अंतरराष्ट्रीय
खसरे के खिलाफ बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान के बावजूद एशिया और अफ्रीका महाद्वीप के कुछ देशों में यह बीमारी नए सिरे से फैल रही है. बांग्लादेश में इसकी चपेट में आने से कम से कम पांच सौ बच्चों की मौत हो चुकी है.
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी की रिपोर्ट –
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के मुताबिक, खसरे से हर साल दुनिया भर में करीब 95 हजार लोगों की मौत हो जाती है. हाल के दिनों में बांग्लादेश और मेक्सिको में ही इस बीमारी का सबसे गंभीर प्रकोप दिखा है.
बांग्लादेश इस बीमारी के अब तक के सबसे भयावह प्रकोप से जूझ रहा है. फिलहाल बांग्लादेश के 64 में से 58 जिलों में इस बीमारी का प्रकोप है. देश में 50 हजार से ज्यादा ऐसे मामलों की पुष्टि हो चुकी है और इस पर अंकुश लगाने में स्वास्थ्य सेवाओं को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. इस बीमारी के टीके की उपलब्धि में रुकावटों की वजह से नियमित टीकाकरण नहीं होना ही इसकी सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है. इससे देश में मोहम्मद युनूस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के कार्यकाल के दिनों में होने वाली कथित लापरवाही पर भी सवाल उठ रहे हैं.
अब करीब पांच सौ बच्चों की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग और यूनिसेफ ने करीब 1.8 करोड़ बच्चों के लिए बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान शुरू किया है.
कितनी खतरनाक बीमारी है खसरा
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, निमोनिया, बर्थ एस्फिक्सिया यानी प्रसव के दौरान या जन्म के तुरंत बाद नवजात शिशुओं को पर्याप्त मात्रा में आक्सीजन नहीं मिलना और समय-पूर्व प्रसव के अलावा नवजात का वजन कम होने जैसी वजहों से देश में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 30 से 31 प्रति एक हजार तक है.
खसरा: रोकी जा सकने वाली घातक बीमारी
अब हालत यह है कि राजधानी ढाका समेत देश के तमाम प्रमुख शहरों के तमाम अस्पताल दूर-दराज से आने वाले मरीजों से भर गए हैं. बांग्लादेश में यूनिसेफ के एक अधिकारी मिगेल माटिओस मुनोज ने पत्रकारों से कहा, "बीते साल सरकार ने टीके की सप्लाई में बदलाव का प्रयास किया था. इससे टीकाकरण में देरी हुई. बीते तीन साल के दौरान टीका नहीं लेने वाले बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ी है." उनका कहना था कि कम से कम दो डोज लेने की स्थिति में ही इस टीके का प्रभाव होता है. लेकिन ज्यादातर मामलों में या तो टीका ही नहीं लगा या फिर एक बार ही टीका लगा है.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि खसरा छुआछूत वाली बीमारी है और यह बीमारी किसी लक्षण सामने आने से पहले ही एक मरीज से दूसरे में फैल सकती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आंकड़ों के मुताबिक इस बीमारी की चपेट में आने वाले प्रति एक हजार में से दो या तीन लोगों की मौत हो सकती है. प्रभावी टीके की मौजूदगी के बावजूद वर्ष 2024 में खसरे से पूरी दुनिया में करीब एक लाख लोगों की मौत हो गई.
बांग्लादेश के हाल से और देश भी हुए सतर्क
बांग्लादेश में इस बीमारी के प्रकोप ने दूसरे देशों को भी सतर्क कर दिया है. इसकी वजह यह है कि इसकी चपेट में आने वाला मरीज आसानी से यह संक्रमण फैला सकता है. अमेरिका में वर्ष 2000 में इस बीमारी के खत्म होने का एलान किया गया था. लेकिन अब वहां भी इसका प्रकोप दिखने लगा है. इसके अलावा भारत, मेक्सिको और कुछ अफ्रीकी देशों में भी यह बीमारी और इससे होने वाली मौतें बढ़ रही हैं.
बांग्लादेश में स्वास्थ्य विभाग के प्रवक्ता जाहिद रेहान ने पत्रकारों को बताया, "खसरे से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में स्थिति अब धीरे-धीरे सुधर रही है. हालांकि पूरी तरह अंकुश लगाने में कुछ समय लगेगा. वहां बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान चल रहा है."
ढाका में कोविड-19 अस्पताल की संचालक डॉ. लतीफा रहमान बताती हैं, "दूरदराज के कस्बों से लोग आतंकित होकर राजधानी के अस्पतालों में पहुंच रहे हैं. इससे इसके संक्रमण का खतरा और बढ़ गया है." हालांकि स्वास्थ्य मंत्री सरदार मोहम्मद सखावत हुसैन का दावा है कि खसरे से पीड़ित तमाम मरीजो को अंतरराष्ट्रीय स्तर का इलाज मुहैया कराया जा रहा है. उन्होंने ढाका में पत्रकारों से बातचीत में कहा, "हमने बहुत कम समय में भारी तादाद में टीके का इंतजाम किया है. अब तक दुनिया.या के किसी भी देश को ऐसा करने में कामयाबी नहीं मिली है."
खसरा इतना घातक क्यों होता है?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि खसरे से पीड़ित बच्चों की लगातार बढ़ती संख्या से यह साबित नहीं होता कि इस बीमारी का प्रकोप कम हो रहा है. उनका कहना है कि अब टीकाकरण अभियान पूरा होने के कुछ दिनों बाद ही इसके असर का पता चलेगा. तब तक इंतजार ही किया जा सकता है. ढाका के एक शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. मोहम्मद इरफान डीडब्ल्यू से कहते हैं, "खसरे की चपेट में आने वाले बच्चो की रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहद कम हो जाती है. इसकी वजह से उनके निमोनिया और दूसरी बीमारियों की चपेट में आने की आशंका बढ़ जाती है. बेहतर इलाज नहीं मिल पाने के कारण मौतों की तादाद बढ़ रही है."
खसरे का टीका मौजूद है फिर भी क्यों हो रही है बीमारी
स्कॉटलैंड के चिकित्सक फ्रांसिस होम ने वर्ष 1757 में अपने शोध के आधार पर बताया था कि खसरा मरीजों के रक्त में मौजूद एक संक्रामक कारक के कारण होता है. वर्ष 1912 में खसरा अमेरिका में राष्ट्रीय स्तर पर सूचित करने योग्य बीमारी बन गई. इसके तहत देश में स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने वाली संस्थाओं और इस बीमारी की जांच करने वाली प्रयोगशालाओं के लिए ऐसे मामलों की जानकारी देना अनिवार्य बना दिया गया. उसके बाद के एक दशक के दौरान इस बीमारी की चपेट में आकर हर साल औसतन करीब छह हजार लोगों की मौत रिकार्ड की गई थी. वर्ष 1963 में जॉन एंडर्स और उनके सहयोगियों ने खसरा वायरस का टीका बनाया और अमेरिका में उनको इसका लाइसेंस मिला.
डब्ल्यूएचओ का कहना है कि खतरे से होने वाली ज्यादातर मौतें अब भी उन देशों में होती हैं जहां स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचा क्षतिग्रस्त है या वहां के लोग गंभीर कुपोषण के शिकार हैं.


