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ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्यों के समांतर, टेक्नोलजी की मदद से 2050 तक नेट जीरो एमीशन हासिल करने की बात चली है. भारत पर भी नेट जीरो टार्गेट का दबाव है. लेकिन उसने अभी हां नहीं की है.
डॉयचे वैले पर शिवप्रसाद जोशी की रिपोर्ट-
अभी तक दुनिया के 77 देश अपने यहां कानूनों या एक्शन प्लान के जरिये नेट जीरो टार्गेटों का ऐलान कर चुके हैं. भारत की सबसे बड़ी चिंता यह है कि नेट जीरो टार्गेट के चक्कर में उसके आर्थिक विकास की गति मंद पड़ जाएगी. उसे यह भी लगता है कि बड़े और संपन्न देश तो प्रौद्योगिकी की मदद से यह लक्ष्य हासिल कर लेंगे लेकिन गरीब और विकासशील देश एक बार फिर पीछे छूट जाएंगे. यह ठीक वैसा ही होगा जैसे बड़े देशों में 19वीं और 20वीं सदी के अपार औद्योगिक विकास के लंबे दौर के बाद 21वीं सदी में जाकर वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चिंताएं सामने आई हैं और बड़े देश ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी कटौती की दुहाई देने लगे हैं.
नेट जीरो पर नई अंगड़ाई लेता अमेरिका
अमेरिका में जलवायु परिवर्तन का सवाल पूर्व राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के कार्यकाल में हाशिये पर पड़ा था लेकिन मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडेन जलवायु मुद्दे पर मुखर रहे हैं और वैसे भी अमेरिका इस मुद्दे पर दुनिया की अगुवाई करने के लिए छटपटा रहा है. दूसरी बात अपनी प्रौद्योगिकी और उपकरणों के लिए बाजार भी चाहिए.
कुछ इन्हीं संदर्भों के साथ जलवायु परिवर्तन पर बाइडेन के विशेष दूत जॉन कैरी पिछले दिनों भारत दौरे पर थे. उन्होंने अक्षय ऊर्जा के महत्त्वाकांक्षी टार्गेट को हासिल करने की भारत की कोशिश में मदद के लिए हरित प्रौद्योगिकियां और वित्तीय मदद उपलब्ध कराने का भरोसा दिया. इस यात्रा का एक और मकसद थाः आगामी 22-23 अप्रैल को राष्ट्रपति जो बाइडेन ने जलवायु परिवर्तन पर विश्व नेताओं की वर्चुअल बैठक बुलाई है. भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इसमें न्यौता है. जलवायु परिवर्तन के मुद्दे और अमेरिकी चिंताओं को रेखांकित और पुनर्जीवित करते हुए यह बाइडेन का पहला और बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन है.
अमेरिका आगामी बैठक में 2050 तक नेट जीरो एमीशन के टार्गेट को पूरा करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर कर सकता है. ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देश पहले ही शताब्दी के मध्य तक नेट जीरो एमीशन को हासिल करने का वादा करते हुए अपने यहां कानूनों को अमल में ला चुके हैं. यूरोपीय संघ सम्मिलत रूप से इसी दिशा में प्रयासरत है. जबकि कनाडा, दक्षिण कोरिया, जापान और जर्मनी ने नेट जीरो भविष्य के प्रति अपने सकारात्मक इरादे जाहिर किए हैं. यहां तक कि चीन ने भी 2060 तक नेट जीरो का वादा कर दिया है. इन तमाम देशों में भारत ही अकेला है जो यूं तो अमेरिका और चीन के बाद ग्रीन हाउस गैसों का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक देश है, लेकिन नेट जीरो एमीशन के मामले में फिलहाल उसने अपने पत्ते नहीं खोले हैं.
नेट जीरो एमीशन हासिल करने का लक्ष्य है क्या
नेट जीरो का आशय कार्बन निरपेक्षता यानी कार्बन न्युट्रैलिटी से है. इसका मतलब यह नहीं है कि देश अपने उत्सर्जन का स्तर शून्य पर ले आएंगें, बल्कि नेट जीरो एक ऐसी अवस्था है जिसमें उत्सर्जनों की क्षतिपूर्ति के रूप में ग्रीन हाउस गैसों को तकनीक के माध्यम से जज्ब कर लिया जाता है और वायुमंडल से हटा दिया जाता है. जंगलों को विशाल कार्बन सिंक के तौर पर देखा जाता है. बड़े पैमाने पर जंगल तैयार हों तो वे भी ग्रीन हाउस गैसों को सोखने का काम करेंगे. वायुमंडल से गैसों को हटाने के लिए कार्बन कैप्चर और स्टोरेज जैसी भविष्नोमुखी और महंगी प्रौद्योगिकियों की जरूरत है.
माना जाता है कि पेरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में 2050 तक वैश्विक कार्बन निरपेक्षता मील का पत्थर साबित होगी. अगर इस लक्ष्य को पा सके, तो फिर उससे बड़ा लक्ष्य यानी पूर्व औद्योगिक समय के मुकाबले वैश्विक तापमान में दो डिग्री सेल्सियस से अधिक की बढ़ोत्तरी न होने देने के लक्ष्य को भी पाया जा सकता है.
भारत को लगता है कि एक बड़ा लक्ष्य पहले ही सामने है और अब यह छोटा लक्ष्य और डाल दिया गया है. विशेषज्ञों में भी इस मुद्दे को लेकर अलग अलग राय है. एक वर्ग कहता है कि उत्सर्जन में कटौती और वैश्विक तापमान में निर्धारित नियंत्रण के लक्ष्यों को लेकर भारत का प्रदर्शन अन्य देशों के मुकाबले बेहतर रहा है और अब इस नए लक्ष्य को उसकी आर्थिक गतिशीलता को अवरुद्ध करने के रूप में देखा जा रहा है.
दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को नेट जीरो वाले लक्ष्य को स्वीकार कर लेना चाहिए क्योंकि आखिरकार उसे ही इसका लाभ हासिल होगा और वे न सिर्फ अपने लक्ष्यों में बल्कि हरित प्रौद्योगिकी के लिहाज से भी स्वायत्त और लीडर बन सकेगा.
क्या बड़े देशों के लिए मुफीद है नेट जीरो
नेट जीरो वाले गणित में किसी देश के लिए उत्सर्जन कटौती के लक्ष्य नहीं रखे गए हैं. अब विकसित देशों के लिहाज से तो यह रास्ता राहत वाला है क्योंकि बोझ सिर्फ उनका नहीं है और इसमें सैद्धांतिक पहलू यह भी है कि कोई देश अपने मौजूदा एमीशन स्तरों के साथ या उन्हें बढ़ाकर भी कार्बन न्यूट्रल कहला सकता है, बशर्ते वह उन उत्सर्जनों को वायुमंडल से सोख भी ले या हटा दे.
विकसित देश जाहिर है अपने संसाधनों और प्रौद्योगिकी के दम पर इस काम में बाजी मार ले जाएंगें. भारत इसीलिए इस टार्गेट के प्रति उत्साहित नहीं है क्योंकि सबसे ज्यादा असर उसी पर पड़ेगा. माना जाता है कि अगले दो से तीन दशकों में तेज आर्थिक वृद्धि को लक्षित करते हुए भारत के उत्सर्जन पूरी दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ेंगे. अब इस बेतहाशा बढ़त में किसी तरह का वनीकरण या जंगल लगाने का अभियान बढ़े हुए उत्सर्जनों की भरपाई नहीं कर सकता. अभी कार्बन रिमूवल की तकनीकें बहुत विश्वसनीय नहीं हैं या बहुत महंगी बताई जाती हैं.
भारत की शिकायत यह भी है कि बड़े देश पेरिस समझौते के तहत न सिर्फ निर्धारित लक्ष्यों से बल्कि गरीब देशों की मदद के वादे से भी पीछे हटे हैं और 2050 की कार्बन न्युट्रैलिटी का भी यही हश्र होगा क्योंकि बड़े देश खुद हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे और विकासशील देशों को त्याग करने को कहते रहेंगे. इन्हीं तमाम आशंकाओं और संदेहों सवाल कायम है कि अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए जारी गतिविधियों से समझौता करते हुए भारत भी नेट जीरो वैगन में सवार होगा या किनारे रहना ही पसंद करेगा. (dw.com)
कोविड-19 से लड़ाई में यूरोप भारत के साथ साझेदारी बढ़ाना चाह रहा है. भारत वैक्सीन बनाने के लिए यूरोप से बौद्धिक संपदा के मोर्चे पर रियायत चाह रहा है.
यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष चार्ल्स मिशेल ने बुधवार 15 अप्रैल को एक वर्चुअल सम्मेलन के दौरान कोविड-19 से लड़ाई में भारत के साथ सहयोग का वादा किया. इस साल वर्चुअल रूप से हो रहे बहुराष्ट्रीय सम्मलेन रायसीना डॉयलोग में हिस्सा लेते हुए मिशेल ने कहा, "भारत और यूरोप दोनों टीकों के बड़े उत्पादक हैं. हम सभी जानते हैं कि टीकों के उत्पादन को बढ़ाना एक बहुत बड़ी चुनौती है. हम सबको एक दूसरे की जरूरत है: उदाहरण के तौर पर घटकों या कॉम्पोनेन्ट, उपकरणों और शीशियों के लिए."
भारत का क्या प्रस्ताव है?
भारत ने कोविड से जुड़े उत्पादों को हासिल करने के लिए बौद्धिक संपदा पर एक समझौते को कुछ समय के लिए रोक देने की मांग की है और इसमें उसने यूरोपीय संघ से समर्थन मांगा है. विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) ने कोविड संबंधित सामग्री के लाइसेंस देने की प्रक्रिया पर नियंत्रण रखने के लिए बौद्धिक संपदा के व्यापार से संबंधित आयामों समझौते (टीआरआईपीएस) को तैयार किया था.
वायरस की नई किस्मों के दुनिया भर में फैलने के बीच भारत और दक्षिण अफ्रीका ने इस समझौते से छूट मांगी है, लेकिन अमीर देशों ने इस प्रस्ताव को समर्थन नहीं दिया है. छूट की मांग करने वाले दोनों देशों का कहना है कि इससे विकासशील देशों में दवाएं बनाने वालों को जल्द असरदार टीके बनाने का मौका मिलेगा.
कोवैक्स पहल से 100 देशों को टीके उपलब्ध कराए गए हैं.
यूरोपीय संघ का वैक्सीन बराबरी पर क्या रुख है?
इस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले देश यह मानते हैं कि टीकों का बराबरी से वितरण बेहद आवश्यक है, लेकिन इस तरह की छूट से इस समस्या का समाधान मिलेगा या नहीं, इस पर सहमति नहीं बन पाई है. छूट देने के विरोधियों का कहना है कि वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि कम समय के लिए भी इससे समस्या हल नहीं होगी.
अभी तक यूरोप ने विश्व स्वास्थ्य संगठन समर्थित कोविड-19 वैक्सीन ग्लोबल एक्सेस (कोवैक्स) को समर्थन देने को वरीयता दी है और टीकों के पेटेंट अपने पास रखे हैं ताकि कंपनियां वैज्ञानिक शोध में निवेश करें. मिशेल ने कहा, "भारत और यूरोप दोनों टीकों के बड़े उत्पादक हैं.
कोवैक्स के जरिये दोनों कम आय और मध्यम आय वाले देशों को उनके टीकाकरण की कोशिशों में समर्थन दे रहे हैं. हम दोनों की मिली जुली कोशिशों की वजह से कोवैक्स ने पूरी दुनिया के 100 देशों में 3.8 करोड़ खुराकें पहुंचाई हैं."
[Militärmanöver Malabar 2018 Indien Australien USA Japan]
इंडो-पैसिफिक प्रांत की सुरक्षा में यूरोपीय संघ की रुचि है.
और किन क्षेत्रों में ईयू को भारत से सहयोग चाहिए?
मिशेल ने कहा कि ईयू और भारत के रहते यूरोप की भूराजनीतिक रणनीति के केंद्र में हैं. उन्होंने इंडो-पैसिफिक प्रांत की सुरक्षा में ईयू की रुचि भी व्यक्त की और कहा, "यह हमारे साझा हित में है कि हम दिखाएं कि लोकतांत्रिक और खुली व्यवस्था की दुनिया की चुनौतियों का मुकाबले करने के लिए सबसे शक्तिशाली व्यवस्था है."
संघ "ग्रीन ग्रोथ, सर्कुलर इकॉनमी और क्लीन एनर्जी" के जरिये जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए भारत के साथ एक संयुक्त प्रयास भी चाह रहा है. भारतीय अधिकारियों ने भी एक बयान जारी कर ईयू के साथ और ज्यादा व्यापार के अवसरों की अपील की. (dw.com)
फराह अहमद
एक वित्तीय कंपनी के लिए सरकार में लॉबिंग के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल करने के आरोपों से घिरे ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के खिलाफ संसदीय जांच नहीं होगी.
डॉयचे वैले पर स्वाति बक्शी की रिपोर्ट-
ग्रीनसिल कैपिटल नाम की एक कंपनी के हक में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए मंत्रियों और सरकारी अधिकारियों की लामबंदी के मामले में कैमरन फंस गए हैं. उनके खिलाफ लेबर पार्टी ने संसदीय जांच की योजना रखी लेकिन प्रधानमंत्री बॉरिस जॉनसन ने अपने सांसदों से इसके खिलाफ वोट करने को कहा और प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया गया.
बॉरिस जॉनसन ने एक सरकारी वकील नाइजल बोर्डमैन को इस मामले में स्वतंत्र पुनरावलोकन का जिम्मा दिया है. बोर्डमैन अपनी सरकारी भूमिका से अलग रहकर ग्रीनसिल मामले के वित्तीय पहलुओं और लॉबिंग की जांच पूरी करेंगे. लेबर पार्टी ने इसे सत्ताधारी कंजरवेर्टिव पार्टी के भ्रष्टाचार की लीपा-पोती करार दिया है. डेविड कैमरन ने रविवार को एक लंबा बयान जारी करके कहा कि उन्होंने कोई नियम नहीं तोड़ा है लेकिन इतना जरूर है कि उन्हें "सिर्फ औपचारिक तरीकों से संवाद करना चाहिए था ताकि भ्रामक प्रचार की कोई गुंजाइश ना रहे."
क्या है ग्रीनसिल कंपनी का मामला?
इस ताजा विवाद के केंद्र में है ग्रीनसिल कैपिटल और उसकी नींव रखने वाले लेक्स ग्रीनसिल जो उस वक्त डेविड कैमरन के सलाहकार थे, जब वे प्रधानमंत्री पद पर थे. इसके चलते ग्रीनसिल की तमाम सरकारी महकमों में पहुंच बनी जिसके चलते उनकी कंपनी को जबरदस्त आर्थिक फायदा हुआ. हालांकि इस साल मार्च में यह कंपनी ठप हो गई. संडे टाइम्स अखबार की खोजी रिपोर्ट के मुताबिक ग्रीनसिल उस दौर में बनी ऐसी नीतियों के मुख्य कर्ताधर्ता रहे हैं, जिनसे छोटी कंपनियों को तुरत-फुरत में सरकारी सहायता मुहैया कराई जा सके. उनकी अपनी कंपनी ग्रीनसिल कैपिटल भी लाभ पाने वाली ऐसी कंपनियों में शामिल है.
2016 में अपना पद छोड़ने के बाद डेविड कैमरन साल 2018 में ग्रीनसिल से जुड़ गए. आरोप है कि उन्होंने ब्रिटेन के चांसलर ऋषि सुनक को लिखित संदेश भेजे और कई आला अधिकारियों और मंत्रियों तक अपनी पहुंच का इस्तेमाल करते हुए ग्रीनसिल कैपिटल को कोविड कॉरपोरेट वित्तीय सुविधा के तहत तात्कालिक सरकारी मदद दिलवाई.
ऋषि सुनक के संदेशों को बाद में सार्वजनिक किया गया, तो पता चला कि अप्रैल 2019 में उन्होंने डेविड कैमरन को कहा था कि वे उन्हें वित्तीय सुविधा का पूरा लाभ देने के लिए अपनी विभागीय टीम पर दबाव बना रहे हैं. कैमरन ग्रीनसिल कैपिटल से सलाहकार के तौर पर जुड़े और उन्हें इससे लाखों पाउंड का फायदा होने की बात कही जा रही है. 2019 में कैमरन ने ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्री मैट हैनकॉक और ग्रीनसिल के बीच एक निजी बातचीत भी करवाई.
इसके अलावा यह बात भी सामने आई है कि 2018 में ग्रीनसिल ने सप्लाई चेन फाइनैंस सेवा के जरिये राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा यानी एनएचएस से जुड़ा एक कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने में भी सफलता पाई. सप्लाई चेन फाइनैंस सेवा देने वाली कंपनियां एक निश्चित फीस के बदले किसी कंपनी के बिलों का भुगतान तुरंत करने में सहायता करती है.
ग्रीनसिल की सरकारी मंत्रालयों में पैठ और अधिकारियों से संबंधों की परतें धीरे धीरे खुल रही हैं. सांठगांठ का यह संकट इस मंगलवार से और गहराता नजर आया जब यह बात सामने आई कि वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी बिल क्रॉदर्स ने अपना पद छोड़ने से पहले ही ग्रीनसिल कैपिटल के सलाहकार के तौर पर काम करना शुरु कर दिया. चौंकाने वाली बात यह भी है कि उन्हें यह भूमिका निभाने के लिए आधिकारिक सहमति मिली हुई थी.
लॉबिंग के मायने और सवाल
ब्रिटेन में लॉबिंग राजनैतिक प्रक्रिया का मान्य हिस्सा है और सांसदों की लामबंदी आम बात है. लॉबिंग का मतलब है किसी नीति या जनहित के मसले पर सरकारी रुख को प्रभावित करने के लिए लामबंदी. इसके लिए लिखित सामग्री, ईमेल या सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जा सकता है. हालांकि इसके लिए कायदे-कानून तय हैं ताकि सांसदों में भ्रष्ट आचरण और सरकारी महकमों में पहुंच का इस्तेमाल निजी फायदे के लिए ना किया जाए. ब्रिटिश संसद की वेबसाइट के मुताबिक कोई भी व्यक्ति अपने सांसदों और हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्यों को लामबंद कर सकता है. लॉबिंग करने वालों में व्यवसाय, चैरिटी, दबाव गुट, ट्रेड यूनियन और औद्योगिक प्रतिनिधि शामिल हैं.
वर्तमान नियमों के मुताबिक ब्रिटेन में मंत्री और अहम प्रशासनिक अधिकारी पद छोड़ने के बाद दो साल तक लॉबिंग की प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हो सकते. औपचारिक रूप से लॉबिंग करने वाले व्यक्तियों का नाम एक रजिस्टर में दर्ज किया जाता है. डेविड कैमरन ने 2016 में प्रधानमंत्री पद से विदा ली और ग्रीनसिल के साथ 2018 में जुड़े. वे एक स्वतंत्र लॉबिस्ट या किसी लॉबिंग कंपनी के लिए काम नहीं कर रहे थे, बल्कि ग्रीनसिल का हिस्सा थे. इसलिए रजिस्टर में नाम दर्ज करने की बात भी उन पर लागू नहीं हुई.
ग्रीनसिल कैपिटल मामले में लॉबिंग से जुड़े कई अनसुलझे सवाल तो हैं लेकिन मामला कहीं अधिक पेचीदा है. उदाहरण के तौर पर लेक्स ग्रीनसिल डेविड कैमरन की सरकार में इतने भीतर तक पहुंच बनाने में कामयाब कैसे होते चले गए. एक सवाल यह भी है कि सरकार को एनएचएस से जुड़े भुगतान के लिए सप्लाई चेन फिनैंस सेवा लेने की जरूरत क्यों पड़ गई. ऋषि सुनक के संदेश और भूमिका पर सवालिया निशान हैं, तो एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी का अपने पद पर रहते हुए एक निजी कंपनी में काम करना, आला सरकारी अधिकारियों और निजी हितों के बीच गहरी सांठ-गांठ की चिंताजनक स्थिति की ओर इशारा करता है.
उम्मीद जताई गई है कि नाइजल बोर्डमैन ग्रीनसिल मामले में हुए वित्तीय फैसलों और लॉबिंग की प्रक्रिया पर अपनी रिपोर्ट जून के अंत तक देंगे. हालांकि लॉबिंग सरकारी महकमों और पूंजीवादी फायदों के उलझे तारों को यह रिपोर्ट सुलझा देगी, ऐसी उम्मीद बेमानी है.(dw.com)
सूअरों को क्लासिकल स्वाइन फीवर से बचाने का टीका बनाने के लिए अब भारत में खरगोशों की बलि नहीं चढ़ेगी. नए टीके के बहुत जल्द बाजार में आने की उम्मीद है. इसे सेल कल्चर विधि से विकसित किया गया है.
नया टीका काफी सस्ता भी होगा. देश के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित क्लासिकल स्वाइन फीवर टीके के साथ-साथ भेड़ों में होने वाले चेचक के टीके के व्यावसायिक उत्पादन का अधिकार हाल ही में अहमदाबाद की एक कंपनी को मिला है. ये दोनों टीके भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के तहत आने वाले भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) के वैज्ञानिकों ने तैयार किए हैं.
आईसीएआर के उपमहानिदेशक डॉ. भूपेंद्र नाथ त्रिपाठी ने बताया, "देश में क्लासिकल स्वाइन फीवर के टीके की सालाना 1.8 करोड़ खुराक की जरूरत है, जिसकी पूर्ति के लिए पहले के टीके पर्याप्त नहीं थे और उसकी इम्यूनिटी भी कम थी, लेकिन नए टीके की इम्यूनिटी भी ज्यादा है और ये काफी सस्ते भी हैं. व्यावसायिक उत्पादन शुरू होने के बाद वर्तमान जरूरतों की पूर्ति के लिए पर्याप्त टीके तैयार होने में देर नहीं लगेगी क्योंकि महज चार फलास्क में वैक्सीन की सारी जरूरतें पूरी हो जाएंगी."
नया टीका किफायती भी है
डॉ. त्रिपाठी ने आईएएनएस को बताया, "पहले के टीके की कीमत जहां 20 से 25 रुपये पड़ती है, वहां नए टीके महज दो रुपये में आएंगे. खास बात यह है कि इसके लिए अब खरगोशों की बलि देने की जरूरत नहीं होगी और नए टीके का एक डोज ही काफी होगा क्योंकि इसकी इम्यूनिटी दो साल तक बनी रहती है." वैज्ञानिक बताते हैं कि नया टीका सुरक्षित, शक्तिशाली और 100 फीसदी सुरक्षा प्रदान करने वाला है और टीकाकरण के 24 महीनों तक पशु के शरीर में रोग-प्रतिरोधी क्षमता बनाए रखता है.
क्या है क्लासिकल स्वाइन फीवर?
सूअरों में होने वाली वायरल जनित बीमारी को क्लासिकल स्वाइन फीवर कहते हैं. इस रोग में सूअर को उच्च ज्वर होता है और त्वचा पर रक्त स्राव, कान, पेट व अन्य अंगों का रंग नीला पड़ जाता है और पक्षाघात से पीड़ित होने से पशु की मौत हो जाती है. इस बीमारी में मृत्यु दर 100 फीसदी है.
भारत में 1964 से इस बीमारी की रोकथाम के लिए ब्रिटेन की लैपिनाइज्ड सीएसएफ वैक्सीन का इस्तेमाल किया जा रहा है. इस टीके को बनाने के लिए खरगोशों को मारना पड़ता था. वैज्ञानिक बताते हैं कि एक खरगोश से इस टीके के 50 डोज तैयार किए जाते थे जो काफी महंगे होने के साथ-साथ अपर्याप्त भी थे. इस एक टीके की कीमत 20 से 25 रुपये पड़ती है.
देश में 90.6 लाख सूअरों को टीके लगाने के लिए 1.8 करोड़ टीके की सालाना जरूरत है. वैज्ञानिक बताते हैं कि सेल कल्चर से विकसित नये टीके से देश की जरूरतों की पूर्ति आसानी से हो जाएगी.
भेड़ों में चेचक का उपचार
शीपपॉक्स भेड़ों में होनेवाली संक्रामक वायरल बीमारी है जिसमें पशु के पूरे शरीर में फफोले पड़ जाते हैं और गांठ भी पड़ जाती है. इस बीमारी से मृत्यु दर 50 फीसदी है. विशेषज्ञ बताते हैं कि भेड़ों में होने वाली चेचक की इस बीमारी से देश में सालाना करीब 125 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान होता है और इस नुकसान से बचने का एकमात्र उपाय है भेड़ों का टीकाकरण. आईवीआरआई ने भेड़ के आईसोलेट (एसपीपीवी स्रिन 38/00स्ट्रेन) का उपयोग करके एक लाइव एटेनुएटेड शीपपॉक्स टीका तैयार किया है, जो परीक्षण में सुरक्षित और प्रभावी साबित हुआ है.
वैज्ञानिक बताते हैं कि इस टीके का एक डोज 48 महीने तक भेड़ की रक्षा करता है. इन दोनों टीकों का व्यवसायीकरण केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले कृषि अनुसंधान परिषद एवं शिक्षा विभाग (डेयर) के एग्रीइनोवट के माध्यम से किया गया है. क्लासिकल स्वाइन फीवर और शीप पॉक्स टीके के व्यावसायिक उत्पादन के लिए आईसीएआर-आईवीआरआई ने बीते सप्ताह अहमदाबाद की कंपनी हेस्टर बायोसाइंसेस के साथ दो समझौतों पर हस्ताक्षर किए.
(आईएएनएस)
-विवेक मिश्रा
वैक्सीन की बढ़ी मांग को पूरा करने के लिए भारतीय कंपनियों पर ऑर्डर का बोझ बढ़ा हुआ है
भारत अभी कोविड-19 संक्रमण के दूसरे लहर से जूझ रहा है और इसी बीच भारत के दवा उद्योग में वैक्सीन उत्पादन करने के ऑर्डर की बाढ़ आ गई है। घरेलू मांग भी बहुत ज्यादा है लेकिन, डॉन्स हॉप्किंस यूनिवर्सिटी के आंकड़ों के मुताबिक, भारत अब तक सिर्फ 0.9 प्रतिशत बालिग आबादी को ही वैक्सीन का दो डोज दे पाया है और अप्रैल के पहले हफ्ते तक 1.27 करोड़ लोगों को ही वैक्सीन का पहला डोज मिला है। ओडिशा से लेकर गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र तक देशभर में वैक्सीन की किल्लत की खबरें हैं।
भारत के दो उत्पादक अभी हर महीने 7 करोड़ डोज तैयार कर रहे हैं। हालांकि बिना किसी व्यवधान के टीकाकरण अभियान को पूरा करने के लिए भारत को हर महीने 9 करोड़ वैक्सीन की जरूरत है।
भारत के वैक्सीन उद्योग की इस समस्या का प्रभाव देश के भीतर और बाहर दोनों तरफ महसूस किया जा रहा है। 25 मार्च को जीएवीआई ने अधिसूचना जारी की कि मार्च और अप्रैल में कोविशील्ड की डिलेवरी में देरी होगी। हालांकि सरकार का कहना है कि उसने निर्यात पर किसी तरह की पाबंदी नहीं लगाई है। सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के चेयरमैन अदार पुनावाला ने दावा किया है कि वैक्सीन की किल्लत घरेलू मांग में इजाफे के कारण आई है। एक हालिया साक्षात्कार में उन्होंने सलाह दी कि वैक्सीन उत्पादन में तेजी लाने के लिए सरकार को कंपनी को 3000 करोड़ रुपए देने चाहिए।
कोवैक्सीन के उत्पादन का एक्सक्लूसिव राइट्स पाने वाली भारत की एकमात्र कंपनी भारत बायोटेक भी बढ़ी मांग को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रही है। ये चिंता का कारण है क्योंकि वैक्सीन के उत्पादन में तेजी लाना सबसे आसान है और इसकी वजह ये है कि इसे इंडिया काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने विकसित किया है, जो बायोमेडिकल शोध को बढ़ावा देने, सहयोग और नियमन करने वाला भारत का शीर्ष व अहम संस्थान है।
17 मार्च को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने वैक्सीन उत्पादन में तेजी लाने के लिए एक 6 सदस्यीय अंतर-सरकारी पैनल गठित किया। पैनल के सदस्य व आईसीएमआर के एपिडेमोलॉजी व कम्युनिकेबल डिजीज डिविजन के प्रमुख समीरन पांडा ने कहा, “अन्य सुझावों के साथ हमने वैक्सीन निर्माण के लिए भारत बायोटेक व सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को अधिक से अधिक साइट स्थापित करने या मौजदा सुविधाओं को अन्य उद्देश्य के लिए इस्तेमाल का सुझाव दिया है।”
भारत बायोटेक ने घोषणा की है कि वो कर्नाटक के मालुर और गुजरात के अंकलेश्वर में वैक्सीन का उत्पादन कर अपनी उत्पादन क्षमता में सात गुना इजाफा करेगा। अभी केवल कंपनी की हैदराबाद यूनिट में वैक्सीन तैयार हो रही है।
ज्यादा से ज्यादा वैक्सीन की मांग के लिए संघर्ष के बीच भारत में वैक्सीन तैयार करने वाले 7 संस्थान हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं । इन संस्थानों ने दशकों तक भारत के लिए वैक्सीन की उपलब्धता सुनिश्चित की है। इनमें हिमाचल प्रदेश की सेंट्रल रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीआरआई), तमिलनाडु की बीसीजी वैक्सीन लेबोरेटरी (बीसीजीवीएल), पेस्टयूर इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (पीआईआई) और एचएलएल बायोटेक, उत्तर प्रदेश की भारत इम्युनोलॉजिकल्स व बायोलॉजिकल्स कॉरपोरेशन लिमिटेड, महाराष्ट्र की हैफकिन बायो-फार्मास्यूटिकल्स कॉरपोरेशन लिमिटेड और तेलंगाना की ह्यूमन बायोलॉजिकल्स इंस्टीट्यूट शामिल हैं।
साल 2008 में केंद्र सरकार ने ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स 1945 के नियमों के अंतर्गत वैक्सीन निर्माण नहीं करने के चलते इनमें से तीन सार्वजनिक संस्थानों सीआरआई, बीसीजीवीएल और पीआईआई का उत्पादन लाइसेंस रद्द कर दिया था। आजादी से पहले स्थापित हुई इन सार्वजनिक इकाइयों को सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका और स्वास्थ्य को लेकर बनी संसदीय समिति की तरफ से दंडित करने के बाद दोबारा खोला गया। जुलाई 2019 में केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी चौबे ने कहा था कि देश के टीकाकरण कार्यक्रम के लिए इन इकाइयों में वैक्सीन निर्माण अलग-अलग चरणों में है। लेकिन उनकी तरफ से दिये गये आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं।
सीआरआई ने साल 2018-2019 में टिटनस टोक्स्वायड वैक्सीन का उत्पादन बंद कर दिया। पीआईआई के पास हर साल 6 करोड़ डीपीटी वैक्सीन, 5.5 करोड़ टिटनस टोक्स्वायड और 1.5 करोड़ डिफ्थेरिया वैक्सी का डोज तैयार करने की क्षमता है, लेकिन साल 2016 से इसने एक भी डोज तैयार नहीं किया है। इसी तरह बीसीजीवीएल के तमिलनाडु के गुंडाई में स्थित उत्पादन इकाई में साल 2016 से 2020 तक कोई वैक्सीन नहीं बनी है, जबकि इस इकाई के पास हर साल बीसीजी का 8 करोड़ डोज तैयार करने की क्षमता है। जुलाई 2020 में 4,50,000 डोज की पहली खेप तैयार की गई थी।
केंद्र सरकार ने सीआरआई को नया काम सौंपा है। जब भारत में स्पुटनिकV और एस्ट्राजेनेका वैक्सीन आई, तो क्लीनिकल ट्रायल से पहले सीआरआई द्वारा इसकी सुरक्षा जांच करवाई गई। सार्वजनिक क्षेत्र की ये इकाई सरकर को टीकाकरण के बाद पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को लेकर मूल्यांकन सेवाएं भी मुहैया कराती है।
कोवैक्सीन के निर्माण के लिए आईसीएमआर के निजी कंपनी के साथ साझेदारी पर जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं। जरूरी दवाओं की उपलब्धता पर काम करने वाले गैर-लाभकारी संगठन आल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क की मालिनी आईसोला कहती हैं, “भारत सरकार अनिवार्य लाइसेंसिंग के प्रावधानों के तहत बायोटेक से ये कह सकती है कि वो देश की सार्वजनिक इकाइयों व निजी कंपनियों को तकनीक हस्तांतरित करे।” थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क के केएम गोपाकुमार कहते हैं, “बहुत कम निवेश कर ये सार्वजनिक इकाइयां कोविड-19 वैक्सीन के उत्पादन की अपनी क्षमता बढ़ा सकती हैं। इसके लिए हमें राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।"
ऐसी भी नहीं है कि लोग सार्वजनिक उपक्रमों को भूल गये हैं। 17 मार्च को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुंबई में स्थित राज्य की सार्वजनिक इकाई हैफकिन इंस्टीट्यूट को कोवैक्सीन की तकनीकी हस्तांतरित करने को कहा। इसके लिए संस्थान को पैसे की जरूरत है और संस्थान ने हाल ही में लांच हुए मिशन कोविड सुरक्षा के तहत केंद्र सरकार से फंड मांगा है। केंद्र सरकार ने अभी तक इसके लिए हरी झंडी नहीं दी है।
तमिलनाडु के चेंगलपट्टु में देश का अत्याधुनिक इंटिग्रेटेड वैक्सीन कॉम्प्लेक्स भी है, जिसका उद्घाटन साल 2016 में हुआ था और तब से बेकार पड़ा हुआ है। सार्वजनिक क्षेत्र की तीन इकाइयों का उत्पादन लाइसेंस रद्द होने के बाद केंद्र सरकार ने साल 2008 में 49 हेक्टेयर का एक कॉम्प्लेक्स तैयार करने का विचार किया था। इस कॉम्प्लेक्स को सरकार के वैश्विक टीकाकरण कार्यक्रम के तहत सस्ती कीमत पर वैक्सीन का निर्माण, शोध और सप्लाई के लिए नोडल सेंटर के रूप में काम करना था। लेकिन, अब तक इसने एक भी वैक्सीन विकसित नहीं की है।
जनवरी 2020 में भारत बायोटेक ने कॉम्प्लैक्स को पुनर्जीवित करने के लिए 600 करोड़ रुपए देने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ सकी। इस साल 9 जनवरी को भारत में टीकाकरण अभियान शुरू होने से कुछ दिन पहले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्ष वर्धन ने उक्त प्लांट का दौरा कर सुविधाओं का जायजा लिया। कॉम्प्लेक्स को फिलहाल सार्वजनिक इकाई एचएलएल हाइफकेयर लिमिटेड की सहायक इकाई एचएलएल बायोटेक लिमिटेड संचालित कर रही है। 16 जनवरी को एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड ने वैक्सीन निर्माण में इस प्लांट का इस्तेमाल करने के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंट्रेस्ट जारी किया।
गैर-सरकारी संगठन तमिलनाडु हेल्थ डेवलपमेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष सीएस रेक्स सरगुनाम कहते हैं, “वैक्सीन तैयार करने के लिए कॉम्प्लेक्स में बुनियादी ढांचा, प्रशिक्षित तकनीशियन और वैज्ञानिक हैं। ये कोवैक्सीन के निर्माण में भागीदारी निभा सकते हैं।”
हालांकि भारत इकलौता देश नहीं है, जहां सार्वजनिक उपक्रमों को हाशिये पर धकेल दिया गया है। नीदरलैंड की ऐम्सटर्डम यूनिवर्सिटी में साइंस एंड बिहैवियरल साइंसेज फैकल्टी में प्रोफेसर एमिरेट्स स्टुर्ट ब्लुमे विस्तार से बताते हैं कि साल 1980 में नवउदारवादी विचारों और स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण का उभार हुआ। उन्होंने कहा, “साल 1980 में विशेषज्ञों ने पेटेंट और बौद्धिक सम्पदा अधिकार पर जोर दिया और दुनिया ने इसके साथ सुर में सुर मिलाया। फार्मा उद्योग भी यही चाहता था।”
अब कोविड-9 ने सार्वजनिक क्षेत्र को दूसरा मौका दिया है और देशों को ये अहसास होने लगा है कि संकट से उभरने में लाभ से प्रेरित निजी कंपनियां काफी नहीं हो सकती हैं। कनाडा में घरेलू स्तर पर वैक्सीन के निर्माण की कोशिशें चल रही हैं। कनाडा को ये एहसास तब हुआ, जब वैक्सीन के लिए लोगों की शिनाख्त करने के बाद पता चला कि देश के पास वैक्सीन निर्माण की क्षमता नहीं है।
इसी तरह क्यूबा पर्याप्त मात्रा में वैक्सीन का डोज प्री-बुक नहीं कर सका, तो उसने खुद की वैक्सीन विकसित करना शुरू कर दिया। अनुमान है कि अप्रैल के आखिर तक क्यूबा सोबेराना-02 वैक्सीन का 10 लाख डोज जारी कर सकता है। क्यूबा सोबेराना-01, माम्बिसा और अबदाला नाम से तीन और वैक्सीन विकसित कर रहा है। चीन और रूस ने भी सार्वजनिक सेक्टर के जरिए ही वैक्सीन विकसित किया है।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, टेक्नोलॉजी एंड डेवलपमेंट स्टडीज के काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च में शोधकर्ता वाई माधवी कहती हैं, “भारत में सार्वजनिक सेक्टर को उसकी पूरी क्षमता के साथ पुनर्जीवित करना चाहिए और सेक्टर के पास मौजूद विशेषज्ञता व दक्ष मानव संसाधन को मजबूत करने के लिए सहयोग देना चाहिए।
हालांकि, ये इतना आसान नहीं होगा क्योंकि समय के साथ सार्वजनिक उपक्रमों के चरित्र में बदलाव आ गया है। “हमारे पास जो संस्थान थे, उनकी आज के वातारण में पुनर्रचना नहीं की जा सकती है। दुनिया के लिए जो एक बेहतर उदाहरण हो, ऐसा नया उदाहरण अभी मौजूद नहीं है,” ब्लुमे कहते हैं। भारत में टीकाकरण का चरित्र भी बदल चुका है। वैश्विक टीकाकरण कार्यक्रम में भारत अब मिश्रित वैक्सीन को तरजीह दे रहा है और पुरानी सार्वजनिक इकाइयों के पास इसके लिए जरूरी बुनियादी ढांचा नहीं है। अधिकांश नई वैक्सीन का पेटेंट हो चुका है, इसलिए इन सार्वजनिक इकाइयों के लिए इनका निर्माण मुश्किल है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों से डाउन टू अर्थ ने सवाल पूछा कि क्या सरकार वैक्सीन के लिए सार्वजनिक सेक्टर पर विचार कर रही है, लेकिन अधिकारियों की तरफ से को जवाब नहीं आया। निजी कंपनियों से पूछा गया कि क्या वे सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के साथ साझेदरी पर विचार कर रहे हैं, लेकिन कंपनियों ने भी जवाब देने से इनकार कर दिया।
माधवी कहती हैं कि निजी क्षेत्र पर पूरी निर्भरता एक गलती है। ऐसे बहुत-से उदाहरण है, जहां निजी कंपनियां प्रदर्शन करने में विफल रही हैं। साल 2015 में वैक्सीन की कमी के कारण उत्तर प्रदेश में जापानी इंसेफेलाइटिस ने विकराल रूप ले लिया था। माधवी ने कहा, “वर्तमान में भारत सरकार की भारत और भारत के बाहर वैक्सीन की 80 प्रतिशत जरूरतें निजी कंपनियां पूरी करती हैं। इनकी कीमत सार्वजनिक सेक्टर के मुकाबले 250 गुना ज्यादा होती है, जिस कारण पांच सालों में भारत का टीकाकरण बजट सात गुना बढ़ गया है।”.
मौजूदा संकट ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में मौजूद एक बड़ी खामी को उजागर कर दिया है और वो है अच्छी नीतियों का घोर अभाव। मिसाल के तौर पर भारत के पास दो स्वास्थ्य दस्तावेज हैं, जो दिशानिर्देशन करते हैं, लेकिन दोनों के विचारों में विरोधाभास है। भारत की राष्ट्रीय टीका नीति-2011 निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों के बीच साझेदारी को प्रोत्साहित करती है जबकि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति-2017 स्वस्थ प्रतिस्पर्धा, एंटी सेरा व गुणवत्तापूर्ण वैक्सीन की निर्बाध सप्लाई के लिए सार्वजनिक सेक्टर की उत्पादन इकाइयों पर फोकस करती है।
माधवी कहती हैं, “जमीन पर केवल निजीकरण हो रहा है। ऐसी स्थिति में आगे का रास्ता ये हो सकता है कि निजी और सार्वजनिक सेक्टरों को प्रतिसपर्धा के लिए बराबर अवसर दिया जाए तथा 50 प्रतिशत वैक्सीन उत्पादन सार्वजनिक सेक्टर करे। राष्ट्रीय महत्व के सभी वैक्सीन को पब्लिक सेक्टर के लिए आरक्षित करना चाहिए।”
ये दूसरे तरीके से मदद करेगा। कोविड-19 वैक्सीन पर फोकस उन वैक्सीन के संसाधन को भी ले लेगा, जिनका इस्तेमाल वैश्विक टीकाकरण कार्यक्रम में होता है और इससे बच्चों का रूटीन टीकाकरण बेपटरी हो सकता है। चूंकि निजी कंपनियां महामारी से लड़ने में व्यस्त हैं, तो ऐसे में सार्वजनिक इकाइयां कम से कम इस कमी को रोक सकती है।
कोविड-19 की मौजूदा स्थिति से साफ पता चलता है कि फार्मा कंपनियों नहीं बल्कि सरकार को महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की जरूरत है। इसका समाधान तत्काल होना चाहिए। दुनिया इंतजार नहीं कर सकती है कि ऐसी की एक और महामारी आए और ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हो। (downtoearth.org.in)
-विवेक मिश्रा
हरिद्वार के कोरोना जांच और पॉजिटिव आंकड़ों को लेकर भी भ्रम बना हुआ है
उत्तराखंड के हरिद्वार में 14 अप्रैल को एक और शाही स्ननान संपन्न हुआ। मेला प्रशासन ने डाउन टू अर्थ को बताया कि 14 अप्रैल को कुल 135,1631 ने गंगा स्नान किया। पहले शाही स्नान की तरह ही सोशल डिस्टेसिंग और मास्क जैसे बुनियादी नियमों का उल्लंघन होता रहा। प्रशासन सिर्फ अखाड़ों के स्नान में व्यस्त रहा।
मेला अधिकारी दीपक रावत ने इस कुंभ स्नान को एक सफल आयोजन बताया। उन्होंने कहा कि कोरोना संक्रमण के इस दौर में भी शाही स्नान को शासन और प्रशासन ने बहुत अच्छी तरीके से संपन्न किया है।
कुंभ मेले में 12 अप्रैल, 2021 को 31 लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं ने गंगा स्नान किया था। कोरोना बचाव के स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) का पालन नहीं हो पाया था।
सिर्फ दो दिन के भीतर कुंभ के शाही स्नान में श्रद्धालुओं की संख्या में बड़ी गिरावट हुई। मेला अधिकारियों ने बताया कि दूसरे राज्यों में कोविड-19 मामलों के चलते प्रतिबंधों के कारण श्रद्धालुओं की संख्या मेला तक नहीं पहुंच पाई।
बहरहाल, पुलिस प्रशासन ने डाउन टू अर्थ को बताया कि 13 अप्रैल, 2021 को 3.5 लाख से अधिक श्रद्धालु मेला क्षेत्र में पहुंचे। यह 10 अप्रैल, 2021 के बाद से श्रद्धालुओं के पहुंचने की सर्वाधिक संख्या रही। इससे पहले 12 अप्रैल को दोपहर तक 1.5 लाख लोग पहुंचे थे। 11 अप्रैल को 95 हजार और 10 अप्रैल को संख्या 40 हजार तक थी।
हालांकि, 14 अप्रैल को प्रशासन के दावे के मुताबिक शाही स्नान में श्रद्धालुओं की संख्या में कमी के बावजूद हरिद्वार में कोरोना के मामलों का ग्राफ बढ़त की ओर ही है। चौंकाने वाली बात है कि अभी तक हरिद्वार में कोरोना मरीजों के मृत्यु का कोई आंकड़ा नहीं है।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी एसके झा के मुताबिक 0.6 फीसदी की दर से कोरोना संक्रमण फैल रहा है। उन्होंने बताया कि आरटी-पीसीआर टेस्ट संभव नहीं हो पा रहे हैं। जबकि एंटीजन टेस्ट जारी हैं।
हरिद्वार के कोरोना जांच और पॉजिटिव आंकड़ों को लेकर भी भ्रम बना हुआ है। दरअसल एंटीजन टेस्ट में पॉजिटिव संख्या बहुत कम है जबकि आरटीपीसीआर टेस्ट में पॉजिटिव लोगों की संख्या काफी ज्यादा मिल रही है।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी से डाउन टू अर्थ को मिले आंकड़ों के मुताबिक इस हफ्ते लगातार कोरोना के मामलों में बढ़ोत्तरी हुई है। जिसमें यह स्पष्ट देखा जा सकता है कि एंटीजन टेस्ट में पॉजिटिव केसों की संख्या काफी कम है जबकि बहुत कम आरटीपीसीआर टेस्ट में पॉजिटिव लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है।
बहरहाल स्टेशन पर काफी भीड़ है। बंगाल और महाराष्ट्र जैसी जगहों से आने वाले कई लोगों के पास टिकट नहीं है। सभी स्टेशन के पंडाल में रुके हैं। प्रशासन इन लोगों को यहां से जल्द से जल्द वापस भेजना चाहता है।
कुंभनगरी में बढ़ता कोरोना का बढ़ता ग्राफ :
10 अप्रैल, 2021 को कुल 30,638 जांच हुई कुल 205 कोरोना संक्रमित थे।
- इनमें एंटीजन टेस्ट 22610 में 54 संक्रमित मिले
- आरटीपीसीआर टेस्ट 8028 में 151 संक्रमित मिले
11 अप्रैल, 2021 को 55,430 जांच हुई, कुल 369 संक्रमित मिले
- 49929 एंटीजन जांचें हुई इनमें 98 कोरोना संक्रमित पाए गए।
- 5501 आरटीपीसीआर जांच हुई इनमें 271 कोरोना संक्रमित मिले।
12 अप्रैल, 2021 को 66203 जांच हुई और 387 पॉजिटिव मिले
- 61810 एंटीजन जांचे हुई इनमें 171 पॉजिटिव मिले।
- 4393 आरटीपीसीआर हुए इनमें 215 पॉजिटिव मिले।
13 अप्रैल, 2021 को 50638 कुल टेस्ट हुए इनमें कुल 496 पॉजिटिव मिले
- 45285 एंटीजन टेस्ट हुए इनमें 163 पॉजिटिव मिले।
- 5353 आरटी-पीसीआर टेस्ट हुए इसमें 333 पॉजिटिव मिले
- 14 अप्रैल, 2021 को शाम पांच बजे तक कुल 36243 जांचे हुईं हैं, इनमें एंटीजन से 154 संक्रमित मिले हैं। 2000 से अधिक आरटीपीसीआर जांचे हुई हैं। इनके परिणाम एक दिन बाद आएंगे। रात 12 बजे तक यह आंकड़े और अपडेट हो जाएंगे।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी एसके झा ने डाउन टू अर्थ को बताया कि हरिद्वार में कोरोना संक्रमण के फैलने की दर अभी 0.6 फीसदी है। यह सभी आंकड़ें कुंभ और हरिद्वार को मिलाकर तैयार किए गए हैं। यह 24 घंटे के आधार पर हैं जो कि रात 12 बजे से रात 12 बजे तक की स्थिति है। (downtoearth.org.in)
-दयानिधि
मॉडल दिखाता है कि संक्रमण के प्रकोप को रोका जा सकता है बशर्ते कम से कम 60 फीसदी आबादी इन दोनों उपायों का पालन एक साथ करती है तो।
दुनिया भर में कोविड-19 टीकाकरण चल रहा है लेकिन इस घातक वायरस के खिलाफ लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए, लंबे समय तक सामाजिक दूरी और मास्क से पीछा छुड़ाना काफी मुश्किल लग रहा है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि मास्क पहनने और सामाजिक दूरी बनाने से कोविड-19 वायरस को फैलने से रोका जा सकता है, लेकिन इन दोनों के एक साथ पालन करने से कितना प्रभाव पड़ेगा इसके बारे में ठीक-ठीक जानकारी नहीं है।
अब न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के कैओस और इटली के पोलिटेकनिको डी टोरिनो के शोधकर्ताओं ने कोविड-19 जैसे हवा से फैलने वाले रोगों के लिए इन दो उपायों के प्रभावों का अध्ययन करने के लिए एक नेटवर्क मॉडल बनाया है। यह मॉडल दिखाता है कि संक्रमण के प्रकोप को रोका जा सकता है बशर्ते कम से कम 60 फीसदी आबादी इन दोनों उपायों का पालन एक साथ करती है तो।
मॉरीजियो पोर्फिरी ने कहा कि जब तक कि पूरी आबादी एक ही बार में दोनों उपायों का पालन नहीं करती, तब तक न तो सामाजिक दूरी और न ही केवल मास्क पहनने से कोविड-19 रुकने वाला है। उन्होंने कहा संक्रमण को रोकने के लिए बड़े पैमाने पर टीकाकरण बहुत जरूरी है।
शोधकर्ताओं ने एक ऐसा नेटवर्क मॉडल बनाया है जो नोड्स या आंकड़े आधारित बिंदुओं और किनारों, या नोड्स के बीच कड़ी को जोड़ता है। इस तरह के मॉडल पक्षी के प्रवास का पता लगाने के लिए उपयोग किए जाते हैं। इस मॉडल में, एक अतिसंवेदनशील, संक्रमित, अलग किए गए, नए पाए गए या मर चुके लोगों के ढांचे के आधार पर, जहां हर नोड एक व्यक्ति को दर्शाता है, साथ ही यह उस व्यक्ति के स्वास्थ्य की स्थिति के बारे में बताता है। ये किनारों से जुड़े व्यक्तियों के जोड़े के बीच होने वाले संपर्कों का भी पता लगाता है।
मॉडल लोगों की गतिविधि में बदलाव की गणना करता है, जिसका अर्थ है कि कुछ अत्यधिक सक्रिय नोड नेटवर्क के अधिकांश लोगों से संपर्क के लिए जिम्मेदार हैं। यह धारणा इस बात का खुलासा करती है कि ज्यादातर लोगों की कुछ ही लोगों से प्रसपर बातचीत होती है और कुछ ही कई अन्य लोगों के साथ बातचीत करते हैं। अलग-अलग बदलाव के रूप में उपायों को स्थापित करके मास्क पहने हुए और इसके विपरीत सामाजिक दूरी वाले दृश्यों का परीक्षण किया गया था।
मॉडल में वाशिंगटन विश्वविद्यालय में इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन से प्राप्त सेलफोन के आधार पर लोगों के इधर-उधर जाने के आंकड़े और फेसबुक सर्वेक्षण आधारित आंकड़ों को शामिल किया गया। आंकड़ों से पता चला कि जो लोग मास्क पहनते हैं, वे भी ऐसे हैं जो अपनी इधर-उधर जाने की गतिविधि को कम करते हैं। इसके आधार पर, नोड्स को उन व्यक्तियों में विभाजित किया गया था जो नियमित रूप से मास्क और सामाजिक रूप से दूरी बनाए हुए हैं उनका व्यवहार प्रकोप या महामारी से काफी हद तक बदला नहीं है।
न्यूयॉर्क टाइम्स द्वारा मॉडल के असर को मापने के लिए एकत्र किए गए डेटा का उपयोग करते हुए, शोधकर्ताओं ने 14 जुलाई, 2020 के बीच सभी 50 राज्यों और कोलंबिया जिले में अधिकतम मामलों का विश्लेषण किया, जब रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्रों ने आधिकारिक तौर पर मास्क पहनने की सिफारिश की थी।
कैओस पत्रिका में प्रकाशित यह शोध मास्क पहनने और सामाजिक दूरी दोनों के असर को दिखाने के अलावा, मॉडल सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए उपायों के व्यापक पालन के महत्वपूर्ण जरूरतों पर प्रकाश डालता है। (downtoearth.org.in)
कोरोना वायरस महामारी को शुरू हुए एक साल से अधिक का समय हो चुका है और इस समय ब्राज़ील में मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ता ही जा रहा है.
ऐसे साक्ष्य हैं जो बताते हैं कि कोरोना वायरस संक्रमण से किशोरों और युवाओं की मौत कम ही होती है लेकिन ब्राज़ील में अब तक इस वायरस के कारण 1,300 बच्चों की मौत हो चुकी है.
एक डॉक्टर ने जेसिका रिकर्ते के कोरोना से संक्रमित एक साल के बेटे को यह कहते हुए देखने से मना कर दिया था कि उसके लक्षण इस वायरस के प्रोफ़ाइल से मिलते जुलते नहीं हैं. दो महीने बाद उस बच्चे की इस वायरस से मौत हो गई.
पेशे से शिक्षक जेसिका ने दो साल तक लगातार फ़र्टिलिटी का इलाज कराया था और उसमें नाकाम होती रही थीं लेकिन आख़िरकार वो गर्भवती हो गईं.
वो कहती हैं, "उसका नाम रोशनी से जुड़ा हुआ था. वो हमारी ज़िदंगी में एक प्रकाश की तरह था. उसने हमें वो ख़ुशी दिखाई जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी."
उन्होंने अपने बेटे लूकस में सबसे पहले भूख न लगने की समस्या को देखा क्योंकि वो पहले अच्छी तरह से खाना खाता था.
जेसिका को पहले लगा कि दांत निकलने की वजह से ऐसा है लेकिन लूकस की गॉडमदर जो उनकी नर्स हैं उन्होंने कहा कि उसके गले में ख़राश हो सकती है लेकिन उसके बाद लूकस को बुख़ार शुरू हो गया और सांस लेने में दिक़्क़त होने लगी.
कोविड टेस्ट ना कराने से बढ़ीं मुश्किलें
जेसिका उसको अस्पताल लेकर गईं और कोविड टेस्ट करने के लिए उन्होंने कहा.
जेसिका कहती हैं, "डॉक्टर ने ऑक्सिमीटर के ज़रिए ऑक्सीजन चेक किया तो उसका स्तर 86% था. अब मैं जानती हूं कि यह साधारण नहीं है."
लेकिन उसे तेज़ बुख़ार नहीं था तो डॉक्टर ने कहा, "चिंता करने की बात नहीं है और कोविड टेस्ट की ज़रूरत नहीं है. शायद यह गले में ख़राश की मामूली दिक़्क़त है."
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डॉक्टर ने जेसिका से कहा कि कोविड-19 बच्चों में बेहद दुर्लभ है और उसने कुछ एंटिबायोटिक्स दवाइयां देकर उन्हें घर भेज दिया. इन संदेहों के बावजूद लूकस का प्राइवेट जगह से टेस्ट कराया जा सकता था.
जेसिका कहती हैं कि 10 दिन के एंटिबायोटिक्स के कोर्स के अंतिम दिन तक उसके लक्षण कम होते चले गए लेकिन उसकी थकान बरक़रार रही जिसके कारण उन्हें कोरोना वायरस की चिंता होने लगी.
वो कहती हैं, "मैंने कई वीडियो उसकी गॉडमदर, अपने परिजनों, मेरी सास और कई लोगों को भेजे तो उनका कहना था कि मैं इसके बारे में बहुत ज़्यादा ही सोच रही हूं. उन्होंने मुझे न्यूज़ देखने से मना किया क्योंकि उनका मानना था कि यह मुझे भ्रम में डाल रहा है. लेकिन मैं जानती थी कि मेरा बेटा ख़ुद से सांस नहीं ले पा रह है."
यह मई 2020 की बात है जब कोरोना वायरस महामारी लगातार फैल रही थी और उत्तर-पूर्व ब्राज़ील के तंबोरिल के सिएरा शहर में दो लोगों की मौत हो चुकी थी.
"हर कोई एक दूसरे को जानता था और पूरा शहर सदमे में था."
जेसिका के पति इसराइल को चिंता थी कि दूसरे अस्पताल में जाने पर संक्रमण का ख़तरा बढ़ जाएगा और जेसिका और लूकस वायरस से संक्रमित हो जाएंगे.
लेकिन कई सप्ताह तक लूकस और अधिक सोने लगा तो आख़िरकार तीन जून को खाना खाने के बाद लूकस को लगातार उल्टियां होने लगीं.
जेसिका स्थानीय अस्पताल में गईं और उन्होंने उसका कोविड टेस्ट कराया.
लूकस की गॉडमदर जो वहां पर काम करती थीं उन्होंने बताया कि लूकस का कोविड टेस्ट पॉज़िटिव आया है.
अधिकतर बच्चों में MIS की स्थिति
जेसिका कहती हैं कि उस समय अस्पताल में रिसस्क्युरेटर (कृत्रिम तरीक़े से सांस देने वाली मशीन) तक नहीं था.
लूकस को सोबराल के पेडिएट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट में भेजा गया जो वहां से दो घंटे की दूरी पर था. वहां पर पता चला की लूकस को मल्टी-सिस्टम इनफ़्लेमेट्री सिंड्रोम (MIS) की शिकायत है.
यह ऐसी स्थिति होती है जिसमें वायरस के ख़िलाफ़ प्रतिरोधक क्षमता चरम पर होती है जिसके कारण महत्वपूर्ण अंगों में सूजन आ जाती है.
विशेषज्ञ कहते हैं कि यह स्थिति छह सप्ताह से अधिक आयु के बच्चों में कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बाद आ सकती है लेकिन यह बेहद दुर्लभ है.
लेकिन साओ पाउलो विश्वविद्यालय की महामारी रोग विशेषज्ञ डॉक्टर फ़ातिमा मारिन्हो का कहना है कि उन्होंने महामारी के दौरान अब तक MIS के सबसे अधिक मामले देखे हैं लेकिन यह सभी मौतों के लिए ज़िम्मेदार नहीं है.
लूकस को जब अस्पताल में भर्ती किया गया तो जेसिका को उसी कमरे में रहने की अनुमति नहीं थी. उन्होंने अपनी ननद को अपने पास बुला लिया.
वो कहती हैं, "हम मशीन की बीप की आवाज़ सुन सकते थे जब तक मशीन बंद नहीं होती है तब तक लगातार बीप की आवाज़ आती रहती है. हम जानते हैं कि कोई व्यक्ति कब मरता है. कुछ मिनटों के बाद मशीन बंद होकर फिर चलने लगी और हमारा रोना शुरू हो गया."
डॉक्टर का कहना था कि लूकस को दिल का दौरा पड़ा था लेकिन वे उसे बचाने में सफल हो गए थे.
बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर मेनुएला मोंते ने एक महीने तक लूकस का सोबराल के आईसीयू में इलाज किया. वो कहती हैं कि उन्हें आश्चर्य है कि लूकस की स्थिति बेहद चिंताजनक थी क्योंकि उसमें इस तरह के गंभीर लक्षण होने का कोई कारण नहीं था.
राज्य की राजधानी फोर्तालेज़ा के अलबर्ट सबिन चिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल में बाल रोग विशेषज्ञ लोहोना तावारेस का कहना है कि जो भी बच्चे कोविड से संक्रमित पाए गए उनमें डायबिटीज़, हृद्य संबंधी और मोटापे जैसी अन्य बीमारियां भी थीं.
लेकिन लूकस के साथ ऐसा बिलकुल नहीं था.
लूकस आईसीयू में 33 दिन तक रहा और जेसिका उसे सिर्फ़ 3 बार ही मिल पाईं. लूकस को उसके दिल के लिए इम्युनोग्लोबुलिन दवाई की ज़रूरत थी जो कि बेहद महंगी है लेकिन सौभाग्य से एक मरीज़ ने उस दवा की एक ख़ुराक को अस्पताल को दे दिया था.
लूकस बेहद बीमार था इसलिए उसे इम्युनोग्लोबुलिन की दूसरी ख़ुराक की ज़रूरत थी. उसके शरीर पर लाल निशान पड़ने लगे और उसे लगातार बुख़ार आने लगा. उसे सांस लेने के लिए सपोर्ट की ज़रूरत थी.
लूकस की जब तबीयत थोड़ी ठीक हुई और वो ख़ुद से सांस लेने लगा तो डॉक्टर ने ट्यूब हटा दी. उन्होंने जेसिका और इज़रायल को वीडियो कॉल किया ताकि होश में आने के बाद लूकस ख़ुद को अकेला न महसूस करे.
जेसिका कहती हैं, "उसने जब हमारी आवाज़ सुनी तो उसने रोना शुरू कर दिया."
यह आख़िरी बार था जब उन्होंने अपने बेटे को कोई प्रतिक्रिया देते हुए पाया था. अगले वीडियो कॉल में 'वो ऐसे था जैसे उसके शरीर में जान ही नहीं है.' अस्पताल ने एक सीटी स्कैन कराने के लिए कहा और पाया कि लूकस को स्ट्रोक हुआ है.
तब तक दोनों पति-पत्नी से कहा गया कि लूकस बेहतर तरीक़े से ठीक हो रहा है और उसे जल्द ही आईसीयू से निकालकर जनरल वॉर्ड में शिफ़्ट कर दिया जाएगा.
जेसिका ने बताया कि वो और इज़रायल जब उसे देखने के लिए पहुंचे तो डॉक्टर पहले की तरह आशावान थे.
उन्होंने कहा, "उस रात मैंने अपने सेल फ़ोन को साइलेंट कर दिया. मैंने सपने में देखा कि लूकस मेरे पास आया है और मेरी नाक को चूम रहा है. वह सपना प्यार, समर्पण की एक बड़ी भावना थी और मैं बहुत ख़ुशी-ख़ुशी सोकर उठी थी. मैंने जब अपना फ़ोन देखा तो पाया कि उसमें डॉक्टर की 10 मिस्ड कॉल थीं."
डॉक्टर ने जेसिका को कहा कि लूकस का हार्ट रेट और ऑक्सीजन लेवल बेहद तेज़ी से गिर रहा था और सुबह को उसकी मौत हो गई.
जेसिका लोगों को कर रही हैं जागरूक
वो मानती हैं कि लूकस का अगर कोविड टेस्ट उनके निवेदन करने के बाद मई की शुरुआत में ही हो चुका होता तो वो आज ज़िंदा होता.
वो कहती हैं, "यह ज़रूरी है कि अगर डॉक्टर यह मानते हैं कि यह कोविड नहीं है तो भी उन्हें इसकी पुष्टि के लिए टेस्ट करना चाहिए."
"एक बच्चा नहीं कह सकता है कि वो कैसा महसूस कर रहा है इसलिए हमें टेस्ट पर निर्भर रहना होता है."
इज़रायल और जेसिका
जेसिका का मानना है कि उचित उपचार में देरी के कारण उसकी स्थिति ख़राब हुई. "लूकस को कई दिक़्क़तें शुरू हो चुकी थीं. फेफड़े 70 फ़ीसदी तक काम कर रहे थे, दिल 40 फ़ीसदी तक फैल चुका था. यह ऐसे स्थिति थी जिससे बचा जा सकता था."
डॉक्टर मोंते कहती हैं कि MIS कभी नहीं रोका जा सकता है इसका उपचार तब सफल होता है जब इसका इलाज शुरुआती चरण में ही शुरू हो जाए.
जेसिका अब उन लोगों को लूकस की कहानी सुनाकर उनकी मदद करना चाहती हैं जो गंभीर लक्षणों को नज़रअंदाज़ कर जाते हैं.
"मैं उन लोगों के लिए यह कर रही हूं जो काश मेरे लिए यह कर पाते. अगर मेरे पास जानकारी होती तब मैं और सतर्क होती."
बच्चों पर कोविड का कम ख़तरा होता है?
डॉक्टर फ़ातिमा मारिन्हो कहती हैं कि यह एक ग़लतफ़हमी है कि बच्चों पर कोविड का कोई ख़तरा नहीं होता है. उनकी रिसर्च में पाया गया है कि इस वायरस से भारी संख्या में बच्चे और शिशु संक्रमित हुए हैं.
ब्राज़ील के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक़, फ़रवरी 2020 से लेकर 15 मार्च 2021 तक कोविड-19 के कारण नौ साल की आयु तक के कम से कम 852 बच्चों और एक साल की आयु तक के 518 बच्चों की मौत हुई है.
हालांकि, डॉक्टर मारिन्हो का अनुमान है कि यह संख्या दोगुनी हो सकती है. उनका मानना है कि कोविड टेस्टिंग कम होने की गंभीर समस्या के कारण भी नंबर कम हैं.
डॉक्टर मारिन्हो का आंकलन है कि महामारी के दौरान अनस्पेसिफ़ाइड अक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम से होने वाली मौतें पिछले साल की तुलना में 10 गुना अधिक हैं.
इन आंकड़ों को जोड़ते हुए वो बताती हैं कि वायरस ने 1,302 शिशुओं समेत 9 साल से कम आयु के 2,060 बच्चों की जान ली है.
आख़िर ऐसा क्यों हो रहा है?
विशेषज्ञों का मानना है कि ब्राज़ील में कोरोना के सबसे अधिक मामले बढ़ने की वजह यहां के शिशुओं और बच्चों के संक्रमित होने के कारण भी हो सकता है.
ब्राज़ीलियन सोसाइटी ऑफ़ पेडिएट्रिक्स के साइंटिफ़िक डिपार्टमेंट ऑफ़ इम्युनाइज़ेशन के अध्यक्ष रेनाटो कफ़ूरी कहते हैं, "हमारे यहां बिलकुल बहुत अधिक मामले आ रहे हैं और बहुत अधिक लोग अस्पताल में भर्ती हो रहे हैं और बच्चों समेत हर आयु के लोगों में अधिक मौतें हो रही हैं. अगर महामारी पर नियंत्रण किया जाता तो इन हालात को कम किया जा सकता था."
ब्राज़ील कोरोना संक्रमण के मामलों में अभी दुनिया में दूसरे नंबर पर है. देश में इसके कारण स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है. पूरे देश में ऑक्सीजन सप्लाई की कमी होती जा रही है, बुनियादी दवाओं की कमी है और देश के कई अस्पताल में आईसीयू बेड्स खाली नहीं हैं.
वहीं, ब्राज़ील के राष्ट्रपति ज़ायर बोलसोनारू ने लॉकडाउन का विरोध किया है और देश में P.1 नामक एक नए वैरिएंट का पता चला है जो कि अधिक संक्रामक समझा जा रहा है. महामारी की शुरुआत से किसी भी महीने की तुलना में पिछले महीने मरने वालों का आंकड़ा दोगुना रहा है.
टेस्टिंग की कमी के कारण बच्चों में इसके अधिक मामले पाए जाने की समस्या सामने आ रही है.
मारिन्हो कहती हैं कि बच्चों में कोविड के बारे में तब पता चल रहा है जब वे गंभीर रूप से बीमार हो जा रहे हैं. वो कहती हैं, "मामलों के पकड़ने की गंभीर समस्या का सामना हमें करना पड़ रहा है. आम जनता के लिए हमारे पास पर्याप्त टेस्ट नहीं हैं और बच्चों के लिए भी बहुत कम हैं. बीमारी के बारे में पता चलने में देरी हो रही है जिसके कारण बच्चों के इलाज में देरी हो रही है."
बच्चों में इस बीमारी के बारे में देर से पता चलने की वजह केवल कम टेस्टिंग ही नहीं है बल्कि कोविड-19 से संक्रमित बच्चों के लक्षण, विभिन्न आयु के युवा वर्ग के लक्षणों से अलग होते हैं जिसके कारण इसका पता लगाने में मुश्किल हो रही है.
वो कहती हैं, "आम कोविड के लक्षणों के मुकाबले बच्चों में डायरिया की अधिक दिक़्क़त है, इसमें उन्हें पेट दर्द और सीने में भी दर्द होता है. इसका पता चलने में देरी होती है तो बच्चा जब तक अस्पताल पहुंचता है तब तक उसकी हालत गंभीर हो चुकी होती है."
इसकी एक वजह ग़रीबी और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी भी है.
20 साल की आयु से कम के 5,857 कोविड-19 मरीज़ों को लेकर किए गए एक शोध से पता चलता है कि बच्चों में कोविड-19 की इतनी बुरी स्थिति के लिए अन्य बीमारियां और सामाजिक-आर्थिक दिक़्क़तें भी बड़ी वजहें हैं.
मारिन्हो इस पर सहमति जताते हुए कहती हैं, "अधिकतर मरीज़ काले बच्चे या फिर वे हैं जो ग़रीब परिवारों से आते हैं या जिनके पास मदद नहीं पहुंच पाती है. इन बच्चों पर भी मौत का अधिक ख़तरा है."
वो कहती हैं कि छोटे घरों में अधिक लोगों के रहने के कारण सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं हो पाता है और ग़रीब समुदायों में स्थानीय स्तर पर आईसीयू की व्यवस्था नहीं होती है.
इसके अलावा इन बच्चों में कुपोषण की भी समस्या होती है जिसके कारण इनकी प्रतिरोधक क्षमता बेहद बुरी होती है.
मारिन्हो कहती हैं, "कोविड के कारण करोड़ों लोगों को ग़रीबी का मुंह देखना पड़ा है. एक साल के अंदर 70 लाख से 2.1 करोड़ लोग ग़रीबी रेखा के नीचे जा सकते हैं. लोग भूखे हैं. ये सब मृत्यु दर पर असर डाल रहा है."
साओ पाउलो स्कूल ऑफ़ मेडिसिन के ब्रायन सूसा कहते हैं कि उनके शोध के अनुसार बच्चों के कुछ समूहों पर अधिक ख़तरा है इसलिए इन्हें कोविड का टीका पहले देना चाहिए. वर्तमान में 16 साल से कम आयु के बच्चों के लिए टीकाकरण की कोई व्यवस्था नहीं है.
कोरोना महामारी की शुरुआत से संक्रमण के डर के कारण आईसीयू में परिजन बच्चों से नहीं मिल सकते हैं.
अलबर्ट सबिन चिल्ड्रेंस हॉस्पिटल में आईसीयू में तैनात डॉक्टर सिनेरा कारनेइरो कहती हैं कि यह बहुत चुनौतीपूर्ण है क्योंकि परिजन ही बता सकते हैं कि उनके बच्चे कब कैसा महसूस करते हैं क्योंकि वे उनके दर्द या मनोवैज्ञानिक पीड़ा को समझ सकते हैं.
वो कहती हैं कि जब परिजन अपनी ग़ैर-मौजूदगी में अपने बच्चों की तबीयत के बारे में सुनते हैं तो वे परेशान हो जाते हैं क्योंकि वे उनके साथ वहां मौजूद रहना चाहते हैं.
डॉक्टर कारनेइरो कहती हैं, "बिना परिजनों की मौजूदगी में एक बच्चे की मौत बेहद पीड़ादायक है."
परिजनों और बच्चों के बीच बातचीत को सुधारने की कोशिश के तौर पर अलबर्ट सबिन हॉस्पिटल ने वीडियो कॉल के लिए फ़ोन और टैबलेट ख़रीदे हैं.
डॉक्टर कारनेइरो कहती हैं कि इसने बहुत मदद की है, "परिजनों और मरीज़ों के बीच में हम 100 से अधिक वीडियो कॉल कर चुके हैं. इस तरह की बातचीत तनाव कम करती है."
वैज्ञानिकों का तर्क है कि इस आयु वर्ग में मौत का ख़तरा अभी भी 'बेहद कम' है. वर्तमान आंकड़े बताते हैं कि ब्राज़ील में कोविड के कारण अब तक हुई 345,287 मौतों में से 0.58% उन लोगों की मौतें थीं जो 0-9 आयु वर्ग के बच्चे थे लेकिन यह संख्या भी 2,000 से अधिक बच्चों की है.
रॉयल कॉलेज ऑफ़ पेडिएट्रिक्स एंड चाइल्ड हेल्थ ने परिजनों को सलाह दी है कि वे आपातकालीन मदद तभी मांगें जब उनके बच्चों को यह दिक़्क़तें हों:
जब उसके शरीर पर लाल निशान दिखने लगे या छूने पर असामान्य रूप से उसका शरीर ठंडा महसूस हो.
सांस लेने में वो रुक रहा हो या अनियमित तरीक़े से सांस ले रहा हो या फिर सांस लेते वक़्त अजीब आवाज़ें निकाल रहा हो.
सांस लेने में दिक़्क़त हो या फिर उत्तेजित हो जाए या किसी बात पर प्रतिक्रिया न दे.
होंठ नीले पड़ जाएं, सुस्त हो या व्याकुल दिखे.
किशोर लड़कों के अंडाकोश में दर्द हो. (bbc.com)
कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम ने बुधवार को घोषणा की कि वो कोरोना के बढ़ते मामलों के मद्देनज़र कोई भी बड़ी रैली का आयोजन नहीं करेंगे.
उनका ये फ़ैसला पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बचे हुए चरणों के लिए है. उनका कहना है कि अब उनके नेता घर-घर जाकर प्रचार करेंगे और सोशल मीडिया का सहारा लेंगे.
इस पर अलग-अलग तरफ़ से कई तरह की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं. लेकिन मेडिकल जगत के लोग इसकी सराहना ज़रूर कर रहे हैं. कई लोग इसे ज़िम्मेदारी भरा फ़ैसला बता रहे हैं.
देश में पाँच राज्यों में चुनाव की घोषणा फ़रवरी के अंत में हुई थी. पश्चिम बंगाल को छोड़ कर बाक़ी के चार राज्यों (असम, तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी) में चुनाव ख़त्म हो चुके हैं. इस बीच अलग-अलग मीम्स और जोक्स से आपके फ़ोन भी पटे पड़े होंगे, जहाँ कहा जा रहा है कि कोरोना वायरस चुनाव से डरता है और इस वजह से चुनाव वाले राज्यों में नहीं जाता.
लेकिन आँकड़े क्या कहते हैं, एक नज़र उन पर भी.
विधानसभा चुनाव वाले राज्यों में कोरोना संक्रमण का हाल
पश्चिम बंगाल में अभी चार चरणों के चुनाव बचे हैं. भारत में कोरोना के नए मामले रोज़ अपना पिछला रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं. ऐसे में जनता सवाल पूछ रही है कि नाइट कर्फ़्यू और सारी पाबंदियाँ केवल जनता पर क्यों लागू की जा रही है. राजनीतिक रैलियों में इनका पालन क्यों नहीं हो रहा?
ऐसा में सवाल उठता है कि आख़िर कोविड प्रोटोकॉल का पालन इन चुनावों में हो, इसकी ज़िम्मेदारी किसकी है? आप में से कई लोग सोच रहे होंगे, नेताओं की. कई लोगों का जवाब हो सकता है लोगों की. कई का जवाब हो सकता है चुनाव आयोग का.
नैतिकता के आधार पर सबकी जवाबदेही ज़रूर है. लेकिन नियम अगर कुछ हैं, तो उसका पालन हो रहा है या नहीं, इसकी ज़िम्मेदारी चुनाव आयोग की होती है.
भारत के सभी राज्यों में विधानसभा चुनाव की ज़िम्मेदारी उन्हीं की है. कुछ राज्यों में पंचायत के चुनाव हो रहे हैं, उसमें उनकी भूमिका नहीं. चुनाव आयोग ने समय-समय पर राजनीतिक दलों को कोविड प्रोटोकॉल की याद ज़रूर दिलाई है. सबसे ताज़ा उदाहरण 9 अप्रैल 2021 की चिट्ठी है, जो उन्होंने तमाम राजनीतिक पार्टियों के अध्यक्षों को भेजी थी.
चुनाव का कोविड प्रोटोकॉल
चुनाव आयोग ने सबसे पहला कोविड प्रोटोकॉल अगस्त 2020 में बनाया था. इसकी शुरुआत बिहार विधान सभा चुनाव के दौरान हुई थी. बिहार, भारत का पहला राज्य था, जहाँ कोरोना महामारी के दौरान चुनाव कराया गया था. अलग-अलग उपचुनावों में भी इसी प्रोटोकॉल को लागू किया गया और इस साल हुए पाँच राज्यों के चुनाव में भी यही नियम लागू हैं.
आठ पन्ने का दस्तावेज़ चुनाव आयोग की वेबसाइट पर मौजूद है, जिनमें से कुछ नियम ये हैं.....
1. नामांकन दाख़िल करते वक़्त उम्मीदवार के साथ केवल दो व्यक्ति मौजूद होंगे. उम्मीदवार अपना नामांकन ऑनलाइन कर सकते हैं और वो चुनाव लड़ने के लिए लगने वाली ज़मानत राशि भी ऑनलाइन जमा कर सकते हैं.
2. रोड शो के दौरान कोई भी उम्मीदवार अधिकतम पाँच वाहनों का इस्तेमाल कर पाएँगे.
3. मतदान के दिन अगर किसी मतदाता में कोरोना वायरस के लक्षण पाए गए, तो उन्हें एक टोकन दिया जाएगा और उस टोकन के माध्यम से वे मतदान के अंतिम घंटे में अपना वोट डाल पाएँगे.
4. ईवीएम मशीन में मतदान करने से पहले मतदाताओं को दस्ताने दिए जाएँगे.
5. एक मतदान केंद्र पर अधिकतम एक हज़ार मतदाता वोट दे सकेंगे. पहले मतदाताओं की अधिकतम संख्या 1500 थी.
6. सभी मतदाताओं के लिए मास्क पहनना अनिवार्य होगा, जिसे पहचान ज़ाहिर करने के लिए थोड़ी देर के लिए उन्हें हटाना होगा.
7. कोरोना संक्रमित और क्वारंटीन में रह रहे मरीज़ों को स्वास्थ्य अधिकारियों की मौजूदगी में मतदान के अंतिम घंटे में वोट डालने की इजाज़त होगी. इस दौरान संक्रमण की रोकथाम के लिए तमाम उपाय किए जाएँगे.
8. महामारी की वजह से मतदान का समय एक घंटे बढ़ा दिया गया है. अब अति संवेदनशील क्षेत्रों को छोड़कर ज़्यादातर मतदान केंद्रों पर मतदान सुबह सात बजे से शाम छह बजे तक होगा. हालाँकि, दिशा निर्देशों में वर्चुअल रैली और डिजिटल कैंपेन को लेकर कुछ नहीं कहा गया है.
ऐसे में सवाल पूछा जाएगा कि चुनाव आयोग क्या कर सकता था? जवाब जानने के लिए बीबीसी ने दो पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त से बात की.
ओपी रावत, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त की राय
"मेरी समझ से कोई भी नेता कैम्पेन में चुनाव आयोग के कोविड-19 प्रोटोकॉल का उल्लंघन करते पाया जाए, तो नेताओं के प्रचार पर बैन कर देना चाहिए. इससे बाक़ी नेताओं और पब्लिक दोनों को एक संदेश जाएगा. लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है. पश्चिम बंगाल से रैलियों की जो तस्वीर सामने आ रही है, उसमें हम साफ़ देख रहे हैं कि स्टार कैम्पेनर बिना मास्क लगाए स्टेज पर हैं. उससे मैसेज ये जा रहा है कि जब उन पर कोई रोक नहीं, तो दूसरों पर क्या होगी. आपने देखा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी कोरोना पॉज़िटिव हो गए. वो भी कैम्पेन में गए थे. हालाँकि ये अभी नहीं पता कि उनको संक्रमण कहाँ से मिला. एक नेता पर एक्शन होने से पूरी जनता में मैसेज जाएगा कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं. चुनाव आयोग को यहीं करना चाहिए था, जो नहीं हुआ.
मुझे नहीं याद कि कोविड के दौरान चुनाव होने पर किसी नेता पर कोविड प्रोटोकॉल तोड़ने पर कोई बैन की ख़बर मीडिया में आई हो. असम में एक नॉमिनेशन के दौरान तो एक किलोमीटर लंबी लाइन टीवी पर दिखाई दे रही थी. कोविड प्रोटोकॉल का वो साफ़ उल्लंघन था. ये ज़िम्मेदारी निर्वाचन अधिकारी की होनी चाहिए कि वो नेताओं से प्रोटोकॉल का पालन करवाएँ. शुरुआत में ही एक्शन लिया होता, तो सब बढ़िया रहता.
कोविड प्रोटोकॉल जो चुनाव आयोग ने बनाए थे, वो अच्छे थे. तमाम पार्टियों की राय ली गई थी. ऐसा नहीं कि आयोग के पास ताक़त नहीं. सुप्रीम कोर्ट की एक रूलिंग है- एमएस गिल बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त 1977 का. सुप्रीम कोर्ट ने उस फ़ैसले में कहा है कि चुनाव के दौरान ऐसी कोई चुनौती मुख्य चुनाव आयुक्त के सामने आए, जिसके बारे में क़ानून में कोई प्रावधान ना हो, ऐसे में जो फ़ैसला मुख्य चुनाव आयुक्त लेंगे, वो ही क़ानून माना जाएगा. इससे बड़ी पावर क्या होगी. कोरोना के बारे में पहले से क़ानून में कुछ नहीं लिखा. ऐसे में सीईसी स्वतंत्र हैं.
लेकिन मैं नहीं मानता कि रैलियों पर पूरी तरह से रोक लगा देनी चाहिए या फिर चुनाव ही रोक देना चाहिए. मैच का रेफ़री मैच को ही रोक दे, ये सही नहीं है. जनता तक अपनी बात पहुँचाने का वर्चुअल माध्यम सबसे बेहतर नहीं हो सकता. सब डिजिटली एक्टिव नहीं होते. सीपीएम ने किया है, वो ठीक है. महामारी के दौर में विश्व के कई देशों में चुनाव हुए."
नसीम ज़ैदी, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त की राय
"चुनाव के दौरान आयोग द्वारा बनाए गए कोविड प्रोटोकॉल का पालन कराना आयोग, उनके तंत्र, और राज्य सरकार की संबंधित एजेंसियों के माध्यम से कराना उनकी एक महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी है. चुनाव आयोग का कोविड प्रोटोकॉल डॉक्यूमेंट कोई स्थायी तो है नहीं. समय के साथ वो बदला भी जा सकता है. उसकी समीक्षा बदलती परिस्थितियों के हिसाब से होनी चाहिए.
चुनाव आयोग द्वारा बनाए गए कोविड प्रोटोकॉल के अनुपालन में सहयोग करना हर राजनीतिक पार्टी की ज़िम्मेदारी है. कल तक वो नियम सही काम कर रहे थे, तो बहुत अच्छी बात है. लेकिन आज महामारी के बढ़ते हुए प्रकोप को देखते हुए अगर सही काम नहीं कर रहे हैं, तो सारे राजनीतिक दलों से बात कर इसे चुनाव के बीच में बदला भी जा सकता है या संशोधन भी किए जा सकते हैं.
अख़बारों में और दूसरे मीडिया में हम देख रहे हैं कि लोग कह रहे हैं कि इतनी संख्या में रोड शो क्यों हो रहे हैं? रोड शो की संख्या को सीमित किया जा सकता है या इस पर विचार किया जा सकता है कि उनकी ज़रूरत है भी या नहीं? दूसरा ये देखा गया है कि रैलियों में बिना मास्क के लोग आ रहे हैं. ऐसे में इस पर विचार किया जा सकता है कि भीड़ को सीमित किया जा सकता है या नहीं.
कोविड प्रोटोकॉल का उल्लंघन सभी राजनीति पार्टियों की चुनावी बैठकों में हो रहा है, जैसा अख़बारों और टीवी चैनलों पर हम देख पा रहे हैं. सीपीएम ने इस संबंध में जो पहल की है, वो सराहनीय है. चुनाव आयोग और उसके तंत्र के सामने एक अच्छा अवसर है, जब इस मुद्दे पर सभी पार्टियों की बैठक बुला कर चर्चा की जाए और कोविड प्रोटोकॉल के बारे में बदलाव के लिए समय रहते आवश्यक क़दम उठाए जाएँ.
मैं ऐसे सुझाव नहीं दे सकता कि पूरी तरह सब बंद हो जाए या पूरी तरह सब खुला रहे. दोनों के बीच एक संतुलन बनाए रखने की ज़रूरत है. उदाहरण के तौर पर कह सकते हैं, एक वक़्त था जब चुनाव में नॉमिनेशन के दौरान उम्मीवारों की गाड़ियां और उनके साथ भीड़ और रोड शो, सड़कों को जाम कर देते थे. आयोग ने इस पर सख़्ती की और अब ऐसे नज़ारे देखने को नहीं मिलते. ऐसे में मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए वर्तमान या फिर संशोधित कोविड नियमों का पालन क्यों नहीं कराया जा सकता.?"
क्या किया चुनाव आयोग ने?
बीबीसी ने चुनाव आयोग ने कोविड प्रोटोकॉल के नियमों का पालन सही से हो रहा है या नहीं, इस बारे में चुनाव आयोग का पक्ष जानने की कोशिश की. सूचना कार्यालय की तरफ़ से चुनाव आयोग का काम काज देख रही अधिकारी ने कहा कि जितनी सूचना वेबसाइट पर उपलब्ध है, वो इससे आगे और कुछ नहीं बता सकतीं.
चुनाव आयोग की वेबसाइट पर केवल प्रोटोकॉल की जानकारी ही हमें मिल पाई. पश्चिम बंगाल चुनाव का कामकाज देख रहे चुनाव आयोग के अधिकारी ने फ़ोन पर कहा कि ऐसे कोविड नियमों की अनदेखी और उन पर की गई कार्रवाई की जानकारी राज्यों के मुख्य चुनाव अधिकारी ही दे सकते हैं.
पश्चिम बंगाल और असम के मुख्य चुनाव अधिकारी से संपर्क साधने की कोशिश की गई, लेकिन उनका जवाब नहीं मिला. उनकी तरफ़ से कोई भी जवाब आते ही रिपोर्ट में जोड़ दिया जाएगा.
कोलकाता हाईकोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग से कोविड प्रोटोकॉल का पालन ना होने पर जवाब तलब भी किया है. 19 अप्रैल को इस मामले पर दोबारा सुनावई होनी है. 16 अप्रैल को इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक भी बुलाई गई है.
रायपुर, 15 अप्रैल। देशभर के स्कूली बच्चों के बीच भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा करवाए गए एक मुकाबले में छत्तीसगढ़ के स्कूली बच्चों को बड़ा शानदार सम्मान मिला है। भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सचिव आशुतोष शर्मा ने राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव डॉक्टर आलोक शुक्ला को एक चिट्ठी भेजकर बधाई दी है।
केंद्र सरकार ने 10 से 15 बरस के स्कूली बच्चों के बीच यह मुकाबला करवाया था जिसमें उनसे विज्ञान और सामाजिक विषयों पर मौलिक सुझाव मांगे गए थे। मानक नाम का यह मुकाबला छत्तीसगढ़ के बच्चों के बीच बड़ी प्रमुखता से बढ़ाया गया था। केंद्र सरकार की चिट्ठी में लिखा गया है कि छत्तीसगढ़ के स्कूली बच्चों में से 55500 ने इसमें हिस्सा लिया था जो कि देश में किसी भी राज्य से आने वाली प्रविष्टियों में तीसरे नंबर पर था. केंद्र सरकार ने इनमें से 3391 बच्चों को मानक अवार्ड के लिए छांटा है और राज्य सरकार को इसके लिए बधाई दी है.
रायपुर 15 अप्रैल। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पहल के बाद राज्य में रेमडेसिवीर इंजेक्शन की आपूर्ति निरंतर जारी हैं। खाद्य और औषधि प्रशासन तथा जिला प्रशासन के समन्वय से राज्य के विभिन्न जिलों और अस्पतालों में आवश्यकतानुसार इंजेक्शन की आपूर्ति की जा रही हैं। आज राज्य को मिले 8800 रेमडेसिवीर इंजेक्शन का अस्पतालों में वितरण किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निर्देश पर राज्य सरकार ने अखिल भारतीय सेवाओं के दो वरिष्ठ अधिकारियों प्रबंध संचालक छ. ग. राज्य सड़क विकास निगम और कृषि विभाग के संयुक्त सचिव भोसकर विलास संदीपन को दवाइयों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए मुंबई और छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक विकास निगम के प्रबंध संचालक अरूण प्रसाद को हैदराबाद में तैनात किया हैं। इससे निरंतर आपूर्ति में मदद मिल रही हैं।
खाद्य और औषधि प्रशासन विभाग के प्रभारी अधिकारी ने बताया कि आज सन फार्मा द्वारा 5400 , और हेटरो कंपनी द्वारा 3400 इंजेक्शन की आपूर्ति की हैं। आपूर्ति का यह क्रम बना रहेगा।
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 15 अप्रैल। राज्य में आज शाम 5.10 तक 11819 कोरोना पॉजिटिव मिले हैं। इनमें सर्वाधिक 2870 अकेले रायपुर जिले के हैं। केन्द्र सरकार के संगठन आईसीएमआर के इन आंकड़ों के मुताबिक आज शाम तक 21 जिलों में सौ-सौ से अधिक कोरोना पॉजिटिव मिले हैं।
आईसीएमआर के मुताबिक आज बालोद 181, बलौदाबाजार 456, बलरामपुर 89, बस्तर 133, बेमेतरा 185, बीजापुर 14, बिलासपुर 905, दंतेवाड़ा 36, धमतरी 331, दुर्ग 1403, गरियाबंद 564, जीपीएम 133, जांजगीर-चांपा 476, जशपुर 179, कबीरधाम 233, कांकेर 145, कोंडागांव 58, कोरबा 569, कोरिया 226, महासमुंद 261, मुंगेली 197, नारायणपुर 2, रायगढ़ 581, रायपुर 2870, राजनांदगांव 1018, सुकमा 17, सूरजपुर 350, और सरगुजा 207 कोरोना पॉजिटिव मिले हैं।
केन्द्र सरकार के संगठन आईसीएमआर के इन आंकड़ों में रात तक राज्य शासन के जारी किए जाने वाले आंकड़ों से कुछ फेरबदल हो सकता है क्योंकि ये आंकड़े कोरोना पॉजिटिव जांच के हैं, और राज्य शासन इनमें से कोई पुराने मरीज का रिपीट टेस्ट हो, तो उसे हटा देता है। लेकिन हर दिन यह देखने में आ रहा है कि राज्य शासन के आंकड़े रात तक खासे बढ़ते हैं, और इन आंकड़ों के आसपास पहुंच जाते हैं, कभी-कभी इनसे पीछे भी रह जाते हैं।
सीमावर्ती इलाकों में टेस्टिंग-जांच के लिए अभियान-सर्वदलीय बैठक में सीएम
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 15 अप्रैल। राज्यपाल सुश्री अनुसुईया उइके ने कहा कि कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए जनजागरण में राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने राजनीतिक दलों के प्रमुखों से आग्रह किया कि वे अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से गांव-गांव में इस बीमारी से बचाव के उपायों के बारे में लोगों को जागरूक करें। राज्यपाल गुरूवार को राज्य में कोरोना संक्रमण के प्रसार की रोकथाम के संबंध में विचार विमर्श के लिए आयोजित सर्वदलीय वर्चुअल बैठक को सम्बोधित कर रही थीं। बैठक में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और अन्य राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि भी उपस्थित थे।
राज्यपाल ने कहा कि राज्य में कोरोना संक्रमण के विस्तार को रोकने के लिए सीमावर्ती महाराष्ट्र राज्य से आए लोगों की जांच किया जाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि इसके लिए राज्य की सीमा पर प्रबंध किया जाना चाहिए और चरेंटाईन सेंटर बनाए जाने चाहिए। उन्होंने रेमडेसीविर इंजेक्शन के उचित उपयोग के बारे में लोगों को जागरूक करने की जरूरत बताई। राज्यपाल ने कहा कि अकेली राज्य सरकार के लिए कोरोना महामारी से निपटना काफी कठिन है। इस महामारी से निपटना हम सब का सामूहिक दायित्व और कर्तव्य है। हम सभी एकजुट होकर इस संकट से उबरने में सहयोग करें। उन्होंने कहा कि जरूरतमंद लोगों तक राहत और सुविधाएं पहुंचाने में राजनीतिक दल शासन-प्रशासन के साथ मिलकर काम करें। दलगत राजनीति से ऊपर उठकर संकट के इस समय में मानव जीवन को बचाने का प्रयास करें।
श्री बघेल ने कहा कि राज्य सरकार कोरोना संक्रमण की रफ्तार को रोकने के लिए हर संभव उपाय कर रही है। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि वे कोरोना के लक्षण दिखने पर लोगों को जल्द से जल्द टेस्ट कराने के लिए जागरूक करें। जब तक टेस्ट की रिपोर्ट नही आ जाती, तब तक संक्रमित व्यक्ति स्वयं को आइसोलेट रखें और रिपोर्ट आने के बाद इलाज प्रारंभ करें। उन्होंने लोगों को मास्क का उपयोग करने, फिजिकल डिस्टेंस और हाथों की साफ-सफाई का ध्यान रखने के संबंध में भी जागरूक करने की अपील की।
उन्होंने कहा कि शासकीय अस्पतालों में मरीजों का नि:शुल्क इलाज किया जा रहा है। डॉ. खूबचंद बघेल स्वास्थ्य सहायता योजना और आयुषमान योजना से इलाज कराने वाले लोगों पर कम से कम आर्थिक बोझ पड़े, इसके लिए टेस्ट और इलाज की दरें निर्धारित की गई हैं। प्रदेश में ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने यह निर्णय लिया है कि प्रदेश के ऑक्सीजन प्लांट में उत्पादित होने वाली 80 प्रतिशत ऑक्सीजन का उपयोग छत्तीसगढ़ में ही हो। उद्योगों को ऑक्सीजन उत्पादन के लिए चार लाईसेंस जारी किए गए हैं।
उन्होंने कहा कि कोरोना से बचाव के लिए टीकाकरण और टेस्टिंग में छत्तीसगढ़ राष्ट्रीय औसत से बेहतर स्थिति में है। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश की सीमावर्ती इलाकों में विशेष अभियान चलाकर टेस्टिंग और इलाज की व्यवस्था की जाएगी। उन्होंने बताया कि आरटीपीसीआर और ट्रू नॉट लैबो की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है। आरटीपीसीआर टेस्ट के लिए वर्तमान में 7 शासकीय और 5 निजी क्षेत्र में लैब हैं। इसी तरह 31 शासकीय ट्रू नॉट लैब और 5 लैब निजी क्षेत्र में हैं। शासकीय और निजी अस्पतालों में 815 वेन्टीलेटर उपलब्ध हैं। प्रदेश में बिस्तरों की संख्या, आईसीयू बेड, ऑक्सीजन युक्त बेड की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है।
मेडिकल स्टॉफ की भर्ती की जा रही है। साथ ही सभी जिलों को कोविड प्रबंधन के लिए लगातार राशि उपलब्ध कराई जा रही है। उन्होंने कहा कि रेमडेसीविर इंजेक्शन के लिए रायपुर के मेकाहारा में काउंटर शुरू किया जा रहा है। इस इंजेक्शन की सुचारू आपूर्ति के लिए महाराष्ट्र और हैदराबाद वरिष्ठ अधिकारियों को भेजा गया है। सभी जिलों में कंट्रोल रूम स्थापित किए गए हैं और इनके नम्बर जारी कर दिए गए हैं। प्रवासी मजदूरों के लिए ग्राम पंचायतों को क्वॉरंटाईन सेंटर स्थापित करने के निर्देश दे दिए गए हैं। कोरोना से बचाव और रोकथाम के उपायों की समीक्षा जिले के प्रभारी मंत्रियों और प्रभारी सचिवों द्वारा वर्चुअल मीटिंग लेकर की जा रही है। जरूरतमंदों को कोई परेशानी न हो, इसका भी ध्यान रखा जा रहा है।
बैठक में विभिन्न दलों के नेताओं ने महत्वपूर्ण सुझाव दिए। नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने विकासखण्ड स्तर पर हास्टल और सामाजिक भवनों में बेड की व्यवस्था करने, अन्य स्थानों पर भी शासकीय और निजी हास्टल में बेड की व्यवस्था करने का सुझाव दिया। भाजपा के शिवरतन शर्मा ने स्वास्थ्य विभाग के रिक्त पदों पर जल्द भर्ती करने, आयुषमान योजना में अन्य अस्पतालों को जोडऩे का सुझाव दिया। कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष मोहन मरकाम ने कहा कि उनके दल द्वारा हर जिले में कंट्रोल रूम स्थापित कर लोगों की सहायता की जा रही है। दल के विधायक, महापौर, पार्षद मुख्यमंत्री सहायता कोष में एक माह का वेतन देंगे। जरूरतमंदों को सूखा राशन और दवाईयां पहुंचाने का काम भी किया जा रहा है। बुजुर्गों को टीकाकरण स्थल तक पहुंचाने के लिए गाडिय़ों की व्यवस्था की गई है।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री राहत कोष में छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठानों द्वारा सीएसआर मद से दी गई राशि छत्तीसगढ़ को मिलनी चाहिए। नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के नीलकंठ त्रिपाठी ने ऑक्सीजन की कमी, निजी अस्पतालों द्वारा उपचार में अत्यधिक शुल्क लेने जैसी समस्याओं पर ध्यान आकृष्ट किया गया। जनता कांग्रेस के अमित जोगी ने 18 वर्ष से अधिक आयु के युवाओं के टीकाकरण, कोरोना मरीजों की टेस्टिंग और ट्रेकिंग के संबंध में सुझाव दिए। शिवसेना के धनंजय परिहार ने रेमडेसीविर इंजेक्शन के उपयोग के बारे में जागरूक करने की जरूरत पर बल दिया। सीपीआईएम के धनराज महापात्र ने चिकित्सा के क्षेत्र में ढांचागत सुविधाएं विकसित करने के लिए पीएम केयर फण्ड से विशेष राहत की मांग की। गोण्डवाना गणतंत्र पार्टी और समाजवादी पार्टी के प्रतिनिधि ने भी बैठक में सुझाव दिए।
बैठक में मुख्यमंत्री के सलाहकार विनोद वर्मा, मुख्य सचिव अमिताभ जैन, स्वास्थ्य विभाग की अपर मुख्य सचिव श्रीमती रेणु पिल्ले, मुख्यमंत्री के सचिव सिद्धार्थ कोमल परदेशी, सामान्य प्रशासन विभाग और जनसम्पर्क विभाग के सचिव डीडी सिंह, संचालक राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन डॉ. प्रियंका शुक्ला, संचालक स्वास्थ्य नीरज बंसोड़ उपस्थित थे।
भारत ने फिर कहा है कि धरती के बढ़ते तापमान को रोकने की उसकी कोशिशों का खर्च यूरोप, चीन और अमेरिका को उठाना पड़ेगा. भारत ने इन तीनों शक्तियों को पिछली सदी में जलवायु को बर्बाद करने के लिए जिम्मेदार ठहराया है.
भारत के पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बुधवार 15 अप्रैल को नई दिल्ली में एक सम्मेलन के दौरान कहा कि अमेरिका, चीन और यूरोप ने पिछली शताब्दी में जो भीषण प्रदूषण फैलाया है उसकी कीमत भारत नहीं चुकाएगा. भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं और दुनिया के सबसे बड़े कार्बन के उत्पादकों के रूप में जाना जाता है.
कोयले पर अपनी भारी निर्भरता के कारण भारत विश्व में कार्बन डाइऑक्साइड का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है, लेकिन उसने इस उत्सर्जन को कम करने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य अपने सामने रखे हैं. साथ ही भारत बार बार दूसरे बड़े देशों को उनकी जिम्मेदारियों का अहसास भी करा रहा है. कुछ ही दिनों पहले भारत आए अमेरिकी राष्ट्रपति के विशेष राजदूत जॉन केरी ने भी जलवायु परिवर्तन पर इशारों इशारों में भारत को और मेहनत करने को कहा था.
बुधवार को फ्रांस के विदेश मंत्री जां-ईव लु द्रिआं ने नई दिल्ली में एक बहस के दौरान बिना भारत का नाम लिए कहा कि दुनिया को कोयले से बिजली बनाना बंद करना पड़ेगा. हालांकि जावड़ेकर ने दोटूक कहा कि भारत "दूसरे देशों के दबाव में आकर" कोई कदम नहीं उठाएगा. भारत पहले भी शिकायत कर चुका है कि पर्यावरण पर आयोजित किए गए पिछले शिखर सम्मेलनों में जिस आर्थिक मदद का वादा भारत से किया गया था वो अभी तक दी नहीं गई है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विश्व के 40 नेताओं के साथ अप्रैल 22-23 को एक और जलवायु शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे. इस सम्मेलन का आयोजन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन कर रहे हैं. कुछ महीनों बाद नवंबर में स्कॉटलैंड के ग्लासगो में संयुक्त राष्ट्र का जलवायु सम्मेलन भी होना है.
नई दिल्ली में अमेरिका, यूरोप और चीन का हवाला देते हुए जावड़ेकर ने कहा, " उन्होंने उत्सर्जन किया जिसका नतीजा आज दुनिया भुगत रही है. भारत दूसरों के किए की सजा भुगत रहा है. हम यह किसी को भी भूलने नहीं देंगे." भारत में 70 प्रतिशत बिजली कोयले से ही बनती है और देश ने अक्षय ऊर्जा को बढ़ाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है.
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने फरवरी में कहा था कि भारत के कार्बन उत्सर्जन में 2040 तक 50 प्रतिशत वृद्धि आगे और यह इसी अवधि में यूरोप में उत्सर्जन में संभावित रूप से आने वाली गिरावट को बेकार कर देगा. आईईए के अनुसार भारत को अगले 20 सालों में "सस्टेनेबल मार्ग" पर लाने के लिए 1,400 अरब डॉलर की आवश्यकता होगी. भारत की मौजूदा नीतियां जितने खर्च की अनुमति देती हैं, यह उससे 70 प्रतिशत ज्यादा है.
सीके/आरपी (एएफपी)
बिहार के मौसम में हो रहे लगातार बदलाव के कारण इस वर्ष आम के फलों में लगने वाले रोगों से किसान परेशान हैं.
किसानों का कहना है कि वातावरण में नमी के अधिक समय तक रहने के कारण आम के मंजर पर मधुआ रोग का प्रकोप रहा है. इसके बाद जब टिकोला लगा तब रेड बैंडेट केटर किलर का प्रकोप दिखने लगा है, जिससे फल खराब हो रहे हैं.
भागलपुर के रहने वाले आम के किसान रामप्रवेश सिंह कहते हैं कि मधुआ के शिशु और वयस्क कीट आम की नई शाखाओं समेत मंजर और पत्तियों का रस चूस जा रहे हैं, जिस कारण मंजर सूख कर झड़ गए. कुछ पेडों में टिकोले लगे हैं. कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि मधुआ कीट द्वारा चिपचिपा मधु सरीखा पदार्थ छोड़ने के कारण मंजर पर फफूंद उग रहे हैं. यह पौधे की प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया की बाधा बन रहे हैं.
इधर, आम के किसान इस बार रेड बैंडेट केटर किलर से भी परेशान हैं. किसान सुरेश कुमार राय कहते हैं कि इस साल मंजर के समय मधुआ ओर अब रेड बैंडेट केटर किलर से किसान परेशान हैं. आम में टिकोले लग रहे हैं और नीचे की ओर से छेद हो जा रहा है और काली धारी बन जा रही है.
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के उद्यान कीट वैज्ञानिक डॉ. मुकेश सिंह आईएएनएस को बताते हैं कि इस बार बिहार में अधिकांश समय मौसम में बदलाव होता रहा, जिस कारण वातावरण में नमी की मात्रा अधिक समय तक रही.
उन्होंने कहा कि आम में मंजर लगने के समय नमी की मात्रा काफी अधिक थी जिस कारण मधुआ रोग का प्रकोप बढ़ा. उन्होंने बताया कि इस साल मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, समस्तीपुर सहित कई क्षेत्रों में रेड बैंडेट केटर किलर की भी समस्या उत्पन्न हो गई है. उन्होंने कहा कि पांच साल पहले तक यह समस्या बिहार में नहीं थी. पिछले वर्ष यह समस्या दरभंगा के कुछ इलाकों में देखी गई थी. उन्होंने बताया, "रेड बैंडेड केटर किलर (फली छेदक कीट) आम में छेद कर सुराख बना रहे हैं तथा गुठली के भीतर जाकर उसे सड़ा देते हैं, जिससे आम का फल काला पड़ने के साथ नष्ट हो जाता है. कीटों का प्रकोप संक्रामक रोग की तरह बढ़ रही है."
उन्होंने बताया कि यहां के किसानों की सबसे बड़ी समस्या है कि वे बागों में तभी जाते हैं जब फलों का समय आ जाता है. ऐसे में बागों की देखरेख नहीं हो पाती है. उनका कहना है कि रेड बैंडेट केटर किलर के टिकोलों को किसान तोडकर पानी में फेंक दे या आग में जला दें, जिससे आम के फलों को कुछ हद तक बचाया जा सकता है. फल तोड़ने के बाद ऑफ सीजन में तना एवं मोटी टहनियों के छेद में छुपे प्यूपा संग्रह कर नष्ट करें.
सिंह यह भी कहते हैं कि आम के किसानों को दवा के छिड़काव से बचना चाहिए. जब जरूरत पड़े तब ही दवा का छिड़काव किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि आमतौर पर यहां देखा जाता है कि आम के मंजर लगे नहीं दवा का छिड़काव किया जाता है.
मनोज पाठक (आईएएनएस)
पूर्वोत्तर राज्यों में सत्ता के लिए दल बदलने और विधायकों के खरीद-फरोख्त की परंपरा पुरानी रही है, लेकिन असम अबतक इससे अछूता रहा है. असम में चुनाव नतीजे आने से पहले ही त्रिशंकु विधानसभा की आशंका व्यक्त की जा रही है.
पूर्वोत्तर इलाके के कई राज्यों में थोक भाव से दल बदलने की वजह से रातों रात सरकार बदलती रही है. लेकिन पूर्वोत्तर का प्रवेशद्वार कहा जाने वाला इलाके का सबसे बड़ा राज्य असम अब तक खरीद-फरोख्त की राजनीति से अछूता था. लेकिन राज्य में इस बार एनआरसी और सीएए की छाया तले हुए विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ और विपक्षी गठबंधन के बीच कांटे की टक्कर मानी जा रही है. ऐसे में खरीद-फरोख्त का खतरा बढ़ गया है. बीजेपी के नेता हिमंत बिस्वा सरमा पहले ही कह चुके हैं कि हर विपक्षी पार्टी में उनके लोग चुनाव लड़ रहे हैं.
विधायकों को खोने की आशंका के मद्देनजर कांग्रेस गठबंधन के कई उम्मीदवारों को जयपुर के होटल में रखा गया है तो उसकी सहयोगी बोड़ो पीपुल्स फ्रंट ने अपने उम्मीदवारों को विदेश भेज दिया है. हालांकि बीजेपी ने कांग्रेस, एआईयूडीएफ और बीपीएफ उम्मीदवारों को राज्य से बाहर भेजने को नाटक करार दिया है. लेकिन कांग्रेस का कहना है कि बीजेपी दोबारा सत्ता हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है. इसलिए पहले से सावधानी बरतना बेहतर है.
असम विधान सभा के चुनाव
असम में तीन चरणों में 126 सीटों के लिए हुए विधानसभा चुनाव को बीजेपी की अगुवाई वाले सत्तारूढ़ गठबंधन और कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन के बीच कांटे की टक्कर माना जा रहा है. तमाम सर्वेक्षणों में भी यह बात सामने आई है. ऐसे में राज्य की राजनीति में पहली बार विपक्ष दलों को अपने विधायकों की खरीद-फरोख्त का डर सता रहा है. कांग्रेस और उसके सहयोगी बदरुद्दीन अजमल की आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) ने इसी खतरे को भांपते हुए पहले ही अपने कम से कम 20 उम्मीदवारों को कांग्रेस शासित राजस्थान की राजधानी जयपुर के एक रिसॉर्ट में भेज दिया है.
दूसरी ओर, हाल तक बीजेपी सरकार में शामिल रहा बोड़ो पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) अबकी विपक्षी गठबंधन में है. उसने तो एक कदम आगे बढ़ते हुए अपने 10 उम्मीदवारों को विदेश दौरे पर भेज दिया है. वर्ष 2016 में बीपीएफ ने बोड़ो-बहुल इलाकों की 12 सीटें जीती थी. लेकिन बोड़ो स्वायत्त परिषद के चुनावी नतीजों के बाद बीजेपी ने बीपीएफ से नाता तोड़ कर दूसरी पार्टी के साथ हाथ मिला लिया था. तीसरे चरण के मतदान से पहले बीपीएफ के तामुलपुर सीट के उम्मीदवार आरके बसुमतारी ने तो मैदान से हटने का फैसला करते हुए बीजेपी का दाम थाम लिया था. इस वजह से खरीद-फरोख्त का अंदेशा बढ़ा है.
चुनाव में एनआरसी और सीएए
असम में एनआरसी और सीएए ज्वलंत मुद्दे रहे हैं और विधानसभा चुनाव भी इससे अछूते नहीं रहे हैं. इसी खतरे को ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने अपने घोषणापत्र और चुनाव अभियान के दौरान राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) को दुरुस्त करने के अलावा असमिया अस्मिता, भाषा और संस्कृति की रक्षा पर सबसे ज्यादा जोर दिया था. लेकिन नागरिकता कानून के मुद्दे पर उसने आश्चर्यजनक रूप से चुप्पी साधे रखी. दरअसल उसे इस मुद्दे के बैकफायर करने का संदेह है.
ऊपरी असम में करीब 45 सीटों पर मूल असमिया लोगों यानी अहोम समुदाय का जबरदस्त असर है. नागरिकता कानून का सबसे ज्यादा विरोध उसी इलाके में हुआ था. अहोम समुदाय के लोगों को आशंका है कि सीएए के कारण बांग्लादेश से आने वाले बांग्लाभाषी लोगों को भी नागरिकता मिल जाएगी और इससे असमिया लोगों के वजूद, भाषा और संस्कृति पर खतरा पैदा हो जाएगा. यही वजह है कि भाजपा ने इस मुद्दे पर चर्चा ही नहीं की.
विपक्ष का जोर एनआरसी पर
दूसरी ओर, कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन ने सीएए और एनआरसी को ही प्रमुख मुद्दा बनाया था. इसके जरिए उसने ऊपरी असम के अहोम समुदाय के अलावा अल्पसंख्यकों को साधने का प्रयास किया था. राज्य के 27 में से नौ जिले अल्पसंख्यक बहुल हैं और कम से कम 49 सीटों पर इस तबके के वोट निर्णायक होते हैं. वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने इनमें से 22 सीटें जीती थीं. लेकिन तब कांग्रेस और एआईयूडीएफ के अलग-अलग चुनाव लड़ने की वजह से अल्पसंख्यक वोटों में विभाजन का फायदा उसे मिला था. इस बार यह दोनों साथ हैं. इसलिए पार्टी ने सीएए और इस पर सत्तारूढ़ पार्टी की चुप्पी को भुनाने का भरसक प्रयास किया है.
असम की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका अस्सी के दशक से ही अहम रही है. इस बार भी सीएए-विरोधी आंदोलन की कोख से उपजी दो नई पार्टियों, असम जातीय परिषद (एजेपी) और राइजोर दल (आरडी) ने हाथ मिलाया है. पहली बार चुनाव मैदान में उतरी इन पार्टियों के प्रदर्शन के बारे में कोई पूर्वानुमान लगाना संभव नहीं है. लेकिन इनका बेहतर प्रदर्शन भाजपा के लिए नुकसानदेह हो सकता है.
राजनीतिक बहस में आरोप-प्रत्यारोप
असम में बीजेपी को खड़ा करने वाले दो ही बड़े नेता हैं, एक मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल और दूसरे कांग्रेस से बीजेपी में आए हेमंत बिस्वा सरमा. असम में सरमा को बीजेपी का चाणक्य कहा जाता है. लंबे समय तक कांग्रेस में रहने की वजह से पार्टी के नेताओं पर उनका खासा असर है. यही वजह है कि कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला से असम के उम्मीदवारों को राजस्थान भेजने की वजह पूछी गई तो उनका कहना था कि इसका जवाब हेमंत बिस्व सरमा और सर्बानंद सोनोवाल ही दे सकते हैं. इससे साफ है कि बीजेपी के यह दोनों नेता नतीजों से पहले ही कांग्रेस को डरा रहे हैं.
विपक्षी गठजोड़ के करीब तीन दर्जन उम्मीदवारों को राज्य से बाहर भेजने के बाद अब कांग्रेस अपने बाकी उम्मीदवारों को भी किसी सुरक्षित जगह भेजने पर विचार कर रही है. क्या खरीद-फरोख्त के डर से विधायकों को बाहर भेजा गया है? बीपीएफ नेता और मंत्री प्रमिला रानी ब्रह्म कहती हैं, "मौजूदा हालात में हम इसकी संभावना से इंकार नहीं कर सकते.” कांग्रेस विधायक और सदन में विपक्ष के नेता देबब्रत सैकिया कहते हैं, "हमें सावधानी बरतनी होगी. हम अपने उम्मीदवारों को अलोकतांत्रिक गतिविधियों से बचाने का प्रयास कर रहे हैं.” कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा सदस्य प्रद्युत बोरदोलोई कहते हैं, "हमारे गठबंधन के सहयोगी बीजेपी की घटिया चालों से अपने उम्मीदवारों को बचाने के लिए जरूरी कदम उठा रहे हैं. हमने गोवा और मणिपुर समेत कई राज्यों में देखा है कि बीजेपी सत्ता हासिल करने के लिए किस तरह जनादेश के साथ खिलवाड़ कर सकती है.”
बीजेपी का विपक्ष के आरोपों से इंकार
उधर, बीजेपी का दावा है कि विपक्ष के तमाम आरोप निराधार हैं. पार्टी ने भरोसा जताया है कि वह अपने सहयोगी दलों के साथ बहुमत हासिल कर दोबारा सत्ता में लौटेगी. प्रदेश बीजेपी प्रवक्ता सुभाष दत्त कहते हैं, "विपक्षी दलों में जो डर है उससे साफ है कि उनको अपने उम्मीदवारों पर भरोसा नहीं है. हार तय जानकर वह लोग ऐसी हरकतें कर रहे हैं. हमें उनके उम्मीदवारों की जरूरत नहीं है.” बीजेपी विधायक शिलादित्य देब कहते हैं, "आजकल खरीद-फरोख्त का काम ऑनलाइन भी होता है. अगर कोई उम्मीदवार खुश नहीं है तो सात तालों में बंद रखने पर भी वह भाग जाएगा. बीपीएफ के एक उम्मीदवार ने तो ऐन मतदान के पहले ही उम्मीदवारी वापस ले ली थी. इसके लिए कौन जिम्मेदार था?”
गौहाटी विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर अखिल रंजन दत्त कहते हैं, "मौजूदा परिस्थिति में सत्ता हासिल करने के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त का अंदेशा जायज है. ज्यादातर राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों का पार्टी के आदर्शों या राजनीतिक निष्ठा से कोई लेना-देना नहीं होता. पार्टी नेतृत्व का भी उन पर कोई नियंत्रण नहीं रहता. यह प्रवृत्ति असम के लिए नुकसानदेह तो है ही, जनादेश का भी अपमान है.”
आगरा, 15 अप्रैल| भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) ने एक बयान जारी कर लोगों को गुरुवार से शुरू होने वाले पंचायत चुनावों में भाजपा के अलावा किसी भी उम्मीदवार को चुनने की बात कही है। बीकेयू के महासचिव द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है, "संयुक्त किसान मोर्चा (एकजुट किसान मोर्चा) केंद्र सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ लड़ रहा है। हम उन राज्यों में जा रहे हैं, जहां विधानसभा चुनाव होने हैं और लोगों से भाजपा को वोट न देने के लिए कह रहे हैं। उत्तर प्रदेश में आयोजित हो रहे पंचायत चुनावों के बारे में हम यह बताना चाहेंगे कि बीकेयू एक गैर-राजनीतिक संगठन है। हम न ही राजनीति में लिप्त हैं और न ही लोगों से किसी पार्टी विशेष को वोट देने के लिए कह रहे हैं। हम बस इतना ही चाहते हैं कि लोग भाजपा समर्थित उम्मीदवारों को छोड़कर किसी को भी वोट दें।"
बीकेयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत कहते हैं, "मेरी भी लोगों से यही अपील है कि वे भाजपा को वोट न दे। यह स्थानीय स्तर पर होने वाला चुनाव है और लोग किसी भी व्यक्ति को चुनने के लिए स्वतंत्र हैं।"
संयुक्ता किसान मोर्चा के एक वरिष्ठ नेता गुरनाम सिंह चादुनी ने कहा, "उत्तर प्रदेश में होने जा रहे पंचायत चुनावों पर चर्चा करने के लिए अभी तक कोई एजेंडा मोर्चा द्वारा प्राप्त नहीं हुआ है। हमारा रुख स्पष्ट है। चुनाव में भाजपा का विरोध किया जाएगा। उत्तर प्रदेश से किसान नेताओं द्वारा पश्चिम बंगाल में भाजपा के खिलाफ प्रचार किया जा रहा है। उन्हें ऐसा उप्र में भी करना चाहिए।" (आईएएनएस)
वॉशिंगटन, 15 अप्रैल| दुनियाभर में कोरोनावायरस के कुल मामलों की संख्या बढ़कर 13.80 करोड़ के पार पहुंच गई है, जबकि 29.7 लाख से अधिक लोग इस बीमारी से अपनी जान गंवा चुके हैं। जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी ने यह जानकारी दी है। यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सिस्टम्स साइंस एंड इंजीनियरिंग (सीएसएसई) ने गुरुवार सुबह अपने नवीनतम अपडेट में खुलासा किया है कि वर्तमान वैश्विक मामलों और मौतों का आंकड़ा क्रमश: 138,021,474 और 2,971,130 है। सीएसएसई के मुताबिक, दुनिया में सबसे अधिक 31,420,888 मामलों और564,396 मौतों के साथ अमेरिका सबसे ज्यादा प्रभावित देश बना हुआ है। वहीं, 13,873,825 मामलों के साथ भारत दूसरे स्थान पर है। सीएसएसई के आंकड़ों के मुताबिक, 20 लाख से अधिक मामलों वाले अन्य देश ब्राजील (13,673,507), फ्रांस (5,210,772), रूस (4,613,646), ब्रिटेन (4,393,330), तुर्की (4,025,557), इटली (3,809,193), स्पेन (3,387,022), जर्मनी (3,067,697), पोलैंड (2,621,116), कोलंबिया (2,604,157), अर्जेटीना (2,585,801), मेक्सिको (2,291,246) और ईरान (2,143,794) हैं।
कोरोना से हुई मौतों के मामले में 361,884 संख्या के साथ ब्राजील दूसरे स्थान पर है।
इस बीच 50,000 से अधिक मामलों वाले अन्य देश मेक्सिको (210,812), भारत (172,085), ब्रिटेन (127,407), इटली (115,557), रूस (102,275), फ्रांस (99,936), जर्मनी (79,234), स्पेन (76,756), कोलंबिया (66,819), ईरान (65,359) , पोलैंड (59,930), अर्जेंटीना (58,542), पेरू (55,812) और दक्षिण अफ्रीका (53,498) हैं। (आईएएनएस)
लखनऊ, 15 अप्रैल| उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने कोविड—19 के उपचार में इस्तेमाल होने वाले रेमिडिसविर इंजेक्शन की 25,000 शीशियां मंगाई हैं। बुधवार शाम को राज्य के एक विमान द्वारा अहमदाबाद से ये शीशियां मंगाई गईं।
सरकार के एक प्रवक्ता ने कहा कि रेमिडिसविर के अलावा अन्य आठ दवाइयों की उपलब्धता पर भी सरकार का ध्यान है, जिन्हें कोरोना मरीजों की इलाज के काम में लाया जाता है। इनमें इवरमेक्टिन, पेरासिटामोल, डॉक्सीसाइक्लिन, एजिथ्रोमाइसिन, विटामिन सी, जिंक टेबलेट्स, विटामिन बी कॉम्प्लेक्स और विटामिन डी3 शामिल हैं।
उन्होंने कहा, "स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि किसी भी जिले में इन दवाओं की कोई कमी न हो। इसके लिए मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य विभाग से सभी जिलों के साथ समन्वय बनाए रखने की बात भी कही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि उनके पास कितना स्टॉक है और कितने समय के अंदर इन्हें दोबारा मंगाए जाने की जरूरत होगी।"
वह आगे कहते हैं, "विभाग ने दवा निर्माण कंपनियों और दवाओं के वितरकों को इनकी निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कहा है ताकि ये बाजार में आसानी से उपलब्ध हो।" (आईएएनएस)
नई दिल्ली, 15 अप्रैल| पेट्रोल और डीजल के दाम में एक पखवाड़े के बाद फिर राहत मिली है। तेल विपणन कंपनियों ने गुरुवार को पेट्रोल और डीजल के दाम में कटौती की। पेट्रोल दिल्ली में 16 पैसे, जबकि कोलकाता, मुंबई और चेन्नई में 15 पैसे प्रति लीटर सस्ता हो गया है। वहीं, डीजल का भाव दिल्ली और कोलकाता में 14 पैसे, जबकि मुंबई में 15 पैसे और चेन्नई में 13 पैसे प्रति लीटर घट गया है। इंडियन ऑयल की वेबसाइट के अनुसार, दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई में पेट्रोल का भाव गुरुवार को घटकर क्रमश: 90.40 रुपये, 90.62 रुपये, 96.83 रुपये और 92.43 रुपये प्रति लीटर पर आ गया। डीजल की कीमतें भी दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई में घटकर क्रमश: 80.73 रुपये, 83.61 रुपये, 87.81 रुपये और 85.75 रुपये प्रति लीटर पर आ गई हैं।
इससे पहले लगातार 15 दिनों तक पेट्रोल और डीजल के दाम में स्थिरता बनी रही। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम में चार दिनों से जारी तेजी के बाद आगे पेट्रोल और डीजल के दाम में राहत मिलने के आसार कम है। बेंचमार्क कच्चा तेल ब्रेंट क्रूड का भाव नौ अप्रैल को अंतर्राष्ट्रीय वायदा बाजार इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज (आईसीई) 62.95 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ था, जो बढ़कर अब 66.69 डॉलर प्रति बैरल हो गया है। इन चार दिनों में कच्चे तेल के भाव में करीब चार डॉलर प्रति बैरल का इजाफा हुआ है।
अंतर्राष्ट्रीय वायदा बाजार इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज (आईसीई) पर ब्रेंट क्रूड के जून डिलीवरी अनुबंध में गुरुवार को बीते सत्र से 0.17 फीसदी की तेजी के साथ 66.69 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार चल रहा था। वहीं, न्यूयॉर्क मर्के टाइल एक्सचेंज (नायमैक्स) पर डब्ल्यूटीआई के मई डिलीवरी अनुबंध में बीते सत्र से 0.08 फीसदी की तेजी के साथ 63.20 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार चल रहा था। (आईएएनएस)
-ललित मौर्य
केवल 38 देशों में तंबाकू पर पर्याप्त कर लगाए गए हैं, जोकि वैश्विक आबादी के केवल 14 फीसदी हिस्से को कवर करते हैं
दुनिया भर में तंबाकू के इस्तेमाल से हर साल करीब 105,38,234 करोड़ रुपए (140,000 करोड़ डॉलर) का नुकसान हो रहा है| विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) द्वारा जारी नए तंबाकू टैक्स मैन्युअल से पता चला है कि यह नुकसान तम्बाकू के कारण स्वास्थ्य पर किए जा रहे खर्च और उत्पादकता में आ रही गिरावट के कारण हो रहा है|
डब्लूएचओ के अनुसार जब पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी से जूझ रही है, ऐसे में तंबाकू पर लगाए जा रहे कर और उनसे जुड़ी नीतियों में सुधार एक बेहतर कल के निर्माण में मदद कर सकते हैं| यह ऐसा समय है जब देशों को अपनी स्वास्थ प्रणाली मजबूत करने की जरुरत है, जिसके लिए अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता होगी|
डब्लूएचओ के स्वास्थ्य संवर्धन विभाग में राजकोषीय नीतियों के यूनिट प्रमुख जेरेमियास एन पॉल जूनियर के अनुसार, "हमने यह जो नया मैन्युअल जारी किया है, इसकी मदद से देशों में मजबूत कराधान सम्बन्धी नीतियों के निर्माण और क्रियान्वयन में मदद मिलेगी| यह मैन्युअल नीति निर्माताओं, वित्त अधिकारियों, कर अधिकारियों, सीमा शुल्क अधिकारियों और तंबाकू कर सम्बन्धी नीति निर्माण में शामिल अन्य लोगों को स्पष्ट, नवीनतम और व्यवहारिक मार्गदर्शन प्रदान करेगा|
उनके अनुसार “हमें उम्मीद है कि यह दस्तावेज, तंबाकू कराधान बढ़ाने के महत्वपूर्ण लाभों पर प्रकाश डालता है। इसमें उपलब्ध आंकड़े और जानकारियां दुनिया भर के नीति निर्माताओं को फिर से सोचने के लिए मजबूर कर देंगी।“ मैन्युअल में दी जानकारी पर अमल, न केवल पैसे की बचत करेगा साथ ही इससे लाखों लोगों की जिंदगियां बचाने में भी मदद मिलेगी|
केवल 38 देशों में तंबाकू पर लगाए गए थे पर्याप्त कर
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार तंबाकू हर साल औसतन 80 लाख लोगों की जान लेती है| उनमें से 70 लाख मौतें तो प्रत्यक्ष रूप से तंबाकू के उपयोग का परिणाम हैं, जबकि 12 लाख लोग ऐसे होते हैं जो इसका सेवन नहीं करते, बस वो धूम्रपान के समय उससे उत्पन्न होने वाले धुएं के संपर्क में आते हैं।
दुनिया भर में तम्बाकू का उपयोग और सेवन करने वाले 130 करोड़ लोगों में से 80 फीसदी निम्न और मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं। यदि 2018 में जारी आंकड़ों को देखें तो केवल 38 देशों में तम्बाकू पर पर्याप्त कर लगाए गए थे, जोकि वैश्विक आबादी के केवल 14 फीसदी हिस्से को कवर करते हैं| जिसका मतलब है कि उन देशों में स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले उत्पादों पर उनकी कीमत का करीब 75 फीसदी हिस्सा कर के रूप में था|
इन करों और इनसे जुड़ी नीतियों की मदद से न केवल देश को लाभ पहुंचेगा| साथ ही इन उत्पादों के उपयोग में भी कमी आएगी, जिससे लोगों का भी जीवन बचेगा| इससे संसाधनों को जुटाने में मदद मिलेगी, स्वास्थ्य सम्बन्धी असमानताएं दूर होंगी, स्वास्थ्य प्रणाली पर बढ़ते बोझ और लागतों को कम करने में मदद मिलेगी और सतत विकास के लक्ष्यों को भी हासिल करना संभव हो सकेगा| (downtoearth.org.in)
-विभा वार्ष्णेय
दुनियाभर में कोविड वैक्सीन की कमी देखी जा रही है। इस चुनौती से तभी निबटा जा सकता है जब औद्योगिक घराने एक साथ आ आएंगे
अमरीका के जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के मुताबिक, 12 अप्रैल तक दुनियाभर में 77.7 करोड़ कोविड-19 इंजेक्शन लगाये गये हैं। यानी कि दुनिया की बालिग आबादी के 2 प्रतिशत से कुछ अधिक हिस्से का पूरी तरह से टीकाकरण सुनिश्चित हो चुका है।
एयरफिनिटी नाम की एक विश्लेषण कंपनी के मुताबिक, साल 2021 के अंत तक दुनियाभर में कोविड-19 टीके के 950 करोड़ डोज का उत्पादन होगा, लेकिन पूरी बालिग आबादी के टीकाकरण के लिए जल्द से जल्द 140 करोड़ टीके की जरूरत है। ये आंकड़ा, वैक्सीन एलायंस गेवी के अनुसार, कोविड-19 संकट से पहले दूसरी बीमारियों के लिए दुनियाभर में जितने वैक्सीन का निर्माण हो रहा था, उसका तीन गुना है।
हालांकि, जब तक वैक्सीन बनाने वाली कंपनियां उत्पादन बढ़ाने के उपाय ढूंढेंगी, तब तक वैक्सीन का अधिकतम फायदा नहीं लिया जा सकेगा। मौजूदा हालात से चिंतित दवा निर्माता कंपनियों ने वैक्सीन उत्पादन व इसके वितरण में आ रही दिक्कतों का समाधान करने के लिए 8 और 9 मार्च को यूके के लंदन में आयोजित ग्लोबल कोविड-19 वैक्सीन सप्लाई चेन एंड मैन्युफैक्चरिंग सम्मेलन में मुलाकात की।
इन सम्मेलन में शिरकत करने वाले नॉर्वे के ओसलो के एक गैर सरकारी संगठन कोलिशन फॉर एपिडेमिक प्रीपर्डनेस एन्नोवेशंस (सीईपीआई) के मुख्य कार्यकारी रिचर्ड हैटचेट ने कहा, “इस महामारी को खत्म करने के लिए हमें वैक्सीन की किल्लत और इससे वैक्सीन की सप्लाई में आने वाली सुस्ती रोकने को आपातकालीन स्थिति में एकसाथ काम करना होगा।”
लेकिन, दवा निर्माता कंपनियां एकसाथ काम नहीं किया करती हैं और इस महामारी ने इसे जगजाहिर कर दिया है। इस बीच, उत्पादन बढ़ाने और सुचारू सप्लाई के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने दवा निर्माता कंपनियों के लिए कुछ स्पष्ट अनुशंसाएं की हैं।
इनमें से सबसे पहला उपाय है पैटेंट और बौधिक सम्पदा अधिकार (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स यानी आईपीआरएस) को खत्म करना, ताकि वे देश जिनके पास वैक्सीन उत्पादन की क्षमता है, वे तुरंत वैक्सीन का निर्माण शुरू कर सकें। हालांकि पिछले साल अक्टूबर में भारत और दक्षिण अफ्रीका ने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) को इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स निलंबित करने का प्रस्ताव दिया था, तो एक भी विकसित देश ने इसका समर्थन नहीं किया।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक अन्य अनुशंसा में वैक्सीन उत्पादन में तेजी लाने के लिए दवा निर्माता कंपनियों के बीच ज्यादा से ज्यादा साझेदारी और द्विपक्षीय तकनीक हस्तांतरण शामिल है। अलबत्ता, निजी कंपनियां साझेदारी तो कर रही हैं, लेकिन ये सिर्फ ज्यादा से ज्यादा फायदा कमाने के लिए हो रहा है। उदाहरण के लिए एस्ट्राजेनेका ने 15 देशों की 26 कंपनियों के साथ साझेदारी की है। लेकिन इस साझेदारी में बहुत पारदर्शिता नहीं है और जिन कंपनियों के साथ साझेदारी हुई है, उनमें से अधिकांश कंपनियां विकसित देशों की हैं।
पिछले साल मई 2020 में वैक्सीन पर काम चल रहा था, तभी विश्व स्वास्थ्य संगठन को इसका एहसास हो गया था। उस वक्त डब्ल्यूएचओ ने न्यूनतम आय वाले देशों के उत्पादकों के साथ वैक्सीन की तकनीक साझा करने के लिए कोविड-19 टेक्नोलॉजी एक्सेस पूल (सी-टैप) तैयार किया था, लेकिन एक भी कंपनी ने तकनीक साझा करने में दिलचस्पी नहीं ली।
सच तो ये है कि सी-टैप के लांच होने से दो दिन पहले 28 मई को पीफाइजर, एस्ट्राजेनेका और ग्लैक्सोस्मिथलिन जैसी बहुराष्ट्रीय दवा निर्माता कंपनियों ने सार्वजनिक तौर पर इस पहल का माखौल उड़ाया था। इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ फार्मास्यूटिकल मैन्युफैक्चरर्स एंड एसोसिएट्स की तरफ से आयोजित एक ऑनलाइन कार्यक्रम में पीफाइजर के चीफ एग्जिक्यूटिव अलबर्ट बौरला ने कहा था, “मुझे लगता है कि इस वक्त ये पहल बकवास और खतरनाक है।” एस्ट्राजेनेका के चीफ एग्जिक्यूटिव पास्कल सोरियोट ने तर्क दिया था कि इंटिलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स उनके कारोबार का बुनियादी हिस्सा है और अगर आप इसकी रक्षा नहीं करते हैं, तो निश्चित तौर पर किसी को भी नवाचार के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं है।
कारोबारियों की तरफ से इस तरह के दावे हास्यास्पद हैं क्योंकि कोविड-19 के जो 13 वैक्सीन अभी बाजार में उपलब्ध हैं, उनकी तकनीक तैयार करने में जनता का पैसा लगा है। मॉडर्ना वैक्सीन एमआरएनए-1273 का निर्माण जिस तकनीक से हुआ है, उसे जनता के पैसे से चलने वाले यूनिवर्सिटी लैब में तैयार किया गया है। कंपनी ने कहा है कि इस वैक्सीन से कंपनी इस साल 18.5 बिलियन अमरीकी डॉलर की कमाई करेगी।
यहां तक कि एजेडडी1222, जो अभी बाजार में सबसे ज्यादा लोकप्रिय है, को यूके की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में ‘सबसे के लिए मुफ्त’ के विचार के साथ विकसित किया गया है। बाद में बिल व मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन की अनुशंसा पर यूनिवर्सिटी ने ब्रिटिश-स्वीडन की कंपनी एस्ट्राजेनेका को इसका विशेष अधिकार देने के लिए उसके साथ अनुबंध कर लिया। एक निजी कंपनी ने सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के साथ एक अनुबंध किया, जो अभी कोविशील्ड नाम से वैक्सीन बना रही है।
इस मामले में अमीर देशों का रवैया भी बहुत अच्छा नहीं रहा है। सब-सहारा अफ्रीका के 50 देशों में अब तक कोविड-19 वैक्सीन की पहली डोज तक नहीं लगी है, लेकिन मार्च में प्रकाशित सीईपीआई की रिपोर्ट बताती है कि इस साल के अंत तक उत्पादित होने वाले वैक्सीन का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा अमीर और मध्य-कमाई वाले देशों ने अपने लिए बुक कर लिया है। बाकी बचा डोज दुनिया के सबसे पिछड़े 92 देशों की आबादी के महज 28 प्रतिशत हिस्से को मिल पायेगा। सच बात तो ये है कि अमीर देश जान बूझकर अपने हिस्से की वैक्सीन दबाकर बैठे हैं, ये जानते हुए कि केवल वायरस के फैलाव को दबाकर इसका संक्रमण सभी जगह एकसाथ रोका जा सकता है। (downtoearth.org.in)
-ललित मौर्य
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह अपील जीवित जंगली जानवरों से इंसानों में बीमारियों के फैलने के खतरे को देखते हुए की है
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जीवित जानवरों से इंसानों में बीमारियों के फैलने के खतरे को देखते हुए खाद्य बाजारों में जीवित जंगली जानवरों के व्यापार पर रोक लगाने की अपील की है। डब्ल्यूएचओ, वर्ल्ड ऑर्गनाइज़ेशन फॉर एनिमल हेल्थ और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने मंगलवार को जारी अपनी अपील में कहा है, हालांकि जीवों के यह पारंपरिक बाजार, एक बड़ी आबादी के लिए भोजन और जीविका प्रदान करते हैं, लेकिन इस कदम से न केवल बीमारियों के फैलने के खतरे कम किया जा सकता है साथ ही वहां काम करने वाले लोगों और दुकानदारों के स्वास्थ्य की भी रक्षा की जा सकती है।
इन दिशानिर्देशों के अनुसार ज्यादातर संक्रामक बीमारियां जिन्होंने दुनिया पर व्यापक असर डाला है जंगली जीवों से ही इंसानों में फैली हैं। इनमें लासा बुखार, मारबर्ग वायरस और निपाह वायरस शामिल हैं। यही नहीं कोरोनावायरस के अन्य रूप जैसे 2003 में फैला सार्स और 2012 में फैला मर्स जैसे संक्रमण भी जीवों से ही इंसानों में फैले हैं।
वहीं कोविड-19 के बारे में भी जितनी जानकारी सामने आई है उसके अनुसार इसके कुछ शुरुवाती मामले चीन के वुहान शहर में एक थोक पारंपरिक खाद्य बाजार से भी जुड़े थे। जिसके शुरुवाती मरीज दुकानों के मालिक, बाजार के कर्मचारी और बाजार में नियमित खरीदारी करने वाले ग्राहक थे। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सार्स-कोव-2 वायरस, जो कोविड -19 का कारण बनता है, उसकी सबसे ज्यादा संभावना है कि वो चमगादड़ में पैदा हुआ था और फिर अभी तक अज्ञात मध्यस्थ जानवर के माध्यम से मनुष्यों में फैल गया था।
70 फीसदी से भी ज्यादा संक्रामक बीमारियों के लिए जिम्मेवार हैं जंगली जीव
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आगाह किया है कि वर्तमान में इंसानों में जितनी भी संक्रामक बीमारियां सामने आ रहीं हैं उनमें से करीब 70 फीसदी के लिए जंगली जानवर ही जिम्मेवार हैं। इनमें से कुछ वायरसों के कारण भी फैल रहे हैं। गाइडेंस के अनुसार पारम्परिक बाजारों में जहां इन जीवों को भोजन के लिए बेचा, काटा और तैयार किया जाता है वहां दुकानदारों और ग्राहकों में रोगजनकों के फैलने का खतरा सबसे ज्यादा होता है।
ऐसे में इस गाइडेंस में अपील की गई है कि जब तक सभी जरुरी सावधानियां न बरती जाएं और खतरों का पूरी तरह आंकलन न हो तब तक इन बाजारों और इसके कुछ हिस्सों को बंद कर दिया जाना चाहिए। संगठनों का कहना है कि इस गाइडेंस का उद्देश्य पारंपरिक खाद्य बाजारों में कोविड-19 और जानवरों से फैलने वाली बीमारियों के जोखिम को कम करना है।
गौरतलब है कि दुनियाभर में अब तक कोविड-19 के 13.8 करोड़ मामले सामने आ चुके हैं। जबकि करीब 30 लाख लोग इस महामारी की भेंट चढ़ चुके हैं। भारत में भी अब तक इसके 1.38 करोड़ मामलों की पुष्टि हो चुकी है जबकि इस संक्रमण से अब तक 172,085 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। ऐसे में इस संक्रमण को फैलने से रोकने और नई बीमरियों को रोकने के लिए इस तरह के कदम जरुरी हैं, जिसे सभी देशों को पालन करना चाहिए। (downtoearth.org.in)
-विवेक मिश्रा
डाउन टू अर्थ ने हरिद्वार में घूम कर कोरोना संक्रमण की रोकथाम को लेकर स्थितियों का जायजा लिया तो स्थिति काफी भयावह नजर आई
देशभर में कोरोना संक्रमण के मामलों की रफ्तार बहुत तेजी से बढ़ रही है। वहीं, उत्तराखंड के हरिद्वार में कुंभ का आयोजन जारी है। 12 अप्रैल, 2021 को पहले शाही स्नान में जहां 31 लाख से ज्यादा लोगों ने गंगा स्नान किया, वहीं अब 14 अप्रैल को भी करीब इतनी ही संख्या गंगा स्नान के लिए पहुंच सकती है। लेकिन डाउन टू अर्थ ने हरिद्वार में घूम कर कोरोना संक्रमण की रोकथाम को लेकर स्थितियों का जायजा लिया तो स्थिति काफी भयावह नजर आई :
केस नंबर एक
हरिद्वार के मेला अस्पताल को एल-थ्री कोविड अस्पताल बनाया गया है। इसमें अभी 25 बेड है, जहां 22 मरीज भर्ती हैं। सैकड़ों मरीजों को यहां से एम्स ऋषिकेश के लिए रेफर किया जा चुका है। यहां जब हम पहुंचे तो एक स्थानीय युवा कोरोना पॉजिटिव मरीज पहुंचा (नाम-पहचान यहां जाहिर नहीं कर सकते) जिसे सांस की दिक्कत थी। वहां मौजूद चिकित्सक ने देखा और नजदीक के एक होटल को आइसोलेशन सेंटर बनाया गया है। वहां उसे जाने के लिए कहा गया।
पॉजीटिव होने के बावजूद खुद ही अपनी स्कूटी से अस्पताल की ओर जाता युवक। फोटो: मिधुन विजयन
हमने मरीज का पीछा किया तो पाया कि वह अपनी स्कूटी से भीड़ वाले इलाके में होते हुए होटल की तरफ गया। किसी भी तरह का प्रोटेक्शन नहीं था। आस-पास मौजूद लोग पूरी तरह इस बात से अंजान थे। ऐसे में कोरोना संक्रमण के मरीज बिना एंबुलेंस और सुरक्षा के भीड़ वाले इलाकों से बिना सोशल डिस्टैंसिंग गुजर रहे हैं।
वहीं एक साल पुराने अस्पताल में आरटीपीसीआर जांच की लैब बनाई जा रही है जिसका काम अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। इसलिए निर्माण कार्य के कारण बेडों की संख्या बढ़ने के बजाए घट गई है। यहां गंभीर मामले होते हैं। ऐसे में अस्पताल से एम्स रेफरल काफी ज्यादा है।
केस नंबर 2 :
हरिद्वार में कई अखाड़ों के टेंट-पंडाल वाली अस्थायी सुविधाएं बैरागी कैंप पर बनाई गई हैं। इनकी संख्या सैकड़ों में है। जहां पंडालों में 10 हजार से ज्यादा लोगों की चहलकदमी दिखाई दी।इस कैंप में एम्स ऋषिकेश की तरफ से कोरोना जांच और 50 बेड (25 महिला और 25 पुरुष बेड) वाला अस्थायी अस्तपाल स्थापित किया गया है। कोरोना जांच केंद्र पर लगातार मामले बढ़ रहे हैं।
नाम न बताने की शर्त पर कोरोना जांच केंद्र के एक कर्मी ने बताया कि यहां पर रोजाना 200 से 250 कोरोना एंटीजन जांच की जा रही है। इसमें जो पॉजिटिव मिलता है सिर्फ उसी संक्रमित व्यक्ति की आरटीपीसीआर जांच हो रही है। बैरागी कैंप पर 11 अप्रैल को कुल 250 जांच की गई इसमें 6 लोग पॉजिटव आए। 12 अप्रैल को 208 जांच की गई जिसमें 17 पॉजिटिव आए। 13 अप्रैल को दोपहर तक 117 लोगों की जांच हुई और जिसमें 6 पॉजिटिव कोरोना मरीजों की पुष्टि हुई।
कैंप के अस्पताल में मौजूद वरिष्ठ चिकित्सक विशाल पाटिल ने बताया कि सामान्य मरीजों की संख्या भी यहां काफी ज्यादा बढ़ रही है। इनमें डायरिया, डिहाइड्रेशन शामिल है। रोजाना 200 से 250 मरीजों का इलाज किया जा रहा है। ज्यादातर यहां भी मामलों को आइसोलेशन के लिए रेफर किया जा रहा है।
केस नंबर 3
हरिद्वार में एक और मुसीबत सामने आई है। मसलन यहां कई साधु पॉजिटिव केस होने के बाद भी आइसोलेशन से इनकार कर रहे हैं। एक ऐसा मामला सामने भी आया है। साधु को पॉजिटिव केस पता चलने पर वह भाग निकला। मुख्य चिकित्सा अधिकारी एसके झा ने डाउन टू अर्थ को बताया कि बाद में उसे पकड़ा गया। ऐसा मामला संज्ञान में आया था। वहीं, फील्ड रिपोर्टिंग के दौरान नाम न बताने की शर्त पर भी जांच केंद्रों पर कर्मियों ने बताया कि ऐसा हो रहा है। इसका मतलब है कि हम जिस भीड़ में हैं उसमें नहीं मालूम है कि कौन कोरोना संक्रमित है।
कुंभनगरी में बढ़ता कोरोना का बढ़ता ग्राफ :
10 अप्रैल, 2021 को कुल 30,638 जांच हुई कुल 205 कोरोना संक्रमित थे।
- इनमें एंटीजन टेस्ट 22610 में 54 संक्रमित मिले
- आरटीपीसीआर टेस्ट 8028 में 151 संक्रमित मिले
11 अप्रैल, 2021 को 55,430 जांच हुई, कुल 369 संक्रमित मिले
- 49929 एंटीजन जांचें हुई इनमें 98 कोरोना संक्रमित पाए गए।
- 5501 आरटीपीसीआर जांच हुई इनमें 271 कोरोना संक्रमित मिले।
12 अप्रैल, 2021 को 66203 जांच हुई और 387 पॉजिटिव मिले
- 61810 एंटीजन जांचे हुई इनमें 171 पॉजिटिव मिले।
- 4393 आरटीपीसीआर 215 पॉजिटिव मिले।
- सभी जांचे और कोरोना संक्रमितों की पुष्टि का यह आंकड़ा रात 12 बजे से अगली रात 12 बजे तक का है। कुल 24 घंटे का यह आंकड़ा है। उदाहरण के लिए 10 अप्रैल का आंकड़ा रात 12 बजे से रात 12 बजे तक का है।
14 अप्रैल को शाही स्नान, स्थिति संवेदनशील
मुख्य चिकित्सा अधिकारी एसके झा ने डाउन टू अर्थ से बताया कि हमारी तैयारी है और हम बचाव की पूरी कोशिश कर रहे हैं। एंटीजन टेस्ट हम ज्यादा जांच इसलिए कर रहे हैं क्योंकि यहां जो भी आ रहे हैं वह निगेटिव रिपोर्ट के साथ आ रहे हैं और उनमें लक्षण नहीं होते हैं। रैंडम टेस्टिंग में यदि कोई एंटीजन पॉजिटिव मिलता है तो उसका हम आरटीपीसीआर टेस्ट भी करते हैं।हरिद्वार में अब कुल 6 कंटेनमेंट जोन बन चुके हैं। 73 साइटों पर टीम रैंडम जांच के लिए मौजूद है। हमारे पास 10 हजार बेडों की व्यवस्था है। बॉर्डर इलाकों पर ज्यादा पॉजिटिव केस मिल रहे हैं। इनमें दिल्ली की तरफ से आने वाला नानसर बॉर्डर भी है।
भगदड़ के डर से नियमों में ढील
वहीं, मेला आईजी संजय गुंज्याल ने स्थानीय लोगों से परेशानी होने के कारण माफी मांगा। उन्होंने कहा कि यहां भगदड़ की घटनाएं हो चुकी हैं। ऐसे में यदि सोशल डिस्टैंसिंग और मास्क नियमों की सख्ती घाटों पर की जाएगी तो संभव है कि भगदड़ हो जाए। ऐसे में इन नियमों का पालन नहीं हो पा रहा है। (downtoearth.org.in)
-रेबेका थॉर्न
"मैं बहुत डरी हुई थी लेकिन मैं उस अनुभव को हाथ से जाने भी नहीं देना चाहती थी. मैं वहां रही भले ही मैंने ज़्यादातर समय अपनी आंखें बंद ही रखीं. मैं ये भी सोच रही थी कि मैं ये दोबारा नहीं करने वाली हूं."
आठ साल की एलेक्ज़ेन्ड्रा मेंडोज़ा ने रोलरकोस्टर की सवारी करते हुए ये कसम खाई थी. लेकिन, बाद में वो इस कसम पर कायम नहीं रह सकीं और वो भी एक बार नहीं बल्कि बार-बार.
उनके रोलरकोस्टर के अनुभव ने उनमें आढ़े-टेढ़े रास्तों की सवारी, सांसें थामने वाली ऊंचाई और झटका देने वाली ढलानों के लिए ज़बरदस्त जुनून पैदा कर दिया. रोलरकोस्टर पर सवार एलेक्ज़ेन्ड्रा इसका मज़ा तो उठाती हैं लेकिन ज़ोर से चीखती भी हैं.
अमेरिका के बड़े थीम पार्क इस महीने के अंत में खुलने वाले हैं. कैलिफॉर्निया में रोलरकोस्टर पर झूलने वालों को अपने उत्साह पर काबू रखने और कम चीखने-चिल्लाने के लिए कहा गया है ताकि इससे कोविड-19 वायरस फैलने के जोखिम को कम किया जा सके.
लेकिन, क्या कोई अपने चीखने पर काबू कर सकता है, क्या रोमांच चाहने वाले चीखे बिना रह सकते हैं और हम बेहद मज़ेदार पलों में चीखते क्यों हैं?
चीख क्या होती है?
इमोरी कॉलेज में मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसक हेरॉल्ड गुज़ूल बताते हैं कि चीखने की क्रिया को "पूरी तरह से गैर-मौखिक" ज़बानी हैरानी दिखाने के तौर पर वर्गीकृत किया गया है. जैसे कि लिखित विस्मयादिबोधक चिन्ह (!) होते हैं.
वह कहते हैं, ''चिल्लाने का मतलब है कि आप अपनी आवाज़ निकाल रहे हैं लेकिन बोल नहीं रहे हैं.''
"चीख एक विशिष्ट स्वर है. इसके ध्वनि संबंधी कुछ विशिष्ट गुण होते हैं; चीख एक सैकेंड के लगभग तीन चौथाई से लेकर डेढ़ सेकेंड तक हो सकती है. ये तेज़ आवाज़ में शुरू होती है और तेज़ ही बनी रहती है."
प्रोफ़ेसर हेरॉल्ड कहते हैं, "तो चीख अपेक्षाकृत छोटी होती है, उसमें चौंकाने की क्षमता होती है, पिच ऊंची होती है और ये थोड़ी दूर तक जाती है."
हम चीखते क्यों हैं?
प्रोफ़ेसर हेरॉल्ड का कहना है, "ऐसा विचार है कि चीख की शुरुआत ऐसे तरीक़े के तौर पर हुई थी जिससे किसी जंगली जानवर को चौंका दिया जाए और आपको बचने का एक छोटा-सा मौका मिल जाए."
हमारे पूर्वज चीख का इस्तेमाल आसपास मौजूद परिवार के सदस्यों को मदद के लिए बुलाने के लिए भी करते थे.
प्रोफ़ेसर बताते हैं, "लेकिन, मौजूदा वक़्त में अगर चीखें मौखिक हथियार बनती हैं तो वो किस व्यक्ति की हैं आपको ये पहचानना आना चाहिए."
उनका सुझाव है कि ऐसा होना इंसान को चीखने और चीख को पहचानने का अभ्यास करने के लिए प्रेरित कर सकता है. वो कम ख़तरे वाले माहौल में इसका अभ्यास कर सकते हैं.
रोलकोस्टर पर क्या हो जाता है?
प्रोफ़ेसर हेरॉल्ड बताते हैं, "हमारा दिमाग़ उन चीज़ों में हमें आनंद प्रदान करता है जिनसे जीवित बच जाने का अहसास होता है. हम काफ़ी सभ्य समाज में रह रहे हैं जहां हमें रोज़ चिल्लाना नहीं पड़ता लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं है कि कुछ मौकों पर हमें डर नहीं लगता. ऐसे मौकों पर हम उसी तरह चीखेंगे जैसे हमारे पूर्वज चीखते थे."
वह कहते हैं, "हमारे पूर्वजों के लिए चीख के अभ्यास की जगह झरना या ज्वालामुखी के आसपास का इलाक़ा रहा होगा और आधुनिक समाज के इंसान के लिए वो जगह रोलरकोस्टर और थीम पार्क हैं."
प्रोफ़ेसर हेरॉल्ड कहते हैं, ''आपका दिल तेज़ी से धड़कने लगता है, ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है, इसलिए आप डरने के वही शारीरिक प्रभाव महसूस करते हैं जैसे कि वास्तविक ख़तरे में होते हैं जबकि इसमें आप जानते हैं कि आप सुरक्षित हैं. ये जो तनाव आपके अंदर बनता है आप चीखकर उसे बाहर निकाल देते हैं.''
इसलिए एलेजेन्ड्रा के रोलरकोस्टर पर चिल्लाने से लगता है कि जैसे उन्हें डर लग रहा है लेकिन असल में तो उन्हें मज़ा आ रहा होता है.
25 साल के इक्वोडोर कहते हैं, "मैं कहूंगा कि ये एक तरह से तनाव को दूर करने वाला है क्योंकि चीखते वक़्त आप सबकुछ भूल जाते हैं. आप सिर्फ़ उस पल में होते हैं."
बेहद रोमांच का अनुभव
23 साल की ट्रैवल ब्लॉगर डिंफ मेनसिंक इस बात से सहमति जताती हैं कि वो बचपन से रोलकोस्टर पर झूलने का मज़ा उठा रही हैं.
वह बताती हैं, ''मैं शहरों में हमेशा थीम पार्क्स में जाना पसंद करती हूं क्योंकि ये मुझे बहुत रोमांचित करने वाला लगता है."
"जब आप रोलरकोस्टर के लिए लाइन लगी हुई देखते हैं और बार-बार वो घूमता है तो आप खुश होते हैं कि अच्छा है कि आप उस पर नहीं हैं. वो उसे और डरावना बना देता है. लेकिन, जब मैं उस पर सवार होती हूं, वो धीरे-धीरे ऊपर जाता है तो मुझे बहुत डर लगता है लेकिन जब वो नीचे उतरता है तो मुझे बहुत रोमांच और खुशी का अनुभव होता है और मैं चीखना चाहती हूं.''
एम्सटर्डम में रहने वाली डिंफ मेनसिंक कहती हैं कि इस तरह चीखने से वो अपनी भावनाओं को ज़ाहिर कर पाती हैं. ये कुछ ऐसा है जो आप सामान्य ज़िंदगी में महसूस नहीं करेंगे. चीखने से और रोमांच का अनुभव होता है.
जापान के उरायासु शहर में रहने वाले आकी हयाशी कहते हैं कि दुनियाभर के रोलरकोस्टर का अनुभव लेना उनकी जीवनभर की प्रेरणा बन गई है.
वह कहते हैं, ''मैं रोलरकोस्टर के बिना अपनी ज़िंदगी का मज़ा नहीं ले सकता.''
27 साल के हयाशी 'कोस्टर राइडर्स जापान' ग्रुप के प्रमुख भी हैं. ये रोलरकोस्टर राइड के दीवानों का एक समूह है जो मिलकर थीम पार्क जाते हैं.
वह कहते हैं कि 350 रोलरकोस्टर पर झूलने के बाद वो अब अपनी चीख पर काबू कर सकते हैं.
हयाशी बताते हैं, ''अगर मैं अकेले झूल रहा हूं तो मैं दिखाता हूं कि जैसे मैं उत्साहित ही नहीं हूं क्योंकि जब मैं अकेले चीखूंगा तो सब मुझे ही देखते हैं. लेकिन, जब हम साथ मिलकर झूलते हैं तो वो एक पार्टी करने जैसा होता है जिसमें हम साथ में खूब चिल्लाते हैं और शोर मचाते हैं. जब हम चिल्लाते हैं तब मुझे बहुत अच्छा लगता है.''
प्रोफ़ेसर हेरॉल्ड कहते हैं कि चीख पर नियंत्रण पाने की क्षमता होना संभव है लेकिन ये एक चुनौती है. कुछ लोग ऐसा कर भी सकते हैं और कुछ नहीं भी. (bbc.com)


