अंतरराष्ट्रीय
-मैट पियर्सन
फुटबॉल खेलने पर प्रतिबंध और देश-निकाला झेलने के बाद, अफगान महिला टीम ने अपना अंतरराष्ट्रीय दर्जा वापस पाने के लिए काफी संघर्ष किया. वे अपने देश की आधिकारिक नेशनल टीम के रूप में फुटबॉल के सबसे बड़े मुकाबलों में खेल सकेंगी.
कई सालों तक जान बचाकर भागने, कड़ा संघर्ष करने और हक की आवाज उठाने के बाद, आखिरकार अफगानिस्तान की महिलाओं ने एक जीत हासिल कर ली है. अब वे अपने देश की आधिकारिक नेशनल टीम के रूप में फुटबॉल के सबसे बड़े मुकाबलों में खेल सकेंगी.
इसी हफ्ते टोरंटो में फुटबॉल की वैश्विक संस्था ‘फीफा' ने एक अभूतपूर्व फैसला लिया. इस फैसले ने अफगान महिला टीम के लिए रास्ते खोल दिए हैं, ताकि वे 2028 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक और उसके बाद होने वाले वर्ल्ड कप और एशियन कप के लिए क्वालीफाई करने की कोशिश कर सकें.
यह उस टीम के लिए एक और बड़ी सफलता है जिसे खेलने के अपने अधिकार के लिए लड़ना पड़ा है. दरअसल, तालिबान के नियंत्रण वाला फुटबॉल संघ अफगानिस्तान की राष्ट्रीय महिला टीम को मान्यता देने से लगातार इनकार करता रहा है.
नेशनल टीम की गोलकीपर इलाहा सफदारी ने डीडब्ल्यू को बताया, "यह हमारे लिए बहुत बड़ी बात है. अब हम दुनिया को बता पाएंगे कि अफगानिस्तान की महिलाएं क्या कुछ हासिल कर सकती हैं. यह तालिबानियों और उन लोगों के मुंह पर करारा तमाचा है जिन्होंने हमें रोकने की कोशिश की थी.”
इलाहा ने आगे कहा, "हम दुनिया के सामने यह साबित कर रहे हैं कि खेलों के माध्यम से हम बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं. इसके साथ ही, हमारा संघर्ष उन महिलाओं के लिए भी है जिनकी आवाज दबा दी गई है और जो आज भी अपने घरों में कैद हैं.”
इस फैसले से दूसरों के लिए खुल सकता है दरवाजा
सफदारी ‘अफगानिस्तान वीमेन यूनाइटेड' की उस टीम का हिस्सा थीं, जिसने 2025 में मोरक्को में ‘फीफा यूनाइट्स वीमेन सीरीज' नाम के एक छोटे टूर्नामेंट में भाग लिया था. इस टीम में वे शरणार्थी खिलाड़ी शामिल हैं जो अब ज्यादातर ऑस्ट्रेलिया और यूरोप में रहती हैं. इन लोगों को कई तरह की कानूनी, राजनीतिक और रहने-खाने से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. संभावना है कि यही खिलाड़ी अब नई नेशनल टीम का मुख्य हिस्सा बनेंगी.
फीफा के अध्यक्ष जियानी इनफैनटिनो ने कहा कि संगठन की काउंसिल में लिया गया यह फैसला ‘ऐतिहासिक' है. उन्होंने कहा कि इसका मतलब यह है कि फीफा अब "असाधारण परिस्थितियों में किसी राष्ट्रीय या प्रतिनिधि टीम के पंजीकरण को मंजूरी दे सकता है, जहां उस देश का फुटबॉल संघ ऐसा करने में असमर्थ हो.”
वह कहते हैं, "विश्व खेल जगत में यह एक मजबूत और बेमिसाल कदम है. फीफा ने इन खिलाड़ियों की बात सुनी है, क्योंकि यह उसकी जिम्मेदारी है कि वह हर लड़की और महिला के फुटबॉल खेलने और अपनी पहचान को दुनिया के सामने रखने के अधिकार की रक्षा करे.”
इनफैनटिनो ने अपनी संस्था की ‘अफगान महिला फुटबॉल के लिए कार्य-नीति' का भी जिक्र किया, जिसे 2025 में मंजूरी दी गई थी. उन्होंने इस नीति को इस बड़े बदलाव का मुख्य कारण बताया.
आंद्रेया फ्लोरेंस, स्पोर्ट एंड राइट्स अलायंस एडवोकेसी ग्रुप की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं. उन्होंने बताया कि नियमों में किया गया यह बदलाव एक मिसाल पेश करता है. यह दिखाता है कि "जब असाधारण परिस्थितियां मांग करती हैं, तो खेल संस्थाएं मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अपने नियमों में बदलाव कर सकती हैं.”
इससे शायद दूसरी नेशनल टीमों के लिए भी रास्ते खुलेंगे. खासकर, महिला टीमों के लिए, जिन्हें उनके फेडरेशन खेलने का मौका नहीं देते.
निर्वासन में रह रही खिलाड़ियों के लिए बड़ा पल
अफगानिस्तान की पूर्व कप्तान खालिदा पोपल, नई पीढ़ी के लिए एक मिसाल बन चुकी हैं. इस घोषणा के समय वह फीफा अध्यक्ष इनफैनटिनो के बगल में बैठी थीं. वहीं दूसरी ओर, टीम की वर्तमान खिलाड़ी कहीं और से एक साथ इस खबर को ऑनलाइन देख रही थीं.
उन्होंने कहा, "यह फैसला बहुत मायने रखता है. अफगानिस्तान की महिलाओं की पूरी स्थिति बहुत ही भावुक कर देने वाली है. यह हमारा पल है. यह हमारा समय है. फुटबॉल हमारी आवाज और हमारा मंच है.”
सफदारी और उनके साथियों के लिए, यह भविष्य की ओर देखने और उस टीम भावना को आगे बढ़ाने का मौका है जो उन्होंने मोरक्को के टूर्नामेंट के दौरान बनाई थी. बता दें कि मोरक्को में खेलते वक्त अफगान टीम को पूरी तरह से राष्ट्रीय टीम के तौर पर मान्यता नहीं मिली थी.
सफदारी ने कहा, "हमारी स्थिति दूसरी टीमों से काफी अलग है, लेकिन मुझे लगता है कि यही हमारी सबसे बड़ी ताकत है. हम कड़ी ट्रेनिंग कर रहे हैं. हम इसी लक्ष्य के लिए मेहनत कर रहे हैं और यह हमारे लिए उम्मीद की नई किरण है. यह हमारी हिम्मत को दिखाता है और साबित करता है कि अगर हम कड़ी मेहनत करें, तो अपने लक्ष्यों को जरूर हासिल कर सकते हैं.”
तालिबान के सत्ता से बाहर होने तक लड़ाई जारी रहेगी
अफगानिस्तान में महिलाओं के हालात को देखते हुए, सफदारी और अन्य खिलाड़ी जानती हैं कि जब तक तालिबान सत्ता में है, उनकी लड़ाई पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. फिर भी, इन खिलाड़ियों को अफगान महिला अंतरराष्ट्रीय एथलीट के रूप में एक ऐसा मंच मिला है जो बहुत कम लोगों को नसीब होता है. अब जब उनका यह मंच और भी बड़ा हो गया है, तो वे अपने देश में मौजूद बेजुबान महिलाओं के लिए यहां से और जोर से आवाज उठाने के लिए तैयार हैं.
सफदारी कहती हैं, "सबसे पहले मुझे अपने माता-पिता की याद आई, जो अभी भी घर पर हैं. उन्हें यह खबर मिल चुकी है और उन्हें इस बात पर गर्व है कि मैं अपनी जिंदगी में कितनी दूर तक आ गई हूं. अपने देश के लिए खेलना और अपने लोगों, परिवार और माता-पिता को गर्व महसूस कराना मेरे लिए सचमुच एक बहुत बड़ी बात है.”
वह आगे कहती हैं, "जाहिर है, मुझे अपने उन दोस्तों और लोगों से बहुत हौसला मिला है जो अभी भी अफगानिस्तान में ही हैं. हमें यह देखकर बहुत सुकून मिल रहा है कि कैसे वे सोशल मीडिया पर इस खबर को लेकर हमारे साथ खड़े हैं और हमें सपोर्ट कर रहे हैं.”
इस टीम को अंतरराष्ट्रीय ब्रेक के दौरान फीफा से आर्थिक मदद और सहयोग मिलता है. अब यह टीम न्यूजीलैंड में इकट्ठा होने वाली है. पिछले अक्टूबर में मोरक्को में हुए मैचों के बाद यह उनका पहला मुकाबला होगा. ओलंपिक क्वालीफायर शुरू होने से पहले, वे आठ दिनों के ट्रेनिंग कैंप के दौरान कुक आइलैंड्स के खिलाफ एक मैच खेलेंगी. इसके बाद, उन्हें वर्ल्ड कप, एशियन कप क्वालिफायर और नए आधिकारिक दर्जे से मिलने वाले तमाम बड़े मौकों में हिस्सा लेने का अवसर मिलेगा.
सफदारी ने कहा, "यह सुनकर बहुत अच्छा लगता है कि अफगानिस्तान इन टूर्नामेंट में हिस्सा ले सकता है. मुझे अब भी यकीन नहीं हो रहा कि हमें आखिरकार आधिकारिक तौर पर मान्यता मिल गई और हम क्वालिफायर मैच खेल सकते हैं.”
यह टीम हाल के वर्षों में एक साथ खेलना तो दूर, मुश्किल से एक ही देश में रही है. उन्हें पुरानी कमियों को दूर करने के लिए अभी बहुत काम करना बाकी है. हालांकि, सफदारी जैसी खिलाड़ियों ने बहुत कम उम्र में परदेस में नई जिंदगी बसाई और फुटबॉल खेलने के अपने हक के लिए लड़ाई लड़ी. ऐसे में उनके लिए यह कोई डरावनी या मुश्किल चुनौती नहीं है. (dw.com/hi)


