विचार/लेख
-अरुण कान्त शुक्ला
शनिवार 3 अप्रैल को बीजापुर जिले के तर्रेम इलाके के पास सीआरपीएफ, कोरबा बटालियन और पुलिस के जवानों पर घात लगाकर नक्सलियों द्वारा किया गया हमला जिसमें 23 जवान मारे गए, 31 घायल हुए और एक नक्सलियों की पकड़ में है, पिछले 15 दिनों में सुरक्षा बलों पर किया गया तीसरा हमला है। इसके पूर्व भी 21 मार्च, 2021 को सुकमा में हुई मुठभेड़ में 17 जवान शहीद हुए थे और फिर 23 मार्च, 2021 को माओवादियों ने नारायणपुर में एक बस को उड़ा दिया था जिसमें 5 पुलिसकर्मी शहीद और 13 घायल हुए थे। पिछले एक दशक में बस्तर, सुकमा, दंतेवाड़ा, बीजापुर, नारायणपुर जिलों के गांवों के आसपास एक दर्जन से अधिक बड़े नक्सल हमले सुरक्षा जवानों पर हो चुके हैं। 25 मई 2013 को बस्तर जिले की दरभा घाटी में हुए नक्सली हमले में महेंद्र कर्मा, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नन्द कुमार पटेल,पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत 30 से अधिक कांग्रेस कार्यकर्ताओं को जान से हाथ धोना पड़ा था। अभी तक ऐसे हमलों में लगभग 350 से अधिक सुरक्षाकर्मी अपनी जान से हाथ धो चुके होंगे। इतनी ही संख्या में अथवा इससे अधिक माओवादी भी सुरक्षा कर्मियों के हमले में मारे गए होंगे।
शहरी क्षेत्र में एक आम धारणा बन चुकी है कि माओवाद अब कोई क्रांतिकारी आंदोलन न होकर अराजक आतंकवाद बन कर रह गया है। मैंने यहाँ उन घटनाओं का जिक्र नहीं किया है जिनमें आम आदमी याने आदिवासी अथवा अर्ध-नगरीय क्षेत्र में रहने वाला नागरिक या किसी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता जो माओवादियों का विरोध करता हो, पुलिस का मुखबिर होने के शक में माओवादियों के द्वारा तड़पा तड़पा कर मार दिया जाता है। अनेक बार ऐसा भी होता है जब जैसे सुरक्षाकर्मियों को गलत जानकारी मिलती है या शक होता है और उनके हाथों निर्दोष लोग मारे जाते हैं वैसे ही माओवादी भी गलती से अथवा शक में आम निर्दोष लोग मारे जाते हैं। स्वाभाविक है अपनी इस गलती को दोनों पक्षों में से कोई स्वीकार नहीं करता है। इन घटनाओं की जितनी भी निंदा की जाए कम है। यदि प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अपना असम दौरा बीच में छोड़कर वापस आए और घायल जवानों से मिले तो केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भी बंगाल का चुनाव छोड़कर आए और घायल जवानों से मिले। स्वाभाविक तौर पर उनसे वे ही रटे रटाये जुमले सुनने मिले जो प्रत्येक गृहमंत्री और मुख्यमंत्री से अभी तक प्रत्येक घटना के बाद सुनने मिलते हैं। जवानों की शहादत व्यर्थ नहीं जायेगी। हमने नक्सलियों को सबक सिखाया और उनकी योजना चौपट की वगैरह।
इस लेख का विषय फोर्स की क्या गलती थी या उनसे कहाँ चूक हुई, इसका शोध करना नहीं है। हम सिर्फ यह चाहते हैं कि माओवादी सक्रियता के लगभग 6 दशकों के बाद माओवादी इस पर विचार करें कि वे किसकी मदद कर रहे हैं और किसको नुकसान पहुंचा रहे हैं। यदि आतंक फैलाकर या बनाए रखकर ही माओवाद को ज़िंदा रखना माओवादियों का मकसद है, तो वे अपने मकसद में फौरी तौर पर इसलिए कामयाब दिख सकते हैं की आतंक फैलाने में वे कामयाब हो गए हैं| पर, यदि वे यह सोचते हैं कि वे इस तरह के हमला करके देश में कायम व्यवस्था को कमजोर कर पाए हैं या उसे बदलने की दिशा में माओवाद को तनिक भी दूर आगे बढ़ा पाए है, तो वे पूरी तरह गलत है| या, वे यह सोचते हैं कि वे नगरीय इलाके के जनमानस को यह सन्देश देने में कामयाब हुए हैं की माओवाद ताकतवर होकर बहुत आगे बढ़ आया है और अब बारी आ गयी है कि अर्बन जनता भी हथियार उठाकर उनके साथ हो ले, तो भी वे पूरी तरह गलत हैं क्योंकि इस हिंसा के फलस्वरूप पैदा होने वाली व्यग्रता का पूरा फायदा देश का शासक वर्ग ही उठा रहा है|
माओवादी जिस हथियारबंद संघर्ष के जरिये तथाकथित क्रान्ति का सपना आदिवासियों को दिखाते हैं, उसका कभी भी सफल न होना, दीवाल पर लिखा एक ऐसा सत्य है, जिसे माओवादी पढ़ना नहीं चाहते हैं| जिस देश में अभी तक मजदूर-किसान के ही एक बड़े तबके को, जो कुल श्रम शक्ति का लगभग 98% से अधिक ही होगा, संगठित नहीं किया जा सका हो| जिस देश में नौजवानों और छात्रों के संगठन लगभग मृतप्राय: पड़ गए हों और वामपंथी शिक्षा कुल शिक्षा से तो गायब ही हो, स्वयं वामपंथ की शैक्षणिक गतिविधियां लगभग शून्य की स्थिति में आ गई हों, वहाँ, शैक्षणिक सुविधाओं से वंचित आदिवासी समाज को जंगल में क्रान्ति का पाठ पढ़ाकर, बन्दूक थमा कर क्रान्ति का सपना दिखाना एक अपराध से कम नहीं है| इस बात में कोई शक नहीं कि जितनी हिंसा माओवाद के नाम पर राज्य सत्ता स्वयं देश के निरपराध और भोले लोगों पर करती है और सेना-पुलिस के गठजोड़ ने जो अराजकता, हिंसा,बलात्कार विशेषकर बस्तर के आदिवासी समाज पर ढा कर रखा है, उसकी तुलना में माओवादी हिंसा कुछ प्रतिशत भी न हो, पर, भारतीय समाज का अधिकाँश हिस्सा आज भी हिंसा को बर्दाश्त नहीं कर पाता है| राज्य अपनी हिंसा को क़ानून, शांति कायम करने के प्रयासों, देशद्रोह, राष्ट्रवाद जैसे नारों के बीच छुपा जाता है, वहीं, माओवादियों के हर आक्रमण को या उनके नाम पर प्रायोजित आक्रमण को बढ़ा-चढ़ा दिखाता है, यह हम पिछले लंबे समय से देख रहे हैं|
पिछले कुछ वर्षों में एक सोची समझी साजिश के तहत अर्बन-नक्सल की थ्योरी प्रचारित की जा रही है जिसकी आड़ में देश के बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, रंगकर्मियों और शिक्षाविदों को निशाना बनाकर उन्हें राष्ट्र-द्रोह के मामलों में फंसाकर या तो जेल में डाला जा रहा है या आम देशवासियों की नजर में उनकी छवि देशद्रोही की बनाई जा रही है। आज देश के शोषितों का बहुत बड़ा हिस्सा किसान सरकार के साथ सीधे-सीधे दो-दो हाथ कर रहा है और सरकार तथा उसके नुमाईंदे उस किसान समूह को आतंकवादी से लेकर राष्ट्र-द्रोही तक सिद्ध करने पर उतारू हैं। जैसे ही 3 अप्रैल की माओवादी घटना हुई, शासक पार्टी की आईटी सेल ने सोशल मीडिया में और सरकार के इशारे पर आज के इस बिक चुके डिजिटल मीडिया ने देश के बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, रंगकर्मियों और शिक्षाविदों, विश्वविद्यालयओं को माओवाद के लिए जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया। इसका एक नमूना सोशल मीडिया में घूमता यह संदेश है;
"शहीद हुए जवानों पर हथियार भले ही नक्सलियों ने ताने थे मगर उनके हाथों में वो हथियार देश की किसी सेंट्रल यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे "ज्ञानी" प्रफ़ेसर ने पहुंचाए हैं। किसी "आला" दर्जे के साहित्यकार ने उन नक्सलियों की ट्रेनिंग का खर्चा उठाया है। रंगमंच के रंगों में सिर से पैर तक डूबे किसी "क्रांतिकारी" रंगकर्मी ने नक्सलियों के हमले की स्क्रिप्ट लिखी है। किसी "टॉप क्लास" फिल्मकार ने उन नक्सलियों के रहने-खाने की व्यवस्था की है। किसी एसी रूम में बैठकर खबर के खोल में संपादकीय बांच रहे किसी "निष्पक्ष" पत्रकार ने उन नक्सलियों की बंदूकों में गोलियाँ भरी हैं। उन जवानों ने हिडमा के साथियों से प्रत्यक्ष युद्ध में बलिदान नहीं दिया है, उन्होंने हमारे-आपके आस-पास मौजूद इन नामी-गिरामी हस्तियों से चल रहे परोक्ष युद्ध में बलिदान दिया है।"
यह एक जाना माना तथ्य है कि एक ऐसी व्यवस्था में, जैसी व्यवस्था में हम रह रहे हैं, एक ऐसी फासिस्ट सत्ता काबिज है जो किसी भी तरह की बौद्धिकता से आम देशवासी को दूर रखना चाहती है। उसे एन 5 राज्यों के चुनाव के समय इस घटना ने एक बड़ा अवसर दे दिया है। पूंजीवाद मात्र एक शासन की व्यवस्था नहीं है, वह एक जीवन शैली भी है और वह पैदा होने के साथ ही मनुष्य को अपने साँचे में ढालना शुरू कर देती है। यही कारण है कि उससे घृणा करने वाले ही उसे जीवन रस भी देते रहते हैं। इसे हथियार से नहीं जन-आंदोलनों से ही बदला जा सकता है।
माओवादियों को सोचना होगा कि उनकी इन सभी गतिविधियों से आखिर किसकी मदद होती है? आज इस देश के अमन पसंद लोगों के सामने सबसे बड़ी समस्या एक ऐसी सत्ता से छुटकारे पाने की है, जिसने इस देश की सदियों पुरानी सहिष्णुता और भाईचारे को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है| जो, खुले आम, आम जनता के खिलाफ पूंजीपतियों के पक्ष में तनकर खड़ी है और जिसने अपना एकमात्र कार्य केवल किसी भी प्रकार से विरोधियों को समाप्त करके देश में फासीवाद को स्थापित करना घोषित करके रखा है| उस समय माओवादियों के ये आक्रमण अंतत: उसी सत्ता की मदद करने वाले हैं जिससे छुटकारा पाने की जद्दोजहद में इस देश के शांतिप्रेमी लोग लगे हैं|
-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल
बात दूकानों में लगे बोर्ड से शुरू हुई थी इसलिए वहीं ख़त्म की जाए। ‘एक मात्र दूकान’ होने का दावा उनका थोथा दावा होता है क्योंकि वैसी दूकानें और भी होती हैं। ऐसा लिखने के पीछे आशय यह होता है कि ग्राहक इधर-उधर न देखे, सीधे उनकी दूकान में घुस जाए और अपनी जेब ढीली कर दे।
पूरे देश में भ्रमण के दौरान मैंने दूकानों में लगे विज्ञापन बोर्डों पर अक्सर यह लिखा पाया, ‘...मिलने का एकमात्र स्थान।’
यद्यपि वह सामान आसपास की अनेक दूकानों में उपलब्ध रहता है लेकिन हर किसी का दावा होता है कि कथित सामान का एक मात्र विक्रेता वही है।
दावा करना हमारी आदत में शामिल है। जो भी हम कहते हैं वो दावे के साथ कहते हैं। दावा करने का अर्थ है, अपनी बात की सत्यता को स्थापित करना और अपनी बात पर टिके रहना।
बच्चे के जन्म से दावा करना आरम्भ होता है। बच्चे के पिता का दावा होता है कि बच्चा ‘उसका’ है जबकि असलियत केवल बच्चे की मां जानती है। बच्चे को देखकर अनुमान लगाया जाता है कि वह किस पर गया है? यदि मां सामने होगी तो वह मां पर गया होता है और यदि बाप सामने होता है तो वह बाप पर गया, ऐसा दावा किया जाता है। जब दोनों सामने हों तो चतुर लोग चुप्पी साध लेते हैं कि कौन झंझट में पड़े।
इसके बाद बच्चा बड़ा होता है। यदि शांत स्वभाव का है तो दोनों खुद को ‘क्रेडिट’ देते हैं और अगर उद्दंड होता है तो मां पिता को श्रेय देती है वहीँ पर पिता मां को। यह सिलसिला बच्चे के गुण-अवगुण के आधार पर निरंतर चलता रहता है। दोनों एक-दूसरे पर मजबूती से अपने दावे प्रस्तुत करते हैं और बहस चलती रहती है।
यह दावों का खेल पति-पत्नी के बीच भी चलते रहता है। पत्नी का दावा रहता है कि पूरे परिवार का भार वह उठा रही है जबकि पति को यह ग़लतफ़हमी रहती है कि भार उसके मत्थे पर है। सही बात तो यह है कि दोनों मिलकर इस भार को उठाते हैं लेकिन जब दोनों के बीच किसी वज़ह से बहस छिड़ जाती है तो दोनों एक-दूसरे को नाचीज़ सिद्ध करने में आमादा हो जाते हैं। पत्नी का दावा होता है कि दिन भर घर में वह रहती है, बच्चों की देखरेख करती है, तीन समय का भोजन तैयार करती है लेकिन पति क्या करता है? उसे बच्चों से कोई मतलब नहीं, उसे किचन से कोई लेना-देना नहीं, उसे घर से कोई सरोकार नहीं। गौर से देखा जाए तो पत्नी की दावों में दम है और पति इन दावों के सामने बेदम नजऱ आएगा।
इसी प्रकार की स्थिति राजनीतिक दलों में भी होती है। हर दल इस बात का दावा करता है कि वही देश को रास्ते में लाने में सक्षम है जबकि उनके सत्ता पर आसीन होते ही असलियत सामने आने लगती है। यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है कि इन दलों के नेताओं से खुद अपना घर नहीं संभलता जबकि ये इतने बड़े देश को सँभालने का दावा करते हैं। इन सबकी नजऱ में दूसरा अयोग्य है लेकिन अपनी अयोग्यता इन्हें नजऱ नहीं आती।
खैर, बात दूकानों में लगे बोर्ड से शुरू हुई थी इसलिए वहीं ख़त्म की जाए। ‘एक मात्र दूकान’ होने का दावा उनका थोथा दावा होता है क्योंकि वैसी दूकानें और भी होती हैं। ऐसा लिखने के पीछे आशय यह होता है कि ग्राहक इधर-उधर न देखे, सीधे उनकी दूकान में घुस जाए और अपनी जेब ढीली कर दे। बिल्कुल उसी प्रकार, जिस प्रकार से घर में पति आत्मसमर्पण करते हैं, मतदाता अपना वोट देकर मूर्ख बनते हैं और ग्राहक कथित दूकानदार से सामान खरीदने के बाद अपना सिर धुनते हैं।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
छत्तीसगढ़ के टेकलगुड़ा के जंगलों में 22 जवान मारे गए और दर्जनों घायल हुए। माना जा रहा है कि इस मुठभेड़ में लगभग 20 नक्सली भी मारे गए। यह नक्सलवादी आंदोलन बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से 1967 में शुरु हुआ था। इसके आदि प्रवर्तक चारु मजूमदार, कानू सान्याल और कन्हाई चटर्जी जैसे नौजवान थे। ये कम्युनिस्ट थे लेकिन माओवाद को इन्होंने अपना धर्म बना लिया था। मार्क्स के ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ के आखिरी पेराग्राफ इनका वेदवाक्य बन गया है।ये सशस्त्र क्रांति के द्वारा सत्ता-पलट में विश्वास करते हैं। इसीलिए पहले बंगाल, फिर आंध्र व ओडिशा और फिर झारखंड और मप्र के जंगलों में छिपकर ये हमले बोलते रहे हैं और कुछ जिलों में ये अपनी समानांतर सरकार चलाते हैं। इस समय छत्तीसगढ़ के 14 जिलों में और देश के लगभग 50 अन्य जिलों में इनका दबदबा है। ये वहां छापामारों को हथियार और प्रशिक्षण देते हैं और लोगों से पैसा भी उगाहते रहते हैं।
ये नक्सलवादी छापामार सरकारी भवनों, बसों और नागरिकों पर सीधे हमले भी बोलते रहते हैं। जंगलों में रहने वाले आदिवासियों को भडक़ा कर ये उनकी सहानुभूति अर्जित कर लेते हैं और उन्हें सब्जबाग दिखा कर अपने गिरोहों में शामिल कर लेते हैं।
ये गिरोह इन जंगलों में कोई भी निर्माण-कार्य नहीं चलने देते हैं और आतंकवादियों की तरह हमले बोलते रहते हैं। पहले तो बंगाली, तेलुगु और ओडिय़ा नक्सली बस्तर में डेरा जमाकर खून की होलियां खेलते थे लेकिन अब स्थानीय आदिवासी जैसे हिडमा और सुजाता जैसे लोगों ने उनकी कमान संभाल ली है।केंद्रीय पुलिस बल आदि की दिक्कत यह है कि एक तो उनको पर्याप्त जासूसी सूचनाएं नहीं मिलतीं और वे बीहड़ जंगलों में भटक जाते हैं। उनमें से एक जंगल का नाम ही है—अबूझमाड़। इसी भटकाव के कारण इस बार सैकड़ों पुलिसवालों को घेर कर नक्सलियों ने उन पर जानलेवा हमला बोल दिया। 2013 में इन्हीं नक्सलियों ने कई कांग्रेसी नेताओं समेत 32 लोगों को मार डाला था।
ऐसा नहीं है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने अपनी आंख मींच रखी है। 2009 में 2258 नक्सली हिंसा की वारदात हुई थी लेकिन 2020 में 665 ही हुईं। 2009 में 1005 लोग मारे गए थे जबकि 2020 में 183 लोग मारे गए। आंध्र, बंगाल, ओडिशा और तेलंगाना के जंगलों से नक्सलियों के सफाए का एक बड़ा कारण यह भी रहा है कि वहां की सरकारों ने उनके जंगलों में सडक़ें, पुल, नहरें, तालाब, स्कूल और अस्पताल आदि बनवा दिए हैं।बस्तर में इनकी काफी कमी है। पुलिस और सरकारी कर्मचारी बस्तर के अंदरुनी इलाकों में पहुंच ही नहीं पाते। केंद्र सरकार चाहे तो युद्ध-स्तर पर छत्तीसगढ़-सरकार से सहयोग करके नक्सल-समस्या को महिने-भर में जड़ से उखाड़ सकती है। यह भी जरुरी है कि अनेक समाजसेवी संस्थाओं को सरकार आदिवासी क्षेत्रों में सेवा-कार्य के लिए प्रेरित करे।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-गिरीश मालवीय
जैसा कि कहा था वही हो रहा है वैक्सीन लगवाना ऐच्छिक नही अनिवार्य ही बनाया जा रहा है। कल इंदौर कलेक्टर ने आदेश दिया है सरकारी दफ्तर में जाने वाले 45 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को अपने साथ वैक्सीनेशन का सर्टिफिकेट लाना अनिवार्य होगा। तभी उन्हें सरकारी दफ्तरों में एंट्री मिलेगी। इंदौर में सरकार कर्मचारियों को वैक्सीन लगवाना जरूरी है, अगर किसी सरकारी कर्मचारी ने वैक्सीन नहीं लगवाई तो उसे सरकारी दफ्तर में आने की अनुमति नहीं रहेगी।
बिहार सरकार ने पुलिस कर्मियों के लिए कोरोना वैक्सीन लेना लेना अनिवार्य कर दिया गया है। कोरोना को टीका नहीं लेने वाले पुलिस कर्मियों के वेतन पर रोक लगा दी जाएगी। बिहार में सरकार ने जिला शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिया है कि बिहार में सभी शिक्षकों का भी कोरोना टीकाकरण किया जाये कुछ जिलों में तो यह आदेश निकाल दिए गए हैं कि अगर किसी दुकानदार के पास भीड़ अधिक है और उसने कोरोना की वैक्सीन नहीं ली है, तो उस पर कार्रवाई की जाए इसके साथ ही दुकानदार से जुर्माना वसूला जायेगा।
छत्तीसगढ़ सरकार ने तो वैक्सीन नहीं तो पेंशन नहीं तक की मुनादी करवाना शुरू करवा दी है यह मुनादी होते ही लाताकोडो ग्राम पंचायत के अपात्र ग्रामीण भी वैक्सीन लगवाने के लिए पिकअप वाहन में बैठकर ब्लॉक मुख्यालय पहुंच गए।
सूरत शहर ने तो ओर कमाल किया है बिना वैक्सीन लिए मार्केट में प्रवेश नहीं करने का फरमान भी जारी कर दिया है।मनपा ने कहा है कि टेक्सटाइल, डायमंड यूनिट, हीरा बाजार, कॉमर्शियल शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, मॉल में कार्यरत वे सभी लोग जो 45 साल से अधिक उम्र के हाईरिस्क में आते हैं अगर उन्होंने वैक्सीन नहीं ली हो और 45 साल से कम उम्र के लोग आरटीपीसीआर या रैपिड टेस्ट की निगेटिव रिपोर्ट नहीं लेकर आए तो उन्हें प्रवेश नहीं दिया जाएगा।
सूरत में सारे नियमो को धता बताए हुए 45 साल से कम उम्र वालो को भी वैक्सीन लगाई जा रही है।
मुंबई के माल्स में तभी प्रवेश मिलेगा जब आप वैक्सीनेशिन का सर्टिफिकेट गेट पर प्रस्तुत कर पाएंगे। यानी कुछ ही दिनों में न सिर्फ एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन बल्कि हर छोटी छोटी जगहों पर वेक्सीन सर्टिफिकेट मांगा जाएगा। जो नहीं लगवाएगा उसे समाज का दुश्मन बता कर कठघरे में खड़ा कर दिया जाएगा।
मात्र एक ही महीने में लोग भी अब इस सबके लिए मेंटली प्रिपेयर हो गये है कि हां यह सही कदम है ! ऐसा ही होना चाहिए। उन्हें इसमें कोई गलती नजर नहीं आ रही है।
हम जानते हैं कि वैक्सीन लगवा चुके लोगो के पास यह वैक्सीन सर्टिफिकेट डिजिटल फॉर्म में रहता है उनके स्मार्ट फोन में सेव है। कल को इन्ही लोगो को यदि कहा जाए कि देखिए स्मार्टफोन के साथ रिस्क है कभी आप इसे लाना ही भूल जाए या इसकी बैटरी लो हो जाए तो आप क्या करेंगे ? ऐसा करते हैं कि आपकी हथेली के पीछे हम एक RFID चिप इम्प्लांट कर देते हैं जिसमें वैक्सीनेशिन के सारी जानकारी सेव रहेंगी तो लोग इसके लिए खुशी-खुशी तैयार हो जाएंगे।
यानी ये तो वही हुआ न जिसके बारे में हम जैसे कई लोग आपको साल भर से बता रहें कि यह एक तरह आईडी 2020 योजना को लागू किया जा रहा है यह घटते हुए हम देख रहे हैं तब भी हम जैसे लोग जो आपको इसके बारे में चेतावनी दे रहे थे उन्हें कांस्पिरेसी थ्योरिस्ट बोला जा रहा हैं।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
चुनावों के दौरान सत्तारुढ़ और विपक्षी दलों के बीच भयंकर कटुता का माहौल तो अक्सर हो ही जाता है लेकिन इधर पिछले कुछ वर्षों में हमारी राजनीति का स्तर काफी नीचे गिरता नजर आ रहा है। केंद्र सरकार के आयकर-विभाग ने तृणमूल कांग्रेस के नेताओं पर छापे मार दिए हैं और उनमें से कुछ को गिरफ्तार भी कर लिया है। तृणमूल के ये नेतागण शारदा घोटाले में पहले ही कुख्यात हो चुके थे। इन पर मुकदमे भी चल रहे हैं और इन्हें पार्टी-निकाला भी दे दिया गया था लेकिन चुनावों के दौरान इनको लेकर खबरें उछलवाने का उद्देश्य क्या है ? क्या यह नहीं कि अपने विरोधियों को जैस-तैसे भी बदनाम करवाकर चुनाव में हरवाना है ? यह पैंतरा सिर्फ बंगाल में ही नहीं मारा जा रहा है, कई अन्य प्रदेशों में भी इसे आजमाया गया है। अपने विरोधियों को तंग और बदनाम करने के लिए सीबीआई और आयकर विभाग को डटा दिया जाता है। इसके कई उदाहरण हमारे सामने हैं। बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे की पत्नी रुचिरा बेनर्जी और उनके दूसरे कुछ रिश्तेदारों से एक कोयला-घोटाले के बारे में पूछताछ चल रही है और चिट-फंड के मामले में दो अन्य मंत्रियों के नाम बार-बार प्रचारित किए जा रहे हैं। इन लोगों ने यदि गैर-कानूनी काम किए हैं और भ्रष्टाचार किया है तो इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई जरुर की जानी चाहिए लेकिन चुनाव के दौरान की गई सही कार्रवाई के पीछे भी दुराशय ही दिखाई पड़ता है।
इस दुराशय को पुष्ट करने के लिए विपक्षी दल अन्य कई उदाहरण भी पेश करते हैं। जैसे जब 2018 में आंध्र में चुनाव हो रहे थे, तब टीडीपी के सांसद वाय.एस. चौधरी के यहां छापे मारे गए। अगले चुनाव में चौधरी भाजपा में आ गए। कर्नाटक के प्रसिद्ध कांग्रेसी नेता शिवकुमार के यहां भी 2017 में दर्जनों छापे मारे गए। उन दिनों वे अहमद पटेल को राज्यसभा चुनाव में जिताने के लिए गुजराती विधायकों की मेहमाननवाजी कर रहे थे। पिछले दिनों जब राजस्थान की कांग्रेस संकटग्रस्त हो गई थीं, केंद्र सरकार ने कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक गहलौत के भाई और मित्रों पर छापे मार दिए थे। लगभग यही रंग-ढंग हम केरल के कम्युनिस्ट और कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ इन चुनावों में देख रहे हैं। कई तमिल नेता और उनके रिश्तेदारों को सरकारी एजेंसिया तंग कर रही हैं। द्रमुक पार्टी ने भाजपा पर खुलकर आरोप भी लगाया है कि वह अपने गठबंधन को मदद करने के लिए यह सब हथकंडे अपना रही है। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान मप्र के कांग्रेसी मुख्यमंत्री कमलनाथ के रिश्तेदारों को भी इसी तरह तंग किया गया था। 2018 में प्रादेशिक चुनावों के पहले कांग्रेसी नेता भूपेश बघेल (आजकल मुख्यमंत्री) को भी एक मामले में फंसाने की कोशिश हुई थी। इस तरह के आरोप अन्य प्रदेशों के कई विरोधी नेताओं ने भी लगाए हैं। चुनाव के दौरान की गई ऐसी कार्रवाइयों से आम जनता पर क्या अच्छा असर पड़ता है ? शायद नहीं। गलत मौके पर की गई सही कार्रवाई का असर भी उल्टा ही हो जाता है। (नया इंडिया की अनुमति से)
-रमेश अनुपम
मृणालिनी देवी सब कुछ भूलकर यहां तक कि अपनी बीमारी को भी भूलाकर जिस तरह से रूखमणी के बारे में गुरुदेव को बताती जा रही थी, गुरुदेव के सामने उसे सुनने के सिवाय और कोई दूसरा चारा नहीं था। अभी असली कहानी के बारे में गुरुदेव को जानना शेष था।
गुरुदेव मन ही मन उस कहानी का केवल अंदाजा भर लगा पा रहे थे कि न जाने इस कहानी का अंत किस दारुण विपदा से हो। किसी के अंतर्मन में झांक पाना इतने बड़े कवि के लिए भी संभव कहां था ?
और वह कथा जो मृणालिनी देवी सुनाने वाली थी उसी मूल कथा का गुरुदेव को इंतजार था, पर गुरुदेव को इसका तनिक भी आभास नहीं था कि वह मूलकथा कुछ अधिक ही महंगी सिद्ध होने वाली है।
‘फांकि’ कविता में इस घटना का चित्रण करते हुए गुरुदेव ने लिखा है :
‘आसाल कथा शेष छिलो
सेईटी किछू दामी।
कुलीर मेयेर बिए होबे ताई।
पेंचे ताबिज बाजूबंध गाडिये देअया चाई। अनेक टेने टूने ताबे पंचीश टका खरचे हबे तराई।’
(असली कहानी समाप्त हुई, जो गुरुदेव के लिए काफी महंगी साबित हुई। कुली की बेटी का ब्याह होने वाला है, इसलिए उसके लिए बाहों में पहने जाने वाले आभूषण बाउटी, ताबीज तथा बाजूबंद बनवाने के लिए रूखमणी को पच्चीस रुपए देना होगा)

रूखमणी की बेटी का ब्याह होने वाला है पर रूखमणी के पास इतने रुपए नहीं हैं कि वह अपनी प्यारी सी बेटी के लिए आभूषण बनवा सके।
रेल्वे स्टेशन पर झाड़ू पोंछा करने वाली तथा जिसका पति रेल्वे में कुली का काम करता हो, वह अपनी बेटी को उसकी शादी में भला क्या दे सकती थी। जैसे तैसे शादी हो जाए यही उनके लिए बहुत बड़ी बात थी।
पर बेचारे गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर भी करें तो क्या करें। उनकी मुसीबत भी कोई कम नहीं थी।
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर चिकित्सा के लिए पेंड्रा रोड जा रहे थे, जहां उन्हें कब तक रहना पड़ेगा और इसमें कितने रुपए खर्च होंगे इसका कोई अनुमान ही नहीं था। ऐसी विपदा के समय आदमी ठोक बजा कर ही अपनी गांठ से रुपए निकालता है।
गुरुदेव यह भी जानते थे कि पेंड्रा रोड एक अपरिचित जगह है, जहां मुसीबत पडऩे पर कोई उसकी सहायता करने वाला नहीं मिलेगा। सन 1902 में पच्चीस रुपए कोई मामूली रकम भी नहीं थी।
इतनी बड़ी राशि वह भी परदेश में और वह भी जब ईलाज करवाने के लिए टी.बी. सेनेटोरियम जा रहे हों, गुरुदेव ने देना उचित नहीं समझा।
गुरुदेव मृणालिनी देवी के कोमल हृदय और उनकी करुणा से भली-भांति परिचित थे। वे जानते थे कि उन्हें हमेशा किसी की मदद करने में अपार सुख और संतोष मिलता है। इसलिए गुरुदेव उनकी भावनाओं का हमेशा ख्याल रखते थे।
पर बिलासपुर स्टेशन में जो कुछ घटित हो रहा था, उसे वे उचित नहीं मान पा रहे थे। मन ही मन वे रूखमणी देवी पर झुंझला भी रहे थे और इस विपदा से किस तरह से बाहर निकला जाए इसका जुगाड़ भी लगा रहे थे।
वे किसी भी कीमत में रेल्वे स्टेशन पर झाड़ू पोंछा करने वाली को पच्चीस रुपए जैसी बड़ी रकम नहीं देना चाहते थे। गुरुदेव यह भी सोच रहे थे कि रूखमणी भोली भाली मृणालिनी को अपनी बातों में फंसा कर उसे लूट रही है।
गुरुदेव सोच रहे थे कि ऐसे ही वह रुपए लुटाता रहा तो क्या होगा ?
गुरुदेव ने इससे बचने के लिए मृणालिनी देवी से झूठ बोला कि उसके पास सौ-सौ रुपए के नोट हैं, खुदरा राशि नहीं है।
इस प्रसंग के विषय में गुरुदेव
‘फांकि’ कविता में लिखते हैं :
‘जात्री घरेर करे झाड़मोंछा। पंचिस टका दिताई होबे ताके। एमन होले देउले होतो कोय दिन बाकी थाके।
अच्छा-अच्छा होबे-होबे।
आमी देखछी मोट।
एक सौ टकार आछे एकटा नोट।
(जो यात्री प्रतीक्षालय में झाड़ू पोंछा कर रही है, उसे अगर पच्चीस रुपए देना होगा तो उसके पास रखी जमा पूंजी ऐसे कितने दिन चलेगा।
अच्छा-अच्छा देखता हूं पर अरे मेरे पास तो सौ रुपए का नोट भर है, चिल्हर नहीं है)
पर मृणालिनी देवी तो मृणालिनी देवी थी, गुरुदेव के इस झांसे में भला कैसे आ जाती। उन्होंने गुरुदेव से कहा स्टेशन में कहीं से भी इस सौ रुपए को तुड़वाओ और रूखमणी को पच्चीस रुपए दो।
गुरुदेव अब करते तो क्या करते ?उनका शतरंज का दांव ही उल्टा पड़ गया था। गुरुदेव समझ गए थे कि अब मृणालिनी देवी को इधर उधर की बातों में उलझाए रखना और शतरंज की बिसात पर उन्हें बहलाए रखना कठिन है।
वह तो जैसे रूखमणी की बेटी के आभूषण बनवाने के लिए पच्चीस रुपए देने की जिद पर ही अड़ गई थी। गुरुदेव अब भला करते तो क्या करते ?
शेष अगले रविवार...
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
मैंने चार-पांच दिन पहले लिखा था कि म्यांमार (बर्मा) में चल रहे नर-संहार पर भारत चुप क्यों है ? उसका 56 इंच का सीना कहां गया लेकिन अब मुझे संतोष है कि भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र संघ और दिल्ली, दोनों स्थानों से म्यांमार में चल रहे फौजी रक्तपात पर अपना मुंह खोलना शुरु कर दिया है। 56 इंच का सीना अभी न तो भारत ने दिखाया है और न ही भिड़ाया है। अभी तो उसने सिर्फ सीने की कमीज के बटनों पर उंगलियां छुआई भर हैं।
इसमें शक नहीं कि म्यांमार में अभी जो कुछ हो रहा है, वह उसका आतंरिक मामला है। भारत को उससे कोई ऐसा सीधा नुकसान नहीं हो रहा है कि उससे बचने के लिए भारत अपना खांडा खडक़ाए लेकिन सैकड़ों निहत्थे और निर्दोष लोगों का मारा जाना न केवल लोकतंत्र की हत्या है बल्कि मानव-अधिकारों का भी हनन है। म्यांमार में फिलहाल ऐसी स्थिति नहीं बनी है, जैसी कि गोआ और पूर्वी पाकिस्तान में बन गई थी। लेकिन दो माह तक भारत की चुप्पी आश्चर्यजनक थी।
उसके कुछ कारण जरुर रहे हैं। जैसे बर्मी फौज के खिलाफ बोल कर भारत सरकार उसे पूरी तरह से चीन की गोद में धकेलना नहीं चाहती होगी। बर्मी फौज के खिलाफ बोलकर राजीव गांधी ने 1988 में जिस आपसी कटुता का सामना किया था, उसके कारण भी भारत सरकार की झिझक बनी हुई थी। बर्मी फौज ने इधर पूर्वांचल के प्रादेशिक बागियों को काबू करने में हमारी सक्रिय सहायता भी की थी। इसके अलावा बर्मी फौज भारत को बर्मा के जरिए थाईलैंड, कंबोडिया आदि देश के साथ थल-मार्ग से जोडऩे में भी मदद कर रही है।
अडानी समूह जैसी कई भारतीय कंपनियां बर्मा में बंदरगाह जैसे विभिन्न निर्माण-कार्यों में लगी हुई हैं। यदि भारत सरकार फौज का सीधा विरोध करती तो ये सब काम भी ठप्प हो सकते थे। लेकिन इस मौके पर चुप रहने का मतलब यही लगाया जा रहा था कि भारत बर्मी फौज के साथ है। यह ठीक है कि फौज को बर्मा में जैसा विरोध आजकल देखना पड़ रहा है, वैसा उग्र विरोध उसने पहले कभी नहीं देखा। 1962 से चला आ रहा फौजी वर्चस्व अभी जड़-मूल से हिलता हुआ दिखाई पड़ रहा है।
बर्मी फौज को अक्सर बौद्ध संघ का समर्थन मिलता रहा है, जैसा कि पाकिस्तानी फौज को कट्टर इस्लामी तत्वों का मिलता रहता है लेकिन इस बार बर्मी बौद्ध संघ भी तटस्थ हो गया है। अमेरिकी और यूरोपीय प्रतिबंधों के कारण म्यांमार की आर्थिक स्थिति बदतर होती चली जाएगी। ऐसी स्थिति में भारत चाहे तो बर्मी फौज को किसी शांतिपूर्ण समाधान के लिए मना सकता है।
दूसरी तरफ बर्मी जनता की लोकतांत्रिक भावनाओं के प्रति पूर्ण सम्मान दिखाते हुए भारत को चाहिए कि फौज द्वारा पीडि़तों की वह खुलकर सहायता करे। बर्मी शरणार्थियों को वापस भगाने का अपना निर्णय रद्द करना केंद्र सरकार का सराहनीय कार्य है। यदि भारत सरकार अपनी जुबान हिलाने के साथ-साथ कुछ कूटनीतिक मुस्तैदी भी दिखाए तो म्यांमारी संकट का समाधान सामने आ सकता है।
(लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)(नया इंडिया की अनुमति से)
-ललित मौर्य
जीनोम सीक्वेंसिंग से पता चला है कि कोरोनोवायरस के नए वेरिएंट की उपस्थिति के चलते संक्रमण के मामले में वृद्धि हो सकती है
सार्स-कोव-2 वायरस जो कोविड-19 महामारी के लिए जिम्मेवार है। उसके हजारों नमूनों की जीनोम सीक्वेंसिंग से पता चला है कि कोरोनोवायरस के नए वेरिएंट की उपस्थिति के चलते संक्रमण के मामले में वृद्धि हो सकती है। यह जानकारी यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया द्वारा किए एक नए शोध में सामने आई है जोकि जर्नल साइंटिफिक रिपोर्टस में प्रकाशित हुआ है।
यह जानकारी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल ही में भारतीय सार्स कोव-2 जीनोमिक्स कंसोर्टियम (आईएनएसएसीओजी) द्वारा भारत में कोविड-19 के नमूनों की जीनोम सीक्वेंसिंग से पता चला था कि भारत में कोरोना वायरस के 771 चिंताजनक और एक नए तरह का वैरिएंट भी मौजूद है। इस जीनोम सीक्वेंसिंग में ब्रिटेन के वायरस बी.1.1.7 के 736 पॉजिटिव नमूने, दक्षिण अफ्रीकी वायरस लिनिएज (बी.1.351) के 34 पॉजिटिव नमूने और ब्राजील लिनिएज (पी.1) वायरस का एक नया मामला सामने आया था।
गौरतलब है कि पिछले कुछ समय में भारत में कोरोना के मामलों में भी तेजी से वृद्धि हो रही है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी ही है कि क्या इन नए वैरिएंट का भारत में मिलना और मामलों का बढऩा बस एक संयोग है या इनके पीछे इन नए वैरिएंट का हाथ है। जिसका जवाब शायद इस नए शोध से मिल सकता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में प्रोफेसर और इस शोध से जुड़े बार्ट वीमर के अनुसार जैसे ही वैरिएंट उभरता है, इसका मतलब है कि आप नए प्रकोप का सामना करने जा रहे हैं। जीनोमिक्स के साथ क्लासिकल महामारी विज्ञान का संगम एक उपकरण प्रदान करता है जिसका उपयोग महामारी के बारे में भविष्यवाणी करने के लिए किया जा सकता है। फिर चाहे वो कोरोनावायरस हो या इन्फ्लूएंजा या कुछ नए रोगजनक हो।
हालांकि इसमें सिर्फ 15 जीन हैं इसके बावजूद सार्स-कोव-2 वायरस लगातार म्युटेट हो रहा है। हालांकि इन परिवर्तनों में बहुत कम ही अंतर होता है। लेकिन इससे कभी-कभी वायरस बहुत ज्यादा और कभी बहुत कम भी फैल सकता है।
क्या कुछ निकलकर आया अध्ययन में सामने
इस शोध में शोधकर्ताओं ने शुरुवात में सार्स-कोव-2 के 150 उपभेदों के जीनोम का विश्लेषण किया था, जो ज्यादातर 1 मार्च, 2020 से पहले एशिया में फैले थे। साथ ही उन्होंने इनकी एपिडेमियोलॉजी और फैलने का भी विश्लेषण किया था। उन्होंने रोगजनक जीनोम की पहचान के लिए इससे जुड़ी सभी जानकारी को एक मीट्रिक जेएनआई में डालकर विश्लेषित किया था। जिससे पता चला है कि जैसे ही इनमें आनुवांशिक भिन्नता आई थी उसके तुरंत बाद मामले में भी तेजी से वृद्धि हुई थी। उदाहरण के लिए फरवरी के अंत में दक्षिण कोरिया में और सिंगापुर में, हालांकि वायरस में आई भिन्नता छोटे प्रकोप से जुड़ी थी जिसे स्वास्थ्य अधिकारी जल्दी से नियंत्रण में लाने में सक्षम थे।
शोधकर्तओं ने फरवरी से अप्रैल 2020 के बीच यूके से एकत्र किए वायरस के करीब 20,000 नमूनों का जीनोम सीक्वेंसिंग किया था और उन्हें मामलों से सम्बन्धी आंकड़ों के साथ जोडक़र देखा था। उन्हें पता चला कि मामों की संख्या में वृद्धि के साथ जेएनआई में परिवर्तन के स्कोर के साथ मामलों की संख्या भी बढ़ी थी।
मार्च के अंत में जब ब्रिटिश सरकार ने लॉकडाउन कर दिया था तो नए मामलों का बढऩा रुक गया था, लेकिन इसके बावजूद जेएनआई स्कोर में वृद्धि हुई थी। इससे पता चलता है कि वायरस के तेजी से विकसित होने की स्थिति में बीमारी को फैलने से रोकने के लिए लोगों को इकठ्ठा होने से रोकना, मास्क का उपयोग और सामाजिक दूरी जैसे उपाय काफी प्रभावी हैं।
साथ ही यह ‘सुपरस्प्रेडर’ की घटनाओं को समझाने में भी मदद कर सकता है। जहां सावधानी में ढील दिए जाने पर बड़ी संख्या में लोग एक ही व्यक्ति और घटना के चलते संक्रमित हो जाते हैं। वीमर को उम्मीद है कि स्वास्थ्य अधिकारी वायरस की भिन्नता को मापने और इसे स्थानीय स्तर पर फैलने से जोडऩे का दृष्टिकोण अपनाएंगे। इस तरह से नए प्रकोप के आने से बहुत पहले ही प्रारंभिक चेतावनी प्राप्त कर सकते हैं। (downtoearth.org.in)
-मनीष सिंह
अस्सी और नब्बे के दशक में नलिनी सिंह की रिपोर्टिंग, उस दौर में दूरदर्शन देखने वालों को जरूर याद होंगी। बिहार के अंदरूनी इलाकों में हिंसा, भय और मारकाट के बाद बाहुबलियों द्वारा बूथ कब्जा करने की लोमहर्षक कथाओं ने हमारे रोंगटे खड़े किए थे।
आज यह चीजें किसी और लोक, किसी और देश की बात लगती है। भारत के पहले चुनाव आयुक्त टीएन शेषन को इस पर रोक लगाने का श्रेय है। उनके प्रयासों पर बात करने के पूर्व ये बताना जरूरी है, की उन्हें पहला इलेक्शन कमिश्नर क्यों कहा। इसलिए कि उनसे पहले इस कुर्सी पर जो आये, वो चूं चूं के मुरब्बे थे।
टीएन शेषन कोई पांच साल इस पद पर रहे। जब आये थे, फर्जी वोटिंग, बूथ कैप्चरिंग और तमाम इलेक्टोरल फंदेबाजी का बोलबाला था। शेषन ने मतदाता पहचान पत्र लागू कराये।
पूरे देश मे हर वोटर को इलेक्शन कमीशन द्वारा जारी वोटर आई डी जारी किया गया। आज फोटोयुक्त पहचान पत्र के बगैर आप वोट नही दे सकते। यह नियम शेषन की देन है, जिसने फर्जी वोटिंग पर एकदम से रोक लगा दी।
दूसरी प्रक्रिया, सेंट्रल फोर्सेस की तैनाती थी। इसके पहले पोलिंग की सुरक्षा स्थानीय बल करते थे। याने पुलिस, फारेस्ट गार्ड, राज्य के सशस्त्र बल, होम गार्ड आदि, ये सारे बल स्टेट गवर्नमेंट के अधीन होते।
इलेक्शन कोड ऑफ कंडक्ट तब कोई नही जानता था। तो राज्य की सरकार में बैठे पावरफुल लोग काफी प्रभावित कर सकते थे।
कोड ऑफ कंडक्ट लागू होने के बाद , ग़ैरनिरपेक्ष अफसरों के ट्रान्सफर इलेक्शन कमीशन ने करना शुरू किया। ऑब्जर्वर नियुक्त किये, उन्हें असीमित पावर दी। और लगाई सेंट्रल फोर्सेस, भारी मात्रा में ..
हर जगह लगाने लायक फोर्स नही, तो एक स्टेटमे चुनाव दो-तीन चरण में कराने की प्रथा आयी। जिससे फोर्स को एक जगह चुनाव निपटा कर दूसरी जगह रवाना कर दिया जाता। कम जगह पोलिंग होने से उपलब्ध फोर्स से काम बन जाता। अब हर जगह पोलिंग के वक्त फोर्स की भारी तैनाती होती है। ऐसे खतरनाक हथियारों के साथ कि किसी मामूली गुंडे की हिम्मत न हो, पोलिंग बूथ की ओर आंख उठाकर देखने की..
बूथ कैप्चरिंग बंद हो गई
ईवीएम एक फर्जी मशीन है, अपारदर्शी है, और इसके जस्टिफिकेशन के लिए दिए जाने वाले तमाम तर्कों में एक यह भी है कि फर्जी वोटिंग और बूथ कैप्चरिंग रूक गई है।
यह बकवास, और निरर्थक तर्क है। जिसे बूथ लूटकर 1000 मतपत्र पर अपना ठप्पा लगाकर, मोडक़र डब्बे में डालने की हिम्मत है, उसमे 1000 बार बटन दबाने की भी हिम्मत है।
दोनों ही प्रोसेस में डेढ़ दो धंटे लगेंगे। मतपेटी में स्याही डालकर उसे खराब करने की जगह मशीन को हथोड़े से कूटपीस दिया जा सकता है। तो फर्क मतपत्र से मशीन के आने से नही पड़ा।
फर्क पड़ा है सिक्योरिटी फोर्सेज के डिप्लॉयमेंट से। जिन लोकल बॉडी इलेक्शन में आज भी ऐसी घटनाएं होती है, उन जगहों पर न केंद्रीय चुनाव आयोग का दखल होता है, न सेंट्रल फोर्सेज का। इस फर्क को नकार कर कोई कहे कि मशीनों ने बूथ कैप्चरिंग रोक दी, तो मान लें कि आपके सामने एक महामूर्ख बैठकर बकवास कर रहा है।
या मशीन के बने रहने में उसका कोई वेस्टेड इंटरेस्ट है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पाकिस्तान ने गजब की पलटी खाई है। यह किसी शीर्षासन से कम नहीं है। उसके मंत्रिमंडल की आर्थिक सहयोग समन्वय समिति ने परसों घोषणा की कि वह भारत से 5 लाख टन शक्कर और कपास खरीदेगा लेकिन 24 घंटे के अंदर ही मंत्रिमंडल की बैठक हुई और उसने इस घोषणा को रद्द कर दिया। यहां पहला सवाल यही है कि उस समिति ने यह फैसला कैसे किया? उसके सदस्य मंत्री लोग तो हैं ही, बड़े अफसर भी हैं। क्या वे प्रधानमंत्री से सलाह किए बिना भारत-संबंधी कोई फैसला अपने मनमाने ढंग से कर सकते हैं ? बिल्कुल नहीं। उन्होंने प्रधानमंत्री इमरान खान की इजाजत जरुर ली होगी। लेकिन जैसे ही परसों दोपहर उन्होंने यह घोषणा की, पाकिस्तान के विरोधी दलों ने इमरान सरकार पर हमला बोलना शुरू कर दिया। उन्हें कश्मीरद्रोही कहा जाने लगा।
कट्टरपंथियों ने इस फैसले के विरोध में प्रदर्शनों की धमकी भी दे डाली। इमरान इतने मजबूत आदमी हैं कि वे इन धमकियों की भी परवाह नहीं करते, क्योंकि उन्हें अपने कपड़ा-उद्योग और आम आदमियों की तकलीफों को दूर करना था। कपास के अभाव में पाकिस्तान का कपड़ा उद्योग ठप्प होता जा रहा है, लाखों मजदूर बेरोजगार हो गए हैं और शक्कर की मंहगाई ने पाकिस्तान की जनता के मजे फीके कर दिए हैं। ये दोनों चीजें अन्य देशों में भी उपलब्ध हैं लेकिन भारत के दाम लगभग 25 प्रतिशत कम हैं और परिवहन-खर्च भी नहीं के बराबर है। इसके बावजूद इमरान को इसलिए दबना पड़ रहा है कि फौज ने कश्मीर को लेकर सरकार का गला दबा दिया होगा। क्योंकि जब तक कश्मीर का मसला जिंदा है, फौज का दबदबा कायम रहेगा।
इमरान, भला फौज की अनदेखी कैसे कर सकते हैं ? इसीलिए मानव अधिकार मंत्री शीरीन मज़ारी ने अपने वित्तमंत्री हम्माद अजहर की घोषणा को रद्द करते हुए कहा है कि जब तक भारत सरकार कश्मीर में धारा 370 और 35 ए को फिर से लागू नहीं करेगी, आपसी व्यापार बंद रहेगा। आपसी व्यापार 9 अगस्त 2019 से इसलिए पाकिस्तान ने बंद किया था कि 5 अगस्त को कश्मीर से इन धाराओं को हटा दिया गया था। इसके पहले ही भारत ने पाकिस्तानी चीज़ों के आयात पर 200 प्रतिशत का तटकर लगा दिया था। पाकिस्तान को भारत के निर्यात में 60 प्रतिशत कमी हो गई थी और भारत में पाकिस्तानी निर्यात 97 प्रतिशत घट गया था।
पिछले एक साल में कपास का निर्यात लगभग शून्य हो गया है। अब पाकिस्तान सरकार ने खुद अपने फैसले को उलट दिया। भारत सरकार को हाँ या ना कहने का मौका ही नहीं मिला। पाकिस्तान की इस घोषणा से यह सिद्ध होता है कि पाकिस्तान की जनता को तो भारत से व्यवहार करने में कोई एतराज नहीं है लेकिन फौज उसे वैसा करने दे, तब तो ! इसीलिए मैं कहता हूं कि भारत और पाकिस्तान की फौजें और सरकारें जो करना चाहें, करती रहें लेकिन दोनों मुल्कों और सारे दक्षिण और मध्य एशिया के देशों की आम जनता का एक ऐसा लोक-महासंघ खड़ा किया जाना चाहिए, जो भारत के सभी पड़ोसी-देशों का हित-संपादन कर सके और फौजी व सरकारी दबावों का मुकाबला कर सके।
(लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)(नया इंडिया की अनुमति से)
दुनिया में कीटनाशकों का संकट स्वास्थ्य, जैव विविधता और खाद्य सुरक्षा के लिये गंभीर संकट बन रहा है. भारत को इसे लेकर अपने घिसे-पिटे कानून को बदलने की जरूरत है.
डॉयचे वैले पर हृदयेश जोशी की रिपोर्ट-
फसलों में रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल न केवल आपके स्वास्थ्य के लिये नुकसानदेह है बल्कि वह खेतों में काम कर रहे किसानों और मजदूरों के लिये भी जानलेवा होता है. इसके अलावा कीटनाशकों से भूजल और हवा प्रदूषित होती है और मिट्टी में भी लम्बे समय तक इसका असर रहता है. अब नेचर जियोसाइंस में छपा शोध बताता है कि पूरी दुनिया में कृषि भूमि के 64 फीसदी हिस्से पर कीटनाशकों का कुप्रभाव पड़ रहा है जिससे मानव स्वास्थ्य के साथ जैव विविधता को खतरा बढ़ेगा. जानकार बताते हैं कि यह हालात भारत जैसे देश के लिये खासतौर पर चिन्ता का विषय है जहां कीटनाशकों को नियंत्रित करने के लिये कोई प्रभावी कानून नहीं है.
क्या कहता है नया शोध?
इस रिसर्च में शोधकर्ताओं ने 168 देशों में नब्बे से अधिक कीटनाशकों के प्रभाव का अध्ययन किया और पाया कि दुनिया की करीब दो तिहाई कृषि भूमि (245 लाख वर्ग किलोमीटर) पर कीटनाशकों के कुप्रभाव दिख रहे हैं. इसमें से लगभग 30 प्रतिशत भूमि पर यह खतरे कहीं अधिक गहरे हैं. शोध में रूस और यूक्रेन जैसे देशों में कीटनाशकों के प्रभाव को लेकर चेतावनी दी गई है तो भारत और चीन भी उन देशों में हैं जहां जहरीले छिड़काव का खतरा सर्वाधिक है.
कीटनाशकों हवा और मिट्टी को प्रदूषित करने के साथ नदी, पोखर और तालाबों जैसे जलस्रोतों और भूजल (ग्राउंड वॉटर) को भी प्रदूषित कर रहे हैं. रासायनिक कीटनाशक फसलों के ज़रूरी मित्र कीड़ों को मार कर उपज को हानि पहुंचाते हैं और तितलियों, पतंगों और मक्खियों को मारकर परागण की संभावना घटा देते हैं जिससे जैव विविधता को हानि होती है. यह गंभीर चिंता का विषय है क्योंकि दुनिया की आबादी साल 2030 तक 850 करोड़ को पार कर जायेगी और कीटनाशकों के असर खाद्य सुरक्षा के लिये गंभीर संकट पैदा कर सकते हैं.
भारत में अब भी घिसा-पिटा कानून
भारत में जनसंख्या दबाव और घटती कृषि योग्य भूमि के कारण कीटनाशकों का इस्तेमाल नियंत्रित किये जाने की ज़रूरत है लेकिन समस्या ये है कि यहां इसके लिये कोई प्रभावी नियम नहीं हैं क्योंकि देश में अब तक पांच दशक पुराना "इन्सेक्टिसाइड एक्ट – 1968” चल रहा है. इसमें किसी कीटनाशक के पंजीकरण से लेकर अप्रूवल, मार्केटिंग और इस्तेमाल के सख्त नियम नहीं हैं.
भारत अमेरिका, जापान और चीन के बाद दुनिया में कीटनाशकों का चौथा सबसे बड़ा उत्पादक है. साल 2014-15 और 2018-19 के बीच भारत में कीटनाशकों का उत्पादन 30,000 टन बढ़ गया. भारत में कुछ बेहद हानिकारक कीटनाशकों (जिन्हें क्लास-1 पेस्टिसाइड की श्रेणी में रखा गया है) के कृषि में इस्तेमाल करने की भी अनुमति है जिन्हें दूसरे कई देशों में प्रयोग करने की इजाजत नहीं हैं.
वर्तमान बिल की जगह एक नया बिल लाने की कोशिश यूपीए-1 सरकार के वक्त 2008 में की गई लेकिन तब बिल संसद में पेश नहीं किया जा सका. उसके बाद साल 2017 में नरेंद्र मोदी सरकार ने बिल संसद में पेश किया लेकिन पास नहीं हो सका. पिछले साल सरकार ने फिर से "पेस्टिसाइड मैनेजमेंट बिल -2020” संसद में पेश किया. दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वायरेंमेंट (सीएसई) में फूड सेफ्टी और टॉक्सिन के प्रोग्राम हेड अमित खुराना कहते हैं, "प्रस्तावित बिल को आदर्श क़ानून तो नहीं कहा जा सकता लेकिन कम से कम आज के हालात से निबटने के लिये यह 1968 के क़ानून की तुलना में बेहतर है. पिछले चार साल से नया क़ानून लाने की कोशिश ही हो रही है और वह पास नहीं हो रहा जबकि कीटनाशकों के कुप्रभाव हम सबके लिये गहरी चिंता के विषय बने हुये हैं.”
जैविक खेती की ओर
साल 2018-19 में देश में 72,000 टन से अधिक रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल हुआ. देश के 8 राज्य कुल कीटनाशकों में का 70 प्रतिशत इस्तेमाल करते हैं. महाराष्ट्र, यूपी और पंजाब कीटनाशकों को इस्तेमाल करने वाली लिस्ट में सबसे ऊपर हैं. करीब 57 प्रतिशत कीटनाशक सिर्फ दो फसलों – कपास और धान – में इस्तेमाल होते हैं. इससे पता चलता है कि कीटनाशकों का उपयोग अवैज्ञानिक और अनियंत्रित तरीके से हो रहा है.
भारत में 1968 का जो कानून अभी लागू है उसके तहत उल्लंघन करने पर केवल 2000 रुपये का जुर्माना और 3 साल तक की सज़ा का प्रावधान है जबकि प्रस्तावित कानून में 5 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है और अपराधी को 5 साल की कैद हो सकती है. जानकार कहते हैं कि नया कानून बनने के बाद भी सरकार का काम कीटनाशकों को अनुमित देने भर का नहीं होना चाहिये बल्कि वह ऐसी कृषि नीति अपनाये जिससे कीटनाशकों का खेती में इस्तेमाल कम से कम हो.
जैविक खेती यानी ऑर्गेनिक फार्मिंग इस दिशा में एक प्रभावी और टिकाऊ हल है लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि इसके लिये सरकार को अधिक सक्रिय होना होगा. भारत में अब तक जैविक खेती चुनिंदा किसान आंदोलनों और सिविल सोसायटी के भरोसे आगे बढ़ी है. हालांकि केंद्र सरकार ने 2015-16 में परम्परागत कृषि विकास योजना शुरू की लेकिन पूर्ण रूप से ऑर्गेनिक फार्मिंग करने वाले सूबे के रूप में एक राज्य सिक्किम का नाम ही गिनाया जाता है.
वैसे हिमाचल प्रदेश 2022 तक और आंध्र प्रदेश साल 2027 तक पूरी तरह नेचुरल खेती वाले राज्य बनने का दावा कर रहे हैं लेकिन अभी पूरे देश में कुल कृषि भूमि के महज़ 2 प्रतिशत पर ही जैविक खेती हो रही है. जानकार कहते हैं कि किसानों को अपनी ज़मीन को जैविक खेती के लिये तैयार करने (कन्वर्जन) में मदद चाहिये और सस्ते दामों में बायो प्रोडक्ट और जैविक खाद उपलब्ध करानी होगी. उन्हें उत्पादों के सर्टिफिकेशन और उचित दामों सुनिश्चित करने वाले बाज़ार से जोड़ना ज़रूरी है.
अमित खुराना के मुताबिक, "भारत सरकार को परम्परागत कृषि विकास योजना जैसे कार्यक्रम से आगे बढ़कर अधिक महत्वाकांक्षी होना होगा. इस कार्यक्रम का बजट कुछ सौ करोड़ का ही है जो कि रासायनिक खादों को दी जाने वाली 70,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी के आगे कुछ नहीं है. कोई हैरत की बात नहीं कि ऑर्गेनिक और नेचुरल फार्मिंग बहुत छोटे दायरे में सीमित है. इसे जन-आंदोलन बनाने के लिये एक मज़बूत नीतिगत फ्रेमवर्क और लागू करने में आने वाली अड़चनों से निपटने के लिये प्रोग्राम बनाना होगा.” (dw.com)
- तारण प्रकाश सिन्हा
इस समय हम सब कोविड-19 की दूसरी लहर का सामना कर रहे हैं। सालभर पहले जब पहली लहर आई थी तो हमने बहुत सफलतापूर्वक उसका सामना किया था, और अंततः संक्रमण को नियंत्रित भी कर लिया था। तब पूरे विश्व के साथ-साथ भारत के सामने भी अभूतपूर्व परिस्थितियां उठ खड़ी हुई थीं। देश ने पहली बार इतना लंबा लाकडाउन झेला था। लाखों लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट उठ खड़ा हुआ था। तब हम इस वायरस के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे। इससे कैसे निपटा जाए, यह भी नहीं जानते थे। डाक्टरों को न तो इसके इलाज का तरीका पता था, न वैज्ञानिकों को वायरस के स्वरूप का। इस महामारी ने हम सबको अचानक एक अंधकार में ला खड़ा किया था, जिसमें टटोल-टटोल कर ही आगे बढ़ा जा सकता था। लेकिन उस अंधकार में हम सबने तुरंत एक-दूसरे का हाथ थाम लिया, ताकि एक-दूसरों को किसी भी तरह की ठोकर से बचाया जा सके। डाक्टरों, नर्सों, पुलिस के जवानों, प्रशासन के अधिकारियों-कर्मचारियों, जनप्रतिनिधियों, समाज-सेवियों ने मिलकर मोर्चा संभाला और अंततः फतह हासिल की।
कोविड-19 ने दूसरी बार हमला किया है। यह ठीक वैसा ही है जैसे जंग जीत कर सुस्ता रहे सैनिकों पर मौके का फायदा उठाते हुए दुश्मन दुबारा हमला कर दे। पहली लहर पर मिली जीत के बाद हम सब भी सुस्ता ही रहे थे। थोड़े लापरवाह, थोड़े निश्चिंत और बहुत ज्यादा आत्मविश्वासी भी हो गए थे। निश्चित ही इसीलिए इस महामारी ने फिर सेंधमारी कर दी है। यह भी तय है कि पिछली बार की तुलना में इस बार कोविड-19 को हम ज्यादा तेजी से परास्त करने वाले हैं। अब हम इस वायरस को भी जानते हैं, इसके इलाज के बेहतर तरीके जानते हैं और वायरस को नख-दंत विहीन करने की क्षमता भी हमारे पास है। हम हमारे पास वैक्सीन के रूप में एक मजबूत सुरक्षा-कवच है।
कोविड-19 की दूसरी लहर से मुकाबला करने के लिए हम सबको कवच धारण करना ही होगा। हम सबको वैक्सीन लगवानी ही होगी। जैसी एकजुटता पिछली लहर से मुकाबले के लिए नजर आई थी, वैसी ही एकजुटता अब स्वयं की सुरक्षा के लिए दिखानी होगी। मानवता की रक्षा के लिए इस समय सबसे बड़ा धर्म यही है कि हम स्वयं को बचाएं और दूसरों को भी प्रेरित करें। पहली लहर के दौरान हम लोगों के सामने वायरस के साथ-साथ तरह-तरह की अफवाहों ने भी चुनौतियां खड़ी की थीं, इस दूसरी लहर के दौरान भी वैसी ही कोशिशें की जा रहीं हैं, हालांकि अब हम सब ज्यादा अनुभवी और ज्यादा जागरुक हैं।
देश में अब तक 6 करोड़ से ज्यादा लोगों को कोरोना का टीका लग चुका है। ये आबादी छोटे-मोटे दो तीन देशों के बराबर तो हो ही जाती है। इतनी बड़ी आबादी के सफलतापूर्वक टीकाकरण के बाद अब इसके साइड इफेक्ट को लेकर किसी भी तरह की शंका की गुंजाइश नहीं रह जाती। छत्तीसगढ़ में भी जोर-शोर से टीकाकरण चल रहा है, और अब तो हमारे-आपके किसी न किसी परिचित ने भी टीका लगवा लिया है। बहुतों ने तो दूसरा डोज भी लगवा लिया है। हम लोगों को उनके अनुभवों को सुनना चाहिए, टीकाकरण के बाद उनके भीतर आए आत्मविश्वास को महसूस करना चाहिए।
कोविड की दूसरी लहर जितनी तेज है, उससे ज्यादा तेजी के साथ टीकाकरण हो रहा है। इस दूसरी जंग में यही रणनीति ही कारगर साबित हो सकती है। जितनी तेजी से टीकाकरण होगा, हम वायरस को उतनी तेजी से पीछे धकेल पाएंगे। इसके लिए जरूरी है कि जो-जो व्यक्ति टीकाकरण के लिए पात्र हैं, वे सबसे पहले स्वयं टीका लगवाएं और अपने आस-पास के लोगों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करें। दूसरे चरण के टीकाकरण में अब 45 साल से अधिक उम्र के सभी लोगों को टीके लगाए जा रहे हैं।
इस दूसरी जंग में हमें यह बात अच्छी तरह याद रखनी होगी कि आत्मविश्वास अच्छी बात होती है, लेकिन अति-आत्मविश्वास नुकासन भी पहुंचा सकता है। टीकाकरण के बाद हमें फिर से लापरवाह नहीं हो जाना है। मास्क, सैनेटाइजिंग, सोशल डिस्टेंसिंग जैसे अस्त्रों को अपने साथ बनाए रखना है। हमारे सुरक्षा-कवच में कोरोना के लिए कहीं पर भी सुराख नहीं होना चाहिए।
लगातार विफल रही नीलामी प्रक्रिया के बावजूद मोदी सरकार ने कमर्शियल कोल माइनिंग के लिये दूसरे चरण की नीलामी प्रक्रिया शुरु कर 67 खदानों को बोली पर लगाया है, जिसमें छत्तीसगढ़ की 18 खदानें शामिल हैं । हालांकि कोयला खदानों की नीलामी वर्ष 2012 से होती आयी है, लेकिन बिना अंत-उपयोग निर्धारित किए मात्र निजी मुनाफे के लिये यह दूसरी बार प्रक्रिया चलाई जायेगी । गौरतलब है कि पिछले चरण की प्रक्रिया में आधी से कम खदानें ही आवंटित हुई, और विश्लेषकों ने कम बोलीदारों की संख्या तथा गैर-प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया के चलते कम बोली दरों पर कई सवाल उठाए थे । ऐसे में पिछली प्रक्रियाओं से सीख लिये बिना ही और बिना किसी बुनियादी ज़रूरत के बगैर नई नीलामी प्रक्रिया की शुरुआत और उसमें और भी लचीले नियम सरकार की मंशा पर गम्भीर सवाल उठाता है – क्या इसकी कड़ी देश की सभी आर्थिक और प्राकृतिक सम्पदा को बेच निकलने की मोदी सरकार की नीतियों से जुड़ी है ? क्या नियमों को बेहद लचीला बनाकर और गैर-प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया के ज़रिये कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने की यह साज़िश है ? क्या यह कोरोना काल की आपदा को खनन कंपनियों के लिए अवसर में बदलने की एक और कोशिश है ? या फिर अपनी आर्थिक नीतियों की विफलताओं को छुपाकर किसी भी तरह लाभ-धन जुटाने का एक और भद्दा प्रयास है ?
क्या थे पिछ्ली प्रक्रिया के अनुभव?पिछ्ले साल जून माह में कोरोना के चरम-सीमा पर पहुंचने के बीचों-बीच व्यापक प्रचार-प्रसार से मोदी सरकार ने कमर्शियल कोल माइनिंग के लिये प्रथम चरण की नीलामी की घोषणा की थी । उस समय दावे किए थे कि खदान नीलामी आत्मनिर्भर भारत और अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने की ओर एक क्रांतिकारी कदम है । हालांकि इसके तुरंत बाद सभी ओर से इसका विरोध शुरु हो गया – विश्लेषकों ने बतलाया कि यह गलत समय है और भारत को इस पैमाने पर कोयला ज़रूरत ही नहीं है, जनांदोलनों और मीडिया ने इससे जुड़े पर्यावर्णीय तथा सामाजिक सवालों को उठाकर प्रक्रिया पर गम्भीर आरोप लगाये, 3 राज्य सरकारों ने इसका पुरज़ोर विरोध किया और इस सम्बंध में झारखण्ड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई जो केस अभी तक लम्बित है । यहां तक कि कई खनन कंपनियों ने भी कोयला की मांग-पूर्ति की स्थिति का हवाला देकर प्रक्रिया पर चिंतायें जताईं । सभी तरफ़ से विरोध के बीच केंद्र सरकार ने 6 खदानों को, यह मानते हुए कि इससे बहुत गम्भीर पर्यावर्णीय दुषप्रभाव होंगे, नीलामी सूची से बाहर भी किया । परंतु फिर भी नीलामी के लिये 38 खदानों के लिये बोलियां आमंत्रित की गयी जिनमें बहुत सी खदानें संवेदनशील इलाकों में थी और अनेकों जगह भारी जन-विरोध था।

ऐसे में जैसा कि छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने पूर्वानुमान लगाया था, यह नीलामी प्रक्रिया पूरी तरह अपने सभी कथित उद्देश्यों पर विफल रही । जिन 38 खदानों के लिये बोलियां आमंत्रित की गई, उनमें से केवल आधे यानी 19 खदानों पर ही न्यूनतम बोलीदार सामने आए जिसके कारण बाकी खदानों की प्रक्रिया को रद्द करना पड़ा । गौरतलब है कि इस बार नियमों को लचीला बनाने हेतु न्यूनतम बोलिदारों की संख्या मात्र 2 रखी गई थी जो कि पिछले नीलामी प्रक्रिया से भी कम है । वही दूसरी ओर यदि नीलामी की बोली- दरों पर नज़र डालें तो साफ है कि बाकी की 19 खदानों को कौड़ी के भाव पर बेच दिया गया । अधिकांश खदानों के लिये बोली अनुसार केवल 10-30% आय का हिस्सा ही राज्य सरकारों को दिया जायेगा जो कि पिछली नीलामी की दर तथा कोयले के वास्तविक मूल्य से बहुत कम है । स्पष्ट रूप से जब आवंटित और संचालित कोल ब्लॉक से ही देश की जरूरत का कोल उपलब्ध है उस स्थिति में इस नीलामी प्रक्रिया की कोई आवश्यकता नही थी। यह सिर्फ बहुमूल्य खनिज संसाधनो को कारपोरेट को सौपने की कोशिश है जिसका छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन पुरजोर विरोध करता है।
क्यूं विफल हुई नीलामी ?
नीलामी प्रक्रिया के विफलताओं के अनेक कारण हैं – 1) देश में इतने पैमाने पर कोयले की ज़रूरत ही नहीं है जिसका जिक्र CEA, कोल इंडिया लिमिटेड vision-2030, तथा अन्य विश्लेषकों ने किया है । गौरतलब है कि 2015 के बाद आवंटित 72 में से सिर्फ 20 खदानें ही चालू हो पाई हैं जबकि 50 से अधिक खदानें अभी तक खनन शुरु नहीं कर पाई हैं । यदि ये खदानें शुरु हुई तो लगभग 320 मिलियन टन का उत्पादन बढ़ जायेगा जो कि भारत की वर्तमान कोयला ज़रूरतों से बहुत ज़्यादा है । 2) कोयला क्षेत्र की अधिकांश कंपनियाँ या तो दिवालिया हो चुकी हैं या आर्थिक संकट से जूझ रही हैं । वहीं विदेशी कंपनियों ने भी कोरोना के समय में कोई रुचि नहीं दिखायी । ऐसे में बोलीदारों का अभाव रहा जिसके कारण केवल 4 खदानों को ही 5 से अधिक बोलियां मिली जबकि कुल 10 के लिये ही 3 से अधिक बोलियां लगाई गई । 3) नीलामी में रखी ज़्यादातर खदानों के पास पर्यावरण तथा वन स्वीकृतियाँ नहीं थी जिससे बोलीकारों को अधिक जोखिम उठाना पड़ रहा था । 4) नीलामी की विफलता का एक कारण यह भी था की सरकार ने MDO के जरिये चुनिन्दा कंपनियों के लिए पिछले दरवाज़े का रास्ता खोला जिसमें जोखिम कम और मुनाफा अधिक था | 5) कोविड के इस संकट में जब विश्व कि अर्थव्यवस्था लगभग मृतप्राय हो, कॉरपोरेट अपने लिये पॅकेज कि मांग कर रहे हैं, उस स्थिति में नीलामी के सफल होने की उम्मीद वैसे भी कम ही थी, इसी कारण झारखंड समेत कई राज्यों ने इसे स्थगित करने की पहले ही मांग की थी |
क्या है वर्तमान निलामी प्रक्रिया का असली सबब ?
निलामी से जुड़े सभी तथ्यों से यह तो स्पष्ट है कि इस प्रक्रिया का सम्बंध तथाकथित देश की या जन-समुदाय की आत्मनिर्भरता से कोई लेना-देना नहीं है । ना ही भारत की कोयला ज़रूरतों या आर्थिक हितों को ध्यान में रखा गया है । ना ही राज्यों से कोई चर्चा – सहमति ली गई है । ना ही प्रतिस्पर्धा बढ़ाकर कोयले के असली मूल्य निकालकर राज्यों को आर्थिक-हित देने का कोई भी प्रयास है – इस प्रक्रिया में तो यूं माने कि पूर्णतया प्रतिस्पर्धा खत्म ही कर दी गई है । रोलिंग यानि नित्य प्रक्रिया के चलते अब जो कंपनी जब चाहे तब न्यूनतम बोलीदार एकत्रित कर मनचाहे दामों पर खदान ले सकेगी ।
ऐसे में साफ है कि इसका उद्देश्य कुछ निजी कंपनियों को आपदा को अवसर में बदलने का एक और मौका दिया जा रहा है और सरकार देश की सारी धन-संपदा को चुनिंदा कॉरपोरेट साथियों को बेचने की नीति में एक और प्रयास कर रही है । वहीं दूसरी ओर सबसे ज़्यादा दुष्प्रभाव खदान क्षेत्रों के पर्यावरण तथा आदिवासी समुदायों के विस्थापन पर पड़ेंगे | साथ ही यहाँ की ग्राम सभाएं अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग कर लगातार खनन का विरोध करती आई हैं, और पांच्वी अनुसूची क्षेत्रों में ज़ाहिर है कि जन-विरोध को दरकिनार कर की हुई यह निलामी प्रक्रिया अपने आप में कानून और संविधान की धज्जियां उडाने समान है | अब ऐसे में देख यह है कि छत्तीसगढ़ राज्य सरकार इस पर क्या रुख उठाती है – क्या वह छत्तीसगढ़ राज्य तथा यहां के गरीब-आदिवासी समुदाय के हक में आवाज़ उठायेगी या फिर वह भी कॉरपोरेट घरानों और केंद्र सरकार के सामने अपने घुटने टेक देगी ।
आलोक शुक्ला, नंदकुमार कश्यप, प्रियांशु गुप्ता
छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन
-रितेश मिश्रा
फिऱाक़ साहेब पीने के बाद थोड़ा बहक जाते थे। एक बार हॉलैंड हॉल में फिऱाक़ साहेब को एक जिरह में बुलाया गया। चूँकि फिऱाक़ साहेब ने शराब पी थी तो उन्होंने जिरह के शुरुआत में ही उस समय के कुलपति अमर नाथ झा को उल्टा सीधा कहने लगे। सुबह जब झा साहेब को पता लगा तो उन्होंने एक आदेश निकाला कि अगर फिऱाक़ साहेब को किसी आयोजन में बुलाया जाय तो दिन में ही और दिन ढलने के बाद उनको किसी भी आयोजन का निमंत्रण न दिया जाय। न फिऱाक़ ने कभी वो आदेश माना न किसी और ने। सब को फिऱाक़ साहेब को सुनना बहुत पसंद था।
एक किस्सा और है । 1950 में एक बार अली सरदार जाफरी साहेब एक मुशायरे में शिरकत करने इलाहाबाद आये। पहले तो फिऱाक़ साहेब और जाफरी ने पी और उसके बाद जब मुशायरे में पहुंचे। अली सरदार जब बोलने लगे तो फिऱाक़ साहेब उनको पीछे से गरियाने लगे। शायद कोई गज़़ल पे मसला हो गया था। आयोजकों ने बहुत समझाया फिऱाक़ साहेब को, माने नहीं और अंत में फिऱाक़ साहेब को घर छोड़ दिया गया।
बहुत देर तक जब फिऱाक़ साहेब की आवाज़ जाफरी साहेब के कानों में नहीं आई तो उन्होंने आयोजकों से पूछा तो उन्हें बताया गया कि फिऱाक़ घर छोड़ दिया गया है। उस समय माइक्रोफोन उनके हाथ में था और उन्होंने मंच से कहा ‘हरामजादों, वो मुझे गाली दे रहा था या तेरे माँ -बाप को, उसका हक़ है मुझे गाली देना, तुम बीच में कौन होते हो। तेरे मुशायरे की ऐसी कि तैसी मुझे मेरे फिऱाक़ के पास ले चलो’
जाफरी साहेब ने मुशायरा वहीं छोड़ दिया और फिऱाक़ के घर पहुंचे। फिऱाक़ साहेब अपने लॉन में टहल रहे थे। जाफरी साहेब उनके पास पहुंचते ही उनको गले लगा लिया। दोनों रोने लगे। जाफरी साहेब बोले ‘हरामज़ादे, न हम दोनों को गाली देने देते हैं , न हंॅसने देते हैं न रोने देते हैं।’ दोनों तब तक गले मिलते रहे जब तक पड़ोसी अपने घर से बाहर नहीं निकल आये।
-जोए टिडी
साइबर सुरक्षा कंपनियाँ ऐसे रेनसमवेयर या वसूली करने वाले वायरसों के बारे में चेतावनी दे रही हैं जो पीडि़तों को शर्मिंदा करके उन्हें पैसे देने के लिए मजबूर करते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि संवेदनशील निजी जानकारी के बदले पैसे वसूलने के इस ट्रेंड से कंपनियाँ के ना सिर्फ ऑपरेशन प्रभावित हो सकते हैं, बल्कि उनकी शाख पर बट्टा भी लग सकता है।
हैकरों के एक आईटी कंपनी के निदेशक के निजी पोर्न कलेक्शन को हैक करने के बारे में टिप्पणी करने के बाद ये मुद्दा और गंभीर हो गया है।
हालांकि, हैकिंग का शिकार बनी इस अमेरिकी कंपनी ने सार्वजनिक तौर पर यह स्वीकार नहीं किया कि उसे हैक किया गया था।
हैकिंग के बारे में पिछले महीने डार्कनेट पर की गई पोस्ट में हैकरों ने आईटी निदेशक का नाम भी जारी किया। साथ ही उन्होंने उनके ऑफिस के कंप्यूटर को हैक करने का दावा किया जिसमें पोर्न फाइलें थीं।
उन्होंने कंप्यूटर की फ़ाइल लाइब्रेरी का स्क्रीनशॉट पोस्ट किया है जिसमें एक दर्जन से अधिक फोल्डर हैं जिनमें पोर्न स्टार्स और पोर्न वेबसाइटों के नाम हैं। इस बदनाम हैकर समूह ने लिखा, ‘जब वे हस्तमैथून कर रहे थे, तब हम उनके कंप्यूटर से उनके और उनकी कंपनी के ग्राहकों के बारे में कई गीगाबाइट की निजी जानकारी डाउनलोड कर रहे थे।’
विशेषज्ञों का अनुमान है कि इसका मतलब ये है कि कंपनी ने हैकरों को पैसा दे दिया है और इसके बदले वो दूसरी जानकारियाँ सार्वजनिक ना करने का वादा निभा रहे हैं।
संबंधित कंपनी ने इस संबंध में टिप्पणी करने के अनुरोध पर जवाब नहीं दिया। लेकिन यही हैकर समूह अमेरिका की एक और यूटिलिटी कंपनी पर पैसे देना का दबाव बना रहा है।
हैकरों ने कंपनी के कर्मचारियों के प्रीमियम पोर्न वेबसाइटों पर इस्तेमाल होने वाले यूजऱनेम और पासवर्ड प्रकाशित कर दिए हैं।
ये नया तरीका है
वसूली करने वाले एक और हैकर समूह ने अपनी डार्कनेट वेबसाइट पर ऐसे ही तरीक़ों के बारे में लिखा है। इस नए गैंग ने लोगों के निजी ईमेल और तस्वीरें प्रकाशित कर दी हैं और साइबर हमले का निशाना बनने वाले अमेरिकी शहर के मेयर से सीधे पैसे माँगे हैं।
वहीं एक दूसरे मामले में हैकरों ने कनाडा की एक इंश्यूरेंस कंपनी में हुए फर्जीवाड़े से जुड़े ईमेल हैक करने का दावा किया है।
साइबर सिक्यूरिटी कंपनी एमसीसॉफ्ट में थ्रेट एनेलिस्ट ब्रेट कैलो कहते हैं कि ये ट्रेंड दर्शाता है कि रैनसमवेयर हैकिंग के नए तरीके सामने आ रहे हैं।
कैलो कहते हैं, ‘ये नए हालात हैं। हैकर अब ऐसी जानकारियाँ सर्च कर रहे हैं जिनका इस्तेमाल ब्लैकमेल करने में किया जा सके। अगर उन्हें कुछ ऐसा मिलता है जो अपराध से जुड़ा या टारगेट को शर्मिंदा करने वाला हो, तो फिर वो इसके बदले बड़ी फिरौती माँगते हैं। ये घटनाएं सिर्फ डेटा चोरी के लिए किये गए साइबर हमले नहीं हैं। ये दरअसल फिरौती वसूल करने के लिए किये गए सुनियोजित हमले हैं।’
दिसंबर 2020 में कॉस्मेटिक सर्जरी चेन, ‘द हॉस्पिटल ग्रुप’ की वेबसाइट हैक करने के बाद कंपनी को मरीजों की पहले और बाद की तस्वीरें प्रकाशित करने की धमकी दी गई थी।
रेंसमवेयर भी विकसित हो रहे हैं
रेंसमवेयर कुछ दशक पहले जब सबसे पहली बार सामने आये थे, तब से अब तक बहुत बदल गए हैं।
पहले साइबर अपराधी या तो अकेले ही काम करते थे या छोटे समूह में काम करते थे।
वो पहले व्यक्तिगत इंटरनेट यूजर को ही निशाना बनाते थे। ईमेल और वेबसाइटों के जरिए जाल फेंककर वो ऐसा करते थे।
लेकिन पिछले कुछ सालों में हैकर अब बहुत जटिल, व्यवस्थित और महत्वाकांक्षी हो गए हैं।
आपराधिक गैंग हैकिंग के ज़रिए सालाना करोड़ों डॉलर कमा रहे हैं। वो अब बड़ी कंपनियों और संस्थानों को निशाना बना रहे हैं और कई बार तो वो एक ही शिकार से करोड़ों डॉलर वसूल लेते हैं।
ब्रेट कैलो कई सालों से रेंसमवेयर हमलों पर नजरें बनाए हुए हैं।
वे कहते हैं कि साल 2019 के बाद से साइबर अपराधियों की रणनीति में बदलाव आया है।
‘पहले हम देखते थे कि हैकर कंपनी का काम प्रभावित करने के लिए उसके डेटा को एनक्रिप्ट कर देते थे। लेकिन अब तो हैकर डेटा को खुद ही डाउनलोड करने लगे हैं।'
इसका मतलब ये है कि वो अब पीडि़त के डेटा को किसी और को बेचने या सार्वजनिक करने की धमकी देकर और अधिक ब्लैकमेल करते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी व्यक्ति या कंपनी को बदनाम करने की ये धमकियाँ इसलिए भी गंभीर हैं क्योंकि इनसे पीडि़त की सुरक्षा करना आसान नहीं है।
अच्छा बैकअप रखने से कंपनियाँ रेंसमवेयर हमले की वजह से काम पर पडऩे वाले प्रभाव को तो कम कर पाती हैं, लेकिन जब हैकर बदनाम करने की धमकी देकर वसूली पर उतर आएं तो पीडि़तों के हाथ में बहुत कुछ होता नहीं है।
साइबर सुरक्षा कंसल्टेंट लीजा वेंचूरा कहती हैं कि ‘कर्मचारियों को अपनी कंपनी के सर्वर पर कोई भी ऐसी सामग्री स्टोर करके नहीं रखनी चाहिए जो कंपनी की साख खऱाब कर सके। संस्थानों को इस बारे में जागरूकता फैलाने के लिए स्टाफ़ को ट्रेनिंग भी देनी चाहिए।’
‘अब रेंसमवेयर (वसूली करने वाले वायरस) के हमलों की ना सिफऱ् तादाद बढ़ गई है, बल्कि ये बहुत जटिल भी हो गए हैं। ये कंपनियों के लिए एक परेशान करने वाली बात है।’
‘हैकरों को जब ये पता चल जाता है कि वो संस्थान को बदनाम कर सकता है, तो वो पीडि़तों से और अधिक फिरौती माँगते हैं।’
पीडि़तों का ऐसी घटनाओं को रिपोर्ट ना करना और कंपनियों में कवर-अप करने की संस्कृति की वजह से रेंसमवेयर के जरिए होने वाली वसूली का सही अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है।
एमसीसॉफ्ट के विशेषज्ञों के मुताबिक, सिर्फ साल 2020 में ही रेंसमवेयर ने कंपनियों को 170 अरब डॉलर का नुकसान पहुँचाया।
इसमें फिरौती में दी गई रकम, वेबसाइट डाउन होने की वजह से काम का प्रभावित होना भी शामिल है। (bbc.com)
-स्वराज करूण
कोरोना की परवाह किए बिना आज देश के कई बड़े शहरों में हजारों लोगों ने होली धूमधाम से मनाई। टीव्ही न्यूज चैनलों में उत्तरप्रदेश के वृंदावन स्थित बांकेबिहारी मंदिर में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता देखा गया। मथुरा में भी जन सैलाब उमड़ता रहा।
महाराष्ट्र के नांदेड़ में लॉक डाउन के बीच होली और होला मोहल्ला का पर्व मनाने के लिए लोगों की भीड़ ने कोविड के नियमों की धज्जियाँ उड़ा दी। रोकटोक करने पर भीड़ ने पुलिस के साथ झगड़ा भी किया। ऐसा नहीं होना चाहिए था। यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी। और भी कई शहरों में होली के दिन कोरोना को ठेंगा दिखाकर भीड़ उमड़ती रही। रंग बरसते रहे। इनके भी रंगीन दृष्य चैनलों पर दिखाए गए। कोई मास्क नहीं, कोई दो गज की दूरी नहीं। और इधर हम हैं और हम जैसे लाखों लोग, जो आज कोरोना से डरकर घरों से निकले ही नहीं!
एक चैनल ने कोलकाता के किसी बड़े बागीचे में आयोजित वसंतोत्सव का आज शाम प्रसारण किया ,जो मॉडलों ,फोटोग्राफरों और वीडियोग्राफरों की किसी संस्था द्वारा आयोजित किया गया था ,जिसमें सीनियर और जूनियर मॉडल्स सज-धज कर तरह -तरह के लोकगीतों की सांगीतिक प्रस्तुतियों में ठुमके लगा रही थीं। इन महिला कलाकारों ने बागीचे की हर खाली जगह को अपना रंगमंच बना लिया था। किसी ने भी मास्क नहीं पहना था। दो गज की दैहिक दूरी भी बिल्कुल नहीं थी। सब लोग मजे से सेल्फी ले रहे थे, घूम रहे थे।
कोरोना के आतंक का वहाँ दूर -दूर तक कोई अता-पता नहीं था। सब बहुत खुश होकर समारोह को इंजॉय कर रहे थे। एंकर कलाकारों से हाथ भी मिला रहे थे। देखकर अच्छा लगा कि हमारे छत्तीसगढ़ और ओडिशा के लोकप्रिय सम्बलपुरी गीत ‘रोंगोबती’ का बांग्ला अनुवाद भी सम्बलपुरी लोकधुन में नृत्य के साथ प्रस्तुत किया गया। यह सब देखकर लगा कि तमाम दिशा -निर्देशों और ‘घर में रहें सुरक्षित रहें’ जैसी चेतावनियों के बावज़ूद लोगों ने जिस उत्साह के साथ बाहर निकलकर मौज -मस्ती के साथ होली मनाई ,उसे देखकर कोरोना वायरस भी जनता के आगे नतमस्तक हो गया!
यह वायरस तो पांच राज्यों में हो रही चुनावी रैलियों की भीड़ को देखकर भी नतमस्तक होकर वहाँ से गायब हो जाता है।
तमाम बड़े -बड़े नेता लोग भी इन रैलियों में मास्क पहने बिना,भाषण देते नजर आते हैं । किसानों की महापंचायतों से भी कोरोना घबराता है और वहाँ से दूर रहता है। अब तक तो किसी महापंचायत और किसी भी दल की चुनावी रैलियों में कोरोना विस्फोट जैसी कोई घटना देखने ,सुनने को नहीं मिली।
चलो अच्छा है, किसी को कुछ नहीं हुआ। लेकिन क्या यह सब देखकर ऐसा नहीं लगता कि कोरोना को लेकर दुनिया भर में जरूरत से ज़्यादा भय और भ्रम फैलाया जा रहा है और जनता ने अब इससे डरना छोड़ दिया है ?
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पत्र के जवाब में पत्र लिखा, यह अपने आप में उल्लेखनीय बात है लेकिन 23 मार्च के पत्र का जवाब देने में उन्हें एक हफ्ता लग गया, यह भी विचारणीय तथ्य है। इससे भी बड़ी बात यह कि पाकिस्तान के स्थापना दिवस पर मोदी ने इमरान को बधाई दी। मोदी को शायद पता होगा कि 23 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया था और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, हिंदू महासभा और कांग्रेस ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया था। अब मोदी ने इसी दिन पर इमरान को बधाई देकर पाकिस्तान के निर्माण और भारत-विभाजन को औपचारिक मान्यता दे दी।
मुझे विश्वास है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने एक स्वयंसेवक की इस पहल का विरोध नहीं करेगा। दूसरे शब्दों में पाकिस्तान अब एक सच्चाई है, जिसे हमें स्वीकार करना ही है। जहां तक इमरान की चिट्ठी का सवाल है, उसका कौन स्वागत नहीं करेगा ? लेकिन पाकिस्तान के किस प्रधानमंत्री या फौजी तानाशाह की हिम्मत है कि वह भारत को अपनी चिट्ठी भेजे और उसमें कश्मीर का जिक्र न करे ? इमरान को शायद इसी दुविधा में एक हफ्ता लगाना पड़ गया होगा।
कश्मीर जितना भारत-पाक मामला है, उससे कहीं ज्यादा पाकिस्तान का अंदरुनी मामला है। कश्मीर तो पाकिस्तान की अंदरुनी राजनीति का छोंक है। इस छोंक के बिना किसी भी नेता की दाल गल ही नहीं सकती। इसीलिए इमरान को दोष देना ठीक नहीं है लेकिन इमरान की चिट्ठी में कश्मीर के छोंक की मिर्ची का असर बहुत कम हो जाता, अगर वे मोदी को यह भरोसा दिलाते कि वे आतंकवाद को खत्म करने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर चलेंगे।
अब अमेरिकी दबाव में दोनों देशों के बीच कुछ संवाद शुरु हो गया है, यह अच्छी बात है लेकिन यह दबाव तभी तक बना रहेगा, जब तक चीन से अमेरिका की अनबन चल रही है और उसका अफगानिस्तान से पिंड नहीं छूट रहा है। दुर्भाग्य यही है कि अफगानिस्तान के मामले में भारत फिसड्डी बना हुआ है। हमारा विदेश मंत्रालय खुद पहल करने के काबिल नहीं है। इसीलिए दूसरों के मेलों में जाकर वह बीन बजाता रहता है, जैसा कि कल उसने ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में जाकर किया है। बीन उसने अच्छी बजाई लेकिन वह काफी नहीं है। कुछ करके भी दिखाना चाहिए।
(लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
ईरान के साथ चीन ने इतना बड़ा सौदा कर लिया है, जिसकी भारत कल्पना भी नहीं कर सकता। 400 बिलियन डॉलर चीन खर्च करेगा, ईरान में ! काहे के लिए ? सामरिक सहयोग के लिए। इसमें आर्थिक, फौजी और राजनीतिक, ये तीनों सहयोग शामिल हैं। भारत वहां चाहबहार का बंदरगाह बनाने और उससे जाहिदान तक रेल-लाइन डालने की कोशिश कर रहा है।
इस पर वह मुश्किल से सिर्फ 2 बिलियन डालर खर्च करने की सोच रहा है। भारत ने अफगानिस्तान में जरंज-दिलाराम सडक़ तैयार तो करवा दी है लेकिन अभी भी उसके पास मध्य एशिया के पांचों राष्ट्रों तक जाने के लिए थल-मार्ग की सुविधा नहीं है। अफगानिस्तान तक अपना माल पहुंचाने के लिए उसे फारस की खाड़ी का चक्कर काटना पड़ता है, क्योंकि पाकिस्तान उसे अपनी जमीन में से रास्ता नहीं देता है।
चीन ने इस पच्चीस वर्षीय योजना के जरिए पूरे पश्चिम एशिया में अपनी जड़ें जमाना शुरु कर दी हैं। चीनी विदेश मंत्री आजकल ईरान के बाद अब सउदी अरब, तुर्की, यूएई, ओमान और बहरीन की यात्रा कर रहे हैं। यह यात्रा उस वक्त हो रही है, जबकि अमेरिका का बाइडन-प्रशासन ईरान के प्रति ट्रंप की नीति को उलटने के संकेत दे रहा है। ट्रंप ने 2018 में ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते को रद्द करके उस पर कई प्रतिबंध लगा दिए थे।अब चीन के साथ हुए इस सामरिक समझौते का दबाव अमेरिका पर जरुर पड़ेगा। चीन, रुस और यूरोपीय राष्ट्रों ने अमेरिका से अपील की है कि वह ओबामा-काल में हुए इस बहुराष्ट्रीय समझौते को पुनर्जीविति करे। 2016 में चीनी राष्ट्रपति शी चिन फिंग की तेहरान-यात्रा के दौरान वर्तमान समझौते की बात उठी थी। उस समय तक चीन ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीददार था। अब चीन उससे इतना तेल खरीदेगा कि अमेरिकी प्रतिबंध लगभग निरर्थक हो जाएंगे लेकिन इस चीन-ईरान समझौते के सबसे अधिक परिणाम भारत को झेलने पड़ेंगे। हो सकता है कि अब उसे मध्य एशिया तक का थल मार्ग मिलना कठिन हो जाए।
इसके अलावा चीन चाहेगा कि अफगान-समस्या के हल में पाकिस्तान और ईरान की भूमिका बढ़ जाए और भारत की भूमिका गौण हो जाए। भारत और अमेरिका की बढ़ती हुई निकटता चीन की आंख की किरकिरी बन गई है। ‘खाड़ी सहयोग परिषद’ के साथ चीन का मुक्त व्यापार समझौता हो गया तो मध्य एशिया और अरब राष्ट्रों के साथ मिलकर चीन अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। भारतीय विदेश नीति निर्माताओं को भारत के दूरगामी राष्ट्रहितों के बारे में सोचने का यह सही समय है। भारत के पास ‘प्राचीन आर्यावर्त’ (म्यांमार से ईरान व मध्य एशिया) को जोडऩे के लिए कोई जन-दक्षेस-जैसी योजना क्यों नहीं है?(नया इंडिया की अनुमति से)
-शाहिद अख्तर
यूं ही कोई मिल गया था सरे राह चलते चलते....
महजबीं बानो ने जिंदगी को ऐसे ही देखा था...सरे राह चलते चलते...
जिंदगी के कठिन डगर पर रिश्तों का बोझ ढोते ढोते और उनका मानी-मतलब समझते-समझते वह छोटी सी महजबीं से मीना कुमारी बनी और सिनेमा के पर्दे पर उन्हें उकेरने और उंडेलने लगी और जब उससे भी तन्हाई और रिश्तों की तल्खी कम नहीं हुई तो अपनी जिंदगी की स्याही शराब में घोल कर कागज पे उकेरने लगीं वह मीना कुमारी ‘नाज’ बनीं।
महजबीं मां-बाप की अनचाही बेटी थी...
मीना कुमारी के अभिनय का सिक्का तो चला, लेकिन रिश्तों की आग में तप कर...
पाकीजा का वह अमर दृश्य देखें... मीना कुमारी का दुपट्टा उड़ता है और राजकुमार उनसे कहते हैं, ‘तुम पाकीजा हो।’ इस दृश्य की शूटिंग के लिए एक दो बार नहीं 17 बार रिटेक किया गया था...
क्या कमाल अमरोही एक अमर दृश्य पाना चाहते थे?
मीना कुमारी सख्त बीमार थीं। उन्हें ver cirrhosis था और उनका जिगर जवाब दे रहा था। वह पाकीजा फिल्म पूरा करना चाहती थी। निजी जिंदगी में सताने वाले कमाल के लिए रिटेक भी एक हथियार था...
वह एक बेमिसाल अभिनेत्री थीं...एक लाजवाब शायरा थीं... और उन सबसे बढ़ कर एक औरत...
वह एक एक सफल अभिनेत्री थीं, एक शानदार शायरा, लेकिन एक नाकाम औरत... जिंदगी की जंग में दिल की गहराइयों तक लहूलुहान... रिश्तों और स्वार्थों की आंधी के बीच अपनी जिंदगी के दश्त में मुहब्बत और खुलूस का एक नन्हा सा दिया जलाने की कोशिश करती एक आबलापा औरत...
अपने खून-ए-जिगर से लिखी मीना कुमारी की गजल मुझे बहुत पसंद है... आपको भी पसंद आएगी-
आबलापा कोई इस दश्त में आया होगा
वरना आंधी में दिया किसने जलाया होगा
जर्ऱे-जर्ऱे पर जड़े होंगे कुंवारे सज्दे
एक एक बुत को खुदा उसने बनाया होगा
प्यास जल्ते हुए कांटों की बुझाई होगी
रिसते पानी को हथेली पे सजाया होगा
मिल गया होगा अगर कोई सुनहरी पत्थर
अपना टूटा हुआ दिल याद तो आया होगा
- मीना कुमारी ‘नाज’
(v August 1932- 31 March 1972)
-कनक तिवारी
गौतम भाटिया का नाम चुन लेना मेरे लिए रोमांचकारी अनुभव है। यह युवा अधिवक्ता और लेखक संविधान की अभिधारणाओं को लेकर नीचे कहीं गहरे अतल में डूबकर वे रहस्य खोज लेना चाहता है जिन्हें न्यायिक व्यवस्था भी अपने सात्विक अहंकार में खारिज करती रहती है। गौतम इक्कीसवीं सदी के युवा संविधान का भविष्य हैं।
पचास साल हो रहे हैं संविधान की पोथी में खोपड़ी धंसाए दिमाग की वर्जिश करते बोलते, लिखते, पढ़ते और संविधान को दी गई चुनौतियों से जूझते। लगातार महसूस होता रहा है ‘हम भारत के लोग‘ जिसे सामूहिक रूप से अपने प्रतिनिधियों के जरिए लिख चुके। उस किताब के केन्द्रीय संदेश और अमलकारी ताकत को महफूज़ और जीवंत रखना चाहिए। पता नहीं क्यों भारत में पिछले सत्तर वर्षों में अब बूढ़े हो चले लेकिन अनंत युवा संविधान की इबारतों का दम कई बार फूलता हुआ दिखाई देता है। उसकी देह के हर अंग पर नफरत, खूंरेजी, गफ़लत, मतिभ्रम और दुर्भावनाओं की चोटें ही चोटें झिलमिलाती हैं। संविधान ने नहीं सोचा होगा कि उसे कुछ कूढ़मगज, संकीर्ण और मनुष्य विरोधी साजिशकर्ता लोग बहुमत के सामने लाचार बनाकर खड़ा करने की जुगत भी बिठाएंगे। यह तो ठीक है कि उसके कुछ वफादार और पारदर्शी स्वभाव के अस्तित्वरक्षकों ने कई कर्मठ किसानों, मज़दूरों, छात्रों, महिलाओं, वंचितों और परेशानदिमागों से मिलकर उसके यश को हिफाजत में रखा है। हमलावरों के पैने नाखून और तेज नश्तर किसी करुणा की फैक्टरी के उत्पाद नहीं होते इसलिए जब जैसा जो बन पड़ा, लिखते, सोचते संविधान की मानवधर्मी पैरवी करने यह एक किताब लिख देने का जज़्बा अंदर ही अंदर उत्तेजित करता स्याही के रास्ते कागजों पर आखिर छपे बिना मान नहीं सका।
संविधान के जनवादी और सर्वसुलभ सफर के साथ उसके इतिहास की बानगी और भविष्य की अनुकूलता के तेवर सैकड़ों लेखकों, अध्यापकों, वकीलों, न्यायविदों और पत्रकारों सहित छात्रों की जहीन और पैनी बुद्धि में सवाल उठाते, जवाब देते कर्तव्यनिष्ठ रहे हैं। वकील होने के नाते एक लंबी फेहरिस्त में कई महत्वपूर्ण नामों में से कुछ नाम किसी कारण से लिखते, सोचते वक्त कौंधते रहे हैं। उनके नाम जनता के सवालों के प्रतीकों, प्रवक्ताओं और प्रस्तोताओं के रूप में दर्ज करने से किताब की अहमियत और विश्वसनीयता में इजाफा होने का अहसास मुझे महसूस हुआ है।
उम्र के लिहाज़ से संविधान यात्रा में ए.जी. नूरानी को बिना पढ़े अंदर कौंध होना मुमकिन ही नहीं हुआ। उनकी किताबें और सैकड़ों लेख जेहन में फकत भले नहीं हैं, बल्कि जज़्ब हो गए हैं। हटेंगे नहीं। नूरानी का ज्ञान-संसार विविधताओं, अनोखेपन, गंभीरता और बहुविध सामाजिक विज्ञानों को अपनी असाधारण भाषा में नदी के जल की तरह प्रवाहित करता रहता है। वे शलाका पुरुष हैं।
असाधारण उर्वर बुद्धि के उपेन्द्र बक्शी से एक बार की ही रूबरू मुलाकात और चर्चा आज तक उत्तेजना पैदा करती है। अनुसूचित जातियों और जनजातियों के संरक्षण के लिए बना अधिनियम उनकी सलाह से लिखे गए पत्र के कारण प्रधानमंत्री विश्नाथ प्रताप सिंह के वक्त अधिसूचित हुआ था। वे विचार सरोवर, वटवृक्ष और उपजाऊ खेत एक साथ हैं।
इंदिरा जयसिंह द्वारा संपादित ‘लॉयर्स कलेक्टिव’ के एक से एक प्रखर अंक और उनकी जहीन बुद्धि के मुद्दों की पैरवी का मैं पाठक, दर्शक तथा श्रोता रहा हूं। इंदिरा का साहस उनकी हर विपरीत चुनौती के लिए आत्मिक पूंजी है। कभी कभी लगता है इंदिरा नाम से ही समझदार साहस की पारम्परिक पहचान होती है।
डॉ. राजीव धवन चलता फिरता ज्ञान-विश्वविद्यालय हैं। एक प्रमुख मुकदमे में उनके साथ जुडक़र पैरवी करते वक्त मैंने उनके स्वभाव, हावभाव और तर्कशक्ति के दांव देखते महसूस कर लिया था कि यह मेरे जीवन का अच्छा ज्ञाननिवेश हुआ। राजीव धवन मौलिकता की खुर्दबीन के आविष्कारक ही हैं। वे मेरे सबसे प्रिय विचार वैज्ञानिक भी हैं।
भाई दुष्यंत दवे तो मिले भी हैं। उन्हें सुना, देखा, समझा और बात की है। उनमें समुद्र के ज्वार की तरह उफनता उद्दाम न्यायप्रियता को लेकर जिस तरह सुप्रीम कोर्ट की समझ की बद्धमूल अवधारणाओं के खिलाफ भूचाल लाता है, वह मेरे लिखते रहने का एक कारण भी है। दुष्यंत दवे के कारण वकालत का व्यवसाय ‘बोनलेस चिकन चिली’ नहीं समझा जा सकता। चाहे हमलावर कितना ही ताकतवर साजिशी क्यों न हो!
मित्र और भाई प्रशांत भूषण ने अपने छात्र जीवन से संविधान को बचाने के नाम पर जोखिम ही उठाए हैं। उसके कारण उन पर लगे और पटा दिए गए एक रुपए जुर्माने का एक पेचीदा समीकरण भविष्य हल करेगा। उनके साहस की संविधान को ज़रूरत है। प्रशांत भूषण मेरे लिए जिद, जिरह, जिच और जिजीविषा के राष्ट्रीय रोल मॉडल हैं। योद्धा प्रशांत के कारण संविधान अपनी रीढ़ पर डटा रहना महसूस करता है।
कामिनी जायसवाल से कभी साथी वकील होने के नाते मिला भी हूं। उन्हें याद क्यों होगी क्योंकि वे सौजन्य मुलाकातें देखने भर की रही हैं। एक याचिकाकार और वकील के रूप में अपनी साथी अधिवक्ताओं के साथ मिलकर या अन्यथा अकेले भी कामिनी ने जो तेवर अपनी वाग्मिता में दिखाए हैं, वे महिला सशक्तिकरण का नहीं संविधान के सशक्तिकरण का उदाहरण हैं।
विधि विशेषज्ञ और संविधान मर्मज्ञ फैज़ान मुस्तफा से दो ढाई बरस पहले हुई सार्थक बातचीत के बाद उनसे कोशिश करने पर भी संपर्क नहीं हो पाया। संवैधानिक ज्ञान और उसकी आत्मा को जनसुलभ भाषा में परोसकर फैजान साहब पूरे देश के नागरिकों को अपनी तरफ जो तोहफा दे रहे हैं। वह घरों के दीवानखानों में सजाने की वस्तु नहीं है। लोगों के ज़ेहन में पैठते जाने से एक नए भारत के उठ खड़े होने की संभावनाओं की बुनियाद चुनी जा रही है।
वृन्दा ग्रोवर मेरी फेसबुक फ्रैंड हैं। मैं उनकी ओर गहरे से आकर्षित हूं। उनसे हालांकि उम्र में बड़ा नागरिक हूं। संवैधानिक अधिकार छीने जा रहे निज़ाम-पीडि़त लोगों के प्रहरी के रूप में उनके प्रयत्नों के लिए भविष्य की भी मुबारकबाद देना चाहता हूं। वृन्दा ग्रोवर का तर्क समुच्चय करुणा की कोख से पैदा होकर कानून के जंगल को जंगल का कानून बनाने से रोकता है।
कॉलिन गोन्ज़ालवीज़ तो मेरे छोटे भाई और दोस्त हैं। हमारे छत्तीसगढ़ से कई तथाकथित मानव अधिकार कार्यकताओं को सरकारी खिताब (?) ‘अर्बन नक्सल’ देने को लेकर संघर्ष करने की हमारी साझा विरासत है। चाहे विनायक सेन हों, सुधा भारद्वाज हों, तमाम पीडि़त हों या बहुत पहले कभी शंकर गुहा नियोगी भी रहे हों। कॉलिन की ईमानदारी और प्रामाणिकता को किसी प्रमाणपत्र की ज़रूरत नहीं है।
यही हाल संजय हेगड़े का है। उनसे जब भी मिला, लगा कोई बेहद सरल व्यक्ति अपनी मुस्कराहट में उन तमाम जिजीविषाओं को छिपाकर संघर्षधर्मी तेवर कभी भोथरा नहीं होने देगा, जो संविधान की केन्द्रीय आवाज़ ‘हम भारत के लोग’ का निश्चय और भवितव्य है। संजय को देखने सुनने से उनके अन्दर खदबदाते मनुष्य-धर्मी इरादों को संविधान तुरन्त समझ लेता है।
गौतम भाटिया का नाम चुन लेना मेरे लिए रोमांचकारी अनुभव है। यह युवा अधिवक्ता और लेखक संविधान की अभिधारणाओं को लेकर नीचे कहीं गहरे अतल में डूबकर वे रहस्य खोज लेना चाहता है जिन्हें न्यायिक व्यवस्था भी अपने सात्विक अहंकार में खारिज करती रहती है। गौतम इक्कीसवीं सदी के युवा संविधान का भविष्य हैं।
ये बारह संविधान मर्मज्ञ संविधान की जीवनवार्षिकी की बारहमासी की तरह हैं। वे हर मौसम में संविधान और ‘हम भारत के लोग‘ का एक जि़ंदा फलसफा बनाए रखने में अपने कर्म में कुछ भी बचाकर नहीं रख रहे हैं।
-सुसंस्कृति परिहार
दमोह विधानसभा उपचुनाव जो प्रदेश का इकलौता उपचुनाव है, मैं नित ये प्रयास चल रहे हैं कि कितने कांग्रेसी भाजपा में शामिल होते हैं यह बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। दरअसल कांग्रेस का रिजेक्ट माल जिसकी पार्टी में पूछ परख कम हो जाती है या कोई भाजपा से टेढ़ा मेढ़ा काम ठीक कराना होता है वे ही दलबदल करते हैं। बंगाल से लेकर असम तक अब भाजपा विपक्षी खेमे से आए लोगों पर निर्भर है। भाजपा के वर्तमान प्रत्याशी राहुल सिंह की जीत हार से यूं तो सरकार को कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है फिर दलबदल का राज मेडीकल कॉलेज में नहीं है इसमें बहुत गहरी राजनीतिक साज़िश है और वह है राहुल के ज़रिए पूर्व वित्तमंत्री जयंत मलैया का पूरी तरह क्षेत्र से खात्मा करना है। सोचिए इस काम को अचानक सामने लाने का ध्येय और क्या हो सकता है ? इसीलिए राहुल को मेडिकल कालेज और पथरिया फाटक ओवरब्रिज से नवाजा गया।उसे मंत्री का दर्जा दिया गया।इतनी बड़ी कृपा आखिरकार क्यों? दोनों काम मलैया को निजी क्षति पहुंचाने के लिए है। इसीलिए ना केवल मुख्यमंत्री , भाजपा प्रदेश अध्यक्ष, सांसद प्रह्लाद पटेल आदि वचनबद्ध हैं राहुल की नैया पार लगाने।जितने दल बदल हुए हैं उसमें इनकी बी टीम का हाथ है। जयंत मलैया ने पहले जिस तरह का रौब गालिब किया, दिल्ली भोपाल की दौड़ की बाद में उन्हें सारा कथानक समझ आ गया उन्होंने समझदारी दिखाते हुए समर्पण कर दिया। बेटे सिद्धार्थ की तमाम तैयारियों पर पानी फिर गया। उन्हें जबेरा विधानसभा प्रत्याशी वाली वह घटना याद रखनी चाहिए जब प्रह्लाद पटेल भाजपा प्रत्याशी बनके फार्म भरने दमोह आए थे तब मलैया जी ने उनकी उपेक्षा करते हुए दशरथ सिंह लोधी को प्रत्याशी बनाया था यह खुन्नस साफ दिखाई देती है। शिवराज तो उनके बढ़े कद से सदैव खार खाते रहे हैं। उसमें तड़का बी डी शर्मा का है ही।
पर ये खेला आज जिस राजनैतिक मोड़ पर है वह राहुल के पक्ष में नज़र नहीं आ रहा है । मलैया का आम लोगों से लगाव रहा है, राहुल बहुत बौने है ।वे पिछला चुनाव कांग्रेस की एकजुटता की वजह से जीत गए थे। अब मुश्किल में हैं उनके साथ कार्यकर्ता नहीं हैं बेमन से जो साथ हैं वे मज़बूरी में है। तभी तो आज मंच पर जयंत मलैया मुख्यमंत्री के सामने ये कह जाते हैं मैं जीतने की बात नहीं करता वे 28000 मतों से जीतेंगे। करारा व्यंग्य ही लगता है।वे खुद अल्प मार्जिन से ही जीतते रहे हैं। कांग्रेस भले विभाजित रही हो वोट लगभग-लगभग बराबरी की ही लेती रही तब जब वित्त मंत्री जैसा प्रदेश का महत्वपूर्ण पद उनके पास रहा। राहुल की लोधी वोट काटने उमा सिंह शक्ति चेतना मंच से जयंत की पत्नी सुधा मलैया ने उतरवाया है वे इस कार्य को अंजाम देने शक्ति पीठ भी गईं।लोधी वोट पर दूसरा डाका डालने राहुल के चचेरे बड़े भाई एड०वैभव सिंह भी निर्दलीय मैदान में उतरे हैं जिनके साथ पिछड़े वर्ग के भी जुड़ने की संभावना है ।
वस्तुस्थिति यह है कि रहली के विधायक और वर्तमान में केबिनेट मंत्री गोपाल भार्गव और जयंत मलैया दोनों शिवराज सिंह से ख़फ़ा हैं तथा राहुल को अपना मुख्य प्रतिद्वंद्वी मान परास्त करने की ठोस इबारत पहले ही लिख चुके हैं जयंत और सिद्धार्थ तीन-चार महिने पहले अपने मतदाताओं को सतर्क कर चुके हैं। कुल मिलाकर फायदा कांग्रेस उम्मीदवार अजय टंडन के पक्ष में जाता नज़र आ रहा है बशर्ते ग्रामीण वोटर जो फूल का जाप करते रहे हैं उन्हें बदलाव की दास्तान से रूबरू कराया जाए।दूसरा ई वी पर नज़र रखी जाए। दलबदलू राहुल पर जनता को एतबार तो दूर की बात शक्ल से भी नफरत है यह प्रचार के दौरान नागरिकों खासकर महिलाओं ने जाहिर भी कर दिया है।मलैया और टंडन की दोस्ती राजनैतिक नहीं है वे पारिवारिक सदस्य हैं सुधा मलैया के प्रिय भाई हैं अजय टंडन। इसलिए इस बार वे अजेय नज़र आ रहे हैं।क्यों ना हों बहिन के संकट में भाई काम आता है ?
-राना सफ़वी
इरफ़ान को इरफ़ान से मिलाओ
इंसान को इंसान से मिलाओ
गीता को क़ुरान से मिलाओ
दैर-ओ-हरम में हो ना जंग
होली खेलो हमारे संग
- नज़ीर ख़य्यामी
रामनगर की अपनी यात्रा के दौरान मैंने बैठकी होली में हिस्सा लिया था, यह उत्तराखंड की पुरानी संस्कृति से जुड़ी होली थी. बसंत पंचमी के बाद ही महिलाएं समूह बनाकर एक-दूसरे के घरों में जातीं और होली से जुड़े गीत गातीं. कुछ महिलाएं नृत्य भी करतीं.

ये गीत रागों पर आधारित होते हालांकि अब इन लोकगीतों में कुछ फ़िल्मी धुनें भी सुनने को मिल जाती हैं.
रामनगर के क्यारी गांव के जिस रिसॉर्ट में हम ठहरे हुए थे, उसी रिसॉर्ट ने गांव की होली में शामिल होने के लिए हमारी व्यवस्था की. गांव पहुंचकर हमने रंगों का ख़ूबसूरत समंदर देखा, महिलाएं रंगबिरंगे कपड़े पहने ढोलक पर थाप देती हुई लोकगीत गा रही थीं.
जब उन महिलाओं ने हमें देखा तो हमारे माथे पर टीका लगाकर और गालों पर गुलाल के साथ हमारा स्वागत किया. मुझे होली खेलना पसंद है और जिस गर्मजोशी से गांव की महिलाओं ने हमारा स्वागत किया, सूखे रंगों से चेहरे को रंगा, उसके बाद मैं भी उन पर रंग लगाने से ख़ुद को नहीं रोक सकी.
रंग इस्लाम में हराम?
इसके बाद जब मैंने होली की ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर अपलोड की तो कुछ लोगों ने मुझे कहा कि मुसलमानों को होली नहीं खेलनी चाहिए क्योंकि इस्लाम में रंग हराम माना जाता है.
मैं उन लोगों से इस बात का सबूत मांगना चाहती थी लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया क्योंकि मैं जानती हूं कि इस तरह की ग़लत धारणाएं अज्ञान और पूर्वाग्रहों से ही पनपती हैं.
इस तरह के अज्ञानता विचारों से लड़ने का एक ही तरीक़ा है- उन पर ध्यान ही ना देना.
नमाज़ पढ़ने के लिए जब हम वुज़ू करते हैं, तब हमारी त्वचा पर ऐसा कुछ भी नहीं लगा होना चाहिए, जो पानी को त्वचा के सीधे संपर्क में आने से रोके. ऐसे में बस इतना करना होगा कि वुज़ू करने से पहले गुलाल को धोना होगा.

700 साल पहले हज़रत अमीर ख़ुसरो की लिखी यह क़व्वाली आज भी काफ़ी लोकप्रिय है-
आज रंग है, हे मां रंग है री
मोरे महबूब के घर रंग है री
होली पर दरगाह में भीड़
पिछले साल होली के मौक़े पर मैं ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह गई थी और वहां मैंने काफ़ी भीड़ देखी. जब मैंने इतनी भीड़ के बारे में सवाल पूछा तो दरगाह के गद्दीनशीं सैय्यद सलमान चिश्ती ने मुझे बताया कि ये सब ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ के साथ होली खेलने आए हैं.
दरगाह में मौजूद तमाम लोग होली के पावन मौके पर दूर-दूर से ख्वाजा ग़रीब नवाज़ की दुआएं लेने पहुंचे थे.
किसी भी सदी के आचार और संस्कृति को उस वक़्त की कला और चित्रकारी के ज़रिए सबसे बेहतर तरीक़े से समझा जा सकता है.
दिल्ली सल्तनत और मुग़लिया दौर के मुस्लिम सूफ़ी संत और कवियों ने होली पर कई बेहतरीन रचनाए गढ़ी हैं.
बाबा बुल्लेशाह ने लिखा है-
होरी खेलूंगी, कह बिसमिल्लाह,
नाम नबी की रतन चढ़ी, बूंद पड़ी अल्लाह अल्लाह.
भगवान कृष्ण के भक्त इब्राहिम रसख़ान (1548-1603) ने होली को कृष्ण से जोड़ते हुए बहुत ही ख़ूबसूरती से लिखा है-
आज होरी रे मोहन होरी,
काल हमारे आंगन गारी दई आयो, सो कोरी,
अब के दूर बैठे मैया धिंग, निकासो कुंज बिहारी
मुग़ल होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पालशी कहते थे और बड़ी ही धूमधाम से उसे मनाते थे. अगर आप गूगल पर मुग़ल चित्र और ईद सर्च करेंगे तो आपको ईद की नमाज़ अदा करते जहांगीर की सिर्फ़ एक पेंटिंग मिलेगी लेकिन अगर आप मुग़ल और होली गूगल करेंगे तो आपको उस वक़्त के राजा और रानियों की तमाम पेंटिंग देखने को मिलेंगी, नवाब और बेगमों की होली मनाती तस्वीरें भी मिल जाएंगी.
पूरे मुग़ल सम्राज्य के दौरान होली हमेशा ख़ूब ज़ोर-शोर के साथ मनाई जाती थी. इस दिन के लिए विशेष रूप से दरबार सजाया जाता था.
लाल क़िले में यमुना नदी के तट पर मेला आयोजित किया जाता, एक दूसरे पर रंग लगाया जाता, गीतकार मिलकर सभी का मनोरंजन करते. राजकुमार और राजकुमारियां क़िले के झरोखों से इसका आनंद लेते.
रात के वक़्त लाल क़िले के भीतर दरबार के प्रसिद्ध गीतकारों और नृतकों के साथ होली का जश्न मनाया जाता.
नवाब मोहम्मद शाह रंगीला की लाल क़िले के रंग महल में होली खेलते हुए एक बहुत प्रसिद्ध पेंटिंग भी है.
मुग़ल पेंटिंग
दिल्ली के प्रसिद्ध शायर शेख़ ज़हूरुद्दीन हातिम ने लिखा है-
मुहैया सब है अब असबाब ए होली
उठो यारों भरो रंगों से जाली
बहादुर शाह ज़फ़र न सिर्फ़ होली के जश्न में शरीक होते बल्कि उन्होंने इस पर एक प्रसिद्ध गीत भी लिखा है-
क्यों मोपे मारी रंग की पिचकारी
देख कुंवरजी दूंगी गारी (गाली)
अगर अकबर ने गंगा जमुनी तहज़ीब की शुरुआत की तो अवध के नवाबों ने इसे अलग मुक़ाम तक पहुंचाया. नवाब सभी त्योहार अपने-अपने अंदाज़ में मनाते. मीर तक़ी मीर (1723-1810) ने लिखा है-
होली खेला आसिफ़-उद-दौला वज़ीर,
रंग सोहबत से अजब हैं ख़ुर्द-ओ-पीर
वाजिद अली शाह ने अपनी एक बहुत प्रसिद्ध ठुमरी में लिखा है
मोरे कान्हा जो आए पलट के
अबके होली मैं खेलूंगी डट के
और मुझे तो लगता है कि नज़ीर अकबराबादी के अलावा किसी और ने होली को इतने ख़ूबसूरत तरीक़े से शब्दों में क़ैद नहीं किया-
जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की,
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की
तारीख़-ए-हिंदुस्तानी में मुंशी ज़काउल्लाह ने कहा भी है, ''कौन कहता है कि होली हिंदुओं का त्योहार है?''
कुल मिलाकर होली एक ख़ूबसूरत त्योहार है और इतना ही ख़ूबसूरत इसका इतिहास भी है, जिसमें हिंदू-मुस्लिम मिलकर इसे मनाते रहे हैं.
आइए, मस्ती करें.
कहीं पड़े ना मोहब्बत की मार होली में
अदा से प्रेम करो दिल से प्यार होली में
गले में डाल दो बाहों का हार होली में
उतारो एक बरस का ख़ुमार होली में
-नज़ीर बनारसी
(ये लेख इससे पहले दो मार्च 2018 को बीबीसी हिन्दी के पन्ने पर प्रकाशित किया गया था) (bbc.com)
जनवरी 2021, चमचमचाती काली कार में रोम की सड़कों पर घूमता हुआ एक व्यक्ति इटली के राष्ट्रपति के सरकारी आवास पर पहुंचता है और उन्हें अपना इस्तीफ़ा थमा देता है.
ये व्यक्ति कोई और नहीं, इटली के प्रधानमंत्री जिजेज्पी कौंटे थे.
इतिहास बताता है कि साल 1948 में इटली के गणराज्य बनने के बाद औसतन लगभग हर साल एक प्रधानमंत्री ने अपना इस्तीफ़ा दिया है.
तो इस हफ्ते दुनिया जहान में हम ये सवाल पूछ रहे हैं कि इटली में सरकारें इतनी जल्दी क्यों गिर जाती हैं.
इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमने कुछ विशेषज्ञों से बात की.
मुसोलिनी की छाया
बेनेटो मुसोलिनी साल 1922 में इटली के प्रधानमंत्री बने और उन्होंने तानाशाही से तब तक शासन चलाया, जब तक कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान वर्ष 1943 में उन्हें गिरफ्तार नहीं कर लिया गया.
इटालियन पॉलिटिकल साइंस रिव्यू के एडिटर-इन-चीफ़ प्रोफेसर मार्टिन बुल कहते हैं, "मुझे लगता है कि इटली की संस्कृति और राजनीति पर इसका बड़ा गहरा असर पड़ा. मुसोलिनी ने बताया कि कमज़ोर राजनीतिक तंत्र में सत्ता पर क़ब्ज़ा कैसे किया जाता है. उन्होंने सभी राजनीतिक दलों पर पाबंदी लगाई और जो थोड़ा बहुत प्रतिनिधित्व दिया भी, वो दरअसल अपनी तानाशाही को छिपाने के लिए किया."
वो कहते हैं, "फासीवाद को हरा तो दिया गया, लेकिन इसके साथ ही मुसोलिनी के समर्थकों और विरोधियों के बीच सिविल वॉर शुरू हो गया. सिविल वॉर ख़त्म भी हो गया लेकिन मुसोलिनी के लिए सहानूभूति रखने वाले लोग ख़त्म नहीं हुए. हालांकि इटली के संविधान में फासीवाद के ख़िलाफ़ भावनाएं साफ़ नज़र आती हैं."
मुसोलिनी के बाद इटली ने राजनीतिक प्रणाली दोबारा इस तरह बनाने की कोशिश की, जिसमें किसी दूसरे मुसोलिनी के लिए अपने पैर जमाने की गुंजाइश ना हो. इस नए तंत्र में ये सुनिश्चित किया गया कि कोई एक राजनीतिक दल या कोई एक व्यक्ति बहुत अधिक ताकतवर ना बन जाए.
प्रोफेसर मार्टिन बुल कहते हैं, "इसके लिए व्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों में अधिकारों और शक्तियों को बांटा गया. इससे सरकारी तंत्र में काम की गति धीमी पड़ गई, जहां जगह-जगह वीटो हैं, अवरोधक हैं और समझौता करने की मजबूरी है."
इटली में सरकार बनाने के लिए अलग-अलग पार्टियों को गठबंधन बनाना पड़ता है, लेकिन सहमति नहीं बनने पर गठबंधन टूटने में ज़रा भी देर नहीं लगती. क्रिश्चियन डेमोक्रेट्स लगभग हमेशा सत्ता में रहे, लेकिन इसके लिए उन्हें मन मारकर गठबंधन बनाने पड़े.
प्रोफेसर मार्टिन बुल के मुताबिक, "सत्ता में आने के लिए और सत्ता में टिके रहने के लिए भ्रष्टाचार ज़रूरी हो गया. लगभग 50 साल से इटली में यही हो रहा है. हर नई सरकार के पीछे सीक्रेट करप्शन है, इटली के नेताओं का भ्रष्टाचार वर्षों तक छिपा रहा, लेकिन समय के साथ भ्रष्टाचार का हर सीक्रेट सबको पता चल गया."

भ्रष्टाचार का बोलबाला
पीसा यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर अल्बर्टो वानुची वर्ष 1992 का एक मामला बताते हैं जब इटली की राजनीति में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ बड़ा मोर्चा खोला गया था.
वो कहते हैं, "जब ये जांच-पड़ताल शुरू हुई, तब ये रिश्वत का बहुत छोटा मामला था. इस मामले में रिश्वत की बहुत कम रकम शामिल थी, जो एक छोटे कारोबारी ने एक नेता को दी थी."
उस समय इटली की गठबंधन सरकार में सोशलिस्ट पार्टी शामिल थी. सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य मारियो कियेज़ो ने भ्रष्टाचार के मामलों में जांच-पड़ताल के दौरान अपनी पार्टी के वरिष्ठ सदस्यों के बारे में सनसनीखेज और चिंताजनक बातें बताईं. इससे इटली के पूरे राजनीतिक तंत्र में रिश्वत और भ्रष्टाचार का तानाबाना उजागर हो गया.
प्रोफेसर अल्बर्टो वानुची के मुताबिक, "तब ये बात आधिकारिक तौर पर नहीं कही जाती थी, लेकिन पता सबको था कि हर उद्यमी को पॉलिटिकल पार्टी को पैसा देना है जिसके बदले में उन्हें प्रोटेक्शन मिलता है."
मारियो कियेज़ो ने जब ये सब ज़ाहिर कर दिया, तब संसद में पूर्व प्रधानमंत्री बेटिनो क्राक्सी ने अपने साथियों को बड़े नाटकीय तरीके से संबोधित किया, जिसके बाद कहने-सुनने के लिए कुछ नहीं बचा.
प्रोफेसर अल्बर्टो वानुची बताते हैं, "बेटिनो क्राक्सी को सार्वजनिक रूप से ये कहना पड़ा कि इटली के पूरे पॉलिटिकल सिस्टम में फाइनेंसिंग की गड़बड़ी है और ये पूरी तरह से ग़ैर-क़ानूनी है. यदि हमने इन मामलों को आपराधिक मामला माना, तो इटली के पूरे पॉलिटिकल सिस्टम को ग़ैर-क़ानूनी मानना पड़ेगा."
जांच-पड़ताल में पता चला कि इटली की राजनीति में शामिल लगभग हर व्यक्ति भ्रष्टाचार में लिप्त है. इसके नतीजे भी सामने आए और कुछ ही वर्षों में चार पूर्व प्रधानमंत्री, संसद के सैकड़ों सदस्य और हज़ारों प्रशासनिक अधिकारी कटघरे में खड़े नज़र आए.
प्रोफेसर अल्बर्टो वानुची बताते हैं, "इसके बाद इटली की जो नामी राजनीतिक पार्टियां थीं, उनमें ज़बर्दस्त बदलाव आया. कुछ पॉलिटिकल पार्टियां तो गायब ही हो गईं. एक-दो वर्ष के भीतर हर बड़ी पार्टी ख़त्म हो गई और ढेर सारी नई पार्टियां बन गईं. इस दौर में एक नया नेता सामने आया जिसका राजनीति से कोई लेनादेना नहीं था और उसका नाम था सिल्वियो बर्लुस्कोनी."
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राजनीति का नया दौर
कैथोलिक यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस की एसोसिएट प्रोफेसर जूलियस आंद्रे कहती हैं, "मैं उस समय 14 साल की थी, लेकिन मुझे वो स्पीच याद है जिसमें उन्होंने चुनाव लड़ने का एलान किया था. तब उनकी बात ही अलग है, उनका संदेश बाकियों से अलग था, उनका अंदाज़ सबसे जुदा था. लोगों ने तब जो देखा-समझा, वो उनके लिए एकदम नया अनुभव था."
उन्हें याद है कि 26 जनवरी 1994 में उन्होंने जाने-माने मीडिया दिग्गज सिल्वियो बर्लुस्कोनी को टीवी पर देखा था जिन्होंने अपनी अलग पॉलिटिकल पार्टी बनाई थी.
सिल्वियो बर्लुस्कोनी उसी साल पहली बार प्रधानमंत्री बने और साल 2013 तक सत्ता में रहे. अपने कार्यकाल के दौरान सिल्वियो बर्लुस्कोनी ने इटली की राजनीति को नए सिरे से परिभाषित किया.
जूलियस आंद्रे बताती हैं, "बर्लुस्कोनी ने राजनीतिक संगठन का एक नया मॉडल बनाया. इस मॉडल में पार्टी अपने करिश्माई नेता के व्यक्तिगत धन और संगठन के संसाधनों और पूरी तरह निर्भर थी. ये मॉडल पचास साल से जारी उस मॉडल के एकदम विपरीत था जो जनसमूह की बुनियाद पर आधारित था, जिस पर इससे पहले की पॉलिटिकल पार्टियां काम कर रही थीं. जनीति के इस दौर में निर्णय लेने का अधिकार मुट्ठीभर लोगों के पास था. बीते दो-तीन दशकों में हुआ ये कि पार्टी और राजनीति में बस उन्हीं का दबदबा रहा."
बर्लुस्कोनी और उनकी पार्टी ने इटली में बने राजनीतिक निर्वात को बखूबी भरने का काम किया. कुछ अन्य पार्टियों ने भी उनका अनुसरण करने की कोशिश की. लेकिन इसके साथ ही इटली की राजनीति में अनिश्चितता बढ़ती गई. नब्बे के दशक से इटली की राजनीति एक नई करवट ले रही थी.
जूलियस आंद्रे के मुताबिक, "इटली की संसद ने राजनीति में आबादी के अनुपात के हिसाब से प्रतिनिधित्व को मंज़ूरी दी. इससे मामूली पार्टियों की भूमिका बढ़ती गई. इटली में फिलहाल ऐसी 30 पार्टियां हैं. इससे सरकार में अलग-अलग समूह बनने लगे जिनकी वजह से प्राथमिकताओं में होड़ लगने लगी. सरकार बनाने के लिए ऐसी पार्टियों में गठबंधन होने लगा जिनके विचारों की दिशा एकदम विपरीत थी."
ऐसे में तकरार बढ़ने लगी और उन्हें साथ लेकर चलना मुश्किल होने लगा. किसी पार्टी के नेता को लगता कि उनके हितों की अनदेखी हो रही है या उन्हें तवज्जो नहीं दी जा रही है, तो वे कभी भी अपना समर्थन वापस लेने लगे.
शायद यहां हम इस सवाल के जबाव के सबसे नज़दीक पहुंच रहे हैं कि इटली में सरकारें इतनी जल्दी-जल्दी क्यों गिर जाती हैं.
जूलियस आंद्रे कहती हैं, "इटली में सरकारें लगातार इस वजह से गिरती रही हैं कि गठबंधन में बहुत सारी पार्टियां शामिल होती हैं. सरकारें वोट ऑफ कॉन्फिडेंस में कमी होने की वजह से नहीं गिरतीं. बल्कि इस वजह से गिरती हैं कि किसी मुद्दे पर उनके बीच एक राय नहीं बन पाती. असहमतियां हद से ज्यादा बढ़ जाती हैं. गठबंधन में दिक्कतें बढ़ती जाती हैं और आखिर में प्रधानमंत्री अपना इस्तीफ़ा देने पर विवश हो जाते हैं."
अब आगे क्या
अब मिलिए हमारी चौथी और आख़िरी विशेषज्ञ से जिनका नाम है अन्नाबुल. वो बताती हैं, " मैं मूल रूप से इटली की ही रहने वाली हूं और पेशे से प्रोफेसर हूं. यूरोपीय संघ से मिला पैसा और उस पैसे पर हुआ विवाद इस बार सरकार गिरने की वजह बना, जिसे लेकर गठबंधन की एक पार्टी में मतभेद हो गए. हालांकि इसके पीछे असली वजह निजी हित थे."
यूरोपीय संघ से फंडिंग का ऑफर इटली को ऐसे समय मिला था, जब कोरोना महामारी की वजह से उसकी आर्थिक हालत ख़राब हो चुकी थी. दूसरी बात ये भी थी कि इटली कई वर्षों से ख़स्ताहाल अर्थव्यवस्था से जूझ रहा था. देश के युवा बेरोज़गारी से जूझ रहे हैं.
सरकार गिरने के एक महीने बाद इटली के राष्ट्रपति ने आर्थिक प्रबंधन में माहिर माने जाने वाले मारियो ड्रागी के हाथ में देश की कमान सौंपी.
अन्नाबुल कहती हैं, "मारियो ड्रागी, सुपर मारियो हो सकते हैं, लेकिन इटली के मौजूदा हाल में उनसे कुछ ज्यादा ही उम्मीदें की जा रही हैं. वो कोई जादूगर नहीं है. मारियो ड्रागी की सरकार बाकी पार्टियों के लिए एक मौका है कि वो एकजुट होकर एक सुर में बात करें. इटली को राजनीति के लिहाज से एकजुटता की ज़रूरत है."
मारियो ड्रागी के पास यूरोपियन सेंट्रल बैंक को संभालने का अनुभव है, हालांकि इटली की पार्टी पॉलिटिक्स में कभी उनका दख़ल नहीं रहा.
अन्नाबुल कहती हैं, "मैं इस बात से इंकार नहीं करूंगी कि इटली की राजनीतिक प्रणाली क्षणभंगुर है जो कभी भी बिखर सकती है. लेकिन मैं साथ ही ये भी कहूंगी कि इटली की राजनीति में बहुत लचक है जिसकी वजह से इमरजेंसी में ऐसे नेता भी एकजुट हो जाते हैं जिनमें छत्तीस का आंकड़ा है. तो हो सकता है कि इस बार भी देश हित में सब एकजुट हो जाएं."
इसमें संदेह नहीं कि इटली के मौजूदा हालात की जड़ें उसके इतिहास में निहित है जहां तानाशाह मुसोलिनी अब भी लोगों के ज़हन में हैं, जहां संविधान में ये सुनिश्चित किया गया है कि कोई एक व्यक्ति, कोई एक पार्टी ज़रूरत से ज़्यादा ताकतवर ना हो जाए, जहां इस बात का ख़्याल रखा गया है कि आबादी के अनुपात के हिसाब से समुचित प्रतिनिधित्व मिले.
लेकिन इन्हीं उपायों में ये कमज़ोरी भी छिपी हुई है कि गठबंधन सरकार में छोटी-छोटी कई पार्टियां शामिल होती हैं जो किसी चेन में अलग-अलग कड़ियों की तरह होती हैं. एक कड़ी के अलग होते ही पूरे चेन बिखर जाती है.
इतिहास इस बात का गवाह है कि इटली में किसी समस्या का समाधान एक व्यक्ति पर केंद्रित नहीं हो सकता. इटली की मौजूदा समस्या का समाधान राजनीतिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन में निहित है. लेकिन क्या इटली इस बड़े बदलाव के लिए तैयार है....ये एक अलग सवाल है. (bbc.com)
-बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शेख हसीना ने ढाका बुलाकर बहुत ठीक किया। बांग्लादेश की आजादी का यह पचासवाँ और शेख मुजीब के जन्म का यह 100 वाँ साल है। इन दोनों शुभ जन्म-अवसरों पर बांग्लादेश में भारत को याद नहीं किया जाता तो किसको याद किया जाता ? मोदी की भी हिम्मत है कि इस कोरोना-काल में उन्होंने पहली विदेश-यात्रा कहीं की तो वह बांग्लादेश की की। उन्होंने अमेरिका, रूस, फ्रांस, जर्मनी, जापान देशों को तो इंटरनेट पर ही निपटा दिया। इस यात्रा से दोनों देशों की सरकारों में अपूर्व और एतिहासिक घनिष्टता भी बढ़ी है। लेकिन इस ढाका-यात्रा में से कुछ अप्रिय संदेश भी निकले हैं, मोदी के विरोध में ढाका, चिटगांव और कई अन्य शहरों में हजारों बांग्लादेशी नागरिक नारे लगाते हुए सड़क पर उतर आए। उन्होंने असम पहुंचे बांग्लादेशियों के विरुद्ध बने कानून का विरोध किया और 2002 में गुजरात में हुए दंगों के पोस्टर भी लगाए।
चिटगांव के चार नौजवान इन प्रदर्शनों में मारे गए और दर्जनों घायल भी हुए। मोदी के खिलाफ उनकी अमेरिका और ब्रिटेन-यात्रा के दौरान भी पहले कई प्रदर्शन हुए हैं लेकिन मुझे याद नहीं पड़ता कि किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की विदेश-यात्रा इतनी विवादास्पद और हिंसक सिद्ध हुई, जितनी कि वह ढाका में हुई।यह ठीक है कि बंगाल के लगभग 3 करोड़ मतुआ वोटरों को पटाने में इस यात्रा का कुछ असर हो सकता है, क्योंकि मोदी मतुआ लोगों के मूल मंदिर में भी जाएंगे। यदि मोदी अपनी इस विदेश-यात्रा का इस्तेमाल अपनी घरेलू राजनीति के लिए कर रहे हैं तो बांग्लादेश के मुस्लिम कट्टरपंथी भी भारत के अंदरुनी राजनीतिक मामलों में अपनी टांग-अड़ाई को उचित ठहरा रहे हैं।
भारत के मोदी-विरोधी लोग सोशल मीडिया पर उनका काफी मजाक भी उड़ा रहे हैं। उनके 1971 में बांग्लादेश के समर्थन में आयोजित जनसंघ के जुलुस में गिरफ्तार होने की बात को वे कोरी गप्प बता रहे हैं। यह ठीक नहीं है। उन दिनों हर प्रबुद्ध भारतीय बांग्लादेश के साथ था। मुझे याद है कि शेख मुजीब के गुरुतुल्य 90 वर्षीय मौलाना भाशानी का मैंने सप्रू हाउस में भाषण करवाया था और अपने दिल्ली विवि के हजारों छात्रों के प्रदर्शन भी आयोजित किए थे। मोदी ने इस मौके पर इंदिराजी को याद किया, अच्छा किया। बेहतर होता कि अपने साथ इंदिरा-परिवार के किसी व्यक्ति को भी वे ढाका ले जाते। यदि सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल जाता तो वह सर्वश्रेष्ठ रहता। (नया इंडिया की अनुमति से)
होली जनवादी सर्वहारा राष्ट्रीय त्यौहार है। इस दिन हर भारतीय अपनी असली औकात पर आ जाता है। वह भाषा बोलता है जो अन्दर कहीं ‘मन की बात’ के झूठ का पर्दाफाश करने बीरबल की खिचड़ी की तरह खदबदाती रहती है। पुलिसवाले आसानी से धारा 294 (अश्लील गाली गलौज) तथा 506 (धमकी) किसी भी नागरिक के खिलाफ कायम करते रहते हैं। वही उनका बाल प्राइमर होता है। होली के दिन जनता के लिए ‘मन की बात’ सूख जाती है। थाने के सामने खड़े होकर भी मनचले होली के दिन ‘सौजन्य-सप्ताह’ (?) मनाने वाली पुलिस का उसकी ही भाषा में स्वागत कर लेते हैं। थानेदार भी मंत्रियों की तरह चेहरे पर बेशर्मी का गुलाल मलकर जन-सेवक दिखने का अभिनय करते हैं। खिलाफ बोले गए उद्गारों को अपने चरित्र की गोपनीय रिपोर्ट मान लेते हैं। सडक़ें बदजुबान अश्लील नारों से पटती जाती हैं। महिलाएं और लड़कियां बेचारगी ढोती कटाक्षों को किसी तरह बर्दाश्त करती हैं। हर आदमी अपने चिकने चुपड़े चरित्र का काला निगेटिव हो जाता है। आईना उसकी औकात पर थूकता है। साल भर वह अपने ऊपर मनुष्य होने का नकाब चढ़ाए रहता है।
कहते हैं भक्त प्रहलाद ने ‘आग लगाए जमालो दूर खड़ी’ जैसी बुआ होलिका को औकात बताकर उसकी गोद में बैठकर भी खुद को बचा लिया था। इसलिए हर नागरिक प्रहलाद होली जलाता है। करोड़ों ने खुद को प्रहलाद समझ लिया है जिससे होलिका के भाई की हुकूमत और सरकारी गोद की आग से बच सकें। बहुत अच्छी फसल हुई है। प्रहलादों की खेती की फसल हिरण्यकशिपु के कहने पर दलाल खरीदारों के जिम्मे कर दी गई थी। हुक्मनामा जारी होता रहा है जाओ उन्हें ही फसल बेचो। वही तुम्हारे मालिक हैं। हर प्रहलाद देश का धरती पुत्र है। इसलिए राजकुमार है। उन्हें होलिका फुसलाकर राजधानी की सीमाओं पर बार बार धकेलती रहती है। यह सब राजदरबार के इशारे पर वह करती है।
होलिका ने कलियुग में अपने दो कॉरपोरेटी कारिन्दों के मार्फत सुबह टेलीफोन पर भतीजे प्रहलाद को चुनौती दी कि हिम्मत है तो बचकर दिखाए। प्रहलाद के टेलीफोन नम्बर पर ट्रूकॉलर लगा है। उसने होलिका का फोन रेकार्ड कर लिया। सबसे बड़े मंत्री के घर पहुंचकर रपट लिखाई। मंत्री ने मुस्कराते हुए कहा, ‘टेप रिकार्डर की आवाज साक्ष्य में नहीं मानी जाती। फिर होलिका ने जान से मारने की धमकी तो नहीं दी है। सिर्फ यही कहा है कि हिम्मत है तो बचकर दिखाओ। जाओ हिम्मत बटोरो और बच जाओ।’
मंत्री ने समझाया अब राज्य में यही करना होगा। जिसमें-जिसमें हिम्मत है, अपराधियों से खुद बचें। जो कायर हैं, रपटें लिखाते रहें। जो कम कायर हैं, अपराधियों से पिटते रहें। प्रहलाद ने देखा एक दरबार में जनप्रहलादों के प्रतिनिधियों को हिरण्यकशिपु के सूबेदारों के सुरक्षाकर्मियों ने खुले आम पीटा। जनता ने तो प्रतिनिधियों को विश्वास में चुना था कि वे गाहे बगाहे जनता की रक्षा करेंगे। वे तो खुद ही पिटते रहे। जनता ने चुनने की गलती नहीं की होती तो बेचारे कम से कम पिटते तो नहीं। ओरिजिनल प्रहलाद को लगा सतयुग में होलिका से पंगा लेकर उसने बहुत गलत कर दिया।
प्रहलाद को नारद मुनि के वंशज नाम के एक व्यक्ति ने कहा कि उसे नरसिंह के नए अवतार रामजी के दर्शन करा सकता है। उस व्यक्ति ने ‘जयश्रीराम’ का नारा लगाकर दिखाया कि ये सफेद केश और दाढ़ीधारी व्यक्ति नरसिंह और राम सबके संरक्षक हैं। ये ही राम हैं, ये विष्णु भी हैं, ये नरसिंह भी हैं। प्रहलाद ने कहा ये अवतार तो बूढ़े दिखते हैं। मीडिया ने कहा इनके केश सफेद हैं लेकिन दिल ऐसा नहीं है। जाओ उनकी शरण में जाओ। ध्यान रहे। यह कलियुग है। तुम्हारा सतयुग नहीं, जब तुम्हारे पिता हिरण्यकशिपु ने तुम्हें बर्दाश्त कर लिया। आज अपनी बुआ से पंगा लोगे तो वह सुपारी देकर किसी को भेज देगी।
‘सुपारी’ सुनकर प्रहलाद को लगा धर्म भारतभूमि पर शेष है। उसने पूछा, ‘क्या सुपारी के अलावा श्रीफल, केला और पंचामृत का प्रसाद भी मिलेगा?’ उस व्यक्ति ने बताया नारियल तो भैया नामक नये वंशधारियों के प्रभार में है। वे कहते रहते हैं, ‘आज पांच नारियल टपका डालना है। केले सस्ते हैं लेकिन उनका छिलका महंगा है। केन्द्रीय और सूबाई दरबारी राजपथ पर चलते सत्ता के केले का गूदा खाकर टैक्स के छिलके जनपथ पर बिछा देते हैं। उस पर प्रहलाद बनी जनता फिसलकर गिरती रहे। प्रहलाद! आजकल इन्कमटैक्स, एनआईए, ई.डी., सीबीआई और पुलिस से प्राप्त प्रसाद को पंचामृत कहते हैं। वह प्रसाद महाराज और होलिका के विरोधियों को छककर खिलाया जा रहा है। बोलो प्रहलाद इनमें से कौन सा प्रसाद लोगे? वही खाकर होलिका की गोद में बैठना है।’
दरअसल प्रहलाद अब तक सपना देख रहा था। सपना टूटते ही उसे ख्याल आया उसका बचपन होलिका से बचने दरदर की ठोकरें खाता रहा है। कभी वह बाल मजदूर कहलाता, कभी यौन शोषित होकर धर्म श्लोक पढ़ता, कभी कारखानों, खदानों और खेतों में काम करता रहा है। कभी फटे कपड़े पहने टेनिस कोर्ट पर साहबों को गेंदें उठाकर देता रहा है। कभी भैया लोगों से जेब काटने की ट्रेनिंग लेता रहा है। कभी होटलों में जूठी प्लेटें उठाता उसकी जूठन चाटता भी रहा है।
वह हर हाल में लेकिन होलिका और हिरण्यकशिपु से अब एकबारगी निपट लेना चाहता है। कॉरपोरेटियों, मंत्रियों, अफसरों, ठेकेदारों, साहबों, दलालों की आंखों में होलिका के अट्टहास को वह देख सुन रहा है। होलिका उसे ललकार रही है कि इस बार बचकर तो दिखाए। कहती है कलियुग मे भी भाई हिरण्यकशिपु का राज है। जो विरोध करेगा, उसे न्यायशास्त्री औकात दिखाना शुरू कर चुके हैं। प्रहलाद को अब केवल जनता के मन की अग्नि का भरोसा है। सत्ता के सब नामों के रूपकों और मिथकों ने अपने अपने चरित्र ही बदल लिए हैं। केवल अग्नि ने नहीं बदला है। होलिका की हिंसा के मुकाबले लोकमत की अग्नि के चरित्र की ज्योति प्रज्ज्वलित कर ही हर प्रहलाद अपने को लोहे से इस्पात बना सकता है।


