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स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर-2020 नाम से प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में वायु प्रदूषण के कारण 5 लाख से अधिक नवजात बच्चों की मौत हो जाती है। रिपोर्ट के अनुसार अत्यधिक प्रदूषण में पलने वाले बच्चे यदि बच भी जाते हैं तो भी उनका बचपन अनेक रोगों से घिरा रहता है.
हाल में ही प्रकाशित स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर-2020 नामक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में वायु प्रदूषण के कारण 5 लाख से अधिक नवजात शिशुओं की मौत हो जाती है। रिपोर्ट के अनुसार अत्यधिक प्रदूषण में पलने वाले बच्चे यदि बच भी जाते हैं तब भी उनका बचपन अनेक रोगों से घिरा रहता है.
वायु प्रदूषण का घातक असर गर्भ में पल रहे शिशुओं पर भी पड़ता है, इससे समय से पूर्व प्रसव या फिर कम वजन वाले बच्चे पैदा होते हैं और ये दोनों ही शिशुओं में मृत्यु के प्रमुख कारण हैंI ऐसी अधिकतर मौतें विकासशील देशों में होती हैं. रिपोर्ट के अनुसार बुजुर्गों पर वायु प्रदूषण के असर का विस्तार से अध्ययन किया गया है, पर शिशुओं पर इसके प्रभाव के बारे में अपेक्षाकृत कम पता हैI इस रिपोर्ट को हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टिट्यूट नामक संस्था ने प्रकाशित किया है.
वायु प्रदूषण से नवजातों की कुल मृत्यु में से दो-तिहाई का कारण घरों के अन्दर का प्रदूषण है. यहां यह ध्यान रखना आवश्यक है कि भारत समेत तमाम विकासशील देशों में घरों के अन्दर के प्रदूषण स्तर का कोई अध्ययन नहीं किया जाता और ना ही इसके बारे में कोई दिशानिर्देश हैं. घरों के अन्दर वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण बंद घरों के अन्दर की रसोई है, जिसपर लकड़ी, उपले इत्यादि जैव-इंधनों से खाना पकाया जाता है.
पिछले वर्ष अमेरिका के वाशिंगटन में अमेरिकन एसोसिएशन फॉर एडवांसमेंट इन साइंसेज की वार्षिक बैठक में घरों के अन्दर के प्रदूषण पर चर्चा की गई और इसे एक गंभीर समस्या माना गया. यह समस्या तो गंभीर है, पर इसकी हमेशा से उपेक्षा की जाती रही है. यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर के वैज्ञानिकों के अनुसार सामान्य घर के कामकाज जैसे खाना पकाना, साफ-सफाई और दूसरे कामों से घरों के अन्दर पार्टिकुलेट मैटर और वोलाटाइल आर्गेनिक कंपाउंड्स (वीओसी) उत्पन्न होते हैं. पार्टिकुलेट मैटर के बारे में तो हम लगातार सुनते रहते हैं पर वीओसी ऐसे रसायनों का समूह है जो केवल घातक ही नहीं है, बल्कि कैंसर-जनक भी है.
वीओसी का स्त्रोत घरों के अन्दर शैम्पू, परफ्यूम, रसोई और सफाई वाले घोल हैं, जबकि पार्टिकुलेट मैटर खाना बनाने और सफाई के दौरान उत्पन्न होते हैं. विश्व स्तर पर वाहनों से गैसों और पार्टिकुलेट मैटर के उत्सर्जन पर बहुत चर्चा की जाती है, पर घरों के अन्दर के इनके स्त्रोतों पर हम चुप्पी साध लेते हैं. इस अध्ययन की अगुवाई मारिया वन्स ने की थी और इस दल ने वर्ष 2018 में कुछ घरों के भीतर प्रदूषण के स्तर का वास्तविक अध्ययन किया था. घरों के अन्दर प्रदूषण का स्तर इन लोगों के अनुमान से अधिक था और प्रदूषण का स्तर पता करने वाले सेंसर्स को कुछ दिनों में ही फिर से कैलिबरेट करना पड़ता था.
मारिया वन्स के अनुसार संभव है कि वीओसी का दुनिया में सबसे बड़ा स्त्रोत घरों के अन्दर की गतिविधियां और घरों के अन्दर इस्तेमाल किये जाने वाले रसायन हों. घरों के अन्दर रसायनों का उपयोग लगातार बढ़ता जा रहा है और इस कारण घरों के अन्दर फॉर्मलडिहाइड, बेंजीन, अल्कोहल और कीटोन जैसे रसायनों की सांद्रता बढ़ती जा रही है. ये सभी रसायन ज्ञात कैंसर जनक हैं.
इस वार्षिक बैठक में ड्यूक यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तुत शोधपत्र में बताया गया कि घरों के अन्दर का प्रदूषण बच्चों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है. सोफा सेट, विनाइल फ्लोरिंग और फ्लेम रीटारडेट से खतरनाक रसायनों का उत्सर्जन होता रहता है. यह घर के अन्दर के वातावरण, जिसे वैज्ञानिक एसोस्फेयर कहते हैं, को प्रभावित और प्रदूषित करता है. इन रसायनों के प्रदूषण के कारण श्वसन, चर्म और प्रजनन से संबंधित विकार उत्पन्न होते हैं. विनाइल फ्लोरिंग वाले घरों में रहने वाले बच्चों के मूत्र में बेंजाइल ब्यूटाइल थैलेट की सांद्रता सामान्य घरों के बच्चों की तुलना में 15 गुना अधिक पाया गया.
घरों के अन्दर इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण, फ्लोरिंग और निर्माण सामग्री से लगातार सेमी-वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स का उत्सर्जन होता रहता है और यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है. अध्ययन दल की प्रमुख हीथर स्तैप्लेटन के अनुसार इन सभी के अत्यधिक उपयोग करने वाले घरों के बच्चों के रक्त और मूत्र के नमूनों में सेमी-वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स की सांद्रता कई गुना अधिक होती है. फोम में पोलीब्रोमिनेटेड डाईफिनाइल ईथर का उपयोग किया जाता है। इस कारण इनका अधिक उपयोग करने वाले घरों के बच्चों के रक्त में इसकी सांद्रता 6-गुना अधिक हो जाती है. इसके प्रभाव से मोटापा, मस्तिष्क के विकास और एंडोक्राइन तथा थाइराइड कैंसर हो सकता है.
स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2020 के अनुसार वर्ष 2019 में दुनिया में कुल 67 लाख व्यक्तियों की असामयिक मृत्यु वायु प्रदूषण के कारण हुई है और वायु प्रदूषण दुनिया में मौत के बड़े कारणों में चौथे स्थान पर है. वायु प्रदूषण के कारण नवजात शिशुओं की सबसे अधिक मौतें अफ्रीका में और एशिया में होती हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफ़ोर्निया की वैज्ञानिक बेट रिट्ज के अनुसार घरों के अन्दर वायु प्रदूषण की सबसे अधिक समस्या भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका में है. इस रिपोर्ट के अनुसार वायु प्रदूषण से बच्चों के मस्तिष्क और दूसरे अंगों पर भी प्रभाव पड़ता है.
यूनिसेफ द्वारा जून 2018 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में लगभग सभी जगहों पर वायु प्रदूषण निर्धारित सीमा से अधिक है, जिससे बच्चे सांस के रोगों, फेफड़ों के रोगों, दमा और अल्प विकसित मस्तिष्क के शिकार हो रहे हैं. पांच वर्ष के कम उम्र के बच्चों की मृत्यु में से से दस प्रतिशत से अधिक का कारण सांसों की बीमारियां हैं जो वायु प्रदूषण के कारण होती हैं. यूनिसेफ के अनुसार विश्व में 2 अरब बच्चे खतरनाक वायु प्रदूषण वाले क्षेत्रों में रहते हैं, जिनमे से 62 करोड़ बच्चे दक्षिण एशियाई देशों में हैं.
भारत में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा प्रायोजित एक अध्ययन के अनुसार दिल्ली के एक-तिहाई बच्चों के फेफड़े सामान्य काम नहीं करते. यूनिसेफ द्वारा दिसम्बर 2017 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में अधिकतर बच्चों के मस्तिष्क की कार्य-प्रणाली वायु प्रदूषण के कारण प्रभावित हो रही है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2018 में “एयर पोल्यूशन एंड चाइल्ड हेल्थ” नामक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इसमें बताया गया है कि पूरी दुनिया में वर्ष 2016 के दौरान पांच वर्ष से कम उम्र के 6 लाख बच्चों की मौत वायु प्रदूषण के कारण हुई, इसमें से एक लाख से अधिक बच्चे अकेले भारत के थे. रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में कुल 101788 बच्चों की मौत वायु प्रदूषण के कारण हुई, इसमें 54893 लड़कियां थीं, जबकि 46895 लड़के थे. ये आंकड़े वायु प्रदूषण के घातक प्रभाव के साथ ही लड़के और लड़कियों की परवरिश के भेदभाव को भी उजागर करते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार बच्चों के स्वास्थ्य से संबंधित लगभग हरेक अनुसंधान वायु प्रदूषण के घातक प्रभाव बता रहे हैं. बच्चे मंदबुद्धि हो रहे हैं, जन्म के समय कम वजन के बच्चे पैदा हो रहे हैं, गर्भ में भी बच्चे वायु प्रदूषण के प्रभाव से अछूते नहीं हैं, इनका तंत्रिका तंत्र प्रभावित हो रहा है, दमा के मामले बढ़ रहे हैं, ह्रदय रोग के मामले बढ़ रहे हैं, सांस के रोग हो रहे हैं और बच्चे मर रहे हैंI दुनिया भर में लगभग 90 प्रतिशत बच्चे, जिनकी कुल संख्या 1.8 अरब है, ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं, जहां वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर है. भारत जैसे विकासशील देशों में तो हालत और भी खराब है और लगभग 98 प्रतिशत बच्चे अत्यधिक प्रदूषित माहौल में रहते हैं.
हम हमेशा बात करते हैं कि आनेवाली पीढी के लिए कैसी दुनिया छोड़कर जाएंगे, पर यदि वायु प्रदूषण का यही हाल रहा तो सत्य तो यही है कि हम आनेवाली पीढियां ही नहीं छोड़ के जाएंगेI जो जिन्दा रहेंगे उनके भी फेफड़े और मस्तिष्क सामान्य तरीके से काम नहीं कर रहे होंगे. (navjivanindia.com)
भोपाल, 25 अक्टूबर| कोरोना महामारी के प्रकोप के बीच मौसम में हो रहे बदलाव के साथ मध्य प्रदेश में स्वाइन फ्लू का खतरा बढ़ चला है। इससे निपटने और रोकथाम के लिए स्वास्थ्य विभाग ने अधिकारियों को आवष्यक दिशा-निर्देश जारी किए हैं। स्वास्थ्य संचालनालय द्वारा राज्य के सभी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी और सिविल सर्जन को लिखा गया है कि मौसम के बदलाव के कारण स्वाइन फ्लू सीजनल इन्फ्लूएन्जा (एच-1 एन-1) के प्रकरण होने की संभावना होती है। इसलिए संभावित सीजनल इन्फ्लूएन्जा (एच-1 एन-1) के मरीजों की स्क्रीनिंग, निदान, उपचार व रोकथाम के लिये और उपचार के लिए भारत शासन द्वारा तय किए गए प्रोटोकॉल और गाइडलाइन का पालन व कार्यवाही की जाए।
बताया गया है कि इस बुखार का सबसे ज्यादा खतरा बच्चों, गर्भवती महिलाओं, किसी घातक बीमारी से ग्रसित व्यक्ति को होता है, इसलिए उन्हें अधिक सतर्क रहने की जरुरत ज्यादा है।
सभी स्वास्थ्य अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि प्रतिदिन दो बार फीवर क्लीनिक में सर्दी-खांसी मरीजों की रिपोर्ट राज्य सर्विलेंस इकाई को भेजें तथा पूरा ब्यौरा रखा जाए। (आईएएनएस)
जनवरी 2009 में जब बराक ओबामा ने अमेरिका के 44वें राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली थी, तब इसे बड़े पैमाने पर अमेरिका के लिए नया सवेरा माना गया था। देश के नए अश्वेत राष्ट्रपति के तौर पर उन्हें श्वेत मतदाताओं ने भी भारी संख्या में वोट किए थे। उन्हें उम्मीद जगी थी कि नए ढंग से बन रहे राजनीतिक परिदृश्य में अमेरिका बेहतर तरीके से शांतिपूर्ण और समृद्ध बन सकेगा। पर हमने गिरते नस्लीय रिश्तों और व्यक्तिगत पहचान के भारी उभार वाली स्थिति देखी जिससे राष्ट्र-राज्य में और अधिक ध्रुवीकरण ही हुआ। अमेरिका भिन्न-भिन्न विचारों वाला देश नहीं रह गया। नस्ली भेदभाव और लिंग भेद के साथ जातीय राजनीति ने दोनों तरफ जुनून भड़काना शुरू कर दिया। इससे आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर कोई आम राय बनाने में आम तौर पर दिक्कत होने लगी।
इसमें शक नहीं कि डोनाल्ड ट्रंप ने मतदाताओं, खास तौर से श्वेत मतदाताओं, के बीच इस विभाजन और असंतोष का लाभ उठाया और 2016 में राष्ट्रपति-पद का चुनाव जीत लिया। यह ऐतिहासिक जीत थी जिससे अमेरिका और दुनिया भर के वैश्विकवादियों में ‘राजनीतिक वर्ग’ सन्न रह गया। तब निवर्तमान डेमोक्रेटिक प्रशासन के साथ मतदाताओं के असंतोष से अधिक यह उनकी जीत थी। निस्संदेह, ट्रंप के चुनाव को तकनीक आधारित नीतियों, वाशिंगटन में सत्ता के बढ़ते केंद्रीयकरण और उन अनियंत्रित प्रवासी नीतियों को झटके के तौर पर देखा गया जिनके डेमोक्रेट भारी पक्षधर थे। इस उग्र अभियान का स्वर ऐसा तीखा था जो शर्मसार करने वाला था। ट्रंप और डेमोक्रेट की उम्मीदवारी नफरत वाली थी। एक ने दूसरे को महिलाओं से घृणा करने वाला, अज्ञात लोगों के प्रति भयभीत, लैंगिकवादी और नस्लीय भेदभाव करने वाला, तो दूसरे ने पहले को गहरे तक भ्रष्टाचारी और अविश्वसनीय कहा।
2020 की राजनीति की दृष्टि से काफी कुछ बदल गया है और अमेरिका आज ऐसा गहरे तक विभाजित देश है जहां ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ शांतिपूर्ण नहीं रह गया है और नेताओं की नई पीढ़ी के पैरोकार ऐसे रचनात्मक बदलाव की मांग कर रहे हैं जिनके बारे में कुछ साल पहले तक एकदम सोचा भी नहीं जा सकता था। कोई नहीं जानता कि यह, बस, गुजर जाने वाला घटनाक्रम है या अमेरिका ऐसी आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था के लिए तैयार है जो दुनिया के लिए रश्क करने वाली चीज रही है और जो आर्थिक तौर पर साधनहीन देशों के लाखों-लाख लोगों को अपने सपने जमीन पर उतारने के लिए लुभाती रही है।
हमें यहां एशियाई भारतीय कहा जाता है। अमेरिका में ऐसे लोगों की संख्या आबादी का एक प्रतिशत से थोड़ा ज्यादा है। यह सबसे सफल प्रवासी समूहों में है जो अमेरिका को अपना घर कहता है। भारतीय परिवार की औसत आय देश में किसी भी अन्य जातीय समूह से ज्यादा है। इसमें संदेह नहीं कि कथित तौर पर ‘माता-पिता द्वारा तय किए गए विवाह’ वाली व्यवस्था ने उन लोगों की आय के स्तर में मदद की होगी जिनमें दो प्रोफेशनल लोग हैं जो इस समुदाय में आम बात है। इसके साथ ही, यह माना जाता है कि यहां लगभग पांच लाख भारतीय नागरिक हैं जिनके पास दस्तावेज नहीं हैं और जो या तो वीसा अवधि समाप्त होने के बाद भी रुक गए हैं या दलालों की मदद से मैक्सिको सीमा पार कर यहां आ गए हैं। इन दलालों को यहां काइयोट- उत्तरी अमेरिका में पाए जाने वाले छोटे भेड़िये, कहते हैं। ये सभी समूह मिलकर अमेरिका में बढ़ते भारतीय डायस्पोरा के हिस्से बनते हैं।
हालांकि भारतीय अमेरिका अपने सामाजिक दृष्टिकोण में अधिकांशतः रूढ़िवादी हैं। जरूरी नहीं कि उन्होंने अपने जातीय संबंधों या नुकसानदेह सोच को साफ ही कर लिया है। पर वे उस डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रति झुकाव रखते हैं जो नीतियों और शासन के मामले आने पर बहुत लिबरल और वाम-उन्मुख है। इस तरह के रुख से जुड़े कई कारण हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी को प्रवासी मसले और सामाजिक लाभ-जैसे सामुदायिक मुद्दों के लिए सकारात्मक तरीके से देखा जाता है। पार्टी को अपने सभी नागरिकों के अल्पसंख्यक अधिकारों और सिविल अधिकारों का बेहतर ध्यान रखने वाले के तौर पर माना जाता है। हालांकि एच1बी वीसा वाले अभी वोट बैंक के तौर पर नहीं उभरे हैं लेकिन उन्हें भारतीय समुदाय का समर्थन हासिल है। वे भी रिपब्लिकन की तुलना में डेमोक्रेटिक नेतृत्व से स्थायी निवास हासिल करने के मामले में अधिक सकारात्मक रुख रखने की आस रखे हुए हैं। यह सिद्धांतों या मूल्य आधारित निर्णय से अधिक आत्मरक्षा को लेकर है।
दूसरी पीढ़ी वाले भारतीय प्रवासी मसले और अपने देश से जुड़ी सांस्कृतिक परंपराओं के समावेश से संबंधित अपने लाइफस्टाइल और अपने दर्शन में खुले दिमाग वाले और प्रगतिशील हैं। वे डेमोक्रेटिक पार्टी के उन मूल्यों और इसके मंच को अपनाने के प्रति झुकाव रखते हैं जो वृहद सोच वाली हैः समावेशी, समानता और निष्पक्षतावादी। इस नई पीढ़ी की युवतियां गर्भपात के अधिकार और समान काम के लिए समान वेतन समेत महिला अधिकारों का भी समर्थन करती हैं। कई को अतिदक्षिणपंथी आंदोलनों के संभावित उभार पर ये आशंकाएं उचित ही लगती हैं कि यह उनकी सुरक्षा और उनके बच्चों के आर्थिक स्थायित्व के लिए खतरा हो सकते हैं।
ऐसे में, हाल में हुए जनमत सर्वेक्षण में इससे कम ही या लगभग नहीं ही आश्चर्य हुआ जिसने संकेत दिया कि करीब 70 फीसद एशियाई भारतीयों ने जो बिडेन/कमला हैरिस को टिकट दिए जाने के पक्ष में वोट डाले। हैरिस भारतीय अमेरिकी हैं, हालांकि वह राजनीतिक कारणों से अपने को ‘ब्लैक अमेरिकन’ कहलाना पसंद करती हैं। हैरिस को जिस तरह अमेरिका में दूसरे नंबर के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति के तौर पर समर्थन मिला है, वही डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रति विश्वास और समाज के अभिन्न अंग के तौर पर उनकी स्वीकारोक्ति का प्रमाण है।(navjivan)
काबुल, 25 अक्टूबर (स्पूतनिक) अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में शिक्षा केंद्र के पास हुए आत्मघाती बम हमले में 30 लोगो की मौत गई है तथा कम से कम 70 अन्य घायल हो गए है। रक्षा सूत्र ने यह जानकारी दी है।
इस बीच स्वास्थ्य मंत्रालय के एक सूत्र ने बताया कि विस्फोट से मरने वालों की संख्या 18 से अधिक है और 50 अन्य लोग घायल हुए हैं। सूत्र के अनुसार घायलों में से 37 को काबुल के जिन्ना अस्पताल ले जाया गया है।
शनिवार को एक आत्मघाती हमलावर ने राजधानी काबुल के दश्त-ए-बारची के पड़ोस में पुल-ए-खोश क्षेत्र में एक शिक्षा केंद्र के पास बम विस्फोट किया। आंतरिक मंत्रालय ने शनिवार को हमले में मरने वालों की संख्या 13 तथा 30 अन्य लोग घायल होने की बात कही थी।
अफगानिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा निदेशालय के अनुसार हमलावर शिक्षा केंद्र में प्रवेश करने का प्रयास कर रहा था।
आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है।
बिहार चुनाव अभियान में 'पंद्रह साल' का ज़िक्र बार-बार सुनाई दे रहा है. लालू के 15 साल की तुलना नीतीश के 15 साल से की जा रही है.
15 वर्षों के बाद एक और कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री पद के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के दावेदार नीतीश कुमार अपनी चुनावी सभाओं में 'लालू यादव के जंगल राज' की अक्सर याद दिलाते हैं. कई बार अपने 'सुशासन' के दावे से भी बढ़कर.

नीतीश लोगों को 15 साल पहले के बिहार की तस्वीर दिखाते हुए पूछ रहे हैं, "हमारे शासन से पहले बिहार का क्या हाल था? शाम के बाद किसी को अपने घर से निकलने की हिम्मत थी? कितनी घटनाएँ घटती थीं सामूहिक नरसंहार की?''
वो कहते हैं, ''पहले अपहरण, सांप्रदायिक दंगे, और कितना कुछ होता था. लेकिन जब आप लोगों ने काम करने का मौक़ा दिया, तो हमने क़ानून का राज कायम किया. जंगल राज से मुक्ति दिलाई."
नीतीश कुमार तथाकथित जंगल राज की याद जिस तरह से दिला रहे हैं उसे समझना पहली बार वोट देने वाले नौजवानों के लिए ज़रा मुश्किल है.

दरअसल, बिहार में युवा वोटरों ने केवल घर के बड़े-बुज़ुर्गों से 1990 से 2005 वाले दौर के क़िस्से सुने होंगे.
18-35 आयु वर्ग वाले मतदाताओं की संख्या इस बार के चुनाव में लगभग 50 फ़ीसदी है यानी लगभग आधे वोटर 36 साल से कम उम्र के हैं.

नीतीश कुमार 2005 से 2020 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे हैं. मई 2014 से नौ महीने छोड़कर, जब जीतनराम मांझी को उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया था.
अपने 15 साल के बही-खाते से ज़्यादा लालू राज के 15 साल के हिसाब-किताब की ज़रूरत भला उन्हें क्यों आन पड़ी है?

लालू के बिहार और नीतीश के बिहार को करीब से देखने वाले वरिष्ठ समाजशास्त्री शैबाल गुप्ता कहते हैं, "पहले बिहार में शासन नाम की चीज़ नहीं थी. नीतीश जब सत्ता में आए तो उन्होंने सबसे पहला काम शासन स्थापित करने का किया.''
''आगे के वर्षों में उसी शासन को मजबूत करने की कोशिश की. जनता में सत्ता के अधिकार और उसके प्रति विश्वास जगाया. वो ऐसा इसलिए कर पाए क्योंकि उन्होंने कई बड़े अपराधियों जैसे आंनद मोहन और मुन्ना शुक्ला को जेल भेजा. इससे अपराधियों में डर पैदा हुआ".
शैबाल कहते हैं, "नीतीश राज के पहले क्राइम करने के बाद अपराधी हीरो बन जाता था और अगले चुनाव में उसकी उम्मीदवारी पक्की मानी जाती थी लेकिन नीतीश राज में इस बात पर रोक लग गई."
नीतीश के कार्यकाल में बिहार में अपराध में कमी आई है, ऐसा वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारीका मानना है.
बीबीसी से बातचीत में कन्हैया कहते हैं, "मेरा पैतृक घर रोहतास ज़िले में पड़ता है लेकिन लालू के दौर में मैं शाम को काम ख़त्म करने के बाद पटना से रोहतास जाने में डरता था लेकिन आज के दौर में आप रात को गाँव की शादी में शामिल होकर सुबह पटना अपने काम पर लौट सकते हैं. सड़कें अब बेहतर हो गई हैं. बिजली भी घंटों तक रहती है. अपराध कम हुए हैं."
नीतीश अपनी रैलियों में दावा करते हैं कि अपराध के मामले में एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक़ बिहार 23वें स्थान पर है.
बीबीसी ने अपराध से जुड़े बिहार पुलिस के आँकड़ों का अध्ययन किया और उनमें क्या पाया, ये आप इस ग्राफ़ से समझ सकते हैं.
राज्य में विकास के सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी एक क़िस्सा सुनाते हैं.
वो याद करते हैं,"ट्रैफ़िक पुलिस में तैनात मेरे एक मित्र ने सड़क पर नियम तोड़ते हुए फर्राटा भर रही एक फॉर्च्यूनर गाड़ी को नहीं रोका लेकिन उसके पीछे चल रही स्कॉर्पियो गाड़ी को रोक लिया.''
''मैने उनसे पूछा कि ऐसा क्यों? तो मेरे मित्र ने जवाब दिया कि पहले गाँव का मुखिया बोलेरो से चलता था और नेता स्कॉर्पियो से. लेकिन नीतीश राज में विकास ऐसा हुआ कि अब मुखिया स्कॉर्पियो से चलता है और नेताओं ने फॉर्च्यूनर ख़रीद ली है. फॉर्च्यूनर में नेताजी थे, इसलिए उनको नहीं रोका".
कन्हैया कहते हैं, "सबकी सम्पत्ति पाँच साल में दोगुनी हो गई है. मुखिया हो या नेता. ये विकास नहीं तो और क्या है?"
कन्हैया भेलारी ने बिहार में हुए विकास को जिस अंदाज़ में समझाया उससे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वहाँ की राजनीति में पिछले 15 साल में क्या बदला है.
वो कहते हैं, "लालू के राज में क्राइम का ग्राफ़ जितना ऊपर था, उतना ही नीतीश के राज में भ्रष्टाचार का ग्राफ़ ऊपर है. बिना पैसों के न तो पंचायत में काम होता है, न ब्लॉक के स्तर पर".
लेकिन सुशासन का दावा करने वाली पार्टी जेडीयू इन आरोपों को ग़लत ठहराती है और लालू के राज के चारा घोटाले की याद दिलाती है.
ऐसा वाक़ई हुआ है या नहीं, इसे साबित करने के लिए कोई सरकारी आँकड़ा मौजूद नहीं है लेकिन आम धारणा है कि भ्रष्टाचार बढ़ा है.
ये बात बिहार की राजनीति को क़रीब से जानने-समझने वाले कई पत्रकार भी कहते हैं.

कई योजनाओं और क़ानूनों को इसके लिए ज़िम्मेदार भी माना जाता है. सबसे ताज़ा उदाहरण है शराबबंदी कानून का.
बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद शराबबंदी क़ानून की नाकामी को आर्थिक नज़रिए से देखते हैं.
वो कहते हैं, "शराबबंदी में पैसे का रोल सबसे अधिक है. शराबबंदी करके सरकार ने कुछ लोगों को बहुत अमीर बना दिया है. ये ज़रूर है कि पुलिसकर्मियों को क़ानून के उल्लंघन में और लापरवाही में पकड़ा गया है, मगर वो बहुत छोटे लोग हैं, बहुत कम हैं. असली लोग न तो पकड़े जा रहे हैं, ना ही उन पर बात की जा रही है. क्योंकि वो बड़े लोग हैं."
बिहार क्या खुले में शौच से मुक्त हो गया?
यही बात शैबाल गुप्ता भी कहते हैं. उनके मुताबिक़ इसी वजह से नीतीश के मौजूदा कार्यकाल में सरकार की साख ख़राब हुई है.
एक अप्रैल 2016 को बिहार में शराबबंदी क़ानून लागू किया गया था. सरकार को इस वजह से तगड़ा राजस्व घाटा भी हुआ, लेकिन राज्य सरकार ने समाज सुधार के नाम पर इसे लागू करने का फ़ैसला लिया.
शराबबंदी क़ानून पर जानकारों की राय है कि वो फैसला साहसिक था, लेकिन उसे लागू करने में कई कमियाँ रहीं. ये नीतीश के इस कार्यकाल के सबसे अहम फ़ैसलों में से एक माना जाता है.
बिहार की राजनीति पर पकड़ रखने वाले पत्रकार और जानकार मानते हैं कि 2005 से 2010 तक नीतीश कुमार ने वाक़ई में जनता के जीवन में सुधार के लिए काम किया.
लेकिन 2010 से 2015 के दौरान नीतीश में राष्ट्रीय राजनीति की महत्वाकांक्षा जाग गई और वो प्रधानमंत्री पद के सपने संजोने लगे. उस वक़्त बिहार विकास की पटरी से जो उतरा, तो आगे उतरता ही चला गया.
उस दौर को याद करते हुए शैबाल कहते हैं, "ये बात बिल्कुल सही है. 2013 के आसपास नीतीश उस क़द के नेता थे, जो नरेन्द्र मोदी को चुनौती दे सकते थे. चाहे सरकार चलाने की बात हो या फिर बोलने की कला, नीतीश का उस दौर में कोई सानी नहीं था."
इसी जोश में उन्होंने कई फै़सले भी लिए. बाढ़ग्रस्त बिहार को गुजरात से मिली मदद वापस करने की घोषणा तक कर दी थी. जीतनराम मांझी को नौ महीने के लिए प्रदेश का मुख्यमंत्री भी नियुक्त कर दिया था.
बिहार के वो लोग जो उसी की राजधानी में प्रवासी की तरह रह रहे हैं?
वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह को नीतीश कुमार को क़रीब से समझने वाले पत्रकारों में से एक माना जाता है.
2017 में आरजेडी से रिश्ता तोड़ने के नीतीश के फ़ैसले पर उन्होंने एक लेख लिखा था. उस लेख में 2013 में एनडीए छोड़ने से लेकर 2017 में आरजेडी गठबंधन से नाता तोड़ने तक के चार सालों को उन्होंने नीतीश कुमार के राजनीतिक जीवन का सबसे 'मूर्खतापूर्ण दौर' बताया था.
उस लेख के मुताबिक़ 2013 और 2015, दोनों ही समय नीतीश का आकलन ग़लत साबित हुआ.
2013 के दौर में नीतीश को लगा कि आरएसएस नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार नहीं बनाएगी. 2015 में उनका अनुमान था कि वो पाँच साल आरजेडी के साथ सरकार चला लेंगे लेकिन उनके दोनों ही अनुमान ग़लत निकले.
एनडीए से निकलने के बाद नीतीश कुमार को विपक्ष में उस वक़्त स्वीकार्यता नहीं मिली. उस दौरान जब वो राहुल गांधी से मिलने पहुँचे तो दोनों की मुलाक़ात बहुत छोटी रही थी. 2014 के लोकसभा चुनाव में जनता दल यूनाइडेट का प्रदर्शन भी बहुत ख़राब रहा था.
उसी दौरान नीतीश कुमार ने जीतनराम मांझी को बिहार के मुख्यमंत्री की गद्दी पर बिठा दिया.
तब लोगों को समझ में नहीं आया कि नीतीश ने ऐसा क्यों किया. कई राजनीतिक जानकारों ने उनके फैसले की आलोचना भी की. छह महीने के अंदर मांझी के सुर बदल गए और 2015 के चुनाव में नीतीश ने आरजेडी के साथ गठबंधन किया और एक बार फिर बिहार की सत्ता संभाली.
ये गठबंधन भी लंबा नहीं चल सका और दो साल से भी कम वक़्त में उन्होंने आरजेडी का साथ छोड़कर एक बार फिर बीजेपी के साथ सरकार बना ली.
इसके बाद विपक्ष के नेता नीतीश कुमार को 'पलटूराम' तक कहने लगे.
शैबाल गुप्ता कहते हैं, एक के बाद एक कई घटानाएँ ऐसी हुईं जिनकी वजह से सत्ता में रहते हुए नीतीश थोड़े कमज़ोर हुए. इस वजह से उनकी अब तक की 'सुशासन बाबू' वाली छवि को धक्का पहुँचा और एक बात साबित हुई कि वो अकेले के दम पर चुनाव नहीं जीत सकते.
इतिहासकार रामचन्द्र गुहा ने 2017 में नीतीश कुमार के लिए कहा था, "देश में एक असली लीडर है और वो हैं नीतीश कुमार. नीतीश कुमार बिना पार्टी के लीडर हैं और कांग्रेस पार्टी के पास लीडर नहीं है, इसलिए कांग्रेस अगर नीतीश कुमार को यूपीए के नेतृत्व का मौका देती है, तो उसका भविष्य बेहतर हो सकता है." उनके इस बयान की तब ख़ूब चर्चा हुई थी.
शैबाल गुप्ता भी रामचन्द्र गुहा की उस बात को सही मानते हैं.
वो कहते हैं, " 2015 में नीतीश को अकेले चुनाव लड़ना चाहिए था लेकिन वो अकेले दम पर चुनाव लड़ने का 'रिस्क' नहीं ले सके. उनके पास इसके लिए पार्टी का तंत्र नहीं था.''
''दूसरी बात ये कि नीतीश अफ़सरों के साथ केवल सरकारी तंत्र चला सकते हैं, पार्टी नहीं. पार्टी चलाना और सरकारी तंत्र चलाना दो अलग-अलग बातें हैं. इतने सालों में भी वो अपनी पार्टी का संगठन नहीं तैयार कर पाए और इसीलिए वो अकेले चुनाव नहीं लड़ सकते."
वहीं, कन्हैया भेलारी के मुताबिक, ऐसा नहीं है कि नीतीश कुमार सिर्फ़ गठबंधन की बैसाखी के सहारे 15 साल तक सत्ता में रहे. कई काम भी उन्होंने किए, जिनकी वजह से पार्टियाँ उनके साथ गठबंधन की राजनीति करना चाहती थीं.
नीतीश कुमार ने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई का इस्तेमाल सरकार चलाने में किया. उनके इस प्रयोग को जानकार 'सोशल इंजीनियरिंग' की संज्ञा देते हैं.
चाहे इस बार के टिकट बँटवारे की बात हो या सरकार में रहते हुए नई योजनाएँ लागू करने की बात हो, दोनों में उनके 'सोशल इंजीनियरिंग' की छाप देखने को मिली. महादलितों और महिलाओं के लिए किए गए उनके काम को लोग इसके उदाहरण के तौर पर गिनाते हैं.
बिहार में दलितों की कुल आबादी 16 फ़ीसदी है और चुनावी राजनीति में इनके वोट की अहम भूमिका है. 1990 से 2000 तक पिछड़े जाति के इन लोगों को लालू यादव ने अपने साथ जोड़ना चाहा, फिर रामविलास पासवान ने इन्हें अपने पाले में लाने की कोशिश की.
लेकिन 'मास्टर स्ट्रोक' तो नीतीश कुमार ने अपने पहले ही कार्यकाल में चला. नीतीश ने पासवान जाति को छोड़कर दलित मानी जाने वाली अन्य 21 उप-जातियों के लिए 'महादलित' कैटेगरी बनाकर उन्हें कई सहूलियतें दीं. बाद में 2018 में जब लोक जनशक्ति पार्टी से उनके रिश्ते बेहतर हुए तो इस लिस्ट में पासवान जाति को भी शामिल कर लिया गया.
कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार के इस 'मास्टर स्ट्रोक' से लोक जनशक्ति पार्टी की ज़मीन खिसकती चली गई.
इसी तरह महिला वोटरों को अपने साथ करने के लिए नीतीश कुमार ने कई नए और ऐतिहासिक फैसले लिए.
मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना, नीतीश सरकार ने 2007 में शुरू की थी. शुरुआत में आठवीं पास करने के बाद पढ़ने वाली छात्राओं को साइकिल के लिए 2000 रुपये दिए जाते थे. अब इस राशि को बढ़ा कर 3000 रुपये कर दिया गया है.
इतना ही नहीं, छात्राओं को स्कूल यूनिफ़ॉर्म के लिए पैसे दिए जाने लगे. स्कूलों में छात्राओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए उनके इस फैसले को 'गेम-चेंजर' तक कहा गया.
बिहार देश का पहला राज्य है, जिसने पंचायत और नगर निकायों के चुनाव में महिला आरक्षण लागू किया. हालांकि गाँवों में महिला सरपंच होने के बावजूद सरपंच पतियों का चलन बिहार में खूब है लेकिन कई महिला मुखिया ऐसी भी हैं जिन्होंने बेहतर काम किया और नाम कमाया.
रितु जायसवाल का नाम भी इसी लिस्ट में आता है, जो अब विधानसभा का चुनाव लड़ रही हैं.
बाल विवाह रोकने और महिला शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से नीतीश सरकार ने 12वीं पास करने वाली अविवाहित लड़कियों को 10 हजार रुपये और स्नातक करने वाली लड़कियों को 25 हज़ार रुपये की प्रोत्साहन राशि देने का भी प्रवाधान जोड़ा.
ऐसी धारणा है कि नीतीश ने महादलितों और महिलाओं के लिए जो काम किए, उनकी बदौलत ये दोनों ही समूह उनसे जुड़ गए.
किसी भी राज्य के विकास के लिहाज से इन तीन पैमानों को सबसे अहम माना जाता है.
आँकड़ों की बात करें तो बिहार की जनता दल यूनाइडेट सरकार का दावा है कि पिछले पंद्रह सालों में एक लाख किलोमीटर ग्रामीण सड़क का निर्माण हुआ है.
अगर आप 15-20 साल पहले तक बिहार में रहे हों तो बहुत मुमकिन है कि आप कटिया डालकर बिजली कनेक्शन जोड़ने के तरीक़े से वाक़िफ़ होंगे लेकिन अब हालात बहुत बदल चुके हैं.
हाँलाकि बिहार मे 24 घंटे बिजली होने का दावा अतिशयोक्ति होगी, लेकिन अब ऐसा नहीं है कि वहाँ के बच्चे लालटेन और ढिबरी की रोशनी में पढ़ रहे हैं.
हर घर नल योजना के जरिए सब तक साफ़ पानी पहुँचाने का काम चल रहा है और नीतीश सरकार का दावा है कि अब तक 80 फ़ीसदी घरों में पानी पहुँच चुका है.
राजनीति में धारणा बहुत मायने रखती है. नीतीश कुमार ने अपने पहले कार्यकाल में विकास के कई ऐसे काम किए, जिससे उनकी 'सुशासन बाबू' की छवि बनी, जिसे उन्होंने जमकर भुनाया भी.
लेकिन उन्हीं के शासन काल में बिहार में सृजन घोटाला, टॉपर घोटाला, मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह कांड भी हुए. उनके शासन पर ये दाग़ भी हैं.
भले ही कभी सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भ्रष्टाचार का दाग़ ना लगा हो, लेकिन नीतीश बेदाग़ भी नहीं हैं.
सृजन घोटाले में पर्दाफ़ाश हुआ कि कैसे सरकारी पैसे एनजीओ के खाते में ट्रांसफ़र होते रहे और प्रशासन को ख़बर तक नहीं लगी.
मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह कांड में बच्चियों के साथ दुर्व्यवहार की ख़बरें नेशनल टीवी चैनलों पर भी दिखाई दीं लेकिन आरोपी मंजू वर्मा को जेडीयू ने इस बार भी टिकट दे ही दिया.
पटना के एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज़ के पूर्व निदेशक डॉक्टर डीएम दिवाकर कहते हैं, "बिहार में इन पंद्रह सालों में विकास हुआ है, ख़र्च करने की लोगों की क्षमता बढ़ी है लेकिन दो-चार पैमाने ऐसे भी हैं जिन पर 2005 और 2020 के बिहार में ज्यादा फ़र्क़ नहीं आया है, वो हैं गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य और बेरोज़गारी."
आज भी तीन साल का कोर्स बिहार में पूरा करने में चार-पाँच साल लग जाते हैं. बिहार में अच्छे कॉलेजों की कमी है. जिस तरह के शिक्षकों की भर्ती हुई है ये बात किसी से छिपी नहीं है.
2016 के टॉपर घोटाले की कहानी नेशनल न्यूज़ में 'विकसित बिहार' की छवि को झुठलाने के लिए काफी थी, जब आर्ट्स सब्जेक्ट की टॉपर रूबी राय ने पॉलिटिकल साइंस को खान-पान से जुड़ा विषय बताया था.
परीक्षा में छात्रों को खिड़की से नकल कराते परिवार वालों की फोटो भी बिहार की शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफ़ी थी. इन वजहों से भी नीतीश के शासन की खूब किरकिरी हुई.
शिक्षकों की भर्ती में भी नियमों की अनदेखी के आरोप नीतीश सरकार पर लगे और 'समान पद समान वेतन' के मुद्दे को विपक्ष इस बार भी चुनाव में जमकर उठा रहा है.
रोज़गार के क्षेत्र में भी नीतीश कुमार कुछ कमाल नहीं कर पाए.
12 अक्टूबर की चुनावी रैली में नीतीश कुमार ने कहा, "राज्य में बड़े उद्योग नहीं लगे. जो राज्य समुद्र के किनारे होते हैं, वहीं उद्योग वाले जाते हैं. बावजूद इसके राज्य में विकास दर 10 फ़ीसदी से ज़्यादा है."
लेकिन विपक्ष उनकी इसी बात को ले उड़ा. बड़े उद्योग नहीं लगे इसलिए युवाओं को रोज़गार नहीं मिला और इसी वजह से पलायन हुआ, विपक्ष ने ऐसा नैरेटिव खड़ा किया.
महागठबंधन ने अपने घोषणापत्र में 10 लाख नौकरियों का वादा किया है. अब बीजेपी ने भी अपने संकल्प पत्र में 19 लाख रोज़गार देने की बात कही है.
जेडीयू के नेता पिछले 15 सालों में 6 लाख 10 हजार नौकरियाँ देने का दावा कर रहे है, लेकिन आरजेडी से 10 लाख नौकरियों के वादे का रोड मैप माँग रहे हैं.
स्वास्थ्य व्यवस्था का भी नीतीश राज में हाल बुरा ही है. कोरोना से अब तक राज्य के दो मंत्री, दो विधायकों और 31 डॉक्टरों की मौत हो चुकी है.
कोरोना संकट के बीच बिहार के कुछ सरकारी अस्पतालों की तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुईं, जिनमें ना तो डॉक्टर दिखे, ना ही मरीज़ों के लिए बेड. कुछ अस्पतालों में तो बारिश का पानी छत से टपकता दिखाई दिया.
चमकी बुख़ार ने 2019 में राज्य में जो क़हर ढाया, वो भी सबने देखा.
इसके बाद भी नीतीश कुमार का दावा है कि 2005 में जहाँ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रतिमाह 39 मरीज़ आते थे, 2020 में ये संख्या बढ़ कर 10 हजार मरीज़ों तक पहुँच गई है.
डॉक्टर डीएम दिवाकर कहते हैं, "2000 के लालू यादव के बिहार में और 2005 के बाद के नीतीश कुमार के बिहार में बदलाव साफ़ देखा जा सकता था. ऐसा इसलिए संभव था क्योंकि दोनों कार्यकाल में तुलना दो अलग-अलग मुख्यमंत्रियों के काम की थी. लेकिन 2010 के बिहार की तुलना 2005 से करें तो थोड़ा मुश्किल होगा''
डॉक्टर दिवाकर कहते हैं कि 2015 की तुलना 2010 से करना और ज्यादा मुश्किल है क्योंकि पिछले पन्द्रह साल में नीतीश ने शुरुआती सालों में जनता के मन में जो आकांक्षाएँ जगाई थीं, उनको लागू करने की स्पीड में पिछले दिनों कमी आई है. इसलिए नीतीश कुमार को अब सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है."(bbc)
डॉयचे वैले पर चारु कार्तिकेय की रिपोर्ट-
चुनावों में कोविड संबंधी सावधानी बरतते हुए कैसे हो अभियान इस सवाल पर चुनाव आयोग और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के बीच ठन गई है. चुनाव आयोग ने अब सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर दस्तक दी है.
मामला मूल रूप से मध्य प्रदेश से संबंधित है जहां विधान सभा की 28 सीटों के लिए उप चुनाव होने वाले हैं. चुनावों के लिए अभियान जोरों पर हैं, लेकिन इस बीच रैलियों में आती भारी भीड़ और उससे संक्रमण के फैलने के खतरे को देखते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर पीठ ने अभियानों पर पाबंदी लगा दी थी.
अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी जिलों के मजिस्ट्रेटों को आदेश दिया था कि वो किसी भी उम्मीदवार या पार्टी को जन सभाएं आयोजित करने के लिए तभी अनुमति दें जब वो यह साबित कर सकें कि वर्चुअल चुनावी अभियान संभव नहीं है.
अदालत ने यह भी कहा था कि रैली की अनुमति तभी दी जाए जब पार्टी या उम्मीदवार इतने पैसे जिला मजिस्ट्रेट के पास जमा करा दें जिनसे रैली में आने वाले सभी लोगों के लिए मास्क और सैनिटाइजर की व्यवस्था की जा सके. इस संबंध में अदालत ने केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का भी आदेश दिया था. अदालत के अनुसार इन दोनों नेताओं ने अपनी रैलियों में कोविड संबंधी सावधानी नहीं बरती थी.
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का भी आदेश दिया था. अदालत के अनुसार इन दोनों नेताओं ने अपनी रैलियों में कोविड संबंधी सावधानी नहीं बरती थी.
गुरुवार को मध्य प्रदेश सरकार ने भी इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला लिया था, लेकिन अब खुद चुनाव आयोग ही इस लड़ाई में कूद गया है. आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि चुनाव कराना सिर्फ उसके अधिकार क्षेत्र में आता है और हाई कोर्ट का आदेश उसके अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रहा है. आयोग ने यह भी कहा है कि हाई कोर्ट का आदेश सभी प्रतिद्वंदियों को सामान अवसर देने की अवधारणा पर असर डालेगा और पूरी चुनावी प्रक्रिया को ही पटरी से उतार देगा.
मध्य प्रदेश के लिए ये उपचुनाव बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये एक बार फिर राज्य में सत्ता पर असर डाल सकते हैं. ये 28 सीटें तब खाली हुई थीं जब कांग्रेस के 25 विधायकों ने पूर्व कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में अपनी पार्टी से बगावत कर दी थी और विधान सभा से इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद राज्य में कमल नाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस की नवनिर्वाचित सरकार गिर गई थी और बीजेपी एक बार फिर सत्ता में आ गई थी. तीन सीटें विधायकों के निधन की वजह से खाली हो गई थीं.
मध्य प्रदेश के साथ साथ इस समय बिहार में भी चुनावी अभियान जोरों पर है. वहां 28 अक्टूबर से तीन चरणों में विधान सभा चुनावों में मतदान होना है. सभी पार्टियां बड़ी बड़ी रैलियां आयोजित कर रही हैं और कई रैलियों में भारी भीड़ भी उमड़ती दिखी है. कोविड संबंधी सावधानियों में से ना एक दूसरे से दूरी बनाए रखने का पालन हो रहा है और ना कोई मास्क पहन रहा है.
ऐसे में यह देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट चुनावी रैलियों पर कोई अंकुश लगाता है या नहीं. (dw)
जल शक्ति मंत्रालय के अधीन सीजीडब्लयूए ने देश के सभी राज्यों और संघ शासित प्रदेशों के साथ नागरिकों को पहली बार यह आदेश जारी किया है।
- Vivek Mishra
अब देश में कोई भी व्यक्ति और सरकारी संस्था यदि भूजल स्रोत से हासिल होने वाले पीने योग्य पानी (पोटेबल वाटर) की बर्बादी या बेजा इस्तेमाल करता है तो यह एक दंडात्मक दोष माना जाएगा। इससे पहले भारत में पानी की बर्बादी को लेकर दंड का कोई प्रावधान नहीं था। घरों की टंकियों के अलावा कई बार टैंकों से जगह-जगह पानी पहुंचाने वाली नागरिक संस्थाएं भी पानी की बर्बादी करती है।
देश में प्रत्येक दिन 4,84,20,000 करोड़ घन मीटर यानी एक लीटर वाली 48.42 अरब बोतलों जितना पानी बर्बाद हो जाता है, जबकि इसी देश में करीब 16 करोड़ लोगों को साफ और ताजा पानी नहीं मिलता। वहीं, 60 करोड़ लोग जलसंकट से जूझ रहे हैं।
सीजीडब्ल्यूए ने पानी की बर्बादी और बेजा इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए 08 अक्तूबर, 2020 को पर्यावरण (संरक्षण) कानून, 1986 की धारा पांच की शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए प्राधिकरणों और देश के सभी लोगों को संबोधित करते हुए दो बिंदु वाले अपने आदेश में कहा है :
1. इस आदेश के जारी होने की तारीख से संबंधित नागरिक निकाय जो कि राज्यों और संघ शासित प्रदेशों में पानी आपूर्ति नेटवर्क को संभालती हैं और जिन्हें जल बोर्ड, जल निगम, वाटर वर्क्स डिपार्टमेंट, नगर निगम, नगर पालिका, विकास प्राधिकरण, पंचायत या किसी भी अन्य नाम से पुकारा जाता है, वो यह सुनिश्चित करेंगी कि भूजल से हासिल होने वाले पोटेबल वाटर यानी पीने योग्य पानी की बर्बादी और उसका बेजा इस्तेमाल नहीं होगा। इस आदेश का पालन करने के लिए सभी एक तंत्र विकसित करेंगी और आदेश का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ दंडात्मक उपाय किए जाएंगे।
2. देश में कोई भी व्यक्ति भू-जल स्रोत से हासिल पोटेबल वाटर का बेजा इस्तेमाल या बर्बादी नहीं कर सकता है।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने राजेंद्र त्यागी और गैर सरकारी संस्था फ्रैंड्स की ओर से बीते वर्ष 24 जुलाई, 2019 को पानी की बर्बादी पर रोक लाने की मांग वाली याचिका पर पहली बार सुनवाई की थी। डाउन टू अर्थ ने 29 जुलाई, 2019 को इस खबर को प्रकाशित किया था। बहरहाल इसी मामले में करीब एक बरस से ज्यादा समय के बाद 15 अक्तूबर, 2020 के एनजीटी के आदेश का अनुपालन करते हुए केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के अधीन केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (सीजीडब्ल्यूए) ने आदेश जारी किया है।
एनजीटी में याचिकाकर्ताओं की ओर से कानूनी पक्ष रखने वाले अधिवक्ता आकाश वशिष्ट ने डाउन टू अर्थ से कहा कि देश में भू-जल संरक्षण के लिए सीजीडब्ल्यूए का यह आदेश एक ऐतिहासिक कदम है। हमने यह मुद्दा एनजीटी में बीते वर्ष उठाया था, इसके बाद अब यह मामला सही दिशा में बढ़ चुका है। अभी तक आवासीय और व्यावसायिक आवासों से ही नहीं बल्कि कई पानी आपूर्ति करने वाले सरकारी टैंकों से भू-जल दोहन के जरिए निकाला गया पीने योग्य पानी (पोटेबल वाटर) बर्बाद होता रहता है। किसी तरह का प्रावधान न होने से पानी बर्बाद करने वाली संस्थाएं व व्यक्ति को इस बात के लिए दंडित भी नहीं किया जा सकता था।
साफ पानी की बर्बादी और बेजा इस्तेमाल पर दंडात्मक आदेश के जारी करने और केंद्रीय मंत्रालयों व राज्यों से समयबद्ध कार्य योजना मिलने के आश्वासन के बाद एनजीटी ने 31 अगस्त, 2020 को मामले का निस्तारण कर दिया था। वहीं, इससे पहले 15 अक्तूबर, 2019 को एनजीटी में राजेंद्र त्यागी और फ्रैंड्स संस्था का यह मामला जब एनजीटी ने सुना तो पाया था कि केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय और दिल्ली जल बोर्ड के जवाबों में पानी की बर्बादी और बेजा इस्तेमाल को रोकने के लिए कोई प्रभावी नीति का जिक्र नहीं किया गया है। एनजीटी ने कहा था प्राधिकरणों के जवाबी हलफनामे बेहद सामान्य और बेकार हैं। राज्यों और संघ शासित प्रदेशों को पत्र लिखने के बजाए एक समयबद्ध कार्ययोजना और निगरानी के साथ दंडात्मक प्रावधानों वाली प्रभावी कार्रवाई योजना बनाई जानी चाहिए।
एनजीटी ने कहा था कि "पर्यावरण कानून का पालन आदेशों का उल्लंघन करने वाले लोगों से बटोरी गई टोकन मनी की रिकवरी भर से नहीं हो जाता है। ...पॉल्यूटर पेज प्रिंसिपल का कोई विकल्प नहीं है।"
डॉयचे वैले पर कार्ला ब्लाइकर की रिपोर्ट-
- इस साल की शुरुआत तक जिस अमेरिका में किसी ने कोरोना का नाम भी नहीं सुना था, वहीं 10 महीने बाद इसी महामारी के मुद्दे पर देश के अमेरिकी चुनाव में सबसे ज्यादा बहस छिड़ी हुई है. डीडब्ल्यू से बातचीत में यूनिवर्सिटी ऑफ इंडियानापोलीस में राजनीतिशास्त्र की असिस्टेंट प्रोफेसर लॉरा मेरीफील्ड विल्सन कहती हैं कि "2020 के चुनावों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा शायद यही है."
अमेरिका में कोविड-19 वायरस ने 220,000 से भी अधिक लोगों की जान ले ली है. 20 अक्टूबर तक देश में संक्रमित लोगों की तादाद 83 लाख को पार कर चुकी है. खुद राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप कोरोना पॉजिटिव थे और दो हफ्तों से भी कम समय में इलाज करा कर वापस आ गए. देश में तमाम लोग आज भी मास्क नहीं पहनने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं और डॉक्टरों की सुझाई सावधानियों तक को लेकर राजनीतिक बहस छिड़ी हुई है.
राष्ट्रपति ट्रंप ने महामारी से निपटने में कैसा प्रदर्शन किया इसे लेकर लोगों की राय भी कहीं ना कहीं उनकी राजनीतिक सोच से जुड़ी दिख रही है. जैसे कि न्यू यॉर्क स्थित कोलंबिया यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर में असिस्टेंट प्रोफेसर और चिकित्सक डॉक्टर अश्विन वासन कहते हैं कि यह चुनाव "पिछले आठ-नौ महीनों में इसी बारे में उनके प्रदर्शन पर रेफरेंडम होगा."
जहां ट्रंप समर्थक कंजर्वेटिव खेमे का मानना है कि ट्रंप के कदमों के बिना हालात और खराब होते. वहीं लिबरल खेमे को लगता है कि अगर प्रशासन जल्दी हरकत में आया होता, हेल्थ एक्सपर्ट्स की सुनी होती और सख्ती से पाबंदियां लागू करवाई होतीं तो हजारों जानें बचाई जा सकती थीं.
सेहत से जुड़ा एक और मुद्दा वोटरों के लिए बेहद अहम है. अमेरिका की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति चुनाव सम्पन्न होने के बाद सबसे पहले एफोर्डेबल केयर एक्ट को रद्द किए जाने के मामले की सुनवाई होनी है. सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में राष्ट्रपति ट्रंप ने एमी कॉनी बैरेट को शामिल करवाया है और इस एक्ट को हटवाने की कोशिश वह अपने पूरे कार्यकाल में करते रहे हैं.
कॉनी बैरेट खुद भी पहले इस एक्ट की आलोचना कर चुकी हैं लेकिन अब वह साफ नहीं कर रहीं कि क्या वह खुद इसे रद्द किए जाने के पक्ष में हैं. ऐसे में आम अमेरिकी अपने स्वास्थ्य बीमा से खुश हैं या नहीं और वे ओबामाकेयर को रखना चाहते हैं या नहीं - इससे भी चुनाव के दिन पड़ने वाले मतों पर बड़ा असर पड़ेगा.
विल्सन कहती हैं कि अर्थव्यवस्था अमेरिकी वोटरों के लिए बेहद अहम है, खासकर तब "जब उसकी हालत अच्छी ना हो." और फिलहाल वह अच्छी नहीं है. महामारी के फैलने से पहले ट्रंप के शासन काल में तीन साल तक अर्थव्यवस्था बहुत अच्छा कर रही थी. लेकिन मार्च में लॉकडाउन के शुरु होते ही पूरे देशे में छोटे कारोबारियों का काम काज बंद हो गया और अप्रैल के मध्य तक आते आते 2.3 करोड़ अमेरिकी काम से बाहर हो गए. श्रम मंत्रालय के आंकड़े दिखाते हैं कि इन दो महीनों के दौरान ही बेरोजगारी दर 3.5 प्रतिशत से उछल कर 14.7 प्रतिशत पर पहुंच गई.
राष्ट्रपति ट्रंप के लिए यह बुरा खबर लेकर आ सकती है. अब वह वोटरों से अपील कर रहे हैं कि अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाने के लिए वही सबसे सही इंसान हैं लेकिन डेमोक्रैटिक उम्मीदवार जो बाइडेन के लिए ट्रंप को इस हाल के लिए जिम्मेदार ठहराना कहीं ज्यादा आसान है. वह वोटरों से वादा कर रहे हैं कि उनके पास अर्थव्यवस्था को "वापस बेहतर बनाने" की कहीं बेहतर योजना है और वे मध्यमवर्गीय अमेरिकियों के जीवनस्तर को ऊपर उठा सकते हैं.
मई में मिनियापोलीस में पुलिस के हाथों जॉर्ज फ्लॉयड की मौत ने देश में ब्लैक लाइव्स मैटर्स के आंदोलन में फिर से जान फूंक दी. अमेरिका में नस्लीय तनाव और हिंसा का काफी लंबा इतिहास रहा है लेकिन इस बार ना केवल अश्वेत बल्कि श्वेत अमेरिकी भी पुलिस हिंसा के अलावा देश में फैले नस्लवाद के खिलाफ साथ सड़कों पर उतरे दिखाई दिए.
कंजर्वेटिव विरोधी इन आंदोलनों के दौरान हुए विरोध प्रदर्शनों में हिंसा और शहरों को हुए नुकसान की ओर ध्यान दिलाते हैं. उनके नेता ट्रंप इस आंदोलन को ही "घृणा का प्रतीक" बताते हैं और अपने समर्थकों से सड़कों पर कानून-व्यवस्था को लौटाने का वादा कर चुके हैं. लिबरल खेमा कहता है कि राष्ट्रपति के रूप में ट्रंप को लोगों को करीब लाने का काम करना चाहिए लेकिन इसके उलट वह तनाव को और भड़काते हैं.
पेरिस: भेदभाव का विरोध
कुछ दिन पहले फ्रांस की राजधानी में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को आंसू गैस का इस्तेमाल कर तितर बितर कर दिया था. शनिवार को भी आइफेल टॉवर और अमेरिकी दूतावास के सामने प्रदर्शनों की इजाजत नहीं दी गई थी. फिर भी दसियों हजार लोगों ने प्रदर्शन में हिस्सा लिया. पेरिस के बाहरी इलाकों में रहने वाले काले नागरिकों के खिलाफ पुलिस हिंसा आम है.
यह एक ऐसा विषय है जो ट्रंप के एक बहुत बड़े समर्थक दल श्वेत प्रोटेस्टेंट ईसाइयों के लिए सबसे अहम है.अमेरिकी आबादी का 15 फीसदी यही लोग हैं और यह मतदान में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं. 2016 के चुनाव में कुल अमेरिकी वोटरों में एक चौथाई हिस्सा इन्हीं का था. तमाम कंजर्वेटिव ईसाइयों को ट्रंप का खुद अपने निजी जीवन में तलाक देना और कई शादियां करना नागवार गुजरता है लेकिन गर्भपात जैसे मुद्दे पर वह ट्रंप के रुख का पुरजोर समर्थन करते हैं. ट्रंप गर्भपात के खिलाफ हैं.
दूसरी तरफ लिबरल वोटरों के लिए भी गर्भपात का मुद्दा बहुत अहम है. डेमोक्रैटिक पार्टी गर्भ को रखने या गिराने का चुनाव लोगों के हाथ में देने के पक्ष में है. ट्रंप की चुनी कॉनी बैरेट को वे अमेरिकी अदालत के ऐतिहासिक 'रो वर्सेज वेड' मामले के लिए खतरा मानते हैं जिसने 47 साल पहले अमेरिकी महिलाओं को सुरक्षित और वैध गर्भपात का अधिकार दिया था.(dw)
मिर्जापुर, 25 अक्टूबर | उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में अपना दल की सांसद अनुप्रिया पटेल ने वेब सीरीज 'मिर्जापुर 2' पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए कहा है कि यह सीरीज जातीय विद्वेष फैला रही है। सांसद ने यह भी आरोप लगाया है कि हाल ही में एमेजॉन प्राइम पर जारी की गई यह सीरीज मिर्जापुर की 'हिंसक' क्षेत्र की छवि बना रही है।
उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में मिर्जापुर एक 'सौहार्द का केंद्र' बन चुका है। इसकी छवि को खराब करने वाले जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।"
बता दें कि 'मिजार्पुर 2' परिवारों, राजनीति और चुनावों के बीच संघर्ष की एक हिंसक कहानी है। इसमें श्वेता त्रिपाठी शर्मा, पंकज त्रिपाठी, अली फजल और दिव्येंदु शर्मा ने मुख्य भूमिकाएं निभाईं हैं।(आईएएनएस)
बुलंदशहर, 25 अक्टूबर भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर अपने उम्मीदवार हाजी यामीन के समर्थन के साथ बुलंदशहर में रविवार को रैली को संबोधित करके आगामी उत्तर प्रदेश उपचुनाव के लिए अपने प्रचार अभियान की शुरुआत करेंगे। इस रैली से भीम आर्मी उत्तर प्रदेश में चुनावी आगाज को चिह्न्ति करेगा। गौरतलब है कि यह पार्टी राज्य में दलितों के बीच एक ताकत के रूप में उभरा है।
नुमाइश मैदान में आयोजित होने वाली रैली में 20,000 से अधिक समर्थकों के शामिल होने की संभावना है।
भीम आर्मी के कार्यकर्ता समर्थन जुटाने और रैली में बड़े पैमाने पर उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए घर-घर जाकर मुहिम में शामिल होने की अपील कर रहे हैं।
बुलंदशहर सीट भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक वीरेंद्र सिरोही के पास थ। हालांकि मार्च में उनकी मृत्यु के बाद यह सीट खाली है।
भाजपा ने दिवंगत विधायक की पत्नी ऊषा सिरोही को मैदान में उतारा है, वहीं राष्ट्रीय लोकदल-समाजवादी पार्टी ने संयुक्त उम्मीदवार प्रवीण कुमार के नाम की घोषणा की है।
बहुजन समाज पार्टी ने शमसुद्दीन रायन को मैदान में उतारा है, जबकि कांग्रेस के उम्मीदवार सुशील चौधरी हैं।
यह उपचुनाव सात सीटों के लिए 3 नवंबर को होने वाले हैं।
चंद्रशेखर ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि उनकी पार्टी 'आजाद समाज पार्टी' के नाम के साथ राजनीति में उतरेगी, जबकि भीम आर्मी संगठन के रूप में काम करना जारी रखेगी।
वह हाल ही में बिहार की यात्रा पर गए थे, जहां उन्होंने पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी के साथ गठबंधन किया था और चुनावी प्रचार करते देखे गए थे।(आईएएनएस)
न्यूयॉर्क, 25 अक्टूबर | न्यूयॉर्क राज्य में प्रारंभिक मतदान शुरू हो गया है, जिसमें मतदाताओं को 3 नवंबर के राष्ट्रपति चुनाव से पहले मतपत्र देने के लिए नौ दिन का समय दिया गया है। समाचार एजेंसी सिन्हुआ ने राज्य सरकार द्वारा जारी कार्यक्रम सूची के हवाले से बताया, न्यूयॉर्क में शुरुआती मतदान की अवधि 1 नवंबर तक चलेगी। यह शनिवार सुबह शुरू हुई है।
उसमें आगे कहा गया है कि 2 नवंबर को कोई भी प्रारंभिक मतदान नहीं होगा।
गवर्नर एंड्रयू क्यूमो ने एक ट्वीट में कहा, "यह इतिहास में पहली बार है कि राष्ट्रपति चुनाव में न्यूयॉर्कवासी जल्दी मतदान कर सकते हैं। अपनी आवाज बुलंद करें।"
इन चुनावों में कई अमेरिकियों ने अपने बैलट में मेल करने के विकल्प को चुना है, जबकि कई मतदाता कोरोनावायरस महामारी के कारण लंबे इंतजार और भीड़ से बचने के प्रयास में शुरुआती मतदान में भाग लेना चुना है।
हिल न्यूज वेबसाइट की रिपोर्ट के अनुसार, इस बीच न्यूयॉर्क शहर के कई हिस्सों में मतदाताओं की लंबी कतारें देखी गईं।
द वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, सेंट्रल पार्क ईस्ट हाईस्कूल में 700 से अधिक लोगों को मतदान केंद्रों के बाहर इंतजार करते देखा गया।
वहीं न्यूयॉर्क सिटी काउंसिलमैन मार्क लेविन ने ट्विटर पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें अपर मैनहट्टन में लंबी कतारें देखी जा सकती हैं।
यूएस इलेक्शंस प्रोजेक्ट की रिपोर्ट के अनुसार, करीब 5.65 करोड़ अमेरिकियों ने शनिवार तक देश भर में शुरुआती मतदान में अपने मतपत्र डाल दिए हैं।(आईएएनएस)
"एक पनडुब्बी कब्र की तरह शांत हो सकती है."
वॉइस एडमिरल जीएम हीरानंदानी (सेवानिवृत्त) ने 'ट्रांज़िशन टू गार्डियनशिप - द इंडियन नेवी 1991-2000' में ये लिखा था, जिसे आधिकारिक रूप से रक्षा मंत्रालय ने प्रकाशित किया था.
शायद ये शब्द इस बात को समझाने के लिए काफ़ी हैं कि भारत ने म्यांमार को आधिकारिक तौर पर एक पनडुब्बी सौंप दी लेकिन इसे लेकर चर्चा बहुत कम क्यों हुई?
15 अक्टूबर को, विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव अनुराग श्रीवास्तव से भारत द्वारा 'म्यांमार को एक पनडुब्बी गिफ्ट करने' की ख़बरों पर स्पष्टीकरण मांगा गया.
उन्होंने जवाब दिया, "भारत म्यांमार नौसेना को एक किलो क्लास की पनडुब्बी आईएनएस सिंधुवीर देगा. हमारी समझ के मुताबिक यह म्यांमार नौसेना के लिए पहली पनडुब्बी होगी.
"ये SAGAR (सेक्योरिटी एंड ग्रोथ फॉर आल इन द रीजन- क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) के आधार पर किया गया है. हम सभी पड़ोसी देशों को क्षमता और आत्मनिर्भरता प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं."
सरकार ने बस इतना ही बताया, इससे जुड़ी कोई प्रेस रिलीज़ भी जारी नहीं की गई.
भारत हेलीकॉप्टर और अन्य हथियारों सहित जहाजों और विमानों का निर्यात करता है. लेकिन जानकार कहते हैं कि एक पनडुब्बी सौंपना अलग कहानी है.
इसके अलावा, निर्यात उन चीज़ों का किया जाता है जो किसी के पास अधिक मात्रा में हों. लेकिन क्या भारतीय नौसेना के पानी के नीचे के बेड़े के बारे में ऐसा कहा जा सकता है?
आईएनएस सिंधुवीर को पूर्व सोवियत संघ ने भारत को दिया था. 11 जून, 1988 को ये भारतीय बेड़े में शामिल हुआ.
रूसी इसे 877 इकेएम क्लास कहते हैं (नाटो कोड नाम: किलो क्लास) और ये डीज़ल-बिजली से चलने वाली बिना न्यूक्लियर पावर वाली पनडुब्बियां हैं. ये पानी के नीचे 300 मीटर तक गोता लगा सकती हैं और 45 दिनों के लिए बिना बाहरी मदद के काम कर सकती हैं. इसे चलाने के लिए 53 सदस्यीय चालक दल की आवश्यकता होती है.
मैंने सुना है कि नौसेना के अधिकारी इनकी क्षमता के कारण ईकेएम पनडुब्बियों को 'समुद्र में ब्लैक होल ' कहते हैं.
भारतीय सेना में मुस्लिम रेज़िमेंट होने के दावे का सच क्या है?
वास्तव में, नौसेना के आधिकारिक इतिहास की इस जानकारी से भारत के शुरुआती दृष्टिकोण का पता चलता है.
कमांडर (बाद में कप्तान बने) केआर अजरेकर ने रूस में प्रशिक्षण लिया और वो सिंधुघोष जो कि पहली ईकेएम पनडुब्बी थी, उसके कमांडिंग ऑफिसर थे.
वो याद करते हैं, "हाइड्रो-डायनामिक रूप से पानी के नीचे काम करने के लिहाज़ से इसका कंफ़िग्यूरेशन सबसे अच्छा था, ईकेएम के पानी के नीचे का प्रदर्शन बेहतरीन है. इसके अलावा शिकार करने के लिए सोनार है जो बहुत उपयोगी है."
आश्चर्य की बात नहीं है कि भारत ने रूस से ऐसी 10 पनडुब्बियां ख़रीद लीं.
इसके अलावा, निर्यात उन चीज़ों का किया जाता है जो किसी के पास अधिक मात्रा में हों. लेकिन क्या भारतीय नौसेना के पानी के नीचे के बेड़े के बारे में ऐसा कहा जा सकता है?
एक नए अधिग्रहण कार्यक्रम में भी देरी हो रही है, ऐसे में पानी के नीचे काम करने की पूर्ण योग्यता पा लेने से अभी हम दूर हैं.
भारत से म्यांमार तक
इस मामले की समझ रखने वाले दो अधिकारियों ने मुझे बताया कि आईएनएस सिंधुवीर को म्यांमार को भारत का 'उपहार' कहना गलत है. उनमें से एक ने सबसे पहली बात कही, "मामला अति गोपनीय है."
"मैं आपको बता सकता हूं कि ये निश्चित अवधि के लिए लीज़ पर है. ये राजस्व अर्जित करने के लिए नहीं किया गया है. "
भारत और म्यांमार में क्या हुआ, इसे समझने के लिए सिर्फ भारत और म्यांमार को नहीं देखना चाहिए.
कई अधिकारियों से मैंने बात कि जिन्होंने बताया कि भारत 'बांग्लादेश के साथ जो हुआ, उसे दोहराने से बचना चाहता है.' उनमें से एक ने समझाया, "2016-17 में, बांग्लादेश ने चीनी पनडुब्बियों का अधिग्रहण किया. चीनी पनडुब्बियों के माध्यम से, चीनी कर्मचारियों को बंगाल की खाड़ी में प्रवेश करने का एक रास्ता मिल गया."
"हालाँकि, उन पनडुब्बियों का उपयोग करते हुए बांग्लादेश का अनुभव, जहां तक हमें पता है, उतना अच्छा नहीं रहा है."
"इससे हमें म्यांमार नौसेना के साथ इस मामले पर चर्चा करने में मदद मिली, जो पानी के नीचे की अपनी क्षमताओं को बढ़ाना चाह रहे थे. हमने उनके क्रू की ट्रेनिंग शुरू की और हम आज भी उनसे जुड़े हुए हैं और सहायता दे रहे हैं."

लेकिन चुप्पी का कारण क्या है?
एक अधिकारी के मुताबिक, "दोनों देशों में से कोई भी इस पर ध्यान नहीं खींचना चाहता है. ये अभी शुरुआत है. इसके अलावा म्यांमार के चीनियों के साथ भी गहरे संबंध हैं. "
इंडियन मेरिटाइम फाउंडेशन के उपाध्यक्ष,रिटायर्ड कॉमोडोर अनिल जय सिंह ने अपने तीन दशकों के अनुभव में चार पनडुब्बियों की कमान संभाली है. वो कहते हैं, "शायद ही कभी एक पनडुब्बी एक देश द्वारा दूसरे देश को लीज़ पर दी जाती है. हालांकि, बड़ी तस्वीर को देखते हुए, हम बंगाल की खाड़ी को चीन के हाथों नहीं खो सकते हैं. इसलिए यह नौसेनाओं के मिलन की दिशा में एक प्रगतिशील कदम है."
उनके अनुसार वह दिन दूर नहीं जब चीनी पनडुब्बियां हिंद महासागर में अक्सर तैनात रहेंगी.
वो कहते हैं,"और याद रखें कि पाकिस्तान को चीन से आठ पनडुब्बियां मिल रही हैं, जो हमारे लिए (पश्चिमी तट पर भी) बड़ी चिंता का विषय है"
भारत की कितनी क्षमता है?
आईएनएस सिंधुवीर को छोड़ दें तो आज भारत के पास कुल आठ ईकेएम पनडुब्बियां, चार जर्मन निर्मित एचडीडब्ल्यू पनडुब्बियां और दो फ्रांसीसी-डिज़ाइन की स्कॉर्पीन पनडुब्बियां हैं.
संख्या के लिहाज़ से भारत के पास अगस्त 2013 के बराबर पनडुब्बियां है. उस समय आईएनएस सिंधुरक्षक जो कि एक और ईकेएम पनडुब्बी थी, उसमें मुंबई नौसेना डॉकयार्ड के अंदर विस्फोट हो गया था और सभी लोग मारे गए थे.
नौसेना के एक अधिकारी के मुताबिक "हम उम्मीद कर रहे हैं कि बाकी चार स्कॉर्पीन 2022 के अंत तक जुड़ जाएंगी."
वर्तमान में, जर्मन एचडीडब्ल्यू पनडुब्बी का बेड़ा 26 से 34 वर्ष पुराना है. ईकेएम क्लास 20 से 34 वर्ष के बीच हैं. पहले, औसतन 28 साल इस्तेमाल के बाद पनडुब्बियां रिटायर कर दी जाती थीं.
सिंह, जो कि ब्रिटेन में भारत के नेवल एडवाइज़र रह चुके हैं, उनके मुताबिक, "मैं इसे लेकर काफी चिंतित हूं. (पनडुब्बी) अधिग्रहण धीमी गति से हो रहा है. आगे की राह साफ़ नहीं है."
''पनडुब्बियां महंगी आती हैं. दिसंबर महीने में, नौसेना प्रमुख एडमिरल करमबीर सिंह ने कहा था, "रक्षा बजट में नौसेना का हिस्सा 2012 के 18% से घटकर वर्तमान वित्तीय वर्ष 2019-20 में 13% हो गया है. उस समय कोरोना संक्रमण के मामले भी नहीं थे. "
कश्मीर का वो गांव जहां पाकिस्तान के बम गिरते रहते हैं
म्यांमार को सहायता देने का निर्णय भारत ने सोच-समझ कर लिया है.
बांग्लादेश और थाईलैंड भारत के पुराने पार्टनर रह चुके हैं. भारतीय नौसेना ने म्यांमार के साथ 2013 में नौसैनिक अभ्यास शुरू किया. बांग्लादेश के साथ अभ्यास 2019 में शुरू हुआ.
बीबीसी मॉनिटरिंग की रिपोर्ट के मुताबिक, म्यांमार की समाचार वेबसाइट इरवाडी ने 16 जुलाई, 2019 को बताया था कि कैसे रूस की यात्रा के दौरान म्यांमार के कमांडर-इन-चीफ सीनियर-जनरल मिन औंग ह्लाइंग ने रूसी सेना के उप प्रमुख से एक उन्नत पनडुब्बी खरीदने पर चर्चा की.
11 दिसंबर, 2019 को म्यांमार टाइम्स ने बताया कि भारत के एक्शन पर थाईलैंड की किस तरह की प्रतिक्रिया थी.
अखबार ने लिखा, "रॉयल थाई नौसेना उस परिस्थिति से निपटने के लिए तैयारियां कर रही है जिसे वो उसके सामने एक 'नई स्थिति' कहती है. ये जानने के बाद कि म्यांमार अपनी पनडुब्बी को अंडमान सागर में सुरक्षा मिशनों के लिए भेजने वाला है, थाईलैंड चीन से तीन पनडुब्बियां खरीदने की प्रक्रिया में है."
वाइस एडमिरल हीरानंदानी के मुतबिक, "समुद्र पनडुब्बी को इलेक्ट्रोमैगनेटिक तरीके से कवच प्रदान करता है."
पनडुब्बी के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी समुद्र ही है. वह लिखते हैं,"अगर पनडुब्बी से निकलने वाली आवाज़ को समुद्र की प्राकृतिक आवाज़ से भी कम कर दिया जाए, तो पनडुब्बी अपने आप को समुद्र में छुपा सकती है."
वहीं, अगर कोई है जो समुद्र के नीचे शांति से साझेदारी बढ़ाना चाहता है, तो वो भारत और म्यांमार हैं.(bbc)
प्रशांत भूषण को अदालत की अवमानना का दोषी ठहराते हुए एक रुपये का जुर्माना लगाया गया था
मशहूर वकील प्रशांत भूषण ने भारतीय सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख न्यायाधीश को लेकर एक नया ट्वीट किया है, जो काफ़ी चर्चा में है.
जस्टिस बोबडे द्वारा हाल ही में अपनी छुट्टियों के दौरान मध्यप्रदेश की सरकार के तरफ़ से उनके लिए हेलिकॉप्टर उपलब्ध कराया था.
इसी को लेकर प्रशांत भूषण ने 21 अक्टूबर को ट्वीट किया है. अपने ट्वीट में उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार के इस आतिथ्य पर सवाल उठाया है.
प्रशांत भूषण ने कहा, ''मुख्य न्यायाधीश ने कान्हा राष्ट्रीय उद्यान और फिर अपने गृह नगर नागपुर की यात्रा के लिए मध्य प्रदेश सरकार की ओर से मिले हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल किया. वो भी ऐसे समय में जब मध्य प्रदेश के बाग़ी विधायकों के निलंबन का महत्वपूर्ण मामला उनके समक्ष लंबित है. मध्य प्रदेश सरकार इस मामले पर टिकी है.''
इस ट्वीट में प्रशांत भूषण ने विनय सक्सेना बनाम मध्य प्रदेश विधानसभा स्पीकर और अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की कॉपी भी लगाई है.
इस मामले की सुनवाई 6 अक्तूबर को मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस एएस बोपन्ना और वी रामासुब्रमण्यम की बेंच ने की थी. आदेश में कहा गया है कि इस मामले में अंतिम फ़ैसला चार नवंबर को लिया जाएगा.
क्या है मध्यप्रदेश विधायकों का मामला?
प्रशांत भूषण का कहना है कि मध्य प्रदेश में 22 विधायकों की सदस्यता का मामला सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यों की खंडपीठ के समक्ष लंबित है, जिसकी सुनवाई ख़ुद जस्टिस बोबडे कर रहे हैं.
इस मामले पर मध्यप्रदेश सरकार का भविष्य टिका है तो इस परिप्रेक्ष्य में सीजेआई को राज्य सरकार का आथित्य स्वीकार किया जाना सही था या नहीं?
आपको याद होगा कि मध्यप्रदेश में महीनों तक ज़बरदस्त सियासी ड्रामा चला था जिसके बाद राज्य में कमलनाथ की सरकार से कुछ कांग्रेस के विधायकों ने बग़ावत कर पार्टी छोड़ दी थी.
बाद में कमलनाथ ने अपनी कुर्सी छोड़ दी और बीजेपी के शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बन गए.
इसके बाद 22 कथित 'दल बदलू'विधायकों की बर्ख़ास्तगी को लेकर कांग्रेस पार्टी की तरफ़ से तत्कालीन प्रोटेम स्पीकर विनय सक्सेना ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और इस सम्बन्ध में एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की.
इस याचिका की सुनवाई जस्टिस बोबडे की अगुवाई वाली खंडपीठ में शुरू हुई जिसके दूसरे अन्य दो सदस्य ह न्यायमूर्ति बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यम हैं.
मामले की सुनवाई चल रही है और इसे अब चार नवम्बर को फिर से खंडपीठ के सामने पेश किया जाएगा.
भूषण कहते हैं कि मध्यप्रदेश सरकार ने जो हेलिकॉप्टर उपलब्ध करवाया था, उससे मुख्य न्यायाधीश सबसे पहले मध्य प्रदेश के 'कान्हा नेशनल पार्क' गए थे और फिर वहाँ से वो नागपुर गए.
इस यात्रा पर सवाल की गुंजाइश इसलिए अधिक बन गई है क्योंकि चीफ़ जस्टिस इस राज्य से जुड़े एक अहम केस की सुनवाई करने जा रहे हैं.
प्रशांत भूषण ने पहले भी उठाया है सवाल
इससे पहले भी प्रशांत भूषण मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे को लेकर ट्वीट कर चुके हैं और अदालत ने उनको अवमानना दोषी क़रार देते हुए एक रुपये का अर्थदंड दिया था.
भूषण ने इसी साल 27 जून को अपने ट्वीट में लिखा था, "जब भावी इतिहासकार देखेंगे कि कैसे पिछले छह साल में बिना किसी औपचारिक आपातकाल के भारत में लोकतंत्र को खत्म किया जा चुका है. वो इस विनाश में विशेष तौर पर सुप्रीम कोर्ट की भागीदारी पर सवाल उठाएंगे और मुख्य न्यायाधीश की भूमिका को लेकर पूछेंगे.''
प्रशांत भूषण ने कुछ दिनों के बाद एक और ट्वीट किया.
उनके ट्वीट के निशाने पर इस बार भी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे थे.
भूषण ने लिखा था, 'भारत के चीफ़ जस्टिस ऐसे वक़्त में राज भवन, नागपुर में एक बीजेपी नेता की 50 लाख की मोटरसाइकिल पर बिना मास्क या हेलमेट पहने सवारी कर रहे हैं जब वो सुप्रीम कोर्ट को लॉकडाउन में रखकर नागरिकों को इंसाफ़ पाने के उनके मौलिक अधिकार से वंचित कर रहे हैं.''
इस ट्वीट पर अदालत ने अवमानना का स्वतः संज्ञान लिया और प्रशांत भूषण पर एक रुपये का अर्थ दंड भी लगाया था.
अब प्रशांत भूषण के मध्य प्रदेश से जुड़े ट्वीट को लेकर न्यायिक हलकों में बहस जारी है और राय भी बंटी हुई है.
सवाल दो हैं? क्या प्रशांत भूषण ने इस ट्वीट से दोबारा कोर्ट की अवमानना की है? क्या ताज़ा संदर्भ में चीफ़ जस्टिस ने मध्यप्रदेश सरकार का आथित्य स्वीकार कर जजों के लिए स्थापित 'कोड ऑफ़ एथिक्स' की अवहेलना की है?
जजों का कोड ऑफ़ एथिक्स क्या कहता है?
सात मई, 1997 को सुप्रीम कोर्ट ने 'न्यायिक जीवन के मूल्यों पर प्रतिबंध' नाम से एक 16-कोड चार्टर अपनाया था. इसका मक़सद स्वतंत्र, मज़बूत और सम्मानित न्यायपालिका के लिए ज़रूरी गाइड के तौर पर काम करना था. इन्हें न्याय के निष्पक्ष प्रशासन के लिए अपरिहार्य माना गया है.
इस चार्टर तीन बिंदु जो इस मामले से संबंधित हैं, वो कुछ इस तरह हैं:
1. न्याय सिर्फ़ किया ही नहीं जाना चाहिए बल्कि ये प्रदर्शित भी होना चाहिए कि न्याय हो रहा है. उच्च न्यायपालिका के सदस्यों का व्यवहार न्यायपालिका की निष्पक्षता में लोगों के विश्वास को मज़बूत करे. सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को, व्यक्तिगत या अधिकारिक क्षमता में, कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जो इस धारणा की विश्वसनीयता को कमज़ोर करता हो.
2. एक न्यायाधीश को अपने कार्यालय की गरिमा का ध्यान रखना चाहिए और अपने आप को सार्वजनिक जीवन से दूर रखना चाहिए.
3. हर जज को हर सयम इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वो जनता की निगरानी में है. उसे ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जो उसके पद के सम्मान के ख़िलाफ़ हो.
कुछ को लगता है की भूषण ने ऐसा ट्वीट करके फिर से अवमानना की है. वहीं, कुछ क़ानून के जानकार मानते हैं कि उनके ट्वीट से अवमानना का कोई मामला नहीं बनता है क्योंकि उन्होने सिर्फ़ अपनी राय दी है.
सिक्किम के मुख्य न्यायाधीश रहे प्रमोद कोहली का बीबीसी से कहना था कि मुख्य न्यायाधीश चाहे सुप्रीम कोर्ट के हों या राज्य के, सभी राजकीय अतिथि के श्रेणी में आते हैं. इनकी सुरक्षा और रहने का का ज़िम्मा भी राज्य सरकारों का ही होता है. वो कहते हैं कि सिर्फ़ मुख्य न्यायाधीश ही नहीं, राज्यों के जज भी इसी श्रेणी में ही आते हैं.
प्रशांत भूषण को सुप्रीम कोर्ट ने क्या सज़ा दी?
उनका ये भी कहना था कि जहां कान्हा नेशनल पार्क स्थित है वो नक्सल प्रभावित इलाक़ा है. ऐसे में चार पाँच घंटों तक सड़क मार्ग से जाना उनकी सुरक्षा के दृष्टिकोण से बड़ी चुनौती रहती.
वर्ष 2011 के मध्य प्रदेश के राज्य के गजट यानी राजपत्र में इन बातों का साफ़ तौर पर उल्लेख किया गया है.
21 जनवरी वर्ष 2011 में प्रकाशित इस राजपत्र के राज्य अतिथि नियम 1 (3 और 4 ) में विशिष्ट लोगों की सूची है जबकि इसी में इनकी आगवानी, सुरक्षा, आवास, भोजन प्रबंध और परिवहन की राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी का स्पष्ट उल्लेख किया गया है.
देश के सभी राज्यों ने महत्वपूर्ण व्यक्तियों को लेकर अलग अलग नियमावली बनायी है. लेकिन बड़े ओहदों पर आसीन अति महत्वपूर्ण लोगो के लिए सभी राज्यों की लगभग एक जैसी ही नियमावली है जिसे इन राज्यों ने राजपत्र यानी गजट के माध्यम से लागू किया हुआ है.
मगर इस मामले पर न्यायिक हलकों में राय एक सामान नहीं है.
बीबीसी से बात करते हुए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति जस्टिस चेलमेश्वर कहते हैं कि अपने कार्यकाल में उन्होंने इस तरह की कोई भी सुविधा या उपकार स्वीकार नहीं किया.
आंध्र प्रदेश स्थित अपने गांव से फ़ोन पर बात करते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश की चर्चा करते हुए कहा कि किसी चर्चित व्यक्ति के साथ वो न्यायाधीश छुट्टियाँ मनाने गए. बाद में उन्हीं न्यायाधीश की अदालत में उस चर्चित व्यक्ति का मामला आया. लेकिन इसके बावजूद उन न्यायाधीश महोदय ने ख़ुद को मामले की सुनवाई से अलग नहीं किया.
जस्टिस चेलमेश्वर कहते हैं कि प्रोटोकॉल को देखते हुए चीफ़ जस्टिस बोबडे आतिथ्य स्वीकार कर सकते हैं मगर मौजूदा परिस्थिती में उनको करना चाहिए या नहीं ये उनके विवेक पर निर्भर करता है.
राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है जज की सुरक्षा
न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर को लगता है कि इस मामले को लेकर बहस होनी ही चाहिए.
बीबीसी हिंदी के लिए सुचित्रा मोहंती से बात करते हुए उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जज देश भर में आते जाते रहते हैं. या तो किसी निजी या सरकारी समारोह में हिस्सा लेने के लिए फिर व्याख्यान देने के लिए. उन्हें सुविधाएं और सुरक्षा राज्य सरकारें मुहैया कराती हैं.
वो कहते हैं, ''देखा जा रहा है कि कुछ जजों का आचरण उनके ओहदे की गरिमा के अनुकूल नहीं है इसके लिए उन्हें आत्ममंथन करना ज़रूरी हो गया है कि क्या उनके द्वारा ऐसा करना सही है या नहीं?''
जस्टिस लोकुर कहते हैं कि जहाँ तक मुख्य न्यायाधीश की बात है तो इस पर चर्चा और बहस होनी ज़रूरी है.
हाँलाकि न्यायमूर्ति रत्नाकर दास मानते हैं कि अदालत में केस सबूतों और दलीलों के आधार पर सुने जाते हैं और इन्ही आधारों पर फ़ैसले दिए जाते हैं. इससे इस बात का कोई लेना देना नहीं है कि उन्हें किस राज्य सरकार ने अपने अतिथि गृह में ठहराया था.
न्यायमूर्ति दास जजों द्वारा इस तरह के सुविधाएं लेने को कहीं से ग़लत नहीं मानते हैं.
प्रशांत भूषण को सज़ा सुनाने पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
वहीं, सुप्रीम कोर्ट के प्रोटोकॉल से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि जो कुछ हुआ है वो पहले से तय किए गए मानकों के हिसाब से ही हुआ है. कान्हा नेशनल पार्क और नागपुर जाने के लिए अगर सड़क मार्ग चुना जाता तो माओवादियों के खतरे को देखते हुए ये ग़लत होता.
जजों और मुख्य न्यायाधीशों की सुरक्षा हर उस राज्य की ज़िम्मेदारी है जहां वो जा रहे हैं, चाहे आधिकारिक रूप से या फिर व्यक्तिगत तौर पर.
हैदराबाद स्थित नालसार क़ानून विश्वविद्यालय के कुलपति फैज़ान मुस्तफ़ा ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि कुछ अति विशिष्ट लोगों की श्रेणी ऐसी है जिसके तहत वो सरकारी काम से जाएं या निजी काम से, उन्हें तय किए गए मापदंडों के हिसाब से ही सुविधाएं दी जाती हैं.
फ़ैज़ान कहते हैं, "सिर्फ़ हेलीकॉप्टर के इस्तेमाल को मुद्दा नहीं बनाना चाहिए क्योंकि ये मुख्य न्यायाधीश को तय किए गए प्रोटोकॉल के हिसाब से ही दिया गया होगा बतौर राजकीय अतिथि."
जहाँ तक रही बात प्रशांत भूषण द्वारा किये गए ट्वीट की, तो फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं कि ये अवमानना का मामला बनता है या नहीं ये तो अदालत ही तय करेगा.
मुद्दा नियमों से ज़्यादा मूल्यों का
लेखक और पत्रकार मनोज मिट्टा का मानना है कि ये मुद्दा नियमों से ज़्यादा मूल्यों का है.
वो कहते हैं, ''मुद्दा ये नहीं है कि कान्हा नेशनल पार्क की विशेष परिस्थितियों का ध्यान रखते हुए हेलीकॉप्टर लिया जाना चाहिए था या नहीं, मुद्दा समय का है. सवाल ये है कि क्या भारत के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को मध्य प्रदेश की सरकार का ऐसे समय में अतिथि बनना चाहिए जब सरकार के अस्तित्व का मामला ही उनके समक्ष हो.''
''उन्हें न्यायिक आचार संहिता का ध्यान रखना चाहिए था. उन्हें ऐसी परिस्थिति में अपने आप को अलग रखना चाहिए ताकि सिर्फ न्याय किया ही नहीं जाए बल्कि न्याय होता हुआ दिखे भी.''
बीबीसी से बात करते हुए पूर्व अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के सी कौशिक ने भी कहा कि सबकुछ जजों के विवेक पर निर्भर करता है कि वो इस तरह के आथित्य अपने निजी काम से जाने के बावजूद स्वीकार करते हैं या नहीं.
उनका कहना था कि जहां तक हो जजों को इस तरह का आतिथ्य स्वीकार करने से बचना चाहिए.
प्रशांत भूषण के इस ताज़ा ट्वीट ने जजों के संदर्भ में राजकीय प्रोटकॉल और कोड ऑफ़ एथिक्स पर एक नई बहस छेड़ दी है. लोकतंत्र में न्यायिक प्रणाली और न्यायधीशों की निष्पक्षता में भरोसा क़ायम रखने के लिए ये बहस बेमानी नहीं है.(bbc)
"मैं इस्लामाबाद से लड़का बन कर गुजरात पहुंचा हूँ. इस बात की मुझे इतनी ख़ुशी है कि मैं बता नहीं सकता. मुझे तो बचपन से ही लड़कियों के कपड़े पसंद नहीं थे. मेरे काम और आदतें लड़कों जैसी थीं. मेरी सात बहनें, दो भाइयों को पाकर बहुत ख़ुश हो रही हैं. मेरे भाई आबिद भी खुश है."
ये कहना है पंजाब प्रांत में गुजरात ज़िले के सोनबड़ी गांव के द्वितीय वर्ष के छात्र वलीद आबिद का.
सेक्स चेंज ऑपरेशन से पहले उनका नाम बुशरा आबिद था.
उनका छोटा भाई मुराद आबिद, जो नौंवी कक्षा का छात्र है, वो ऑपरेशन से पहले वाफ़िया आबिद था.
ये दोनों पंजाब के एक जमींदार परिवार से हैं.
डॉक्टर के लिए 'ये केस अलग' था
वलीद और मुराद के माता-पिता की शादी 1993 में हुई थी. शादी के बाद उनके यहाँ एक के बाद एक नौ बेटियों का जन्म हुआ. हालांकि, दो बहनों के सेक्स चेंज ऑपरेशन के बाद, अब उनकी सात बेटियाँ और दो बेटे हैं. वलीद बहनों में पांचवें और मुराद छठे नंबर पर हैं.
दोनों बहनों का सेक्स चेंज ऑपरेशन इस्लामाबाद के पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज के चिल्ड्रेन हॉस्पिटल में 12 डॉक्टरों की टीम ने डॉक्टर अमजद चौधरी की अगुवाई में किया.
बीबीसी से बात करते हुए डॉक्टर अमजद चौधरी ने कहा कि उन्होंने इससे पहले भी सेक्स ऑपरेशन किये हैं, लेकिन यह मामला अलग था. दोनों भाई लगभग दो साल से इलाज करा रहे थे.
उनके मुताबिक दो सगी बहनों या सगे भाइयों का ऑपरेशन उन्होंने इससे पहले नहीं किया.
डॉक्टर चौधरी ने कहा, "हमने इन दोनों के अलग-अलग ऑपरेशन किये हैं. वलीद आबिद का ऑपरेशन 20 सितंबर को हुआ था, जिसके बाद उन्हें अस्पताल के आईसीयू में रखा गया. जब ऑपरेशन के सफ़ल होने की पूरी तरह से तसल्ली हो गई, तो हमने 10 अक्टूबर को मुराद आबिद का ऑपरेशन किया."
डॉक्टर अमजद के अनुसार, ये ऑपरेशन छह घंटे तक चले थे जिसमें समय-समय पर कई डॉक्टर शामिल हुए. दोनों भाइयों को 21 अक्टूबर को अस्पताल से घर लौटने की इजाज़त दे दी गई है.
सेक्स चेंज ऑपरेशन क्यों?
एबटाबाद स्थित अयूब टीचिंग हॉस्पिटल के डॉक्टर जुनैद के अनुसार, "कुछ बच्चों का जेंडर जन्म के समय स्पष्ट नहीं होता है. इसका कारण यह है कि ऐसे बच्चों के जननांग पूरी तरह से स्पष्ट आकार नहीं ले पाते हैं. ऐसे बच्चों में अगर दोनों जेंडर की विशेषताएं होती हैं, ऐसे मामलों में पैदा होने वाले बच्चों को 'एटिपिकल जेनेटेलिया' नामक बीमारी हो सकती हैं."
उन्होंने कहा कि यह बीमारी आमतौर पर जन्मजात होती है और यह स्थिति विशिष्ट अंगों और यौन विकास के रास्ते में एक रुकावट होती है.
डॉक्टर अमजद चौधरी ने बताया कि यह बीमारी बहुत कम लोगों को होती है. लगभग 0.5 से 0.7 प्रतिशत लोगों को.
वो बताते हैं, "इस केस में, ज़ाहिरी तौर पर तो दोनों लड़कियां थीं, लेकिन उनमें लड़कियों या महिलाओं की कोई भी विशेषताएं नहीं थीं."
डॉक्टर अमजद ने कहा कि एक निश्चित उम्र के होने के बाद भी इन दोनों को माहवारी शुरू नहीं हुई थी. उनकी माँ ने गुजरात में उनकी जांच करवाई, वहां से इन्हें पीआईएमएस चिल्ड्रेन हॉस्पिटल में रेफ़र कर किया गया
उन्होंने कहा कि शुरुआती टेस्ट कराने से पता चल गया था कि दोनों 'एटिपिकल जेनेटेलिया' से ग्रस्त थे और उन्हें जेंडर परिवर्तन ऑपरेशन की ज़रूरत है. इस ऑपरेशन से, उनके जननांगों को सर्ज़री के ज़रिये सामान्य स्थिति में वापस लाया गया.
सेक्स चेंज कैसे होता है?
डॉक्टर अमजद चौधरी के अनुसार, इसके लिए ऑपरेशन से पहले और बाद में इलाज की ज़रूरत पड़ती है. ऑपरेशन से पहले महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक टेस्ट और कॉउंसलिंग की जाती है, जबकि ऑपरेशन के बाद कुछ समय के लिए दवा के ज़रिये से हॉर्मोन पैदा किये जाते हैं.
डॉक्टर अमजद चौधरी ने बताया कि वो इस ऑपरेशन से पहले भी कई सर्ज़री कर चुके हैं और बहुत से लोग ऑपरेशन के बाद एक अच्छा जीवन जी रहे हैं. लेकिन उनका कहना है कि ऑपरेशन कराने का निर्णय 100 फ़ीसदी मरीज़ का अपना होता है.
उन्होंने कहा, "इस केस में भी, हमने दोनों को फ़ैसला करने का पर्याप्त अवसर दिया था. उनसे लगभग हर विषय पर बात हुई थी. हमारे मनोचिकित्सक ने भी उनसे बात की थी.
सर्जन डॉक्टर अमजद चौधरी के मुताबिक माता-पिता को जब लगे कि उनके बच्चों की शारीरिक रचना, जननांग और उनका व्यवहार कुछ अलग है, तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए.
उनका कहना है कि बच्चों में, इस बीमारी का समय रहते इलाज किया जा सकता है, अगर बहुत अधिक देरी हो जाए, तो समस्याएं पैदा हो सकती हैं.(bbc)
न्यूयॉर्क, 25 अक्टूबर | न्यूयॉर्क राज्य के माइक्रो क्लस्टर इलाकों में कोविड-19 परीक्षणों के पॉजिटिव आने की दर बढ़ रही है। यहां महामारी की स्थिति सबसे गंभीर है और एक दिन में ही पॉजिटिविटी रेट 2.31 फीसदी से बढ़कर 2.58 फीसदी हो गयी। यह जानकारी यहां के गवर्नर एंड्रयू क्यूमो ने दी है। समाचार एजेंसी सिन्हुआ ने शनिवार को कहा, 'माइक्रो-क्लस्टर' क्षेत्रों को छोड़कर पूरे राज्य में पॉजिटिविटी दर 1.13 प्रतिशत थी, जो कि गुरुवार को 0.98 प्रतिशत थी। गवर्नर ने कहा कि शुक्रवार को हुए 1,56,940 परीक्षणों में से 2,061 पॉजिटिव आए थे।
जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर सिस्टम साइंस एंड इंजीनियरिंग के अनुसार, शनिवार तक न्यूयॉर्क में कोरोना से 33,418 मौतें हो चुकी हैं, जो देश के सभी राज्यों में से सबसे ज्यादा हैं।
कोरोना संक्रमण के केन्द्र रहे अमेरिका के न्यूयॉर्क में 4,99,000 से अधिक कोविड-19 मामले दर्ज हुए हैं, जिनमें से 2,63,000 से ज्यादा तो न्यूयॉर्क शहर के ही हैं।
जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय के अनुसार, रविवार तक दुनिया में सबसे अधिक 85,71,943 मामले और 2,24,771 मौतें अमेरिका में दर्ज हो चुकी हैं।(आईएएनएस)
ओंगोल (आंध्र प्रदेश), 25 अक्टूबर | आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले की पुलिस ने अपने ही रिश्तेदार द्वारा वेश्यावृत्ति में धकेली गई नेल्लोर जिले की एक नाबालिग लड़की से कथित तौर पर दुष्कर्म करने के मामले में 4 महीने बाद 9 लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने सैय्यद सलमान (24) , कटरागड्डा शिवा कुमार (24 ), उन्नाव नवीन (31), बुरामेट्टी रवि तेजा (24), गोंडी वामसी कृष्णा (24) कोंडामुरसुपालम, कासिरेड्डी ब्रह्मा रेड्डी (25), धन्यासी देव प्रकाश (24), रावुरी अरविंद (25), और कोमातला येदुकोंडालू (30) को गिरफ्तार किया है।
यह मामला 18 जुलाई का है, जिसमें पुलिस ने टिप मिलने के बाद कंडुकुर मंडल के मडवापुरम गांव में एक घर पर छापा मारा। यहां एक नाबालिग लड़की बेहद बुरी स्थिति में मिली जिसके साथ कई पुरुषों ने जबरदस्ती यौन संबंध बनाए थे।
विजयवाड़ा की रहने वाली नादेन्धला माधवी ने 27 हजार रुपये में 5 दिनों तक वेश्यावृत्ति कराने के लिए नाबालिग लड़की की भाभी वादिना के साथ सौदा किया।
प्रकाशम जिले के अधिकारी ने आईएएनएस को बताया, "माधवी ने नाडवापुरम गांव में एक खाली घर में नाबालिग लड़की को रखा और वहां पुरुषों को भेजा। हमें 18 जुलाई को एक सूचना मिली और हमने तुरंत उस घर पर छापा मारा, लड़की को बचाया और 4 लोगों को गिरफ्तार किया।"
घर की मालकिन माधवी और नाबालिग लड़की की भाभी को गिरफ्तार किया गया था। हालांकि, पुलिस उन पुरुषों को नहीं ढूंढ पाई, जिन्होंने नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म किया था।
प्रकाशम जिले के पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ कौशल ने इस मामले पर सख्ती से जांच कराई और टेक्नॉलॉजी की मदद से 9 आरोपियों को पकड़ा क्योंकि आरोपियों ने माधवी को फोन पे ऐप के जरिए पैसे भेजे थे।
सभी 9 लोगों को आईपीसी की धारा 342, 370 (4), 376 (2) और पॉक्सो एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया है।(आईएएनएस)
नई दिल्ली, 25 अक्टूबर | राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने रविवार को विजयादशमी उत्सव के संबोधन के दौरान कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने, नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राम मंदिर का खास तौर से जिक्र किया। उन्होंने कहा कि देश और दुनिया में जितने भी विषयों पर चचार्एं हो रहीं थीं, वह सब कोरोना काल में दब गईं। कोरोना के कारण नागपुर के रेशमबाग में सिर्फ 50 स्वयंसेवकों के साथ आयोजित इस कार्यक्रम को लेकर मोहन भागवत ने कहा कि संघ के इतिहास में पहली बार इतने कम स्वयंसेवकों की उपस्थिति में यह उत्सव हो रहा है। मोहन भागवत का संबोधन सुनने के लिए देश और दुनिया के स्वयंसेवक ऑनलाइन जुड़े। भागवत ने कहा कि मार्च महीने में लॉकडाउन शुरू हुआ। बहुत सारे विषय उस दौरान दुनिया में चर्चा में थे। वे सारे दब गए। उनकी चर्चा का स्थान महामारी ने ले लिया। मोहन भागवत ने पिछले साल जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने और संसद में पास हुए नागरिकता संशोधन कानून का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा, विजयादशमी के पहले ही 370 प्रभावहीन हो गया था। संसद में उसकी पूरी प्रक्रिया हुई। वहीं विजयादशमी के बाद नौ नवंबर को राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का असंदिग्ध फैसला आया। जिसे पूरे देश ने स्वीकार किया। पांच अगस्त को राम मंदिर निर्माण का जो पूजन हुआ, उसमें भी, उस वातावरण की पवित्रता को देखा और संयम और समझदारी को भी देखा।
आरएसएस के इस प्रमुख वार्षिक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने कहा, नागरिकता संशोधन कानून भी संसद की पूरी प्रक्रिया के बाद पास हुआ। पड़ोसी देशों में दो तीन देश ऐसे हैं, जहां सांप्रदायिक कारणों से उस देश के निवासियों को प्रताड़ित करने का इतिहास है। उन लोगों को जाने के लिए दूसरी जगह नहीं है, भारत ही आते हैं। विस्थापित और पीड़ित यहां पर जल्दी बस जाएं, इसलिए अधिनियम में कुछ संशोधन करने का प्रावधान था। जो भारत के नागरिक हैं, उनके लिए कुछ खतरा नहीं था।
मोहन भागवत ने कहा कि नागरिकता संशोधन अधिनियम कानून का विरोध करने वाले भी थे। राजनीति में तो ऐसा चलता ही है। ऐसा वातावरण बनाया कि इस देश में मुसलमानों की संख्या न बढ़े, इसलिए नियम लाया। जिससे प्रदर्शन आदि होने लगे। देश के वातावरण में तनाव होने लगा। इसका क्या उपाय हो, यह सोच विचार से पहले ही कोरोना काल आ गया। मन की सांप्रदायिक आग मन में ही रह गई। कोरोना की परिस्थिति आ गई। जितनी प्रतिक्रिया होनी थी, उतनी नहीं हुई। पूरी दुनिया में ऐसा ही दिखता है। बहुत सारी घटनाएं हुईं हैं, लेकिन चर्चा कोरोना की ही हुई।(आईएएनएस)
अबू धाबी, 25 अक्टूबर, । मौजूदा विजेता मुंबई इंडियंस आईपीएल-13 में रविवार को होने वाले दूसरे मैच में शेख जाएद स्टेडियम में राजस्थान रॉयल्स से भिड़ेगी। मुंबई 10 मैचों में सात जीत और तीन हार के बाद 14 अंक लेकर पहले स्थान पर है। इस मैच में जीतने से उसे जो दो अंक मिलेंगे उससे वह 16 अंक लेकर प्लेऑफ में अपनी जगह पक्की कर लेगी।
वहीं राजस्थान 11 मैचों में चार जीत और सात हार के साथ आठ अंक लेकर सातवें स्थान पर है। इस मैच में जीत उसे प्लेऑफ की रेस में तो बनाए रखेगी लेकिन क्वालीफाई करने के लिए जरूरी है कि टीम अपने बाकी के सभी मैच जीते। साथ ही राजस्थान को बाकी टीमों के प्रदर्शन पर भी नजर रखनी होगी।
मुंबई ने पिछले मैच में चेन्नई सुपर किंग्स को मात दी थी और जिस तरह का प्रदर्शन वह कर रही है उसे देखकर लगता नहीं है कि राजस्थान जैसी अस्थिर टीम उसके सामने टिक पाएगी।
पिछले मैच में रोहित शर्मा नहीं खेले थे और केरन पोलार्ड ने उनकी जगह टीम की कप्तानी की थी। रोहित को पिछले मैच में आराम दिया गया था और पूरी उम्मीद है कि वह राजस्थान के खिलाफ मैदान पर उतरेंगे।
रोहित के आने के बाद तय है कि सौरव तिवारी बाहर जाएंगे। इसके अलावा किसी बदलाव की संभावना मुंबई की टीम में दिखती नहीं है।
क्विंटन डी कॉक और रोहित शर्मा की सलामी जोड़ी पूरे सीजन में शानदार तरीके से रन बना रही है। ईशान किशन और सूर्यकुमार यादव ने मध्य क्रम को मजबूती दी है और अंत की ओर पोलार्ड, हार्दिक पांड्या और उनके भाई क्रूणाल पांड्या हैं।
गेंदबाजी में ट्रेंट बोल्ट ने पिछले मैच में चार विकेट लेकर चेन्नई की कमर तोड़ी थी। जसप्रीत बुमराह, और नाथन कुल्टर नाइल उनका अच्छा साथ दे रहे हैं। स्पिन में राहुल चहर ने बहुत प्रभावित किया है।
वहीं अगर राजस्थान की बात की जाए तो उसके लिए बेन स्टोक्स की फॉर्म चिंता का विषय है। वह अभी तक सलामी बल्लेबाजी करते आए हैं। हो सकता है कि टीम प्रबंधन उन्हें मध्य क्रम में आजमाए और जोस बटलर को रॉबिन उथप्पा के साथ पारी की शुरूआत करने भेजे।
इन दोनों के अतिरिक्त कप्तान स्टीव स्मिथ, और संजू सैमसन से भी टीम को रनों की उम्मीद होगी। राहुल तेवतिया और रियान पराग से भी अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद की जाएगी।
राजस्थान की गेंदबाजी में जोफ्रा आर्चर और कार्तिक त्यागी पर काफी कुछ निर्भर करेगा। इन्हीं दोनों राजस्थान की गेंदबाजी को संभाले रखा है और उम्मीद है कि आने वाले मैचों में भी यह टीम के लिए अच्छा करेंगे।
टीमें (सम्भावित) :
राजस्थान रॉयल्स : स्टीव स्मिथ (कप्तान), अंकित राजपूत, बेन स्टोक्स, जोफ्रा आर्चर, जोस बटलर, महिपाल लोमरोर, मनन वोहरा, मयंक माकंर्डे, राहुल तेवतिया, रियान पराग, संजू सैमसन, शशांक सिंह, श्रेयस गोपाल, वरुण एरॉन, रॉबिन उथप्पा, जयदेव उनादकट, यशस्वी जायसवाल, अनुज रावत, आकाश सिंह, कार्तिक त्यागी, डेविड मिलर, ओशाने थॉमस, अनिरुद्ध जोशी, एंड्रयू टाई, टॉम कुरैन, बेन स्टोक्स।
मुंबई इंडियंस : रोहित शर्मा (कप्तान), आदित्य तारे (विकेटकीपर), अनमोलप्रीत सिंह, अनुकूल रॉय, क्रिस लिन, धवल कुलकर्णी, दिग्विजय देशमुख, हार्दिक पांड्या, ईशान किशन, जेम्स पैटिनसन, जसप्रीत बुमराह, जयंत यादव, कीरन पोलार्ड, क्रूणाल पांड्या, मिशेल मैक्लेंघन, मोहसिन खान, नाथन कुल्टर नाइल, प्रिंस बलवंत राय, क्विंटन डी कॉक (विकेटकीपर), राहुल चहर, सौरभ तिवारी, शेरफाने रदरफोर्ड, सूर्यकुमार यादव, ट्रेंट बोल्ट।(आईएएनएस/ग्लोफैंस)
जीत के लिए 18 गेंदों में 20 रन बनाने हों.
बल्लेबाज़ी कर रही टीम के छह विकेट बाकी हों.
क्रीज़ पर एक ऐसा बल्लेबाज़ मौजूद हो जिसने पिछले मैच में जीत दिलाने वाली हाफ सेंचुरी जमाई हो और मौजूदा मैच में अपनी पारी की आखिरी चार गेंद में 14 रन बना चुका हो तो किस टीम पर दाँव लगाना मुनासिब होगा?
आपका जवाब चाहे जो हो, ऐसी स्थिति के बीच गेंदबाज़ी करने वाली टीम किंग्स इलेवन पंजाब की थी और आईपीएल-13 में फिलहाल ये टीम किसी भी स्थिति से बाउंस बैक करके मैच जीतने का फॉर्मूला हासिल कर चुकी है.
और यही चमत्कार किंग्स इलेवन पंजाब ने शनिवार रात दुबई में किया.

जीत का 'चौका'
जो टीम बल्लेबाज़ी कर रही थी, वो सनराइज़र्स हैदराबाद थी.
127 रन का लक्ष्य लेकर खेल रही हैदराबाद की टीम ने पारी की आखिरी 17 गेंद में सिर्फ़ सात रन बनाए और छह विकेट खो दिए.
इनमें पिछले मैच के हीरो विजय शंकर और प्रियम गर्ग के विकेट शामिल थे. जहाँ जीत तय दिख रही थी, वहीं हैदराबाद की टीम 12 रन से मैच हार गई.
प्लेऑफ की रेस में दावेदारी मजबूत करने के अलावा पंजाब के पास ये मैच जीतने का एक बड़ा मकसद भी था.
टीम के ओपनर मनदीप सिंह के पिता की एक रात पहले मौत हो गई थी. मनदीप इस ग़म को भुलाकर पारी की शुरुआत करने मैदान पर उतरे.
वो रन तो सिर्फ़ 17 रन बना सके लेकिन उनके जज्बे की टीम ने जमकर तारीफ की और जब जीत मिली तो पंजाब की टीम ने इसे मनदीप के पिता के नाम समर्पित कर दिया.
हैदराबाद के ख़िलाफ़ मैच 18वें ओवर में पंजाब के हक़ में झुकता दिखाई दिया लेकिन इसका आधार जे सुचित ने 17वें ओवर में ही तैयार कर दिया था.
उन्होंने क्रिस जोर्डन की गेंद पर मनीष पांडे का बाउंड्री पर जबरदस्त कैच पकड़ा. पांडे के क्रीज पर रहते अलग अंदाज़ में बल्लेबाज़ी कर रहे विजय शंकर उनकी विदाई के बाद ठिठक से गए.
18वें ओवर की चौथी गेंद पर रन लेने की कोशिश के दौरान निकोलस पूरन का थ्रो का उनके हेलमेट से टकराया.
अर्शदीप की अगली ही गेंद पर वो पंजाब के कप्तान केएल राहुल को कैच थमा गए. उम्मीदें प्रियम गर्ग पर टिकीं लेकिन विकटों की झड़ी के बीच वो भी सरेंडर कर गए.
किसी वक़्त पंजाब टीम के लिए खेल चुके टीम इंडिया के पूर्व बल्लेबाज़ युवराज सिंह ने 'उलटफेर' के लिए पंजाब की तारीफ की.

'जीत बनी आदत'
वहीं, किंग्स इलेवन पंजाब के कप्तान केएल राहुल ने कहा कि जीतना उनकी 'टीम की आदत' में शुमार हो गया है.
शुरुआती सात मैचों में से सिर्फ़ एक में जीत हासिल कर सकी पंजाब की टीम ने लगातार चार मैचों में जीत हासिल की है.
ये टीम हैदराबाद के पहले बैंगलोर, मुंबई और दिल्ली को हरा चुकी है.
567 रन के साथ पंजाब के कप्तान केएल राहुल टूर्नामेंट के सबसे कामयाब बल्लेबाज़ हैं. वहीं 17 विकेट ले चुके पंजाब के गेंदबाज़ मोहम्मद शमी आईपीएल-13 में सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज़ों में तीसरे नंबर पर हैं.
सनराइज़र्स हैदराबाद के ख़िलाफ़ 17 रन देकर तीन विकेट लेने वाले क्रिस जॉर्डन मैन ऑफ़ द मैच चुने गए. जॉर्डन ने कहा कि उनके लिए जो चीज मायने रखते है वो है 'टीम की जीत.'
गेंद से करिश्मा शनिवार के पहले मैच के दौरान भी देखने को मिला.
अबु धाबी में खेले गए इस मैच में कोलकाता नाइट राइडर्स ने दिल्ली कैपिटल्स को 59 रन से हरा दिया. कोलकाता की जीत के सबसे बड़े नायक रहे वरुण चक्रवर्ती. वरुण ने चार ओवर में सिर्फ़ 20 रन देकर पांच विकेट हासिल किए.
आईपीएल-13 में एक मैच में पांच विकेट लेने वाले वो पहले गेंदबाज़ हैं. वरुण के मुताबिक वो मैच में एक या दो विकेट हासिल करने का लक्ष्य लेकर उतरे थे.
वरुण ने बताया, "बीते कुछ मैचों से मैं विकेट नहीं ले पाया था. आज मैं एक या दो विकेट लेना चाहता था लेकिन भगवान का शुक्र है मुझे पांच विकेट मिले."

बल्ले में है दम
कोलकाता की जीत में नीतीश राणा और सुनील नरेन की जोड़ी ने बल्ले से अहम किरदार निभाया. शुरुआती तीन विकेट सस्ते में गिर जाने के बाद राणा और नरेन ने 9.2 ओवर में 115 रन की अहम साझेदारी की. राणा ने 81 और नरेन ने 64 रन बनाए.
कोलकाता और पंजाब की टीम ने प्ले ऑफ की रेस को भी दिलचस्प बना दिया है.

मुंबई, दिल्ली और बैंगलोर की टीमें 14-14 अंकों के साथ पहले, दूसरे और तीसरे नंबर पर हैं.
12 अंक के साथ कोलकाता चौथे और 10 अंक के साथ पंजाब पांचवे नंबर पर है.
हैदराबाद और राजस्थान के खाते में आठ-आठ पॉइंट्स हैं. सबसे निचले पायदान पर चेन्नई सुपर किंग्स है. उसके खाते में सिर्फ़ छह अंक हैं.(bbc)
चीन के शंघाई शहर में इंजीनियरों ने 7,600 टन की एक विशालकाय इमारत को उसकी जगह से खिसकाकर दूसरी जगह ले जाने का कारनामा कर दिखाया है.
उन्होंने 1935 में बनी शंघाई के लागेना प्राथमिक विद्यालय की पाँच मंज़िला इमारत को उसकी जगह से उठाया और तकनीक के इस्तेमाल से उसे कुछ दूरी पर ले गए.
स्थानीय प्रशासन के अनुसार, इस पुरानी इमारत के पास ही एक नए प्रोजेक्ट पर काम शुरू होना है जिसके लिए जगह थोड़ी पड़ने पर इस बिल्डिंग को उसकी जगह से खिसकाने का निर्णय लिया गया.

चीन के इंजीनियरों के पास इस इमारत को गिराने का विकल्प भी था, मगर उन्होंने इस ऐतिहासिक इमारत को उसकी जगह से उठाकर दूसरी जगह शिफ़्ट करने का निर्णय लिया.
बिल्डिंग को मूल जगह से क़रीब 62 मीटर खिसकाया गया
चीन के सरकारी मीडिया के अनुसार, इंजीनियरों की एक टीम ने तकनीक की मदद से बिल्डिंग को उठाया और 198 रोबोटिक टाँगों की मदद से उसे कुछ दूर ले गए.
स्थानीय मीडिया के अनुसार, कंक्रीट से बनी हज़ारों टन की इस इमारत को उसकी मूल जगह से क़रीब 62 मीटर खिसकाया गया है.
चीन सरकार द्वारा नियंत्रित सीसीटीवी न्यूज़ नेटवर्क के अनुसार, इमारत को एक जगह से दूसरी जगह शिफ़्ट करने का काम 18 दिनों में पूरा किया गया. बताया गया है कि 15 अक्तूबर को बिल्डिंग शिफ़्ट करने का काम पूरा कर लिया गया था.

न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, स्थानीय प्रशासन ने अब इस ऐतिहासिक इमारत को संरक्षित रखने का निर्णय लिया है और उसी लिहाज़ से इमारत की मरम्मत का काम किया जा रहा है.
इमारतों को एक जगह से दूसरी जगह शिफ़्ट करने के यूँ तो कई तरीक़े हैं, मगर आमतौर पर इंजीनियर ऐसी इमारतों को बड़े प्लेटफ़ॉर्म की मदद से शिफ़्ट करते हैं जिन्हें ज़्यादा क्षमता वाली रेल या क्रेन से खींचा जाता है.
लेकिन इस बार चीनी इंजीनियरों ने रोबोटिक लेग्स (रोबोट द्वारा नियंत्रित मज़बूत पाये) इस्तेमाल किये जिनके नीचे पहिये लगे थे. चीनी इंजीनियरों द्वारा पहली बार इस तरीक़े को अपनाया गया है.
हालांकि, ग़ौर करने वाली बात यह है कि शंघाई के इंजीनियरों के पास बिल्डिंगों को इस तरह शिफ़्ट करने का पुराना तजुर्बा है.
साल 2017 में, 135 साल पहले बने और क़रीब दो हज़ार टन वज़न वाले ऐतिहासिक बौद्ध मंदिर को उसकी मूल जगह से लगभग 30 मीटर खिसकाया गया था और इस मंदिर को 30 मीटर खिसकाने में 15 दिन लगे थे.
इस साल की शुरुआत में भी चीन के इंजीनियरों ने बिल्डिंग निर्माण के क्षेत्र में एक कीर्तिमान स्थापित किया था. चीन के हूबे प्रांत में स्थित वुहान शहर में कोरोना संक्रमण तेज़ी से फ़ैलने के बाद चीनी इंजीनियरों ने दस दिन में हज़ार बेड का अस्पताल बनाकर दिखाया था. वुहान वही शहर है जहाँ सबसे पहले कोविड-19 संक्रमण की आधिकारिक पुष्टि की गई थी.(bbc)
बलिया (उप्र), 25 अक्टूबर | बलिया गोलीकांड की घटना के मुख्य आरोपी का बचाव करने पर विवादों में घिरे भाजपा विधायक सुरेंद्र सिंह पर उप्र भाजपा के अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह द्वारा फूलों की बरसात करने का वीडियो सामने आया है। जबकि कुछ ही दिन पहले इन्हीें विधायक को पार्टी ने बलिया मामले को लेकर चेतावनी जारी की थी। भाजपा के व्हाट्सएप ग्रुपों पर यह वीडियो जमकर वायरल हो रहा है। इस वीडियो में स्वंतत्र देव सिंह सिकंदरपुर क्षेत्र के कठौड़ा गांव में एक कृष्ण मंदिर के 'भूमि पूजन' कार्यक्रम में हैं और दोनों नेता साथ बैठे हैं। यह कार्यक्रम शुक्रवार की शाम को हुआ था। कार्यक्रम के दौरान राज्य के भाजपा प्रमुख स्वतंत्र देव सिंह विधायक सुरेंद्र सिंह पर फूलों की पंखुड़ियों की वर्षा करते नजर आते हैं और विधायक हाथ जोड़कर खड़े हैं।
इस कार्यक्रम में भाजपा के सलेमपुर के सांसद रवींद्र कुशवाहा भी मौजूद थे। जब उनसे इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि केवल स्वंतत्र देव सिंह ही इस बारे में बता सकते हैं।
वहीं स्वतंत्र देव सिंह ने फोन कॉल का जवाब नहीं दिया और ना ही कोई अन्य भाजपा नेता इस घटना पर टिप्पणी देने के लिए राजी हुआ।
बता दें कुछ ही दिन पहले भाजपा की राज्य इकाई ने विधायक को लखनऊ बुलाकर राज्य सरकार को शमिर्ंदा करने वाले बयान जारी करने के खिलाफ चेतावनी दी थी। इतना ही नहीं भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने भी उप्र भाजपा प्रमुख से विधायक के व्यवहार पर नाराजगी जताई थी।
15 अक्टूबर को राशन की दुकान के आवंटन को लेकर हुए झगड़े में 46 वर्षीय व्यक्ति की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। इस घटना के मुख्य आरोपी धीरेन्द्र प्रताप सिंह का विधायक सुरेंद्र सिंह खुलकर बचाव कर रहे थे। विधायक ने प्रशासन पर पक्षपात करने का आरोप लगाते हुए और आरोपी का बचाव करते हुए कहा था कि उसने आत्मरक्षा में गोली चलाई थी। साथ ही उन्होंने दूसरे पक्ष के खिलाफ कार्रवाई करने की भी मांग की थी। (आईएएनएस)
वाशिंगटन, 25 अक्टूबर | वैश्विक स्तर पर कोरोनावायरस मामलों की कुल संख्या 4.25 करोड़ हो चुकी है, वहीं घातक संक्रमण से अब तक 1,148,940 से अधिक मौतें दर्ज की गई हैं। यह जानकारी जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय ने रविवार को दी। विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर सिस्टम साइंस एंड इंजीनियरिंग (सीएसएसई) के नए अपडेट के अनुसार, रविवार की सुबह तक कुल मामलों की संख्या 42,532,198 हो गई, जबकि मौतों का आंकड़ा बढ़कर 1,148,943 हो गया।
सीएसएसई के अनुसार, अमेरिका दुनिया में कोविड-19 से सबसे अधिक प्रभावित देश हैं। यहां संक्रमण के 8,571,943 मामले दर्ज किए गए हैं, वहीं इससे हुई मौतों का आंकड़ा 224,771 है।
वहीं संक्रमण के मामलों के हिसाब से भारत 7,814,682 आंकड़ों के साथ दूसरे स्थान है, जबकि देश में मरने वालों की संख्या 117,956 है।
सीएसएसई के आंकड़ों के अनुसार, कोविड-19 के अधिक मामलों वाले अन्य शीर्ष 15 देश ब्राजील (5,380,635), रूस (1,487,260), फ्रांस (1,084,659), अर्जेंटीना (1,081,336), स्पेन (1,046,132), कोलम्बिया (1,007,711), मेक्सिको (886,800), पेरू (883,116), ब्रिटेन (857,043), दक्षिण अफ्रीका (714,246), ईरान (562,705), इटली (504,509), चिली (500,542), इराक (449,153) और जर्मनी (427,808) हैं।
कोविड-19 से हुई मौतों के मामले में अमेरिका के बाद ब्राजील का स्थान है, जहां 156,903 मौतें दर्ज की गई हैं।
वहीं 10,000 से अधिक मौत दर्ज करने वाले देशों में मेक्सिको (88,743), ब्रिटेन (44,835), इटली (37,210), स्पेन (34,752), फ्रांस (34,536), पेरू (34,033), ईरान (32,320), कोलंबिया (30,000), अर्जेंटीना (28,613), रूस (25,647), दक्षिण अफ्रीका (18,944), चिली (13,892), इंडोनेशिया (13,205), इक्वाडोर (12,542), बेल्जियम (10,658), इराक (10,568) और जर्मनी (10,015) हैं।(आईएएनएस)
पटना, 25 अक्टूबर | बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर अब सभी राजनीतिक दल मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए पूरा जोर लगाए हुए हैं। इसी क्रम में शनिवार को चुनावी रैलियों में भाग लेने पहुंची केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने भी जहां विरोधियों पर निशाना साधा वहीं केंद्र सरकार द्वारा किए गए विकास कार्यो को भी गिनाया। ईरानी शनिवार को पटना और गोपालंगज में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए बोलीं, "जब कोई व्यक्ति लक्ष्मी के सामने सिर झुकाता है तो पाता है कि लक्ष्मी जब घर आती हैं, तब हाथ पकड़ कर नहीं आती हैं और लालटेन लेकर नहीं आती हैं। लक्ष्मी जब आती हैं तब कमल पर बैठकर आती हैं।"
उन्होंने राजद के अध्यक्ष लालू प्रसाद पर कटाक्ष करते हुए कहा, "बिहार के स्वाभिमानी नागरिक जब भगवान से याचना करते हैं कि या मां भगवती से आशीर्वाद मांगते हैं, तो कहते हैं कि मेरे बाजुओं में इतना बल दे कि मैं भी मेहनत से दो वक्त की इज्जत की रोटी कमा सकूं। बिहार का स्वभिमानी व्यक्ति कभी नहीं कहता है कि हे भगवान मुझे मौका दे कि मैं भी चारा घोटाले में पैसा कमा सकूं।"
ईरानी ने कहा कि आपने 15 साल विनाश करने वाली सरकार को देखा है और उसके बाद 15 साल से लगातार विकास कर रही सरकार को भी देख रहे हैं।
उन्होंने विकास की यह निरंतरता बनाए रखने के लिए राजग को मजबूत करने की अपील करते हुए कहा कि बिहार एलइडी युग में हैं, फिर से लालटेन युग को अपने यहां प्रवेश न करने दें।
केंद्रीय मंत्री ने महागठबंधन को आड़े हाथों लेते एक तरफ लालटेन पर निशाना साधा, तो वहीं दूसरी ओर राममंदिर के बहाने कांग्रेस को भी आड़े हाथों लिया।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में देश रोजाना विकास के नये-नये आयाम बना रहा है। प्रधानमंत्री ने गरीब महिलाओं के स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए, गैस सिलेंडर दिए वहीं आयुष्मान भारत योजना के तहत गरीबों को इलाज की सुविधा दी। (आईएएनएस)
काबुल, 25 अक्टूबर | अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में शनिवार एक शैक्षणिक केंद्र में हुए आत्मघाती हमले में कम से कम 11 लोगों की मौत हो गई और 20 अन्य घायल हो गए। स्थानीय पुलिस ने यह जानकारी दी। काबुल पुलिस के प्रवक्ता फिरदौर फरमर्ज ने यहां पत्रकारों से कहा, "विस्फोट स्थानीय समयनुसार 4.30 बजे कोवसर-ए-दानिश में एक निजी शैक्षणिक केद्र में हुआ। आत्मघाती हमलावार ने संस्थान के सुरक्षा गार्ड द्वारा पकड़े जाने के बाद खुद को उड़ा लिया।"
उन्होंने कहा, "शुरुआती जानकारी से पता चला है कि हमलावर समेत 11 लोगों की मौत हो गई है और 20 अन्य घायल हो गए हैं।"
प्रत्यक्षदर्शी मोहम्मद नबी ने समाचार एजेंसी सिन्हुआ से कहा, "हमने दशटी बराची क्षेत्र में पुल-ए-खुश्क में स्थित एक शैक्षणिक केंद्र के बाहर जोरदार विस्फोट की आवाज सुनी। विस्फोट से लोग डर गए।"
अभी तक किसी ने भी इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है।(आईएएनएस)
पणजी, 25 अक्टूबर | गोवा के एआईसीसी प्रभारी सचिव दिनेश गुंडू राव ने शनिवार को कहा केंद्र सरकार की प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और आयकर विभाग ने पिछले छह वर्षों में भाजपा नेताओं से जुड़े मामलों में शायद ही कभी छापेमारी की हो। राव ने पणजी में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान कहा, "भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की भावनाएं भड़क रही हैं, क्योंकि पार्टी या सरकारी कार्यक्रम अब कोई मायने नहीं रखते। अर्थव्यवस्था गिर गई है, हमारी सीमाओं को खतरा है, हमारी विदेश नीति ध्वस्त हो गई है और हम अपने पड़ोस में मित्रहीन हैं, महिलाओं और दलितों के लिए कोई सुरक्षा नहीं है।"
उन्होंने कहा, "धर्म और राष्ट्रवाद का उपयोग अब राजनीतिक छोर के लिए किया जा रहा है। पिछले छह वर्षों में, मुझे एक भाजपा नेता दिखाओ, जिसे ईडी या आईटी ने नोटिस जारी किया गया हो। इसलिए कई सरकारें अपंग हो गई हैं। क्या ईडी या आईटी विभाग को इसकी जानकारी नहीं है?"
उन्होंने कहा कि यह दर्शाता है कि गैर-भाजपा सरकारों के समय पर विधायकों को लुभाने के लिए बड़ी रकम का लेन-देन किया गया था।
दो दिवसीय यात्रा पर गोवा आए राव ने तटीय राज्य में विपक्षी पार्टी के मामलों के लिए नया कार्यभार संभालने के बाद यह भी कहा कि वह पार्टी के स्थानीय ब्लॉकों को मजबूत करने और संगठन के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करेंगे।
कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि पार्टी 2022 के राज्य विधानसभा चुनावों में सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ने पर विचार कर रही है।
उन्होंने खराब प्रशासन के लिए मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत की अगुवाई वाले सत्तारूढ़ दल की आलोचना भी की।
राव इससे पहले कर्नाटक के पूर्व अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं।
राव ने कहा, "यह सरकार विफल रही है। मुख्यमंत्री अपने अधिकार का प्रयोग करने में विफल रहे हैं। उनकी सरकार के मंत्रियों का केवल एक एजेंडा है, लूटो और खिसक जाओ।"(आईएएनएस)


