विचार/लेख
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
राहुल गांधी की अच्छी-खासी भारत-यात्रा चल रही है, लेकिन पता नहीं क्या बात है कि वक्त-बेवक्त उसमें वे पलीता लगवा लेते हैं। पहले उन्होंने जातीय-जनगणना के सोये मुर्दे को उठा दिया, जिसे उनकी माता सोनिया गांधी ने खुद दफना दिया था और अब उन्होंने महाराष्ट्र में जाकर वीर सावरकर के खिलाफ बयान दे दिया है। क्या उन्हें पता नहीं है कि विनायक दामोदर महाराष्ट्रियन थे और महाराष्ट्र के लोग उन्हें स्वांतत्र्य संग्राम का महानायक मानते हैं? स्वयं इंदिरा गांधी ने उन्हें महान स्वतंत्रता-सेनानी कहा है।
राहुल ने ब्रिटिश सरकार को लिखे सावरकर के एक पत्र को उद्धृत करते हुए कहा है कि सावरकर ने अपने आप को अण्डमान की जेल से छुड़वाने के लिए ब्रिटिश सरकार से माफी मांगी और रिहा होने के बाद उसके साथ पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। राहुल का कहना है कि सावरकर ने ऐसा करके गांधी, पटेल और नेहरु के साथ विश्वासघात किया और वे अंग्रेजों का साथ देते रहे।
ऐसा कहने में मैं राहुल का कोई दोष नहीं मानता हूं। यह दोष उनका है, जो लोग राहुल को पट्टी पढ़ाते हैं। बेचारे राहुल को स्वाधीनता संग्राम के इतिहास के बारे में क्या पता है? अंग्रेज के जमाने के गुप्त दस्तावेजों का स्वाध्याय और अनुसंधान करना तो राहुल क्या, किसी पढ़े-लिखे नेता से भी उम्मीद नहीं की जा सकती लेकिन सावरकर पर इधर छपे 5-6 प्रामाणिक ग्रंथों को भी राहुल ने सरसरी नजर से भी देख लिया होता तो उन्हें पता चल जाता कि सावरकर और उनके भाई ने आजन्म जेल से छूटने के लिए ब्रिटिश सरकार को एक बार नहीं, कई बार चि_ियां लिखी थीं और वे हर कीमत पर जेल से छूटकर अंग्रेज के खिलाफ सशस्त्र क्रांति का षडय़ंत्र रच रहे थे।
यह बात मैं नहीं कह रहा हूं। लगभग 40 साल पहले नेशनल आर्काइव्ज़ के गोपनीय दस्तावेजों को खंगालने पर मुझे पता चला कि उनके माफीनामे पर प्रतिक्रिया देते हुए गवर्नर जनरल के विशेष अधिकारी रेजिनाल्ड क्रेडोक ने लिखा था कि सावरकर झूठी माफी मांग रहा है और वह जेल से छूटकर यूरोप के ब्रिटिश-विरोधी आतंकवादियों से हाथ मिलाएगा और सशस्त्र क्रांति के द्वारा ब्रिटिश सरकार को उलटाने की कोशिश करेगा। सावरकर को जेल से छोडऩे के बाद भी बरसों-बरस नजरबंद करके क्यों रखा गया?
यदि सावरकर अंग्रेजभक्त थे तो महात्मा गांधी खुद उनसे मिलने लंदन के ‘इंडिया हाउस’ में क्यों गए थे? स्वयं गांधीजी ब्रिटिश-विरोधी तो 1916 में बने। 1899 में वे अफ्रीका के बोइर-युद्ध में अंग्रेजों के साथ दे रहे थे। उन्हें ‘केसरे-हिंद’ की उपाधि भी अंग्रेज सरकार ने दी थी। सावरकर उनके बहुत पहले से ही ब्रिटिश सरकार को उलटाने की कोशिश कर रहे थे? क्या वजह है कि मदाम भीकायजी कामा, सरदार भगतसिंह और सुभाषचंद्र बोस सावरकर के भक्त थे?
यह ठीक है कि आप सावरकर और सुभाष बोस के सशस्त्र क्रांति के हिंसक तरीकों से असहमत हों लेकिन सावरकर को लांछित करने और अंग्रेजों को लिखे उनके पत्रों की मनमानी व्याख्या करने की तुक क्या है? यदि राहुल का सोच यह है कि इससे वे ज्यादा वोट कबाड़ सकेंगे तो उन्हें पता होना चाहिए कि महाराष्ट्र में आजकल उनका साथ देने वाली उद्धव ठाकरे की शिवसेना को उन्होंने कितनी अधिक तकलीफ पहुंचाई है। सावरकर को नीचा दिखाकर भाजपा को हानि पहुंचाने की रणनीति कांग्रेस के लिए आत्मघाती सिद्ध हो सकती है। (नया इंडिया की अनुमति से)
‘नाऊ इज ऑल’ यानी ‘वर्तमान ही सब कुछ है’ कतर विश्वकप का अधिकारिक नारा है। शायद ये संदेश है कि वर्तमान और खेल के मैदान पर ध्यान रखो, जहां जल्द ही मुकाबले शुरू होने वाले हैं। यानी पिछली बातों से आगे बढ़ा जाए। लेकिन क्या ये इतना आसान है?
बहुत से लोग कतर 2022 वल्र्डकप को हालिया इतिहास का सबसे विवादित खेल आयोजन मान रहे हैं। बीते दो दशकों में चीन ने दो बार ओलंपिक खेलों का आयोजन किया है। रूस फुटबॉल विश्व कप 2018 और शीत ओलंपिक की मेजबानी कर चुका है।
रूस और चीन दोनों ही मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए बदनाम रहे हैं और ये चिंता पैदा हुई थी कि इतने बड़े खेल आयोजन यहां की तानाशाही सत्ता को और मज़बूत कर सकते हैं। लेकिन निस्संदेह सबसे ज़्यादा विवाद कतर की विश्वकप की मेजबानी पर ही हो रहा है। बीते 12 सालों में बार-बार फुटबॉल के सबसे बड़े आयोजन को कतर को सौंपने को लेकर गुस्से और बेचैनी का इजहार किया जाता रहा है।
भव्य होगा वर्ल्डकप : कतर
कतर पश्चिमी देशों का अहम सहयोगी देश है और बड़ा निवेशक है। रिपोर्टों के मुताबिक ब्रिटेन में जमीन के मालिकाना हक वाले दस शीर्ष निवेशकों में कतर शामिल है। यही नहीं कतर गैस का बड़ा सप्लायर है और यूरोप में बढ़ रहे गैस संकट के बीच कतर की भूमिका अहम हो सकती है। पूर्व फीफा प्रमुख सेप ब्लैटर का बयान हो या फिर कतर के वल्र्डकप एंबेसडर खालिद सलमान का समलैंगिकों को लेकर दिया गया विवादत बयान-कतर वर्ल्डकप पर एक के बाद एक सवाल उठ रहे हैं।
वर्ल्डकप से जुड़े निर्माण कार्यों में लगे मजदूरों की हालत और उनके मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर भी कतर पर सवाल उठते रहे हैं। इस सबके बीच कतर का कहना है कि वल्र्डकप की बदनामी के प्रयास अनुचित हैं। ये मध्य पूर्व का पहला वल्र्डकप है और कतर का कहना है कि ये भव्य और दर्शनीय होगा और इस ऐतिहासिक टूर्नामेंट का जश्न मनाया जाना चाहिए। कतर ने कहा है कि इस विशाल आयोजन में सबका स्वागत है, ये खेल को बढ़ावा देगा, युवाओं को प्रेरित करेगा, पर्यटन को बढ़ाएगा, देश की अर्थव्यवस्था में विविधता लाएगा।
सबसे बड़ा सवाल: कतर में क्यों हो रहा है वर्ल्डकप?
बीते सोमवार को फीफा के पूर्व प्रमुख सेप ब्लैटर ने कहा कि कतर में विश्वकप कराना एक गलती है। मंगलवार को कतर के वल्र्डकप एंबेसडर खालिद सलमान ने समलैंगिकता को ‘दिमाग की खराबी’ बता दिया।
कतर ने कहा है कि वर्ल्डकप में सभी का स्वागत है, लेकिन इस बयान को लेकर विवाद बढ़ता ही जा रहा है। ऐसे में ये सवाल बार-बार उठ रहा है कि तीस लाख की आबादी वाले देश में जहां गर्मियों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस को पार कर जाता है और जहां समलैंगिकता पर पाबंदी है, उसे वल्र्डकप की मेजबानी कैसे मिली?
कतर ने कभी भी वल्र्डकप के लिए चलीफाई तक नहीं किया था, मेज़बानी करना तो अलग ही बात थी। लेकिन साल 2010 में ये बदल गया। फीफा ने साल 2022 के फीफा वल्र्डकप की मेजबानी के लिए कतर को विजेता घोषित किया।
फीफा की कार्यकारी समिति ने ये फैसला लिया था। साल 2014 में इसमें मतदान करने वाले एक सदस्य मिशेल प्लातिनी ने बीबीसी को बताया था कि उन्होंने कतर को ही क्यों चुना।
प्लातिनी ने कहा था, ‘मैंने ये फैसला किया था कि इस बार हम ऐसे हिस्से में जाएंगे जहां पहले कभी वल्र्डकप नहीं हुआ है।’
फीफा के लिए कतर को चुनने का ये एक कारण था, लेकिन इसके और भी कारण हो सकते हैं। संडे टाइम्स की एक खुफिया रिपोर्ट के बाद मतदान से पहले समिति के दो सदस्यों को हटा दिया गया था। इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि इन दोनों सदस्यों ने अपने वोट बेचने की पेशकश की थी।
मेजबानी तय करने के लिए हुए उस मतदान में बाकी सदस्यों ने अमेरिका की जगह कतर को चुना था। हालांकि अमेरिका को पहली पसंद बताया जा रहा था। इसके बाद साल 2011 में संडे टाइम्स की एक और खुफिया रिपोर्ट में दावा किया गया था कि समिति के दो अन्य सदस्यों को भी कतर के समर्थन में मतदान करने के लिए पंद्रह लाख डॉलर दिए गए थे। उन्होंने इन आरोपों को खारिज किया था।
साल 2012 में फीफा ने इसकी जांच की घोषणा कर दी थी। इस जांच की रिपोर्ट में कहा गया कि वोट खरीदे नहीं गए थे, लेकिन इसमें ये भी कहा गया था कि कुछ खास लोगों का आचरण समस्याओं का संकेत देता है।
एफ़बीआई ने साल 2015 में कहा कि फीफा में रिश्वत, अवैध भुगतान और फायदा पहुंचाना काम करने का तरीका बन गया था। हालांकि एफबीआई ने कतर के विश्व कप की मेजबानी हासिल करने का खास उल्लेख नहीं किया था। हालांकि इसके बाद से ये फैसला लेने वाली कार्यसमिति के 22 सदस्यों में से 11 को या तो निलंबित कर दिया गया या उन पर जुर्माना लगाया गया या मुकदमा चला। इनमें से दो दोषी साबित हुए, लेकिन क़तर की मेजबानी के मामले में नहीं। अब मतदान के 12 साल बाद कतर ने कहा है कि उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया है जो अवैध हो या अनैतिक हो। लेकिन इस सप्ताह सेप ब्लैटर ने इस बारे में और भी अधिक कहा है। उन्होंने कहा है कि ज़ाहिर है ये पैसे का मामला भी है। उन्होंने कहा कि वो ये बात लोगों के नहीं, देशों के संदर्भ में कह रहे हैं।
उन्होंने बिना किसी सबूत के ये संकेत दिए हैं कि हो सकता है कतर का फ्रांस से लड़ाकू विमान की बिक़्री का सौदा कतर की वल्र्डकप की मेजबानी हासिल करने की वार्ता के जरिए आसान हुआ हो।
हालांकि अभी ये संबंध स्थापित नहीं हुआ है और ना ही बड़े खेल आयोजनों की मेजबानी देने के पीछे राजनीतिक वजहें होना कोई असामान्य बात हो। लेकिन ये बात ऐसा व्यक्ति कह रहा है जो फीफा का प्रमुख रहा है और उसके कहने का मतलब ये है कि कतर के वल्र्डकप की मेजबानी हासिल करने के तार फ्रांस के कतर को सैन्य उपकरण बेचने से जुड़े हो सकते हैं। हमें ये भी याद रखना चाहिए कि सेप ब्लैटर जिन दिनों फीफा के प्रमुख थे, उसे फीफा में भ्रष्टाचार के दौर के रूप में जाना जाता है।
कतर और फीफा दोनों ही किसी भी तरह से कुछ भी गलत होने से इंकार करते रहे हैं।
इस सबके बीच, जब खिलाड़ी क़तर जाने की तैयारियां कर रहे हैं, इस सवाल का जवाब अभी मिलना बाकी है कि ये वल्र्डकप कतर में क्यों हो रहा है?
सर्दियों में क्यों हो रहा है वर्ल्डकप?
फीफा वर्ल्डकप टूर्नामेंट आमतौर पर जून और जुलाई में आयोजित किया जाता है, लेकिन कतर में साल के इन महीनों में औसत तापमान लगभग 41 डिग्री सेल्सियस होता है और ये 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। इतनी गर्मी ख़तरनाक है और ऐसी स्थिति में 90 मिनट खेलने की बात सोच भी नहीं सकते हैं। बोली प्रक्रिया के दौरान, कतर ने एडवांस्ड एयर कंडीशनिंग तकनीक का इस्तेमाल करने का वादा किया था। ऐसा कहा गया था कि ये स्टेडियम और ट्रेनिंग पिच जैसी जगहों को 23 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा कर देगा। हालांकि, 2015 में फीफा ने ये फैसला लिया कि टूर्नामेंट सर्दियों में आयोजित कराया जाएगा। वल्र्डकप 20 नवंबर से शुरू हो रहा है और फाइनल 18 दिसंबर को खेला जाना है। इसका मतलब ये है कि ये कई देशों के क्लब फुटबॉल सीजन के ठीक बीच में आएगा, जिससे उन्हें रुकावट का सामना करना पड़ेगा।
किन स्टेडियमों में खेले जाएंगे मुकाबले?
इस टूर्नामेंट के लिए कतर में कुल 8 स्टेडियम तैयार किए गए हैं। 8 में से 7 तो इस टूर्नामेंट के लिए बिल्कुल शुरुआत से बनाए गए हैं। बाकी बचे एक को भी पूरी तरह से फिर से तैयार किया गया है। ये सभी स्टेडियम एक-दूसरे से कऱीब एक घंटे की ड्राइव और ज़्यादा से ज़्यादा 43 मील की दूरी पर हैं।
ये 8 स्टेडियम हैं-
लुसैल स्टेडियम (क्षमता- 80,000)
अल बेत स्टेडियम (क्षमता- 60,000)
स्टेडियम 974 (क्षमता- 40,000)
ख़लीफ़ा इंटरनेशनल स्टेडियम (क्षमता- 45,416)
एजुकेशन सिटी स्टेडियम (क्षमता- 40,000)
अल थुमामा स्टेडियम (क्षमता- 40,000)
अल जनुब स्टेडियम (क्षमता- 40,000)
अहमद बिन अली स्टेडियम (क्षमता- 40,000)
फीफा वर्ल्डकप 2022 का फ़ाइनल मुकाबला 18 दिसंबर को लुसैल स्टेडियम में खेला जाएगा। (bbc.com/hindi)
-रीवा एस. सिंह
रणबीर कपूर के फिटनेस ट्रेनर ने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट लिखकर उनकी तारीफ की है। फिटनेस को लेकर उनके लगन पर कहा है कि अभिनेता के पास इस सप्ताह वर्कआउट न करने के लिये हर वाजिब वजह थी, उनकी बेटी घर आयी है। लेकिन ब्रह्मात्र स्टार ने किसी दिन कोई सेशन मिस नहीं किया।
लोग इस पर लहालोट हो रहे हैं कि ये है फिटनेस का राज। अच्छी डेडिकेशन है! डिलिवरी के तुरंत बाद जब करीना ने काम शुरू किया था तो किसी को डेडिकेशन की स्पेलिंग नहीं याद आ रही थी।
फिटनेस, सेल्फ-लव बहुत अच्छी बातें हैं, और अच्छी होतीं अगर इनपर सबका एक समान अधिकार होता। बच्चे को माँ की जरूरत ज्यादा होती है लेकिन जो काम पिता कर सकते हैं उसमें भी कितने पिता फ्रंटफुट पर आते हैं? अपनी जिम्मेदारियां दूसरों के हिस्से छोडक़र पेरेंटहुड को मदरहुड बना दिया जाता है और किनारे खड़े होकर तसल्ली से उसी मदरहुड को ग्लोरिफाय किया जाता है।
बच्चे का डायपर बदलना हो तो अक्सर माँ को ही आवाज लगाई जाती है, भले वह किचन में व्यस्त हो। बच्चा रात को न सोये तो माँ की ही नींद खराब होती है, पिता तो जैसे-तैसे सो ही जाते हैं।
आलिया के पास ढेरों सुविधाएँ होंगी लेकिन बच्चे को पूरा वक्त तो देना पड़ रहा है न! उसी वक्त में जब रणबीर के फिटनेस फ्रीक होने पर कसीदे पढ़े जा रहे हैं।
विराट कोहली को बुरी तरह ट्रोल होना पड़ा था क्योंकि वे सिरीज छोडक़र पैटर्निटी लीव ले रहे थे। तब सबको मैच ज्यादा जरूरी लग रहा था, घर में बेटी का आना कमतर। उनकी प्रशंसा में नहीं कहा गया कि कितने बेहतरीन पिता होंगे विराट, क्या गजब डेडिकेशन है!
किस्त-7
सबसे बड़े सामाजिक मसीहा बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी ने अदालतों और वकालत की जनविरोधी भूमिका पर गहरा कटाक्ष ‘हिन्द स्वराज’ में किया है। उनका दो टूक कहना था अंगरेजी फितरत की अदालतें गोरी नस्ल की संसद की तरह भारत जैसे गरीब लेकिन सांस्कारिक देश के लिए नामाकूल हैं। गांधी नहीं चाहते थे, लेकिन अंगरेज मेम ठसक लिए हिन्दुस्तानी पोशाक पहनकर भारत में न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका की जनता से निरपेक्ष भूमिका में आखिर आ ही गई। गांधी ने ‘हिन्द स्वराज’ में वकीलों को लेकर जो कहा, वह शश्वत सच दिखाई पड़ता है। उन्होंने वकील वर्ग के प्रति अपनी नफरत का इजहार नहीं बल्कि अंगरेजी पद्धति की न्याय व्यवस्था की जड़ों पर हमला किया। गांधी ने साफ कहा ‘जिन्हें अपनी सत्ता कायम रखनी है, वे अदालतों के जरिये लोगों को बस में रखते हैं। लोग अगर खुद अपने झगड़े निबटा लें, तो तीसरा आदमी उन पर अपनी सत्ता नहीं जमा सकता। सचमुच जब लोग खुद मारपीट करके या रिश्तेदारों को पंच बनाकर अपना झगड़ा निबटा लेते थे तब वे बहादुर थे। अदालतें आईं और वे कायर बन गए। लोग आपस में लडक़र झगड़े मिटायें, यह जंगली माना जाता था। अब तीसरा आदमी झगड़ा मिटाता है, यह क्या कम जंगलीपन है? क्या कोई ऐसा कह सकेगा कि तीसरा आदमी जो फैसला देता है वह सही फैसला ही होता है? कौन सच्चा है, यह दोनों पक्ष के लोग जानते हैं। हम भोलेपन में मान लेते हैं कि तीसरा आदमी हमसे पैसे लेकर हमारा इंसाफ करता है।’ इसी क्रम में गांधी ने आगे कहा कि ‘अंग्रेजी सत्ता की एक मुख्य कुंजी उनकी अदालतें हैं और अदालतों की कुंजी वकील हैं। अगर वकील वकालत करना छोड़ दें और वह पेशा वेश्या के पेशे जैसा नीच माना जाय, तो अंग्रेजी राज एक दिन में टूट जाय। वकीलों ने हिन्दुस्तानी प्रजा पर यह तोहमत लगवाई है कि हमें झगड़े प्यारे हैं और हम कोर्ट-कचहरी रूपी पानी की मछलियां हैं। जो शब्द मैं वकीलों के लिए इस्तेमाल करता हूं, वे ही शब्द जजों को भी लागू होते हैं। ये दोनों मौसेरे भाई हैं और एक-दूसरे को बल देने वाले हैं।’
गांधी रुक नहीं जाते। हिन्दुस्तान पर विचार करते हैं ‘अंग्रेजी सत्ता की एक मुख्य कुंजी उनकी अदालतें हैं और अदालतों की कुंजी वकील हैं। अगर वकील वकालत करना छोड़ दें और वह पेशा वेश्या के पेशे जैसा नीच माना जाय तो अंग्रेजी राज एक दिन में टूट जाय।’ पहले गांधी यह सवाल कर चुके थे-‘क्या आप मानते हैं कि अंग्रेजी अदालतें यहां न होतीं तो वे हमारे देश में राज कर सकते थे?’ उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा और उसमें दीक्षित वर्ग-वकील, डॉक्टर, इंजीनियर को ब्रिटिश साम्राज्य की शोषणधर्मी नीतियों का सबसे बड़ा समर्थक वर्ग माना है। गांधी लिखते हैं ‘पश्चिम के सुधारक खुद मुझसे ज्यादा सख्त शब्दों में इन धंधों के बारे में लिख गए हैं। उन्होंने वकीलों और डॉक्टरों की बहुत निन्दा की है। उनमें से एक लेखक ने एक जहरी पेड़ का चित्र खींचा है, वकील-डॉक्टर वगैरा निकम्मे धंधेवालों को उसकी शाखाओं के रूप में बताया है और उस पेड़ के तने पर नीति-धर्म की कुल्हाड़ी उठाई है।’ वे आगे लिखते हैं ‘हम डॉक्टर क्यों बनते हैं, यह भी सोचने की बात है, उसका सच्चा कारण तो आबरूदार और पैसा कमाने का धंधा करने की इच्छा है। उसमें परोपकार की बात नहीं है।‘
गांधी एक महत्वपूर्ण वकील रहे हैं। उन्होंने ज्ञान का उपयोग व्यक्तियों के बीच फैले विद्वेष को घटाने में किया। गांधी अमीर वकील की भूमिका का निर्वाह नहीं कर पाए। यही भूमिका संपन्न करने उन्हें दक्षिण अफ्रीका ले जाया गया था। तत्कालीन समाज में वकील और डॉक्टर दो प्रमुख व्यवसाय थे। वे अपने उद्देश्यों से भटक जाने के कारण/बावजूद सफलता का परचम हाथ में लिए थे। दोनों व्यवसायों का घोषित तौर पर मकसद जनसेवा करना था, लेकिन पथभ्रष्ट होकर ‘अर्थसंग्रह’ में लग गए। दोनों पश्चिम से उपजी मनुष्य विरोधी आधुनिक सभ्यता के प्रतीक, प्रस्तोता और प्रवक्ता हो गए थे। सचेत और अध्ययनशील वकील गांधी को सही प्राथमिक जानकारियां भी थीं।
वकीलों के बारे में समाज में आम धारणा बहुत संतोषजनक नहीं है। यह धारणा है कि जो और कुछ नहीं बन सकता, वह वकील हो जाता है। विख्यात अंग्रेज कवि चॉसर ने सुप्रसिद्ध कृति ‘केन्टरबरी टेल्स’ में वकील का चित्रांकन करते लिखा है कि वकील वह प्राणी है जो अपने को व्यस्त दिखाने का उपक्रम करता रहता है। वकालत की सफलता का श्रेय तिकड़म तथा झांसापट्टी को दिया जाता है। कितनी ही मेहनत अपने मुअक्किल के लिए करे। खुद उसका पक्षकार भी उससे सशंकित रहता है। वकीलों की वाकपटुता, सफेद को काला दिखाने की क्षमता और हुनरबाजी का लोहा मानने पर भी समाज को उनसे आतंकित रहने की आदत पड़ गई है। माना जाता है अदालतों में न्याय के रूप में सत्य की खोज में लगे वकील वर्ग को सच से निजी तौर पर कोई सरोकार नहीं है। झूठी गवाही, झूठे हलफनामे और फरेब से सत्य की आत्मा बेहोश तो कर ही दी जाती है।
वकीलों के बारे में यह भी धारणा है कि यह समाज का पराश्रयी है। अंग्रेज साहित्यकार थैकरे ने यहां तक कहा था कि ईमानदार आदमी की हड्डियों पर ही वकील का गोश्त चढ़ता है। एक जस्टिस ने झल्लाकर कहा था, ‘राज्य आखिरकार वकीलों की तरह आपसे में बंट जायेगा।’ मुकदमों की नियति होती है कि उनका अन्त होते होते दोनों पक्ष हलाकान हो जाते हैं। फ्रांसीसी लेखक वोल्तेयर ने कहा था वे जीवन में केवल दो बार बरबाद हुए। एक बार जब मुकदमा जीते और दूसरी बार जब मुकदमा हारे। मानवतावादी, साहित्यकार शेक्सपियर प्रख्यात इतिहासपुरुष क्रॉमवेल, कवि टेनिसन, ब्रिटिश प्रधानमंत्री डिजरायली आदि ने भी वकीलों के पेशे पर कटाक्ष किए हैं। प्रसिद्ध अंग्रेज वकील तथा लेखक बेन्थम ने कहा था ‘कानून का अज्ञान किसी भी व्यक्ति को नहीं बख्शता सिवाय वकील के।’ उसने व्यंग्य भी किया कि जब किसी मुल्क में क्रांति होती है। तो पहला सुधार यही होगा कि सारे वकीलों को सजा दी जाए। यह ऐसा फैसला होगा जिस पर आने वाली पीढिय़ाँ कभी नहीं पछताएंगी।
न्यायालय पीडि़त व्यक्तियों की अंतिम उम्मीद के रूप में बनाए गए। उन्हें भी ऐशगाह बनाया, समझाया जा रहा है। कई जजों को करोड़ों रुपयों की तलब के आरोप लगाए जाते हैं। उन्हें ज्ञान, सेवा और चरित्र के अतिरिक्त बाकी कुछ और भी चाहिए। वे बात-बात में झल्लाने लगते हैं। कुछ वकीलों को रियायत देते हैं। बाकी से डांटडपट करते हैं। न्यायालय घूसखोरी से परे नहीं हैं। पदों की बंदरबाट में अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग है। उनका धन व्यापार वगैरह में लगने की भी अफवाहें हैं। लोकतंत्र तो धर्मशाला, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या चैत्य विहार बनने आया था। जुरासिक पार्क बनकर रह गया है। इसमें संदेह नहीं बहुत मुश्किल समय में कई जजों ने साहसिक नवाचार से उपेक्षितों को अनाथालय बनने से बचा लिया। हजारों एकड़ जमीन किसानों, आदिवासियों को लौटाई गई। देश के कई हाईकोर्ट ऐतिहासिक भूमिका के लिए याद रखे जाएंगे। जेलों में सड़ रहे बंदियों, फुटपाथ के रहवासियों और प्रदूषण झेलते नागरिकों को सुप्रीम कोर्ट ने राहत दी है। अशेष कवि दुष्यंत कुमार ने जनसलाह दी थी कि आसमान में भी सूराख हो सकता है, यदि कोई तबियत से पत्थर तो उछाले। अदालतों की जनप्रतिष्ठा की कांच की दीवारें कुछ चटक गई है। उस शीशमहल सुप्रीम कोर्ट को संविधान निर्माताओं ने मशक्कत, जद्दोजहद, समझदारी, बहसमुबाहिसा और भविष्यमूलक दृष्टि से रचा। कार्यपालिका और विधायिका के कर्तव्य, फैसलों, विलोप और आलस्य तक के खिलाफ समझाईश, टिप्पणी और विवेक को बर्खास्त करना भी सुप्रीम कोर्ट के दायरे में रचा। कई पेंच डाल दिए जो मासूम जनता को नहीं दिखे। न्याय मिलता दिखता है, लेकिन मिलता नहीं है।
किस्त-6
हिन्दू मुसलमान का उलझाया गया रिश्ता गांधी के जीवन का अहम सवाल रहा है। ‘हिन्द स्वराज’ में ही उन्होंने चिंता व्यक्त की एक-राष्ट्र होकर रहने वाले लोग एक-दूसरे के धर्म में दखल नहीं देते, अगर देते हैं तो समझना चाहिये कि वे एक-राष्ट्र होने के लायक नहीं हैं। अगर हिन्दू मानें कि सारा हिन्दुस्तान सिर्फ हिन्दुओं से भरा होना चाहिये, तो यह एक निरा सपना है। मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ मुसलमान ही रहें, तो उसे भी सपना ही समझिये। फिर भी हिन्दू, मुसलमान, पारसी, ईसाई, जो इस देश को अपना वतन मानकर बस चुके हैं एक-देशी, एक-मुल्की हैं, वे देशी-भाई हैं, और उन्हें एक-दूसरे के स्वार्थ के लिए भी एक होकर रहना पड़ेगा। गांधी लगातार ‘हिंद स्वराज’ के दिनों से ही इस समस्या और परेशानी से रूबरू होते रहे। उनकी अपनी एक मानवीय, दार्शनिक दृष्टि रही।
साथ ही गांधी ने स्पष्ट किया जहां मूर्ख होंगे, वहां बदमाश भी होंगे। कायर होंगे, वहां उजड्ड भी होंगे-चाहे हिन्दू हों या मुसलमान। सांप्रदायिक विद्वेषों में सवाल नहीं है कि दो में से एक समुदाय को किस तरह सबक सिखाया जाये या उसका मानवीकरण किया जाये। सवाल है किस तरह कायर को बहादुर बनाया जाए। गांधी ने साफ कहा कोई अपनी और अपनों की रक्षा अहिंसात्मक प्रतिरोध (जिसमें मृत्यु भी शामिल है) के जरिए नहीं कर सकता। तो हमलावर का मुकाबला हिंसा के आधार पर भी कर सकता है। जो दोनों नहीं कर सकता, वह खुद एक बोझ है। सवाल है कौन हिंसा कर रहा है? कौन है जिसे अपनी और अपनों की रक्षा के लिए दूसरे विकल्प के रूप में हथियार उठा लेने चाहिए?
‘हिन्द स्वराज’ में 39 वर्ष के बैरिस्टर गांधी लिख गए ‘‘मैं खुद गाय को पूजता हूं यानी मान देता हूं। जैसे मैं गाय को पूजता हूं वैसे मैं मनुष्य को भी पूजता हूं। क्या गाय को बचाने के लिए मैं मुसलमान से लड़ूंगा? क्या उसे मारूंगा? गाय की रक्षा करने का यही उपाय है कि मुझे अपने मुसलमान भाई के सामने हाथ जोडऩे चाहिये और उसे देश के खातिर अगर वह न समझे तो मुझे गाय को मरने देना चाहिये, क्योंकि वह मेरे बस की बात नहीं। मुझे गाय पर अत्यंत दया आती हो तो जान दे देनी चाहिये, लेकिन मुसलमान की जान नहीं लेनी चाहिये। यही धार्मिक कानून है। मेरा भाई गाय को मारने दौड़े, तो उसके साथ कैसा बरताव करूंगा? उसे मारूंगा या उसके पैर पड़ूंगा? आप कहें कि मुझे उसके पांव पडऩा चाहिये, तो मुझे मुसलमान भाई के भी पांव पडऩा चाहिये। जो हिन्दू गाय की औलाद को पैना (आरी) भोंकता है, उस हिन्दू को कौन समझाता है?
संघ परिवार ने रहस्योद्घाटन किया कि गांधी ने औसत हिन्दू को कायर तथा औसत मुसलमान को लगभग गुंडा कहा था। गांधी को खंगाले बिना कहना संभव है कि बापू जैसा संतुलित समन्वयवादी न तो हिन्दू को कायर कह सकता है और न मुसलमान को मवाली या गुंडा। जो अफवाह को भारत का पांचवां वेद बनाए हुए हैं, उनके गुरुकुल में चरित्र हत्या, धर्मोन्माद, परनिन्दा जैसी फैकल्टियां भी खुली हुई हैं। उनके कई विशेषज्ञ इन विषयों के अंतरराष्ट्रीय ख्यातिनाम हस्ताक्षर हैं।
गांधी के वक्त गोधरा सहित अन्य जगहों में दोनों समुदायों के बीच युद्ध की मानसिकता थी। वे झगड़े शहरों तक सीमित थे, गांवों तक नहीं फैले थे। इक्कीसवीं सदी का गुजरात गांवों को भी बुरी तरह झुलसाये हुए है। गांधी के साबरमती आश्रम में उन्मादी तत्वों की भीड़ मेधा पाटकर जैसी शख्सियत को नेस्तनाबूद करने हिंसक थी। दुर्भाग्य है कि पुलिस पत्रकारों को पीट रही थी और टेलीविजन के परदे पर मुस्करा रही थी। गांधी के सामने एक समुदाय के लोग गाजर मूली की तरह काटे जा रहे हों और दूसरा समुदाय राज्य संरक्षण में अट्टहास कर रहा हो, तब गांधी अहिंसा को लेकर क्या कहते? गांधी ने इसका भी इशारा किया है।
गांधी की अहिंसा दांव पर चढ़ी है। बहुसंख्यकों के लिए उन्होंने अहिंसा का विचार चौपाल पर रखा था। वह राज्यतंत्र के सहारे कुछ लोगों की मु_ी में आ गया है। अल्पसंख्यक वर्ग को हिंसा का खतरा बढ़ गया है। मौजूदा भारत गांधी के सच की उलटबांसी है। गुजरात सहित भारत आधे अधूरे सच का यतीमखाना है। आज गांधी के सत्य के प्रयोगों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। गांधी के संदेष की समीक्षा संघ परिवार कर रहा है। संकट तो यह है कि लोग ट्रिपल रिफाइंड दांडी का नमक तक वफादारी जताये बिना हजम कर गये।
130 करोड़ की आबादी में हिन्दू सौ करोड़ के ऊपर हैं। करीब बीस करोड़ लोगों में मुसलमान, ईसाई, पारसी वगैरह विदेशी धर्मों की मजहबी अल्पसंख्यकता है। हिंदू लगातार सत्ता में हैं। फिर भी उनके मन में खरोंच है कि तुर्क, पठान और मुगल मुसलमान वगैरह सदियों तक हुकूमत करते रहे। अंगरेज के साथ पुर्तगाली, डच और फ्रांसीसी वगैरह भी तो आए थे। भारत में इतनी हिम्मत क्यों नहीं थी कि विदेशी हमलावरों को रोक सके। अपने हाथों अपनी पीठ ठोंकने की कला में कुछ लोग माहिर हैं। आत्मा से पूछें क्या हम यूरोप और अमेरिका बल्कि चीन के भी सामने रीढ़ की हड्डी पर सीधे खड़े होकर कह सकते हैं कि हम पराजित नहीं होंगे। भारतीयों में साहस, विजय, सहनशीलता और भाईचारे का इंजेक्शन लगाने के बदले भडक़ाऊ नारे जबान पर चस्पा हों तो क्या देश मजबूत होगा?
भारत गैरजरूरी और आ बैल मुझे मार जैसे सांस्कृतिक संकट में उलझ जा रहा है। राजनीति, भूगोल, भाषा, पोषाक, तहजीब, खानपान और रस्मोरिवाज की किसी भी खिडक़ी से देखने पर यही सवाल कई तरह से देखा जा सकता है। होना तो चाहिए कि कोई बेगैरत सवाल देश की एकता, सामूहिकता और लोकतांत्रिक भविष्य के मद्देनजर उठाया ही नहीं जाए। अनोखी, एकल और जबरिया बनाई जा रही सुरंग में देश धकेला जा रहा है। धरती पर दूसरा देश नहीं है, जहां इतने जुदा-जुदा धर्म, क्षेत्रीयताएं, आदतें, तीज त्यौहार और जीवन के बहुविध शऊर सदियों से आपसी सहकार में रच बस गए हैं। सूख गए घाव से नोंच-नोंचकर ऊपर की त्वचा हटा देने पर ताजा चोट उभर उभर आती है।
यह सवाल केवल राजनीति के जरिए नहीं सुुलझ सकता। मस्जिदों के सामने भीड़ लेकर हनुमान चालीसा पढ़ी जाए। मॉल के अंदर नमाज पढ़ी जाए या सडक़ों पर। उत्तेजक नारे लगाकर धर्म को हिंसक संघर्ष के रास्ते खड़ा किया जाए। आपसी सहकार के बिना संविधान में संशोधन केवल वोट बैंक को निगाह में रखकर क्यों किया जाए? आजादी की दहलीज पर हिन्दू मुस्लिम अलगाव का नासूर बहने लगा था। वह आजादी के अमृत वर्ष में भी सूख नहीं सका। आत्मा के लोहारखाने में कबीर नाम का दार्शनिक कवि हुआ है। उसकी फितरत और रोम रोम में सच्ची हिन्दुस्तानियत है। संविधान, राजनीति, संसदें और इक्कीसवीं सदी के तेवर किताबी तौर पर भले ही मानव धर्म को समझ लें। अपने जेहन और चरित्र में दाखिल नहीं कर पाते।
इरादा हो कि मनुष्य में मजहब की सिखावन और रूढिय़ां कुलबुलाती नहीं रहें। वह मनुष्य होने की अंतिम सीढ़ी है। विवेकानन्द ने मित्र मोहम्मद सरफराज हुसैन को लिखा था कि जब वेदांत का मन इस्लाम की देह में जज्ब हो जाएगा, वही दिन इंसानियत के उदय का होगा। गांधी ने राम की प्रार्थना में अल्लाह का नाम संयुक्त किया था। समान नागरिक संहिता दुनिया के कई देशों में है। उसे लागू करने में बुराई नहीं है। सवाल है क्या उसे राजनीति अपना लाभ, हानि का खाता देखकर तय करेगी। असल में धर्मों की एकता का सांस्कृतिक समास होता है। उसे वक्त या भविष्य कुदरती हुक्म मानकर कभी लागू कर भी लेंगे।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
केरल की मार्क्सवादी सरकार का दुराग्रह अपनी चरम सीमा पर पहुंचा हुआ है। सत्तारुढ़ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने अपने राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने राज्यपाल को केरल के विश्वविद्यालयों के कुलपति पद से हटाने के लिए एक अध्यादेश तैयार कर लिया है और अब विधानसभा का सत्र बुलाकार वे अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रस्ताव भी पारित करना चाहते हैं। उनसे कोई पूछे कि राज्यपाल के हस्ताक्षर के बिना कौनसा प्रस्तावित अध्यादेश लागू किया जा सकता है और उनके दस्तखत के बिना कौनसा विधेयक कानून बन सकता है याने केरल की विजयन सरकार झूठ-मूठ की नौटंकी में अपना समय बर्बाद कर रही है।
जहां तक उप-कुलपतियों का सवाल है, उनकी नियुक्तियाँ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग नियमों के अनुसार ही होनी चाहिए लेकिन उन नियमों का उल्लंघन करके आप अपने मनमाने उम्मीदवारों को चुन लें और फिर राज्यपाल से कहें कि वे आंख मींचकर उन पर मोहर लगा दें। राज्यपाल आरिफ खान ने इस मामले में दृढ़ता दिखाई है और ऐसे उप-कुलपतियों से इस्तीफे देने के लिए कहा है। आरिफ खान के इस दृष्टिकोण को भारत के सर्वोच्च न्यायालय और केरल के उच्च न्यायालय ने दो उप-कुलपतियों के मामलों में बिल्कुल सही ठहराया है।
उन्होंने कहा है कि यदि राज्यों के विश्वविद्यालयों को वि.वि.अ. आयोग की मान्यता और वित्तीय सहायता मिल रही है तो उन्हें नियुक्तियों में उसके नियमों का पालन करना अनिवार्य है। केरल के विश्वविद्यालयों और सरकारी दफ्तरों में सारे नियमों को ताक पर रखकर मार्क्सवादी पार्टी के समर्थकों और कार्यकर्ताओं और नेताओं के रिश्तेदारों को भरा जा रहा है। अदालतों ने मार्क्सवादी नेताओं की पत्नियों को दी गई कई बड़ी नौकरियों को गैर-कानूनी घोषित कर दिया है।
कई अपराधी पार्टी कार्यकर्ताओं को सरकारी नौकरियां पकड़ा दी गई हैं ताकि उनके सहारे वे कानून की वैतरणी पार कर जाएं और दो साल की नौकरी के बाद जीवनभर पेंशन के मजे लूटते रहें। केरल की माक्र्सवादी पार्टी में यह राजनीतिक भ्रष्टाचार तो उसका शिष्टाचार बन गया है, लेकिन राजनीतिक शिष्टाचार की सारी मर्यादाएं उसने भंग कर दी हैं।
2019 में कन्नूर के समारोह में राज्यपाल पर हमला करनेवाले पार्टी कार्यकर्ता को दंडित करना तो दूर रहा, मुख्यमंत्री ने उसे अपने निजी स्टाफ में नियुक्त करके उसे सुरक्षा-कवच प्रदान कर दिया है। मर्यादा-भंग का ऐसा ही काम एक मंत्री ने भी कर दिखाया है। मुख्यमंत्री विजयन को शायद अंदाज नहीं है कि यदि वे यही अतिवादी रवैया बनाए रखेंगे तो वे केरल में कहीं राष्ट्रपति शासन को आमंत्रित न कर डालें और उसके साथ-साथ मार्क्सवाद की मिट्टी भी कहीं पलीत न कर दें। (नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
संयुक्तराष्ट्र संघ की ताजा रपट के मुताबिक दुनिया की आबादी 8 अरब से भी ज्यादा हो गई है। पिछले 50 साल में दुनिया की जनसंख्या जितनी तेजी से बढ़ी है, पहले कभी नहीं बढ़ी। अभी तक यही समझा जा रहा था कि चीन दुनिया का सबसे बड़ी आबादी वाला देश है लेकिन भारत उसको भी मात करने वाला है। भारत में इधर बढ़े 17 करोड़ लोग उसे दुनिया का सबसे बड़ा देश बना देंगे।
ऐसा नहीं है कि भारत जनसंख्या के हिसाब से ही बहुत आगे बढ़ गया है। इस देश ने कई मामलों में सारी दुनिया से बेहतर उपलब्धियां भी हासिल की हैं। इस समय डिजिटल व्यवहार में वह दुनिया में सबसे आगे हैं। जहां तक प्रवासी भारतीयों का सवाल है, दुनिया के जितने अन्य देशों में भारतीय मूल के लेाग शीर्ष स्थानों पर पहुंचे हैं, दुनिया के किसी मुल्क के लोग नहीं पहुंच सके हैं। भारतीय मूल के लोग जिस देश में भी जाकर बसते हैं, वे हर क्षेत्र में आगे निकल जाते हैं।
वे अपने सभ्य और सुसंस्कृत आचरण के लिए सारे विश्व में जाने जाते हैं लेकिन दुनिया की बढ़ती हुई आबादी कई देशों के लिए तो खतरनाक सिद्ध हो ही रही है, वह भारत के लिए भी चिंता का विषय है। यदि आपके देश की या परिवार की आबादी बढ़ती चली जाए और उसकी जरूरतों की पूर्ति भी होती चली जाए तो कोई बात नहीं है लेकिन आबादी के साथ-साथ गरीबी और असमानता भी बढ़ती चली जाए तो वह समाज के लिए बोझ बन जाती है।
यों तो भारत में जनसंख्या की रफ्तार पिछले दशकों के मुकाबले थोड़ी कम हुई है लेकिन हमारे देश में अभी भी लगभग 100 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिनके लिए हम पर्याप्त भोजन, निवास, वस्त्र, शिक्षा, चिकित्सा और मनोरंजन की व्यवस्था नहीं कर पाए हैं। हमारी जनसंख्या-बढ़ोतरी का यह अच्छा पहलू है कि भारत में युवा लोगों का अनुपात वृद्धों के मुकाबले बेहतर है। दुनिया के मालदार देशों में दीर्घायु की सुविधाओं के कारण वृद्धों की संख्या कहीं ज्यादा है।
जनसंख्या के खतरे से निपटने के लिए भारत सरकार को दो बच्चोंवाले प्रतिबंध पर भी तुरंत विचार करना होगा। जनसंख्या की दृष्टि से भारत का फायदा उसके इस तेवर में भी है कि भारत से पढ़े-लिखे युवक बढिय़ा आमदनी की तलाश में विदेशों में जाकर अपना ठिकाना बना लेते हैं। लेकिन भारत चाहे तो अपने दक्षिण और मध्य एशिया के देशों में विकास का इतना बड़ा अभियान चला सकता है कि देश के कई करोड़ लोगों को वहां रोजगार मिल सकता है और वे वहां बस भी सकते हैं।
मध्य एशिया के पांचों देशों का क्षेत्रफल भारत से डेढ़ गुना है और उनकी आबादी मुश्किल से साढ़े सात करोड़ है। भारतीय लोगों को अगर उचित मार्गदर्शन और सुविधा मिले तो वे न केवल भारत की बढ़ती आबादी की समस्या हल कर सकते हैं बल्कि प्राचीन आर्यावर्त्त की अकूत संपदा का दोहन करके एशिया को यूरोप से भी आगे ले जा सकते हैं। (नया इंडिया की अनुमति से)
-Kavita Krishnan
(feminist activist)
Aftab must be tried, convicted and punished for murdering Shraddha, chopping up her body and covering up his crime. But that’s a job for police and prosecution. What can we, ordinary people shocked by this killing, do to bring change and prevent such violence faced by women? Here are six thoughts from me, about what needs to change in society to prevent such murders, and what each of us can and must do to help bring about such change.
Campaign For Timely Action Against Domestic Violence Before It Escalates To Murder : I’ve seen posts saying they fell in love, lived together and suddenly one day Aftab strangled her when she suggested they marry. The sad thing is, I’m sure this wasn’t sudden. Usually boyfriends/husband murder women after long periods of domestic violence. If only people reacted to domestic violence and took action to stop it, it could save women’s lives. Sadly domestic violence is largely seen as a “private matter”, a “lovers’ quarrel” and hardly anyone interferes. Moreover the woman’s own parents and natal family often discourage daughters from leaving an abusive marriage, telling her instead to adjust, or merely try to get the husband to behave better, because in Indian society, divorced women are stigmatised.
Demand That Govts Ensure Sustained, Non-Judgmental, Respectful Support, Help, Shelter For DV Victims: Far from “misusing” domestic violence laws, most women in fact avoid reporting domestic violence, because the nature of such violence is that it’s followed by displays of remorse; women truly believe the perpetrator loves them and won’t repeat the violence; and in the vast majority of cases the perpetrator makes the victim believe SHE is responsible for provoking violence in HIM. A pervasive culture of blaming women for violence done to them by men, contributes to this tendency in women to blame themselves for violence by men in their lives. In most cases, women will do almost anything to save a marriage, even when they approach feminist organisations or the police, it’s with the hope that the latter can somehow get the husband to stop being abusive and violent.
Stop Isolating Women In Inter Caste or InterFaith Relationships - In inter caste or inter faith love/marriage, it is even harder for women to seek help for domestic violence, because the woman’s family usually disowns her. Even though they merely disapprove of her relationship instead of disowning her, she hesitates to complain about her partner for fear it will confirm her family’s prejudices. By the way, I’ve known this exact same thing to happen even in love marriages where Hindu Brahmin women have loved and married Hindu Brahmin men - the fact that the woman’s parents didn’t really approve of “love marriage” made the woman hesitate to tell them her husband was alcoholic and the marriage increasingly toxic. Likewise women students hesitate to complain of sexual harassment or rape, for fear parents will curtail their education in the name of their daughters’ “safety”. If only parents and communities made it clear to women that.
Draw Attention To Intimate Partner Violence - That Is The Number One Killer of Women Worldwide And In India - Instead of Stranger Rape/Violence Alone - Women are more likely to be killed in their homes by their own loved ones than they are likely to be killed by strangers - the opposite is true of men.
a) In 2012, a UN study showed that of all women who were the victims of homicide globally, almost half were killed by intimate partners, compared to less than 6 percent of men killed similarly.
b) A study in Ireland found that 87 per cent of women who were murdered in Ireland over the last twenty years were killed by a man they knew; and 63 per cent were killed in their own homes.
c) In September 2014, a Delhi High Court bench, commenting on the large number of murders of women in their matrimonial homes, with the husband as the prime accused, said, “It appears that the married women in India are safer on the streets than in their matrimonial homes.”
What Can We Do To Help? - It shouldn’t even need saying that Shraddha must get justice, and Aftab, punishment for his horrific crime. But is it enough for Indians to just express disgust and anger for Aftab on social media? If we are to fight violence women face, we have to do much more:
a) We have to demand better help and government funding for way better helplines and welcoming shelters for women facing domestic violence. Right now, most helplines are struggling and facing cuts, shelters lack resources, Protection Officers under the PWGDVA (civil law to protect women from Domestic Violence) are overburdened with cases and lack training, refresher training, guidance and resources, and above all, many shelters tend to be run like prisons rather than like places where women can regain confidence and feel safe and cared for. We need to demand the state and central governments give the PWDVA teeth, and ensure all the resources and trained personnel necessary to support victims of DV.
b) We have to realise that many women in that situation will not opt for police intervention, and even if they leave the marital/shared home they are likely to return, many many times, before they actually make a complete break with the abusive partner. It’s our job as ordinary people (not a job to be left to feminist activists alone), to be there for victims of DV, to listen, to let them decide when and how much help they need rather than taking control away from them, and to offer help and intervention of the kind THEY chooses every single time that it’s needed, without ever shaming them for being unable to leave the abusive partner. It’s only if you offer non judgmental help that SHE can control, that the victim will call you every single time she’s in danger - and that may save her life.
c) We as a society have to do much more to support those in inter caste, inter faith, same sex, live-in, same gotra, and love marriages of all kinds - to prevent organised violence and harassment faced by men/same sex partners at the hands of the women’s family/parents and caste/community/political groups in collusion with the police; as well as to make sure that women or same sex partners in such relationships are not cut off from society and thus deprived of the chance to seek help in case they face violence and abuse.
d) We need to push back against media/social media campaigns that isolate a single case as though it were a stand-alone atrocity by an “inhuman” man, and instead make sure we connect the dots between the individual case and the larger pattern of gender-based and domestic violence, so that the individual case leads to broader social and political change that can prevent such violence in future.
6) Fight The Communal Bogey of Love Jehad Which Harms Women Victims Of Domestic And Sexual Violence - When Hindu-supremacist groups cherry-pick a case of violence against a Hindu woman by a Muslim partner and claim it’s proof of “love jehad” - ie a conspiracy where Muslim men prey on Hindu women in the name of love, they do great harm to the ongoing feminist struggles against gender-based violence. How so?
a) First, they are methodologically completely wrong. It’s only if statistics show that Muslim men abusing/killing Hindu women form a disproportionate part of the WHOLE picture of men abusing/killing women, that you can prove a pattern of Muslim male violence against Hindu women. And even that would not amount to “love jehad” which investigations by the police forces of multiple states over the years since
2009 have proved to be a lie.
b) By getting a vast number of Hindus to believe that Hindu women only face sexual/domestic violence at the hands of Muslim men, they are preventing Hindu women victims of domestic, intimate partner and sexual violence from being seen, heard, believed, and thus helped.
c) By falsely framing the problem as one of “Muslim violence against Hindu women”, their propaganda prevents people from recognising and addressing the real problem that Shraddha’s murder points to: that of rampant intimate partner violence faced by women in India and the world over.
किस्त-5
‘हिन्द स्वराज’ में गांधी भारत में आदर्ष राष्ट्र-राज्य स्थापित होने की अनुकूलता पाते हैं क्योंकि पश्चिम के विचारक भारत को इस तरह की अनुकूलता में नहीं पाते थे। गांधी ने लिखा, ‘जिन दीर्घद्रष्टा पुरुषों ने सेतुबन्ध रामेश्वरम् जगन्नाथ और हरिद्वार की यात्रा की, क्या आप जानते हैं, उनके मन में क्या विचार था? आप स्वीकार करेंगे कि वे लोग मूर्ख नहीं थे। वे जानते थे कि ईश्वर भजन तो घर बैठे हो जाता है। उन्होंने हमें सिखाया कि ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’। किन्तु उन्होंने विचार किया कि प्रकृति ने भारत को एक देश बनाया है तो उसे राष्ट्र भी होना चाहिए। इसलिए इन विभिन्न धामों की संस्थापना करने उन्होंने लोगों को एकता की ऐसी कल्पना दी जैसी दुनिया में दूसरी जगह नहीं है। दो अंग्रेज जितने एक नहीं हैं, हम भारतीय उतने एक थे और हैं। केवल हमारे और आपके मन में, जो ‘सभ्य’ हो गये हैं, यह आभास उत्पन्न हो गया है कि भारत में अलग अलग कौमें हैं।’
गांधी की धारणा थी धर्म तो शुरू से ही कर्तव्यों और आदेषों का पर्व रहा है। मजहबी आडंबरों और पुरोहितों ने निर्णायक हैसियतें बाद में अख्तियार कर लीं। गांधी के अनुसार वक्त आ गया है कि धर्म की परिभाषा, उद्देश्यों और संभावनाओं का परिष्कार किया जाए कि उसमें राजनीतिक-सामाजिक आजादी, आर्थिक बराबरी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, बंधुत्व और पारस्परिक सहयोग के तत्व भी गूंथे जा सकें। ‘हिन्द स्वराज’ में उन्होंने सीधी, सपाट, बेलाग और अविचल भाषा में अपने इन्हीं आदर्शों को पुनर्परिभाषित धर्म की उनकी व्याख्याओं के अनुसार परोसा है। गीता और रामायण गांधी के दो आदर्श ग्रंथ रहे हैं। गांधी के अनुसार ‘हिन्द स्वराज’ की भाषा भले ही राजनीतिक हो लेकिन उसका मूल मकसद धर्म-तत्व का विवेचन करना ही है। ‘हिन्द स्वराज’ को धर्म-संहिता अथवा रामराज्य का उपनाम/सहनाम भी समझा जा सकता है।
‘हिन्द स्वराज’ के अनुसार राजनीति सक्रिय जीवन की सबसे महत्वपूर्ण सहायिका हो सकती है। बशर्ते वह धर्म की उपयोगिता का परिष्कार करते उससे संपृक्त हो। इस संघर्ष बिन्दु पर गांधी नए भारत में राष्ट्रवाद की अपनी परिकल्पना इंजेक्ट करते हैं। वह पूरी तौर पर भारतीय नस्ल की नहीं भी है और है भी। गांधी नए सामाजिक धर्म को भारत में राष्ट्रवाद में ढल जाने की उम्मीद जगाते ‘हिन्द स्वराज’ में तर्कों की बीजगणित से पश्चिम को चुनौती देते हैं। वे एक साथ उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद, आधुनिकता और पदार्थवाद के खिलाफ हल्ला बोलते हैं। ‘हिन्द स्वराज’ की भाषा प्राथमिक, ग्रामीण और देसी किस्म का सोंधापन लिए हुए है। यह धोखा होता है कि यूरोप के राजनीतिक सदियों में पुष्ट, रूढ़ और आप्त हुए मानदंडों को उन्हें यह निरीह किताब किस तरह चुनौती देगी।
गांधी ने हिन्दू धर्म को उसकी कुरीतियों, रूढिय़ों और आडंबरों से मुक्त करने के प्रयत्न किए। ब्राह्मणवाद में अभिषाप धर्म की ही छाती पर उगाए गए। गांधी ने उनको चुनौती दी। उन्होंने आश्रम भजनावली के पदों में हिन्दू मतवाद के अतिरिक्त अन्य मजहबों का समावेश कर एक तरह का सेक्युलर-भारतधर्म विकसित किया, हालांकि वह बहुलांश में उदारवादी हिन्दू मान्यताओं से परे नहीं था। यह अलग बात है कि ईसाइयत के नैतिक मूल्यों का उस पर मुलम्मा चढ़ा भी दीखता था। कई लोग व्यंग्य में गांधी को ईसाई हिन्दू तक कह देते रहे हैं। राष्ट्रवादी मानसिकता के हिन्दुत्व का दक्षिणपंथी धड़ा गांधी की धर्म-थीसिस का समानांतर रचता रहा अब भी कायम है। पारंपरिक हिन्दुत्व के संरक्षकों और टीकाकारों के लिए यह जरूरी हो गया था कि गांधी की हत्या करें।
जो धर्म-गति गांधी की थी, वही दिक्कत जातीय समरसता को लेकर भी आती रही। सवर्ण हिन्दुओं और दलितों में सामाजिक समरसता कायम करने की गांधी की कोशिशें ऊपरी तौर पर स्वीकार होती रहीं। लेकिन जाति प्रथा की जड़ें इतनी अगम्य और गहरी हैं कि उन्हें नष्ट कर पाना गांधी के परे था। बीसवीं सदी में और कोई विकल्प भी नहीं था। जिन्ना और मुस्लिम राष्ट्रवाद को लेकर कठिनाई गांधी को हुई। वैसी ही अंबेडकर और उनके समर्थकों द्वारा बार बार गतिरोध पैदा करने के कारण होती रही। गांधी के विरोधी, विदेशों में कम और भारत में ज्यादा रहे। वे सत्ताविहीन व्यक्तियों की दुनिया के सबसे बड़े प्रवक्ता और जनसत्ता के व्यक्ति हैं। गांधी ने हाशिए पर खड़े व्यक्ति को राजनीति के केन्द्र में स्थापित कर दिया।
गांधी ने इस ‘हिन्द स्वराज’ में ‘धर्म’ शीर्षक से कोई परिच्छेद नहीं लिखा, हालांकि पूरे वर्णन में वह विस्तृत है। वे मजहबों को भी धर्म की परिभाषा में शामिल करते यही कहते हैं कि दुनिया के तमाम धर्म एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं। गांधी की धर्म-मीमांसा पश्चिम की ईसाईयत की मान्यताओं से अलग है। केवल ईश्वर में विश्वास रखना धार्मिक होने के लिए गांधी की परिभाषा में पर्याप्त रहा है। यह पश्चिम को स्वीकार नहीं रहा है। भारत में जातिवादी व्यवस्था के चलते धर्म को आक्टोपस की आठ भुजाओं की तरह जकडऩ का पर्याय बनाया गया। हिन्दू होकर जीना गरिमा का समानार्थी होने के बदले सामाजिक धर्म का उदाहरण बनाया गया। इसलिए धर्म परिवर्तन का एक विकल्प दिखाई पड़ा। लिहाजा हिन्दू साम्प्रदायिकों के लिए गांधी की नंगी छाती पर गोली मारना निर्विकल्प हो गया। हिन्दू-मुसलमान के बीच गांधी के रहते नफरत फैलाना संभव नहीं था। इसलिए गांधी का मरना तय किया गया। अफवाहें फैलाई गईं कि गांधी की वजह से पाकिस्तान को बत्तीस करोड़ रुपए दिए जा रहे हैं। यह भी कि हिन्दुओं की दंगों में हो रही मौतों के लिए गांधी जिम्मेदार हैं। यह भी कि गांधी की नपुंसकता की वजह से क्रांतिकारियों का इतिहास धूमिल किया जा रहा है। जो तत्व अंगरेजों के मुकाबले चूहों की तरह बिलों में दुबके रहे, गांधी की छाती को छलनी करने ‘राष्ट्रवादी’ कृत्य के लिए भाड़े के टट्टू ले आए।
सात दशक बीत गए हैं गांधी को गए हुए, लेकिन वे जाते नहीं हैं। देश में कोई बड़ी घटना, चुनाव या परिवर्तन मोहनदास करमचंद गांधी की याद के बगैर अंजाम नहीं पाते। गांधी पर किताबें लिखी गई हैं। विश्वविद्यालयों में शोध किए गए हैं। स्मरण पट्टिकाएं लगाई गई हैं। चुनाव घोषणापत्रों और कार्यक्रमों में उल्लेख किया गया है। तस्वीरें लगाई गई हैं। उतना नसीब और किसी जननेता का नहीं है। गांधी की तस्वीर एक साथ कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के दफ्तरों में कैसे लगाई जा सकती है?उनकी तस्वीर के नीचे बैठे न्यायाधीश घूस भी खा रहे और अंगरेजी भाषा की स्तुति भी कर रहे हैं। स्कूली पाठ्यक्रम से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं में गांधी एक महत्वपूर्ण प्रयोजन हैं, भले ही प्रयोजनहीन हों। गांधी इतिहास की किरकिरी हैं, जो उसकी आंख से निकल जाने के बाद भी आंख को मसलने के लिए मजबूर कर रही है। गांधी रक्तबीज की तरह हैं जिन्हें रोज ब रोज मारे बिना उनके जीते रहने का खतरा सत्ताधीशों के लिए बढ़ जाता है।
गांधी का हिन्दुत्व मनुवादी संस्कारों, वर्ण व्यवस्थाओं और धार्मिक अनुष्ठानों के खिलाफ जेहाद बोलने के बदले उनका आधुनिकीकरण और समायोजन करने के पक्ष में था। उन्होंने मन, वचन और कर्म सहित लेखन में जितनी बार ‘राम’ और ‘हिन्दू’ शब्द का इस्तेमाल किया है। उतनी बार संघ परिवार ने नहीं किया होगा। भारत से अंग्रेज को हटाने, खुद का बुखार उतारने, देश में फैली हिंसा को शांत करने और कंाग्रेस से जुड़े सभी जटिल मुद्दों को हल करने में गांधी राम नाम का प्रयोग करते थे। उनका राम अर्थशास्त्र का अध्यापक भी था। वह समाज के सबसे गरीब व्यक्ति की परिभाषा माल्थस या पार्किन्सन से कहीं आगे बढक़र करने, समझने के काम आता था। संविधान में घोषित लोकतंत्र की उद्देशिकाओं से ऐसे व्यक्तियों का कोई संबंध नहीं है। राम इस देश में लोकतंत्र के जनक हैं। लोकतंत्र का अक्स राम के अस्तित्व में ही समाया। राम हुए हों या नहीं हुए हों उनके मिथक का लोकतंत्रीय व्यक्तित्व सारी दुनिया में आज भी अप्रतिम है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत में कोई स्वेच्छा से अपना धर्म बदलना चाहे तो यह उसका मौलिक अधिकार है लेकिन मैं पूछता हूं कि ऐसे कितने लोगों को आपने कोई नया धर्म अपनाते हुए देखा है, जिन्होंने उस धर्म के मर्म को समझा है और उसे शुद्ध भाव से स्वीकार किया है? ऐसे लोगों की आप गणना करना चाहें तो उनमें महावीर, बुद्ध, ईसा, मुहम्मद, शंकराचार्य, गुरु नानक, महर्षि दयानंद जैसे महापुरूषों के नाम सर्वाधिक अग्रगण्य होंगे लेकिन दुनिया के लगभग 90 प्रतिशत लोग तो इसीलिए किसी पंथ या धर्म के अनुयायी बन जाते हैं, क्योंकि उनके माता-पिता उसे मानते थे।
सारी दुनिया में ऐसे 5-7 प्रतिशत लोग ढूंढना भी मुश्किल हैं, जो वेद, जिंदावस्ता, आगम ग्रंथ, त्रिपिटक, बाइबिल, कुरान या गुरूग्रंथ पढक़र हिंदू या पारसी या जैन या बौद्ध या ईसाई या मुसलमान या सिख बने हों। जो थोक में धर्म-परिवर्तन होता है, उसके लिए या तो विशेष परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं या फिर धर्म-परिवर्तन का कारण होता है- लालच, भय, जबर्दस्ती, ठगी, मजबूरी। ईसाइयत और इस्लाम का दुनिया में फैलाव ज्यादा करके इसी आधार पर हुआ है।
जिन्होंने पश्चिम एशिया और यूरोप का इतिहास ध्यान से पढ़ा है, उन्हें इन मजहबों की करुण कथा विस्तार से पता है। भारत जैसे प्राचीन राष्ट्रों में ज्यादातर धर्मांतरण डंडे या थैली या कुर्सी के जोर पर हुआ है, जैसा कि आजकल राजनीतिक दल-बदल होता है। इसी के विरुद्ध हमारे सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से पूछा है कि वह इस अनैतिक धर्मांतरण को रोकने के लिए क्या उपाय कर रही है? वास्तव में धर्मांतरण-विरोधी कानून तमिलनाडू, ओडिसा और म.प्र. की सरकारों ने बनाए हैं लेकिन इनमें और अन्य प्रदेशों में भी ढेरों संगठनों का बस एक ही काम है- लोगों को ईसाई और मुसलमान बनाओ।
उन्हें ये पादरी और मौलवी ईसा और मुहम्मद के सन्मार्गों पर चलने की उतनी सीख नहीं देते, जितनी अपना संख्या-बल बढ़ाने पर देते हैं। वे धर्म का नहीं, राजनीति का रास्ता पकड़े हुए हैं। यह वही रास्ता है, जो मुस्लिम बादशाहों और अंग्रेज शासकों ने अपने जमाने में भारत में चला रखा था। इसीलिए गांधीजी ने 1935 में कहा था कि ‘‘अगर मैं कानून बना सकूं तो मैं धर्मांतरण पर निश्चित ही रोक लगा दूंगा।’’
यदि कोई अपने धर्म के सिद्धांतों का प्रचार करना चाहे तो उसको उसकी पूरी छूट होनी चाहिए, जैसे कि 100 साल पहले तक भारत में विद्वानों के बीच खुलकर शास्त्रार्थ हुआ करते थे लेकिन आजकल धर्म की चर्चा सिर्फ आदिवासियों, गरीबों, पिछड़ों, ग्रामीणों और दलितों के बीच ही होती है, क्योंकि उन्हें ठगना, बेवकूफ बनाना और लालच में फंसाना आसान होता है।
यह धर्म की सेवा नहीं, अधर्म का विस्तार है। इस पर केंद्र सरकार जितनी सख्ती और जल्दी से रोक लगाए उतना अच्छा है। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि हमारे नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता पर किसी भी तरह का प्रतिबंध उचित होगा लेकिन धर्मांतरण की स्वतंत्रता के नाम पर अधर्म की गुलामी को क्यों चलने दिया जाए? (नया इंडिया की अनुमति से)
-राजेश अग्रवाल
आरक्षण पर झारखंड में आज बिल पास हो गया। कुल मिलाकर 77त्न लोगों को उनकी जाति के हिसाब से सरकारी नौकरियां मिलेंगी। छत्तीसगढ़ में 1 और 2 दिसंबर को इसी विषय पर एक विधानसभा सत्र होने वाला है। छत्तीसगढ़ में भी यह पास हो जाने वाला है, क्योंकि यह सभी दलों की चिंता है। सभी दलों को लगता है कि हम ही उनके हितेषी हैं, जिनकी संख्या ज्यादा है।
आरक्षण की मौजूदा पद्धति से सहमत होना मुश्किल है। ऐसी व्यवस्था बराबरी पर हम सबको कभी नहीं ला पाएगी, 200 साल दे दो तब भी।
मेरे अनेक मित्र हैं जिन्होंने इसी आरक्षण का फायदा लेते हुए अपने परिवार को छोडक़र ज्यादा कुछ नहीं सोचा है। कई ऐसे मित्र भी हैं जिन्होंने नौकरी नहीं की और व्यवसाय में मिली छूट का फायदा लिया। आज वे बहुत बेहतर जगह पर हैं और बहुत संपत्ति उनके पास है। प्रतिष्ठित कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति होती है। ऐसे मित्रों को सलाम करता हूं, क्योंकि उन्होंने अपने लिए मिली विशेष सुविधा का लाभ तो लिया, साथ में अपनी मेहनत भी लगा दी।
यदि हम किसी भी प्रावधान, कानून या निर्णय की समय-समय पर समीक्षा नहीं करते हैं तो यह अच्छी बात नहीं है, कूप मंडूक कहे जाएंगे। अब तक समझ में नहीं आया कि जिन लोगों को आरक्षण का लाभ लिया, उन्होंनेखुद अपने समाज का कितना भला किया? बहुत खराब अनुभव सामने आएंगे। अफसर बनने के बाद उन्होंने खुद अपनी ही बिरादरी के लोगों से मिलना-जुलना और उनका आदर करना बंद कर दिया। कई उदाहरण मेरे सामने हैं।
विनम्रता से कहूं तो इस बारे में मुझसे कोई सवाल मत करें। आधी रात को भी मैं आरक्षित कहे जाने वाले वर्ग के अपने प्राइमरी स्कूल वाले मित्रों को घर में दरवाजा खोल कर बैठाता, सुलाता, खिलाता हूं। इन्होंने इतना ही किया कि अपने बेटी-बेटे की नौकरियां लगा दी। और इन बेटे-बेटियों को भी अपने ही बच्चों के लिए लाभ पाने का रास्ता पता है।
कुछ साल पहले की बात है। रिजर्व कोटे से नियुक्त एक बड़े शिक्षा अधिकारी का बड़ा भाई घोड़े की नाल ठोक कर दयनीय स्थिति में अपना गुजारा कर रहा था। अगर शिक्षा अधिकारी अपनी सैलरी से 10 फीसदी भी दे देता तो उसकी हालत अच्छी हो सकती थी। उसे अपनी बेटी की शादी करनी थी। मैंने कहा उसकी मदद करो। उसने बताया, मेरा कई साल से संपर्क नहीं है। उसने मेरी पढ़ाई में जो मदद की थी, उसका कई गुना में लोटा चुका हूं।
मौजूदा आरक्षण व्यवस्था के समर्थकों की ओर से एक और विचार चलता है कि यह सिर्फ सरकारी नौकरी और आमदनी का मसला नहीं, समाज में बराबर सम्मान हासिल करने का है। यह बात भी गलत है। मैंने दर्जनों बार देखा है कि आर्थिक रूप से सक्षम लोगों की शादी ब्याह वाली पार्टियों में बहुत भीड़ पहुंची है और कई बच्चों युवाओं ने तो आयोजक के पैर भी हुए हैं। इस बात की परवाह किए बगैर कि हम श्रेष्ठ वर्ण से आते हैं।
सामान्य वर्ग का वह युवा जो जानता ही नहीं है कि आपके साथ उसके पूर्वजों ने क्या अत्याचार किए, उनके मन में रोष है। वह आरक्षण से पद हासिल करने वालों के बारे में कैसे सद्भाव रख सकता है?
आज जब छत्तीसगढ़ और झारखंड में विभिन्न पिछड़े समुदायों को अधिक आरक्षण देने की मांग पर सरकारें परेशान हैं तब उन्हें डेटा एकत्र करके कोर्ट में प्रस्तुत करना पड़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी 10 फीसदी आरक्षण को जायज बताते हुए कहा है कि आरक्षण की मौजूदा पद्धति सही नहीं है, खत्म करना चाहिए।
संविधान मे प्रावधान करने के दौरान हमारे पास ऐसा कोई आंकड़ा नहीं था कि कितने प्रतिशत लोगों के साथ कितने लोगों ने अत्याचार किया और कितने प्रतिशत लोगों को इस आधार पर आरक्षण देना चाहिए।
आज भी कुछ उदाहरण जरूर आते हैं, जब पिछड़ों और दलितों को अपमानित किया जाता है। इसे देश भर की मानसिकता के रूप में प्रस्तुत करना एक राजनीतिक गतिविधि हैं।
नई पीढ़ी के कॉलेज गोइंग बच्चों से पूछें। उन्हें पता ही नहीं है कि वह सवर्ण है या नहीं, बगल में बैठे बच्चे के बारे में समझाना पड़ेगा कि वह दलित है, तुम ज्यादा मेहनत करोगे तब भी उसे आगे ज्यादा मौका मिलने वाला हैं। उनको बस पढ़ाई लिखाई के बाद एक अच्छे ब्रेक की जरूरत है। जो अच्छे कॉलेज मैं नहीं पढ़ पाते हैं उनको भी रोजी-रोटी की चिंता है। इस दौर में असल सवाल आर्थिकी का है। आज सामान्य वर्ग के युवाओं को जब विफलता मिलती है तब पता चलता है कि कोई एक आरक्षण व्यवस्था की गई है जिसके चलते उसे मौका नहीं मिल रहा है। वंचित वर्ग को मौका देने की कोई दूसरी व्यवस्था बनानी चाहिए। मौजूदा स्वार्थपूर्ण राजनीति के लिए देश की छवि दुनिया में खराब हो रही है।
किस्त-4
‘हिन्द स्वराज’ का एक महत्वपूर्ण संदेश अहिंसा का है। दरअसल पुस्तक हिंसावादियों और अराजकता समर्थकों को आश्वस्त नहीं कर पाने की असफलता से खिन्न होकर गांधी ने लिखी थी। ‘हिन्द स्वराज’ उन्हीं तत्वों और व्यक्तियों से गांधी की बहस का निरंतर सिलसिला भी है। पाठक की भूमिका में वे सारे तर्क, विचार और लोग हैं जिनसे गांधी वर्षों तक जूझते रहे। अहिंसा को गांधी का समर्थन राजनीतिक फलसफा भर नहीं था। यह उनकी मूल बनावट से आया था। जीवन के प्रति औसत भारतीय आध्यात्मिक ही होता है। बचपन से ही नीतिबोध की कथाओं से गांधी को संवारा गया। उनके केन्द्रीय तत्व गांधी में औसत हिन्दुस्तानी के लक्षण बनकर उभरते रहे। उन्होंने एक राजपुत्र या जननेता के हठ को भी जोड़ा कि चाहे कुछ हो जाए, अहिंसा के मार्ग से विरत हो जाने का कोई सवाल नहीं है। चुनौतियां व्यक्तिगत स्तर से उठकर पूरे देश के सामने खड़ी हो जाएं तब भी उनका उत्तर देना गांधी की थ्योरी के अनुसार अहिंसक रूप में संभव रहा है। शर्त है कि प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा अहिंसा की आभा से आलोकित होती रहे।
गांधी की असफलताओं की भी लंबी चौड़ी फेहरिस्त है। वे पूरी जिंदगी यह अफसोस भी सचेत बयानों में करते रहे कि लोगों ने उनकी बात नहीं मानी। ‘लोगों‘ से उनका संकेत और आशय सत्ता की चौकड़ी से था। उन्हें एक बात का संतोष था कि सामाजिक अहिंसा का अनोखा और लगभग मौलिक प्रयोग हिन्दुस्तान में अपनी आजादी की जद्दोजहद में उनके समझाने से जरूर हुआ है। कई मौकों पर जहां हिंसा हो सकती थी, वहां फकत गांधी के कई बार अनशन के भी कारण अहिंसा का वैकल्पिक प्रयोग हिन्दुस्तान ने किया। वेस्टमिन्स्टर पद्धति की संसद और प्रशासन व्यवस्था भारत में आई। उसे अलबत्ता गांधी रोक नहीं पाए। तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में उसका रोका जाना संभव नहीं था।
यह समझना भी गलत है कि गांधी अहिंसा के अतिवादी पुजारी थे। 1942 में मौलाना आजाद ने इशारा किया था। ‘जब आखिरी इंकलाब या क्रांति करते हो और अंग्रेज जब पकडक़र जेल ले जाने लगे, तो मत जाओ। जेल के कानून को मत मानो और उपवास करो।’ अपनी बात को तेज बनाने के लिए उन्होंने यहाँ तक कहा था कि जेल की दीवार से सिर टकरा-टकरा कर मर जाओ लेकिन गलत बात मत मानो, अन्याय के आगे मत झुको। गांधी अन्याय का विरोध करने की अहिंसक राष्ट्रीय आदत बनाने के पक्षधर थे। हिंसक राष्ट्रीय आदत संभव है, लेकिन हर वक्त उतनी भौतिक ताकत कहाँ होगी? एक दूसरे अवसर पर गांधी ने कहा था कि मुझे सत्य और अहिंसा में से एक चुनना पड़े तो मैं सत्य को चुनूँगा। अहिंसा का आदर्श गांधी का मौलिक योगदान नहीं था। उपनिषदों, भगवान बुद्ध और चौबीसों जैन तीर्थंकरों ने सामाजिक जीवन में अहिंसा पर जोर दिया है। चीन के लाओ त्से, ईसा, कुरान शरीफ की कई आयतों और तॉल्स्तॉय के जीवन दर्शन में भी अहिंसा है। बापू के लेखे ऐटम से आत्मा की आवाज बड़ी है और रहेगी। अमेरिकी विचारक थोरो की सिविल नाफरमानी का मतलब है मामूली इंसान का मामूली वीरता से काम चलाना। सिविल नाफरमानी नया इंसान पैदा करती है जो जालिम के सामने घुटने नहीं टेकता लेकिन साथ ही उसकी गर्दन भी नहीं काटता।
गांधी चाहते तो लोकप्रियता के आधार पर हिंसक आंदोलनों को अंजाम दे सकते थे। गोलीकाण्ड करवाते। धार्मिक उपासना स्थल ढहा देते और कथित अराजकता के बावजूद अपनी सम्पूर्ण शैली पर दार्शनिकता का मुलम्मा चढ़ा देते। कुछ लोग आज यही कुुचक्र करने का प्रयास कर रहे हैं। गांधी के कर्म-संसार में शरीर एक पूरक आवश्यकता के रूप में उपस्थित होकर दिखाई पड़ता है। बापू आत्मा के लुहारखाने के कारीगर थे। सांसों की धौंकनी चलाकर वे हर आदमी के अन्दर देखना चाहते थे, उसमें आत्मा ही आत्मा से सरोकार था। गरीब के मन से हीनता, और अमीर के मन से अहंकार निकालकर जीवन को गांधी ने संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण से अलग हटकर समास बनाया था। वे आत्मबल के आधार पर उत्फुल्ल होकर जी रहे थे मौत उनके लिए एक छोटी मोटी चोट, खिलवाड़ या सामान्य दुर्घटना थी। उनकी छाती पर गोलियां लगने के बाद भी उनके शरीर का पूरा फ्रेम आत्मा के कब्जे में होने कारण विचलित, आशंकित या बदहवास नहीं हुआ। उन्होंने शान्तिपूर्वक ‘हे राम‘ का उच्चारण किया।
आज के जलते सवाल का संभावित उत्तर, वक्त की दीवार पर महात्मा ने दशकों पहले लिख दिया था। उनका कहना था जब तक अहिंसा के लिए जगह न हो, कायरों को सांप्रदायिक दंगों से बचाया नहीं जा सकता। गांधी ने खुद को दंगों के संदर्भ में लाचार पाया था। अपनी लाचारी की हालत में वे ईश्वर के दरबार में प्रार्थना करने लगते थे। उन्होंने दोनों समुदायों के बुद्धिजीवियों में गहरा भरोसा किया था। ऐसा होता है, तो पारस्परिक अहिंसा का रास्ता खुलता है। गांधी का दावा था कि किसी भी सभ्य समाज में कायरों के लिए कोई जगह नहीं है। स्वराज्य कायरों के लिए नहीं होता। बीसवीं सदी के तीसरे दशक की राजनीतिक पृष्ठभूमि में संघ परिवार सांप्रदायिक दंगों में मषगूल रहा होगा। उसकी भूमिका अंग्रेजोंं को सुहाती थी। क्या देश के अंदर और बाहर सांप्रदायिक और आतंकवादी गतिविधियां इसलिए जारी हैं जिससे कभी न कभी भारतीय लोकतंत्र हिंसा की चपेट में आकर रिरियाने लगे? नरेन्द्र मोदी राजधर्म सिखाते हैं और बिना मांगे अमेरिका के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। वे गांधी को भी जानने का दावा करते हैं जो गांधी जीवन भर उस विचारधारा की मुखालफत करते रहे। महान हिन्दू कौम को गांधी ने कभी कायर नहीं कहा और न ही उनकी दृष्टि में मुसलमान कभी अराजक बने। यही वक्त है जब गांधी को नफरत की आंधी के मुकाबले चट्टानी दीवार बनाया जाये।
भारत में हालिया हुआ किसान आंदोलन याद रखा जाएगा। वह अवाम के एक अंश का आजादी के आन्दोलन के बाद सबसे बड़ा जनघोष हुआ। उसमें सैकड़ों किसानों की मौतें हो चुकीं। वह लाखों करोड़ों दिलों का स्पंदन गायन बना। कहां विवरण है कि किसानों की लाठियों या अन्य हथियारों से पुलिस या नागरिकों की कितनी मौतें हुई हैं? जाहिर है कई पुलिस वालों को काफी चोटें लगी। कई किसानों को भी पुलिसिया दमनात्मक कार्रवाई का शिकार होना पड़ा। इसीलिए महात्मा गांधी ने अंगरेजी सल्तनत के मुकाबले अहिंसा को खड़ा किया। उन्होंने अंगरेज की हत्या करने के बदले भारतीयों के प्राण उत्सर्ग करने की अपील की। सामाजिक अहिंसा से संसार की सबसे बड़ी ताकत को भारत से रुखसत होना पड़ा था।
नेताओं की भाषा हिंसा भडक़ाने उत्प्रेरक है। नरेन्द्र मोदी श्मशान और कब्रिस्तान का संदर्भ उठाते हैं। वोटों के लिए सद्भाव का भी धु्रवीकरण होने लगता है। खून के सौदागर जैसा जुमला विरोधी चस्पा करते हैं। गधा नाम के शब्द का व्यंग्य और कटाक्ष में अनावश्यक रूप से बार बार इस्तेमाल करते हैं। कई सांसद, विधायक और मंत्री गाली गलौज, बदतमीजी, अश्लीलता और असंसदीय भाषा के बगैर गंभीर बातें भी बोलना नहीं चाहते। दूसरों को सहिष्णुता का पाठ सिखाने वाले तस्लीमा नसरीन के मामले में कठमुल्ला और संकीर्ण हो जाते हैं। गोविंद पानसरे, नरेन्द्र दाभोलकर और प्रोफेसर कलबुर्गी की हत्याओं के पीछे खास विचारधारा को दोषी ठहराया जाता है। वेलेन्टाइन डे की आड़ में कर्नाटक की श्रीराम सेने परंपराओं की आड़ में गुंडागर्दी करने से परहेज नहीं करतीं।
गांधी की अहिंसा पर लौटते कुछ बुनियादी बातों को समझना होगा। गांधी ने कभी नहीं कहा अहिंसा उनका अकेला हथियार है। उन्होंने अपनी किताब का नाम अहिंसा के साथ मेरे प्रयोग नहीं लिखा। उसे ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ कहा था। कहा था सत्य और अहिंसा में अगर छोडऩा पड़े तो सत्य को नहीं छोडंूगा। अहिंसा को छोड़ दूंगा। कहा था अहिंसा कायरों का हथियार नहीं है। वह आत्मा के बहादुरों का हथियार है। कहा था कि अगर हर मजबूरी के चलते अहिंसा साथ नहीं दे रही है, तो जनता के हक में जनकल्याणकारी फैसलों के लिए हिंसा का आनुपातिक, यथार्थपरक और वांछितता के साथ सहारा लिया जा सकता है। इसी विचार को भारतीय प्राचीन मनीषा में धर्म के साथ आपद् धर्म कहा गया है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
इस सप्ताह दो महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हो रहे हैं। एक कंपूचिया के नोम पेन्ह में और दूसरा इंडोनेशिया के शहर बाली में! पहले सम्मेलन में ‘एसियान’ संगठन के सदस्य-राष्ट्रों का 17 वां शिखर सम्मेलन संपन्न हुआ और अब बाली में आजकल 20 राष्ट्रों के ‘ग्रुप-20’ संगठन का शिखर सम्मेलन हो रहा है। पहले सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने किया और अब बाली के सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद जा रहे हैं।
दोनों सम्मेलनों में विदेश मंत्री जयशंकर भी भाग ले रहे हैं और वे शिखर-वार्ता के लिए जमीनी तैयारी कर रहे हैं। पहले सम्मेलन में तो अमेरिका से प्रभावित पूर्व एशियाई राष्ट्रों ने चीनी विस्तारवाद के विरुद्ध अपनी चिंता पर सबसे ज्यादा जोर दिया। यद्यपि सभी राष्ट्रों के प्रतिनिधियों ने आपसी सहयोग के कई आयामों पर विस्तृत चर्चा भी की लेकिन उनकी परेशानी यह थी कि दक्षिण चीनी समुद्र में चीन ने उसके सभी पड़ौसी देशों के जल-क्षेत्रों पर अपना कब्जा जमा लिया है।
उसने ताइवान, फिलिपीन्स, ब्रुनेई, मलेशिया और वियतनाम के जल-क्षेत्रों में कृत्रिम द्वीप खड़े कर लिये हैं और सैनिक अड्डे बना लिये हैं। इन देशों के शिखर सम्मेलन में भारत के उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का प्रभावशाली भाषण तो हुआ ही, कंपूचिया के साथ चार समझौते भी हुए लेकिन अब जो सम्मेलन बाली में अभी हो रहा है, उसका स्वर न तो चीन-विरोधी हो सकता है और न ही रूस-विरोधी! क्योंकि ये दोनों राष्ट्र जी-20 के महत्वपूर्ण सदस्य हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन, इंडोनेशिया पहुंच चुके हैं और चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग से मिलने वाले भी हैं। वे पहले ही कह चुके हैं कि अमेरिका की चीन से कोई दुश्मनी नहीं है। उसके साथ वे सार्थक संवाद जारी रखेंगे। लेकिन यूक्रेन के मसले पर अमेरिका और उसके कई साथी राष्ट्र रूस की भर्त्सना किए बिना नहीं रहेंगे। शायद इसी डर के मारे रूस के राष्ट्रपति पूतिन बाली नहीं गए हैं। इस शिखर सम्मेलन के संयुक्त वक्तव्य को लेकर कई देशों के कूटनीतिज्ञ अपना दिमाग भिड़ाए हुए हैं।
इस मुद्दे पर भारत को अपने कदम फूंक-फूंककर रखने होंगे, क्योंकि इस नए वर्ष में भारत ही इस विशाल संगठन का अध्यक्ष रहने वाला है। उसकी विदेश नीति अभी तक बहुत ही संतुलित और व्यावहारिक रही है। मोदी और शी चाहें तो इस मौके पर एक-दूसरे से मिल भी सकते हैं, जैसे कि बाइडन और शी भी मिल रहे हैं। जी-20 इस वर्ष यदि पर्यावरण शुद्धि, परमाणु निरस्त्रीकरण, आर्थिक पुनरोदय आदि विश्व व्यापी मुद्दों पर कुछ ठोस फैसले कर सके तो भारत की अध्यक्षता एतिहासिक सिद्ध हो जाएगी। (नया इंडिया की अनुमति से)
किस्त-3
प्रस्तावना
इस विषय पर मैंने जो बीस अध्याय लिखे हैं, उन्हें पाठकों के सामने रखने की मैं हिम्मत करता हूं।
जब मुझसे रहा ही नहीं गया तभी मैंने यह लिखा है। बहुत पढ़ा, बहुत सोचा। विलायत में ट्रान्सवाल डेप्युटेशन के साथ मैं चार माह रहा। उस बीच हो सका उतने हिन्दुस्तानियों के साथ मैंने सोच-विचार किया। हो सका उतने अंग्रेजों से भी मैं मिला। अपने जो विचार मुझे आखिरी मालूम हुए। उन्हें पाठकों के सामने रखना मैंने अपना फर्ज समझा।
‘इण्डियन ओपिनियन’ के गुजराती ग्राहक आठ सौ के करीब हैं। हर ग्राहक के पीछे कम से कम दस आदमी दिलचस्पी से यह अखबार पढ़ते हैं। ऐसा मैंने महसूस किया है। जो गुजराती नहीं जानते, वे दूसरों से पढ़वाते हैं। इन भाइयों ने हिन्दुस्तान की हालत के बारे में मुझसे बहुत सवाल किये हैं। ऐसे ही सवाल मुझसे विलायत में किये गये थे। इसलिए मुझे लगा कि जो विचार मैंने यों खानगी में बताये, उन्हें सबके सामने रखना गलत नहीं होगा।
जो विचार यहां रखे गये हैं, वे मेरे हैं और मेरे नहीं भी हैं। वे मेरे हैं, क्योंकि उनके मुताबिक बरतने की मैं उम्मीद रखता हूं; वे मेरी आत्मा मेंं गढ़े-जड़े हुए जैसे हैं। वे मेरे नहीं हैं, क्योंकि सिर्फ मैंने ही उन्हें सोचा हो सो बात नहीं। कुछ किताबें पढऩे के बाद वे बने हैं। दिल में भीतर ही भीतर मैं जो महसूस करता था, उसका इन किताबों ने समर्थन किया।
यह साबित करने की जरूरत नहीं कि जो विचार मैं पाठकों के सामने रखता हूं, वे हिन्दुस्तान में जिन पर (पश्चिमी) सभ्यता की धुन सवार नहीं हुई है ऐसे बहुतेरे हिन्दुस्तानियों के हैं। लेकिन यही विचार यूरोप के हजारों लोगों के हैं, यह मैं अपने पाठकों के मन में अपने सबूतों से ही जंचाना चाहता हूं। जिसे इसकी खोज करनी हो, जिसे ऐसी फुर्सत हो, वह आदमी वे किताबें देख सकता है। अपनी फुर्सत से उन किताबों में से कुछ न कुछ पाठकों के सामने रखने की मेरी उम्मीद है।
‘इण्डियन ओपिनियन’ के पाठकों या औरों के मन में मेरे लेख पढक़र जो विचार आयें, उन्हें अगर वे मुझे बतायेंगे तो मैं उनका आभारी रहूंगा।
उद्देश्य सिर्फ देश की सेवा करने का और सत्य की खोज करने का और उसके मुताबिक बरतने का है। इसलिए अगर मेरे विचार गलत साबित हों, तो उन्हें पकड़ रखने का मेरा आग्रह नहीं है। अगर वे सच साबित हों तो दूसरे लोग भी उनके मुताबिक बरतें, ऐसी देश के भले के लिए साधारण तौर पर मेरी भावना रहेगी।
सुभीते के लिए लेखों को पाठक और संपादक के बीच के संवाद का रूप दिया गया है।
किलडोनन कैसल,
मोहनदास करमचंद गांधी
22-11-1909
स्वराज का गांधी अर्थ चर्चा, शोध और विवाद का भी विषय रहा है। अंगरेजी शब्द ‘इंडिपेंडेंस’ का अनुवाद स्वतंत्र, स्वाधीन, स्वराजी और आजादी जैसे शब्दों में होता रहता है। इसी तरह ‘डेमोक्रेसी’ का अनुवाद भी प्रजातंत्र, लोकतंत्र, लोकशाही या जनतंत्र जैसे अनुवादों में किया जाता है। यह कहना मुमकिन है कि गांधी की समझ ने ‘स्वराजी’ और ‘प्रजातंत्र’ जैसे शब्दों का ज्यादा इस्तेमाल किया। अंगरेजी शासन से मुक्ति के बाद भारत ‘इंडिपेंडेंट’ तो हुआ है। उसने ‘डेमोक्रेसी’ की स्थापना भी की है। ‘प्रजा’ शब्द से गांधी का आशय प्राचीन, सामंती लेकिन परंपरापोषित भारतीय सांस्कृतिक समाज से रहा है। वह धर्म और संस्कृति के सहारे ही एक तरह की समग्रता में जीता रहा है। वे नए भारत का सपना उसके साभ्यतिक बल्कि सांस्कृतिक समास में ढूंढते रहे थे। गांधी के लिए ‘स्वराज’ षब्द पहला राजनीतिक आजादी या इंडिपेंडेंस के अर्थ में। दूसरा हर व्यक्ति की खुद को आत्मनियंत्रित करती अपनी निजी आजादी के अर्थ में। गांधी का स्व एकल नहीं, वह स्व का गुणक अर्थात ‘बहुल’ है। वह एक रचा गया समाज-संसार है। फकत यूटोपिया नहीं है। गांधी मनुष्य की अपरिमित शक्तियों और मूल्यों की सार्थकता तलाश करती संभावनाओंं के अंतरिक्ष के (अपने वक्त और अब भी) सबसे प्रमुख एस्ट्रोनॉट हैं।
‘हिन्द स्वराज’ में गांधी ने संसदीय प्रणाली की बड़ी फजीहत की है। अंग्रेजी पार्लियामेंट को ध्यान में रखकर गांधी ने यहाँ तक कहा था कि संसदीय पद्धति बांझ और बेसवा की तरह है। गांधी का तर्क था कि पार्लियामेंट कानूनों को तो जन्म दे सकती है, लेकिन वह संवेदना, करुणा और लोक कल्याण का प्रजनन नहीं कर सकती। संसद पाँच वर्षों तक फूहड़ बेशर्मी के साथ मतदाताओं का अपमान करते हैं। मतदाता भी इनका चुनाव मुख्यत: समाचार पत्रों को पढक़र सामूहिक राय के आधार पर करते हैं समाचार पत्र वास्तविक जीवन का न तो प्रतिनिधित्व करते हैं और न ही वे उसका प्रतिबिम्ब हैं। बौद्धिक षडय़ंत्र के तहत मत कबाडक़र जीती गयी संसद बांझ प्रक्रिया की हिस्सेदार है। सत्ताधारी दल का नेता अपनी सुविधा के अनुसार संसदीय कार्य का संचालन करता है। इससे सामूहिक प्रतिनिधित्व की भावना का मखौल उड़ता है। इंग्लैंड की आज की स्थिति सचमुच दयनीय है। और मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वैसी स्थिति भारत की कभी न हो। जिसे आप पार्लियामेंटों की माता कहते हैं, वह पार्लियामेंट तो वन्ध्या है और वेश्या है। ये दोनों शब्द कड़े हैं, फिर भी ठीक से लागू होते हैं। मैंने वन्ध्या कहा, क्योंकि अब तक पार्लियामेंट ने आपने-आप एक भी अच्छा काम नहीं किया। उसकी स्वाभाविक स्थिति ऐसी है कि यदि कोई उस पर जोर डालने वाला न हो तो वह कुछ भी न करे। और वह वेश्या है, क्योंकि मंत्रिमंडल उसे रखता है वह उसके पास रहती है। आज उसका धनी एस्क्विथ है, तो कल बॉलफर और परसों कोई तीसरा।’
जो बात गांधी ने 1909 में तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत और संसदीय प्रणाली के सन्दर्भ में कही थी, वह बात उसी वेस्टमिन्स्टर संसदीय प्रणाली की नकल करने वाली भारतीय संसद पर भी लागू क्यों नहीं हो सकती? संसदीय कर्म और कौशल को दूरदर्शन पर देखकर मतदाताओं का सिर आत्मग्लानि से झुक जाता है कि उन्होंने अपने मतों का उपयोग क्यों किया। उन्होंने यह भी माना कि उनकी निगाह में स्वराज्य की जो मुमकिन तस्वीर है, वैसा हिन्दुस्तान बनाने की फिलहाल वे कोशिश नहीं कर रहे हैं। उन्होंने यह भी माना कि हिन्दुस्तान अभी उसके लिए तैयार नहीं है। अलबत्ता गांधी की अपनी निजी कोशिश जरूर चल रही है। महात्मा गांधी ने एक राजनीतिक विचारक के रूप में सत्याग्रह, सर्वोदय, अहिंसा और स्वराज संबंधी कई राजनीतिक थ्योरियां नवोन्मेशित की हैं। ‘हिन्द स्वराज’ में इन सबका उद्गम है। भारत को मिल सकने वाले स्वराज का खाका गांधी ने पहली और आखिरी बार इसी पुस्तक में खींचा था। गांधी की यह अवधारणा इतिहास में किस तरह दुर्घटनाग्रस्त हुई इसका ठीकरा महत्वाकांक्षी और सत्ताभिमुख कांग्रेस नेतृत्व पर फूटना चाहिए अथवा हालात ही इस तरह हो गए थे कि भारत के लिए विभाजन और अंगरेजी शासन पद्धति को स्वीकार करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा था?
गांधी केवल विचारक नहीं थे। वे देश के लिए माक्र्स भी थे और लेनिन भी। वे महापुरुषों की उस श्रेणी में हैं जिनसे परम्परा की पुनर्रचना और नवनिर्माण होता है और जिनसे संस्कृति आत्मबल पाती है। 1946 के हरिजन में उन्होंने यहां तक लिख दिया कि अब तो केवल एक ही जाति हो जिसका नाम भंगी हो और वह एक सुधारक जाति के रूप में व्याख्यायित हो। गांधी की समता और बराबरी की समझ आधुनिक औद्योगिक समाज के लिए विकसित और लागू करना संभव नहीं है। गांधी जानते थे असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि में देश को सकारात्मक कार्यक्रम से लबरेज करना ज्यादा आवश्यक है। उन्होंने अपने केन्द्रीय अभियान में असहयोग की भावना को पुख्ता करने उसके साथ साम्प्रदायिक सद्भाव, अस्पृश्यता उन्मूलन, खादी और हथकरघा, स्वदेषी ग्रामोद्योग, ग्राम विकास, राष्ट्रीय शिक्षा, मद्यनिषेध और पंचायतों का गठन जैसे मुद्दे जोड़ रखे थे। गांधी की रणनीतिक कुशलता रही कि चंपारण और खेदा जैसे आंदोलनों में प्राण फूंकने के वक्त भी गांधी ने केवल उग्र आक्रामक और प्रतिषोधी हथियारों से लडऩा जनमानस को नहीं सिखाया। दुनिया के किसी भी जननेता से पहले उन्होंने हर मनुष्य को खुद सुधरने का आह्वान किया। ताकि वह जनयुद्ध का प्रतीक समझा जाए।
लोकतंत्र का प्राणतत्व लोकमत या जनमत है। जनमत अमूमन अल्पशिक्षित, अफवाहग्रस्त और भीड़तंत्र की मानसिकता लिए हुए होता है। शिक्षा के अभाव के कारण जनमत अब तक उन मूल्यों से शासित या संसूचित नहीं है जो जम्हूरियत की जिंदगी के लिए जरूरी है। मीडिया, विश्वविद्यालय अर्थात शिक्षा और राजनीतिक पार्टियों को लोकतंत्र में जिम्मेदारी दी गई है कि वे जनमानस को सुशिक्षित करें। हकीकत में राजनीतिक पार्टियों ने जनता को रेवड़ या भीड़ में तब्दील करने में महारत हासिल कर ली है। शिक्षा संस्थान फीस वसूलने, नकल कराने और फर्जी डिग्रियां बांटने के कारखाने बन गए हैं। दौलत बाजार में मीडिया सबसे ऊंची कीमत पर खरीदा बेचा जा रहा है। वह सेठों और जीहुजूरियों की ऐशगाह बनता जा रहा है।
संविधान की हिदायतों में तय है कि देश की दौलत नागरिकों की जागीर है। सम्पत्ति का दोहन इस तरह हो जिससे सार्वजनिक बंटवारा हो सके। यूरोप ने सिखाया। सब कुछ पुराना नष्ट करो। नये विचारों से भारत में नया यूरोप, अमेरिका बनाओ। उनसे प्रभावित भारतीयों ने मां बाप को ‘ओल्ड होम’ में डाला। खेती करना छोड़ा। शहरी मजदूर बने। ज्यादा पढ़े लिखे लोग विदेश भागे। वहां दोयम दर्जे के नागरिक बनकर गुलामी करते रहे। भारतीय भाषाओं और बोलियों को दकियानूस कहते उन पर थूकने लगे। अंगरेजी पोषाक में बंध गए। यूरो अमेरिकी नग्न संस्कारों में झूमे। इतालवी शराब पी। सस्ता चीनी सामान खरीदा। हथियारों का जखीरा बनाया। पड़ोसी को दुश्मन समझा। देश की अपढ़ जनता को अंगरेजी नारों से भौंचक किया। ‘स्टार्ट अप’, ‘बुलेट ट्रेन’, ‘स्मार्ट सिटी’, मेक इन इंडिया जैसे नये मंत्र गूंजने लगे। विधर्मियों को मारा। जन्नत में हूरें ढूंढने लगे। गाय का गोश्त बेचने की फैक्टरी लगाई। किसी को गाय का कातिल कहते उनका बीफ बना दिया। दोमुही बातें कीं। देश की चूलें हिल रही हैं। कोयला खुद गया है। लौहअयस्क देश पार जा रहा है। जंगल कराह रहे हैं। नदियों का पानी सुखाकर कारखाने लग रहे हैं। आध्यात्मिक लुटेरे बच्चियों की अस्मत लूटते जेल में बंद हैं। आर्थिक लुटेरों की पौ बारह है। जनता की गाढ़े की कमाई का रुपया बैंकों में डाका डालकर लुटेरों की तिजोरी में है। सरकारें उन्हें दामाद और समधी बनाए हुए हैं। एक-एक गिरहकट की लालच के लिए नगरों और गांवों को नेस्तनाबूद किया जा रहा है। लोग पस्तहिम्मत हैं। बदबूदार विचारों की अफीम चटाई जा रही है। लोग पीनक में बड़बड़ाते हैं। भारत महान देश है। हम विश्व गुरु बनने वाले हैं। अद्र्धशिक्षित नेता और किताबी विचारक अवाम को मायूसी के दलदल में धकेल चुके हैं। भविष्य पतन के रास्ते पर है। देश का कारवां इतिहास में मिथक को ढूंढने अभिशप्त है। आईना देखकर चीखता रहता है। विकास हो रहा है। गफलत को अध्यात्म समझने का खतरनाक दौर एक सौ तीस करोड़ मनुष्यों को कुछ सैकड़ा नवाबों की चाकरी करने जहरखुरानी का शिकार बना दिया जा रहा है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
आज दो खबरों ने बरबस मेरा ध्यान खींचा। एक तो मुख्य न्यायाधीश धनंजय चंद्रचूड़ के बयान ने और दूसरा गृहमंत्री अमित शाह के बयान ने! दोनों ने वही बात कह दी है, जिसे मैं कई दशकों से कहता चला आ रहा हूं लेकिन देश के किसी न्यायाधीश या नेता की हिम्मत नहीं पड़ती कि भाषा के सवाल पर वे इतनी पुख्ता और तर्कसंगत बात कह दें।
चंद्रचूड़ ने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की संगोष्ठी में बोलते हुए कह दिया कि कोई यदि अच्छी अंग्रेजी बोल सकता है तो इसे उसकी योग्यता का प्रमाण नहीं माना जा सकता और उसकी योग्यता इस बात से भी नापी नहीं जा सकती कि वह व्यक्ति कौन से नामी-गिरामी स्कूल या कालेज से पढक़र निकला है। हमारे देश में इसका एकदम उल्टा ही होता है। इसका एकमात्र कारण हमारे नेताओं और नौकरशाहों की बौद्धिक गुलामी है।
अंग्रेजों की लादी हुई औपनिवेशिक व्यवस्था ने भारत की शिक्षा और चिकित्सा दोनों को चौपट कर रखा है। महर्षि दयानंद, महात्मा गांधी और डा. रामनोहर लोहिया ने इस राष्ट्रीय कलंक के विरुद्ध क्या-क्या नहीं कहा था? इस औपनिवेशिक और पूंजीवादी मनोवृत्ति के खिलाफ हमारे वामपंथियों ने भी जब-तब बोला और लिखा है लेकिन अब देश के सर्वोच्च न्यायाधीश यह बात बोल रहे हैं तो वे सिर्फ बोलते ही न रह जाएं।
इस दिशा में कुछ करके भी दिखाएं। भारत की सभी अदालतों में भारतीय भाषाओं में फैसले और बहस भी हों, ऐसी घोषणा वे क्यों नहीं करते? वे संसद को सारे कानून हिंदी में बनाने के लिए बाध्य या प्रेरित क्यों नहीं करते?
गृहमंत्री अमित शाह ने इस प्रक्रिया का रास्ता दिखा दिया है। उन्होंने तमिलनाडु सरकार से कहा है कि वह अपने स्कूल-कालेजों की पढ़ाई तमिल माध्यम से क्यों नहीं करवाती? अब से लगभग 30 साल पहले जब उ.प्र. के मुख्यमंत्री मुलायमसिंह और मैं चेन्नई में मुख्यमंत्री करूणानिधि से मिलने गए थे तो उनका पहला सवाल यही था कि ‘आप दोनों यहां क्या हम पर हिंदी थोपने के लिए आए हैं?’ तो हमारा जवाब था, ‘हम आप पर तमिल थोपने आए हैं।’
यही बात अब अमित शाह ने बेहतर और रचनात्मक तरीके से कह दी है। दक्षिण भारत के नेता ‘हिंदी लाओ’ और ‘अंग्रेजी हटाओ’ का विरोध तो कर सकते हैं लेकिन ‘तमिल पढ़ाओ’ का विरोध किस मुंह से करेंगे? यदि करेंगे तो उनके वोट-बैंक में चूना लग जाएगा। वोट और नोट तो नेताओं की प्राण-वायु है। उसके बिना उनका दम घुटने लगता है। चंद्रचूड़ और अमित शाह ने उनकी प्राणवायु को स्वच्छ बना दिया है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
हिन्द स्वराज एक पुनर्विचार आज के लिए
बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी ने 13 नवंबर 1909 से 22 नवंबर 1909 अर्थात दस दिनों में इंग्लैंड से दक्षिण अफ्र्रीका जाते पानी के जहाज ‘एस एस किल्डोनन कैसल’ में बैठकर एक किताब लिखी। उस अमर कृति का नाम है ‘हिन्द स्वराज।’ पश्चिमी जगत और भारत में उस किताब पर सैकड़ों लेख और टिप्पणियां लिखी गई हैं। हिन्दी भाषा में लेकिन ‘हिन्द स्वराज’ पर पहली दस मुकम्मिल किताबें छत्तीसगढ़ के सुपरिचित लेखक सीनियर एडवोकेट और गांधीवादी विचारक कनक तिवारी को लिखने का सौभाग्य मिला। उनकी किताब ‘फिर से हिन्द स्वराज’ शताब्दी वर्ष 2009 में तथा अगली किताब ‘हिन्द स्वराज का सच’ 2010 में प्रकाशित हुई। इन दिनों कनक तिवारी ‘हिन्द स्वराज’ पर अपनी तीसरी किताब मौजूदा संदर्भ के उल्लेख के साथ लिख रहे हैं। छत्तीसगढ़ के लिए यह सुअवसर है और संयोग भी कि ठीक 13 नवंबर से 22 नवंबर तक दस दिनों में जब गांधी ने अपनी किताब लिखी थी, हम कनक तिवारी के रोज एक की दर से दस लेख ‘छत्तीसगढ़’ के पाठकों के लिए मुहैया कराएंगे। हमें उम्मीद है कि आपको यह लेख पसंद आएंगे जिनमें गांधी जी के ‘हिन्द स्वराज’ का संक्षेप में आलोचनात्मक ब्यौरा है।
-सम्पादक
आज सामाजिक जीवन में राजनीति ने सबसे बड़ी भूमिका हथिया ली है। गांधी के अनुसार राजनीति को ऐसी भूमिका तब मिलनी चाहिए, जब वह धर्म की मर्यादा में रहे। यहां धर्म से आशय आधुनिक धर्म से है जिसमें स्वतंत्रता, समानता और प्रगति के सभी संभावित तत्वों का समावेश हो। गांधी आग्रहपूर्वक कहते हैं कि जब तक भारतीय इस तरह की मनोवृत्ति का धर्म विकसित नहीं करते, वे अपनी बेहतर संस्कृति के बावजूद आधुनिकता और औपनिवेशीकरण से संघर्ष नहीं कर सकते। ‘सच्ची सभ्यता कौन सी है?’ वाले तेरहवें परिच्छेद में गांधी इस सवाल का जवाब देते हैं ‘सभ्यता वह आचरण है जिससे आदमी अपना फर्ज अदा करता है। फर्ज अदा करने के मानी हैं नीति का पालन करना। नीति के पालन का मतलब है अपने मन और इन्द्रियों को बस में रखना। ऐसा करते हुए हम अपने को (अपनी असलियत को) पहचानते हैं। यही सभ्यता है। इससे जो उलटा है वह बिगाड़ करने वाला है।’
‘हिन्द स्वराज’ की यही अनुगूंज या प्रतिध्वनि थी। 1909 में ‘हिन्द स्वराज’ को एक बड़ी राजनीतिक चुनौती देने के खतरनाक आरोप के एवज में प्रतिबंधित कर दिया गया था। तब भी सत्ता प्रतिष्ठान की समझ में यह बात नहीं आई कि गांधी ने सांस्कृतिक मूल्य-युद्ध के लिए पश्चिमी गोलाद्र्ध को जिस तरह ललकारा है। वह आवाज ‘हिन्द स्वराज’ के प्रतिबंधित करने से इसलिए खामोश नहीं हो सकती थी क्योंकि उसकी अंर्तध्वनि तो पूरी दुनिया की अभिव्यक्ति के पसरते माध्यमों में शामिल हो चुकी थी।
गांधी ने इस सभ्यता के बहुत से नए उपादानों का गांधी ने स्वागत भी किया-मसलन नागरिक आजादी, समानता, अधिकारजन्यता, आर्थिक सुधारों का आग्रह, ढकोसलों और परंपराओं से नारी की मुक्ति और धार्मिक सहिष्णुता वगैरह। ‘नवजीवन’ के 28 अप्रैल 1929 के अंक में गांधी ने पश्चिमी सभ्यता की आलोचना करते हुए स्वीकार किया कि उन्होंने ‘हिन्द स्वराज’ में उसका एक मोटा सा खाका खींचा है। समय बीतने के बाद भी उनके दृष्टिकोण में अंतर नहीं हुआ है। गांधी ने लेकिन यह भी कहा कि पश्चिम की हर वस्तु या विचार को बुरा नहीं कहा जा सकता क्योंकि उन्होंने पश्चिम से बहुत कुछ सीखा भी है। पष्चिम में बहुत से नैतिक और पवित्र चरित्र के लोग हैं और गांधी के अनुसार उनके बहुत से मित्र भी।
एक बार नहीं, लेकिन बार बार गांधीजी इस सभ्यता को ‘शैतानी’, ‘चाण्डाल’, ‘आसुरी’ तथा ‘रावण का राज्य’ कहते हैं। स्पष्ट है कि गांधीजी इस सभ्यता के किसी एक उपांग या अंग की बात नहीं करते हैं। इसके किन्हीं विशेष पक्षों की भी अलग से बात नहीं है। जहां है भी, वहां यही बताने के लिए है कि इसका मूल स्वभाव, मूल प्रवृत्ति ही शैतानी, चाण्डाल, राक्षसी है। वे यह नहीं कहते कि राक्षस है लेकिन अगर उसके हाथ पैर ठीक कर दिये जाएं। तो उसके समस्त कारोबार भी ठीक हो जाऐंगे। बहुत लोग हैं, जो मानते हैं कि अगर टेक्नालॉजी को ठीक कर दिया जाए या संसदीय प्रणाली को चुस्त और दुरुस्त कर दिया जाय, या विकास के कामों में कुछ हिस्सेदारी बढ़ा दी जाए, तो सब ठीक हो जाएगा। गांधीजी ने यह तो नहीं कहा है कि इसके हाथ पैर शैतान के हैं। बाकी मन और दिमाग देवता के हैं।
गांधी के एक बड़े अध्येता भीखू पारेख उनकी कुछ कमियों की ओर भी इशारा करते हैं। उनका तर्क है कि आधुनिक सभ्यता की गांधी-समीक्षा कुछ उपलब्धियों की अनदेखी करती है। मसलन सभ्यता की वैज्ञानिक और आलोचनात्मक अन्वेषण वृत्ति, मनुष्य द्वारा प्रकृति का नियंत्रण और सभ्यता की स्वयं की सांगठनिक शक्ति। पारेख का कहना है कि ऐसी उपलब्धियों का यह भी निहितार्थ है कि इनका कुछ न कुछ आध्यात्मिक आयाम तो है। उसे गांधी ने ठीक से नहीं देखा होगा। बहरहाल गांधी का फोकस एक खास युग की आधुनिक सभ्यता की समीक्षा और औपनिवेशिक साम्राज्यवाद की बुराइयों को देखने का था। इसी संदर्भ में औद्योगीकरण और पूंजीवाद से उपजी बुराइयों की ओर भी था।
यह अलग बात है कि गांधी ने कोई सौ वर्ष से भी पहले पाठक के जरिए जो सवाल पूछे थे, उन्हें अब तक तथाकथित अविकसित और विकासशील देशों की दुनिया पश्चिम की मालिक सभ्यता से अब तक पूछ रही है। गांधी ने भारत को सभ्य बनाए जाने के इंग्लैंड के मिशन की वैधता और नीयत पर ही सवाल किया था। उसे लगभग अकेले/पहले भारतीय के रूप में खारिज भी कर दिया था। उन्हें पश्चिम से कुछ सीखने की इच्छा ही नहीं थी। हालांकि पश्चिम से बहुत कुछ सीखा गया और सीखा भी जा सकता था।
पश्चिमी सभ्यता से आज हम सीख रहे हैं पश्चिम से उसका मन। 31 दिसम्बर की रात को सडक़ों पर शराब के पेगों से उत्पन्न किए गए उल्लास के कारण नौजवान पीढ़ी को पुलिस के संरक्षण में नाचने कूदने की अनुमति दी जाए-इसे हम आधुनिक संस्कृति कहते हैं। इसे हम ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के निर्यात लाइसेंस का जवाबी आयात लाइसेंस समझते हैं। रोजा अफ्तार अपनी पवित्रता, कुर्बानी और भाइचारे की बुनियादी सांस्कृतिक अवधारणा से अलग हटकर पांच सितारा होटलों, मंत्रियों तथा दिग्गज नौकरशाहों की सामाजिक पार्टियों का पर्याय बनाया जा रहा है। दीवाली पर जलने वाले दियों के लिए तेल अब बचा ही नहीं है। होली अश्लील गालियों के सामूहिक नारे का नाम हो गई है। इतनी ताब इतनी जुम्बिष हाथों में नहीं बची कि हम आल्हा ढोलक की थाप पर गा लें। कृष्ण की झांकियां उनकी लीलाओं के देह पथ के सरोकारों से जुड़ती जा रही है। तिलक ने जिस उद्देश्य से गणेश उत्सव प्रारंभ किये थे, वह अंग्रेजों के जाने के साथ पूरा हो गया। अब गणेष उत्सवों में फूहड़ आर्केस्ट्रा गूंज रहा है। देश कभी गांधी के कारण प्रभात फेरियों का देश था। अब देश में किसी भी सांस्कृतिक कार्य में सुप्रभात नहीं होता। भारतीय व्यंजन अपनी अस्मिता खो चुके हैं। वे किसी आदिम कबाइली परम्परा के वंशज हैं। अब तो फास्ट फूड के खोमचे वाले हर नुक्कड़ चौराहे पर शाम से आधी रात तक खड़े तरह तरह की बीमारियां परोस रहे हैं।
आधी रात के बाद दूरदर्शन में उत्तेजक फिल्में और सीरियल शुरू होते हैं। दिन में अपसंस्कृति पर व्याख्यान देने वाले रात में जागकर उन्हें खुद देखते हैं। भारतीयता पर धुंआधार भाषण देने वाले राष्ट्रवादी नेता, उद्योगपति और नौकरशाह अपने बच्चों को विदेषों में ही पढ़ाते हैं। राष्ट्रभाषा प्रचार समितियों के कर्ताधर्ता अपनी संतानों के लिए देषों विदेशों से आयातित सेल फोन, वॉकमैन, लैपटॉप कम्प्यूटर , जीन्स वगैरह के तोहफे विश्व हिन्दी सम्मेलनों से खरीद कर लाते हैं। स्वदेशी के तमाम पैरोकारों के आसपास से विदेशी गंध आती रहती है। गणतंत्र दिवस, स्वाधीनता दिवस, गांधी जयंती वगैरह के मुख्य अतिथियों और अन्य कपड़ों से नीनारिक्की, चार्ली, ब्रूट, जोवन, सेक्स अपील जैसे विदेशी इत्रफुलेलों की गंध वातावरण में ठसके से समाती जा रही है।
हमारे देश में कुलीनता का यही बैरोमीटर है कि कौन सा महत्वपूर्ण व्यक्ति कितनी बार विदेश गया है। उनके निजी मद्यगृह में कितने देशों की कितनी पुरानी मदिरा है। उनके कितने विदेशी बैंकों में खाते हैं। वह कितनी विदेशी किताबें और पत्रिकाएं मंगाता है। उनकी बीबियों के पास किस विदेशी बुटीक के वस्त्र हैं। माइकल जैक्सन, मेडोना वगैरह के कितने नम्बर किसे कंठस्थ हैं। ‘बे वॉच’ जैसे टेलीविजन कार्यक्रम की किसे कितनी समझ है। महात्मा गांधी के नाम पर खोले गए विश्वविद्यालय के भविष्य और पाठ्यक्रम का निर्धारण गोडसे-वृत्ति कर रही है। सैकड़ों हजारों करोड़ रुपए ऐय्याशी पर खर्च करने के लिए अमरीकी फोर्ड और रॉकफेलर फाउन्डेशनों की तरह भारत में भी मिशन स्थापित कर लिए गए हैं। इनकी एजेन्सी (दलाली) सेवानिवृत्त और मौजूदा नौकरशाही पर है। कुछ भद्र दिखते राजनीतिज्ञ परिवार खुरचन खाकर ही संतुष्ट रहते हैं।
पढ़ें बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक का लिखा-
इन दिनों सर्वोच्च न्यायालय के लगातार कुछ ऐसे फैसले आ रहे हैं, जो आम लोगों की समझ के बाहर हैं ही, कई विधिवेत्ता भी उनसे सहमत नहीं हैं। जैसे कि ताजा फैसला, जो कि राजीव गांधी के हत्यारों के बारे में है। उन्हें काफी गहरी छान-बीन और बहस के बाद उम्र-कैद हुई थी। उनकी फांसी की सजा को पहले उम्र-कैद में बदला गया और अब जो छह उम्र कैदी बचे थे, उन्हें भी रिहा कर दिया गया है। एक उम्र कैदी परारीवालन को खराब स्वास्थ्य के आधार पर पहले ही जेल से छुटकारा दे दिया गया था।
21 मई 1991 में श्रीपेरंबदूर में हुए इस हत्याकांड में राजीव गांधी के साथ-साथ अन्य 14 लोग भी मारे गए थे। इसमें 41 लोग दोषी पाए गए थे। उनमें से 12 ने आत्महत्या कर ली थी। 3 फरार हो गए। 26 को फांसी की सजा मिली लेकिन 1999 में उनमें से सिर्फ 7 के लिए फांसी की सजा बरकरार रही। इस सजा को भी 2014 में उम्र-कैद में बदल दिया गया।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह इसलिए किया कि 11 वर्षों तक सरकार ने उनकी दया याचिका को लटकाए रखा था। अन्नाद्रमुक सरकार ने राज्यपाल को 2018 में फिर से दया याचिका पर सहमति देने को लिखा लेकिन उन्होंने इसे लटकाए रखा तो अब सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार की याचिका को स्वीकार करते हुए सभी कैदियों को रिहा कर दिया है। जहां तक तमिलनाडु की द्रमुक और अन्नाद्रमुक सरकारों का सवाल है, इन हत्यारों के प्रति उनकी सहानुभूति का भाव तो समझ में आता है लेकिन आश्चर्य है कि सर्वोच्च न्यायालय ने किस आधार पर यह दया दिखाई है?
यदि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारे दया के पात्र हो सकते हैं तो हजारों साधारण हत्यारों को जेलों में क्यों सड़ाया जा रहा है? उन्हें भी छोड़ा क्यों नहीं जाता? राजीव के हत्यारों में देशी लोग तो थे, विदेश भी थे। श्रीलंकाई तमिल उग्रवादी भी थे। यदि विदेशी आतंकवादियों के लिए भी उम्र-कैद में छूट मिल सकती है तो वही छूट स्वदेशी हत्यारों को क्यों नहीं मिल सकती? उनकी रिहाई को लेकर तमिलनाडु के दलों और कांग्रेस में मुठभेड़ शुरु हो गई है।
तमिल राजनीतिक दल इस रिहाई का स्वागत कर रहे हैं तो कांग्रेस इसका विरोध कर रही है। तमिल दलों का तर्क है कि जब राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी ने हत्यारों को क्षमादान दे दिया था तो अब उनकी रिहाई में कौनसी बुराई है? यह तो सोनिया गांधी का विलक्षण बड़प्पन है। उन्होंने ईसा मसीह की क्षमा-भावना का सच्चा अनुकरण किया है लेकिन अदालतों को तो अपना काम नियमानुसार करना चाहिए। अदालत का यह तर्क बिल्कुल लचर-पचर है कि पिछले तीन दशकों की जेल के दौरान इन कैदियों का आचरण उत्तम रहा है, इसलिए इन्हें छोड़ा जा रहा है।
क्या इस तरह के हजारों अन्य कैदी नहीं हैं? उन्हें आप क्यों नहीं छोड़ते? क्योंकि उनके लिए जोर लगाने वाली सरकारें नहीं हैं या बड़े-बड़े वकीलों को अपने लिए अटकाने की सामर्थ्य उनमें नहीं है। सबसे अधिक दुखद तथ्य यह है कि इन हत्यारों की रिहाई पर तमिलनाडु में जश्न मनाया जा रहा है लेकिन कांग्रेस के वर्तमान पदाधिकारी तो इस फैसले पर दुख प्रकट करने में कोई लिहाज नहीं कर रहे हैं। (नया इंडिया की अनुमति से)
संदीप बामजई
मैं खुद को किसी भी राज्य में बाहरी नहीं मानता। पूरा भारत मेरा घर है और मैं किसी भी हिस्से में जाने का अधिकार रखता हूं। जो हुआ है उसके लिए मुझे खेद नहीं है। अगर यह शासकों और अन्य लोगों को भारत में नई स्थिति और उसके लोगों के स्वभाव के बारे में सोचने पर मजबूर करता है, तो ऐसा ही हो।
23 जून, 1946 को दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा वापस आने के लिए मजबूर किए जाने के बाद प्रेस के सदस्यों से बात कर रहे थे, जब उन्हें महाराजा हरि सिंह की सेना द्वारा दो दिनों के लिए उरी डाक बंगले में नजरबंद कर दिया गया था, क्योंकि उन्होंने कश्मीर में प्रवेश करने की कोशिश की थी।
22 मार्च, 1947 को जब लॉर्ड माउंटबेटन भारत आए, तो संक्षिप्त आदेश ब्रिटिश क्राउन से भारत में सत्ता के हस्तांतरण को अंजाम देना था।
हालांकि जटिलता कहीं अधिक थी, क्योंकि इसमें भारत का विभाजन भी शामिल था, अर्थात, पश्चिम में पंजाब और पूर्व में बंगाल। इसका मतलब यह था कि उन्हें कांग्रेस और मुस्लिम लीग के साथ जुड़ना था और साथ ही दोनों पार्टियों के बीच विश्वास की कमी को पाटने की कोशिश करनी थी।
जैसे ही माउंटबेटन ने प्रमुख चौकड़ी - गांधी, नेहरू, पटेल और जिन्ना के नेतृत्व में भारतीय नेताओं के साथ अपनी बातचीत शुरू की, कई सवाल थे, जिनके उत्तर की आवश्यकता थी। उदाहरण के लिए, नेहरू को यह एहसास जल्दी हो गया था कि माउंटबेटन एक मिशन पर हैं। और वो मिशन था भारत को आजादी दिलाना। इसलिए, नेहरू ने इन चर्चाओं के दौरान एक सरल प्रश्न पूछा : क्या आपके पास पूर्णाधिकारी शक्तियां हैं? जब उन्हें हां में जवाब मिला तो उन्होंने महसूस किया कि स्वतंत्रता दिवस की उलटी गिनती शुरू हो गई है।
उस साल 4 जून तक, एक संबोधन में, माउंटबेटन ने कहा, मार्च में मेरे भारत आगमन के बाद से मैंने लगभग हर दिन यथासंभव अधिक से अधिक समुदायों और हितों के नेताओं और प्रतिनिधियों के साथ परामर्श किया है। मैं कहना चाहता हूं कि मैं उन सभी सूचनाओं और सहायक सलाह के लिए कितना आभारी हूं जो उन्होंने मुझे दी हैं। पिछले कुछ हफ्तों में मैंने जो कुछ भी देखा या सुना है, उससे मेरे विचार बदल गए है कि समुदायों के बीच सद्भावना के एक उचित उपाय के साथ, एक एकीकृत भारत समस्या का सबसे अच्छा समाधान होगा।
मेरा पहला रास्ता, मेरी सभी चर्चाओं में, राजनीतिक नेताओं से 16 मई, 1946 की कैबिनेट मिशन योजना को अनारक्षित रूप से स्वीकार करने का आग्रह करना था। मेरी राय में वह योजना सर्वोत्तम व्यवस्था प्रदान करती है जिसे भारत के सभी समुदायों के हितों को पूरा करने के लिए तैयार है।
मुझे बहुत खेद है कि कैबिनेट मिशन योजना या भारत की एकता को बनाए रखने वाली किसी भी अन्य योजना पर सहमति प्राप्त करना असंभव हो गया है। लेकिन किसी भी बड़े क्षेत्र में जहां एक समुदाय का बहुमत है, वहां जबरदस्ती करने का कोई सवाल ही नहीं है।
लेकिन जब मुस्लिम लीग ने भारत के विभाजन की मांग की, तो कांग्रेस ने उस घटना में कुछ प्रांतों के विभाजन की मांग के लिए उन्हीं तर्कों का इस्तेमाल किया। मेरे विचार से यह तर्क अखंडनीय है। वास्तव में, कोई भी पक्ष पर्याप्त क्षेत्र छोड़ने को तैयार नहीं हुआ, जिसमें उनके समुदाय के पास दूसरे की सरकार के तहत बहुमत है।
इस पृष्ठभूमि के खिलाफ, नेहरू वह व्यक्ति थे जो कल को देखते थे। नेहरू के लिए, भारत का मतलब हमेशा एक संपूर्ण भारत था। इसमें सीधे ब्रिटिश शासन के तहत आने वाले प्रांत और सर्वोच्च शक्ति द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित 565 रियासतों के विशाल क्षेत्र शामिल थे, जहां 100 मिलियन भारतीय रहते थे। अविभाजित जम्मू-कश्मीर अकेले फ्रांस से बड़ा था, हैदराबाद कई यूरोपीय देशों से बड़ा था।
राजशाही के लिए नेहरू का विरोध और इसके कारण, टिन पॉट महाराजाओं के लिए, जिन्होंने अपनी संधियों और सर्वोच्चता के अन्य संबंधों के आधार पर राज्यों पर शासन किया, लगभग स्पष्ट थे।
नेहरू यह नहीं समझ पाए कि प्रांतों में रहने वाले भारतीय राष्ट्रवादी कैसे हो सकते हैं, जबकि रियासतों में रहने वाले लोग भारत के मूल मानस को व्यापक बनाने वाले स्वतंत्रता आंदोलन से अछूते रहेंगे। यह नेहरू के लिए कालदोष था, उन्होंने गांधी की नीति से लड़ने का संकल्प लिया, जिसे उन्होंने स्पष्ट दिशा के बिना पाया।
नेहरू के लिए, भारत का नक्शा जिस रूप में अस्तित्व में था वह एक स्वतंत्र भारत, बिना किसी समझौते का था।
कई मायनों में, 1938-1939 की अवधि में सत्ताधारी व्यवस्था की मनमानी के खिलाफ शक्तिशाली जन आंदोलन फले-फूले, जिसने रियासतों में सर्वोच्च शक्ति से सीधे अपनी ताकत खींची। लगभग उसी समय गांधीजी-नेहरू-पटेल की तिकड़ी को भी चुनौती मिली।
हरिपुरा कांग्रेस में सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष बने और एक साल बाद त्रिपुरी में, उन्होंने तीनों के कड़े विरोध के बावजूद, गांधीजी के उम्मीदवार पट्टाभि सीतारामय्या के खिलाफ 95 मतों से राष्ट्रपति पद जीता। बोस की जीत के बाद गांधी ने कहा कि पट्टाभि की हार उनसे ज्यादा मेरी थी।
मार्च 1939 में त्रिपुरी में, जी.बी. पंत ने एक प्रस्ताव पेश किया जिसमें बोस से गांधी के विचारों के अनुरूप एक कार्यसमिति नियुक्त करने को कहा गया। 10 मार्च 1939 को रियासतों पर एक भावुक अध्यक्षीय भाषण में, बोस के विचारों ने नेहरू के विचारों को प्रतिध्वनित किया, जैसा कि उन्होंने कहा, लेकिन हरिपुरा के बाद से बहुत कुछ हुआ है। आज हम देखते हैं कि पैरामाउंट पावर ज्यादातर जगहों पर राज्य सरकार के साथ है। ऐसे में क्या हमें कांग्रेसियों को राज्यों के लोगों के करीब नहीं आना चाहिए? मुझे अपने मन में कोई संदेह नहीं है कि आज हमारा कर्तव्य क्या है। नागरिक स्वतंत्रता और जिम्मेदार सरकार के लिए राज्यों में लोकप्रिय आंदोलनों का मार्गदर्शन करने का कार्य समिति द्वारा व्यापक और व्यवस्थित आधार पर किया जाना चाहिए।
नेहरू के लिए, यह एक निर्णायक क्षण बन गया क्योंकि इसने उन्हें स्वतंत्रता संग्राम के दायरे को रियासतों तक विस्तारित करने में सक्षम बनाया।
पंजाब, नाभा और पटियाला में दो रियासतों के शासकों के बीच एक कटु विवाद था। इसके कारण भारत की ब्रिटिश सरकार द्वारा नाभा के महाराजा रिपुदमन सिंह का बयान दिया गया और राज्य पर शासन करने के लिए एक ब्रिटिश प्रशासक की नियुक्ति की गई।
महाराजा के बयान से कई सिखों ने एक नया आंदोलन छेड़ दिया। स्वयंसेवकों का जत्था नाभा राज्य के जैतो में आया। इन जत्थों पर पुलिस ने बेरहमी से हमला किया, गिरफ्तार किया और प्रदर्शनकारियों को बाद में जंगल के दूरदराज के इलाकों में छोड़ दिया गया।
दो साथी कांग्रेसियों के साथ -- ए.टी. गिडवानी और के. संथानम, जवाहरलाल नेहरू 19 सितंबर, 1923 को नाभा के लिए रवाना हुए। उन्होंने 20 सितंबर को मुक्तसर में एक जनसभा को संबोधित किया। अगले दिन, जैतो की ओर बढ़ते हुए, वे एक जत्थे के सदस्यों में शामिल हो गए और जल्द ही उन्हें रोक दिया गया। पुलिस अधीक्षक ने उन्हें तुरंत नाभा छोड़ने के लिए कहा।
उन्होंने इनकार कर दिया, और उन्हें तुरंत सीआरपीसी की धारा 188 के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। सभी को हथकड़ी लगाई गई, और संथानम की बायीं कलाई जवाहरलाल के दाहिनी हाथ की ओर बंधी हुई थी। एक पुलिस अधिकारी ने उन्हें जंजीर से सड़कों पर ले गया और उन्हें जैतो से मुख्य शहर नाभा के लिए शाम की ट्रेन में चढ़ने का आदेश दिया। 20 घंटे बाद ही हथकड़ी हटाई गई। जेल में इस जादू ने नेहरू को काफी हद तक प्रभावित किया।
नेहरू ने अपनी पुस्तक 'एन ऑटोबायोग्राफी' में लिखा है, नाभा जेल में, हम तीनों को सबसे अस्वच्छ कक्ष में रखा गया। जिसकी छत काफी नीचे ती। रात में हम फर्श पर सोते थे, और मैं बार-बार जागता था, यह देखने के लिए कि चूहा कही मेरे ऊपर से तो नहीं गुजर रहा।
उन्होंने अपने मुकदमे के बारे में लिखा: मुझे खुशी है कि मुझ पर एक ऐसे कारण के लिए मुकदमा चलाया जा रहा है जिसे सिखों ने अपना बना लिया है। मैं जेल में था जब गुरु का बाग संघर्ष सिखों द्वारा वीरतापूर्वक लड़ा और जीता था।
यह विडंबना ही है कि अगली बार नेहरू ने एक रियासत का उदाहरण देने के लिए चुना, वे फिर से पंजाब के लिए रवाना हो गए। इस बार उन्होंने 27 मई, 1946 को फरीदकोट पर छापा मारा। शासक ने राज्य में उसके प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया। लेकिन पंडितजी ने प्रतिबंध की अवहेलना की और धारा 144 सीआरपीसी के तहत उन्हें दिए गए नोटिसों को फाड़ दिया। शांतिपूर्ण जनसमूह को शहर में मार्च करने के लिए कहा। शासक ने रास्ता दिया और समझौता करने का अनुरोध किया।
इसके बाद कांग्रेस के निर्वाचित अध्यक्ष नेहरू ने अपने मित्र शेख अब्दुल्ला का समर्थन करने के लिए कश्मीर में जबरदस्ती घुसने की कोशिश की, जिन्हें महाराजा हरि सिंह ने राजद्रोह के आरोप में जेल में डाल दिया था। 21 जून, 1946 को उन्हें डोमेल में रोक दिया गया और जेल में डाल दिया गया।
संदीप बामजई
जवाहरलाल नेहरू के लिए यह सोचना मुमकिन नहीं था कि रियासतें स्वतंत्र भारत की सीमा से बाहर रहेंगी। वह भारतीय रियासतों के राजाओं को ब्रिटिश शासन के साथ संबधों के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। उन्हें किसी बाहरी सत्ता के प्रति निष्ठा रखने या बिटिश शासन के साथ कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती थी, क्योंकि इससे स्वतंत्र भारत की आंतरिक सुरक्षा खतरे में पड़ जाती और राष्ट्र का विकास भी प्रभावित हो सकता था। देश के नेहरूवादी आदर्श की आधारशिला यह थी कि एकीकरण की प्रक्रिया शुरू होने पर रियासतों की सांस्कृतिक और भाषाई निकटता को एक दूसरे के साथ या आसपास की इकाइयों के साथ सबसे ऊपर रखा जाएगा। नेहरू ब्रिटिश राजशाही व्यवस्था और भारत में चैंबर ऑफ प्रिंसेस के साथ इसके संबंधों से घृणा करते थे।
उनके उपनिवेश-विरोधी विचारों को इंग्लैंड में बिताए उनके समय से आकार मिला, जहां वे फेबियन सोसाइटी के संपर्क में आए। उनकी सोच फैबियन समाजवादी थी। देश की बागडोर संभालने के बाद उन्होंने फेबियन समाजवाद की तर्ज पर भारत के लिए आर्थिक नीति तैयार की। फेबियन समाजवाद का नेहरू पर इतना दूरगामी और स्पष्ट प्रभाव था कि उन्होंने भारत को एक ऐसी अर्थव्यवस्था की संकल्पना की, जिसमें उत्पादन के साधनों, विशेष रूप से भारी उद्योग जैसे इस्पात, दूरसंचार, परिवहन, बिजली उत्पादन, खनन और रियल एस्टेट आदि का स्वामित्व, संचालन और नियंत्रण राज्य के पास था। वास्तव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नेता व उनकी गुरु एनी बेसेंट भी एक फेबियन समाजवादी थीं।
जवाहरलाल नेहरू के जीवनी लेखक फ्रैंक मोरेस कहते हैं, धर्म पर जवाहरलाल के अपने विचार धुंधले थे, उनके निजी शिक्षक ब्रुक्स दृढ़ थियोसोफिस्ट थे, इसलिए उन्हें अपने शिष्य को अपने तरीके से प्रभावित करने में थोड़ी कठिनाई हुई। उन्होंने थियोसॉफी में उनकी रुचि पैदा की। 13 वर्ष की आयु में जवाहरलाल नेहरू ने थियोसोफिकल सोसायटी में शामिल होने का फैसला किया।
उनके पिता मोतीलाल भी सोसायटी के सदस्य थे। सोसायटी की संस्थापक ब्लावात्स्की ने भारत यात्रा के दौरान उन्हें इसके बारे में बताया। न्यूयॉर्क में 1875 में स्थापित सोसाइटी को 1882 में मद्रास में स्थानांतरित कर दिया गया। चार्ल्स ब्रैडलॉफ और जॉर्ज बर्नार्ड शॉ की दोस्त एनी बेसेंट के भारत आगमन के साथ थियोसॉफी ने शहरी भारतीय बुद्धिजीवियों को अपनी तरफ आकर्षित करना शुरू किया। बेसेंट अपने समय के श्रेष्ठ वक्ताओं में से एक थीं। इलाहाबाद में उनके कुछ भाषणों को सुनने के बाद नेहरू मंत्रमुग्ध हो गए थे। लेकिन थियोसोफी के प्रति नेहरू का मोह लंबे समय तक नहीं चल सका।
नेहरू की जीवनी में मोरेस लिखते हैं कि कैम्ब्रिज के दिनों में नेहरू के मन में समाजवाद ने जड़ें जमाई, जब शॉ और वेब के फेबियनवाद ने उन्हें आकर्षित किया। बट्र्रेंड रसेल और जॉन मेनार्ड कीन्स के व्याख्यानों को उन्होंने सुना।
हालांकि लंदन में रहने के दौरान उनके विचारों में स्पष्टता नहीं आई थी। वह अब भी द्वंद में थे। हालांकि वह समाजवाद के प्रति आकर्षित थे, लेकिन दो राहे पर खड़े थे। अभी तक उनका कोई स्थापित सामाजिक, राजनीतिक या बौद्धिक विचार नहीं था।
नेहरू ने इंग्लैंड में जो कुछ भी पढ़ा और सुना, उसे और परिमार्जित किया और अपना फैबियन सोशलिस्ट मॉडल बनाया। उन्होंने राजशाही और उसके समर्थकों और चैंबर ऑफ प्रिंसेस का विरोध किया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र भारत में राजशाही का अस्तित्व नहीं रहेगा। राजाओं को जनता के प्रतिनिधियों को शासन सौंपना ही होगा। ये लोग जनता का भविष्य निर्धारित नहीं कर सकते थे।
ब्रिटिश सरकार ने दिसंबर 1933 में, दिल्ली के मुख्य आयुक्त को यह विचार करने के लिए कहा कि क्या ब्रिटिश राजशाही व देशी राजाओं की आलोचना करने भाषण के लिए नेहरू को गिरफ्तार किया जा सकता है। लेकिन अधिकारियों ने भाषण को आपत्तिजनक मानते हुए भी कहा कि मामले कोई दमदार केस नहीं बनता है। पुलिस को नेहरू के भाषणों पर नजर रखने के लिए कहा गया।
उसी माह कानपुर में ट्रेड यूनियन कांग्रेस में बोलते हुए नेहरू ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया। मामले को ब्रिटिश सरकार ने संज्ञान लिया। उन्हें लगने लगा कि अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए अब नेहरू के खिलाफ कार्रवाई का समय आ गया है।
आजादी के लिए छिड़ा आंदोलन ब्रिटिश शासन तक ही सीमित था। नेहरू ने रियासतों के लोगों से स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रवादी आंदोलन का हिस्सा बनने की अपील की। इस प्रकार 1927 में अखिल भारतीय राज्यों के पीपुल्स कांफ्रेंस का गठन किया गया।
1935 में नेहरू को कांफ्रेंस का अध्यक्ष बनाया गया था। उन्होंने लोगों की राजनीतिक सहभागिता बढ़ाने पर बल दिया। सरदार पटेल और वी.पी. मेनन को देशी राजाओं से आजादी के आंदोलन में भाग लेने के लिए देशी राजाओं से बातचीत की कमान सौंपी।
हिन्द स्वराज एक पुनर्विचार आज के लिए
बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी ने 13 नवंबर 1909 से 22 नवंबर 1909 अर्थात दस दिनों में इंग्लैंड से दक्षिण अफ्रीका जाते पानी के जहाज ‘एस एस किल्डोनन कैसल’ में बैठकर एक किताब लिखी। उस अमर कृति का नाम है ‘हिन्द स्वराज।’ पश्चिमी जगत और भारत में उस किताब पर सैकड़ों लेख और टिप्पणियां लिखी गई हैं। हिन्दी भाषा में लेकिन ‘हिन्द स्वराज’ पर पहली दस मुकम्मिल किताबें छत्तीसगढ़ के सुपरिचित लेखक सीनियर एडवोकेट और गांधीवादी विचारक कनक तिवारी को लिखने का सौभाग्य मिला। उनकी किताब ‘फिर से हिन्द स्वराज’ शताब्दी वर्ष 2009 में तथा अगली किताब ‘हिन्द स्वराज का सच’ 2010 में प्रकाशित हुई। इन दिनों कनक तिवारी ‘हिन्द स्वराज’ पर अपनी तीसरी किताब मौजूदा संदर्भ के उल्लेख के साथ लिख रहे हैं। छत्तीसगढ़ के लिए यह सुअवसर है और संयोग भी कि ठीक 13 नवंबर से 22 नवंबर तक दस दिनों में जब गांधी ने अपनी किताब लिखी थी, हम कनक तिवारी के रोज एक की दर से दस लेख ‘छत्तीसगढ़’ के पाठकों के लिए मुहैया कराएंगे। हमें उम्मीद है कि आपको यह लेख पसंद आएंगे जिनमें गांधी जी के ‘हिन्द स्वराज’ का संक्षेप में आलोचनात्मक ब्यौरा है।
-सम्पादक
1909 में लंदन से दक्षिण अफ्रीका लौटते हुए पानी के जहाज ‘किल्डोनन कैसल’ पर सम्पादक पाठक संवाद की शैली में गांधी ने कालजयी कृति लिखी। तब के हिन्दुस्तानियों के हिंसावादी पंथ और उसी विचारधारा वाले दक्षिण अफ्रीका के एक वर्ग को दिए गए कथित जवाब में लिखी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ है। यह एक लेखमाला के रूप में गांधी के ‘इण्डियन ओपिनियन’ नामक गुजराती अखबार में दक्षिण अफ्रीका में प्रकाशित हुई। दरअसल मुकम्मिल आजादी की कल्पना के पहले गांधी ने 1891 से 1894 के बीच दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले भारतीयों की तरफ से लिखी गई कई याचिकाओं में आज़ादी का खुद के विचार का खाका खींच रखा था। हो सकता है ‘हिन्द स्वराज’ उसका संशोधित रूप हो। इस पुस्तक के भारत में गुजराती संस्करण के प्रकाशित होते ही बम्बई में ब्रिटिष सरकार ने जब्त कर लिया। जवाहरलाल नेहरू ने बाद में इस किताब में व्यक्त विचारों को भ्रम पैदा करने वाले और अव्यवहारिक कहकर उससे असहमति व्यक्त की थी। गांधी ने स्वयं गुजराती ‘हिन्द स्वराज’ का अंग्रेजी अनुवाद किया और फिर प्रकाषित कराया। उसे भी ब्रिटिष सरकार ने आपत्तिजनक बताकर जब्त कर लिया।
1915 में महात्मा गांधी जब दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे तो उन्होंने सबसे पहले ‘हिन्द स्वराज’ को फिर से प्रकाषित करवाया। तब सरकार ने इसे जब्त नहीं किया। ‘हिन्द स्वराज’ को गांधी ने आधुनिक सभ्यता की समालोचना के रूप में प्रचारित किया था। उन्होंने लगातार यही कहा कि पश्चिमी सभ्यता के संबंध में मेरे मूलभूत विचार यही हैं जो इस पुस्तक में मैंने व्यक्त किए हैं। उन्होंने साफ कहा था ‘यह किताब ऐसी है कि बालकों के हाथ में भी दी जा सकती है। यह द्वेष-धर्म की जगह प्रेम-धर्म सिखाती है। हिंसा की जगह आत्म बलिदान को रखती है। पशुबल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल को खड़ा करती है। ‘हिन्द स्वराज’ में भारतीय स्वतंत्रता का जनपथ विस्तृत है। आजादी के पचहत्तर वर्ष बाद इस किताब के माध्यम से संघर्षषील हिन्दुस्तान की आजादी की जद्दोजहद को देखते ऐसा लगता है कि महापुरुषों की भीड़ में गांधी धु्रव तारे की तरह अकेले निर्विकार लेकिन हठधर्मी मुद्रा में मील का पत्थर बनकर खड़े हैं। इस निष्कलंक कृति के माध्यम से गांधी ने आजादी की लड़ाई के सभी योद्धाओं से अलग हटकर कुछ बुनियादी सवाल हमारी चेतना में छितराये हैं। ये सवाल आज भी वैसे ही मुँह बाए खड़े हैं।
‘हिन्द स्वराज’ दुनिया की सबसे तेज़ गति से लिखी किताबों में से है। उसे 13 नवंबर से 22 नवंबर 1909 के बीच ‘एस.एस. किल्डोनन कैसल’ नामक जलयान में इंग्लैंड से दक्षिण अफ्रीका लौटते समय गांधी ने लगभग भावनात्मक उद्रेक में लिखा था। जहाज की स्टेशनरी पर गुजराती में गांधी ने 40 पृष्ठ बाएं हाथ से और 235 पृष्ठ दाएं हाथ से लिखे। मात्र 16 लकीरों को काटकर अलग किया गया और लगभग तीस हजार में से गिने चुने शब्दों में हेर फेर किया गया। गांधी ने अपने मित्र हरमैन कैलेनबाख को दक्षिण अफ्रीका में लिखकर सूचित किया कि ‘हिन्द स्वराज’ उनकी मौलिक कृति है। ‘हिन्द स्वराज’ के परिशिष्ट में 14 लेखकों की 20 किताबों को पढऩे की सिफरिश पाठकों से करते हैं।
‘इंडियन ओपिनियन’ के गुजराती पाठकों के लिए ‘हिन्द स्वराज’ भूचाल की तरह था क्योंकि उसकी भाषा बेलाग और तर्क बेहद धारदार थे। पुस्तक के लिखने के दो वर्ष पहले ही गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में निष्क्रिय प्रतिरोध का आंदोलन शुरू किया था। वह आंदोलन गांधी के आंतरिक व्यक्तित्व में उठ रहे ज्वालामुखी के प्राथमिक संकेतों/संवेगों की तरह था। ‘हिन्द स्वराज’ गांधी के राजनीतिक अस्तित्व का पहला पुख्ता और विश्वसनीय पड़ाव था। कहने को तो वह उनको इंग्लैंड में मिले हिंसक आंदोलनों के समर्थकों से हुई असहमतियों का प्रतिक्रियात्मक ब्यौरा था, लेकिन अचानक उसमें पष्चिम की पूरी भौतिकवादी सभ्यता को लेकर एक उभरते हुए राजनीतिक विचारक के तेवर समाहित हो गये थे।
‘हिन्द स्वराज’ सम्पादक-पाठक संवाद की शैली में लिखी कृति है। यहां भी गांधी ने वर्षों पूर्व गुरु-षिष्य के भारतीय परंपरावादी चरित्रों का सहारा नहीं लिया। सम्पादक एक आधुनिक उपपत्ति है और पाठक तत्कालीन भारत के कथित आधुनिक व्यक्तियों का वैसा ही प्रतिनिधि, संभवत: जिनसे गांधी इंग्लैंड में मिले थे। भूमिका के अनुसार इस शैली का उपयोग गांधी ने इसलिए किया था ताकि वह पाठकों को जल्दी समझ में आए और उन्हें सुविधा हो। पुस्तक 20 अध्यायों में विभाजित है। 11 अध्यायों में ऐतिहासिक विवेचन है और बाकी में दार्शनिक। ऐतिहासिक विवेचन के परिच्छेद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के योगदान का मूल्यांकन भी करते हैं। उसमें गांधी कांग्रेस के प्रयासों की सराहना तो करते हैं लेकिन स्वराज्य के संबंध में कांग्रेस की समझ के मकडज़ाल से परहेज भी करते हैं और उसे पुनर्विचार करने को कहते हैं। गांधी बंगाल के विभाजन से बेहद दुखी हैं। उस संबंध में अहिंसक आंदोलन करने का इषारा भी करते हैं। भारत में ब्रिटिश हुकूमत के कारणों और परिणामों की व्याख्या भी ‘हिन्द स्वराज’ में विस्तृत है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि अंगरेज वाणिज्य और शक्ति संबंधी कारणों से भारत में आए। उसका एक कारण भारतीय समाज की राजनीतिक और नैतिक ताकत का क्षरण भी रहा है। भारत में वकीलों और डॉक्टरों जैसे मध्यवर्ग के पतन के उत्थान और भूमिका की कथा भी गांधी ने लिखी। इन सब मुसीबतों से बचने का उपाय गांधी की दृष्टि में भारतीय परंपराओं पर विश्वास करने से ही होगा।
22 नवंबर 1909 से गांधी अपनी निर्दोष दिखने वाली क्लासिक कृति ‘हिन्द स्वराज्य’ से पूरी दुनिया की विचार परिधि पर चलते हुए उसके केन्द्र में आ गए। जवाहरलाल नेहरू ‘हिन्द स्वराज’ के कट्टर आलोचक रहे हैं। गांधी से गहराते चले जा रहे उनके मतभेद भी जगजाहिर हैं। चाहे सवाल भारत-पाक विभाजन का रहा हो या राष्ट्रभाषा का या देष के आर्थिक आयोजन का-दोनों शीर्ष नेता दो विपरीत ध्रुवों पर नजर आते हैं। सवाल है कि गांधी इस देष को किन नतीजों तक ले जाना चाहते थे? क्या वह मानते थे कि यही देष है जो विश्व को फिर से मानवता का रास्ता दिखा सकता है? क्या इसमें अब भी इतना आत्मबल और साहस बचा है कि सारी दुनिया के सामने अपने आदर्शों की वरिष्ठता और श्रेष्ठता लेकर खड़ा हो सके? एक जगह भारतीय समाज व्यवस्था और सांस्कृतिक मूल्य की चर्चा करते गांधी इस सन्दर्भ में हमें याद दिलाते हैं हमारे पुरखों ने भोग की हद बांध दी। हमने नाशकारक होड़ को समाज में जगह नहीं दी। सब अपना-अपना धंधा करते रहे। उसमें उन्होंने दस्तूर के मुताबिक दाम लिये। ऐसा नहीं था कि हमें यंत्र वगैरह की खोज करना ही नहीं आता था। लेकिन हमारे पूर्वजों ने देखा कि लोग अगर यंत्र वगैरह की झंझट में पड़ेंगे, तो गुलाम ही बनेंगे और अपनी नीति को छोड़ बैठेंगे। उन्होंने सोचा कि बड़े शहर खड़े करना बेकार की झंझट है। उनमें लोग सुखी नहीं होंगे। उनमें धूर्तों की टोलियां और वेश्याओं की गलियां पैदा होंगी। गरीब अमीरों से लूटे जायेंगे। इसीलिए उन्होंने छोटे देहातों से संतोष किया।
‘हिन्द स्वराज’ गांधी वांग्मय की अकेली पुस्तक है, जिसके मूल गुजराती भाष्य का गांधी ने खुद अंग्रेजी में अनुवाद किया था। अपनी ‘आत्मकथा‘ तक को बापू ने अनुवाद के लिए अपने ‘बॉसवेल‘ महादेव देसाई के भरोसे छोड़ दिया था। इस अर्थ में ‘हिन्द स्वराज’ बापू के लिए ‘आत्मकथा‘ से भी बढक़र उनका विश्वसनीय फलसफा बल्कि व्यवहार्य ‘टेन कमांडमेंट्स‘ है। अंग्रेजी का भाष्य ही तॉल्स्तॉय, रोम्या रोलां, जवाहरलाल नेहरू और राजाजी वगैरह ने पढ़ा था और टिप्पणियां की थीं। गांधी खुद इसी अंग्रेजी पाठ को पूरे जीवन अपने विचार प्रवर्तन में खंगालते रहे थे।
-डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी
‘ऊंचाई’ राजश्री प्रोडक्शन की साठवीं फिल्म है। जाहिर है यह फिल्म भी साठोत्तर लोगों के लिए ही है। शाकाहारी भोजनालय की थाली जैसी सादी, कम मसाले वाली, सात्विक थाली जैसी फिल्म है। आजकल की फिल्मों जैसी प्यार मोहब्बत, फाइटिंग, गाने, डांस और वल्गर दृश्य इसमें नहीं हैं। बिना प्याज लहसुन की इस थाली में कलाकारों के नाम पर अमिताभ बच्चन, डेनी, अनुपम खेर, बोमन ईरानी, परिणीति चोपड़ा, नीना गुप्ता आदि हैं।
परिणीति ने इस फिल्म में बेहतरीन काम किया है। फिल्म की खूबी यह है कि इसमें चार बुजुर्ग मित्रों की दोस्ती दिखाई गई है और हौसला भी। चार में से एक बुजुर्ग की अचानक मृत्यु हो जाती है और वही कारण बनता है तीनों मित्रों के एवरेस्ट बेस कैंप तक जाने का। सूरज बडज़ात्या ने यह ऐहसान किया है कि तीनों बुजुर्गों को ऐवरेस्ट की चोटी पर नहीं पहुंचाया। बेस कैंप तक जाकर ही सूरज बडज़ात्या ने चैन की सांस ली और दर्शकों ने भी। यह सभी जानते हैं कि ऐवरेस्ट के बेस कैंप तक पहुंचना भी कोई आसान बात नहीं हैं। दिलचस्प और प्रेरणादायक प्रसंगों के साथ तीनों बुजुर्ग अपने लक्ष्य को पाने में कामयाब होते हैं।
इस फिल्म के बुजुर्गों को दीन-दुनिया की ज्यादा चिंता नहीं। चारों अपनी-अपनी जगह खूब कामयाब हैं। मर्सिडीज गाड़ी में घूमते हैं, कोठियों में रहते हैं, क्लबों में पार्टियां करते हैं। जब सबकुछ हो, तब भी आदमी कोई न कोई स्यापा पाल ही लेता है। ये चारों भी किसी न किसी स्यापे को अपना लेते हैं। फिल्म बुजुर्गों को समझने और जीने का एक बहाना देती है। नेपाल मूल के एक मित्र की अस्थियों की राख को एवरेस्ट बेस कैंप पर पहुंचाने और वहां बिखेरने के दृश्य मार्मिक तो है, लेकिन सवाल यह है कि क्या एवरेस्ट बेस कैंप पहुंचकर यह कर पाना क्या संभव है।
फिल्म में एडवेंचर, प्यार, इमोशन और इंस्पिरेशन का मेल है। फिल्म का संदेश है कि चलते रहेंगे, तो थकान महसूस नहीं होगी। इंसान के लिए कोई भी लक्ष्य ऊंचा नहीं है। इंसान इस लक्ष्य से प्रेरणा पाकर वहां पहुंच सकता है। दिल्ली, आगरा, कानपुर, लखनऊ, गोरखपुर, काठमांडू और हिमालय की तलहटी के नजारे इस फिल्म में बहुत ही आकर्षक तरीके से दिखाए गए हैं। कहीं-कहीं दो पीढिय़ों के बीच चल रहे द्वंद को दिखाने की कोशिश भी की गई है। सारिका की भूमिका भी इस फिल्म में हैं और वे पहाड़ों पर चढऩे के तरीके बताती है। एडवेंचर पसंद करने वालों को भी यह फिल्म अच्छी लगेगी।
एवरेस्ट को लेकर कई फिल्में बन चुकी हैं। यह फिल्म एवरेस्ट की पृष्ठभूमि में बनाई गई है। सादगी, मासूमियत, भावुकता और कल्पना का अच्छा मिश्रण सूरज बडज़ात्या ने बनाया है। फिल्म के भीतर कई दर्शक आंसू पोंछते भी नजर आते हैं। दिलचस्प बात यह है कि दर्शकों का बड़ा वर्ग बुजुर्गों का नहीं, बल्कि युवाओं का है।
बुजुर्गों और खासकर शाकाहारी बुजुर्गों को यह फिल्म पसंद आएगी, इसकी गारंटी है। मैं बुजुर्ग नहीं हूं, लेकिन फिर भी मुझे फिल्म पसंद आई। फिल्म देखकर यह एहसास हुआ कि एवरेस्ट बेस कैंप तक तो कभी न कभी जाना ही है, क्योंकि इतना सुंदर हिमालय इसके पहले किसी फिल्म में नहीं देखा।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर ने दिल्ली में एक संगोष्ठी में कहा कि रूस और यूक्रेन के बीच भारत की मध्यस्थता की बात बहुत अपरिपक्व है याने अभी कच्ची है। यह उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा है। यह सवाल किसी ने इसलिए उनसे पूछ लिया था कि वे 7-8 नवंबर को मास्को गए थे और उस वक्त यही प्रचारित किया जा रहा था कि वे रूस-यूक्रेन युद्ध को रूकवाने और दोनों राष्ट्रों के बीच मध्यस्थता करने के लिए जा रहे हैं। ऐसा लग भी रहा था कि भारत एकमात्र महत्वपूर्ण राष्ट्र है, जो दोनों की बीच मध्यस्थता कर सकता है और इस युद्ध को रूकवा सकता है।
ऐसा लगने का एक बड़ा कारण यह भी है कि भारत ने इस दौरान निष्पक्ष रहने की पूरी कोशिश की है। उसने संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी मंचों पर यूक्रेन के बारे में यदि मतदान हुआ है तो किसी के भी पक्ष या विपक्ष में वोट नहीं दिया। वह तटस्थ रहा। उसने परिवर्जन किया। युद्ध के पिछले 8 महिनों में यदि उसने यूक्रेन को अनाज और दवाइयां भेजी हैं तो रूस का तेल भी खरीदा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों देशों के नेताओं से सीधा संवाद भी कायम किया। उसने रूस के दबाव में आकर यूक्रेन की मानवीय सहायता से अपना हाथ नहीं खींचा और अमेरिका के दबाव में आकर यूरोपीय नाटो राष्ट्रों की तरह रूस के तेल और गैस को अस्पृश्य घोषित नहीं किया।
मोदी ने न सिर्फ यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लोदिमीर झेलेंस्की और रूस के राष्ट्रपति पूतिन से ही बात नहीं की बल्कि युद्ध रूकवाने के लिए अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस के नेताओं से भी अनुरोध किया। उन्होंने शांघाई सहयोग संगठन की बैठक में पूतिन से दो-टूक शब्दों में कहा कि यह युद्ध का समय नहीं है। लेकिन क्या वजह है कि भारत के इस एकदम सही आह्वान को कोई क्यों नहीं सुन रहा है?
इसका सबसे बड़ा कारण तो मुझे यह दिखाई पड़ता है कि इस वक्त सारी दुनिया एक नए शीतयुद्ध के दौर में प्रवेश कर रही है। एक तरफ अमेरिकी खेमा है और दूसरी तरफ रूस-चीन खेमा है। यही स्थिति कोरिया-युद्ध और स्वेज-नहर के मामले में भी कई दशक पहले पैदा हुई थी लेकिन तब जवाहरलाल नेहरु- जैसा विद्वान और अनुभवी व्यक्ति इन मामलों में मध्यस्थता करने की क्षमता रखता था। उस समय भारत कमजोर था लेकिन आज भारत काफी मजबूत है।
यदि इस शक्तिसंपन्न भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं पहल करें तो कोई आश्चर्य नहीं है कि रूस-यूक्रेन युद्ध तो रूक ही जाएगा, विश्व राजनीति भी दो खेमों में बंटने से बच जाएगी। भारत वैसी स्थिति में गुट-निरपेक्षता नहीं, गुट-सापेक्षता का जनक माना जाएगा। विश्व-राजनीति को भारत की यह नई देन होगी। (नया इंडिया की अनुमति से)
-अल्पयु सिंह
आमतौर पर भूलने की बीमारी तो हर किसी को ही होती है, चाभी कहां रखी, पर्स कहां है जैसी बातों से रोज़ाना कई लोग जूझते हैं। कहते हैं कि एक उम्र के बाद नाम वगैरह याद करना भी मुश्किल होता है। लेकिन अगर किसी शख्स को अपने जीवन से जुड़ी ज्यादातर बातें डिटेलिंग के साथ याद रहें तो उसे Hyperthymesia syndrome कहते हैं।
विज्ञान के मुताबिक बहुत कम लोग इस तरह की मेमोरी रखते हैं, हॉलीवुड की एक्ट्रेस Marilu Henner एक ऐसा ही नाम रही हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि अगर उन्हें अतीत की किसी भी तारीख के बारे में पूछा जाता था तो वो उस दिन को बेहद डिटेल में accuracy के साथ बयां करती थीं। खैर सवाल ये है कि इस तरह Highly superior autobiographical memory को asset माना जाए या बीमारी।
ये सही है कि आदमी स्मृतियों की एक गठरी लेकर पैदा नहीं होता लेकिन जैसे जैसे वो दुनिया देखता है, उसका जीवन उसके कंधे पर अच्छी बुरी स्मृतियों का एक ग_र सिर पर लाद देता है। संवेदनशील लोगों के लिए कुछ स्मृतियां जीवन पर्यंत चलती हैं।कुछ स्मृतियों के बोझ से आदमी कभी छुटकारा नहीं पाता । निर्मल वर्मा ने एक दफ़ा कहीं लिखा था- आदमी हर साल नया साल मनाता है ये सोचे बगैर कि स्मृतियों में वो हर क्षण पुरातन हो रहा है।
अब जऱा सोचिए कि अगर किसी की स्मृति Marilu Henner जैसी हो तो उसका क्या होगा, सारी ही बातें याद रहेंगी, अच्छी और बुरी दोनों। बीती बात बिसार दे की थ्योरी ऐसे लोग कभी खुद पर लागू कर ही नहीं पाएंगे । वो हमेशा ही खुद को यादों के जंगल में भटकते हुए पाएंगे । ऐसे में इस सुपर पावर का आदमी क्या ही करेगा ? ये अलग बात है कि ऐसे लोग शायद पढ़ाई और एग्जाम वगैरह में ज्यादा मेहनत किए बगैर ही अव्वल आ जाते हैं, लेकिन जीवन की रेस में स्मृतियां बार -बार बाधा ही बनकर सामने आएगी। खैर एक एक हॉलीवुड फिल्म है, जो वक्त मिले तो सभी को देखनी चाहिए इटरनल सनशाइन ऑफ़ द स्पॉटलेस माइंड Eternal Sunshine of the Spotless Mind साल 2004 में आई। यादों और भावनाओं की सांप सीढ़ी वाली इस फिल्म में हीरो- हीरोइन एक दूसरी की यादें मिटाने के लिए एक साइंटिफिक प्रोसिजर से गुजऱते हैं। यादें मिट भी जाती हैं। लेकिन वो फिर से एक दूसरे से टकराते हैं और फिर से एक दूसरे की ओर झुकते हैं, ये जाने बगैर कि वो पहले मिल चुके है। सार ये है कि भावनाओं का कोई मैप ही नहीं होता और सबकॉन्शियस माइंड की वजह स्मृति से छुटकारा पाया नहीं जा सकता, आदमी सिर्फ उसे मैनेज करना ही सीख सकता है।
-रजनीश कुमार
34 साल के जयेश का होम टाउन पोरबंदर है। वह अहमदाबाद में रहते हैं। उनकी शिकायत है कि पोरबंदर अब भी विकास से कोसों दूर है। जयेश सुबह-सुबह अपने दोस्त मनोज के साथ समंदर में नहाने आए हैं। उनसे पूछा कि पिछले 27 सालों से बीजेपी यहाँ चुनाव जीत रही है, यह पोरबंदर के लिए कैसा रहा?
जयेश कहते हैं, ‘मेरे परिवार में आधे से ज़्यादा लोग ब्रिटेन में रहते हैं। मैं उनसे पूछता हूँ कि वे भारत कब आएँगे? उनका जवाब होता है कि हम वहाँ आकर क्या करेंगे? दस साल पहले सडक़ों पर जो गड्ढे थे, अब भी नहीं भरे हैं। न तो वहाँ कुछ बदल रहा है और न ही विकास हो रहा है।’
वो कहते हैं, ‘वैसे मेरा वर्कटाउन अहमदाबाद है। मुझे जब छुट्टी मिलती है तो पोरबंदर आता हूँ। अहमदाबाद में मेट्रो आ गई है। लेकिन पोरबंदर गांधी जी की जन्मस्थली के बावजूद बहुत पिछड़ा हुआ है। नरेंद्र मोदी को पोरबंदर की तरफ भी देखना चाहिए, क्योंकि यहाँ के विधायक और सांसद भी बीजेपी के ही हैं। मोदी ने काम किया है लेकिन कुछ गिने-चुने शहरों में ही किया है। पोरबंदर में तो कुछ हुआ ही नहीं है।’
चालीस साल के धर्मेश पटेल शेयर ब्रोकर का काम करते हैं। उनका कहना है कि मोदी ने अहमदाबाद का कायाकल्प कर दिया है, लेकिन पोरबंदर में कुछ नहीं हुआ है। वह कहते हैं, ‘यहाँ जो भी इंडस्ट्री थी, वो बंद हो गई। इन्हें फिर से शुरू नहीं किया गया। पोरबंदर का कुछ भी नहीं हुआ है।’
पोरबंदर पहली नजर में देखने पर भारत का बाकी के शहरों की तरह ही लगता है। यहाँ ज्यादातर पुरानी इमारते हैं। पुरानी इमारतों को देखते हुए बनारस की याद आती है।
‘पोरबंदर में विकास कम लेकिन
इसमें मोदी की गलती नहीं’
पैंतालीस साल के न_ा भाई स्विमिंग कोच हैं।
उनसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, ‘यहाँ कांग्रेस लंबे समय तक रही। 1995 से यहाँ बीजेपी का राज है लेकिन पोरबंदर का कुछ नहीं किया। गांधी की जन्मस्थली है, यहाँ कुछ तो खास होना चाहिए था। इन्होंने समुद्र तट को ठीक कर दिया। रिवर फ्रंट बना दिया। घूमने के लिए तो ठीक है लेकिन रोजी-रोटी के लिए कुछ नहीं किया।
वो कहते हैं, ‘पहले यहाँ कितनी इंडस्ट्री थी लेकिन सब बंद हो गई। लोगों को रोजी-रोटी चाहिए लेकिन यहाँ काम के लिए कुछ नहीं है। मछुआरे भी तकलीफ में हैं।’
जिग्नेश पटेल पोरबंदर में पैथोलॉजी लैब चलाते हैं। वे अपनी पत्नी किंजल पटेल के साथ चौपाटी (समुद्र तट) पर आए हैं। उनसे पूछा कि वह पीएम मोदी के बारे में क्या सोचते हैं?
जिग्नेश पटेल ने कहा, ‘मैं सरदार पटेल और मोदी को आदर देता हूँ। सरदार पटेल ने रियासतों को एक किया। यह बड़ा काम था। मोदी के आने के बाद भी पूरे देश में काम हुआ है। यह केवल गुजरात की बात नहीं है। पोरबंदर में पैसा भेजा जाता है, लेकिन पैसे कहाँ चला जाता है, इसे देखना चाहिए।
वो कहते हैं, ‘पोरबंदर में विकास कम हुआ है, लेकिन इसमें मोदी की ग़लती नहीं है। मोदी ने पटेल की इतनी ऊंची मूर्ति बनाई है। इससे हमारा मान बढ़ा है।’
60 साल के अशोक सिंह ऑटो चलाते हैं। वे कहते हैं कि सरकार को पोरबंदर पर भी ध्यान देना चाहिए, क्योंकि यहाँ रोजी-रोटी को लेकर बहुत कुछ करने की जरूरत है। अशोक सिंह कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी गांधी की विरासत को लेकर पोरबंदर में काम करें, ताकि बापू को समझने और पढऩे में मदद मिले।
पोरबंदर में बीजेपी और कांग्रेस
को ‘आप’ से चुनौती
पोरबंदर में 2012 से विधानसभा चुनाव बीजेपी के बाबूभाई भीमाभाई बोखरिया जीत रहे हैं।
वे कांग्रेस के अर्जुन मोढ़वाडिय़ा को पिछले दो विधानसभा से चुनाव हरा रहे हैं। दोनो मेर जाति के हैं। मेर ख़ुद को राजपूत बताते हैं। मेर जाति यहाँ ओबीसी में है। जातीय समीकरण के हिसाब से देखें तो यहाँ मेर जाति का वोट सबसे ज़्यादा है।
बाबूभाई बोखरिया कहते हैं कि यहाँ मेर जाति का वोट 74 हजार है। इसके बाद ब्राह्मणों का वोट 32 हजार और 26 वोट के साथ तीसरे नंबर पर मछुआरे हैं।
आम आदमी पार्टी ने मछुआरे जाति से ताल्लुक रखने वाले जीवन जंग को यहाँ से मैदान में उतारा है। कांग्रेस और बीजेपी दोनों इस बात से चिंतित हैं कि कहीं आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार के कारण उन्हें हार का सामना न करना पड़े।
क्यों रास आ रही है हिंदुत्व की विचारधारा?
यहाँ के आम लोगों में बीजेपी और पीएम मोदी को लेकर शिकायतें हैं, लेकिन फिर भी ये कहते हैं कि बीजेपी ही सत्ता में आएगी।
आखिर ऐसा क्या हुआ कि गांधी की विचारधारा में पले-बढ़े लोगों को हिन्दुत्व की विचारधारा रास आने लगी?
कई लोगों का मानना है कि गुजरात में गांधी के बाद नॉलेज ट्रेडिशन पूरी तरह से ग़ायब है। जाने-माने समाज विज्ञानी अच्युग याग्निक इसे बौद्धिक गरीबी कहते हैं। वह पोरबंदर में बीजेपी की जीत को इसी बौद्धिक गरीबी से जोड़ते हैं।
वे कहते हैं- 1960 में गुजरात एक अलग राज्य बना था। इससे पहले बॉम्बे से शासित होता था। गुजरात के गठन से लेकर कांग्रेस पार्टी के आने तक आरएसएस कुछ नहीं कर पाया। गुजरात में कई दंगे हुए हैं। एक 1969 में हुआ। तब कांग्रेस की ही सरकार थी और हितेंद्र देसाई मुख्यमंत्री थे।
दूसरा दंगा 1985 में हुआ, तीसरा 1992 में हुआ और उसके बाद 2002 में हुआ। आरक्षण विरोधी आंदोलन भी हुए। एक 1981 में और दूसरा 1985 में।
वरिष्ठ पत्रकार राजीव शाह मानते हैं कि इन दंगों और आरक्षण विरोधी आंदोलन से बीजेपी का परचम पूरे गुजरात में लहराया।
हालाँकि गुजरात में 2002 के दंगे का असर पोरबंदर में उस तरह से नहीं पड़ा था। 2002 में दंगों के कारण गुजरात विधानसभा चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण की बात कही जाती है लेकिन तब भी पोरबंदर से कांग्रेस के अर्जुन मोढ़वाडिय़ा ही जीते थे।
‘मोदी हिंदुत्व की राजनीति
की वजह से लोकप्रिय’
भानूभाई ओडादरा पोरबंदर जि़ला कोर्ट में वकील हैं।
वो कहते हैं, ‘मोदी हिन्दुत्व की राजनीति के कारण यहाँ लोकप्रिय हैं। यहाँ के ब्राह्मण और मछुआरे बीजेपी के साथ जाते हैं। मछुआरे गरीब हैं और उन्हें बीजेपी कहती है कि वोट नहीं दोगे तो पाकिस्तान वाले बोट जब्त कर लेंगे और कोई फिर छुड़ा नहीं पाएगा।’
वो कहते हैं, ‘पाकिस्तान से बचना है तो बीजेपी को जिताओ। मछुआरों को यह बात अपील करती है। लेकिन इस बार आम आदमी पार्टी ने मछुआरे को ही टिकट दिया है इसलिए बीजेपी को नुक़सान हो सकता है।’
2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से चुनावी राजनीति में बीजेपी को वहाँ भी जीत मिली, जहाँ अतिवादी वामपंथियों का केंद्र रहा या फिर गांधीवादियों का। वो चाहे पश्चिम बंगाल का माटीगरा-नक्सलबाड़ी इलाक़ा हो या गांधी की जन्मस्थली पोरबंदर। (www.bbc.com)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कर्नाटक और गुजरात के मेडिकल कॉलेजों ने गजब कर दिया है। उन्होंने अपने छात्रों की फीस बढ़ाकर लगभग दो लाख रु. प्रति मास कर दी है। याने हर छात्र और छात्रा को डाक्टर बनने के लिए लगभग 25 लाख रु. हर साल जमा करवाने पड़ेंगे। यदि डाक्टरी की पढ़ाई पांच साल की है तो उन्हें सवा करोड़ रु. भरने पड़ेंगे। आप ही बताइए कि देश में कितने लोग ऐसे हैं, जो सवा करोड़ रु. खर्च कर सकते हैं?
लेकिन चाहे जो हो, उन्हें बच्चों को डाक्टर तो बनाना ही है। तो वे क्या करेंगे? बैंकों, निजी संस्थाओं, सेठों और अपने रिश्तेदारों से कर्ज लेंगे, उसका ब्याज भी भरेंगे और बच्चों को किसी तरह डॉक्टर की डिग्री दिला देंगे। फिर वे अपना कर्ज कैसे उतारेंगे? या तो वे कई गैर-कानूनी हथकंडों का सहारा लेंगे या उनका सबसे सादा तरीका यह होगा कि वे अपने डॉक्टर बने बच्चों से कहेंगे कि तुम मरीजों को ठगो। उनका खून चूसो और कर्ज चुकाओ। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए आजकल निजी अस्पतालों में जबर्दस्त लूट-पाट मची हुई है।
उनके कमरे पांच सितारा होटलों के कमरों से भी ज्यादा सजे-धजे होते हैं। किसी मरीज की एक बीमारी के कारण का पता करने के लिए डॉक्टर लोग दर्जनों ‘टेस्ट’ करवा देते हैं। और फिर दवाइयां भी ऐसी बता देते हैं, जिससे रोगी का रोग द्रौपदी का चीर बन जाए ताकि उससे मोटी राशि वसूली जा सके। हमारे डॉक्टर अपना धंधा शुरु करने के पहले यूनानी दार्शनिक के नाम से चली ‘हिप्पोक्रेटिक शपथ’ लेते हैं, जिसमें आदर्श और नैतिक आचरण की ढेरों प्रतिज्ञाएं हैं।
क्या वे उनका पालन सच्चे मन से कभी करते हैं? उनके उल्लंघन से ही उनका पालन ज्यादातर डॉक्टर करते हैं। उन डॉक्टरों की पढ़ाई की यह लाखों रु. फीस इस उल्लंघन का सबसे पहला कारण है। हमारे सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर घोर आपत्ति की है। उसने एक याचिका पर अपना फैसला देते हुए कहा है कि जिन कॉलेजों ने अपनी फीस में कई गुना वृद्धि कर दी है, यह शुद्ध लालच का प्रमाण है। यह कॉलेज के प्रवेश और फीस-निर्णायक नियमों का सरासर उल्लंघन है।
इस तरह की फीस के दम पर बने डॉक्टरों से सेवा की उम्मीद करना निरर्थक है। इसका एक गंभीर दुष्परिणाम यह भी होगा कि गरीब, ग्रामीण और मेहनतकश तबकों के बच्चे डॉक्टरी शिक्षा से वंचित रह जाएंगे। वे इतनी मोटी फीस कैसे भरेंगे? नतीजा यह होगा कि हमारे डॉक्टरों में ज्यादा वही होंगे, जिनके माता-पिता ऊँची जातियों के होंगे, मालदार होंगे, शहरी होंगे और शिक्षित होंगे। इस तरह के वर्गों से आनेवाले युवा डॉक्टरों में सेवा का विनम्र भाव कितना होगा, इसका अंदाज आप स्वयं लगा सकते हैं। (नया इंडिया की अनुमति से)


