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. नजीब जंग का तर्क है कि ऐसा इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रचार नहीं कर रहे हैं. नजीब जंग का तर्क है कि मोदी अब भी लोकप्रिय हैं और पब्लिक योगी से नाराज़ है.

तथ्यात्मक रूप से यह सही नहीं है कि मोदी ने प्रचार नहीं किया. इसे सम्भावित हार का सारा ठीकरा योगी के सिर पर फोड़ने की कोशिश कहा जा सकता है.

ग़ौरतलब तथ्य यह भी है कि यूपी की जनता बदल-बदल कर सबको आज़माने में विश्वास रखती है. 1989 के बाद से उत्तर प्रदेश में कोई मुख्यमंत्री या पार्टी रिपीट नहीं हुई है. (bbc.com)


अन्य पोस्ट