संपादकीय
पंजाब में एक डीआईजी ने जब एक कारोबारी से रिश्वत उगाही की कोशिश की, तो उसने सीबीआई को शिकायत की, और कुछ लाख रूपए लेते हुए यह डीआईजी गिरफ्तार तो हुआ ही, इसके साथ-साथ जब उसके ठिकानों पर छापा पड़ा, तो साढ़े 7 करोड़ की नगद नोट, 5 करोड़ का सोना मिला, और इसके अलावा भारत, दुबई, और कनाडा में 71 प्रॉपर्टियों के सुबूत भी मिले। इस डीआईजी अर्चना सिंह भुल्लर ने अपने इलाके के कारोबारियों और सट्टेबाजों सरीखे मुजरिमों से महीना बांध रखा था। एक पुलिस अफसर ने लोगों से रकम निचोडऩे के लिए कई एजेंट तैनात कर रखे थे, और वे उसके लिए बैग और लिफाफे लेकर आने के एवज में कमीशन पाते थे। इस देश में बरसों पहले एक नोटबंदी हुई थी, और यह माना जा रहा था कि उसके बाद कालाधन खत्म हो जाएगा। अभी किसी पीडब्ल्यूडी अफसर के घर, तो किसी आबकारी अफसर के घर के छापों में करोड़ों की नगदी मिली है, और अब पंजाब में इस डीआईजी से। फिर यह भी है कि यह राज्य सरकार ने अपनी निगरानी से की हुई कार्रवाई की हो, ऐसा भी नहीं है। शिकायतकर्ता सीबीआई तक पहुंचा, और सीबीआई ने रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा। क्या कोई यह सोच सकते हैं कि किसी राज्य की सरकार को उसके ऐसे अरबपति बन चुके अफसर की खबर न हो कि वह परले दर्जे का भ्रष्ट है? शायद ऐसे ही नजारे के लिए किसी ने एक गाना लिखा था- पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा, हाल हमारा जाने है, जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग तो सारा जाने है...।
आज जब हिन्दुस्तान का तकरीबन पूरा हिस्सा लक्ष्मी पूजा की तैयारी में लगा हुआ है, और गैरहिन्दू कारोबारी भी अपने व्यापार की जगह पर बराबरी के उत्साह से लक्ष्मी पूजा करते हैं, तब कुबेर सरीखा यह खजाना कई लोगों के मुंह चिढ़ाता है। पंजाब पुलिस में दर्जनों डीआईजी होंगे, और उनमें से एक डीआईजी अगर 71 प्रॉपर्टी का मालिक मिल रहा है, जिसने घर पर साढ़े 7 करोड़ की नगदी रखी हुई है, सोना जिसके पास किलो के हिसाब से है, तो फिर देश में इस स्तर के हजारों अफसर हैं। इस स्तर से परे भी सरकार के कई ऐसे कमाऊ विभाग हैं जिसमें अखिल भारतीय सेवाओं के अफसरों की जरूरत नहीं पड़ती, और मझले दर्जे के विभागीय अफसर ही छापे में सैकड़ों के आसामी मिलते हैं। हमारा अपना अंदाज यह है कि किसी भी भ्रष्ट अफसर पर छापे में उसकी काली कमाई के पांच-दस फीसदी से अधिक की बरामदगी नहीं होती। इसके कोई सुबूत दर्जे के आंकड़े हमारे पास नहीं है, लेकिन हम आसपास पर्याप्त संख्या में भ्रष्ट लोगों को देख चुके हैं, और उनके पैसे खपाने की क्षमता भी जाहिर रहती है।
लक्ष्मी पूजा की चर्चा हमने इसलिए की है कि लोग मानते हैं कि पूजा करने से लक्ष्मी मिलती है। और पूजा करने के साथ-साथ धर्म की जो दूसरी मान्यताएं रहती हैं, उन्हें भी कई लोग मानते हैं कि दान-धरम करना चाहिए। लेकिन जब भ्रष्ट अफसरों और नेताओं को देखें, तो लगता है कि ऐसी कौन सी देवी हो सकती है जो ऐसे लोगों के भ्रष्टाचार का साथ देती होगी? अभी दो-चार साल के भीतर ही बंगाल में एक कोई ऐसे मंत्री पकड़ाए थे जिनकी प्रेमिका का एक खाली फ्लैट फर्श से छत तक नोटों से भरा हुआ था। भला धर्म की कौन सी धारणा इस तरह की कमाई का साथ दे सकती है? लक्ष्मी पूजा के ठीक पहले पंजाब के डीआईजी का कुबेर का ऐसा खजाना मिलना, दो दिन पहले गोहाटी में नेशनल हाईवे के एक बाबू के घर से 2 करोड़ 62 लाख रूपए नगद मिलना, ऐसी अंतहीन खबरों से हर हफ्ते यह समझ आता है कि नोटबंदी के बावजूद बैंक की किसी छोटी ब्रांच जितनी नगदी एक-एक अफसर के घर से निकलना देश की हकीकत है। सरकार किसी भी पार्टी की रहे, बहुत से नेता और अफसर इसी तरह कुबेर रहते हैं। काली कमाई का ऐसा जखीरा धर्म के असर से कायदे से तो भस्म हो जाना चाहिए था, लेकिन वह बढ़ते ही चलता है। सौ-पचास में से कोई एक मामला भांडाफोड़ होने से पकड़ाता है, वरना वह दुनिया भर में पूंजीनिवेश में खप जाता है।
दीवाली का मौका यह भी याद दिलाता है कि भारत में कारोबार करने के लिए व्यापारियों को सरकार में किस तरह, और किस हद तक रिश्वत देनी पड़ती है। अब लक्ष्मी पाने के लिए अगर उसकी इस तरह की पूजा अनिवार्य हो जाती है, तो फिर कौन सी सरकार ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का दावा कर सकती है? भारत में यह सिलसिला भयानक है। इसका एक और बड़ा बुरा नुकसान होता है, कि मोटी रिश्वत, कमीशन, या रंगदारी देने की लागत व्यापार के खर्च में ही जुड़ जाती है, और इससे बाजार में एक गैरबराबरी का मुकाबला भी खड़ा हो जाता है। रिश्वत देने वाले लोग सरकारी खजाने को चूना लगाने के लिए कई तरह की छूट पाने लगते हैं, और उन्हीं के व्यापार में उन्हीं के मुकाबले जो दूसरे लोग रिश्वत नहीं देते, रियायत नहीं पाते, वे धीरे-धीरे मुकाबले से बाहर होने लगते हैं। यह कहा जाता है कि नकली नोट धीरे-धीरे असली नोटों को चलन से बाहर करने की क्षमता रखते हैं, ठीक उसी तरह खराब और भ्रष्ट व्यापारी धीरे-धीरे बाजार से अच्छे और ईमानदार व्यापारियों को बाहर करने की क्षमता रखते हैं।
पूरे देश में अखिल भारतीय सेवा के अफसरों का राज है। हम यह नहीं कहते कि उनमें से हर कोई भ्रष्ट है, लेकिन हम इतना तो पुख्ता जानते हैं कि जो नियमित रूप से और लंबे समय तक भ्रष्ट रहते हैं, उनकी जानकारी राज्य सरकार और केन्द्र सरकार में सभी संबंधित लोगों को रहती है। कोई चाशनी में लपेटकर भी इस बात को हमारे गले उतारने की कोशिश करेंगे कि सरकारें अनजान रहती हैं, तो भी हम उस बात को नहीं मानेंगे। भ्रष्ट की शोहरत दूर तक रहती है, और उससे अनजान रहने का दावा करने वाले लोग अक्सर ही उसमें शामिल भी रहते हैं। इसलिए देश-प्रदेश की सरकारों को यह चाहिए कि पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुके सरकारी तंत्र का कोई इलाज सोचा जाए, क्योंकि यह लोकतंत्र को खत्म करने की पुख्ता ताकत रखता है। दीवाली की लक्ष्मी पूजा यही हो सकती है कि इस देश में रिश्वत, भ्रष्टाचार, सरकारी-रंगदारी जैसे कालेधन को खत्म करने के बारे में सोचा जाए, वरना औपचारिकता के लिए एक तस्वीर या प्रतिमा की पूजा का कोई फायदा नहीं है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


