विचार/लेख
ऋतु तिवारी
आज महिला दिवस पर बधाइयों के बीच मुझे वो दिन याद आ रहा है जिस दिन मैं कोलकाता के सोनागाछी गई थी सेक्स वर्कर्स से मिलने और जानने और समझने कि सोनागाछी के बारे में शहर से लेकर देश -विदेश में जो मिथक हैं उनमें कितनी सच्चाई है और जिन पर फिल्में बनाकर फिल्मकारों ने जाने कितने अवार्ड बटोरे।
सबसे पहला संघर्ष रहा उस गली तक पहुँचना जो उन तक जाती थी।उनके संगठन के ऑफि़स तक पहुँचने में कोई मुश्किल नहीं हुई और संगठन के सेक्रेटरी से बात करने के बाद जब उन्हें संतोष हुआ कि हम किसी गलत नीयत से नहीं आये हैं, एक रास्ता खुला कि उन तक पहुँचा जा सके।
पर वहाँ उस गली में पहुँचते पहुँचते जाने कितनी बार हम पर शक किया गया..पर हम ये बताने में सफल रहे कि हम उनलोगों में से नहीं हैं जिनसे उन्हें डर है। (हमसे डरने का कारण उन्होंने बताया, जिसकी चर्चा एथिक्स के हिसाब से गलत होगा।)
आखिरकार शहर के एक आम रास्ते से होते हुए हम उस गली में पहुँच ही गये जिसके हर मकान की खिडक़ी को बाहर से गुजरने वाला एक ऐसी नजऱ से देखता है मानो उस खिडक़ी के पार दुनिया की सबसे खराब औरत रहती है।
जब हम एक मकान के भीतर घुसे तो दृश्य बिल्कुल वैसा था जैसा सिनेमा में आप सबने देखा होगा कि रात को शरीर बेचने वाली भी दिन में बैठकर बालों में तेल लगा रही है, कोई बच्चे को खाना खिला रही है।जिस बात ने सबसे पहले मुझे चोट पहुँचाई वो ये कि एक अजीब सी हिकारत से हमें देखा गोया हम बाहरी उनकी दुनिया में इतनी आसानी से कैसे घुस आये।
धीरे-धीरे उनके बीच हमने विश्वास कायम किया और उन्होंने हमसे बातचीत शुरू की।
आश्चर्य होगा आप सबको ये जानकर कि उनके बीच जब हम थे तो हमपर बाहर से कुछ युवक नजर रखे हुए थे और बीच बीच में आकर तस्दीक करते थे कि कहीं कुछ संदेहास्पद तो नहीं।
लेकिन अंतत: हम पर भरोसा किया गया और फिर जो सुना, उनकी आँखों से देखा और समझा उसकी बात एक साथ लिखते हुए फोन हैंग हो जायेगा।
पर इतना जरूर देखा हमने कि उन्होंने हमारी आँखों में आँखें डाल कर जिस तरह बात की,बयान किया..हम शर्मिंदा थे..हमारी आँखें नीची थी और उनकी आत्मा पर लगे घाव हम सिर्फ महसूस करने की कोशिश कर रहे थे।
कितना अद्भुत संयोग है कि हम जिसको प्यार करते हैं उसे बाबू कहकर पुकारते हैं, उनके बाबू वो हैं जो उनके लिये ग्राहक लाकर देते हैं।
कितने ही अनुभव उन क्षणों में हमने सुना, उनके दर्द को सुना (हम समझने का दावा कर लें पर ये आसान नहीं तो मैं खुद को नहीं छल सकती।)लेकिन सबसे ऊपर रहा उनके अपने आत्मसम्मान की भावना जिसको बयान किया ही नहीं जा सकता।
वो तो सिर्फ ‘धंधा’ करती हैं कि कोई अपनी अपाहिज बच्ची का इलाज करा सके या कोई अपनी बहन-भाई को पढ़ा सके या फिर किसी के पति ने उसे छोड़ दिया और उसके पास अपने बच्चों को जीवन देने के लिये इसके अलावा कोई रास्ता नहीं दिखा जो उसकी जरूरत पूरी कर पाये।
फिर हमारे लौटने का वक्त हुआ तो एक उम्रदराज ‘बाबू’ ने मुझे अपना नम्बर देते हुए सिफ$ इतना कहा कि मेरा नम्बर रख लें। शायद आप किसी की कोई भला करना चाहेंगी तो मैं मदद कर सकता हूँ।
इस दुनिया में सेक्स वर्क होम का होना किसी महिला का नहीं बल्कि पुरुषों का चरित्र प्रमाणपत्र है।
संजय ढकाल
नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल प्रचंड ने एक बार फिर से पाला बदल लिया है।
सोमवार को प्रचंड की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी सेंटर) ने नेपाली कांग्रेस से गठबंधन तोड़ नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के साथ गठबंधन बना लिया है।
प्रचंड के इस हालिया फ़ैसले से नेपाली संसद में सबसे ज़्यादा 88 सीटें जीतने वाली नेपाली कांग्रेस पार्टी विपक्ष में हो गई है।
प्रचंड और ओली की पार्टी का कहना है कि दोनों के बीच सरकार को लेकर नया समझौता हो गया है। एक साल से कुछ ही ज़्यादा समय हुआ है कि एक बार फिर से नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों का गठबंधन तैयार हुआ है।
प्रचंड और ओली की पार्टी के बीच बने गठबंधन में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) और जनता समाजवादी पार्टी भी शामिल हैं। सोमवार की शाम प्रचंड ने अपने सभी मंत्रियों को हटा दिया था और अपनी पार्टी, ओली की पार्टी के अलावा आरएसपी से एक-एक नए मंत्रियों को शामिल किया था। प्रचंड ने बाकी के सभी 25 मंत्रालय अपने पास रखे हैं।
नेपाल में 2022 के आम चुनाव में नेपाली कांग्रेस और प्रचंड की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी सेंटर) के बीच गठबंधन था। लेकिन चुनाव बाद प्रचंड ने ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत माक्र्सवादी-लेनिनवादी) से गठबंधन कर लिया था।
फिर से साथ आए ओली और प्रचंड
ओली की पार्टी नेपाल में 78 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। नेपाली कांग्रेस ने 25 दिसंबर 2022 को प्रचंड की उस मांग को खारिज कर दिया था, जिसमें वह तीसरी बड़ी पार्टी (32 सीटें) होने के बावजूद प्रधानमंत्री बनना चाहते थे।
लेकिन पिछले साल फऱवरी में ही ओली की पार्टी ने प्रचंड से गठबंधन तोड़ लिया था। प्रचंड की पार्टी ने नेपाल के राष्ट्रपति चुनाव में नेपाली कांग्रेस के नेता रामचंद्र पौडेल का समर्थन किया था।
ओली चाहते थे कि प्रचंड राष्ट्रपति चुनाव में उनकी पार्टी के उम्मीदवार का समर्थन करें। रामचंद्र पौडेल के राष्ट्रपति बनने के बाद नेपाली कांग्रेस ने एक बार फिर से प्रचंड से हाथ मिला था। लेकिन एक साल से कुछ ही ज़्यादा वक्त हुआ है और प्रचंड ने नेपाली कांग्रेस से खुद को अलग कर लिया।
नेपाली कांग्रेस और प्रचंड की पार्टी के बीच सरकार में कई मुद्दों पर मतभेद खुलकर सामने आ रहे थे। लेकिन नेशनल एसेंबली के अध्यक्ष को लेकर सबसे ज़्यादा कलह थी। नेपाली कांग्रेस नहीं चाहती थी कि नेशनल एसेंबली के अध्यक्ष का पद प्रचंड की पार्टी के पास जाए।
नेपाली कांग्रेस से मतभेद
नेपाल की नेशनल एसेंबली के अध्यक्ष का पद अहम होता है क्योंकि संवैधानिक निकायों में सदस्यों की नियुक्तियां उसी की सिफारिश से होती हैं।
12 मार्च को नेपाल में नेशनल एसेंबली के अध्यक्ष के लिए चुनाव है। नेपाल में बार-बार नई सरकार का बनना कोई नई बात नहीं है। 2008 में नेपाल में राजशाही ख़त्म होने के बाद से 11 सरकारें बन चुकी हैं।
नेपाल की चुनावी व्यवस्था में किसी भी पार्टी के लिए अपने बहुमत पर सरकार बनाना संभव नहीं है। 275 सदस्यों वाली नेपाल की प्रतिनिधि सभा में 165 सदस्यों को सीधे जनता अपने मतों से चुनती है और बाक़ी 110 सदस्यों का चुनाव समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रक्रिया से होता है।
2018 में ओली और प्रचंड ने अपनी पार्टियों का विलय कर बड़ा कम्युनिस्ट फोर्स नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी बनाई थी लेकिन दोनों के बीच सत्ता संघर्ष इस कदर बढ़ा कि 2021 में अलग हो गए और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी टूट गई थी। इसके बाद दोनों ने अपनी-अपनी पार्टी बना ली थी।
कहा जाता है कि नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टियों की एकता को चीन हमेशा से पसंद करता रहा है। वहीं भारत के बारे में कहा जाता है कि वह नेपाली कांग्रेस को सत्ता में किसी ने किसी रूप में हिस्सेदार देखना चाहता है।
भारत के हक में नहीं
विश्लेषकों का कहना है कि नेपाल में नया सत्ता समीकरण बनने के बाद काठमांडू के प्रति उसके पड़ोसी देशों भारत और चीन की राय बदल सकती है।
करीब 13 महीने पहले नेपाली कांग्रेस और प्रचंड की पार्टी के बीच गठबंधन से भारत सहज था।
कहा जाता था कि उससे पहले जब वामपंथी दल एक साथ आए तो चीन इससे सहज था।
तो, क्या अब फिर चीन ख़ुश हो गया है और दिल्ली उस नए गठबंधन को लेकर चिंतित है, जिस पर कम्युनिस्टों का वर्चस्व होगा?
विश्लेषकों के मुताबिक, इससे देश की बुनियादी विदेश नीति तो नहीं बदलेगी लेकिन नेपाल के प्रति धारणा बदल सकती है।
नेपाल की विदेश नीति
नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार युवराज घिमिरे कहते हैं कि चूंकि नेपाल का संविधान गुटनिरपेक्ष विदेश नीति को अपनाता है, इसलिए भले ही सरकार बदल जाए, एक ‘संतुलित’ विदेश नीति रखी जाएगी। ख़ासकर पड़ोसियों के मामले में ऐसा ही होगा।
घिमिरे कहते हैं, ‘हालांकि, यह सच है कि अतीत में, जब कम्युनिस्ट एकजुट हुए थे तो चीन ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी थी।’
उन्होंने कहा, ‘इसलिए, चीन के साथ बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी बीआरआई समझौते अमल में लाना भविष्य में प्राथमिकता बन सकता है।’
पूर्व मंत्री राम कार्की के मुताबिक, नए गठबंधन से नेपाल की विदेश नीति ‘अधिक संतुलित’ होगी।
उन्होंने कहा, ‘नेपाल को विदेशी मामलों में अपनी तटस्थता को अधिक मजबूत तरीके से दिखानी होगी।’
जब पुराना गठबंधन था तो क्या वह तटस्थ नहीं था? इस सवाल के जवाब में कार्की ने कहा, ‘यह ऐसी बात है, जिसे हर कोई जानता है।’
पिछले कुछ समय से कुछ समूह नेपाल में हिंदू राष्ट्र की वापसी की मांग कर रहे हैं। नेपाली कांग्रेस के अंदर भी एक गुट यह मांग उठाता रहा है।
यह सवाल भी उठाया जाता रहा है कि अगर हिंदू राष्ट्र का एजेंडा- जो भारत की मौजूदा सत्ता के लिए रुचिकर हो सकता है- एक नया गठबंधन बन गया तो क्या होगा।
हालांकि भारत ने नेपाल में हिंदू राष्ट्र या संघीय शासन या गणतंत्र के बहस पर औपचारिक रूप से प्रतिक्रिया नहीं दी है या कोई रुचि व्यक्त नहीं की है।
पत्रकार घिमिरे ने कहते हैं, ‘देश के भीतर भी, मुझे नहीं लगता कि इन मुद्दों को बड़ी पार्टियों ने ईमानदारी से उठाया है।’
‘विश्वसनीयता का नुकसान’
नेपाल में सत्ता गठबंधन बदलना सामान्य बात हो गई है।
पिछले आम चुनाव के डेढ़ साल से भी कम समय में, सिंह दरबार पर शासन करने वाला सत्ता गठबंधन तीन बार बदल चुका है।
लेकिन हर बार संसद में तीसरी ताकत माओवादी पार्टी के अध्यक्ष पुष्प कमल दाहाल ‘प्रचंड’ प्रधानमंत्री बनने में सफल रहे हैं।
प्रचंड के नेतृत्व वाली पिछली गठबंधन सरकार के दौरान जिसमें उदारवादी मानी जाने वाली नेपाली कांग्रेस मुख्य भागीदार थी, यह टिप्पणी की गई थी कि चीन के साथ बीआरआई समझौते के तहत परियोजनाएं आगे नहीं बढ़ीं।
लेकिन इसी अवधि में भारत के साथ नज़दीकियां बढ़ीं और ऊर्जा व्यापार पर एक महत्वपूर्ण समझौता भी हुआ, जबकि अमेरिका के साथ मिलेनियम चैलेंज कॉर्पोरेशन के तहत एमसीसी नामक कॉम्पैक्ट समझौते को मंजूरी दी गई।
नेपाल मुद्दे पर भारत के टिप्पणीकार भी कह रहे थे कि प्रचंड और नेपाली कांग्रेस के बीच गठबंधन दिल्ली के लिए ‘अच्छा’ है। लेकिन देश के अंदर कुछ विश्लेषक गठबंधन का झुकाव दिल्ली की ओर अधिक होने की आलोचना करते रहे हैं।
पिछले चुनाव में, नेपाली कांग्रेस ने संसद के निचले सदन में 88 सीटें जीतीं, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) ने 78 सीटें जीतीं और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी सेंटर) ने 32 सीटें जीतीं। बाकी सीटें अन्य पार्टियों ने जीतीं।
संविधान के मुताबिक सरकार बनाने के लिए 275 सीटों में से 138 सीटों की जरूरत होती है।
नेपाल के पूर्व राजनयिक दिनेश भट्टराई ने कहा कि जब सत्ता गठबंधन में बार-बार बदलाव होंगे तो देश के अंदर और बाहर ‘विश्वसनीयता में कमी’ आएगी।
भट्टराई, जो अतीत में नेपाली कांग्रेस के प्रधानमंत्रियों के विदेशी मामलों के सलाहकार भी रह चुके हैं, कहते हैं, ‘नेपाल के भीतर सत्ता के लिए हाथापाई बाहरी शक्तियों को अपनी चालें चलने के लिए प्रोत्साहित करेगी।’
‘नेपाल की भू-राजनीति चीन और भारत जैसे बड़े देशों के बीच होने के कारण बहुत संवेदनशील मानी जाती है। इसलिए, यहां की अस्थिरता को लेकर बाहर भी दिलचस्पी और चिंता है।’
क्या कहते हैं प्रचंड?
पहले कहा जा रहा था कि कांग्रेस और अन्य छोटी पार्टियों के साथ मिलकर माओवादियों का बनाया गठबंधन पाँच साल तक सरकार चलाएगा।
अनौपचारिक रूप से यह भी कहा गया था कि पहले दो साल के लिए प्रचंड प्रधानमंत्री होंगे और उसके बाद नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा और कुछ समय के लिए नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूनिफाइड सोशलिस्ट) के अध्यक्ष माधव कुमार नेपाल सत्ता का नेतृत्व करने वाले थे।
लेकिन सोमवार को प्रचंड ने जो नई राजनीतिक चाल चली उसके बाद वो सभी समझौते टूट गए हैं।
लगातार राजनीतिक समीकरण बदल कर सत्ता में बने रहने में कामयाब रहे प्रचंड इसे स्वाभाविक मानते हैं।
सोमवार को राजनीतिक तनाव के बीच राजधानी काठमांडू में प्रचंड ने कहा, ‘जब तक मैं मर नहीं जाऊंगा, देश में उथल-पुथल मची रहेगी।’
उन्होंने यह भी कहा कि वह ‘बड़ी वामपंथी एकता की शुरुआत’ कर रहे हैं।
बैठक में उन्होंने अपनी विदेश नीति के बारे में भी बताया।
नेपाल की भौगोलिक स्थिति की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, ‘अगर हम एक उचित, वैज्ञानिक, स्वतंत्र और गुटनिरपेक्ष विदेश नीति अपनाने में विफल रहते हैं और अगर हम नेपाली लोगों के साथ एकजुट होने में विफल रहते हैं, तो नेपाल किसी भी समय कठिन स्थिति में जा सकता है।’ (bbc.com/hindi)
ध्रुव गुप्त
‘महिला दिवस’ पर एक बार फिर से स्त्री-शक्ति के गुणगान का सिलसिला शुरू हो गया है। हर तरफ शोर मचा है कि स्त्रियां मां है, देवी हैं, शक्तिस्वरूपा हैं, पूजनीया हैं। यह बात कम ही लोग कहेंगे कि वे पुरुषों के जैसी ही हाड़-मांस की बनी व्यक्ति हैं जिनकी अपनी स्वतंत्र चेतना होती हैं,सोच होती है, इच्छाएं होती हैं, उडऩे की चाहत होती है। किसी न किसी बहाने स्त्रियों का महिमामंडन उनको बेवकूफ बनाने का सदियों पुराना और आजमाया हुआ नुस्खा है। झूठी तारीफें कर हजारों सालों तक धर्म और संस्कृति के नाम पर पुरुषों ने योजनाबद्ध तरीके से उनकी मानसिक कंडीशनिंग की है। इतना कि अपनी बेडिय़ां भी उन्हें आभूषण नजर आने लगे। सदियों तक स्त्रियों ने यह सवाल नहीं पूछा कि किसी भी धर्म अथवा संस्कृति में पुरूष धर्मगुरु और नीतिकार ही आजतक क्यों तय करते रहे हैं कि स्त्रियां कैसे रहें, कैसे हंसे-बोले, क्या पहने-ओढ़े, किससे बोलें- बतियाएं और मर्दों को खुश रखने के लिए क्या-क्या करें? उन्होंने तो यहां तक तय कर रखा है कि मर जाने के बाद किसी दूसरी दुनिया में उनकी क्या भूमिका होने वाली है। स्वर्ग या जन्नत पहुंचकर भी उन्हें अप्सरा या हूरों के रूप में पुरूषों का दिल ही बहलाना है। स्त्रियों के संदर्भ में आजतक गढ़ी गई तमाम नीतियां, मर्यादाएं और आचारसंहिताएं उनके व्यक्तित्व और स्वतंत्र सोच को नष्ट करने के पुरुष-निर्मित औज़ार हैं। भोलेपन में उन्हें अपनी गरिमा मानकर स्त्रियों ने स्वीकार किया और अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व तथा स्वतंत्र चेतना की बलि दे दी।
शिक्षा के प्रसार और कानूनी संरक्षण के विस्तार के साथ अब उन्हें बहुत हद तक समझ आने लगा है कि दुनिया की आधी और श्रेष्ठतर आबादी को अपने इशारों पर चलाने की मर्दों की शातिर चाल उन्हें कहां ले आई है। आज की पढ़ी-लिखी स्त्रियों ने रूढिय़ों से लडक़र अपने लिए थोड़ी आर्थिक आत्मनिर्भरता भी हासिल की है, आत्मविश्वास भी और थोड़ी-सी आज़ादी भी। इस प्रक्रिया में उन्हें शिक्षित और विवेकवान पुरुषों का सहयोग भी मिला है। मगर दुर्भाग्य से ऐसी स्त्रियों और पुरुषों की संख्या अधिक नहीं है। ज्यादातर पुरुष अपनी सोच में आज भी रूढि़वादी हैं और ज्यादातर स्त्रियां आज भी पितृसत्ता की बेडिय़ों में जकड़ी हुई। ग्रामीण क्षेत्रों में अथवा अशिक्षित या अर्धशिक्षित आबादी के बीच स्त्रियों की मुक्ति की खिड़कियां कम ही खुल पाई हैं। पितृसत्ता की जकडऩ से मुक्ति के लिए स्त्रियों को किसी खास दिन या किसी की दया और कृपा की नहीं, बहुत सारी स्वतंत्र सोच के साथ थोड़ी आक्रामकता की जरुरत है। उन्हें देवत्व नहीं, मनुष्यत्व चाहिए। उनकी जिन्दगी क्या और कैसी हो, इसे उनके सिवा किसी और को तय करने का अधिकार नहीं।
शुभेच्छाओं के साथ सभी स्त्रियों को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएं !
तमिलनाडु के सत्तारूढ़ दल द्रविड़ मुनेत्र कडग़म (डीएमके) के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री ए राजा के बयान पर जमकर विवाद हो रहा है। ए राजा की टिप्पणी से कांग्रेस की अगुआई वाला इंडिया गठबंधन भी बैकफुट पर दिख रहा है।
पिछले हफ्ते ए राजा ने कहा था कि भारत पारंपरिक दृष्टि से एक भाषा, एक संस्कृति वाला देश नहीं है।
उन्होंने कहा था कि भारत यह एक देश नहीं, बल्कि एक उपमहाद्वीप है।
एक मार्च को कोयंबटूर में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के जन्मदिन के आयोजन में राजा ने कहा था, ‘एक देश का मतलब है एक भाषा, एक संस्कृति, एक परंपरा। भारत एक देश नहीं बल्कि एक उपमहाद्वीप था। यहाँ तमिलनाडु एक देश है, जिसकी एक भाषा और एक संस्कृति है। मलयालम एक अन्य भाषा और संस्कृति है। इन सभी के एक साथ आने से ही भारत बना है - इसलिए भारत एक उपमहाद्वीप बनता है, एक देश नहीं।’
तमिल में दिया गया ए राजा के इस भाषण का वीडियो क्लिप अंग्रेजी सबटाइटल के साथ सोशल मीडिया पर पिछले दो दिन से वायरल हो रहा है। बीजेपी इसे लेकर इंडिया गठबंधन और कांग्रेस को आड़े हाथों ले रही है।
ए राजा ने और क्या कहा था?
ए राजा ने बिलकिस बानो गैंग रेप केस में दोषियों की रिहाई पर कथित रूप से लगाए गए ‘जय श्री राम’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे जि़क्र करते हुए कहा कि ‘हम ऐसे लोगों के ‘जय श्री राम’ और ‘भारत माता’ क़तई स्वीकार नहीं करेंगे। तमिलनाडु ये कभी स्वीकार नहीं करेगा। अपने लोगों को जाकर कह दीजिए कि हम राम के दुश्मन हैं।’
ए राजा ने हाल के दिनों में दिए गए प्रधानमंत्री के उस बयान का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि चुनाव के बाद डीएमके पार्टी खत्म हो जाएगी।
इस बयान पर राजा ने कहा कि डीएमके तब तक रहेगा जब तक भारत रहेगा।
ए राजा ने कहा था, ‘आपने कहा है कि चुनाव के बाद डीएमके का अस्तित्व नहीं रहेगा। यदि चुनाव के बाद डीएमके नहीं होगा तो भारत भी नहीं होगा, इसे याद रखिए! आप क्या शब्दों से खेल रहे हैं?’
अपने इस बयान को विस्तार देते हुए ए राजा ने संविधान के प्रस्तावना की बात की थी और कहा था, ‘मैं क्यों कह रहा हूं कि भारत नहीं रहेगा? क्योंकि अगर आप सत्ता में फिर आए तो भारतीय संविधान ही नहीं होगा तो भारत नहीं होगा। यदि भारत का अस्तित्व नहीं रहा तो तमिलनाडु एक अलग इकाई बन जाएगा। क्या हम उस परिदृश्य की कामना करते हैं?’
ए राजा ने कहा था कि भारत विविधताओं और कई संस्कृतियों का देश है।
‘अगर आप तमिलनाडु आएं तो वहां एक ही संस्कृति है। केरल की एक अलग, दिल्ली और ओडिशा की एक अलग संस्कृति है। मणिपुरी लोग कुत्ते का मांस खाते हैं, यह एक अलग संस्कृति है। ये उनकी संस्कृति है।’
ए राजा ने कहा था, ‘पानी की एक टंकी से पानी आता है। यही पानी रसोई और शौचालय में जाता है। हम रसोई के लिए शौचालय से पानी नहीं लेते। क्यों? इसी तरह हम अंतर को स्वीकार करते हैं। आपसी अंतर और विविधताओं को स्वीकर करना चाहिए। आपकी (बीजेपी-आरएसएस) समस्या क्या है? क्या आपसे किसी ने गोमांस खाने के लिए कहा? इसलिए विविधता में एकता ही भारत के लिए मायने रखती है। इस देश में विविधताओं को स्वीकार करें।’
ए राजा ने कहा था, ‘क्या मेरे नाक और कान हूबहू दूसरे व्यक्ति के जैसे हैं? नहीं। यह सबके लिए समान क्यों होना चाहिए? हर एक को वैसे ही स्वीकार करना जैसे वे हैं, समझदारी इसी में है। अगर आप सभी को एक जैसा बनाने की कोशिश करेंगे तो क्या होगा? यही खतरा अब आ गया है।’
कांग्रेस और आरडेजी ने बयान के किया किनारा
ए राजा के इस बयान की ना सिर्फ बीजेपी बल्कि उनके अपने गठबंधन के सहयोगी भी आलोचना कर रहे हैं। केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता गिरिराज सिंह ने कहा है कि ऐसे लोग ‘सनातन संस्कृति बर्बाद करना चाहते हैं।’
आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने कहा है कि ‘ये बयान ए राजा के व्यक्तिगत विचार हैं और ये गठबंधन की सोच नहीं है।’
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने भी इस पर कहा है कि कांग्रेस इस बयान से पूरी तरह असहमत है। उन्होंने कहा कि राम सबके हैं।
बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने एक्स पर लिखा, ‘डीएमके की हेट स्पीच लगातार जारी है। उदयनिधि स्टालिन के सनातन धर्म को नष्ट करने के आह्वान के बाद, अब यह एक राजा हैं जो भारत के विभाजन का आह्वान कर रहे हैं। भगवान राम का उपहास कर रहे हैं, मणिपुरियों पर अपमानजनक टिप्पणी कर रहे हैं और एक राष्ट्र के रूप में भारत के विचार पर सवाल उठा रहे हैं।’
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा है कि कांग्रेस ए राजा के बयान की निंदा करती है।
उन्होंने कहा, ‘मैं उनके बयान से 100 फीसदी असहमत हूँ। मैं इस मंच से ऐसे बयान की निंदा करती हूँ। मेरा मानना है कि राम सबके हैं और सर्वव्यापी हैं। मेरा मानना है कि राम जिन्हें इमाम-ए-हिंद कहा जाता था वो समुदायों, धर्मों और जातियों से ऊपर हैं। राम जीवन जीने के आदर्श हैं। राम मर्यादा हैं, राम नीति हैं, राम प्रेम हैं।’
‘मैं इस बयान की पूरी तरह से निंदा करता हूं, ये उनका ( ए राजा का) बयान हो सकता है, मैं इसका समर्थन नहीं करती। मैं इसकी निंदा करती हूं और मुझे लगता है कि लोगों को बात करते समय संयम बरतना चाहिए।’
उदयनिधि ने सनातन धर्म पर क्या कहा था
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे और राज्य सरकार में मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने बीते साल दो सितंबर को तमिलनाडु में आयोजित एक कार्यक्रम में सनातन धर्म को कई ‘सामाजिक बुराइयों के लिए जि़म्मेदार ठहराते हुए इसे समाज से खत्म करने की बात कही थी।
उन्होंने कहा था, ‘सनातन धर्म लोगों को जाति और धर्म के नाम पर बाँटने वाला विचार है। इसे ख़त्म करना मानवता और समानता को बढ़ावा देना है।’
उदयनिधि ने कहा था, ‘जिस तरह हम मच्छर,डेंगू, मलेरिया और कोरोना को खत्म करते हैं, उसी तरह सिर्फ सनातन धर्म का विरोध करना ही काफी नहीं है। इसे समाज से पूरी तरह ख़त्म कर देना चाहिए।’
इस बयान पर आरएसएस, बीजेपी और दक्षिणपंथी खेमे से काफी तीखी प्रतिक्रिया आई है।
बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा था, ‘ये हमारे धर्म पर हमला है।’
हालांकि बयान पर विवाद के बाद भी उदयनिधि ने कहा था कि हम अपने बयान पर कायम हैं।
उन्होंने बोला था कि हमने समाज के सताए हुए और हाशिये पर डाल दिए गए लोगों की आवाज उठाई है, जो सनातन धर्म की वजह से तकलीफ झेल रहे हैं।
उदयनिधि ने कहा था, ‘हम अपनी बात पर कायम हैं और किसी भी कानूनी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हैं। हम द्रविड़ भूमि से सनातन धर्म को हटाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और इससे एक इंच भी पीछे नहीं हटने वाले।’
उदयनिधि की इस टिप्पणी के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और सर्वोच्च अदालत ने सोमवार को उन्हें सख़्त हिदायत दी।
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट उदयनिधि स्टालिन की एक अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उन्होंने मांग की थी कि महाराष्ट, बिहार उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को एक साथ जोड़ दिया जाए।
इस मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच ने कहा कि एक मंत्री होने के नाते उदयनिधि स्टालिन को अपने बयानों में सावधानी बरतनी चाहिए थी और उनके संभावित परिणामों के प्रति सचेत रहना चाहिए।
कोर्ट ने कहा, ‘आप अनुच्छेद 19(1)(ए) (अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार) के तहत अपने अधिकार का दुरुपयोग कर रहे हैं। आप अनुच्छेद 25 (विवेक की आज़ादी, धर्म को मानने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता) के तहत अपने अधिकार का दुरुपयोग कर रहे हैं। अब आप अनुच्छेद 32 के तहत अपने अधिकार (सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने का अधिकार) का इस्तेमाल कर रहे हैं। क्या आप नहीं जानते कि आपने जो कहा उसका परिणाम क्या होगा? आप आम आदमी नहीं हैं। आप मंत्री हैं। आपको परिणाम जानना चाहिए। ’ (bbc.com/hindi)
कंवल भारती
रैदास साहेब की राज्य की अवधारणा आज इसलिए प्रासंगिक है, क्योंकि आज आरएसएस और भाजपा एक ऐसे हिंदू राज्य का निर्माण कर रहे हैं, जिसमें वर्णव्यवस्था को लागू करने का गुप्त एजेंडा निहित है। इस सरकार की जनविरोधी नीतियों और विनिवेश की योजनाओं ने करोड़ों लोगों का रोजगार खत्म करके उन्हें भूखों मरने के लिए असहाय छोड़ दिया है। बता रहे हैं कंवल भारती
एक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा-
ऐसा चाहूँ राज मैं जहाँ मिलै सबन को अन्न।
छोट बड़ो सभ सम बसै रैदास रहे प्रसन्न।।*
-संत रैदास
हिंदू राज्य की स्थापना पर डॉ. आंबेडकर की चेतावनी-
यदि हिंदू राज की स्थापना सच में हो जाती है, तो निस्संदेह यह इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य होगा। चाहे हिंदू कुछ भी कहें, हिंदूधर्म स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिए एक खतरा है। यह लोकतंत्र के लिए असंगत है। किसी भी कीमत पर हिंदू राज को स्थापित होने से रोका जाना चाहिए।
-डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर
रैदास साहेब की उपर्युक्त साखी में एक ऐसे कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना निहित है, जो 600 साल के बाद भी प्रासंगिक है। यह परिकल्पना उस दौर में की गई थी, जब भारत में राजशाही थी। समाज में असमानता और अमीरी-गरीबी अपने चरम पर थी। कबीर के शब्दों में कोई महलों में पलंग-निवाड़ी पर सोता था, तो एक बड़ी आबादी को छप्पर और पुआल का बिछौना भी नसीब नहीं था। किसी के द्वार पर हाथी बंधा होता था, तो बहुत से गरीब लोग अपने बाल-बच्चों तक को बेचकर गुजारा कर रहे थे।
भारत में कानूनन स्वतंत्रता और समानता आने में अभी चार सदियों की देर थी। लेकिन भारत में वैदिक काल से ही स्वतंत्रता और समानता की पक्षधर विचारधारा का अस्तित्व रहा है। कबीर और रैदास उसी परंपरा के अनुयायी थे, जिन्होंने पूरी निडरता और साहस के साथ हर तरह की विषमता और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई थी, और परिवर्तन के लिए जनता को जागरूक किया था।
यह रैदास साहेब की मानवीय चेतना थी, जो उन्होंने एक कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना पंद्रहवीं शताब्दी में ही कर ली थी। ऐसी परिकल्पना वही व्यक्ति कर सकता है, जो अपने समय की राज्य-व्यवस्था से पीडि़त समुदाय का द्रष्टा और भोक्ता दोनों हो, या उस वर्ग से आता हो, जो राज्य की सुविधाओं से वंचित हो। तुलसीदास सोलहवीं शताब्दी में भी ऐसे कल्याणकारी राज्य की कल्पना नहीं कर सके थे, जबकि वह खुद भी दर-दर के भिखारी थे। तुलसी के समय में भी लोगों को दिन-रात मेहनत करने के बावजूद भरपेट खाना नहीं मिलता था। लेकिन तुलसी ने वर्णव्यवस्था को ही आदर्श व्यवस्था माना और सुख-दुख, अमीरी-गरीबी और ऊंच-नीच को पूर्वजन्म के कर्मों का परिणाम कहा। अगर एक-तिहाई आबादी को भरपेट रोटी नहीं मिल रही थी, तो यह तुलसी जैसों की नजर में राज्य-व्यवस्था का दोष नहीं था, बल्कि लोगों के पूर्वजन्म के कर्मों का दोष था। इसलिए एक समावेशी कल्याणकारी राज्य की कल्पना उनके लिए असंभव थी। यहां तक कि वर्णव्यवस्था के विरुद्ध शूद्रों की शिक्षा और बगावत को भी वह कलियुग का दुष्प्रभाव मानते थे।
लेकिन वर्णव्यवस्था का खंडन करने वाले रैदास साहेब ने तुलसी से भी सौ साल पहले यह बता दिया था कि अमीरी-गरीबी और सुख-दुख पूर्वजन्मों का कर्मफल नहीं, बल्कि उसके लिए राज्य की कुव्यवस्था जिम्मेदार है। अगर लोगों को भरपेट खाना नहीं मिल रहा है, तो इसलिए कि राज्य की व्यवस्था कल्याणकारी नहीं है। राज्य की कृपा दीनदुखियों और गरीबों पर नहीं है।
इसलिए रैदास का यह सुचिंतित प्रश्न है कि एक राज्य को कैसा होना चाहिए? उन्होंने कहा कि राज्य ऐसा होना चाहिए, जिसमें राज्य का कोई भी प्राणी भूखा न मरे। यह तभी होगा, जब राज्य अपनी समस्त प्रजा के लिए अन्न की व्यवस्था करेगा। अगर राज्य के सभी लोगों को अन्न सुलभ नहीं हो पा रहा है, तो वह राज्य कल्याणकारी राज्य नहीं हो सकता, वरन प्रजा पर अत्याचार करने वाला राज्य होगा।
सर्वसुलभ का मतलब यह नहीं है कि राज्य जनता को मुफ्त अनाज वितरण करे, बल्कि इसका मतलब यह है कि राज्य के लोगों की आय इतनी होनी चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति आसानी से अनाज खरीद सके। अगर अन्न प्राप्त करने की सामर्थ्य केवल धनी लोगों तक ही सीमित होगी, तो शेष प्रजा अभावग्रस्त ही रहेगी और अपना पेट नहीं भर सकेगी।
रैदास जी की राज्य की अवधारणा में केवल यही नहीं है कि सबके लिए अनाज सुलभ हो, बल्कि यह भी है कि राज्य में छोटे-बड़े के बीच किसी तरह का कोई भेदभाव न हो – न सामाजिक और न आर्थिक। वे सम बसें, अर्थात पूरी समानता के साथ रहें। यह भेदभाव न हो कि जो बड़े लोग हैं, उनको विशेषाधिकार प्राप्त हों, और जो छोटे लोग हैं, उनका दमन हो और उन्हें सम्मान भी प्राप्त न हो।
रैदास साहेब की राज्य की यह अवधारणा इतनी क्रांतिकारी है कि इसमें स्वतंत्रता और समानता के उन मूलभूत अधिकारों की पैरवी की गई है, जिसकी व्याख्या हमें पश्चिम के लोकतंत्र-प्रणाली में मिलती है। हालाँकि वह राजनीतिक पराधीनता का दौर था, किंतु पराधीनता के दौर में भी उच्च वर्गों के लोग स्वाधीन और आत्मनिर्भर थे, जबकि मेहनत करके कमाने-खाने वाले किसान, चर्मकार, कुम्हार, तेली, लुहार आदि उत्पादक लोग न स्वाधीन थे और न आत्मनिर्भर। वे इस कदर पराधीन और गुलाम थे कि वे अपनी बदहाली के खिलाफ फरियाद भी नहीं कर सकते थे। उन्हें न सम्मान मिलता था और ना ही प्यार। ऐसे लोगों को सभी नीच समझते थे। इन शोषित लोगों के प्रति रैदास साहेब के अंदर गहरी सहानुभूति थी। उन्होंने कहा-
पराधीन का दीन क्या, पराधीन बेदीन।
रैदास पराधीन को, सभ ही समझें हीन।
बहुत ही मार्मिक बात रैदास जी ने इस साखी में कही है। वे सिर्फ यही नहीं कहते कि जो पराधीन है, उसका कोई धर्म नहीं है, क्योंकि धर्म स्वाधीनों का ही होता है, बल्कि वे यह भी कहते हैं कि जो पराधीन हैं, उन्हीं को लोग नीच समझते हैं। रैदास साहेब का यह विचार राजनीतिक पराधीनता को लेकर नहीं है, बल्कि आर्थिक पराधीनता को लेकर है। राजनीतिक रूप से पूरा देश पराधीन था। पर सामाजिक और खासतौर से आर्थिक रूप से निम्न वर्गों के मेहनतकश लोग ही पराधीन थे। वस्तुत: रैदास ने इस साखी में वर्णव्यवस्था पर प्रहार किया है, जिसने शूद्र वर्ग को द्विजों के अधीन करके रखा था। इन्हीं पराधीनों को रैदास ने ‘बेदीन’ कहा है। अर्थात वे लोग, जो धर्म-रहित या बेधरम हैं। चूंकि वे लोग बेदीन थे, इसीलिए उन्हें स्वतंत्रता और समानता के अधिकारों से वंचित रखा गया।
रैदास साहेब की राज्य की अवधारणा आज इसलिए प्रासंगिक है, क्योंकि आज आरएसएस और भाजपा एक ऐसे हिंदू राज्य का निर्माण कर रहे हैं, जिसमें वर्णव्यवस्था को लागू करने का गुप्त एजेंडा निहित है। इस सरकार की जनविरोधी नीतियों और विनिवेश की योजनाओं ने करोड़ों लोगों का रोजगार खत्म करके उन्हें भूखों मरने के लिए असहाय छोड़ दिया है। इस सरकार में लोगों की पहुंच से सिर्फ शिक्षा, दवाइयां और न्याय ही बाहर नहीं हो गए हैं, बल्कि दाल-रोटी भी पहुंच से दूर हो गई है। हिंदू राज्य भारत के लोकतंत्र के लिए, स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व के सिद्धांतों के लिए न केवल खतरनाक है, बल्कि देश की एकता के लिए भी घातक है। डॉ. आंबेडकर ने 1940 में ही इस खतरे को महसूस कर लिया था, इसलिए उन्होंने देशवासियों को चेतावनी दी थी कि एक कल्याणकारी राज्य के हित में हिंदू राज्य को स्थापित होने से रोकना होगा। (फॉरवर्डप्रेस)
ऋत्विक दत्ता
हम साल 2024 में हैं। कई क्षेत्रों में महिलाओं की प्रगति के बावजूद ये सवाल कायम है कि स्वास्थ्य, कार्यस्थल, कारोबार और राजनीति में महिलाओं की मौजूदा स्थिति क्या है?
पिछले वक्त की तुलना में भारत की महिलाएं प्रगति कर पा रही हैं या नहीं, ये जानने और हमने उभरते हुए ट्रेंड को समझने के लिए भारत सरकार के डेटा का विश्लेषण किया।
अगर हम अलग-अलग क्षेत्रों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की बात करें तो भारत सरकार के डेटा से ये पता चलता है कि पिछले कुछ सालों की तुलना में इसमें सुधार हुआ है।
हालांकि, विश्लेषक मानते हैं कि अगर करीब से इस पर नजर रखी जाए तो अभी भी सुधार की गुंजाइश है।
हमने कुछ क्षेत्रों में महिलाओं की मौजूदगी की समीक्षा की ताकि विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के प्रतनिधित्व को समझा जा सके।
श्रमशक्ति में महिलाएं
सरकार नियमित समय पर श्रमिकों का सर्वे कराती है। इसके डेटा से ये पता चलता है कि श्रमशक्ति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ा है।
साल 2017-18 में श्रमिकों में महिलाओं की हिस्सेदारी 23.3 प्रतिशत थी जो साल 2020-21 में बढक़र 32.5 प्रतिशत हो गई है।
भारत में श्रमिक महिलाओं की संख्या बढ़ी है लेकिन ये चुनौतियों के बीच एक उम्मीद की तरह ही नजऱ आती है।
बढ़ी हुई संख्या के बावजूद, हज़ारों महिलाएं ऐसी हैं, जिन्होंने कोविड के दौरान और बाद में काम छोड़ दिया। आबादी के अनुपात में पुरुषों की बराबरी में पहुंचने के लिए महिला श्रमिक अब भी संघर्ष कर रही हैं।
आंबेडकर यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर दीपा सिन्हा असंगठित क्षेत्र में श्रमिकों से जुड़े सटीक डेटा की कमी को रेखांकित करते हुए कहती हैं कि इसी वजह से श्रमिकों के लैंगिग अनुपात को समझना और भी जटिल हो जाता है।
शिक्षा पूरी करने के बावजूद बच्चों को जन्म देने, मातृत्व अवकाश और बराबर वेतन जैसी चुनौतियों की वजह से कर्मचारियों में महिलाओं की मौजूदगी अब भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।
डॉ. सिन्हा ज़ोर देकर कहती हैं, ‘बहुत सी महिलाएं या तो अपनी मर्जी से या फिर दबाव में शिक्षा और काम छोड़ देती हैं और इसी वजह से नेतृत्व वालों पदों पर उनका प्रतिनिधित्व और कम हो जाता है।’
वो कहती हैं कि निर्णय लेने वालों पदों में बदलाव रातोरात नहीं हो पाएगा लेकिन कार्यस्थलों पर लैंगिक बराबरी के साथ बेहतर और सुरक्षित माहौल बनाना ज़्यादा महत्वपूर्ण है।
एसटीईएम में पुरुषों से आगे निकली महिलाएं
उच्च शिक्षा पर अखिल भारतीय सर्वे के सबसे ताज़ा डेटा से पता चला है कि शैक्षणिक वर्ष 2020-21 में भारत में 29 लाख से अधिक महिलाओं ने एसटीईएम (विज्ञान, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और गणित) विषयों में दाखिला लिया है। ये संख्या पुरुषों से अधिक है। इसी दौरान 26 लाख पुरुषों ने इन विषयों में दाखिला लिया।
2016-17 में एसटीईएम विषयों में दाखिले के मामले में महिलाएं पुरुषों से पीछे थीं। हालांकि साल 2017-18 में इन विषयों में महिलाओं की संख्या बढ़ी और अगले ही साल यानी 2018-19 में महिलाओं ने इन विषयों में दाखिला लेने के मामले में पुरुषों को पीछे छोड़ दिया।
ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कुल एसटीईएम कर्मचारियों में महिलाएं 27 प्रतिशत हैं। हालांकि अब भी पुरुषों और महिलाओं के वेतन में गैर बराबरी बहुत ज़्यादा है।
लैंगिग वेतन असामनता के मामले में भारत 146 देशों की सूची में 127वें नंबर पर है।
प्रोफेसर दीपा सिन्हा कहती हैं कि एसटीईएम विषयों में लैब तक पहुंच और प्रयोग करना बेहद अहम होता है।
दीपा सिन्हा ज़ोर देकर कहती हैं कि ऐसे संसाधनों तक महिलाओं की पहुंच इस क्षेत्र में महिलाओं की प्रगति को बनाये रखती है।
इस सेक्टर में देर रात तक कार्यस्थलों पर सुरक्षा चिंताओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए और नीति निर्माताओं को और अधिक जि़म्मेदार होना चाहिए।
संसद में प्रतिनिधित्व
भारतीय संसद के निचले सदन लोकसभा में साल 1999 में 48 महिला सदस्य थीं जिनकी तादाद साल 2019 में बढक़र 78 पहुंच गई। इसके बाद हुए कुछ स्थानीय चुनावों और उपचुनावों की वजह से ये संख्या और भी बढ़ गई है।
राज्यसभा में भी ऐसा ही ट्रेंड देखने को मिल रहा है। राज्यसभा के लिए नामित होने वाली महिलाओं की संख्या साल 2012 में 9.8 प्रतिशत से बढक़र साल 2021 में 12.4 प्रतिशत तक पहुंच गई।
हालांकि इससे राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व भले ही बढ़ता हुआ दिख रहा है लेकिन पुरुषों की तुलना में ये भी भी बहुत कम ही है।
इकोनॉमिक फ़ोरम की जेंडर पे गैप रिपोर्ट के मुताबिक़ महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण के मामले में भारत 146 देशों की सूची में 56वें नंबर पर है।
ग़ौरतलब है कि बांग्लादेश ने महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण में भारत को पीछे छोड़ते हुए शीर्ष दस देशों में स्थान हासिल किया है।
बिजनेस स्टैंडर्ड की कंसल्टिंग एडिटर और वरिष्ठ पत्रकार राधिका सामाशेषन कहती हैं कि देश में हुए पहले चुनाव से लेकर अब तक राजनीति में महिलाओं की मौजूदगी में इजाफा हुआ है हालांकि अब भी भारत में महिलाओं को अपनी आबादी के हिसाब से संसद में प्रतिनिधित्व नहीं मिला है।
रामाशेषन कहती हैं कि ये सिर्फ किसी एक राजनीतिक दल तक ही सीमित नहीं हैं। साथ ही, महिला आरक्षण विधेयक अब भी क़ानून नहीं बना है और इसी वजह से राजनीतिक दलों में अभी ये लागू नहीं हो सका है।
स्वास्थ्य
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के ताजा डेटा के मुताबिक़ भारत में अब 18 प्रतिशत महिलाओं का बीएमआई (बॉडी मास इंडेक्स ) अभी कम है। हालांकि साल 2015-16 में ये 22.9 प्रतिशत था।
हालांकि, कम वजऩ वाली महिलाओं की संख्या भले ही कम हुई है लेकिन मोटापा पुरुषों के मुकाबले में महिलाओं में अधिक प्रचलित है। सर्वे से पता चलता है कि भारत में 24 प्रतिशत महिलाएं मोटापे का शिकार हैं जबकि पुरुषों में ये संख्या 22.9 प्रतिशत है।
पोषण से जुड़ी चिंताओं के साथ-साथ, डेटा से पता चलता है कि महिलाओं के सभी आयु वर्गों में एनीमिया लगातार बढ़ रहा है।
भारत में 15-49 आयु वर्ग की 57।2 प्रतिशत महिलाएं एनीमिक हैं, ये साल 2015-16 में 53.2 प्रतिशत था। इसी आयु वर्ग की गर्भवती महिलाओं में आयरन की कमी दिखाई देती है।
सेंटर फॉर सोशल मेडिसिन एंड कम्यूनिटी हेल्थ से जुड़ी डॉ। स्वाति एचआईवी फिज़़ीशियन हैं। डॉ। स्वाति कहती हैं कि चिकित्सा शिक्षा को सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से कुछ स्वास्थ्य मुद्दों को देखने में अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।
भारत जैसे देश में जहां खाद्य ज़रूरतें पूरा करने के मामले में पुरुषों को प्राथमिकता दी जाती है, एनीमिया पोषण की कमी और गऱीबी की वजह से भी होता है। इसकी वजह से महिलाएं सभी ज़रूरी पोषक तत्व हासिल नहीं कर पाती हैं और एनीमिया और कुपोषण की शिकार महिलाओं की तादाद बढ़ जाती है। (bbc.com/hindi)
नाजिया खान
आप बहुत टैलेंटेड हैं, इंटेलिजेंट हैं, बढिय़ा प्रेज़ेंस ऑफ माइंड है, सेंस ऑफ ह्यूमर है, पॉपुलर हैं, ख़ूबसूरत हैं, मिलनसार हैं, स्ट्रेटफॉर्वर्ड हैं, डिप्लोमेटिक हैं, कूटनीतिज्ञ हैं, सक्सेसफुल हैं, वेल-सेटल्ड हैं, स्ट्रेटेजिक हैं, सीधे-सादे हैं, हुनरमंद हैं...
इनमें से एक या अनेक, जो भी क्वालिटीज़ आपमें मौजूद है, लोग जिनकी वजह से आपकी ओर आकर्षित होते हैं, आपको दूर से विस्मय से निहारते रहते हैं, आपके प्रशंसक बन जाते हैं, आपके कऱीब आना चाहते हैं। अगर उनको आपने अपने पर्सनल स्पेस में थोड़ी भी जगह दे दी, तो फिर वे फैलने लगते हैं, कब्ज़ा जमाने लगते हैं। कालांतर में, आपकी उन्हीं विशेषताओं से चिढऩे-कुढऩे लगते हैं, जिनसे आकृष्ट होकर आपकी ओर बढ़े थे। आप बाउंड्री सेट करने की कोशिश करेंगे तो फिर वे आपको चोट पहुँचाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ेंगे, आपकी रेप्यूटेशन, आपकी मेंटल हेल्थ सब चौपट करना चाहेंगे।
वहीं दूसरी ओर जब आप किसी से प्रभावित होकर उसकी तरफ़ बढ़ते हैं और उसे जानने-समझने की कोशिश करते हैं और पाते हैं कि वह वैसा है ही नहीं, जैसा आपने सोचा था या जैसा उसने ख़ुद को प्रेज़ेंट किया हुआ है, जो आभामंडल उसके इर्द-गिर्द बना है, नक़ली है, तब भी आप ठगा सा महसूस करते हैं। लोगों की प्रोफेशनल लाइफ, पर्सनल लाइफ से अलग होती है। कथनी और करनी जैसे ही लेखनी और करनी में भी फक़ऱ् होता है। बड़ी-बड़ी बातें करने वाले,असल में उतने बड़े होते नहीं। किसी से बहुत जल्दी प्रभावित मत होइए। चकाचौंध और भेड़चाल में अंधे मत होइए। फैन हैं किसी के तो उससे सेफ डिस्टेंस मेंटेन रखिये, बहुत घुसने की कोशिश मत कीजिये ताकि फैनडम बरकऱार रहे। बन्द मुट्ठी लाख की, खुल गई तो ख़ाक की।
चन्द्रशेखर गंगराड़े
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस
प्रत्येक वर्ष पूरी दुनिया में 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस अवसर पर विश्व की समस्त नारी शक्ति को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ। आधिकारिक रूप से इसकी शुरूआत वर्ष 1921 में हुई लेकिन इसकी अनौपचारिक शुरूआत वर्ष 1909 में ही 28 फरवरी को न्यूयॉर्क में हो गई थी. वर्ष 1910 में इंटरनेशनल सोशलिस्ट कांग्रेस द्वारा महिला दिवस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाने का निर्णय किया गया. 19 मार्च, 1911 को पहला अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस आयोजित किया गया बाद में 1921 में 19 मार्च के स्थान पर 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का आयोजन किया जाने लगा। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र की आम सभा द्वारा भी वर्ष 1975 से 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाने की शुरूआत की गई।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के आयोजन एवं इसे मनाने का मुख्य उद्देश्य, महिलाओं के अधिकारों का संरक्षण, समाज में उनको समानता का अवसर देना तथा उनके प्रति सम्मान प्रकट करना है. एक पुरूष होने के नाते भी मुझे यहां यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि न केवल विश्व में, अपितु भारत में भी महिलाओं की जनसंख्या लगभग आधी है लेकिन पूर्व में उन्हें पुरूषों के समक्ष, अधिकारों, समानता एवं सम्मान से वंचित रखा गया और यही कारण है कि महिलाओं को अपना अधिकार पाने के लिए आंदोलन करना पड़ा, तब जाकर उन्हें अनेक क्षेत्रों में उनके अधिकार प्राप्त हुए और समानता का अवसर भी मिला. हालांकि अभी-भी इस क्षेत्र में काफी कुछ किया जाना है.
भारतीय प्राचीन संस्कृति में महिलाओं के महत्व का काफी उल्लेख मिलता है और हमारे वेदों में यहां तक उल्लेख किया गया है कि- ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:’ अर्थात् जहां नारियों की पूजा होती है, वहां देवताओं का वास होता है। सनातन धर्म में भी बुद्धि, लक्ष्मी और शक्ति की प्रतीक देवियां ही हैं. जिनकी हम आराधना कर उनसे बल, बुद्धि एवं ऐश्वर्य प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं।
समाज ने जैसे-जैसे महिलाओं की भागीदारी एवं उनकी महत्ता का अनुभव किया, राज्य सरकारों एवं केंद्र सरकार ने भी महिलाओं पर केंद्रित विभिन्न योजनाओं को लागू करना प्रारंभ किया जिससे महिलायें आर्थिक रूप से सुरक्षित रहें और जब महिलायें आर्थिक रूप से सुरक्षित एवं आत्मनिर्भर रहेंगी, तब उनका समाज में आदर एवं सम्मान भी रहेगा. महिलाओं की शक्ति को समझते हुए देर से ही सही भारत सरकार ने भी संसद एवं विधान सभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत स्थान आरक्षित करने का विधेयक पास कर दिया है, जिसके वर्ष 2029 में प्रभावशील होने की संभावना है। समाज के सर्वांगीण विकास में महिलाओं के योगदान को देखते हुए ही वर्ष 2024 में मनाये जाने वाले अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की थीम-
‘इन्वेस्ट इन वुमन : एक्सीलेरेट प्रोग्रेस’
अर्थात् महिलाओं में निवेश करें : प्रगति में तेजी लायें।
इस ध्येय वाक्य से ही महिलाओं की महत्ता स्थापित हो जाती है जिसका आशय है कि यदि किसी राष्ट्र को तरक्की करना है तो महिलाओं की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारतीय संस्कृति एवं समाज में महिलाओं का जो योगदान रहा है, उसकी महत्ता से इंकार नहीं किया जा सकता। महिलायें जिस कुशलता से अपने घर-परिवार की देखभाल करती हैं और बच्चों को जो संस्कार देती हैं, इससे वे अप्रत्यक्ष रूप से देश के भविष्य के निर्माण में अपना योगदान देती हैं।
गृह-कार्य में उनके प्रबंधन को जो स्तर रहता है, उसका सीधा प्रभाव यदि वे राजनीतिक एवं प्रशासनिक क्षेत्र में कार्यरत हैं तो उनकी कार्य संस्कृति में परिलक्षित होता है एवं राजनीतिक तथा प्रशासनिक क्षेत्र में भी शुचिता परिलक्षित होती है जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव देश के आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक विकास पर पड़ता है।
यद्यपि शासकीय सेवाओं में महिलाओं के लिए स्थान राज्य सरकारों द्वारा आरक्षित किए गए हैं और स्थानीय प्रशासन अर्थात् ग्राम-पंचायत, नगर-पंचायत, नगर-पालिका एवं नगर-निगमों में भी महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित हैं लेकिन लोक सभा एवं विधान सभाओं में स्थान आरक्षित न होने के बावजूद, महिलाओं ने राजनैतिक क्षेत्र में अपनी जो अच्छी-खासी उपस्थिति दर्ज की है, यह उनके संघर्ष, साहस तथा आत्मविश्वास का द्योतक है। और मुझे विश्वास है कि जिस देश में महिलाओं को सम्मान मिलेगा और जिस देश की महिलायें जागरूक और आत्मनिर्भर होंगी वह देश विकास के पथ पर सदैव अग्रसर रहेगा।
पूर्व प्रमुख सचिव
छत्तीसगढ़ विधानसभा
साल 2006 में शांति का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस को लगता है कि 2007 में बांग्लादेश में सैन्य समर्थित कार्यवाहक सरकार के दौरान एक राजनीतिक पार्टी बनाने की उनकी पहल एक ग़लती थी।
प्रोफेसर यूनुस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘गरीबों के बैंकर’ के तौर पर जाना जाता है। बीबीसी बांग्ला को दिए एक इंटरव्यू में प्रोफेसर यूनुस ने दावा किया कि उस समय सेना समर्थित सरकार के अनुरोध के बावजूद उन्होंने सरकार का मुखिया बनना स्वीकार नहीं किया था। बाद में सबके अनुरोध पर उन्होंने राजनीतिक पार्टी बनाने की पहल की थी। लेकिन इस पहल के दस सप्ताह के भीतर ही वो पीछे हट गए थे।
बीबीसी बांग्ला से बातचीत में उन्होंने सवाल किया कि क्या दस सप्ताह के उस घटनाक्रम का खामियाजा उन्हें जिंदगीभर भुगतना होगा?
प्रोफेसर यूनुस ने उस समय ‘नागरिक शक्ति’ नामक राजनीतिक पार्टी बनाने की पहल की थी।
बीबीसी बांग्ला के संपादक मीर शब्बीर के साथ कऱीब एक घंटे की बातचीत के दौरान इस नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री ने अपने खिलाफ चलने वाले मामलों, अपनी संस्था पर जबरन कब्जे के आरोप, बांग्लादेश चुनाव और लोकतांत्रिक व्यवस्था के अलावा पद्मा सेतु की फंडिंग रोकने की घटना समेत तमाम मुद्दों पर खुलकर जवाब दिया।
प्रोफेसर ने बताया कि उनके खिलाफ सौ से ज़्यादा मामले चल रहे हैं। उनमें सजा हुई है। एक मामले में वो जमानत पर हैं। इसका असर उनके निजी जीवन पर भी पड़ा है।
वह कहते हैं, ‘निजी जीवन में सब कुछ तहस-नहस हो गया है। मेरी पत्नी डिमेंशिया की मरीज़ है। वह मेरे अलावा किसी को नहीं पहचानती। उसकी देखभाल का पूरा जिम्मा मुझ पर है। इस परिस्थिति में अगर जेल में रहना पड़ा तो उनकी क्या हालत होगी?’
मामले और जेल की सजा
प्रोफेसर यूनुस और उनकी संस्था के ख़िलाफ़ श्रम कानूनों के उल्लंघन और भ्रष्टाचार निरोधक आयोग के समक्ष मनी लॉन्ड्रिंग समेत जो सौ से ज़्यादा मामले हैं उनमें से एक में छह महीने की सजा हुई है। कई मामलों की अब भी सुनवाई चल रही है।
इन मामलों के कारण उनको क़ानूनी लड़ाई में बहुत समय देना पड़ता है। उन्होंने बीबीसी बांग्ला से कहा, ‘मैं किसी योजना का कार्यक्रम तैयार नहीं कर पाता। मेरे और मुझसे जुड़े लोगों के जीवन में एक तरह की अनिश्चितता पैदा हो गई है।’
बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक के संस्थापक
प्रोफेसर बताते हैं कि ग्रामीण के संस्थानों से वह कोई वेतन-भत्ता नहीं लेते, वह अवैतनिक रूप से वहां काम करते हैं।
वह कहते हैं, ‘इन संस्थानों को तैयार करने में ही मेरा जीवन बीत गया। मेरा परिवार ख़त्म हो गया। मेरे पुत्र-पुत्रियों का भविष्य नष्ट हो गया। अब लोग मुझसे डरते हैं। मैं एक सजायाफ्ता हूं।’
संस्थान पर क़ब्ज़ा?
प्रोफेसर यूनुस ने इस साल फऱवरी में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपने संस्थान ग्रामीण टेलीकॉम और ग्रामीण कल्याण समेत आठ संस्थानों पर जबरन कब्ज़े करने का आरोप लगाया था। यह तमाम संस्थान ढाका के मीरपुर में चिडिय़ाखाना रोड पर स्थित टेलीकॉम भवन में थे।
लेकिन अब उन संस्थानों की क्या स्थिति है? इस सवाल पर उनका कहना था, ‘फिलहाल हम लोग यहां हैं। लेकिन यह नहीं पता कि भविष्य में क्या होगा। अचानक कुछ लोग वहां पहुंचे और शोरगुल करने लगे। नियम कानून की परवाह किए बिना वो सबको आदेश देने लगे।’
वो बताते हैं कि उन लोगों ने ग्रामीण बैंक से चि_ी लाने का दावा कर चेयरमैन से लेकर सब कुछ बदलने की बात कह कर अधिकारियों और कर्मचारियों को डरा दिया था। इसके जरिए उन्होंने एक डरावना माहौल भले बना दिया, लेकिन अब कब्जा करने के लिए आने वाले लोग इस संस्थान में नजर नहीं आते।
क्या अब जबरन दखल का मामला ख़त्म हो गया है? इस सवाल पर प्रोफेसर यूनुस ने बताया, ‘फिलहाल ऐसा कुछ हमें नजर नहीं आ रहा है। भीतर-भीतर हो भी सकता है। हमें तो यह भी नहीं पता कि कल क्या होगा।’
ग्रामीण बैंक से प्रतिद्वंद्विता क्यों?
प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस और ग्रामीण बैंक को साल 2006 में संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। नोबेल विजेता संगठन और नोबेल विजेता व्यक्ति के बीच शत्रुतापूर्ण संबंध कैसे बने?
इसके जवाब में नोबेल विजेता अर्थशास्त्री ने कहा, ‘क्या यह एक अनूठा मामला नहीं है? इसे एक मजबूत संबंध होना चाहिए था। अब उसी संस्थान का नाम लेकर उग्र रूप से हमला करने आ रहे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है?’
मोहम्मद यूनुस ने साल 2011 में ग्रामीण बैंक की जिम्मेदारी छोड़ दी थी। इसके कऱीब 13 साल बाद बीती फरवरी में एक गुट ने उसी ग्रामीण बैंक पर कब्जे का प्रयास किया।
प्रोफेसर यूनुस बीबीसी बांग्ला को दिए इंटरव्यू में कहते हैं, ‘बांग्लादेश में नोबेल पुरस्कार आया। सबके मन में बेहद खुशी थी। लोगों में लंबे समय तक यह खुशी बनी रही। इसकी याद बांग्लादेश के लोगों के मन में गहराई तक बसी हुई है।’
उनका कहना था कि नोबेल तो कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसकी खोज मैंने की है, यह पूरी दुनिया में स्वीकार्य है।
क्या इस शत्रुतापूर्ण रिश्ते को सुधारने के लिए कोई पहल की गई थी? इस सवाल पर उनका कहना था, ‘नहीं, मेरे साथ कोई संपर्क नहीं किया गया। हमारी ओर से रिश्ते में कोई दरार नहीं पैदा की गई है।’
‘अब कौन किसका ख़ून चूस रहा है?’
ग्रामीण बैंक ने माइक्रो क्रेडिट की अवधारणा के माध्यम से पूरी दुनिया में असर छोड़ा था। प्रोफ़ेसर यूनुस की इस अवधारणा के कारण ही उनको और ग्रामीण बैंक को साल 2006 शांति का नोबेल मिला था। लेकिन उसके बाद सत्तारूढ़ अवामी लीग और प्रधानमंत्री ने कथित रूप से कई बार यूनुस को ‘सूदखोर’ कहा था, अलग-अलग समय पर मीडिया में ऐसी खबरें छपती रही हैं।
प्रोफेसर यूनुस ने इस मुद्दे पर भी अपनी बात रखी। वह कहते हैं, ‘हम खून चूसने वाले हैं। ठीक है, हम यही सही। जब हमने माइक्रो क्रेडिट के मुद्दे पर काम शुरू किया तब लोग हमें खून चूसने वाला कहते थे। अब तो सब लोग यही व्यापार कर रहे हैं। सरकार नियम नीति बना कर पैसे दे रही है। अब कौन किसका खून चूस रहा है?’
उनका कहना था, ‘मुझे कई बार सूदखोर कहा गया है। सुनकर तकलीफ़ होती है। जो व्यक्ति बांग्लादेश के लिए नोबेल पुरस्कार ले आया, उसे प्रधानमंत्री ऐसे अपमानित करेंगी, यह तो किसी को अच्छा नहीं लगेगा। यह तो देश को लोगों को भी पसंद नहीं आना चाहिए।’
‘अगर आप एक बात बार-बार कहेंगे तो वह लोगों के मन में बैठ जाएगी। लोगों को लगेगा कि यह अच्छा आदमी नहीं हैं। देश का नुकसान कर रहे हैं। लोग तो मेरी ओर देखकर कहते हैं कि यह सूदखोर है, इसे पकड़ो।’
मोहम्मद यूनुस अफसोस जताते हुए कहते हैं, ‘मुझे भी यह जानने की इच्छा होती है कि वह लोग ऐसी बातें क्यों कहते हैं। मुझे लोगों को अपमानित करने के अलावा इसका दूसरा कोई उद्देश्य नजर नहीं आता।’
उन्होंने दूसरे बैंकों के साथ ग्रामीण बैंक की ब्याज दर के अंतर का भी जिक्र किया। वह कहते हैं, ‘ग्रामीण बैंक का 75 प्रतिशत मालिकाना हक सदस्यों के पास है। तो अगर ब्याज खाते भी हैं तो गऱीब और महिलाएं ही खा रही हैं। लेकिन बीच में मैं सूदखोर हो गया? मुझे निजी तौर पर सूदखोर क्यों कहा जा रहा है? ग्रामीण बैंक के ब्याज की दर सबसे कम है। ब्याज की दर नियंत्रित करने का अधिकार माइक्रो क्रेडिट अथॉरिटी के पास है जो सरकारी संस्था है।’
वन इलेवन की घटना पर सवाल
साल 2007 में वन इलेवन के बाद सेना के समर्थन वाली कार्यवाहक सरकार के कार्यकाल में मोहम्मद यूनुस बांग्लादेश की राजनीति में काफ़ी अहम हो गए थे। तब पूर्व प्रधानमंत्री बेगम ख़ालिदा जिय़ा और मौजूदा प्रधानमंत्री शेख़ हसीना से इतर एक राजनीति की कोशिश हो रही थी। उस समय प्रोफ़ेसर यूनुस के नेतृत्व में एक राजनीतिक पार्टी बनाने की चर्चा भी जोरों पर थी।
प्रोफेसर यूनुस ने इस मुद्दे पर कहा, ‘उस समय सेना तो मेरे पास ही आई थी। उसने मुझे सरकार का मुखिया बनने का प्रस्ताव दिया था। कहा था कि आप बांग्लादेश की सत्ता संभालिए। मैंने इससे मना कर दिया। मैं तो राजनीति नहीं करता। मैं राजनीति का आदमी नहीं हूं।’
उन्होंने ऐसी परिस्थिति में नागरिक शक्ति नामक एक पार्टी बनाने की पहल करने की बात कही।
उनका कहना था, ‘मुझे कई तरह के दबाव में डाला गया। तब मैंने सबको पत्र भेजा और सबसे राय लेता रहा। इसके समर्थन और विरोध में कई प्रस्ताव मिले। पार्टी के नाम पर कौतूहल था। तब मैंने नागरिक शक्ति नाम दिया। बाद में मैंने कह दिया कि अब और राजनीति में नहीं रहूंगा, मैं राजनीति नहीं करना चाहता।’ (बाकी पेज 8 पर)
अब मोहम्मद यूनुस मानते हैं कि राजनीतिक पार्टी बनाने का फैसला गलत था।
बांग्लादेश चुनाव और लोकतंत्र
बांग्लादेश का बारहवां राष्ट्रीय चुनाव हाल में संपन्न हुआ है। अवामी लीग ने लगातार चौथी बार जीत हासिल कर सरकार का गठन किया है। लेकिन उस चुनाव से पहले यूनुस के हवाले कार्यवाहक सरकार के सत्ता में आने की बात भी सुनने में आ रही थी। लेकिन उनका कहना था कि वह सब अफवाह थी।
चुनाव के बाद सरकार के गठन के बावजूद उनको लगता है कि देश में अब भी लोकतंत्र पर एक तरह का संकट है।
उन्होंने बीबीसी बांग्ला से कहा, ‘हम फिलहाल लोकतंत्रविहीन स्थिति में हैं। मैंने वोट नहीं डाला। कइयों ने वोट नहीं दिया। मैं तो मतदान में हिस्सा नहीं ले सका। कई अन्य लोग भी ऐसा नहीं कर सके। अगर मैं वोट नहीं डाल सका और मतदान में हिस्सा नहीं ले सकता तो यह कैसा लोकतंत्र है?’
पद्मा सेतु की फंडिंग में किसने बाधा पहुंचाई थी?
अवामी लीग सरकार ने साल 2009 में सत्ता में आने के बाद पद्मा सेतु के निर्माण की पहल की थी। उस समय विश्व बैंक भी इसके लिए वित्तीय सहायता मुहैया कराने के लिए तैयार हो गया। लेकिन भ्रष्टाचार के आरोप में वह सहायता बीच में ही रुक गई।
इसके बाद प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने विभिन्न सभाओं में आरोप लगाया कि मोहम्मद यूनुस के प्रभावित करने के कारण ही यह फंडिंग रुक गई थी।
इसके जवाब में यूनुस ने कहा, ‘मेरे पास तो इसमें बाधा पहुंचाने की कोई वजह नहीं थी। पद्मा सेतु देश के लोगों का सपना है। इसमें बाधा डालने का सवाल क्यों पैदा हो रहा है? विश्व बैंक तो मेरे प्रभावित करने का इंतजार नहीं कर रहा। उसका कहना है कि भ्रष्टाचार हुआ है।’ (bbc.com/hindi)
तमिलनाडु के सत्तारूढ़ दल द्रविड़ मुनेत्र कडग़म (डीएमके) के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री ए राजा के बयान पर जमकर विवाद हो रहा है। ए राजा की टिप्पणी से कांग्रेस की अगुआई वाला इंडिया गठबंधन भी बैकफुट पर दिख रहा है।
पिछले हफ्ते ए राजा ने कहा था कि भारत पारंपरिक दृष्टि से एक भाषा, एक संस्कृति वाला देश नहीं है।
उन्होंने कहा था कि भारत यह एक देश नहीं, बल्कि एक उपमहाद्वीप है।
एक मार्च को कोयंबटूर में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के जन्मदिन के आयोजन में राजा ने कहा था, ‘एक देश का मतलब है एक भाषा, एक संस्कृति, एक परंपरा। भारत एक देश नहीं बल्कि एक उपमहाद्वीप था। यहाँ तमिलनाडु एक देश है, जिसकी एक भाषा और एक संस्कृति है। मलयालम एक अन्य भाषा और संस्कृति है। इन सभी के एक साथ आने से ही भारत बना है - इसलिए भारत एक उपमहाद्वीप बनता है, एक देश नहीं।’
तमिल में दिया गया ए राजा के इस भाषण का वीडियो क्लिप अंग्रेजी सबटाइटल के साथ सोशल मीडिया पर पिछले दो दिन से वायरल हो रहा है। बीजेपी इसे लेकर इंडिया गठबंधन और कांग्रेस को आड़े हाथों ले रही है।
ए राजा ने और क्या कहा था?
ए राजा ने बिलकिस बानो गैंग रेप केस में दोषियों की रिहाई पर कथित रूप से लगाए गए ‘जय श्री राम’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे जि़क्र करते हुए कहा कि ‘हम ऐसे लोगों के ‘जय श्री राम’ और ‘भारत माता’ क़तई स्वीकार नहीं करेंगे। तमिलनाडु ये कभी स्वीकार नहीं करेगा। अपने लोगों को जाकर कह दीजिए कि हम राम के दुश्मन हैं।’
ए राजा ने हाल के दिनों में दिए गए प्रधानमंत्री के उस बयान का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि चुनाव के बाद डीएमके पार्टी खत्म हो जाएगी।
इस बयान पर राजा ने कहा कि डीएमके तब तक रहेगा जब तक भारत रहेगा।
ए राजा ने कहा था, ‘आपने कहा है कि चुनाव के बाद डीएमके का अस्तित्व नहीं रहेगा। यदि चुनाव के बाद डीएमके नहीं होगा तो भारत भी नहीं होगा, इसे याद रखिए! आप क्या शब्दों से खेल रहे हैं?’
अपने इस बयान को विस्तार देते हुए ए राजा ने संविधान के प्रस्तावना की बात की थी और कहा था, ‘मैं क्यों कह रहा हूं कि भारत नहीं रहेगा? क्योंकि अगर आप सत्ता में फिर आए तो भारतीय संविधान ही नहीं होगा तो भारत नहीं होगा। यदि भारत का अस्तित्व नहीं रहा तो तमिलनाडु एक अलग इकाई बन जाएगा। क्या हम उस परिदृश्य की कामना करते हैं?’
ए राजा ने कहा था कि भारत विविधताओं और कई संस्कृतियों का देश है।
‘अगर आप तमिलनाडु आएं तो वहां एक ही संस्कृति है। केरल की एक अलग, दिल्ली और ओडिशा की एक अलग संस्कृति है। मणिपुरी लोग कुत्ते का मांस खाते हैं, यह एक अलग संस्कृति है। ये उनकी संस्कृति है।’
ए राजा ने कहा था, ‘पानी की एक टंकी से पानी आता है। यही पानी रसोई और शौचालय में जाता है। हम रसोई के लिए शौचालय से पानी नहीं लेते। क्यों? इसी तरह हम अंतर को स्वीकार करते हैं। आपसी अंतर और विविधताओं को स्वीकर करना चाहिए। आपकी (बीजेपी-आरएसएस) समस्या क्या है? क्या आपसे किसी ने गोमांस खाने के लिए कहा? इसलिए विविधता में एकता ही भारत के लिए मायने रखती है। इस देश में विविधताओं को स्वीकार करें।’
ए राजा ने कहा था, ‘क्या मेरे नाक और कान हूबहू दूसरे व्यक्ति के जैसे हैं? नहीं। यह सबके लिए समान क्यों होना चाहिए? हर एक को वैसे ही स्वीकार करना जैसे वे हैं, समझदारी इसी में है। अगर आप सभी को एक जैसा बनाने की कोशिश करेंगे तो क्या होगा? यही खतरा अब आ गया है।’
कांग्रेस और आरडेजी ने बयान के किया किनारा
ए राजा के इस बयान की ना सिर्फ बीजेपी बल्कि उनके अपने गठबंधन के सहयोगी भी आलोचना कर रहे हैं। केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता गिरिराज सिंह ने कहा है कि ऐसे लोग ‘सनातन संस्कृति बर्बाद करना चाहते हैं।’
आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने कहा है कि ‘ये बयान ए राजा के व्यक्तिगत विचार हैं और ये गठबंधन की सोच नहीं है।’
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने भी इस पर कहा है कि कांग्रेस इस बयान से पूरी तरह असहमत है। उन्होंने कहा कि राम सबके हैं।
बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने एक्स पर लिखा, ‘डीएमके की हेट स्पीच लगातार जारी है। उदयनिधि स्टालिन के सनातन धर्म को नष्ट करने के आह्वान के बाद, अब यह एक राजा हैं जो भारत के विभाजन का आह्वान कर रहे हैं। भगवान राम का उपहास कर रहे हैं, मणिपुरियों पर अपमानजनक टिप्पणी कर रहे हैं और एक राष्ट्र के रूप में भारत के विचार पर सवाल उठा रहे हैं।’
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा है कि कांग्रेस ए राजा के बयान की निंदा करती है।
उन्होंने कहा, ‘मैं उनके बयान से 100 फीसदी असहमत हूँ। मैं इस मंच से ऐसे बयान की निंदा करती हूँ। मेरा मानना है कि राम सबके हैं और सर्वव्यापी हैं। मेरा मानना है कि राम जिन्हें इमाम-ए-हिंद कहा जाता था वो समुदायों, धर्मों और जातियों से ऊपर हैं। राम जीवन जीने के आदर्श हैं। राम मर्यादा हैं, राम नीति हैं, राम प्रेम हैं।’
‘मैं इस बयान की पूरी तरह से निंदा करता हूं, ये उनका ( ए राजा का) बयान हो सकता है, मैं इसका समर्थन नहीं करती। मैं इसकी निंदा करती हूं और मुझे लगता है कि लोगों को बात करते समय संयम बरतना चाहिए।’
उदयनिधि ने सनातन धर्म पर क्या कहा था
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे और राज्य सरकार में मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने बीते साल दो सितंबर को तमिलनाडु में आयोजित एक कार्यक्रम में सनातन धर्म को कई ‘सामाजिक बुराइयों के लिए जि़म्मेदार ठहराते हुए इसे समाज से खत्म करने की बात कही थी।
उन्होंने कहा था, ‘सनातन धर्म लोगों को जाति और धर्म के नाम पर बाँटने वाला विचार है। इसे ख़त्म करना मानवता और समानता को बढ़ावा देना है।’
उदयनिधि ने कहा था, ‘जिस तरह हम मच्छर,डेंगू, मलेरिया और कोरोना को खत्म करते हैं, उसी तरह सिर्फ सनातन धर्म का विरोध करना ही काफी नहीं है। इसे समाज से पूरी तरह ख़त्म कर देना चाहिए।’
इस बयान पर आरएसएस, बीजेपी और दक्षिणपंथी खेमे से काफी तीखी प्रतिक्रिया आई है।
बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा था, ‘ये हमारे धर्म पर हमला है।’
हालांकि बयान पर विवाद के बाद भी उदयनिधि ने कहा था कि हम अपने बयान पर कायम हैं।
उन्होंने बोला था कि हमने समाज के सताए हुए और हाशिये पर डाल दिए गए लोगों की आवाज उठाई है, जो सनातन धर्म की वजह से तकलीफ झेल रहे हैं।
उदयनिधि ने कहा था, ‘हम अपनी बात पर कायम हैं और किसी भी कानूनी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हैं। हम द्रविड़ भूमि से सनातन धर्म को हटाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और इससे एक इंच भी पीछे नहीं हटने वाले।’
उदयनिधि की इस टिप्पणी के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और सर्वोच्च अदालत ने सोमवार को उन्हें सख़्त हिदायत दी।
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट उदयनिधि स्टालिन की एक अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उन्होंने मांग की थी कि महाराष्ट, बिहार उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को एक साथ जोड़ दिया जाए।
इस मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच ने कहा कि एक मंत्री होने के नाते उदयनिधि स्टालिन को अपने बयानों में सावधानी बरतनी चाहिए थी और उनके संभावित परिणामों के प्रति सचेत रहना चाहिए।
कोर्ट ने कहा, ‘आप अनुच्छेद 19(1)(ए) (अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार) के तहत अपने अधिकार का दुरुपयोग कर रहे हैं। आप अनुच्छेद 25 (विवेक की आज़ादी, धर्म को मानने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता) के तहत अपने अधिकार का दुरुपयोग कर रहे हैं। अब आप अनुच्छेद 32 के तहत अपने अधिकार (सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने का अधिकार) का इस्तेमाल कर रहे हैं। क्या आप नहीं जानते कि आपने जो कहा उसका परिणाम क्या होगा? आप आम आदमी नहीं हैं। आप मंत्री हैं। आपको परिणाम जानना चाहिए। ’ (bbc.com/hindi)
अंजली
देश के ग्रामीण क्षेत्रों में आय का सबसे सशक्त माध्यम कृषि है। देश की आधी से अधिक ग्रामीण आबादी कृषि पर निर्भर करती है। इसके बाद जिस व्यवसाय पर ग्रामीण सबसे अधिक निर्भर करते हैं वह है पशुपालन। बड़ी संख्या में ग्रामीण भेड़, बकरी और मुर्गी पालन कर इससे आय प्राप्त करते हैं। जम्मू कश्मीर में तो बाकायदा गुजर बकरवाल नाम से एक समुदाय है जो सदियों से भेड़ और बकरी पालन का काम करता आ रहा है। इस समुदाय को जम्मू कश्मीर में अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त है। जम्मू कश्मीर की तरह राजस्थान में भी बड़ी संख्या में ग्रामीण भेड़, बकरी और ऊंट पाल कर आमदनी प्राप्त कर रहे हैं। हालांकि पशुधन जहां आय का प्रमुख जरिया है वहीं इसके पालन और चारा की व्यवस्था एक बड़ी समस्या के रूप में भी रहती है।
राजस्थान के बीकानेर स्थित लूणकरणसर ब्लॉक के कालू गांव के ग्रामीण भी बड़ी संख्या में पशुधन आय का माध्यम बना हुआ है। यह गांव ब्लॉक मुख्यालय से लगभग 20 किमी और जिला मुख्यालय से करीब 92 किमी दूर है। इस गांव की जनसंख्या करीब 10334 है। यहां अनुसूचित जाति की संख्या करीब 14।5 प्रतिशत है। गांव में साक्षरता की दर लगभग 54।7 प्रतिशत है, जिसमें महिलाओं की साक्षरता दर मात्र 22।2 प्रतिशत है। इस गांव में 250 ऐसे घर हैं जो भेड़ बकरियां पालने का काम करते हैं। प्रत्येक परिवार के पास कम से कम 100 भेड़ बकरियाँ और ऊंट अवश्य है। जबकि कुछ परिवार ऐसे भी हैं जिनके पास लगभग 400 से भी अधिक मवेशियाँ हैं। जिन्हें चराने के लिए कई बार पशुपालकों को काफी समस्याओं का सामना करनी पड़ती है। भेड़ बकरियों को चराने के लिए जब वह उन्हें खेत में लेकर जाते हैं तो कई बार खेत के मालिक उन्हें वहां चराने से मना कर देते हैं। वहीं कई बार जब खेतों में चारा खत्म हो जाता है और बारिश नही होती है तो इन्हें अपने मवेशियों को लेकर अन्य स्थानों की ओर पलायन करने पर मजबूर होना पड़ता है।
गांव से कुछ किमी दूर सेना के अभ्यास के लिए फायरिंग रेंज एरिया है, अक्सर ग्रामीण वहां अपने मवेशियों को चराने ले जाते हैं। लेकिन भारतीय सेना के लिए यह स्थान आरक्षित होने के कारण इन्हें वहां अपने जानवरों को चराने में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। हालांकि ग्रामीणों की इस समस्या को देखते हुए स्थानीय संस्था उर्मुल द्वारा एक सी।एफ।सी सेंटर (कॉमन फैसिलिटी सेंटर) खोला गया है। यह गांव की गोचर भूमि है। जिसे 150 बीघा जमीन में बनवाया गया है। इसमें चारों ओर तारे बंधी हुई हैं। जिसमें चारे की उचित व्यवस्था की गई है। यहां पर पानी की व्यवस्था के लिए 4 कुंड भी बनाए गए हैं। इसके अतिरिक्त इस भूमि पर एक जोहड़ (कुंड) की भी व्यवस्था करवाई गई है जिसमें वर्षा के दिनों में पानी इक_ा करने की व्यवस्था की गई है। इसके अतिरिक्त इस सेंटर में भेड़ों की ऊन कटिंग की व्यवस्था भी की गई है। जहां पशुपालक आधुनिक मशीनों के माध्यम से अपनी अपनी भेड़ों के ऊन उतरवाते हैं। इसके अतिरिक्त यहां मवेशियों वैक्सीन की भी व्यवस्था की गई है, तथा उनके बीमार होने पर इलाज का भी पूरा इंतज़ाम किया गया है। इतना ही नहीं, इस दौरान पशुपालकों के लिए ठहरने के लिए भवन का भी निर्माण किया गया है। इस चारागाह में सालाना कम से कम 1900 से अधिक मवेशी आते हैं।
इस कॉमन फैसिलिटी सेंटर के कारण कालू गांव के पशुपालकों को अपने मवेशियों को चराने की समस्या लगभग समाप्त हो गई है। मवेशियों को पर्याप्त चारा और मेडिकल सुविधा मिलने के कारण जानवर काफी स्वस्थ रहते हैं। जिसका लाभ ग्रामीणों को अधिक आय के रूप में मिलने लगा है। इस संबंध में गांव के निवासी माना राम का कहना कि वर्तमान में मेरे पास 97 भेड़ और 8 बकरियां हैं। जिन्हें बेच कर मुझे एक साल में दस हजार तक की आमदनी हो जाती है। इसके अतिरिक्त एक साल में तीन बार भेड़ और ऊन के बालों की कटिंग भी करते हैं। जो अलग अलग महीनों में अलग अलग दामों पर बिकते हैं। मार्च में जहां भेड़ के बाल 170 रुपए किलो बिकता है वहीं जुलाई में इसकी कीमत 70 से 80 रुपए किलो होती है। हालांकि नवंबर और दिसंबर में यह 50 से 60 रुपए किलो बिकती है। उन्होंने बताया कि एक बार में भेड़ से डेढ़ किलो ऊन प्राप्त हो जाता है। वहीं एक अन्य मवेशी पालक प्रेम का कहना है कि मेरे पास 68 भेड़ें और 17 बकरियां हैं। जिनसे मुझे सालाना 60 से 70 हजार रुपए तक की आमदनी हो जाती है। भेड़ों का ऊन बेचकर जहां काफी लाभ मिलता है। वहीं उनका मीट 350 रुपए किलो बिकता है। प्रेम कहते हैं कि मुझे बकरी का दूध बेचकर भी काफी लाभ मिल जाता है। कई बार बीमारों के लिए लोग ऊंचे दामों में बकरियों का दूध भी खरीदते हैं। जिसकी हमें अच्छी कीमत मिलती है।
वहीं एक अन्य पशुपालक राजू राम कहना है कि मेरे पास 386 भेड़ हैं। हम परिवार के चार लोग साल में आठ महिने घर से बाहर भेड़ों को चराने के लिए ले जाते हैं। इन मवेशियों से मेरे परिवार को सालाना ढाई लाख रुपए की आमदनी हो जाती है। हालांकि इस आमदनी को प्राप्त करने में हमें काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जब हम एक साथ इतनी सारी भेंडो को लेकर गांव से पलायन करते हैं तो कई बार रोड पर एक्सीडेंट से हमारी भेंड़े मर भी जाती हैं। सरकार द्वारा हमारे मवेशियों का कोई बीमा भी नहीं होता है। जिससे मरने वाले जानवरों का कोई मुआवज़ा भी नहीं मिलता है। इससे हमें काफी नुकसान उठाना पड़ता है। इसके अतिरिक्त रास्ते में चारे पानी की भी कोई उचित व्यवस्था नहीं हो पाती है। बीमारी आने पर उन मवेशियों के लिए किसी प्रकार की वैक्सीनेशन की व्यवस्था भी नहीं होता है। इसके कारण हमें जानवरों का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। गांव में जब हम वापस आते हैं तो इतनी सारी भेड़ो को रखने के लिए उचित स्थान भी नहीं होता है। वहीं आंधी और बारिश के समय भी बहुत से मवेशी मारे जाते हैं। जिसके नुकसान की कोई भरपाई नहीं हो पाती है।
बहरहाल, गांव में कॉमन फैसिलिटी सेंटर की व्यवस्था होने के कारण पहले की तुलना में मवेशी पालकों को काफी सुविधाएं मिलने लगी हैं। लेकिन जानवरों का बीमा नहीं होना इन मवेशी पालकों के लिए आज भी एक समस्या बनी हुई है। ऐसे में सरकार को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिससे कि इन्हें धरातल पर सभी सुविधाओं का लाभ मिल सके। ताकि मवेशी पालक अधिक से अधिक मवेशी पालने को प्रोत्साहित हो सकें क्योंकि वर्तमान में कृषि के बाद जिस प्रकार से मवेशी पालन ग्रामीणों की आय का प्रमुख स्रोत बनता जा रहा है, वह न केवल उनके लिए बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए भी सकारात्मक संकेत कहे जा सकते हैं। (चरखा फीचर)
देश के ग्रामीण क्षेत्रों में आय का सबसे सशक्त माध्यम कृषि है। देश की आधी से अधिक ग्रामीण आबादी कृषि पर निर्भर करती है। इसके बाद जिस व्यवसाय पर ग्रामीण सबसे अधिक निर्भर करते हैं वह है पशुपालन। बड़ी संख्या में ग्रामीण भेड़, बकरी और मुर्गी पालन कर इससे आय प्राप्त करते हैं। जम्मू कश्मीर में तो बाकायदा गुजर बकरवाल नाम से एक समुदाय है जो सदियों से भेड़ और बकरी पालन का काम करता आ रहा है। इस समुदाय को जम्मू कश्मीर में अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त है। जम्मू कश्मीर की तरह राजस्थान में भी बड़ी संख्या में ग्रामीण भेड़, बकरी और ऊंट पाल कर आमदनी प्राप्त कर रहे हैं। हालांकि पशुधन जहां आय का प्रमुख जरिया है वहीं इसके पालन और चारा की व्यवस्था एक बड़ी समस्या के रूप में भी रहती है।
राजस्थान के बीकानेर स्थित लूणकरणसर ब्लॉक के कालू गांव के ग्रामीण भी बड़ी संख्या में पशुधन आय का माध्यम बना हुआ है। यह गांव ब्लॉक मुख्यालय से लगभग 20 किमी और जिला मुख्यालय से करीब 92 किमी दूर है। इस गांव की जनसंख्या करीब 10334 है। यहां अनुसूचित जाति की संख्या करीब 14।5 प्रतिशत है। गांव में साक्षरता की दर लगभग 54।7 प्रतिशत है, जिसमें महिलाओं की साक्षरता दर मात्र 22।2 प्रतिशत है। इस गांव में 250 ऐसे घर हैं जो भेड़ बकरियां पालने का काम करते हैं। प्रत्येक परिवार के पास कम से कम 100 भेड़ बकरियाँ और ऊंट अवश्य है। जबकि कुछ परिवार ऐसे भी हैं जिनके पास लगभग 400 से भी अधिक मवेशियाँ हैं। जिन्हें चराने के लिए कई बार पशुपालकों को काफी समस्याओं का सामना करनी पड़ती है। भेड़ बकरियों को चराने के लिए जब वह उन्हें खेत में लेकर जाते हैं तो कई बार खेत के मालिक उन्हें वहां चराने से मना कर देते हैं। वहीं कई बार जब खेतों में चारा खत्म हो जाता है और बारिश नही होती है तो इन्हें अपने मवेशियों को लेकर अन्य स्थानों की ओर पलायन करने पर मजबूर होना पड़ता है।
गांव से कुछ किमी दूर सेना के अभ्यास के लिए फायरिंग रेंज एरिया है, अक्सर ग्रामीण वहां अपने मवेशियों को चराने ले जाते हैं। लेकिन भारतीय सेना के लिए यह स्थान आरक्षित होने के कारण इन्हें वहां अपने जानवरों को चराने में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। हालांकि ग्रामीणों की इस समस्या को देखते हुए स्थानीय संस्था उर्मुल द्वारा एक सी।एफ।सी सेंटर (कॉमन फैसिलिटी सेंटर) खोला गया है। यह गांव की गोचर भूमि है। जिसे 150 बीघा जमीन में बनवाया गया है। इसमें चारों ओर तारे बंधी हुई हैं। जिसमें चारे की उचित व्यवस्था की गई है। यहां पर पानी की व्यवस्था के लिए 4 कुंड भी बनाए गए हैं। इसके अतिरिक्त इस भूमि पर एक जोहड़ (कुंड) की भी व्यवस्था करवाई गई है जिसमें वर्षा के दिनों में पानी इक_ा करने की व्यवस्था की गई है। इसके अतिरिक्त इस सेंटर में भेड़ों की ऊन कटिंग की व्यवस्था भी की गई है। जहां पशुपालक आधुनिक मशीनों के माध्यम से अपनी अपनी भेड़ों के ऊन उतरवाते हैं। इसके अतिरिक्त यहां मवेशियों वैक्सीन की भी व्यवस्था की गई है, तथा उनके बीमार होने पर इलाज का भी पूरा इंतज़ाम किया गया है। इतना ही नहीं, इस दौरान पशुपालकों के लिए ठहरने के लिए भवन का भी निर्माण किया गया है। इस चारागाह में सालाना कम से कम 1900 से अधिक मवेशी आते हैं।
इस कॉमन फैसिलिटी सेंटर के कारण कालू गांव के पशुपालकों को अपने मवेशियों को चराने की समस्या लगभग समाप्त हो गई है। मवेशियों को पर्याप्त चारा और मेडिकल सुविधा मिलने के कारण जानवर काफी स्वस्थ रहते हैं। जिसका लाभ ग्रामीणों को अधिक आय के रूप में मिलने लगा है। इस संबंध में गांव के निवासी माना राम का कहना कि वर्तमान में मेरे पास 97 भेड़ और 8 बकरियां हैं। जिन्हें बेच कर मुझे एक साल में दस हजार तक की आमदनी हो जाती है। इसके अतिरिक्त एक साल में तीन बार भेड़ और ऊन के बालों की कटिंग भी करते हैं। जो अलग अलग महीनों में अलग अलग दामों पर बिकते हैं। मार्च में जहां भेड़ के बाल 170 रुपए किलो बिकता है वहीं जुलाई में इसकी कीमत 70 से 80 रुपए किलो होती है। हालांकि नवंबर और दिसंबर में यह 50 से 60 रुपए किलो बिकती है। उन्होंने बताया कि एक बार में भेड़ से डेढ़ किलो ऊन प्राप्त हो जाता है। वहीं एक अन्य मवेशी पालक प्रेम का कहना है कि मेरे पास 68 भेड़ें और 17 बकरियां हैं। जिनसे मुझे सालाना 60 से 70 हजार रुपए तक की आमदनी हो जाती है। भेड़ों का ऊन बेचकर जहां काफी लाभ मिलता है। वहीं उनका मीट 350 रुपए किलो बिकता है। प्रेम कहते हैं कि मुझे बकरी का दूध बेचकर भी काफी लाभ मिल जाता है। कई बार बीमारों के लिए लोग ऊंचे दामों में बकरियों का दूध भी खरीदते हैं। जिसकी हमें अच्छी कीमत मिलती है।
वहीं एक अन्य पशुपालक राजू राम कहना है कि मेरे पास 386 भेड़ हैं। हम परिवार के चार लोग साल में आठ महिने घर से बाहर भेड़ों को चराने के लिए ले जाते हैं। इन मवेशियों से मेरे परिवार को सालाना ढाई लाख रुपए की आमदनी हो जाती है। हालांकि इस आमदनी को प्राप्त करने में हमें काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जब हम एक साथ इतनी सारी भेंडो को लेकर गांव से पलायन करते हैं तो कई बार रोड पर एक्सीडेंट से हमारी भेंड़े मर भी जाती हैं। सरकार द्वारा हमारे मवेशियों का कोई बीमा भी नहीं होता है। जिससे मरने वाले जानवरों का कोई मुआवज़ा भी नहीं मिलता है। इससे हमें काफी नुकसान उठाना पड़ता है। इसके अतिरिक्त रास्ते में चारे पानी की भी कोई उचित व्यवस्था नहीं हो पाती है। बीमारी आने पर उन मवेशियों के लिए किसी प्रकार की वैक्सीनेशन की व्यवस्था भी नहीं होता है। इसके कारण हमें जानवरों का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। गांव में जब हम वापस आते हैं तो इतनी सारी भेड़ो को रखने के लिए उचित स्थान भी नहीं होता है। वहीं आंधी और बारिश के समय भी बहुत से मवेशी मारे जाते हैं। जिसके नुकसान की कोई भरपाई नहीं हो पाती है।
बहरहाल, गांव में कॉमन फैसिलिटी सेंटर की व्यवस्था होने के कारण पहले की तुलना में मवेशी पालकों को काफी सुविधाएं मिलने लगी हैं। लेकिन जानवरों का बीमा नहीं होना इन मवेशी पालकों के लिए आज भी एक समस्या बनी हुई है। ऐसे में सरकार को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिससे कि इन्हें धरातल पर सभी सुविधाओं का लाभ मिल सके। ताकि मवेशी पालक अधिक से अधिक मवेशी पालने को प्रोत्साहित हो सकें क्योंकि वर्तमान में कृषि के बाद जिस प्रकार से मवेशी पालन ग्रामीणों की आय का प्रमुख स्रोत बनता जा रहा है, वह न केवल उनके लिए बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए भी सकारात्मक संकेत कहे जा सकते हैं। (चरखा फीचर)
तमिलनाडु के सत्तारूढ़ दल द्रविड़ मुनेत्र कडग़म (डीएमके) के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री ए राजा के बयान पर जमकर विवाद हो रहा है। ए राजा की टिप्पणी से कांग्रेस की अगुआई वाला इंडिया गठबंधन भी बैकफुट पर दिख रहा है।
पिछले हफ्ते ए राजा ने कहा था कि भारत पारंपरिक दृष्टि से एक भाषा, एक संस्कृति वाला देश नहीं है।
उन्होंने कहा था कि भारत यह एक देश नहीं, बल्कि एक उपमहाद्वीप है।
एक मार्च को कोयंबटूर में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के जन्मदिन के आयोजन में राजा ने कहा था, ‘एक देश का मतलब है एक भाषा, एक संस्कृति, एक परंपरा। भारत एक देश नहीं बल्कि एक उपमहाद्वीप था। यहाँ तमिलनाडु एक देश है, जिसकी एक भाषा और एक संस्कृति है। मलयालम एक अन्य भाषा और संस्कृति है। इन सभी के एक साथ आने से ही भारत बना है - इसलिए भारत एक उपमहाद्वीप बनता है, एक देश नहीं।’
तमिल में दिया गया ए राजा के इस भाषण का वीडियो क्लिप अंग्रेजी सबटाइटल के साथ सोशल मीडिया पर पिछले दो दिन से वायरल हो रहा है। बीजेपी इसे लेकर इंडिया गठबंधन और कांग्रेस को आड़े हाथों ले रही है।
ए राजा ने और क्या कहा था?
ए राजा ने बिलकिस बानो गैंग रेप केस में दोषियों की रिहाई पर कथित रूप से लगाए गए ‘जय श्री राम’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे जि़क्र करते हुए कहा कि ‘हम ऐसे लोगों के ‘जय श्री राम’ और ‘भारत माता’ क़तई स्वीकार नहीं करेंगे। तमिलनाडु ये कभी स्वीकार नहीं करेगा। अपने लोगों को जाकर कह दीजिए कि हम राम के दुश्मन हैं।’
ए राजा ने हाल के दिनों में दिए गए प्रधानमंत्री के उस बयान का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि चुनाव के बाद डीएमके पार्टी खत्म हो जाएगी।
इस बयान पर राजा ने कहा कि डीएमके तब तक रहेगा जब तक भारत रहेगा।
ए राजा ने कहा था, ‘आपने कहा है कि चुनाव के बाद डीएमके का अस्तित्व नहीं रहेगा। यदि चुनाव के बाद डीएमके नहीं होगा तो भारत भी नहीं होगा, इसे याद रखिए! आप क्या शब्दों से खेल रहे हैं?’
अपने इस बयान को विस्तार देते हुए ए राजा ने संविधान के प्रस्तावना की बात की थी और कहा था, ‘मैं क्यों कह रहा हूं कि भारत नहीं रहेगा? क्योंकि अगर आप सत्ता में फिर आए तो भारतीय संविधान ही नहीं होगा तो भारत नहीं होगा। यदि भारत का अस्तित्व नहीं रहा तो तमिलनाडु एक अलग इकाई बन जाएगा। क्या हम उस परिदृश्य की कामना करते हैं?’
ए राजा ने कहा था कि भारत विविधताओं और कई संस्कृतियों का देश है।
‘अगर आप तमिलनाडु आएं तो वहां एक ही संस्कृति है। केरल की एक अलग, दिल्ली और ओडिशा की एक अलग संस्कृति है। मणिपुरी लोग कुत्ते का मांस खाते हैं, यह एक अलग संस्कृति है। ये उनकी संस्कृति है।’
ए राजा ने कहा था, ‘पानी की एक टंकी से पानी आता है। यही पानी रसोई और शौचालय में जाता है। हम रसोई के लिए शौचालय से पानी नहीं लेते। क्यों? इसी तरह हम अंतर को स्वीकार करते हैं। आपसी अंतर और विविधताओं को स्वीकर करना चाहिए। आपकी (बीजेपी-आरएसएस) समस्या क्या है? क्या आपसे किसी ने गोमांस खाने के लिए कहा? इसलिए विविधता में एकता ही भारत के लिए मायने रखती है। इस देश में विविधताओं को स्वीकार करें।’
ए राजा ने कहा था, ‘क्या मेरे नाक और कान हूबहू दूसरे व्यक्ति के जैसे हैं? नहीं। यह सबके लिए समान क्यों होना चाहिए? हर एक को वैसे ही स्वीकार करना जैसे वे हैं, समझदारी इसी में है। अगर आप सभी को एक जैसा बनाने की कोशिश करेंगे तो क्या होगा? यही खतरा अब आ गया है।’
कांग्रेस और आरडेजी ने बयान के किया किनारा
ए राजा के इस बयान की ना सिर्फ बीजेपी बल्कि उनके अपने गठबंधन के सहयोगी भी आलोचना कर रहे हैं। केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता गिरिराज सिंह ने कहा है कि ऐसे लोग ‘सनातन संस्कृति बर्बाद करना चाहते हैं।’
आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने कहा है कि ‘ये बयान ए राजा के व्यक्तिगत विचार हैं और ये गठबंधन की सोच नहीं है।’
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने भी इस पर कहा है कि कांग्रेस इस बयान से पूरी तरह असहमत है। उन्होंने कहा कि राम सबके हैं।
बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने एक्स पर लिखा, ‘डीएमके की हेट स्पीच लगातार जारी है। उदयनिधि स्टालिन के सनातन धर्म को नष्ट करने के आह्वान के बाद, अब यह एक राजा हैं जो भारत के विभाजन का आह्वान कर रहे हैं। भगवान राम का उपहास कर रहे हैं, मणिपुरियों पर अपमानजनक टिप्पणी कर रहे हैं और एक राष्ट्र के रूप में भारत के विचार पर सवाल उठा रहे हैं।’
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा है कि कांग्रेस ए राजा के बयान की निंदा करती है।
उन्होंने कहा, ‘मैं उनके बयान से 100 फीसदी असहमत हूँ। मैं इस मंच से ऐसे बयान की निंदा करती हूँ। मेरा मानना है कि राम सबके हैं और सर्वव्यापी हैं। मेरा मानना है कि राम जिन्हें इमाम-ए-हिंद कहा जाता था वो समुदायों, धर्मों और जातियों से ऊपर हैं। राम जीवन जीने के आदर्श हैं। राम मर्यादा हैं, राम नीति हैं, राम प्रेम हैं।’
‘मैं इस बयान की पूरी तरह से निंदा करता हूं, ये उनका ( ए राजा का) बयान हो सकता है, मैं इसका समर्थन नहीं करती। मैं इसकी निंदा करती हूं और मुझे लगता है कि लोगों को बात करते समय संयम बरतना चाहिए।’
उदयनिधि ने सनातन धर्म पर क्या कहा था
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे और राज्य सरकार में मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने बीते साल दो सितंबर को तमिलनाडु में आयोजित एक कार्यक्रम में सनातन धर्म को कई ‘सामाजिक बुराइयों के लिए जि़म्मेदार ठहराते हुए इसे समाज से खत्म करने की बात कही थी।
उन्होंने कहा था, ‘सनातन धर्म लोगों को जाति और धर्म के नाम पर बाँटने वाला विचार है। इसे ख़त्म करना मानवता और समानता को बढ़ावा देना है।’
उदयनिधि ने कहा था, ‘जिस तरह हम मच्छर,डेंगू, मलेरिया और कोरोना को खत्म करते हैं, उसी तरह सिर्फ सनातन धर्म का विरोध करना ही काफी नहीं है। इसे समाज से पूरी तरह ख़त्म कर देना चाहिए।’
इस बयान पर आरएसएस, बीजेपी और दक्षिणपंथी खेमे से काफी तीखी प्रतिक्रिया आई है।
बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा था, ‘ये हमारे धर्म पर हमला है।’
हालांकि बयान पर विवाद के बाद भी उदयनिधि ने कहा था कि हम अपने बयान पर कायम हैं।
उन्होंने बोला था कि हमने समाज के सताए हुए और हाशिये पर डाल दिए गए लोगों की आवाज उठाई है, जो सनातन धर्म की वजह से तकलीफ झेल रहे हैं।
उदयनिधि ने कहा था, ‘हम अपनी बात पर कायम हैं और किसी भी कानूनी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हैं। हम द्रविड़ भूमि से सनातन धर्म को हटाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और इससे एक इंच भी पीछे नहीं हटने वाले।’
उदयनिधि की इस टिप्पणी के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और सर्वोच्च अदालत ने सोमवार को उन्हें सख़्त हिदायत दी।
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट उदयनिधि स्टालिन की एक अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उन्होंने मांग की थी कि महाराष्ट, बिहार उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को एक साथ जोड़ दिया जाए।
इस मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच ने कहा कि एक मंत्री होने के नाते उदयनिधि स्टालिन को अपने बयानों में सावधानी बरतनी चाहिए थी और उनके संभावित परिणामों के प्रति सचेत रहना चाहिए।
कोर्ट ने कहा, ‘आप अनुच्छेद 19(1)(ए) (अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार) के तहत अपने अधिकार का दुरुपयोग कर रहे हैं। आप अनुच्छेद 25 (विवेक की आज़ादी, धर्म को मानने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता) के तहत अपने अधिकार का दुरुपयोग कर रहे हैं। अब आप अनुच्छेद 32 के तहत अपने अधिकार (सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने का अधिकार) का इस्तेमाल कर रहे हैं। क्या आप नहीं जानते कि आपने जो कहा उसका परिणाम क्या होगा? आप आम आदमी नहीं हैं। आप मंत्री हैं। आपको परिणाम जानना चाहिए। ’ (bbc.com/hindi)
अपूर्व गर्ग
यमराज आते हैं और अक्सर अकेले भी लौटते हैं। आजकल की सुपरस्पेशलिटी ब्रीड मरीजों को मरने नहीं देती ये और बात है आजकल की बेरहम दुनिया जीने नहीं देना चाहती।
दुनिया बदल चुकी है पर 80-90+के लोगों को बदलकर इस बदलाव को समझना चाहिए।
आप इतनी जल्दी ‘टाटा बाई बाई’ नहीं कर पाएंगे । बेहतर है 100+ की तैयारी भी रखें।
आज का विज्ञान आपको सिर्फ डायबिटीज, हार्ट, बीपी, न्यूरो, कैंसर आदि। इत्यादि की वजह से रुखसत होने नहीं देगा।
आज का विज्ञान आपको बूढ़ा होने भी नहीं देता। विटामिन ई-सी- डी, मिनरल्स, ट्रेस एलिमेंट्स, एंटी ऑक्सीडेंट्स की बहार के साथ ही नए नए एंटी ऐजिंग ऐसे -ऐसे सप्लीमेंट्स हैं जो चेहरे को चमकाए रखेंगे और हसरतों की रौशनी बुझने नहीं देंगे तब तक जब तक नियमित आप अपनी बैटरी रिचार्ज करते रहेंगे।
वो दिन ढल गए जब रामू काका साठ बरस के बूढ़े हुआ करते आज के काका तो 60 के बाद नए सिरे से बॉडी को शेप दे रहे, कभी जिम में झांकिए!
आज 103 बरस के यावर अब्बास साहब जश्न -ए-रेख़्ता का चिराग लंदन में जिस तरह जलाते दीखते हैं। सबकी उम्मीदों के चिराग़ जलने लगते हैं। ये वही शानदार पत्रकार यावर अब्बास साहब हैं जिन्होंने 100 बरस की उम्र में ब्याह कर दुनिया को बताया कि जब तक है जान जीते रहो। बुझो मत।
एक यावर अब्बास साहब ही नहीं हैं और भी दुनिया में सुखऩ-वर बहुत अच्छे। जरा देखिये तो।
याद करिये कैसे कोलकाता के मनोहर आइच 104 बरस की उम्र तक डम्बल बेंच प्रेस करते रहें थे।
कैसे वडोदरा में हुए टूर्नामेंट की 100 मीटर की दौड़ में हरियाणा की 105 वर्षीय रामाबाई ने अकेले दौड़ कर मैडल जीता।
कल्पा, हिमाचल प्रदेश के श्याम सरन नेगी 105 बरस की उम्र में भी अपना वोट डालकर लोकतंत्र को महकाया, उनकी यादें महकती रहेंगी।
हाल ही में साढ़े 100 के हो चुके डॉक्टर रामदरश मिश्र को साहित्यिक कार्यक्रम में तने हुए और खिंचती सेल्फियों के बीच मुस्कुराते देखा ।
आज अकेले ये रामदरश मिश्र जी की तस्वीर नहीं है बल्कि ये आज की दुनिया की वो तस्वीर है जो बिल्कुल बदल चुकी।
दुनिया बदल चुकी, जीवन बदल चुका पर नहीं बदले तो इस देश के लोगों के चींटी की तरह की रेंगती सोच और कछुए की तरह रेंगते विचार!
जागो भाई , घर की खिडक़ी और दिमाग पर लदे हुए सुस्त विचारों के पर्दे हटाओ।
और देखिये।
कितनी सुंदर तस्वीरें सामने हैं।
अपने थके-हारे, निराश, अवसाद में डूबे ,मौत की आहट से घबराये, बूढ़े-जर्जर शरीर नहीं। सुन्न दिमाग पर पड़े कुहासे और हताशा के पर्दे को उठा कर आशा की इन किरणों को भीतर आने दीजिये।
देखिये, ये किरणें कितनी उम्मीद से भरी हैं।
देखिये, इनमें जिजीविषा की आशा कैसे मचल रही है।
देखिये, ये कितनी उत्साहवर्धक, प्रेरणादायी, ऊर्जा-विटामिन और प्रोटीन से भरपूर तस्वीरें हैं, खबरें हैं।
अगर बूढ़ा न होने की ख़्वाहिश रखते हैं ,अगर सौ बरस के उस पार भी उत्साह से जीने की तमन्ना है तो ज्ञान-विज्ञान आपके साथ है ।विज्ञान दिन -प्रतिदिन नयी रौशनी ला रहा। आप भी अपनी उमीदों के चिराग बुझने मत दीजिये।
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि राजनीतिक पार्टियों को चंदा देने के लिए खरीदे गए इलेक्टोरल बॉन्ड की जानकारी चुनाव आयोग को देने के लिए 30 जून तक का समय दिया जाए।
एसबीआई ने इस प्रक्रिया को ‘काफी समय लेने’ वाला काम बताते हुए समय की मांग की है। 30 जून तक देश में लोकसभा चुनाव पूरे हो जाएंगे।
बीते महीने सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने इलेक्टोरल बॉन्ड को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया जो इलेक्टोरल बॉन्ड बेचने वाला अकेला अधिकृत बैंक है, उसे निर्देश दिया था कि वह छह मार्च 2024 तक 12 अप्रैल, 2019 से लेकर अब तक खऱीदे गए इलेक्टोरल बॉन्ड की जानकारी चुनाव आयोग को दे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इलेक्टोरल बॉन्ड को अज्ञात रखना सूचना के अधिकार और अनुच्छेद 19 (1) (ए) का उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि राजनीतिक पार्टियों को आर्थिक मदद से उसके बदले में कुछ और प्रबंध करने की व्यवस्था को बढ़ावा मिल सकता है।
चुनाव आयोग को ये जानकारी 31 मार्च तक अपनी वेबसाइट पर जारी करनी थी।
इलेक्टोरल बॉन्ड राजनीतिक दलों को चंदा देने का एक वित्तीय ज़रिया है।
यह एक वचन पत्र की तरह है, जिसे भारत का कोई भी नागरिक या कंपनी भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं से खऱीद सकता है और अपनी पसंद के किसी भी राजनीतिक दल को गुमनाम तरीक़े से दान कर सकता है।
मोदी सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की घोषणा 2017 में की थी। इस योजना को सरकार ने 29 जनवरी 2018 को क़ानूनन लागू कर दिया था।
एसबीआई ने क्या कहा?
सोमवार को एसबीआई ने इसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका डाली है।
एसबीआई ने कहा कि वह अदालत के निर्देशों का ‘पूरी तरह से पालन करने करना चाहता है। हालांकि, डेटा को डिकोड करना और इसके लिए तय की गई समय सीमा के साथ कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां हैं’ इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदने वालों की पहचान छुपाने के लिए कड़े उपायों का पालन किया गया है। अब इसके डोनर और उन्होंने कितने का इलेक्टोरल बॉन्ड खऱीदा है, इस जानकारी का मिलान करना एक जटिल प्रक्रिया है।’
बैंक ने कहा कि दो जनवरी, 2018 को इसे लेकर ‘अधिसूचना जारी की गई थी।’ यह अधिसूचना केंद्र सरकार की ओर से साल 2018 में तैयार की गई इलेक्टोरल बॉन्ड की योजना पर थी। इसके क्लॉज 7 (4) में यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि अधिकृत बैंक हर सूरत में इलेक्टोरल बॉन्ड खऱीदार की जानकारी को गोपनीय रखे।
अगर कोई अदालत इसकी जानकारी को मांगती है या जांच एजेंसियां किसी आपराधिक मामले में इस जानकारी को मांगती है, तभी खऱीदार की पहचान साझा की जा सकती है।
बैंक ने अपनी याचिका में कहा है, ‘इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदारों की पहचान को गोपनीय रखने के लिए बैंक ने बॉन्ड कि बिक्री और इसे भुनाने के लिए एक विस्तृत प्रकिया तैयार की है जो बैंक की देशभर में फैली 29 अधिकृत शाखाओं में फॉलो की जाती है।’
एसबीआई ने कहा, ‘हमारी एसओपी के सेक्शन 7.1.2 में साफ़ कहा गया था कि इलेक्टोरल बॉन्ड खऱीदने वाले की केवाईसी जानकारी को सीबीएस (कोर बैंकिंग सिस्टम) में ना डाला जाए। ऐसे में ब्रांच में जो इलेक्टोरल बॉन्ड बेचे गए हैं, उनका कोई सेंट्रल डेटा एक जगह पर नहीं है। जैसे खऱीदार का का नाम, बॉन्ड खरीदने की तारीख, जारी करने की शाखा, बॉन्ड की कीमत और बॉन्ड की संख्या। ये डेटा किसी सेंट्रल सिस्टम में नहीं हैं। ’
‘बॉन्ड खरीदने वालों की पहचान गोपनीय ही रहे यह सुनिश्चित करने के लिए बॉन्ड जारी करने से संबंधित डेटा और बॉन्ड को भुनाने से संबंधित डेटा दोनों को को दो अलग-अलग जगहों में रखा गया है और कोई सेंट्रल डेटाबेस नहीं रखा गया।’
सभी खरीदारों की जानकारी को जिन ब्रांच से इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदे गए वहां एक सीलबंद कवर में रखा गया। फिर इन सीलबंद कवर को एसीबीआई की मुख्य शाखा जो कि मुंबई में है, वहाँ दिया गया।’
कोई सेंट्रल डेटा नहीं
एसबीआई ने कहा, ‘हर राजनीतिक दल को 29 अधिकृत शाखाओं में से किसी में एक में अकाउंट बनाए रखना ज़रूरी था। केवल इसी अकाउंट में उस पार्टी को मिले इलेक्टोरल बॉन्ड जमा किये जा सकते थे और भुनाये जा सकते थे। भुनाने के समय मूल बॉन्ड, पे-इन स्लिप को एक सीलबंद कवर में एसबीआई मुंबई मुख्य शाखा को भेजा जाता था।
‘ऐसे में यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि जानकारी के दोनों सेट एक दूसरे से अलग-अलग स्टोर किए जा रहे थे। अब उनका मिलान करना एक ऐसा काम होगा जिसके लिए काफ़ी समय की ज़रूरत होगी। बॉन्ड खरीदने वाला कौन है, ये जानकारी उपलब्ध कराने के लिए हर बॉन्ड के जारी होने की तारीख़ को को डोनर के खऱीदने की तारीख़ से मिलाना होगा।’
‘ये एक जगह की जानकारी होगी। यानी बॉन्ड जारी हुआ और किसने खऱीदा इसकी जानकारी होगी। फिर जानकारी का दूसरा सेट आएगा, जहाँ ये बॉन्ड राजनीति दल ने अपने अधिकृत खाते में भुनाया होगा। फिर हमें खरीदे गए बॉन्ड की जानकारी भुनाए गए बॉन्ड की जानकारी से मिलाना होगा।’
एसबीआई ने समय बढ़ाने के पक्ष में दलील देते हुए कहा, ‘हर जगह से जानकारी प्राप्त करना और एक जगह की जानकारी को दूसरे जगह से मिलाने की प्रक्रिया एक समय लेने वाली प्रक्रिया होगी। जानकारियां अगल-अलग जगहों पर स्टोर की गई हैं।’
‘कुछ जानकारी जैसे बॉन्ड की संख्या आदि को डिजि़टल रूप से स्टोर किया गया है जबकि अन्य विवरण जैसे खऱीदार का नाम, केवाईसी आदि को फि़जिकल रूप में स्टोर किया गया है। ऐसा करने के पीछे हमारा उद्देश्य था कि योजना के तहत किसी भी तरह से बॉन्ड खऱीदने वालों की पहचान ज़ाहिर ना हो।’
बैंक ने कहा है कि 22,217 इलेक्टोरल बॉन्ड को राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए खरीदा गया।
बैंक ने बताया, ‘हर चरण के अंत में भुनाए गए बॉन्ड को सीलबंद लिफाफे में अधिकृत शाखाओं की ओर से मुंबई मुख्य शाखा में जमा किया जाता था। चूंकि डेटा के दो अलग-अलग सेट हैं, ऐसे में हमें 44,434 जानकारियों के सेट डिकोट करना होगा, मिलाना होगा और उनकी तुलना करनी होगी।’
एसबीआई ने कहा, ‘इसलिए यह अदालत से दरख़्वास्त करते हैं कि 15।02।2024 के फ़ैसले में तय की गई तीन सप्ताह की समय-सीमा पूरी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होगी और हमें आदेश पालन करने के लिए और वक़्त दिया जाए।’
एसबीआई की ओर ये दाखिल की गई इस याचिका में जून तक का समय मांगने की कुछ लोग आलोचना कर रहे हैं। उनका तर्क है कि देश में आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए ऐसा किया जा रहा है।
‘चुनाव से पहले भ्रष्टाचार छुपाने की कोशिश’
आरटीआई कार्यकर्ता अंजली भारद्वाज ने इसे लेकर एक्स पर लिखा, ‘बॉन्ड खरीदने और इसे भुनाने की जानकारी दोनों एसबीआई के मुंबई ब्रांच में सीलबंद लिफाफे में हैं ये बात एसबीआई का हलफऩामा कह रहा है तो फिर क्यों बैंक ये जानकारी तुरंत जारी नहीं कर देता। 22, 217 बॉन्ड की के खऱीदार और भुनाने की जानकारी मिलाने के लिए चार महीने का समय चाहिए, बकवास है ये।’
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि एसबीआई का डोनर्स की जानकारी देने के लिए चुनाव बाद का समय मांगना, चुनाव ये पहले ‘मोदी के असली चेहरे को छुपाने की अंतिम कोशिश है।’
उन्होंने एक्स पर लिखा, ‘नरेंद्र मोदी ने ‘चंदे के धंधे’ को छिपाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इलेक्टोरल बॉन्ड का सच जानना देशवासियों का हक है, तब एसबीआई क्यों चाहता है कि चुनाव से पहले यह जानकारी सार्वजनिक न हो पाए?’
राहुल ने कहा,‘एक क्लिक पर निकाली जा सकने वाली जानकारी के लिए 30 जून तक का समय मांगना बताता है कि दाल में कुछ काला नहीं है, पूरी दाल ही काली है। देश की हर स्वतंत्र संस्था ‘मोडानी परिवार’ बन कर उनके भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने में लगी है। चुनाव से पहले मोदी के ‘असली चेहरे’ को छिपाने का यह ‘अंतिम प्रयास’ है।’
सीपीआईएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने एसबीआई की याचिका पर निराशा ज़ाहिर करते हुए एक्स पर लिखा, ‘ये न्याय का मज़ाक होगा। क्या एसबीआई इसलिए और समय मांग रहा है ताकि लोकसभा चुनाव में बीजोपी और मोदी को बचा सके।’
इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर कई पत्रकारों ने पड़ताल की थी, जिसमें बताया था कि एसबीआई के इन इलेक्टोरल बॉन्ड पर एक सीक्रेट नंबर होता है, जिसके ज़रिए इन्हें ट्रेस किया जा सकता है।
सीताराम येचुरी ने इस रिपोर्ट का लिंक शेयर करते हुए एक्स पर लिखा, ‘जब ऐसी बात है तो एसबीआई और वक़्त की मांग क्यों कर रहा है।
ये तो सत्तारूढ़ दल बीजेपी के राजनीतिक भ्रष्टाचार का बचाव करने की स्पष्ट कोशिश लग रही है।’
सुप्रीम कोर्ट के चर्चित और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने इस पर कहा, ‘जैसा कि अपेक्षित था, मोदी सरकार ने स्टेट बैंक के माध्यम से एक आवेदन दायर कर इलेक्टोरल बॉन्ड खऱीदारों की जानकारी देने के लिए चुनाव के बाद तक का समय मांगा है। अगर ये जानकारी अभी आ गई तो कई सारे रिश्वत देने वाले और उन्हें दिए जाने वाले फ़ायदे सबके सामने आ जाएंगे।’
रिटॉयर्ड कॉमडोर लोकेश बत्रा जाने माने आरटीआई कार्यकर्ता हैं, इलेक्टोरल बॉन्ड की पार्दर्शिता के लिए उन्होंने लगातार काम किया है।
बैंक की इस याचिका पर उन्होंने एक्स पर लिखा, ‘2017-2018 में एसबीआई ने बॉन्ड की बिक्री और रिडंप्शन को मैनेज करने के लिए एक कस्टमाइज़ तकनीक स्थापित की थी।
अप्रैल 2019 से जनवरी-2024 तक: बेची गई इलेक्टोरल बॉन्ड की कुल संख्याकेवल 22217।
एसबीआई के लिए बेचे गए 22217 बॉन्ड की जानकारी देना मुश्किल नहीं होना चाहिए।’ (bbc.com/hindi)
आभा शुक्ला
आज कल थोड़ा नींद कम आती है मुझे बीमार होने के बाद से तो जब नींद नहीं आती रात बिरात तो फेसबुक खोल लेती हूँ। रात में 12 बजे के बाद फेसबुक भी महिलाओं के लिए सेफ नहीं रह गया है। लोग भाग कर इनबॉक्स में आते हैं। देर रात तक जागने का कारण पूछते हैं। बता दो कि नींद नहीं आ रही तो और बातें करने की कोशिश करते हैं।
फिर कुछ तो नया पत्ता फेंकते हैं। कहते हैं आभा जी मैं फेसबुक कम चलाता हूँ। क्या आपसे WhatsApp पर बात हो पाएगी।
कुछ इनके भी बाप होते हैं। मैसेज इगनोर करो तो कॉल करने लगते हैं मैसेंजर पर। कल एक को इसी हरकत की वजह से ब्लॉक किया है।
पहले ये था कि देर रात बाहर रहती है मतलब चरित्र खराब है पर अब तो लगता है कि धारणा ये हो गई है कि देर रात तक ऑनलाइन रहती है मतलब चरित्र खराब है।
बताओ और कितना विकास चाहिए।
वैसे कहना ये था हमको कि जिस स्कूल में आप पढ़ रहे हैं हम उसके हेडमास्टर हैं। तो हमसे पैंतरे चलने की कोशिश मत किया करिये। फिर हम आपको लाइन में लेंगे आपका एसएस लगाएंगे। आपकी बारात निकालेंगे। आपको अच्छा नहीं लगेगा। अरे तो लल्ला काहे करते वो ये काम।
हम 1 बजे या 2 बजे ऑनलाइन क्यों हैं ये पूछने का हक हम अपनी माँ के अलावा किसी को नहीं देते और कभी-कभी तो उनको भी नहीं, फिर आप किस खेत के करेला हैं।
इसलिये ये सब मत किया करिये
हमसे जो इज्जत मिल रही है उसकी कद्र करिये क्योंकि हमारी नजर से आदमी बहुत जल्दी उतरता है।
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि राजनीतिक पार्टियों को चंदा देने के लिए खरीदे गए इलेक्टोरल बॉन्ड की जानकारी चुनाव आयोग को देने के लिए 30 जून तक का समय दिया जाए।
एसबीआई ने इस प्रक्रिया को ‘काफी समय लेने’ वाला काम बताते हुए समय की मांग की है। 30 जून तक देश में लोकसभा चुनाव पूरे हो जाएंगे।
बीते महीने सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने इलेक्टोरल बॉन्ड को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया जो इलेक्टोरल बॉन्ड बेचने वाला अकेला अधिकृत बैंक है, उसे निर्देश दिया था कि वह छह मार्च 2024 तक 12 अप्रैल, 2019 से लेकर अब तक खऱीदे गए इलेक्टोरल बॉन्ड की जानकारी चुनाव आयोग को दे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इलेक्टोरल बॉन्ड को अज्ञात रखना सूचना के अधिकार और अनुच्छेद 19 (1) (ए) का उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि राजनीतिक पार्टियों को आर्थिक मदद से उसके बदले में कुछ और प्रबंध करने की व्यवस्था को बढ़ावा मिल सकता है।
चुनाव आयोग को ये जानकारी 31 मार्च तक अपनी वेबसाइट पर जारी करनी थी।
इलेक्टोरल बॉन्ड राजनीतिक दलों को चंदा देने का एक वित्तीय ज़रिया है।
यह एक वचन पत्र की तरह है, जिसे भारत का कोई भी नागरिक या कंपनी भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं से खऱीद सकता है और अपनी पसंद के किसी भी राजनीतिक दल को गुमनाम तरीक़े से दान कर सकता है।
मोदी सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की घोषणा 2017 में की थी। इस योजना को सरकार ने 29 जनवरी 2018 को क़ानूनन लागू कर दिया था।
एसबीआई ने क्या कहा?
सोमवार को एसबीआई ने इसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका डाली है।
एसबीआई ने कहा कि वह अदालत के निर्देशों का ‘पूरी तरह से पालन करने करना चाहता है। हालांकि, डेटा को डिकोड करना और इसके लिए तय की गई समय सीमा के साथ कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां हैं’ इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदने वालों की पहचान छुपाने के लिए कड़े उपायों का पालन किया गया है। अब इसके डोनर और उन्होंने कितने का इलेक्टोरल बॉन्ड खऱीदा है, इस जानकारी का मिलान करना एक जटिल प्रक्रिया है।’
बैंक ने कहा कि दो जनवरी, 2018 को इसे लेकर ‘अधिसूचना जारी की गई थी।’ यह अधिसूचना केंद्र सरकार की ओर से साल 2018 में तैयार की गई इलेक्टोरल बॉन्ड की योजना पर थी। इसके क्लॉज 7 (4) में यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि अधिकृत बैंक हर सूरत में इलेक्टोरल बॉन्ड खऱीदार की जानकारी को गोपनीय रखे।
अगर कोई अदालत इसकी जानकारी को मांगती है या जांच एजेंसियां किसी आपराधिक मामले में इस जानकारी को मांगती है, तभी खऱीदार की पहचान साझा की जा सकती है।
बैंक ने अपनी याचिका में कहा है, ‘इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदारों की पहचान को गोपनीय रखने के लिए बैंक ने बॉन्ड कि बिक्री और इसे भुनाने के लिए एक विस्तृत प्रकिया तैयार की है जो बैंक की देशभर में फैली 29 अधिकृत शाखाओं में फॉलो की जाती है।’
एसबीआई ने कहा, ‘हमारी एसओपी के सेक्शन 7.1.2 में साफ़ कहा गया था कि इलेक्टोरल बॉन्ड खऱीदने वाले की केवाईसी जानकारी को सीबीएस (कोर बैंकिंग सिस्टम) में ना डाला जाए। ऐसे में ब्रांच में जो इलेक्टोरल बॉन्ड बेचे गए हैं, उनका कोई सेंट्रल डेटा एक जगह पर नहीं है। जैसे खऱीदार का का नाम, बॉन्ड खरीदने की तारीख, जारी करने की शाखा, बॉन्ड की कीमत और बॉन्ड की संख्या। ये डेटा किसी सेंट्रल सिस्टम में नहीं हैं। ’
‘बॉन्ड खरीदने वालों की पहचान गोपनीय ही रहे यह सुनिश्चित करने के लिए बॉन्ड जारी करने से संबंधित डेटा और बॉन्ड को भुनाने से संबंधित डेटा दोनों को को दो अलग-अलग जगहों में रखा गया है और कोई सेंट्रल डेटाबेस नहीं रखा गया।’
सभी खरीदारों की जानकारी को जिन ब्रांच से इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदे गए वहां एक सीलबंद कवर में रखा गया। फिर इन सीलबंद कवर को एसीबीआई की मुख्य शाखा जो कि मुंबई में है, वहाँ दिया गया।’
कोई सेंट्रल डेटा नहीं
एसबीआई ने कहा, ‘हर राजनीतिक दल को 29 अधिकृत शाखाओं में से किसी में एक में अकाउंट बनाए रखना ज़रूरी था। केवल इसी अकाउंट में उस पार्टी को मिले इलेक्टोरल बॉन्ड जमा किये जा सकते थे और भुनाये जा सकते थे। भुनाने के समय मूल बॉन्ड, पे-इन स्लिप को एक सीलबंद कवर में एसबीआई मुंबई मुख्य शाखा को भेजा जाता था।
‘ऐसे में यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि जानकारी के दोनों सेट एक दूसरे से अलग-अलग स्टोर किए जा रहे थे। अब उनका मिलान करना एक ऐसा काम होगा जिसके लिए काफ़ी समय की ज़रूरत होगी। बॉन्ड खरीदने वाला कौन है, ये जानकारी उपलब्ध कराने के लिए हर बॉन्ड के जारी होने की तारीख़ को को डोनर के खऱीदने की तारीख़ से मिलाना होगा।’
‘ये एक जगह की जानकारी होगी। यानी बॉन्ड जारी हुआ और किसने खऱीदा इसकी जानकारी होगी। फिर जानकारी का दूसरा सेट आएगा, जहाँ ये बॉन्ड राजनीति दल ने अपने अधिकृत खाते में भुनाया होगा। फिर हमें खरीदे गए बॉन्ड की जानकारी भुनाए गए बॉन्ड की जानकारी से मिलाना होगा।’
एसबीआई ने समय बढ़ाने के पक्ष में दलील देते हुए कहा, ‘हर जगह से जानकारी प्राप्त करना और एक जगह की जानकारी को दूसरे जगह से मिलाने की प्रक्रिया एक समय लेने वाली प्रक्रिया होगी। जानकारियां अगल-अलग जगहों पर स्टोर की गई हैं।’
‘कुछ जानकारी जैसे बॉन्ड की संख्या आदि को डिजि़टल रूप से स्टोर किया गया है जबकि अन्य विवरण जैसे खऱीदार का नाम, केवाईसी आदि को फि़जिकल रूप में स्टोर किया गया है। ऐसा करने के पीछे हमारा उद्देश्य था कि योजना के तहत किसी भी तरह से बॉन्ड खऱीदने वालों की पहचान ज़ाहिर ना हो।’
बैंक ने कहा है कि 22,217 इलेक्टोरल बॉन्ड को राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए खरीदा गया।
बैंक ने बताया, ‘हर चरण के अंत में भुनाए गए बॉन्ड को सीलबंद लिफाफे में अधिकृत शाखाओं की ओर से मुंबई मुख्य शाखा में जमा किया जाता था। चूंकि डेटा के दो अलग-अलग सेट हैं, ऐसे में हमें 44,434 जानकारियों के सेट डिकोट करना होगा, मिलाना होगा और उनकी तुलना करनी होगी।’
एसबीआई ने कहा, ‘इसलिए यह अदालत से दरख़्वास्त करते हैं कि 15।02।2024 के फ़ैसले में तय की गई तीन सप्ताह की समय-सीमा पूरी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होगी और हमें आदेश पालन करने के लिए और वक़्त दिया जाए।’
एसबीआई की ओर ये दाखिल की गई इस याचिका में जून तक का समय मांगने की कुछ लोग आलोचना कर रहे हैं। उनका तर्क है कि देश में आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए ऐसा किया जा रहा है।
‘चुनाव से पहले भ्रष्टाचार छुपाने की कोशिश’
आरटीआई कार्यकर्ता अंजली भारद्वाज ने इसे लेकर एक्स पर लिखा, ‘बॉन्ड खरीदने और इसे भुनाने की जानकारी दोनों एसबीआई के मुंबई ब्रांच में सीलबंद लिफाफे में हैं ये बात एसबीआई का हलफऩामा कह रहा है तो फिर क्यों बैंक ये जानकारी तुरंत जारी नहीं कर देता। 22, 217 बॉन्ड की के खऱीदार और भुनाने की जानकारी मिलाने के लिए चार महीने का समय चाहिए, बकवास है ये।’
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि एसबीआई का डोनर्स की जानकारी देने के लिए चुनाव बाद का समय मांगना, चुनाव ये पहले ‘मोदी के असली चेहरे को छुपाने की अंतिम कोशिश है।’
उन्होंने एक्स पर लिखा, ‘नरेंद्र मोदी ने ‘चंदे के धंधे’ को छिपाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इलेक्टोरल बॉन्ड का सच जानना देशवासियों का हक है, तब एसबीआई क्यों चाहता है कि चुनाव से पहले यह जानकारी सार्वजनिक न हो पाए?’
राहुल ने कहा,‘एक क्लिक पर निकाली जा सकने वाली जानकारी के लिए 30 जून तक का समय मांगना बताता है कि दाल में कुछ काला नहीं है, पूरी दाल ही काली है। देश की हर स्वतंत्र संस्था ‘मोडानी परिवार’ बन कर उनके भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने में लगी है। चुनाव से पहले मोदी के ‘असली चेहरे’ को छिपाने का यह ‘अंतिम प्रयास’ है।’
सीपीआईएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने एसबीआई की याचिका पर निराशा ज़ाहिर करते हुए एक्स पर लिखा, ‘ये न्याय का मज़ाक होगा। क्या एसबीआई इसलिए और समय मांग रहा है ताकि लोकसभा चुनाव में बीजोपी और मोदी को बचा सके।’
इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर कई पत्रकारों ने पड़ताल की थी, जिसमें बताया था कि एसबीआई के इन इलेक्टोरल बॉन्ड पर एक सीक्रेट नंबर होता है, जिसके ज़रिए इन्हें ट्रेस किया जा सकता है।
सीताराम येचुरी ने इस रिपोर्ट का लिंक शेयर करते हुए एक्स पर लिखा, ‘जब ऐसी बात है तो एसबीआई और वक़्त की मांग क्यों कर रहा है।
ये तो सत्तारूढ़ दल बीजेपी के राजनीतिक भ्रष्टाचार का बचाव करने की स्पष्ट कोशिश लग रही है।’
सुप्रीम कोर्ट के चर्चित और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने इस पर कहा, ‘जैसा कि अपेक्षित था, मोदी सरकार ने स्टेट बैंक के माध्यम से एक आवेदन दायर कर इलेक्टोरल बॉन्ड खऱीदारों की जानकारी देने के लिए चुनाव के बाद तक का समय मांगा है। अगर ये जानकारी अभी आ गई तो कई सारे रिश्वत देने वाले और उन्हें दिए जाने वाले फ़ायदे सबके सामने आ जाएंगे।’
रिटॉयर्ड कॉमडोर लोकेश बत्रा जाने माने आरटीआई कार्यकर्ता हैं, इलेक्टोरल बॉन्ड की पार्दर्शिता के लिए उन्होंने लगातार काम किया है।
बैंक की इस याचिका पर उन्होंने एक्स पर लिखा, ‘2017-2018 में एसबीआई ने बॉन्ड की बिक्री और रिडंप्शन को मैनेज करने के लिए एक कस्टमाइज़ तकनीक स्थापित की थी।
अप्रैल 2019 से जनवरी-2024 तक: बेची गई इलेक्टोरल बॉन्ड की कुल संख्याकेवल 22217।
एसबीआई के लिए बेचे गए 22217 बॉन्ड की जानकारी देना मुश्किल नहीं होना चाहिए।’ (bbc.com/hindi)
मध्य प्रदेश के भोपाल से लोकसभा सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर को बीजेपी ने इस बार टिकट नहीं दिया है।
बीजेपी ने पिछले हफ़्ते शनिवार को लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी की थी। इनमें मध्य प्रदेश की कुल 29 लोकसभा सीटों में से 24 सीटों के उम्मीदवारों की घोषणा भी की गई थी।
इन 24 सीटों में भोपाल लोकसभा सीट भी शामिल है लेकिन यहाँ की मौजूदा सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर की जगह बीजेपी ने भोपाल के पूर्व मेयर आलोक शर्मा को उम्मीदवार बनाया है। भोपाल से टिकट कटने पर प्रज्ञा सिंह ठाकुर से रविवार को पत्रकारों ने पूछा कि गोडसे को लेकर विवादित बयान के कारण पीएम मोदी ने कहा था कि वह मन से कभी माफ नहीं कर पाएंगे। क्या इस वजह से उन्हें टिकट नहीं मिला?
टिकट कटने पर प्रज्ञा ठाकुर का बयान
इस सवाल के जवाब में प्रज्ञा ठाकुर ने कहा, ‘मैंने कभी विवादित बयान नहीं दिया। जो कहा, सत्य कहा। राजनीति में रहकर अगर सत्य कहना गलत है तो मुझे लगता है कि सत्य कहने की आदत डाल लेनी चाहिए। जो सत्य हो उससे समाज को अवगत कराना चाहिए।’
प्रज्ञा ठाकुर ने कहा, ‘मीडिया वाले विवादित बयान कहते थे लेकिन जनता इसे सच मानती है। हमारी जानता ने हमेशा मुझे सच कहा। विरोधियों के लिए यह हथियार बना। कहीं अगर हमारे मानदंडों से अलग कोई शब्द हो गया है तो माननीय प्रधानमंत्री जी को यह कहना पड़ा कि मन से माफ नहीं करेंगे। उसके लिए मैं पहले ही क्षमा मांग चुकी थी।’
‘किसी के मन को ठेस पहुँचाने का मेरा कोई विचार नहीं रहता। प्रधानमंत्री मोदी जी के मन को कष्ट हुआ था, इसलिए उन्हें कहना पड़ा कि मन से माफ नहीं कर पाएंगे। मेरा इस प्रकार का कोई भाव नहीं था कि उनके मन को कष्ट पहुँचाऊं। उसके बाद मैंने कभी कष्ट पहुँचाया भी नहीं।’
प्रज्ञा ठाकुर ने कहा, ‘टिकट नहीं देने का निर्णय संगठन का है और उसका निर्णय सर्वोपरि होता है। हमारे यहाँ संगठन ही अहम होता है। उसका निर्णय सहज स्वीकार्य होता है। आलोक शर्मा को मेरा आशीर्वाद और शुभकामनाएं हैं। मैंने 2019 में भी टिकट नहीं मांगा था लेकिन तब भी संगठन का ही फ़ैसला था कि मैं चुनाव लड़ूँ।’
पीएम मोदी ने क्या कहा था?
नाथूराम गोडसे पर प्रज्ञा ठाकुर के इस बयान को लेकर पीएम मोदी से मई 2019 में सवाल पूछा गया था तब उन्होंने कहा था, ''गांधी जी या गोडसे के संबंध में जो भी बातें कही गई हैं, वे भयंकर खऱाब हैं। हर प्रकार से घृणा के लायक हैं। सभ्य समाज में इस तरह की भाषा नहीं चलती है। इस प्रकार की सोच नहीं चल सकती है। इसलिए ऐसा करने वालों को 100 बार आगे सोचना पड़ेगा। दूसरा, उन्होंने माफी मांग ली अलग बात है। लेकिन मैं अपने मन से माफ नहीं कर पाऊंगा। मन से कभी माफ़ नहीं कर पाऊंगा।’
2019 में प्रज्ञा ठाकुर ने भोपाल से दिग्विजय सिंह को तीन लाख से ज़्यादा वोटों से हराया था।
इस सीट पर 2019 में मुकाबला काफी दिलचस्प रहा था क्योंकि एक तरफ राज्य की कांग्रेस सरकार में दो बार मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह थे और दूसरी तरह प्रज्ञा ठाकुर उस सीट से जो बीते 30 सालों से बीजेपी का गढ़ रही।
मध्य प्रदेश लोकसभा सीटों की संख्या के मामले में छठा सबसे बड़ा राज्य है। 29 सीटों में 10 सीटें अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए रिज़र्व हैं। 19 सीटें सामान्य हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने मध्य प्रदेश की 29 में 28 सीटों पर जीत दर्ज की थी।
जब संसद में गोडसे को बताया था देशभक्त
सासंद बनने के बाद प्रज्ञा ठाकुर अपने कामों से ज़्यादा अपने बयानों के कारण चर्चा में रहीं।
लोकसभा में जब स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (संशोधन) विधेयक पर बहस हो रही थी तो डीएमके सांसद ए राजा ने नाथूराम गोडसे के एक बयान का जिक्र किया ये बताने के लिए कि आखऱि गोडसे ने गांधी को क्यों मारा। इस बहस को बीच में रोकते हुए प्रज्ञा ठाकुर ने कहा था, ‘आप एक देशभक्त का इस तरह उदाहरण नहीं दे सकते।’
इस बयान के बाद बीजेपी ने डैमेज कंट्रोल करना शुरू किया था। प्रज्ञा ठाकुर को रक्षा पर सलाहकार समिति से हटा दिया था। 2019 में संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान संसदीय दल की बैठक में भाग लेने से भी प्रज्ञा ठाकुर को रोक दिया गया था।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने प्रज्ञा ठाकुर के बयान से पार्टी को अलग करते हुए लोकसभा में कहा था,‘नाथूराम गोडसे को देशभक्त कहा जाना तो दूर अगर उन्हें देशभक्त माने भी जाने के बारे में कोई सोच रहा है तो इस सोच की हमारी पार्टी पूरी तरह निंदा करती है।’ उनके बयान को संसद के रिकॉर्ड से हटा दिया गया। कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष ने लोकसभा में इस मुद्दे को उठाया और प्रज्ञा ठाकुर पर कड़ी कार्रवाई करने की मांग की।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने उस समय एक्स पर लिखा, ‘आतंकवादी प्रज्ञा ने आतंकवादी गोडसे को देशभक्त बताया। ये भारतीय संसद के इतिहास में एक दुखद दिन है।’
प्रज्ञा ठाकुर गोडसे को लेकर दिए गए अपने बयानों के अलावा अपने मेडिकल दावों को लेकर भी आचोलनाओं से घिर चुकी हैं।
हेटस्पीच और हिंदुओं को हथियार रखने की सलाह
कोविड-19 की दूसरी लहर के समय प्रज्ञा ठाकुर ने कहा था कि 'गोमूत्र पीने से कोरोना से बचा जा सकता है और ये फेफड़ों को भी संक्रमण से बचाता है।'
प्रज्ञा ठाकुर ने कहा था, ‘गोमूत्र अर्क फेफड़ों के संक्रमण से दूर रखता है। मैं स्वास्थ्य संबंधी परेशानी झेल रही हूं लेकिन हर दिन ‘गोमूत्र अर्क’ लेती हूँ। इसके बाद मुझे कोरोनो वायरस के लिए कोई दवा देने की जरूरत नहीं। मैं कोरोनोवायरस संक्रमित नही होऊंगी।’
सांसद रहते हुए प्रज्ञा ठाकुर पर हेट स्पीच देने के भी आरोप लगे। दिसंबर 2022 में प्रज्ञा ठाकुर के बयान से तब विवाद मच गया जब उन्होंने कहा कि हिंदुओं को अपनी रक्षा के लिए हथियार रखने चाहिए।
उन्होंन एक भाषण में कहा, ‘अपने घरों में हथियार रखें और कुछ नहीं तो कम से कम सब्जिय़ां काटने वाले चाकू तो तेज़ रखिए।।।पता नहीं कब क्या स्थिति आ जाए।।।आत्मरक्षा का अधिकार हर किसी को है। यदि कोई हमारे घर में घुसकर हम पर हमला करता है तो उसका मुँहतोड़ जवाब देना हमारा अधिकार है।’
इस बयान को लेकर प्रज्ञा ठाकुर के ख़िलाफ़ पुलिस ने शिकायत दर्ज की। इस एफ़आईआर में भारतीय दंड संहिता की धारा 153 ए (धर्म और नस्ल के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना) और 295 ए (जानबूझकर किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को अपमानित करना) की धारा लगाई गई।
मालेगाँव धमाका (2008) की स्पेशल प्रॉसिक्युटर रोहिणी सालियन ने 2015 में आरोप लगाया था कि इस हमले के अभियुक्तों को लेकर नरमी बरतने के लिए उन पर दबाव बनाया गया।
रोहिणी ने एनआईए के एसपी सुहास वर्के पर यह आरोप लगाया था। रोहिणी ने कहा था कि ऐसा केस को कमज़ोर बनाने के लिए किया गया ताकि सभी अभियुक्त बरी हो जाएं। इस ब्लास्ट में भोपाल से बीजेपी सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर भी अभियुक्त हैं।
रोहिणी ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में कहा था, ‘एनडीए सरकार आने के बाद मेरे पास एनआईए के अधिकारियों का फ़ोन आया। जिन मामलों की जांच चल रही थी उनमें हिन्दू अतिवादियों पर आरोप थे। मुझसे कहा गया वो बात करना चाहते हैं। एनआईए के उस अधिकारी ने कहा कि ऊपर से इस मामले में नरमी बरतने के लिए कहा गया है।’
2016 में एनआईए ने साध्वी प्रज्ञा का नाम आरोपपत्र में शामिल नहीं करते हुए क्लीन चिट दे दी थी। 2017 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने प्रज्ञा ठाकुर को ज़मानत दी। इसी साल इस मामले के मुख्य अभियुक्त कर्नल पुरोहित को सुप्रीम कोर्ट से बेल मिली।
विवादित बयानों के अलावा बतौर सांसद अगर प्रज्ञा ठाकुर का परफॉर्मेंस देखें तो वो बहुत सक्रिय नहीं थीं। पीआरएस लेजिस्लेटिव की रिपोर्ट के अनुसार, इनकी लोकसभा में उपस्थिति 66 फ़ीसदी रही जो देश को औसत 79 फ़ीसदी से 13 फ़ीसदी कम है।
बतौर सासंद प्रज्ञा ठाकुर ने 19 बहसों के हिस्सा लिया। उन्होंने कोई निजी सदस्य बिल भी पेश नहीं किया।
उन्होंने सासंद रहते हुए सिफऱ् 36 सवाल संसद में पूछे जबकि सांसदों के सवालों राष्ट्रीय औसत 210 सवालों का है। (bbc.com/hindi)
डॉ. आर.के. पालीवाल
वर्तमान केंद्र सरकार को सर्वोच्च न्यायालय से विगत कुछ वर्षों में वैसे तो एक के बाद एक कई झटके मिले हैं लेकिन हाल ही में सबसे बड़ा झटका केंद्र सरकार की इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक ठहराने से लगा है। शायद इसीलिए उत्तर प्रदेश के संभल में कल्कि मंदिर की आधारशिला रखते हुए प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में सर्वोच्च न्यायालय पर अप्रत्यक्ष रुप से तीखा कटाक्ष किया है कि आजकल ऐसा माहौल है कि यदि सुदामा का भगवान कृष्ण को चावल की पोटली देते वीडियो आ जाए तो किसी की पी आई एल पर सर्वोच्च न्यायालय इसे भ्रष्टाचार का मामला बता सकता है। इस हल्के बयान में सर्वोच्च न्यायालय को घसीटने का कोई औचित्य नहीं है।दरअसल वर्तमान केन्द्र सरकार को कांग्रेस सहित इंडिया गठबंधन में इक_ा हुआ समूचा विपक्ष तो कोई खास चुनौती नहीं दे पा रहा है लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड योजना पर दिया फैसला परेशानी में डालने वाला साबित हो सकता है। 2024 के लोकसभा चुनाव जैसे जैसे नजदीक आते जा रहे हैं भारतीय जनता पार्टी पूरे जोरशोर से अपने गठबंधन के लिए चार सौ सीटों के आंकड़े के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। इलेक्टोरल बॉन्ड योजना भी सरकार की ऐसी ही योजना है जिसके माध्यम से भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष से बहुत ज्यादा चुनावी फंड जुटाया है। सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने लगभग पांच साल बाद यह फैसला सुनाया है कि केन्द्र सरकार द्वारा शुरु की गई इलेक्टोरल बॉन्ड योजना असंवैधानिक है। विपक्षी दलों के साथ साथ बहुत सी समाजसेवी संस्थाओं और प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा इस योजना का विरोध किया जा रहा था जबकि भारतीय जनता पार्टी और उसकी केन्द्र सरकार इस योजना को ऐतिहासिक बताकर खुद अपनी पीठ थपथपा रही थी। हालांकि केन्द्र सरकार इस योजना को चुनाव प्रक्रिया में काले धन के उपयोग को रोकने का कारगर उपाय बता रही थी और यह तर्क दे रही थी कि कंपनियों द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड चैक द्वारा खरीदे जाएंगे इसलिए चुनाव में काले धन का लेन देन कम हो जाएगा। विपक्ष और योजना के विरोध में खड़े लोग सबसे ज्यादा इस योजना की अपारदर्शिता और सत्ताधारी दल द्वारा दुरुपयोग की संभावना से चिंतित थे। उनका मानना था कि इस योजना में दानदाता कंपनियों के नाम गुप्त रहने से सरकार कंपनियों को अपने ही दल को ज्यादा चंदा देने के लिए बाध्य कर सकती है और उन्हें जांच एजेंसियों से डरा धमकाकर अवैध वसूली भी कर सकती है और नई नीतियों द्वारा उन्हें लाभ पहुंचाने का लालच देकर भी धन वसूली कर सकती है जो एक तरह से घूसखोरी की श्रेणी में आता है। इसके अलावा केंद्र में सत्ताधारी दल दानदाता कंपनियों पर यह दबाव भी डाल सकता है कि वे विरोधी दलों को चंदा न दें।
इलेक्टोरल बॉन्ड योजना के दुरुपयोग के बारे में जिस तरह की संभावनाएं सर्वोच्च न्यायालय के सामने लंबित याचिकाओं में बताई गई थी सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें सही माना है। इसका एक दस्तावेजी प्रमाण यह भी है कि इस योजना के आने के बाद से कंपनियों द्वारा लगभग साठ प्रतिशत दान अकेले भारतीय जनता पार्टी को ही दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी माना है कि दानदाताओं के नाम गुप्त रखना जनता से सूचना छिपाना है जबकि चुनावी प्रक्रिया और उसमें भी राजनीतिक दलों को मिलने वाला चंदा पूर्णत: पारदर्शी होना चाहिए। यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को निर्देशित किया है कि वह तय समय सीमा में इन बॉन्ड की पूरी जानकारी केन्द्रीय चुनाव आयोग को उपलब्ध कराए ताकि केंद्रीय चुनाव आयोग इस जानकारी को जनता को उपलब्ध करा सके। हालांकि कुछ प्रबुद्ध जन यह चिंता जता रहे हैं कि केंद्र सरकार इस फैसले को निष्क्रिय करने के लिए अध्यादेश ला सकती है। यदि ऐसा हुआ तो चुनावी वर्ष में विपक्ष इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी को घेर सकता है। सरकार के लिए यह फैसला निश्चित रूप से नुकसान दायक है।प्रधानमंत्री के बयान को इस परिपेक्ष्य में भी देखने की आवश्यकता है।
डॉ. आर.के. पालीवाल
वर्तमान केंद्र सरकार को सर्वोच्च न्यायालय से विगत कुछ वर्षों में वैसे तो एक के बाद एक कई झटके मिले हैं लेकिन हाल ही में सबसे बड़ा झटका केंद्र सरकार की इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक ठहराने से लगा है। शायद इसीलिए उत्तर प्रदेश के संभल में कल्कि मंदिर की आधारशिला रखते हुए प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में सर्वोच्च न्यायालय पर अप्रत्यक्ष रुप से तीखा कटाक्ष किया है कि आजकल ऐसा माहौल है कि यदि सुदामा का भगवान कृष्ण को चावल की पोटली देते वीडियो आ जाए तो किसी की पी आई एल पर सर्वोच्च न्यायालय इसे भ्रष्टाचार का मामला बता सकता है। इस हल्के बयान में सर्वोच्च न्यायालय को घसीटने का कोई औचित्य नहीं है।दरअसल वर्तमान केन्द्र सरकार को कांग्रेस सहित इंडिया गठबंधन में इक_ा हुआ समूचा विपक्ष तो कोई खास चुनौती नहीं दे पा रहा है लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड योजना पर दिया फैसला परेशानी में डालने वाला साबित हो सकता है। 2024 के लोकसभा चुनाव जैसे जैसे नजदीक आते जा रहे हैं भारतीय जनता पार्टी पूरे जोरशोर से अपने गठबंधन के लिए चार सौ सीटों के आंकड़े के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। इलेक्टोरल बॉन्ड योजना भी सरकार की ऐसी ही योजना है जिसके माध्यम से भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष से बहुत ज्यादा चुनावी फंड जुटाया है। सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने लगभग पांच साल बाद यह फैसला सुनाया है कि केन्द्र सरकार द्वारा शुरु की गई इलेक्टोरल बॉन्ड योजना असंवैधानिक है। विपक्षी दलों के साथ साथ बहुत सी समाजसेवी संस्थाओं और प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा इस योजना का विरोध किया जा रहा था जबकि भारतीय जनता पार्टी और उसकी केन्द्र सरकार इस योजना को ऐतिहासिक बताकर खुद अपनी पीठ थपथपा रही थी। हालांकि केन्द्र सरकार इस योजना को चुनाव प्रक्रिया में काले धन के उपयोग को रोकने का कारगर उपाय बता रही थी और यह तर्क दे रही थी कि कंपनियों द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड चैक द्वारा खरीदे जाएंगे इसलिए चुनाव में काले धन का लेन देन कम हो जाएगा। विपक्ष और योजना के विरोध में खड़े लोग सबसे ज्यादा इस योजना की अपारदर्शिता और सत्ताधारी दल द्वारा दुरुपयोग की संभावना से चिंतित थे। उनका मानना था कि इस योजना में दानदाता कंपनियों के नाम गुप्त रहने से सरकार कंपनियों को अपने ही दल को ज्यादा चंदा देने के लिए बाध्य कर सकती है और उन्हें जांच एजेंसियों से डरा धमकाकर अवैध वसूली भी कर सकती है और नई नीतियों द्वारा उन्हें लाभ पहुंचाने का लालच देकर भी धन वसूली कर सकती है जो एक तरह से घूसखोरी की श्रेणी में आता है। इसके अलावा केंद्र में सत्ताधारी दल दानदाता कंपनियों पर यह दबाव भी डाल सकता है कि वे विरोधी दलों को चंदा न दें।
इलेक्टोरल बॉन्ड योजना के दुरुपयोग के बारे में जिस तरह की संभावनाएं सर्वोच्च न्यायालय के सामने लंबित याचिकाओं में बताई गई थी सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें सही माना है। इसका एक दस्तावेजी प्रमाण यह भी है कि इस योजना के आने के बाद से कंपनियों द्वारा लगभग साठ प्रतिशत दान अकेले भारतीय जनता पार्टी को ही दिया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी माना है कि दानदाताओं के नाम गुप्त रखना जनता से सूचना छिपाना है जबकि चुनावी प्रक्रिया और उसमें भी राजनीतिक दलों को मिलने वाला चंदा पूर्णत: पारदर्शी होना चाहिए। यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को निर्देशित किया है कि वह तय समय सीमा में इन बॉन्ड की पूरी जानकारी केन्द्रीय चुनाव आयोग को उपलब्ध कराए ताकि केंद्रीय चुनाव आयोग इस जानकारी को जनता को उपलब्ध करा सके। हालांकि कुछ प्रबुद्ध जन यह चिंता जता रहे हैं कि केंद्र सरकार इस फैसले को निष्क्रिय करने के लिए अध्यादेश ला सकती है। यदि ऐसा हुआ तो चुनावी वर्ष में विपक्ष इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी को घेर सकता है। सरकार के लिए यह फैसला निश्चित रूप से नुकसान दायक है।प्रधानमंत्री के बयान को इस परिपेक्ष्य में भी देखने की आवश्यकता है।
-डॉ. आर.के. पालीवाल
दिल्ली के मुख्यमंत्री और पूर्व आई आर एस अधिकारी अरविंद केजरीवाल और प्रवर्तन निदेशालय के बीच चूहा बिल्ली जैसा खेल चल रहा है। प्रवर्तन निदेशालय ने हाल में दिल्ली की शराब नीति के मामले में उन्हें आठवीं बार समन जारी किया है। अरविंद केजरीवाल सात बार प्रवर्तन निदेशालय के समन को अवैध बताकर समन की अवहेलना कर चुके हैं। अरविंद केजरीवाल, आम आदमी पार्टी और विपक्षी दल प्रवर्तन निदेशालय के समन को राजनीतिक कारणों से विपक्ष को परेशान करने की भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र सरकार की अलोकतांत्रिक तानाशाही बता रहे हैं तो भाजपा और प्रवर्तन निदेशालय इसे जरूरी कानूनी कार्रवाई का सामान्य हिस्सा बता रहे हैं।
जहां तक राजनीति का प्रश्न है इसमें कोई संदेह नहीं है कि केंद्रीय जांच एजेंसी जब तक स्वतंत्र रुप से कार्य करने में सक्षम नहीं होंगी तब तक उन पर यह आरोप लगाया जाता रहेगा कि वे केन्द्र सरकार के दबाव में काम करती हैं। यह आंकड़ों से भी प्रमाणित होता है। एक तरफ विपक्षी दलों के सासंद,मंत्री, उप मुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री प्रवर्तन निदेशालय ने गिरफ्तार किए हैं और कई पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है और दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी की किसी राज्य सरकार के मंत्रियों पर भी प्रवर्तन निदेशालय द्वारा गिरफ्तारी की कार्यवाही नहीं हुई है चाहें उन पर कितने ही गम्भीर आरोप क्यों न लगे हैं। यहां तक कि जिन नेताओं पर खुद भाजपा संगीन आरोप लगाती थी जब से वे केन्द्र सरकार और भाजपा की शरण में आए हैं उनकी तरफ भी केन्द्रीय जांच एजेंसियों की नजर उठनी बंद हो गई है।
अरविंद केजरीवाल के लिए हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय का वह फैसला मुसीबत खड़ी कर सकता है जिसमें न्यायालय ने कहा है कि प्रवर्तन निदेशालय के समन का अनुपालन किया जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय तमिलनाडु के आई ए एस अधिकारियों के मामले में आया है जिन्हें भ्रष्टाचार के मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने समन जारी किए थे। तमिलनाडु सरकार इन अधिकारियों के बचाव में हाई कोर्ट आई थी जिसने समन पर स्टे दे दिया था। प्रवर्तन निदेशालय ने मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश को निरस्त कर प्रवर्तन निदेशालय के पक्ष मे निर्णय किया है।
अभी कुछ दिन पहले चंडीगढ़ मेयर चुनाव में सर्वोच्च न्यायालय ने आम आदमी पार्टी के पक्ष मे निर्णय देते हुए चुनाव के प्रभारी रिटर्निंग अधिकारी पर कड़ी कार्यवाही करने का निर्देश दिया था। अरविंद केजरीवाल ने सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश की भूरि भूरि प्रशंसा की थी।अब उन्हें सर्वोच्च न्यायालय के प्रवर्तन निदेशालय के मामले में दिए निर्णय का भी वैसा ही सम्मान करते हुए प्रवर्तन निदेशालय के समन का अनुपालन सुनिश्चित करना चाहिए। अरविंद केजरीवाल खुद को शिक्षित नेता मानते हैं। उनसे आम आदमी से भी ज्यादा कानूनी नोटिस के अनुपालन की उम्मीद की जाती है।
समन से बचने की कोशिश करने से उनकी ईमानदार नेता की छवि से ज्यादा साहसी नेता की छवि को नुकसान होगा। पंजाब विधानसभा के चुनाव में उन्होंने सरदार भगत सिंह की फोटो का सबसे ज्यादा उपयोग किया था। अब उन्हें सरदार भगत सिंह सरीखी बहादुरी का परिचय देते हुए सीना तान कर प्रवर्तन निदेशालय के सामने उपस्थित होना चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इस मामले में उनके दो प्रमुख साथी काफी समय से जेल में बंद हैं और जब तक अरविंद केजरीवाल के बयान कलमबद्ध नहीं होंगे उनका मामला भी लंबित रहेगा और उन्हें जमानत मिलना आसान नहीं होगा। अरविंद केजरीवाल को अपने गठबंधन के अन्य साथियों, हेमंत सोरेन आदि से भी यह सीख लेनी चाहिए कि जांच एजेंसियों से सहयोग करें।
यदि एजेंसी अपने अधिकार का दुरुपयोग करती हैं तो वे और आम आदमी पार्टी सर्वोच्च न्यायालय जाने में पूर्ण सक्षम हैं।
छोटू सिंह रावत
बच्चों के स्वास्थ्य एवं पोषण की स्थिति को सुधारने के लिए सरकार कई सालों से प्रयासरत है. बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य का बेहतर विकास हो इसके लिए केंद्र से लेकर सभी राज्य सरकारों ने अपने अपने स्तर से कई तरह की योजनाएं चला रखी हैं. इसके अतिरिक्त कई स्वयंसेवी संस्थाएं भी इस दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रही हैं. इन सबका उद्देश्य गरीब और वंचित मज़दूरों और उनके परिवारों को समाज की मुख्यधारा से जोडऩा है. लेकिन इतने प्रयासों के बावजूद भी सबसे अधिक असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले प्रवासी मज़दूर और इनके बच्चे सरकारी सेवाओं से वंचित नजऱ आते हैं. जिन्हें इससे जोडऩे के लिए कई गैर सरकारी संस्थाएं प्रमुख भूमिका निभा रही हैं. देश के अन्य राज्यों की तरह राजस्थान में भी यह स्थिति स्पष्ट नजऱ आती है।

राजस्थान के अजमेर और भीलवाड़ा सहित पूरे राज्य में लगभग 3500 से अधिक ईट भट्टे संचालित हैं. जिन पर छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, मध्यप्रदेश और राजस्थान के ही सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों से लगभग 1 लाख श्रमिक प्रति वर्ष काम की तलाश में आते हैं. यह मज़दूर 8 से 9 माह तक परिवार सहित इन ईंट भट्टों पर काम करने के लिए आते हैं. इनमें बड़ी संख्या महिलाओं, किशोरियों और बच्चों की होती है. जहां सुविधाएं नाममात्र की होती है. वहीं बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए भी कोई सुविधा नहीं होती है. लेकिन इसके बावजूद आर्थिक तंगी मजदूरों को परिवार सहित इन क्षेत्रों में काम करने पर मजबूर कर देता है। यहां काम करने वाले अधिकतर मजदूर चूंकि अन्य राज्यों के प्रवासी होते हैं, ऐसे में वह सरकार की किसी भी योजनाओं का लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं। जिसका प्रभाव काम करने वाली महिलाओं और उनके बच्चों के सर्वांगीण विकास पर पड़ता है।

इस संबंध में सेंटर फॉर लेबर रिसर्च एंड एक्शन, अजमेर की जिला समन्वयक आशा वर्मा बताती हैं कि "ईट भट्टो पर लाखों प्रवासी श्रमिक और उनके बच्चे हैं, जिन्हें स्वास्थ्य और महिला बाल विकास विभाग की सेवाएं मिलनी चाहिए, लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसा नहीं होता है। 0 से 5 साल के बच्चों में पोषण की स्थिति देखें तो सबसे ज्यादा समस्या भी इन प्रवासी श्रमिकों के बच्चों में है। जिनमें सही समय पर टीकाकरण, खानपान और पोषणयुक्त आहार नहीं मिलने के कारण कुपोषण दर ज्यादा बढऩे का खतरा रहता है। वहीं ईट भट्टो पर महिलाओं और किशोरियों की स्वास्थ्य स्थिति देखें तो यह भी चिंताजनक स्थिति में नजर आता है, क्योंकि इन जगहों पर इनके लिए शौचालय और स्नानघर की उचित व्यवस्था नहीं होती है। ऐसे में खुले में शौच इसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इसके अतिरिक्त माहवारी के समय सेनेटरी नैपकिन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण भी यह महिलाएं और किशोरियां कई प्रकार की स्वास्थ्य समस्याओं से जूझती रहती हैं।’

आशा वर्मा के अनुसार इन प्रवासी मजदूरों के बच्चों और महिलाओं में स्वास्थ्य की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए संस्था पिछले तीन साल से अजमेर और भीलवाड़ा क्षेत्र के 20 ईट भट्टो पर बालवाड़ी केन्द्र संचालित कर रही है, जिसमें 0 से 6 साल के 620 बच्चों को नामांकित किया गया है। जिन्हें सूखा व गर्म पोषाहार दिया जा रहा है।

जो बच्चे कुपोषण की श्रेणी में आते हैं उन्हें न केवल कुपोषण उपचार केंद्र में दिखाया जाता है बल्कि संस्था की ओर से उनके साथ विशेष काम किया जाता है। उन्होंने बताया कि पिछले तीन सालों में परिवार के साथ ईट भट्टो पर रहने वाले कुपोषित बच्चों की स्थिति देखें तो इसमें काफी सुधार आया है। अब तक करीब 100 से ज्यादा बच्चों को इन बालवाड़ी केंद्र के माध्यम से कुपोषण से मुक्त स्वस्थ शिशु बनाया गया है। इसके अतिरिक्त समय समय पर उन बच्चों और गर्भवती महिलाओं का सम्पूर्ण टीकाकरण करवाने में भी पहल की गई है। इसके अतिरिक्त इन बालवाड़ी केंद्रों पर बच्चों के साथ लर्निंग गतिविधियां भी की जाती हैं ताकि उनमें शिक्षा के प्रति लगन बनी रहे। इसके लिए हर माह बच्चो की ग्रोथ मॉनिटरिंग भी की जाती है।
ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या ईट भट्टों पर काम करने वाले प्रवासी मजदूरों के बच्चों पर शिक्षा का अधिकार कानून लागू नहीं होता है? हालांकि सरकार का हमेशा प्रयास रहता है कि बच्चों की शिक्षा की स्थिति में सुधार हो. इसके लिए सरकार हमेशा नई नई योजनाएं भी लेकर आती है, ताकि कोई भी बच्चा शिक्षा से छूटे नहीं. इसके लिए देश में शिक्षा का अधिकार कानून भी लागू किया गया. लेकिन इसके बावजूद अधिकतर प्रवासी मजदूरों के बच्चे इस अधिकार से वंचित रह जाते हैं। आशा वर्मा के अनुसार इस दिशा में काम कर रही सीएलआरए और उसकी जैसी अन्य गैर सरकारी संस्थाएं इस इसमें बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। जिनकी ओर से हर साल शिक्षा विभाग को इन बच्चों को स्थानीय स्कूल से जोडऩे के लिए सूची उपलब्ध करवाई जाती है।

हालांकि अभी तक इन बच्चो का शिक्षा से जुड़ाव हो इसके लिए विभाग की ओर से कोई ढांचा तैयार नही हुआ है। यही कारण है कि यह प्रवासी बच्चे पढऩे और खेलने कूदने की उम्र में माता-पिता के साथ दिहाड़ी मजदूर बन रहे हैं। आशा वर्मा के अनुसार इन प्रवासी बच्चों के पास कोई दस्तावेज नहीं होने और अपने गृह नगर से बीच में ही स्कूल छोडक़र पलायन करने के कारण कार्यस्थल के आसपास के सरकारी स्कूल उन्हें प्रवेश देने में आनाकानी करते हैं। जबकि शिक्षा का अधिकार कानून में बिना किसी दस्तावेज के सभी बच्चो का स्कूल में प्रवेश होने की बात कही गई है. लेकिन जागरूकता की कमी के कारण यह सरकारी स्कूल उन्हें बिना दस्तावेज़ के प्रवेश देने से इंकार कर देते हैं। यह शिक्षा का अधिकार कानून का सरासर उल्लंघन है।

आशा वर्मा बताती हैं कि ने बताया कि तीन सालों में अजमेर और भीलवाड़ा जिला के 20 ईट भट्टो पर करीब 1800 प्रवासी बच्चे इस प्रकार के बालवाड़ी केंद्रों पर नामांकित हुए हैं. जो एक बड़ी उपलब्धि है. वास्तव में, राजस्थान में किसी भी ईट भट्टे पर सरकार की ओर से आंगनबाड़ी केन्द्र नहीं होने के कारण लाखों बच्चों का बाल्यावस्था में जो विकास होना चाहिए इन मूलभूत अधिकारों से यह सभी प्रवासी बच्चे वंचित रह जाते हैं. जिससे उनका शारीरिक और मानसिक विकास बाधित हो जाता है. ऐसे में सरकार को इस प्रकार की नीति, योजनाएं और ढांचा तैयार करनी चाहिए जिससे प्रवास होने वाले बच्चे भी शिक्षा जैसे मूल अधिकार से वंचित न हो सकें. (चरखा फीचर)
विनीत खरे
राजनीतिक रणनीतिकार और जन सुराज अभियान के संयोजक प्रशांत किशोर ने कहा है कि बीजेपी ये चाहती है कि लोग ये मान लें कि 2024 के चुनाव के बाद आगे कुछ नहीं।
बीबीसी के साथ ख़ास बातचीत में प्रशांत किशोर ने विपक्ष की रणनीति पर सवाल उठाए और कहा कि इस लोकसभा चुनाव को ‘डू ऑर डाई’ कहना विपक्ष की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल है।
प्रशांत किशोर ने कहा, ‘विपक्ष दूसरी बड़ी ग़लती कर रहा है। ये बहुत बड़ी रणनीतिक ग़लती है जिसे विपक्ष कर रहा है। कोई अगर ये कह रहा है कि इसके बाद कुछ नहीं होगा। ये तो बीजेपी चाहती है कि आप और हम ये मान लें कि 2024 के चुनाव के बाद आगे कुछ भी नहीं। जैसे ये पहला और आखऱिी चुनाव हो और एक बार अगर जनता ने बीजेपी के पक्ष में जनादेश दे दिया, तो कोई सवाल मत करो।’
उन्होंने कहा कि 2024 में कोई जीते या कोई हारे। इसका मतलब ये नहीं कि देश में विपक्ष नहीं रहेगा, असहमति नहीं रहेगी। इस देश की समस्याएँ नहीं रहेंगी। देश में आंदोलन नहीं होने चाहिए या देश में प्रयास नहीं होने चाहिए, जो बीजेपी से इत्तेफाक नहीं रखते।
उन्होंने कहा, ‘अगर विपक्ष ये कह रहा है। उनको लग रहा है कि वे लोगों को डरा रहे हैं ताकि हम कहेंगे कि 2024 के बाद कुछ नहीं बचेगा, इसलिए वोट दो हमें। मुझे लग रहा है कि वे बहुत बड़ा टेक्निकल ब्लंडर कर रहे हैं। उन्हें ये नहीं कहना चाहिए। ये सच्चाई भी नहीं है।’
प्रशांत किशोर ने कहा कि अगर वे उनकी जगह होते, तो ये कहते कि 2024 में लड़ेंगे, पूरी ताक़त से लड़ेंगे, लेकिन अगर 2024 में जीत नहीं भी हुई, तो इसके बाद भी समय आएगा।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह कहकर एजेंडा सेट कर दिया है कि अबकी बार 400 पार। वो कहते हैं कि अब बात बीजेपी की हार-जीत की नहीं हो रही है, बल्कि इस बात की चर्चा है कि 400 सीटें आएँगी या नहीं।
लोकसभा चुनाव और विपक्षी एकता की कोशिश
ऐसे समय में जब लोकसभा चुनाव में कुछ ही समय रह गया है, तब विपक्ष की तैयारियां कैसी हैं और विपक्ष कहाँ खड़ा है?
इस सवाल के जवाब में प्रशांत किशोर कहते हैं कि विपक्ष ने बहुत देर कर दी है।
वो अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि इसकी तैयारियां कई साल से की जा रही थीं। यह बात सबको पता थी कि इसका उद्घाटन चुनाव से कुछ महीने पहले हो जाएगा।
उन्होंने कहा कि इसी तरह से यह सबको पता है कि 2024 के अप्रैल-मई में लोकसभा चुनाव होंगे। ऐसे में विपक्ष का ‘इंडिया’ गठबंधन जो चुनाव से कुछ महीने पहले बना है, क्या वह गठबंधन दो-तीन साल पहले नहीं बन सकता था।
वो कहते हैं कि विपक्षी दलों को गठबंधन करने से किसने रोका था।
प्रशांत किशोर ने कहा, ‘वो तीन साल पहले भी किसानों का मुद्दा उठा सकते थे, दो-तीन साल पहले ही वो सीट शेयरिंग कर सकते थे। तीन साल पहले ही गठबंधन का नाम ‘इंडिया’ रख दिया होता। अगर तीन साल पहले ही इंडिया गठबंधन बन गया होता तो उसको लेकर लोगों की समझ आज ज़्यादा होती।’
बिहार में बदलाव की आस
बाद में बीबीसी के साथ बातचीत में प्रशांत किशोर ने कहा कि लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष जो एकता की कोशिशें करता दिख रहा है, वह दो-तीन साल पहले होनी चाहिए थी।
उन्होंने पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव में बीजेपी के बेहतर प्रदर्शन की भी उम्मीद जताई है।
पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में बेहतर प्रदर्शन किया था, लेकिन विधानसभा चुनाव में पार्टी उतना अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई थी।
बिहार के बारे में प्रशांत किशोर ने कहा कि अब वे बिहार में वो करना चाहते हैं, जिससे बिहार के लोगों की जि़ंदगी बदले, न कि केवल यहाँ की सत्ता बदले।
उन्होंने कहा कि आज तक मिले अनुभव के आधार पर उन्हें लगाता है कि महात्मा गांधी का रास्ता आज सबसे अधिक प्रासंगिक है।
उन्होंने कहा, ‘जब समाज में जाकर जन चेतना को नहीं बदला जाता है, तब तक किसी बड़े परिवर्तन की उम्मीद बेमानी है।’
प्रशांत किशोर ने कहा कि जब यात्रा की योजना बनाई गई तो उन्होंने तय किया कि वे लोगों को यह नहीं बताएंगे कि किसको वोट दें और किसको नहीं। वे लोगों को यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि वोट किस बात के लिए देना चाहिए।
भारत में महात्मा गांधी की प्रासंगिकता
प्रशांत किशोर ने कहा कि किसी दूसरे कालखंड की तुलना में आज के समय में महात्मा गांधी की प्रासंगिकता ज़्यादा है।
उन्होंने कहा कि आज शहरी भारत में यह धारणा बनाने की कोशिश की जा रही है कि महात्मा गांधी की प्रासंगिकता नहीं रह गई है या उनको मानने वालों की संख्या कम हो गई है।
प्रशांत किशोर ने कहा, ‘2018-19 के दौरान मैंने देश के कऱीब 2,500 कॉलेजों में एक सर्वेक्षण करवाया था। सर्वे के परिणाम से पता चला कि महात्मा गांधी आज भी इस देश में सबसे अधिक पसंद किए जाने वाले सामाजिक-राजनीतिक व्यक्तित्व हैं।’
अगले कुछ महीनों में होने वाले लोकसभा चुनाव में 'जन सुराज' की भूमिका के सवाल पर प्रशांत किशोर ने कहा कि अभी वे जनता को जागरूक करने की भूमिका में बने रहेंगे।
उन्होंने कहा कि उन्होंने बिहार की जनता से वादा किया है कि पहले वे पूरे बिहार की पदयात्रा करेंगे, उसके बाद अधिवेशन-सम्मेलन कर उसमें चर्चा करेंगे कि वे लोग दल बना रहे हैं, तभी जाकर दल बनेगा।
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दल बनाने के सवाल पर वो कहते हैं कि उन्होंने लोकसभा या विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर यात्रा नहीं शुरू की है।
लेकिन उन्होंने बिहार के अगले विधानसभा चुनाव से पहले ‘जन सुराज’ यात्रा पूरी होने और नया राजनीतिक दल बन जाने की उम्मीद जताई।
कौन दे रहा है ‘जन सुराज’ यात्रा का ख़र्चा?
‘जन सुराज’ यात्रा को लेकर उठ रहे सवालों के जवाब में प्रशांत किशोर कहते हैं कि सवाल तो उठते रहेंगे, जिनका काम सवाल उठाना है, वे सवाल उठाते रहेंगे। उनका काम अपने काम को ईमानदारी और शुद्धता से करना है।
प्रशांत किशोर ने कहा, ‘यात्रा के दौरान मैं लोगों से कहता हूँ कि आप यह मत देखिए कि प्रशांत किशोर क्या कह रहे हैं, आप यह देखिए कि मैं कर क्या रहा हूं। आप मेरे काम को अपने अनुभव की कसौटी पर कसिए, ठीक लगे तो मुझसे जुडि़ए।’
प्रशांत किशोर कहते हैं कि उनके पास केवल एक ही फ़ॉर्मूला है कि लोगों को संगठित कैसे किया जाए और लोगों को संगठित कर एक राजनीतिक दल कैसे बनाया जाए। अगर राजनीतिक दल बन जाए तो उसे चुनाव कैसे लड़ाया जाए और उसे जिताया कैसे जाए।
‘जन सुराज’ यात्रा के पैसे के स्रोत के सवाल पर प्रशांत किशोर कहते हैं कि पिछले कुछ सालों में उन्होंने कई राज्यों में कई लोगों और कई राजनीतिक दलों को चुनाव जीताने में मदद की है। लेकिन उन्हें कोई राजनीतिक दल पैसा नहीं दे रहा है।
उन्होंने कहा, ‘जन सुराज यात्रा के लिए पैसा वे लोग दे रहे हैं जिनके चुनाव में मैंने मदद की है। ऐसे लोग साधन संपन्न हैं और वही लोग यात्रा के लिए पैसे दे रहे हैं। इन लोगों को मुझ पर भरोसा है कि अगर प्रशांत किशोर ये प्रयास कर रहे हैं तो इससे जरूर कुछ अच्छा निकल सकता है। इसलिए वो मेरी मदद कर रहे हैं।’
क्या तेजस्वी यादव बिहार के यूथ आइकन हैं
राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव के उभार और यूथ आइकन बताए जाने के सवाल पर प्रशांत किशोर कहते हैं कि लोकतंत्र में काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ाई जा सकती है।
वो कहते हैं कि आरजेडी के 15 साल के जंगलराज को जिन लोगों ने देखा है, वो लोग आरजेडी या उससे जुड़े लोगों को फ्रंट सीट पर बैठे हुए देखना नहीं चाहते हैं।
इलेक्टोरल बॉन्ड पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का चुनाव पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
इस सवाल पर उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि इसका चुनाव पर कोई असर होगा। इससे गाँव-देहात के लोगों का मतदान प्रभावित नहीं होगा।
बंगाल में संदेशखाली के मुद्दे से किसे होगा फायदा
पश्चिम बंगाल में संदेशखाली के मुद्दे पर सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी में मचे घमासान के सवाल पर प्रशांत किशोर ने कहा कि इस तरह के मुद्दे सही हैं या गलत हैं, यह तो जाँच का विषय है, लेकिन जब यह मुद्दा जनता के बीच में आता है तो सत्ताधारी दल को उसका नुकसान उठाना पड़ता है।
उन्होंने कहा, ‘यह कहना कि पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी कमज़ोर हो गई है, यह ठीक नहीं है। विधानसभा चुनाव में बीजेपी को तृणमूल ने बहुत मेहनत करके हराया था।’
‘अगर उस तरह की मेहनत लोकसभा चुनाव में नहीं की गई तो बीजेपी के लिए चुनाव परिणाम करीब-करीब 2019 के जैसे या उससे बेहतर भी आ सकते हैं।’
उनका कहना है कि 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद से पश्चिम बंगाल में बीजेपी के समर्थन में बढोतरी हुई है। ऐसे में अगर तृणमूल को अपने आधार को बचाना है, तो उसे बहुत कड़ी मेहनत करनी होगी।
आम लोगों में कैसी है प्रशांत किशोर की छवि
बिहार में जन सुराज अभियान शुरू करने वाले प्रशांत किशोर पिछले करीब डेढ़ साल से राज्य में पदयात्रा पर हैं और वो अभी तक 14 जिलों की यात्रा कर चुके हैं।
बीबीसी के साथ बातचीत में प्रशांत किशोर ने लोकसभा चुनाव, बीजेपी, राम मंदिर, तेजस्वी यादव और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार को लेकर भी अपनी राय ज़ाहिर की।
जब बिहार के सहरसा जि़ले के गाँव देहद में बीबीसी की टीम उनसे मिलने पहुँची, तो रास्ते में जगह-जगह पर प्रशांत किशोर की तस्वीर लगे स्वागत द्वार बने थे।
सडक़ के दोनों ओर की दुकानों, खंभों पर कई जगह जन सुराज के पीले झंडे और जय श्रीराम के झंडे साथ दिखे।
क्या आप प्रशांत किशोर को जानते हैं, नाम सुना है, या उन्हें देखा है? इस सवाल कुछ लोगों ने कहा कि वो प्रशांत किशोर के बारे में नहीं जानते और एक बार उन्हें सुनने के बाद उनके बारे में मन बनाएँगे। कुछ ने कहा कि उन्होंने प्रशांत किशोर के वीडियो देखे हैं।
प्रशांत किशोर ने गाँव वालों से कऱीब आधे घंटे बात की। वहीं खड़े ज़हूर आलम ने कहा कि वो प्रशांत किशोर को मोबाइल पर सुनते रहे हैं और प्रशांत किशोर ने कई अच्छी बातें कीं।
रंजीत कुमार सिंह ने कहा कि प्रशांत अच्छी बातें जनता तक पहुंचा रहे हैं।
बड़ी संख्या में महिलाएँ भी प्रशांत किशोर को सुनने आईं हुई थीं। प्रशांत लोगों से अपनी बात रखने को कहते, उनसे सवाल पूछते।
एक जगह उन्होंने कहा, ‘जनता का राज अगर चाहिए तो इसका एक ही रास्ता है। अगली बार वोट नेता का चेहरा देखकर नहीं, अपने बच्चों का चेहरा देखकर दीजिए।’ (bbc.com/hindi)
डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन
कॉफी शब्द कहां से आया? कॉफी इथियोपिया से आई थी, जहां के लोग इसे कहवा कहते थे। स्वर्गीय डॉ. के. टी. अचया ने वर्ष 1998 में ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी से प्रकाशित अपनी पुस्तक ए हिस्टोरिकल डिक्शनरी ऑफ इंडियन फूड में लिखा है कि कॉफी के बीज अरब व्यापारियों द्वारा कुलीन वर्ग के उपयोग के लिए भारत लाए गए थे। अरबी लोगों ने दक्षिण भारत और श्रीलंका में कॉफी के बागान लगाए। और सूफी बाबा बुदान ने कर्नाटक के चिकमगलुर के पास कॉफी के पौधे उगाए।
1830 की शुरुआत में, शुरुआती ब्रिटिश आगंतुकों ने दो प्रकार की कॉफी के कॉफी बागान लगाए – अच्छी ऊंची जगहों पर कॉफी अरेबिका के, और निचले इलाकों में कॉफी रोबस्टा के बागान। (चूंकि युरोप में कहवे का कारोबार अरब व्यापारी करते थे इसलिए अरेबिका नाम पड़ा; और रोबस्टा, क्योंकि पश्चिम अफ्रीका की यह किस्म रोगों के प्रति अधिक प्रतिरोधी है)। जैसा कि मैंने कॉफी पर अपने पूर्व लेखों में लिखा था, कॉफी एक स्वास्थ्यवर्धक पेय है, खासकर जब इसे गर्म दूध के साथ मिला कर पीया जाता है। कई अमेरिकी लोग बिना दूध वाली (ब्लैक) कॉफी पीते हैं।
तमिलनाडु के कुंभकोणम शहर के कॉफी के शौकीन बाशिंदे अपनी कॉफी को कुंभकोणम डिग्री कॉफी कहते हैं। उनका दावा है कि उसके स्वाद का कोई मुकाबला नहीं है। वे आगे कहते हैं कि यह कॉफी विशुद्ध अरेबिका कॉफी है और इसमें चिकरी पाउडर नहीं मिला होता है, जो आम तौर पर डिपार्टमेंटल स्टोर या कॉफी शॉप पर मिलने वाले कॉफी पाउडर या कॉफी के बीजों में होता है। इसी तरह, सिकंदराबाद की जिस कॉफी शॉप से मैं कॉफी खरीदता हूं वहां शुद्ध अरेबिका कॉफी पावडर के साथ-साथ चिकरी मिश्रित अरेबिका कॉफी पीने वालों के लिए चिकरी मिश्रित कॉफी पावडर भी मिलता है।
लेकिन चिकरी है क्या? यह भी कॉफी की एक किस्म है, और भारत चिकरी का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। हमारे देश में यह सुदूर पूर्वी राज्यों (असम, मेघालय, सिक्किम) में उगाई जाती है। वहीं कुछ लोगों का ऐसा दावा है कि पोषण के मामले में चिकरी अरेबिका से बेहतर हो सकती है, क्योंकि इसमें कैफीन की मात्रा कम होती है। कैफीन एक अणु है जो केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को उत्तेजित करता है, हालांकि इस सम्बंध में अब तक कोई निर्णायक प्रमाण नहीं मिले हैं।
आंध्र प्रदेश अराकू घाटी के पहाड़ी क्षेत्रों में उगाई जाने वाली अपनी विशेष कॉफी के लिए प्रसिद्ध है। अराकू कॉफी के बारे में दावा है कि यह न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी उपलब्ध सबसे अच्छी कॉफी है। यह शुद्ध अरेबिका कॉफी है। बहुत अच्छी किस्म की अरेबिका तमिलनाडु की शेवरॉय पहाडिय़ों और कर्नाटक के मंजराबाद किले के आसपास के इलाकों में भी उगाई जाती है। भारत भर के बड़े शहरों में कई युवा स्टारबक्स की कॉफी खरीदते हैं और पीते हैं, और कैफे कॉफी डे (सीसीडी) से भी। स्टारबक्स सिर्फ शुद्ध अरेबिका कॉफी का उपयोग करता है, जबकि सीसीडी के बारे में स्पष्ट नहीं है कि वे शुद्ध अरेबिका का उपयोग करते हैं या मिश्रण का।
कॉफी की इन विभिन्न प्रमुख किस्मों को लेकर इतना शोर क्यों है? जवाब इतालवी आनुवंशिकीविद डॉ. मिशेल मॉर्गन्टे द्वारा किए गए हालिया आनुवंशिकी अध्ययन (नेचर कम्युनिकेशंस जनवरी 2024) से मिलता है जो बताता है कि कॉफी की कई कृष्य किस्में बेहतर स्वाद दे सकती हैं। दी हिंदू ने हाल में संक्षेप में अपने विज्ञान पृष्ठ पर यह बात बताई है और बीबीसी न्यूज़ के अनुसार कॉफी अरेबिका में आनुवंशिक परिवर्तन बेहतर महक दे सकते हैं। तो वक्त आ गया है कि भारतीय आनुवंशिकीविद भारतीय कॉफियों के जीन्स अनुक्रमित करके देखें। (स्रोत फीचर्स)
डॉ. परिवेश मिश्रा
(संयोग है कि आज श्री दिग्विजय सिंह का जन्मदिन है। चार साल में एक बार आता है। उन्हें बधाई। )
कभी कभी छोटी बातें भी बड़े सामाजिक परिवर्तन का कारण बन जाती हैं। शर्त बस इतनी है कि बात को आगे बढ़ाने वाले लोग मिलते रहें। जैसे हमें मिले।
सारंगढ़ से उत्तर दिशा में महानदी के किनारे जेवरा नाम का एक छोटा गाँव में जब हम पहुँचे तो सौ डेढ़ सौ युवा दम्पत्तियों का एक समूह बच्चों को गोद में लिए खड़ा था। मेरी पत्नी मेनका देवी और मैं वहाँ बच्चों का टीकाकरण करने पहुँचे थे। राजीव गांधी और सैम पित्रोदा के शुरू किये कोल्ड-चेन आधारित टीकाकरण मिशन में कुछ समय बाकी था। वहाँ हमें अनेक लोगों के गले में टेबल-टेनिस से लेकर टेनिस बॉल के आकार की गांठें लटकी दिखीं। गिनने पर ऐसे लोगों की संख्या 18 निकली।
जब हम दोनों ने मेडिकल कॉलेज से शिक्षा पूरी की हम आदर्शवाद के बादलों में तैर रहे थे। मेरी पीढ़ी का यह वह दौर था जब बीस से तीस वर्ष की आयु में यदि कोई युवा थोड़ा विद्रोही, स्थापित व्यवस्था से प्रश्न करने वाला, थोड़ा क्रांतिकारी टाईप विचार न रखे, न व्यवहार करे तो लोग उसे असामान्य मानने लगते थे।
उस दौर में नये बने डॉक्टर के सामने अधिक विकल्प नहीं होते थे। नर्सिंग होम और निजि बड़े अस्पतालों का चलन राजीव गांधी से शुरू होकर नरसिंह राव तथा मनमोहन सिंह के काल में बढ़ा, तब नहीं था। भोपाल में मेडिकल कॉलेज होस्टल के पास ही राज्य के स्वास्थ्य विभाग का दफ्तर था। सादे कागज पर आवेदन छोड़ आने के हफ्ता-दस दिन में नियुक्ति पत्र हाथ में आ जाता था। यह अलग बात है कि गूगल-पूर्व के उस काल में उसके बाद नियुक्ति पत्र हाथों में लिये युवा डॉक्टर पता करते घूमता था कि नियुक्ति वाला गांव नक्शे में कहां है। अधिकांश प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बिजली और सडक़ विहीन स्थानों पर थे। रेडियोलॉजी विभाग में मेरे साथ एम.डी. कर रहे डॉ. समीर हूमड मनासा के रहने वाले थे। मनासा मध्यप्रदेश की पश्चिमी सीमा पर नीमच के पास है। एक दिन समीर ने अपना नियुक्ति लिफ़ाफ़ा खोला और पूछा था- यह कुडुमकेला कहां होता है? मैंने बताया यह मध्यप्रदेश की पूर्वी सीमा पर रायगढ़ और धर्मजयगढ़ के बीच है। समीर का अगला प्रश्न था- कितनी दूर है? जब बताया कुडुमकेला में मनासा की अपेक्षा सूरज चालीस मिनट पहले उदय होता है तो देर तक सोने के आदी समीर का चेहरा उतर गया था।
मेनका देवी और मैंने सामाजिक चिकित्सा के क्षेत्र वाले जिस रास्ते पर चलने का निर्णय लिया था वह बहुत अधिक चला हुआ नहीं था। इस राह में हमें लेप्रसी, टीबी, फ़ायलेरियेसिस जैसी स्थितियां इफरात में मिलने जा रही थीं। लेकिन इनसे दो-चार होने का कोई मॉडल सामने नहीं था जिसके अनुसरण पर विचार किया जा सके। मुरलीधर देवीदास आमटे को बाबा आमटे के नाम से जाना जाता था। उन्होंने लेप्रसी पर बहुत काम किया था। वे बहुत बड़ी हस्ती थे। वे स्वाभाविक रोल मॉडल हो सकते थे। किन्तु हम न तो अपने कार्यक्षेत्र को लेप्रसी में सीमित रखना चाहते थे न ही अपने भूगोल को आश्रम के भीतर।
जब हम जेवरा गाँव से वापस आये तो एक नया अध्याय हमारे कामों में जुड़ गया। गले में गांठ (घेंघा या गॉयटर) को आयोडीन की कमी से शरीर में होने वाले दुष्प्रभावों के समूह में रखा जाता है। इसके अलावा नवजात शिशुओं की बढ़ी हुई मृत्यु दर, मृत शिशु के बाहर आने की दर, शारीरिक और मानसिक विकलांगताएं, मंदबुद्धि आदि भी इस समूह में आते हैं।
प्राकृतिक आयोडीन मिट्टी की सबसे ऊपरी सतह में पाया जाता है और जहां पानी का बहाव तेज होता है वहां इसकी कमी अधिक होती है। हमारे जि़ले के उत्तरी क्षेत्रों में पहाड़ी इलाका होने के कारण बहाव तेज होना ही था। अब यह इलाका जशपुर के नाम से एक अलग जिला बन चुका है। उन दिनों युवा होनहार अफसरों को एडिशनल कलेक्टर का पद दे कर यहां का प्रशासनिक मुखिया बनाया जाता था। सात विशाल विकास खण्डों वाला यह बड़ा इलाका था। यदि युवा अधिकारी प्रतिभाशाली और कल्पनाशील हो तथा कुछ नया करने का जज़्बा रखता हो तो उसे ऐसा करने के लिए पूरा अवसर यहाँ प्राप्त होता था।
उन दिनों यहां श्री मनोज श्रीवास्तव पदस्थ थे। हाल में वे मध्यप्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव के पद से रिटायर हुए। उन्होने इस समस्या को समझा और निदान ढूंढऩे में हमारी मदद की। नमक ऐसी वस्तु थी जिसका सेवन सब करते हैं। किन्तु आयोडीन वाले नमक की उपलब्धता और खपत दोनों बहुत कम थे। उन दिनों की प्रचलित प्रथा के अनुसार कस्बों से व्यापारी अपनी सायकिल में लटके झोलों में ढेले वाला नमक लेकर वन के अंदर गाँवों तक पहुंचते और आदिवासियों से बदले में वनोपज लेकर वापस आ जाते थे। आमतौर पर यह वह नमक होता जो घोड़ों आदि पशुओं के लिये बाज़ार में आता था। मनोज जी ने एक प्रयोग का सुझाव दिया। उन दिनों जवाहर रोजग़ार योजना के नाम से एक कार्यक्रम चलता था जिसमें ग्रामीणों को काम के बदले पारिश्रमिक के रूप में चावल और नगद दिया जाता था। सुझाव था इस कार्यक्रम के माध्यम से आयोडीन वाला नमक आदिवासियों तक पहुँचाने का। मनोज जी के सुझाव पर अमल हुआ।
बाहर से बड़े पैकिंग में आयोडाईज्ड नमक बुलाया गया। खुले नमक से आयोडीन का क्षरण हो जाता है इसलिए इलाके की सारी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का सहयोग लेकर नमक को प्लास्टिक के छोटे-छोटे पैकेट्स में बांटा और मोमबत्ती की लौ की सहायता से सील किया गया। नमक के पैकेट्स के ढेर बन गये। जवाहर रोजग़ार योजना के भुगतान के साथ नमक का वितरण शुरू हुआ। आमतौर पर परिवार के एक से अधिक सदस्य मज़दूरी करते थे। देखते देखते ग्रामीणों और आदिवासियों के घरों में इतने पैकेट्स इक_ा हो गये कि वनोपज से अदला-बदली कर ढेले वाला नमक लेने का कारण समाप्त हो गया। उसके बाद कोई औपचारिक सर्वे तो नहीं हुआ किन्तु उस इलाके में पदस्थ डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों से जानकारी मिली कि परिवर्तन दिखाई देना शुरू हो गया था।
इस दौरान मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बन गये थे। 1995 में उनके मंत्रीमंडल के एक साथी मोहनलाल चौधरी की मृत्य हो गयी। वे सारंगढ़ से लगे हुए सरायपाली क्षेत्र से विधायक थे। मृत्य के कारण उपचुनाव घोषित हुआ और उम्मीदवार के चयन के सिलसिले में दिग्विजय सिंह जी का आगमन हुआ। सरायपाली का रास्ता सारंगढ़ होकर जाता था सो भोजन के लिए वे गिरिविलास में रुके। उस दौरान हुई बातचीत में मेनका जी ने उनके साथ जेवरा से लेकर जशपुर तक के अपने अनुभव साझा किये। मुझसे उन्होंने इस विषय पर इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च से लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन तक के द्वारा किये गये रिसर्च की रिपोर्ट्स लीं। सारंगढ़ से सरायपाली के बीच का रास्ता उन दिनों बेहद खराब था। सो रास्ते में दस्तावेजों का अध्ययन करने के लिए उन्हे कुछ अतिरिक्त समय भी मिला। लौटते समय वे एक बार फिऱ रुके और जो शंकाएं थीं उनका निराकरण किया।
मुख्यमंत्री के भोपाल वापस पहुंचने के कुछ ही दिनों के भीतर दो बाते हुईं - उन्होने अपनी सरकार के लिए पांच मिशनों की घोषणा की। आयोडीन की कमी से होने वाली स्थितियों पर नियंत्रण उनमें एक था। दूसरा निर्णय था मध्यप्रदेश में बिना आयोडीन के खुले नमक की बिक्री पर पूरी तरह रोक।
खुले नमक की बिक्री पर रोक की घोषणा का सभी ने खुले दिल से स्वागत किया हो ऐसा नहीं था। इसका विरोध करने वाले एक बड़े वर्ग का मानना रहा कि यह निर्णय आयोडीन नमक बेचने वाली बड़ी कम्पनियों के दबाव में या उन्हे उपकृत करने के लिए लिया गया था।
जो भी हो, इसका दूसरा पक्ष अधिक महत्वपूर्ण है। न मनोज श्रीवास्तव अपने पद पर रहे न दिग्विजय सिंह। लेकिन यह सच है कि आज छत्तीसगढ में (और शायद मध्यप्रदेश और अन्य स्थानों में भी) गले में गांठ लिये लोग दिखाई नहीं देते। कम से कम उतनी आसानी और उतनी संख्या में तो कतई नहीं जितने हमें जेवरा में दिखाई दिये थे। पीढ़ी दर पीढ़ी होने वाली विकलांगताएं अब नजर नहीं आतीं। अब बाजार में खुला नमक भी बिकता नजर नहीं आता।
गिरिविलास पैलेस, सारंगढ़


