अंतरराष्ट्रीय
मौजूदा हालात का असली केंद्र युद्धविराम नहीं, बल्कि उस पर छाया गहरा अविश्वास है. अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अचानक हमले रोकने और युद्धविराम बढ़ाने की बात कही, लेकिन इसके साथ ही समुद्री नाकेबंदी जारी रखी. यही सबसे बड़ा अड़ंगा बन गया है. ईरान ने साफ कहा कि जब तक यह नाकेबंदी हटाई नहीं जाती, किसी “पूरे युद्धविराम” की बात बेमानी है.
दो हफ्ते पुराना अस्थायी युद्धविराम कब खत्म हुआ या बढ़ा, यह भी स्पष्ट नहीं, क्योंकि दोनों पक्षों ने अलग-अलग संकेत दिए हैं. इसी बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान की सख्ती बढ़ी है, जहां उसने दो जहाज जब्त कर लिए और वैश्विक तेल आपूर्ति के इस अहम रास्ते पर दबाव और बढ़ा दिया.
ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर कालीबाफ ने अमेरिका के रुख को “खुलेआम युद्धविराम उल्लंघन” बताया. ट्रंप के बयान पर उन्होंने सीधे कहा, “आप सैन्य आक्रामकता से अपने लक्ष्य हासिल नहीं कर पाए और धमकी देकर भी नहीं कर पाएंगे” और यह भी जोड़ा, “एकमात्र रास्ता ईरानी लोगों के अधिकारों को मान्यता देना है.” दूसरी तरफ, अमेरिका ने नाकेबंदी और सख्त कर दी है. कई जहाजों को लौटाया गया और एशियाई समुद्री रास्तों में ईरानी टैंकरों को रोका गया.
बातचीत की कोशिशें भी फिलहाल बेअसर दिख रही हैं. पाकिस्तान की मध्यस्थता के बावजूद इस्लामाबाद में तय बैठक नहीं हो सकी और कोई नई समय-सीमा भी सामने नहीं आई. अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करे, जबकि ईरान प्रतिबंध हटाने, नुकसान की भरपाई और जलडमरूमध्य पर अपने नियंत्रण की मान्यता मांग रहा है. इस खींचतान के बीच युद्ध रुका हुआ जरूर लगता है, लेकिन हल कहीं नजर नहीं आता, और इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल कीमतों पर साफ दिख रहा है. (dw.com/hi)


