संपादकीय
लोग जिंदगी के बारे में कहते हैं कि वह हमेशा इंसाफपसंद नहीं रहती, लाईफ इज नॉट ऑलवेज फेयर। होता भी यही है, बहुत से लोगों को जिंदगी में तकलीफें इतनी अधिक झेलनी पड़ती हैं कि लगता है कि जिंदगी उनसे कोई बदला निकाल रही है। अब यह मामला इंसानी जिंदगी से बढक़र आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस तक पहुंच गया है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च से एआई मॉडल्स की एक कमजोरी पता लगी है कि जब इन्हें सिर्फ जीतने, अधिक लोकप्रिय बनाने, या अधिक टिप्पणी, लाईक्स, शेयर हासिल करने के मुकाबले में उतारा जाता है, तो ये सच को छोडक़र आगे बढ़ जाते हैं। इनमें से कोई भी काम करने के लिए, या किसी सामान को किसी भी तरह बेचने के लिए, किसी चुनाव में वोट बंटरोने के लिए, या सोशल मीडिया पर किसी इश्तहार की तरफ लोगों का ध्यान खींचने के लिए जब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को झोंका जाता है, तो वह नैतिक-अनैतिक में फर्क छोड़ देता है, झूठ बोलने से उसे कोई परहेज नहीं रहता, वह चीजों को बढ़ा-चढ़ाकर बताने लगता है, और गलत जानकारी देने में भी उसे कोई बुराई नहीं लगती क्योंकि उसे मुकाबला करना है। एआई इस तरह के मुकाबलों में जितना कामयाब होता है, उतने ही अधिक अनैतिक तौर-तरीके उसने इस्तेमाल किए होते हैं। ऐसा लगता है कि मानो कोई बाजारू कारोबारी धंधे के मुकाबले में कुछ भी नैतिक-अनैतिक नहीं मान रहा, और सही-गलत कुछ भी करके आगे बढ़ रहा है।
बच्चों से लेकर बड़ों तक खेला जाने वाला भारत में हिन्दीभाषियों के बीच जिसे व्यापार कहा जाता है, वह अंग्रेजी में मोनोपोली कहलाता है, यानी एकाधिकार। बचपन में खेले गए व्यापार की कुछ याद अभी तक ताजा है, और वह बताती है कि किस तरह रेलवे के साथ-साथ एयरलाईंस भी खरीद लेने वाले कारोबारी के सामने से निकलने के लिए अधिक भुगतान करना होता है, और इसके साथ-साथ बस सर्विस और शिप भी किसी ने खरीद ली है, तो उसका एकाधिकार उसे कई गुना अधिक कमाई दिलाता है। आज से 50 बरस पहले हमने व्यापार खेलते हुए जिन बातों को देखा था, वह आज हिन्दुस्तान में अडानी जैसी कंपनियां सचमुच ही कर रही हैं, एयरपोर्ट, बंदरगाह, रेलवे स्टेशन, खदान, बिजलीघर, और भी जाने क्या-क्या। अभी अमरीका में ट्रंप के एक सबसे पसंदीदा कारोबारी का नाम चीनी कंपनी टिकटॉक के संभावित अमरीकी भागीदार का नाम सामने आया जो कि एक-एक करके अमरीका के तमाम महत्वपूर्ण और संवेदनशील कारोबारों में दखल दे चुका है, और अब वह टिकटॉक को कंट्रोल करने वाला भी होने जा रहा है। उसने अभी एक इंटरव्यू में यह कहा कि जिस व्यापार में एकाधिकार न किया जा सके, वह कोई व्यापार ही नहीं होता।
अब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को कोई तोहमत क्यों दी जाए, क्योंकि यह तो आज की ताकतवर ह्यूमन इंटेलीजेंस भी कह रही है। और ट्रंप के पसंदीदा लोगों से यह उम्मीद तो उन लोगों के परिवार, या ट्रंप, किसी को भी नहीं होगी, कि वे सच ही बोलेंगे, और नैतिक काम ही करेंगे। खुद ट्रंप ऐसी नैतिक सोच से कोसों दूर है, और नैतिकता कहीं दिख जाए तो ट्रंप अपनी बुलेटप्रूफ कार से उतरने को तैयार नहीं होता। ऐसे में एआई ने अगर चुनाव के लिए वोट जुटाने, सामान के लिए ग्राहक जुटाने, सोशल मीडिया पोस्ट के लिए वाहवाही जुटाने के लिए अनैतिक काम किया, तो वह तो साफ-साफ ट्रंप का असर दिख रहा है। यह एक अलग बात है कि ट्रंप ने आज अमरीकी विश्वविद्यालयों पर जो आतंक फैलाने की कोशिश की है, तो कई जगहों पर शोधकर्ता एआई की नैतिकता को ट्रंप की अनैतिकता से जोडक़र देखने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे।
आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस इंसानी सोच से कुछ अलग-अलग भी चल रहा था, लेकिन अब इंसानों के साथ संबंध और संपर्क की वजह से उसने इंसान की खूबियां और खामियां कुछ अधिक हद तक सीख ली है। सीखने का यह सिलसिला इंसानों की कल्पना करने की शक्ति से भी अधिक ताकत के साथ आगे बढ़ रहा है। यह समझ पड़ता है कि एआई जब इंसानों जैसी कमीनगी भी सीख लेगा, तो फिर वह इंसानों सरीखी तानाशाही की हसरत भी पा लेगा। इंसानी तानाशाह तो फिर भी किसी फौज की हिफाजत के घेरे में रहते हैं, ट्रंप की तरह चार बरस की सुनामी की तरह आते हैं, या अपने-अपने देशों में अराजकता या धर्मान्धता से आते हैं। उन्हें लोकतंत्र से परे की कुछ चीजें तो लगती ही हैं। लेकिन एआई की तानाशाही इन सबसे परे सिर्फ अपनी ही हिकमत से कायम हो सकती है, उसे तो ऊपर की इस फेहरिस्त में से कुछ भी नहीं लगेगा, क्योंकि वह अपना रास्ता खुद बना सकेगा, और खुद उस पर मनचाही मंजिल तक, मनचाही रफ्तार से आगे बढ़ सकेगा। एआई चूंकि एक मशीनी मॉडल है, इसलिए यह सोचा जा रहा था कि वह इंसान की कुछ मानवीय कमजोरियों से मुक्त भी रह सकता है, लेकिन उसने ऐसी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। दुनिया की सबसे बड़ी ताकत को अगर किसी अनैतिक बात से कोई परहेज नहीं होगा, तो फिर उसके सामने अंतरिक्ष भी कोई सीमा नहीं रहेगा।
हम प्रलयवादी सोच के नहीं हैं, लेकिन अगर एआई अपने दिल-दिमाग से, या आतंकियों के हाथ का हथियार बनकर दुनिया के इंसानों को तबाह कर देगा, तो भी उससे बहुत बड़ा नुकसान नहीं होगा। धरती के बाकी प्राणी, और धरती की प्रकृति इंसानी-प्रदूषण से मुक्त होकर बेहतर तरीके से फल-फूल सकेंगे, और एक बेहतर जिंदगी जी सकेंगे, जो कि इंसानों ने नामुमकिन कर दी है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


