विचार/लेख
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पिछले कई दिनों से संसद का काम-काज ठप्प है। सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच ठनी हुई है। विपक्ष के दर्जन भर से भी ज्यादा दल मोदी सरकार के विरुद्ध एकजुट होने में लगे हुए हैं। लेकिन मोदी सरकार ने क्या दांव मारा है कि सारा विपक्ष खुशी-खुशी कतारबद्ध हो गया है। अब फर्क करना ही मुश्किल है कि भारत की संसद में कौन सत्तापक्ष है और कौन विपक्ष है ? कौनसा ऐसा मामला है, जिसने दोनों के बीच यह अपूर्व संगति बिठा दी है? वह मामला है— देश के सामाजिक और आर्थिक पिछड़े वर्ग की जनगणना का! पक्ष और विपक्ष दोनों उस 127 वें संविधान के समर्थन में हाथ खड़े कर रहे हैं, जो राज्यों को अधिकार देगा कि वे अपने-अपने पिछड़ों की जन-गणना करवाएं। यह संशोधन सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले को रद्द कर देगा, जिसमें उसने राज्यों को उक्त जन-गणना के अधिकार से वंचित कर दिया था।
अदालत का कहना था कि शिक्षण संस्थाओं और सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने का अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार को ही है। केंद्र की मेादी सरकार ने सोनिया-मनमोहन सरकार के नक्शे-कदम पर चलते हुए जातीय जनगणना पर रोक लगा दी थी लेकिन अब वह क्या करेगी ? अब वह जातीय जनगणना करवाने के लिए भी तैयार हो जाएगी। जैसा कि मैं हमेशा कहता आया हूँ कि हमारे सभी नेता वोट और नोट के गुलाम हैं। यह प्रांतीय जन-गणना इसका साक्षात प्रमाण है। सभी दल चाहते हैं कि देश की पिछड़ी जातियों के वोट उन्हें थोक में मिल जाएं। इसीलिए वे संविधान का भी कचूमर निकालने पर उतारु हो गए हैं। संविधान कहता है कि ''सामाजिक और आर्थिक पिछड़ा वर्गÓ लेकिन हमारे नेता जातियों को ही वर्ग का जामा पहना देते हैं।
क्या जाति और वर्ग में कोई फर्क नहीं है ? यदि सरकारी रेवडिय़ाँ आपको थोक में ही बांटनी है तो आप जन-गणना क्यों करवा रहे हैं ? जब आप गणना कर ही रहे हैं तो हर आदमी से आप उसकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति क्यों नहीं पूछते? आपको एकदम ठीक-ठीक आंकड़े मिलेंगे। उन आँकड़ों के आधार पर आप उन करोड़ों लोगों को शिक्षा और चिकित्सा मुफ्त उपलब्ध करवाइए लेकिन उन्हें आप कुछ सौ नौकरियों का लालच देकर उनकी जातियों के करोड़ों वोट पटाना चाहते हैं। इससे बड़ी राजनीतिक बेईमानी और क्या हो सकती है? देश के किसी भी नेता या पार्टी में इतना नैतिक साहस नहीं है कि वह इस सामूहिक बेइमानी के खिलाफ मुँह खोले। अब यह मांग भी उठेगी कि आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से कहीं ज्यादा हो।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल
बिलासपुर के ज्येष्ठ नागरिक संघ के एक कार्यक्रम में मुझे वरिष्ठजनों के (शेष) जीवन को सार्थक दिशा देने हेतु व्याख्यान के लिए बुलाया गया था। उन्हें मैंने कुछ ‘टिप्स’ दिए लेकिन आप तो जानते हैं कि सूखे पौधे पर पानी देने से कोई खास लाभ नहीं होता बल्कि पानी व्यर्थ चला जाता है किन्तु कुछ अपवाद भी होते हैं।
अगले दिन एक सज्जन जिनकी उम्र अस्सी से अधिक रही होगी, लडख़ड़ाकर चलते हुए मेरी होटल में मुझसे मिलने पधारे। कार्यक्रम की बातों से प्रभावित होकर वे अपनी पारिवारिक समस्या पर मुझसे सलाह लेने आए। वार्तालाप इस तरह था, पढि़ए-
‘मुझे जानते हो?’ उन्होंने मुस्कुराते हुए बात शुरू की।
‘जी, मैं आपको पहचानता हूँ।’ मैंने विनयपूर्वक कहा।
‘कल आपने बहुत अच्छा बोला इसलिए मुझे ऐसा लगा कि मैं अपनी एक व्यक्तिगत समस्या पर आपकी राय लूँ।’
‘आप मुझसे इतने सीनियर हैं, मैं आपको भला क्या राय दे सकता हूँ!’
‘ऐसा मत कहिये।’
‘चलिए, बताइए।’
‘मेरी पत्नी को स्वर्गवासी हुए बहुत समय बीत गया, मेरे साथ बेटा-बहू रहते हैं। बेटा वकालत करता है और बहू तीस किलोमीटर दूर एक सरकारी स्कूल में ‘टीचर’ है।’
‘जी।’
‘बहू रोज सुबह साढ़े नौ बजे हमारे लिए खाना बनाकर नौकरी पर निकल जाती है, बेटा ग्यारह बजे कचहरी चला जाता है। दोपहर एक बजे जब मुझे भूख लगती है तो मैं अपने हाथ से खाना परोसकर खाता हूँ पर ठंडा हो जाने के कारण मुझसे खाया नहीं जाता।’
‘तो, गरम कर लिया करें।’
‘दाल-सब्जी हो जाती है पर रोटी और चावल दोबारा गरम करने में भाता नहीं।’
‘जी, आप ठीक कह रहे हैं,’
‘मैं बहू को समझाता हूँ कि नौकरी छोड़ दे, मेरी पेंशन और बेटे की वकालत से घर चल जाता है परन्तु वह मानती नहीं। बेटा भी अपनी घरवाली की तरफदारी करता है। मैं बहुत दुखी हूँ। असल में मैं शुरू से ही गुस्सैल रहा हूँ, कोई कहना नहीं मानता तो मुझे आग सी लग जाती है।’
‘मेरी राय है कि सबसे पहले आप यह बात समझें कि आपकी पत्नी की तरह कोई दूसरा आपकी देखभाल और सेवा नहीं कर सकता।‘
‘सही है।’
‘अब मैं आपसे एक प्रश्न करता हूँ, घर में आप देवी-देवताओं की पूजा करते हैं या नहीं ?’
‘हाँ, प्रतिदिन करता हूँ।’
‘लक्ष्मीजी और दुर्गाजी की ?
‘हाँ,’
‘तो उनके चित्रों के समीप अपनी बहू का भी चित्र रख लीजिए।’
‘क्यों ?’
‘क्योंकि वे आपके घर में विराजमान साक्षात देवी अन्नपूर्णा हैं। सुबह-सुबह नौकरी पर निकलने के पहले आपके लिए भोजन तैयार करके जाती हैं, सोचिए, वे आपकी कितनी फि़क्र करती हैं!’
‘अरे, इस बात में मेरा कभी ध्यान नहीं गया लेकिन अब मेरी समझ में आ रहा है; लेकिन मैं क्या करूँ, मुझे गुस्सा बहुत आता है।’
‘अब गुस्सा करोगे तो किस पर, अंकल जी ? आपका गुस्सा सहने वाली आपकी पत्नी तो आपको छोडक़र जा चुकी!’ मैंने उनसे कहा। वे जब मुझसे मिलने आए थे तो लडख़ड़ाते हुए आए थे लेकिन जब वापस जा रहे थे तो उनके कदम सधे हुए थे।
(आत्मकथा का एक अंश है यह)
-प्रकाश दुबे
केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर और पश्चिम बंगाल के कृषि मंत्री शोभनदेव चट्टोपाध्याय की मुक्केबाजी के लिए टोक्यो जाने या टीवी खोलने की तकलीफ न करें। विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री ने पश्चिम बंगाल सरकार को खास अंदाज में आड़े हाथों लिया था-दीदी ओ दीदी, किसानों तक सम्मान निधि का पैसा भी नहीं बंटने देतीं। सरकार बनने के बाद शोभनदेव का जवाबी पंच-44 लाख 48 हजार नाम भेजे थे। उनमें से साढ़े नौ लाख नाम अटका दिए। केन्द्र सरकार का अगला पंच-सूची में शामिल किसान सुपात्र हैं या नहीं? हमने इस बात की पड़ताल करने का आदेश जारी किया है। कृषि मंत्रियों की मुक्केबाजी है, सो जबड़ा मंत्री का मार खाएगा। प्रधानमंत्री के भक्तजन और मुख्यमंत्री और बाउल गायक अपने अपने आराध्य के गाल सहलाएंगे। विशेष सूचना- टोक्यो ओलम्पिक के बाद भी खेल जारी रहेगा।
सेल्फ गोल
खेल की दुनिया में अपने पर गोल करने जैसा अपराध कोई दूसरा नहीं। इस पाप को धोने के तरीके पर चक दे इंडिया फिल्म बनी। शिक्षा मंत्रालय के नए खिलाड़ी ने न ओलम्पिक से सबक लिया और न फिल्म से। इतना बड़ा महकमा संभाल रहे हैं। इसके बावजूद केन्द्रीय विद्यालय में ग्यारहवें विद्यार्थी को दाखिला नहीं दिला सकते। दस दाखिलों का अधिकार भी सांसद होने के कारण मिला है। प्रधानमंत्री से लेकर मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के खाते से कानूनन एक भी बच्चे का प्रवेश संभव नहीं। मंत्री, विधायक आदि तरह तरह का कोटा समाप्त करने के आदेश जारी हो चुके हैं। केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री बनने के बाद अर्जुन सिंह ने सांसदों सहित कई लोगों को दाखिले का विशेषाधिकार देकर लुभाने का प्रयास किया था। अर्जुन सिंह सांसदों का प्रधानमंत्री बनने लायक बहुमत नहीं जुटा सके। सच यह भी है कि समर्थ की तुलना में गरीब बच्चे दाखिला-कोटा का क्वचित फायदा उठा पाए। कुछ पाठशालाएं खुलीं। कुछ खुलने वाली हैं। कहोगे-स्कूल चले तुम? मंत्री कहेंगे-दाखिला न दे सकेंगे।
देश की धरती सोना उगले
भारत के कई खिलाड़ी कंगाली और दुश्वारी के बावजूद कमाल करने में कामयाब रहे। उन्हें बधाई देते हुए बता दें कि भारत में भगवान के घर भी कडक़ी आती है। तिरुपति के बालाजी बरस में एक बार पत्नी महालक्ष्मी कोल्हापुरे (कोल्हापुरवासिनी) का कर्ज चुकाते हैं। सबरीमाला में विराजमान अयप्पा स्वामी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। विष्णु के मोहिनी रूप से मोहित शिव के पुत्र हरिहर यानी अयप्पा बचपन में राजपाट छोडक़र वन चले गए। हर साल मकर संक्रांति के अवसर पर पंडालम राजमहल से अय्यप्पा के आभूषणों को संदूकों में रखकर एक भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। नब्बे किलोमीटर की यात्रा तय करके तीन दिन में सबरीमाला पहुंचती है। मकर संक्रांति दूर है। महामारी के कारण अयप्पा देवस्थान छह अरब रुपए के घाटे में है। देवस्थान वालों ने भगवान के बजाय वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन, पेट्रोलियम, रेल आदि महकमों के मंत्रियों वाला शार्ट कट अपनाया। इसे श्रद्धालु जनता पर भाला फेंक दांव का प्रयोग कह सकते हैं। देवस्थानम ने प्रसादम का दाम बढ़ाने का फैसला कर लिया।
मैत्री-मेडल की सेनाबांट
ओलम्पिक खेलों के दौरान कई मार्मिक कहानियां बेपरत हुईं। स्वर्ण पदक विजेता खिलाड़ी ने निर्णायक से पूछा-घायल पराजित प्रतिद्वंद्वी और मैं दोनों स्वर्ण पदक में हिस्सेदारी कर सकते हैं? उसने हामी भरी। खेल की अलग अंदाज़ वाली दिलचस्प कहानी की परतें हम खोले देते हैं। चीन ने कब्जा कितनी जमीन पर छोड़ा, कहां डटा है, सरकार जाने। एक अगस्त को सिक्किम में चीन सीमा पर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने जन्मदिन का जश्न मनाया। चीन के कब्जे से पहले यह तिब्बत-भारत सीमा कहलाती थी। भारत-चीन के कमांडरों ने मिलकर उत्सव मनाया। उपहार के तौर पर दोनों देशों के बीच हाटलाइन शुरु हुई। अनोखी ओलंपिक भावना से गलवान घाटी की शहादत याद करने वाले प्रफुल्लित होंगे। जीत-हार चलती रहती है। बीस लाख सैनिक वाली चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के 94 वें जन्मदिन समारोह की जानकारी भारत की सेनाओं के सभापति (चीफ आफ डिफेंस स्टाफ) जनरल बिपिन रावत को रही होगी।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत के सर्वोच्च न्यायाधीश एन.वी. रमन ने आज भारत की न्याय-व्यवस्था के बारे में दो-टूक बात कह दी है। विज्ञान भवन के एक समारोह में उन्होंने कहा कि भारत के पुलिस थानों में गिरफ्तार लोगों के साथ जैसी बदसलूकी की जाती है, वह न्याय नहीं, अन्याय है। वह न्याय का अपमान है। गरीब और अशिक्षित लोगों की कोई मदद नहीं करता। उन्हें कानूनी सहायता मुफ्त मिलनी चाहिए। उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि वे भी हमारी न्याय-व्यवस्था के अंग है। अदालतों तक पहुँचने का खर्च इतना ज्यादा है और मुकदमे इतने लंबे समय तक अधर में लटकते रहते हैं कि करोड़ों गरीब, ग्रामीण, अशिक्षित लोगों के लिए हमारी न्याय-व्यवस्था बिल्कुल बेगानी बन गयी है।
आजकल तो डिजिटल डिवाइस चली है, वह भी उक्त लोगों के लिए बेकार है। दूसरे शब्दों में हमारी न्याय और कानून की व्यवस्था सिर्फ अमीरों, शहरियों और शिक्षितों के लिए उपलब्ध है। न्यायमूर्ति रमन ने हमारे लोकतंत्र की दुखती रग पर अपनी उंगली रख दी है लेकिन इस दर्द की दवा कौन करेगा ? हमारी संसद करेगी। हमारी सरकार करेगी। ऐसा नहीं है कि हमारे सांसद और हमारी सरकारें न्याय के नाम पर चल रहे इस अन्याय को समझती नहीं हैं। उन्हें सब पता है। लेकिन वे स्वयं इसके भुक्तभोगी नहीं हैं।
वे जैसे ही सत्ता में आते हैं, उन्हें सारी सुविधाएं उपलब्ध होने लगती हैं। वे पहले से ही विशेषाधिकार संपन्न होते हैं। यदि उनके दिल में परपीड़ा होती तो अंग्रेजों के द्वारा बनाए-गए इस सड़े-गले कानून तंत्र को अब तक वह उखाड़ फेंकते। वर्तमान सरकार ने ऐसे कई कानूनों को रद्द करने का साहस जरुर दिखाया है लेकिन पिछले 75 साल में हमारे यहां एक भी सरकार ऐसी नहीं बनी, जो संपूर्ण कानून और न्याय-व्यवस्था पर पुनविर्चार करती। यह तो संतोष और थोड़े गर्व का भी विषय है कि इस घिसी-पिटी व्यवस्था के बावजूद हमारे कई न्यायाधीशों ने सच्चे न्याय के अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। न्याय-व्यवस्था को सुधारने के लिए कुछ पहल एकदम जरुरी हैं।
सबसे पहले तो सभी कानून मूलत: हिंदी में लिखे जाएं। अंग्रेजी का पूर्ण बहिष्कार हो। बहस और फैसलों में भी! ये दोनों वादी और प्रतिवादी की भाषा में हो। वकीलों की लूट-पाट पर नियंत्रण हो। गरीबों को मुफ्त न्याय मिले। हर मुकदमे पर फैसले की समय-सीमा तय हो। मुकदमे अनंत काल तक लटके न रहें। अंग्रेजों के ज़माने में बने कई असंगत कानूनों को रद्द किया जाए। न्यायाधीशों को सेवा-निवृत्ति के बाद किसी भी लाभ के पद पर न रखा जाए ताकि उनके निर्णय सदा निष्पक्षता और निर्भयतापूर्ण हों। न्यायपालिका को सरकार और संसद के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नियंत्रणों से मुक्त रखा जाए। स्वतंत्र न्यायपालिका लोकतंत्र की सबसे मजबूत गारंटी है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-कनुप्रिया
इन्हीं दिनों एक मेनस्ट्रीम हॉलीवुड मूवी देखी जिसमें कहानी में आदिवासियों का पिछड़ापन गुँथा हुआ था। ऐसे सिनेमा का असर इतना बारीक होता है कि दर्शकों को पता ही नहीं चलता कि वो अपने भीतर किन धारणाओं को पक्का कर रहे हैं।
पॉपुलर हॉलीवुड और बॉलीवुड सिनेमा ने आदिवासी समाज की कुछ ऐसी ही खराब छवि बनाई है हमारे दिमागों में कि हम न सच्चाई जानते हैं, न जानना चाहते हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग तो आदिवासी का जिक्र करते ही झिंगालाला हुर्र हुर्र करने लगते हैं।
पिछली सदी से जब आधुनिक समाज ने अपनी ये गत कर ली है कि वो विकास की स्वार्थसिद्धि के लिए प्रकृति पर शासन की जुगत में उससे विरोध लिये बैठा है, और न सिर्फ खुद के लिये बल्कि दूसरे जीव जगत के लिये भस्मासुर बन गया है। और कहीं न कहीं धर्म जाति द्वेष से इंसानों की आँखों पर पट्टी बाँधने का काम कर रहा है ताकि उन्हें अपना विनाश दिख ही न सके। ऐसे में जब आदिवासी समाज से जंगल और जमीन बचाने की आवाजें सुनाई देती हैं और ये उन्हें ही अपराधी घोषित कर देता है, तब लगता है कि आधुनिकता का भरम कितना खोखला और आत्महंता है। जिन आदिवासियों को पॉपुलर माइंडसेट में पिछड़ा, अंधविश्वासी, असभ्य घोषित किया जा चुका है, वो प्रकृति से सामंजस्य स्थापित करके ऐसा जीवन जीना जानते हैं जिनके ऊपर करोड़ों-अरबों खर्च करके विश्व मंचों पर सेमिनार सभाएँ होती हैं और तमाम तरह के ढकोसले होते हैं।
अब जब हमारे लौटने के रास्ते बंद हो गए हैं, तब आदिवासी जिस प्राकृतिक सामंजस्य के साथ जीना जानते हैं और उसका संरक्षण करते हैं वो सिर्फ अपने लिये ही नहीं, कहीं न कहीं हमारे लिये भी जरूरी है।
आज 9 अगस्त नागासाकी दिवस है, नहीं जानती कि आज ही विश्व आदिवासी दिवस क्यों घोषित किया गया, इसके पीछे विश्व की ताकतों की क्या मंशा होगी, मगर एक समाज का मॉडल वो है जिसने हिरोशिमा जैसी तबाही को अंजाम दिया और एक मॉडल आदिवासियों का है। कम से कम दूसरे मॉडल को सम्मान और संरक्षण देने की बात शुरू हुई है, कहीं न कहीं इसका फर्क सरकारों और जनता के आदिवासियों के प्रति रवैये पर भी पड़ेगा, आज पहले विश्व आदिवासी दिवस पर यही उम्मीद लगती है। और डर ये है कि कहीं उनके विकास के नाम पर उन्हें भी उसी विध्वंसक रास्ते पर न डाल दिया जाए जिस पर हम चल पड़े हैं।
अभी कुछ दिनों पहले बस्तर संभाग के एक पुलिस कप्तान ने अधिकृत तौर पर कहा और सरकार को सूचित किया कि इस आदिवासी क्षेत्र में ईसाइयत के पक्ष में तेजी से धर्मांतरण मिशनरियों द्वारा किया जा रहा है। स्वाभाविक ही उसकी पक्ष विपक्ष में काफी प्रतिक्रिया हुई। कुछ अरसा पहले मुझे एक शुभचिंतक पाठक ने भी टेलीफोन पर विस्तार से बस्तर में किए जा रहे धर्मांतरण को लेकर कई बातें बताई थीं। वे भी एक सरकारी कर्मचारी हैं। भारत में अंगरेजी राज आने का यह भी एक असर या अभिशाप हुआ है कि ईसाइयत का धर्मपरिवर्तन के सहारे काफी फैलाव हुआ। हालांकि धर्मातरित ईसाइयों की संख्या अब भी मुख्य अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के मुकाबले बहुत कम है। अंगरेजी हुकूमत ईसाइयत के लिए स्वर्ण युग कहा जाएगा। उसके पहले मुगलिया सल्तनत के रहते अल्पसंख्यक होते हुए भी मुसलमान भारतीय संस्कृति में इस तरह रच बस गए हैं कि उनके उससे अलग होने की न तो कल्पना है और न ही संभावना। विवेकानन्द ने धर्मांतरण के खिलाफ जेहाद बोला ही था। उन्हें अमेरिका में जिस तरह बौद्धिकों और धर्माचार्यों द्वारा जलील भी किया गया। तो उनका झल्लाकर बहुत कुछ कह देना स्वाभाविक था। वैसे रामकृष्ण मिशन बनाने का ख्याल उनके अनुसार उन्हें ईसा मसीह के जन्मदिन ही इलहाम की तरह आया था। इसके बरक्स उन्होंने अपने दोस्त मोहम्मद सरफराज हुसैन को पत्र लिखकर यहां तक कहा कि जिस दिन इस्लामी देह में वेदांती मन होगा। वह धार्मिकता का उदय कहलाएगा। यह बात उन्होंने भारत के संदर्भ में कही थी।
आदिवासियों को दुनियावी कारणों से भले ही ईसाइयत में जबरिया या लालच के आधार पर धर्मांतरित कर लिया जाता रहा हो लेकिन उसे आदिवासी होने की मानसिकता का ईसाइयत में अंतरण नहीं कहा जा सकता। गोविन्द गारे कहते हैं चाहे ईसाई हों या हिन्दू-दोनों ही आदिवासियों के उन्नयन और सुधार के नाम पर उनके अस्तित्व के मूल ढांचे पर आक्रमण करते हैं। उन्हें ऐसी अबूझ स्थिति में धार्मिक कहते हिन्दू या ईसाई बनाते हैं। तब वह आदिवासी की आस्था पर हमला होने से किसी तरह सांस्कृतिक परिवर्तन नहीं कर सकता। ग्रेस कुजूर अपने इंटरव्यू में कहती हैं कि शहरी सभ्यता से दिन प्रतिदिन व्यापक और सघन संपर्क होने के कारण आदिवासियों की बोली, रहन-सहन, भाषा और पहनावे में आधुनिकता के नाम पर हो रहा बदलाव स्वाभाविक है। उस पर रोक लगाने की जरूरत नहीं है। इन सब ऊपरी तत्वों की आड़ में आधुनिक सभ्यता का हमला आदिवासी जीवन के कई प्रतिमानों पर पड़ तो रहा है। इसलिए आदिवासी अपनी मूल अस्मिता सुरक्षित रख पाने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं। बदलाव प्रकृति का नियम होता है लेकिन अपनी जड़ों से उखड़ जाना नहीं।
भारतीय आदिवासी जनमंच के अध्यक्ष विवेक मणि लकड़ा के अनुसार आदिवासियों की सरना संस्कृति गायब होती जा रही है। उनका आरोप है कि आदिवासी समाज बिखरा दिया गया है। इसका लाभ उठाते बड़े पैमाने पर आदिवासियों को ईसाइयत में शामिल किया जा रहा है। आदिवासी समाज कच्चे माल की तरह उपयोग की वस्तु समझा जा रहा है। ब्रिटिश हुकूमत के दिनों में आदिवासियों के सांस्कृतिक जीवन में हस्तक्षेप की प्रक्रिया शुरू हुई थी। जनजातियों की गरीबी के कारण ईसाई मिशनरियों ने उनके बीच धर्मांतरण का कुचक्र चलाया। बड़े पैमाने पर मिशनरियों को सफलता भी मिलती रही। नतीजतन ईसाइयत में तब्दील होती जनजातियों की सांस्कृतिक और सामाजिक आदतों की खाई मूल जनजातियों से बढ़ती गई।
लकड़ा का आरोप है कि ईसाई मिशनरी उग्र, आक्रामक, धर्म प्रचार करते अनापशनाप धन खर्च करते हैं। ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, गुजरात और नागालैंड जैसे कई राज्यों में ईसाई मिशनरियों की गैरजरूरी गतिविधियों के कारण आदिवासियों के आपसी सौहाद्र को खतरा पैदा हो गया है। पूर्वोत्तर प्रदेशों में आदिवासियों की बहुतायत ही है। धर्मांतरण को लेकर वहां कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट मतावलंबियों के बीच भी आपस में भारी हिंसा होती रहती है।
धर्म प्रचार और धर्म परिवर्तन करने के बीच छोटा सा स्पेस है। धर्मांतरण कराने वाले ईसाई मिशनरी जानबूझकर उसे नहीं देखते। उनका मकसद धर्म प्रचार करने की आड़ में आदिवासियों का ईसाइयत में शामिल कर लेना है। इसलिए कई राज्यों ने इस प्रक्रिया को लेकर हस्तक्षेप शुरू किया है। आदिवासी इलाकों में ब्रिटिश हुकूमत के जमाने में ईसाई मिशनरियों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य कई तरह के आवश्यक जीवनयापन के साधनों पर बहुत धन खर्च किया गया। उनकी सेवा भी की। इस वजह से बेहतर जीवन जीने की उम्मीद लिए गरीब आदिवासी ईसाई धर्म की ओर अपने आप आगे होते रहे। उन्हें धीरे-धीरे महसूस होता रहा कि धर्म परिवर्तित करने से उनका जीवन स्तर सुधरा है। उनकी चिंताएं कम हुई हैं। अपने आप अगली पीढिय़ों में ईसाइयत के प्रति आकर्षण भी पैदा होने लगा। वह अस्वाभाविक मानवीय प्रक्रिया नहीं कही जा सकती।
भारत के आदिवासी समुदाय के एकमात्र कार्डिनल आर्चबिशप तिल्सेफर टोप्पो मानते रहे हैं कि जनजातियों के बीच कैथोलिक चर्च अभी शिशु अवस्था में ही है। संकेत है कि चर्च को जनजातियों के बीच आगे बढऩे की संभावनाएं दिखाई दे रही है। भारत सरकार या प्रदेशों की सरकारों ने आदिवासियों के जीवन इंडेक्स के लिए बुनियादी सुविधाएं मुहैया नहीं कराई हैं। आजादी के सत्तर वर्ष बाद भी आदिवासी इलाकों में बदहाली है, कर्ज है, खूब शराबखोरी है, जिस्मखोरी का आलम है। पुलिस, राजस्व, जंगल और उद्योग विभाग सहित सरकारी विभागों के कर्मचारी बादशाहों की तरह आदिवासियों को गरीब कहते सलूक करते हैं। उनकी संपत्ति और अस्मिता तक की लूट हो रही है। आदिवासी ज्ञान पर डाका डाला जा रहा है। नक्सलवाद खत्म करने के नाम पर सुरक्षा सैनिक बड़ी संख्या में तैनात किए जा रहे हैं। वे भी शोषकों के रूप में भी नया चेहरा भारत के इतिहास को दिखा रहे हैं।
संविधान के अनुसार ईसाई धर्म अल्पसंख्यक धर्म है। आदिवासी संवैधानिक रूप से घोषित अल्पसंख्यक नहीं हैं। आदिवासी के ईसाइयत में धर्मपरिवर्तित होने पर उसकी पहचान आदिवासी के रूप में सुरक्षित रहती है। जब वे ईसाइयों के रूप में समाज आचरण करते सरकारों से व्यवहार करते हैं, तो कहते हैं कि हमें अल्पसंख्यक माना जाए। जब संवैधानिक और अन्य तरह की सुरक्षाएं दी जाती हैं, जिसके वे नौकरी, विधायन में निर्वाचन तथा शिक्षा आदि के लिए हकदार हैं, तब कहते हैं हम आदिवासी हैं। ईसाइयत में परिवर्तित हुए सभी ईसाई आदिवासी दोहरा चरित्र जीवन जीने और दोहरे लाभ भी उठाने को मजबूर हैं। इसलिए भी गैरईसाई आदिवासियों और धर्म परिवर्तित आदिवासियों के बीच एक माहौल देश में गर्म हो रहा है। पूर्वोत्तर प्रदेशों में बुनियादी आदिवासी अर्थात् गैरईसाई आदिवासी लगभग खत्म हो चुके हैं। नागालैंड, मिजोरम और मेघालय जैसे राज्य तो ईसाई राज्य ही बन गए हैं। वहां ईसाइयों की आबादी, मसलन मेघालय में लगभग 65 प्रतिशत है और मुश्किल से हिंदू 150 प्रतिशत बचे हैं। नागालैंड में ईसाईयों का प्रतिशत 98 प्रतिशत है और हिंदू आबादी केवल 20 प्रतिशत रह गई है। मिजोरम में भी यही हालात हैं, वहां 850 प्रतिशत ईसाई हैं।
अपनी किताब ‘क्रिश्चियनिटी एंड ट्राइबल रिलीजन इन झारखंड’ में जे. एन. एक्का ने लिखा है कि वर्ष 1850 में पहली बार चार स्थानीय उरांव आदिवासियों को ईसाई बनाया गया। बाद में तीन वापस अपने पुराने धर्म में आ गए। फिर विरोध या सामाजिक बहिष्कार के डर से झारखंड से भाग गए थे। सरना आदिवासी समिति के महासचिव संतोष तिर्की आदिवासियों के ईसाई बनने के खिलाफ हैं। यह भी है कि 1970 के दशक में आदिवासियों के जाने माने नेता कार्तिक उरांव ने संसद में मांग की थी कि ईसाई आदिवासियों को नौकरियों में जनजाति के नाम पर मिलने वाले आरक्षण से बाहर कर देना चाहिए क्योंकि वह दोहरा लाभ लेते हैं। भाजपा और सरना धर्म अनुयायियों सहित कुछ और लोगों का भी तर्क है कि जो आदिवासी ईसाई बन गए हैं, उन्हें जनजातीय संस्कृति और परंपरा से दूर होते देखने पर उन्हें आरक्षण का फायदा नहीं मिलना चाहिए। सवाल संविधान का है। अभी तक कौन आदिवासी है और कौन आदिवासी नहीं है। इसके प्रतिमान तक स्थिर नहीं हुए हैं।
महात्मा गांधी ने कहा है कि ईसाई धर्म प्रचारक कई पीढिय़ों से आदिवासियों की सेवा करते आ रहे हैं, लेकिन मेरी विनम्र समझ में, उनके काम में एक खामी यह है कि आखिर में वे इन भोले-भाले लोगों से ईसाई बनने की उम्मीद करते हैं। यदि ईसाई धर्म प्रचारक भी धर्मान्तरण के मकसद को छोडक़र सिर्फ इंसानी नजरिए से ही उनकी सेवा करें तो कितना अच्छा हो। गांधी ने यह भी कहा कि आप भारत में सच्चे मनुष्यों की खोज करना चाहते हैं और यदि आप उनको पाना चाहते हैं तो आपको गरीबों के झोंपड़ों में जाना होगा और उन्हें कुछ देने के लिए नहीं बल्कि बने तो उनसे कुछ लेने के लिए ही। मुझे आपमें सीखने की नम्रता और भारत के जनसाधारण से तादात्म्य स्थापित करने की इच्छा दिखाई नहीं देती।
ईसाई मिशनरी और ईसाइयत में धमांतरित आदिवासी लोग भाजपा, विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आदि के खिलाफ हिंसा का आरोप लगाते हैं। उनका कहना है ये संस्थाएं ईसाइयों को जबरिया हिंदू धर्म में वापसी कराने तयशुदा अभियान चला रही हैं। ईसाई आदिवासियों और चर्च पर हमलावर होते हैं जिससे डर के कारण हिंदू धर्म में लौट जाने के हालात बनें। ईसाइयत का प्रचार भी रोका जा सके। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री कार्यकाल में राष्ट्रीय स्वयंसेक संघ, विश्व हिंदू परिषद और भाजपा द्वारा हमले लगातार बढ़ रहे हैं। आरोप यह भी है कि जिन राज्यों में भाजपा सरकारें होती हैं, वहां हमले अचानक बढ़ जाते हैं। पुलिस तो कार्रवाई करने से पूरी तौर पर इंकार करती है। इस मुद्दे पर संयुक्त राज्य अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने भारत के खिलाफ प्रतिबंध लगाने की सिफारिश तक की है।
आयोग के नोट में छत्तीसगढ़ के धर्मांतरण विरोधी कानून का विशेष उल्लेख है। झारखंड में भी रघुवर दास सरकार ने धर्मांतरण पर प्रतिबंध लगाने झारखंड रिलिजस फ्रीडम बिल 2017 पास किया था। सरना धर्म को मानने वाले गैरईसाई आदिवासियों का आरोप है कि चर्च उनके खिलाफ साजिश रचता रहता है और उनके धर्म तथा संस्कृति को नुकसान पहुंचाता है जिससे उनकी मौलिकता और पहचान खत्म कर उन्हें जबरन फुसलाया जा सके। धर्म परिवर्तित ईसाई आदिवासियों तथा मूल आदिवासियों में सामाजिक दूरियां लगातार बढ़ती रहती हैं, बल्कि दोनों पक्षों की ओर से बढ़ाई जाती रहती हैं। कुछ धर्मपरिवर्तित ईसाईयों का यह भी कहना है कि हम अपनी जड़ों और संस्कृति से कटे नहीं हैं। हमने केवल परिवेश बदला है। उस बदलाव के बावजूद हम अपनी ही मिट्टी की उपज हैं। हमें शिक्षा, स्वास्थ्य और आधुनिक मूल्यों के प्रति जागरूकता मिली है, लेकिन हम किसी हालत में आदिवासी संस्कृति से अलग या कटे हुए नहीं माने जा सकते। इस सिलसिले में पीडि़त और प्रभावित पक्ष के कई आदिवासी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट तक मुकदमा लेकर गए हैं। उन्हें वहां से कुछ न कुछ अनुकूल आदेश भी मिले हैं। हालांकि उनकी शिकायत है कि आदेश होने के बाद भी सरकार की ओर से कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है।
सरना धर्म को मानने वाले गैरईसाई आदिवासी हैं। उनका आरोप है कि चर्च उनके खिलाफ साजिश रच रहा है और उनके धर्म और संस्कृति को नुकसान पहुंचाता है ताकि उनकी मौलिकता और पहचान खत्म होकर उन्हें जबरन फुसलाया जा सके। धर्म परिवर्तित ईसाई आदिवासियों तथा मूल आदिवासियों के बीच सामाजिक स्तर पर दूरियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। बल्कि दोनों पक्षों की ओर से बढ़ाई जा रही हैं। इसके बरक्स कुछ धर्म परिवर्तित ईसाईयों का कहना है कि हम अपनी जड़ों और संस्कृति से कटे नहीं हैं। केवल परिवेश बदला है, उस प्रभाव के बावजूद हम अपनी ही मिट्टी और परिवेश की उपज हैं। हमें शिक्षा, स्वास्थ्य और आधुनिक मूल्यों के प्रति जागरूकता तो मिली है। लेकिन हम किसी भी हालत में अपनी आदिवासी संस्कृति से अलग या कटे हुए नहीं माने जा सकते। इस सिलसिले में पीडि़त और प्रभावित पक्ष के कई आदिवासी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट तक मुकदमा लेकर गए हैं। उन्हें वहां से कुछ न कुछ अनुकूल आदेश भी मिले हैं हालांकि उनकी शिकायत है कि ऐसे आदेश होने के बाद भी उन पर सरकार की ओर से कोई भी कार्यवाही नहीं की जा रही है।
छत्तीसगढ़ में भी ईसाइयत का धर्मप्रचार होने के साथ साथ आदिवासी इलाकों में धर्मांतरण तो हुआ है। सी.पी. एण्ड बरार प्रदेश रहने के वक्त जस्टिस टी.पी. नियोगी की विस्तृत रिपोर्ट भी इस संबंध में बहुत कुछ कहती है। गांधी के साथ दिलचस्प यह हुआ कि दक्षिण अफ्रीका में उनके ईसा मसीह और ईसाइयत को लेकर व्याख्यान या लेख प्रसारित होते थे। कुछ पादरियों ने मिलकर गांधी को ईसाई बनाना चाहा। उनका एक जत्था उस घर में पहुंचा जहां गांधी रहते थे। घंटों की असफल तकरीर के बाद सबसे बड़े ईसाई पादरी ने बाहर निकलकर अपने कनिष्ठ सहयोगियों से कहा कि इस आदमी को ईसाई बनाने का ख्याल दिमाग से निकाल दो। यह हम तुम सबसे ज्यादा बड़ा मानसिक और आध्यात्मिक समझ में खुद ईसाई है। हिन्दू धर्म को देखने की गांधी की दृष्टि इसीलिए हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई के नारे की राह में गीत गाती थी। इन सबके बावजूद यह इतिहास का सच है कि गांधी ने सबके लिए तो किया लेकिन आदिवासियों के लिए सार्थक कुछ कर सकने का वक्त ने उन्हें मौका नहीं दिया। इसका उन्हें जीवन भर मलाल रहा है। पिछले दिनों कोंडागांव में आदिवासी और गैर आदिवासी के नाम से हुए संघर्ष में अन्य लोगों के अलावा गांधीवादी समझ की मानव अधिकार कार्यकर्ता मेधा पाटकर भी आई थीं। तब भी पुलिसिया और प्रशासनिक विवाद हुए। हिंसक झड़पें हुई। सब मिलाकर आदिवासी तो खरबूजा हैं। हर मजहबी चाकू उनके ऊपर गिरती है और वे ही कटते हैं।
Dowry deaths have persisted in India in spite of laws. Recent revelations of the growth of this crime in Kerala have disturbed the state government and spurred it into thinking of different solutions — out of the box, as it were. It appears that high literacy, as in Kerala, cannot eradicate this evil when values tilt towards materialism and consumerism. These are the causes that the Communist Party of India (Marxist)’s chief whip in Kerala, K.K. Shailaja, mentioned when she suggested that mandatory premarital counselling be introduced to improve understanding between couples and reduce violence against women. Marriage is not a matter of sex and money but a lifelong friendship that must be nurtured. The simplicity of Ms Shailaja’s statement underscored its importance. Society has indeed reduced marriage to a matter of money and sex. This is the approach that young people imbibe from their elders; in an aspirational society thriving on foreign remittance it can have a devastating effect on the value system.
The focus is on dowry. Shahida Kamal, a member of the state women’s commission, suggested that marriage certificates be given after a premarital counselling certificate has been produced. She also suggested that billboards proclaiming that dowry was illegal be put up at public marriage venues, inducing shame. Kerala’s governor said that university students should promise in writing that they would not engage in dowry transactions. But it is the idea of premarital counselling that has most potential, especially because it is not a ‘legal’ solution. Yet, can the State fill society’s lacunae? Violence against women has many causes: dowry is just one of them. Ms Kamal’s emphasis on sex education glances at a part of this truth. But this violence is also a manifestation of society’s misogyny. Therefore, Ms Shailaja’s other suggestions — that panchayats form committees to prevent dowry violence, for example, or that society ensure the punishment of perpetrators — are frankly utopic. Dowry is seldom decided by the groom alone; similarly, those who thrive on a system built on the deprivation of women’s rights, dignity and freedom will not prevent violence against them. Ms Shailaja’s recommendation for premarital counselling, however, could be developed and emulated elsewhere. It could lead to a more educated — not just literate — society. (Editorial of The Telegraph)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
जैसी की आशंका थी, अफगानिस्तान में तालिबान का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है लेकिन दुनिया के शक्तिशाली देश हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। वे अपने-अपने देश और संयुक्तराष्ट्र संघ में बैठकर जबानी जमा-खर्च जमकर कर रहे हैं। मैं पिछले कई हफ्तों से लिख रहा हूँ कि सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता सम्हालते ही भारत को अफगानिस्तान में संयुक्तराष्ट्र संघ की शांति-सेना भिजवाने का प्रयत्न करना चाहिए। यह संतोष का विषय है कि भारतीय प्रतिनिधि ने पहले ही दिन अफगानिस्तान को सुरक्षा परिषद में चर्चा का विषय बना दिया लेकिन हुआ क्या? कुछ भी नहीं। इस अंतरराष्ट्रीय संगठन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। जो भी प्रतिनिधि इस 15 सदस्यी संगठन में बोले, उन्होंने हमेशा की तरह घिसे-पिटे बयान दे दिए और छुट्टी पाई।
सबके बयानों का सार यही था कि वे अफगानिस्तान में चल रही हिंसा और खून-खराबे की भर्त्सना करते हैं और डंडे के जोर पर सत्ता-परिवर्तन के खिलाफ हैं। कुछेक वक्ताओं ने यह भी कहा कि तालिबान की सरकार को वे मान्यता नहीं देंगे। यह उन्होंने ठीक कहा लेकिन काबुल में तालिबान की सरकार 20 साल पहले भी चलती रही थी और उसे किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की मान्यता की जरुरत नहीं थी। अमेरिका में तालिबान के अनौपचारिक राजदूत अब्दुल हकीम मुजाहिद 1999 में न सिर्फ न्यूयार्क में मुझसे गुपचुप मिला करते थे बल्कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के साथ भी लंबी-लंबी बैठकें नियमित किया करते थे। सभी महाशक्तियों ने तालिबान के साथ गुपचुप संबंध बना रखे थे।
भारत के अलावा अफगान मामलों से संबंधित सभी राष्ट्रों ने आजकल तालिबान से खुले-आम संबंध बना रखे हैं। काबुल पर कब्जा करने के बाद उन्हें औपचारिक मान्यता मिलने में देर नहीं लगेगी। भारत ने सुरक्षा परिषद का यह अपूर्व अवसर अपने हाथ से फिसल जाने दिया है। इसकी जिम्मेदारी दिल्ली में बैठे हमारे नादान नेताओं पर है, जिन्होंने विदेश नीति को चलाने का ठेका अफसरों को देकर छुट्टी पा ली है। यदि शांति-सेना का प्रस्ताव पारित हो जाता तो वह किसी के भी विरुद्ध नहीं होता। अफगानिस्तान का खून-खराबा रुक जाता और साल भर बाद चुनाव हो जाता लेकिन अभी तो एक के बाद एक प्रांतों की राजधानियों पर तालिबान का कब्जा बढ़ता जा रहा है और हवाई हमलों में सैकड़ों तालिबान मारे जा रहे हैं। हजारों लोग वीजा के साथ और उसके बिना भी अफगानिस्तान से पलायन कर रहे हैं। कतर की राजधानी में चल रही तालिबान और डॉ. अब्दुल्ला की बातचीत भी अधर में लटक गई है। कतर के विशेष राजदूत भारत आए हुए हैं। पाकिस्तान की दोहरी नीति जारी है। एक तरफ वह खून-खराबे की भर्त्सना कर रहा है और दूसरी तरफ तालिबान लड़ाकों की भरपूर मदद कर रहा है। अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने का यह सुनहरा मौका भारत के हाथ से निकला जा रहा है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
मज़हब के नाम पर कितनी पशुता हो सकती है, इसके प्रमाण हमें अफगानिस्तान और पाकिस्तान, हमारे ये दो पड़ौसी दे रहे हैं। अफगानिस्तान में तालिबान ने सरकार के प्रमुख प्रवक्ता दावा खान मेनापाल की हत्या उस वक्त कर दी, जो नमाज का वक्त था और उन्होंने पख्तिया नामक प्रांत के एक गुरुद्वारे के ध्वज को उतार डाला। कुछ माह पहले उन्होंने एक सिख नेता का अपहरण कर लिया था और काबुल में 20 सिखों को मार डाला था। यह सब कुकर्म इस्लाम के नाम पर किया गया जबकि कुरान शरीफ कहती है कि मजहब के मामले में जोर-जबरदस्ती को कोई जगह नहीं है। पाकिस्तान में तो मजहब के नाम पर क्या-क्या नहीं हो रहा है? पंजाब प्रांत के भोंग शरीफ इलाके में एक गणेश मंदिर को लोगों ने तोडफ़ोड़ कर गिरा दिया।
यह मंदिर उन्होंने इसलिए गिराया कि वे एक आठ साल के हिंदू बच्चे की एक हरकत से नाराज हो गए थे। उस बच्चे ने किसी मदरसे के पुस्तकालय के गलीचे पर पेशाब कर दिया था। हिंसाप्रेमी लोगों का कहना है कि उस पुस्तकालय में पवित्र ग्रंथ रक्खे थे। इस छात्र ने वहाँ पेशाब करके धर्मद्रोह का अपराध किया है। उसे ईश निंदा कानून के तहत गिरफ्तार करवा दिया गया लेकिन उसे अदालत ने जमानत पर रिहा कर दिया। इसी कारण लोगों ने गणेश मंदिर को ढहाकर बदला ले लिया। लोग मंदिर पर घंटों हमला करते रहे और पुलिस खड़े-खड़े देखती रही। यह इस बात का प्रमाण है कि मजहबी उन्माद यदि किसी की मति हर लेता है तो किसी को निकम्मा बना देता है लेकिन सबसे ज्यादा संतोष की बात यह है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और सर्वोच्च न्यायालय ने इन मजहबी उग्रवादियों की कड़ी निंदा की है और उन्हें कठोर सजा दिलवाने का इरादा जाहिर किया है।
पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश गुलजार अहमद ने पंजाब प्रांत के सर्वोच्च पुलिस अधिकारियों को भी न्याय के कठघरे में खड़ा कर दिया है। जज अहमद ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा है कि गणेश मंदिर कांड के कारण सारी दुनिया में पाकिस्तान की बदनामी हुई है। पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र देश है, जो मजहब के नाम पर बना है। वहां तो मजहब के नाम पर ऐसे काम होने चाहिए, जिनसे इस्लाम का मस्तक ऊँचा हो सके। पाकिस्तान के आचरण को देखकर दुनिया के हिंदू, यहूदी, बौद्ध और ईसाई राष्ट्र इस्लाम की अच्छाइयों से सीखने की कोशिश करें लेकिन पाकिस्तान में इस्लाम के नाम पर आतंकवाद को फैलाना, गैर-मुसलमानों को डराना-धमकाना, करोड़ों लोगों को गरीबी की भ_ी में झोंके रखना उसकी मजबूरी बन गई है। पता नहीं, वह पाकिस्तान, जो कभी हमारे परिवार का ही हिस्सा था, वह कभी सभ्य और सुसंस्कृत राष्ट्र की तरह जाना जाएगा या नहीं?
(नया इंडिया की अनुमति से)
-रमेश अनुपम
यह हम सबके लिए एक दुर्लभ संयोग है कि 8 अगस्त को छत्तीसगढ़ के महान सपूत जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’ जी की 162 वीं जयंती है। उनकी जयंती के अवसर पर छत्तीसगढ़ राज्य उनका पुण्य स्मरण करते हुए उनकी स्मृति को सादर नमन करता है।
‘छंद प्रभाकर’ और ‘काव्य प्रभाकर’ जगन्नाथ प्रसाद च् भानु’ की दो अमूल्य कृतियां हैं। ‘छंद प्रभाकर’ की रचना उन्होंने सन 1894 में की थी और ‘काव्य प्रभाकर’ की रचना सन 1905 में।
‘छंद प्रभाकर’ में भानु जी ने छंदों के प्रमुख प्रकार और लक्षण पर विस्तारपूर्वक कार्य किया है। हिंदी के अनेक विद्वान आचार्यों का मानना है कि छंद शास्त्र पर इसकी बराबरी का अन्य कोई ग्रंथ हिंदी में उपलब्ध नहीं है। जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु ’ के इस ग्रंथ को हिंदी साहित्य में अपार ख्याति मिली। इस ग्रंथ के दस संस्करण निकले थे। उस जमाने में किसी ग्रंथ का दस संस्करण निकलना कोई साधारण घटना नहीं है।
‘काव्य प्रभाकर’ को जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु ’ का एक विलक्षण ग्रंथ माना जाता है। यह 800 पृष्ठों का एक वृहद काव्यग्रंथ है। इस ग्रंथ का प्रकाशन सन 1905 में वेंकटेश्वर प्रेस बम्बई द्वारा किया गया था। बाद में इसका प्रकाशन काशी नागरी प्रचारिणी सभा बनारस द्वारा भी किया गया।
‘काव्य प्रभाकर’ को जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु ’ ने बारह मयूखों में विभक्त किया है, जो इस प्रकार है-
1. छंद वर्णन 2.ध्वनि भेद
3. विभाव 4. उद्दीपन विभाव
5. अनुभाव 6. संचारी भाव
7. स्थायी भाव 8. रसवर्णन
9. अलंकार 10. काव्यदीप
11. काव्यनिर्णय 12. लोकोक्ति संग्रह।
जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’ ने तुलसीदास के जीवन पर आधारित अपने ग्रंथ ‘तुलसीतत्व प्रकाश’ में तुलसीदास की संक्षिप्त जीवनी के साथ ही मानस के सातों कांडों का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया है। यह लगभग दो सौ पृष्ठों का एक दुर्लभ ग्रंथ है, जो सन 1931 में जगन्नाथ प्रेस बिलासपुर से प्रकाशित हुआ था।
तुलसी पर ही केंद्रित ‘तुलसीभाव प्रकाश’ उनकी दूसरी प्रसिद्ध पुस्तक है। जिसमें प्रश्न उत्तर शैली में ‘रामचरित मानस’ संबंधी अनेक शंकाओं का समाधान प्रस्तुत किया गया है।
बिलासपुर की उर्वर भूमि और अरपा नदी की अथाह जल राशि को अलविदा कहकर 25 अक्टूबर सन 1945 को भानु सदा-सदा के लिए नील गगन में अस्त हो गए। एक उल्का पिंड सुदूर अंतरिक्ष में कहीं विलीन हो गया।
जगन्नाथ प्रसाद ‘भान’ छत्तीसगढ़ के महान सपूत थे। संपूर्ण हिंदी साहित्य को ‘भानु’ ने अपने ग्रंथों के प्रकाश से आलोकित कर दिया था। उन्होंने ‘छंद प्रभाकर’ और ‘काव्य प्रभाकर’ जैसे बहुमूल्य ग्रंथ लिखकर संपूर्ण देश में हमारे छत्तीसगढ़ का मान बढ़ाया था।
हिंदी साहित्य और छत्तीसगढ़ राज्य उनके बहुमूल्य योगदान को कभी भुला नहीं सकेगा। छत्तीसगढ़ राज्य को अपने इस महान सपूत पर हमेशा गर्व रहेगा।
जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’ जो उर्दू में ‘फैज’ उपनाम से नज्म लिखते थे, उनके द्वारा सन 1911 में लिखित उर्दू संग्रह ‘गुलजारे सुखन’, जिसका दुर्भाग्य से अब तक हिंदी तर्जुमा नहीं हो सका है। मेरी गुजारिश पर बिलासपुर के ही उर्दू प्रोफेसर मरहूम डॉक्टर मोहम्मद खालिद अली इकबाल ने उनकी कुछ रचनाओं का हिंदी तर्जुमा कर मुझे उपलब्ध करवाया था। उसमें से एक गजल यहां प्रस्तुत है-
‘न मिलने के साहब बहाने बहुत हैं
जो मिलने पे आओ ठिकाने बहुत हैं।
बहार आई फूलों से शाखें लदी हैं बहुत बुलबुलें-आशियाने बहुत हैं।
वह तीर व कमां घर से लेकर तो निकलें
बहुत सर व कफ हैं निशाने बहुत हैं।
वह सुनकर मेरा किस्सा-ए-दिल यह बोले
उठा जिंदगी से न तू हाथ ऐ दिल अभी जुल्म उनके उठाने बहुत हैं।
दिल व चश्म-ए-आशिक में घर है तुम्हारा
जिगर व दिल हैं मुश्ताक नजरें मिलाएं
कहा दर्द-ए-दिल मैंने तो हंसके बोले
सुने हमने ऐसे फसाने बहुत हैं।
दर-ए-‘फैज’ अगर फैज है बन्द उनका
तो उठो चलो आस्ताने बहुत हैं।’
(अगले हफ्ते रतनपुर के रत्न साहित्यकार बाबू रेवाराम...)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने भारत के मुसलमानों के नाम आज एक अपील जारी करके कहा है कि वे किसी गैर-मुस्लिम से शादी न करें। यदि वह ऐसा करते हैं तो यह बहुत ही दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण होगा। बोर्ड का पूरा सम्मान करते हुए मैं कहना चाहता हूं कि यदि देश में अंतरधार्मिक, अंतरजातीय और अंतरभाषिक शादियों की बाढ़ आ जाए तो यह देश हिमालय से अधिक सुदृढ़ बन जाएगा। मैं तो वह दिन देखना चाहता हूं कि ऐसी शादियों की संख्या देश में हर साल कम से कम एक करोड़ जरुर हो जाए। प्रेम-सगाई से बड़ी दुनिया में कोई सगाई नहीं हो सकती। उससे बड़ा कोई धर्म-विवाह नहीं हो सकता। यदि भारत में ऐसी शादियों की संख्या बढ़ जाए तो सबसे बड़ा खतरा उन नेताओं के लिए पैदा हो जाएगा, जिनकी राजनीति का आधार सांप्रदायिकता, जातिवाद, प्रांतवाद आदि बना हुआ है। ऐसे नेताओं और पार्टियों को अपनी दुकानें समेटनी पड़ जाएंगी।
इसके अलावा मिश्रित धर्मों और जातियों के लोगों के लिए आरक्षण की पोंगापंथी परंपरा अप्रासंगिक हो जाएगी। ऐसे परिवारों में पैदा हुए बच्चे अपने माता-पिता के धर्मों की अच्छी-अच्छी बातें स्वीकार करेंगे और वे उन धर्मों की गई-गुजरी तथा तर्कहीन पंरपराओं का परित्याग कर सकेंगे। वे अंधविश्वास की बेड़ियों में जकड़े नहीं रहेंगे। इतना ही नहीं, जिन देशों में अब भी आम लोगों पर मजहबों का नशा चढ़ा रहता है, उनमें ऐसे लोगों की संख्या बढ़ेगी, जो दूसरे मजहबों के लोगों के प्रति उदार होंगे। दूसरे शब्दों में धार्मिक साहिष्णुता अपने आप बढ़ेगी। सभी मजहबों के धर्मग्रंथ आप देख डालिए। किसी भी धर्मग्रंथ में आपको यह लिखा नहीं मिलेगा कि आप किस धर्म वाले से शादी करें और किस से न करें? ये धर्मग्रंथ ईश्वर ने बनाए हैं तो वह ईश्वर या अल्लाह ही क्या है, जो अपने बंदों में भेदभाव करे? यों भी वेदों के काल में सिर्फ आर्य थे। यहूदी, बौद्ध, जैन, ईसाई और मुसलमान नहीं थे। ओल्ड टेस्टामेंट के जमाने में पृथ्वी पर कोई ईसाई या मुसलमान भी नहीं था। बाइबिल के जमाने में कोई मुसलमान नहीं था और कुरान जब आई तब अरब देश में कोई हिंदू या सिख भी नहीं था।
इसीलिए धर्म के आधार पर किसी के साथ शादी में परहेज़ की बात बिल्कुल बनावटी लगती है। हां, यदि सिर्फ धर्म-परिवर्तन के इरादे से कोई शादी की जाती है या भय, लालच, ठगी उसके पीछे है तो वह बिल्कुल अनैतिक है। ऐसी शादियां अगर समानधर्मी हैं तो वे भी अनैतिक हैं। मुस्लिम बोर्ड ने देश के मुसलमानों से अनुरोध किया है कि वे अपनी बेटियों को सह-शिक्षा संस्थाओं में न पढाएं और उनकी शादियां भी वे छोटी उम्र में ही करवा दें। देरी न करें। क्यों न करें? क्योंकि फिर कहीं वे स्वेच्छा से अपना पति न चुन लें। हर हिंदू या मुसलमान या ईसाई लड़के और लड़की को उसकी स्वेच्छा से वंचित करके उसे शादी की भट्टी में झोंकना कहां तक उचित है? (नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
यह खुश खबर है कि देश के आठ राज्यों के 14 इंजीनियरिंग कालेजों में अब पढ़ाई का माध्यम उनकी अपनी भाषाएँ होंगी। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की पहली वर्षगांठ पर इस क्रांतिकारी कदम का कौन स्वागत नहीं करेगा? अब बी टेक की परीक्षाओं में छात्रगण हिंदी,मराठी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, गुजराती, मलयालम, बांग्ला, असमिया, पंजाबी और उडिय़ा माध्यम से इंजीनियरी की शिक्षा ले सकेंगे। मातृभाषा के माध्यम का यह शुभ-कार्य यदि 1947 में ही शुरु हो जाता और इसे कानून, गणित, विज्ञान, चिकित्सा आदि सभी पाठ्यक्रमों पर लागू कर दिया जाता तो इन सात दशकों में भारत विश्व की महाशक्ति बन जाता और उसकी संपन्नता यूरोप के बराबर हो जाती। दुनिया का कोई भी शक्तिशाली और संपन्न देश ऐसा नहीं है, जहाँ विदेशी भाषा के माध्यम से पढ़ाई होती हो। हिरन पर घांस लादने की मूर्खता सिर्फ भारत-जैसे पूर्व गुलाम देशों में ही होती है।
इसके विरुद्ध डॉ. लोहिया ने जो स्वभाषा आंदोलन चलाया था, उसका मूर्त रुप अब देखने में आ रहा है। जब 1965-66 में मैंने इंडियन स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ में अपना पीएच.डी. का शोध ग्रंथ हिंदी में लिखने की मांग की थी तो मुझे निकाल बाहर किया गया था। संसद ठप्प हो गई थी लेकिन उसके 50-55 साल बाद अब क्रांतिकारी कदम उठाने का साहस भाजपा सरकार कर रही है। सरकार में दम और दृष्टि हो तो शिक्षा में से अंग्रेजी की अनिवार्य पढ़ाई पर कल से ही प्रतिबंध लगाए और देश के हर बच्चे की पढ़ाई उसकी मातृभाषा में ही हो। अंग्रेजी समेत कई अन्य विदेशी भाषाएं स्वेच्छया पढऩे-पढ़ाने की सुविधाएँ विश्वविद्यालय स्तर पर जरुर हों लेकिन यदि शेष सारी पढ़ाई स्वभाषा के माध्यम से होगी तो यह निश्चित जानिए कि नौकरियों में आरक्षण अपने आप अनावश्यक हो जाएगा। गरीबों, ग्रामीणों और पिछड़ों के बच्चे बेहतर सिद्ध होंगे।
परीक्षाओं में फेल होनेवालों की संख्या घट जाएगी। कम समय में ज्यादा पढ़ाई होगी। पढ़ाई से मुख मोडऩेवाले छात्रों की संख्या घटेगी। छात्रों की मौलिकता बढ़ेगी। वे नए-नए अनुसंधान जल्दी-जल्दी करेंगे। लेकिन भारत की शिक्षा का स्वभाषाकरण करने के लिए सरकार में अदम्य इच्छा-शक्ति की जरुरत है। रातों-रात दर्जनों पाठ्य-पुस्तकें, संदर्भ-ग्रंथ, शब्द-कोश, प्रशिक्षण शालाएँ आदि तैयार करवाने का जिम्मा शिक्षा मंत्रालय को लेना होगा। स्वभाषा में शिक्षण का यह क्रांतिकारी कार्यक्रम तभी अपनी पूर्णता को प्राप्त करेगा, जब सरकारी नौकरियों से अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त होगी। क्या किसी नेता या सरकार में दम है, यह कदम उठाने का? यदि आपने संसद में, अदालतों में, सरकारी काम-काज में और नौकरियों में अंग्रेजी को महारानी बनाए रखा तो मातृभाषाओं की हालत नौकरानियों-जैसी ही बनी रहेगी। मातृभाषाओं को आप पढ़ाई का माध्यम जरुर बना देंगे लेकिन उस माध्यम को कौन अपनाना चाहेगा?
(नया इंडिया की अनुमति से)
भारत में इंटरनेट पर सामान बेचने वाली कंपनी फ्लिपकार्ट को सौ अरब रुपये के जुर्माने का नोटिस भेजा गया है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने यह खुलासा किया है.
रॉयटर्स ने एक रिपोर्ट में तीन सूत्रों और एक अधिकारी के हवाले से लिखा है कि वॉलमार्ट की फ्लिपकार्ट और इसके संस्थापकों को नोटिस भेजकर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने पूछा है कि क्यों ना कंपनी पर सौ अरब रुपये का जुर्माना लगा दिया जाए. यह मामला विदेशी निवेश संबंधित कानूनों के उल्लंघन का है.
ईडी कई साल से फ्लिपकार्ट और एमेजॉन द्वारा विदेशी निवेश के नियमों के उल्लंघन के मामले की जांच कर रहा है. नाम न छापने की शर्त पर ईडी के एक अधिकारी ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया कि फ्लिपकार्ट और संबद्ध पक्ष डबल्यूएस रीटेल ने विदेशी निवेश हासिल किया और फिर अपनी वेबसाइट पर उत्पाद बेचे, जिसकी भारतीय कानून इजाजत नहीं देता. इस बारे में भेजे गए सवालों का ईडी ने फिलहाल जवाब नहीं दिया है.
जुलाई में भेजा गया नोटिस
इस मामले से परिचित तीन और सूत्रों ने बताया कि इस बारे में ईडी ने एक कथित कारण बताओ नोटिस बीती जुलाई में जारी किया था जो चेन्नै स्थित फ्लिपकार्ट के दफ्तर और इसके संस्थापकों सचिन बंसल और बिनी बंसल को भेजा गया था. इस नोटिस में मौजूदा निवेशक टाइगर ग्लोबल का भी नाम था.
इस बारे में सवाल पूछे जाने पर फ्लिपकार्ट के एक प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी भारत के सारे नियम-कानूनों का पालन कर रही है. प्रवक्ता ने कहा, "हम अधिकारियों से पूरा सहयोग करेंगे जो नोटिस के मुताबिक 2009-2015 के दौरान के मामले को देख रहे हैं.”
ईडी अपनी जांच के दौरान इस तरह के नोटिस सार्वजनिक नहीं करता है. एक सूत्र ने कहा कि फ्लिपकार्ट और अन्य के पास इस नोटिस का जवाब देने के लिए 90 दिन का समय है. डब्ल्यूएस रीटेल 2015 में ही भारत से अपना कामकाज समेट चुकी है. टाइगर ग्लोबल ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. सचिन और बिनी बंसल ने भी अभी इस बारे में टिप्पणी नहीं की है.
छोटे विक्रेता नाराज हैं
2018 में वॉलमार्ट ने 16 अरब डॉलर में फ्लिपकार्ट में मुख्य हिस्सेदारी खरीदी थी, जो अमेरिकी कंपनी का अब तक का सबसे बड़ा सौदा था.
फ्लिपकार्ट पहले भी कई मुश्किलों से गुजर रही है. कंपनी के खिलाफ कई मामलों में जांच चल रही है और छोटे विक्रेताओं ने भी बड़ी संख्या में शिकायतें की हैं.
भारत के छोटे विक्रेताओं का कहना है कि एमेजॉन और फ्लिपकार्ट अपने यहां चुनिंदा विक्रेताओं को प्राथमिकता देते हैं और विदेशी निवेश संबंधी कानूनों से बचने के लिए जटिल ढांचे का प्रयोग करते हैं, जिससे छोटे निवेशकों को नुकसान होता है. दोनों ही कंपनियां इन आरोपों को गलत बताती हैं.
भारत में ऑनलाइन रीटेल
भारत में बिजनस टु बिजनस ईकॉमर्स में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश की इजाजत है. भारतीय बाजार में ऑनलाइन रीटेल का दायरा लगातार बढ़ रहा है. इंडिया ब्रैंड इक्विटी फाउंडेशन के मुताबिक 2020 की आखिरी तिमाही में ई-कॉमर्स का आकार 36 प्रतिशत बढ़ा, जिनमें सबसे बड़ा हिस्सा ब्यूटी-वेलनेस से जुड़े उत्पादों का था.
फाउंडेशन का अनुमान है कि 2025 तक भारत में ई-कॉमर्स की ग्रॉस मर्चेंडाइज वैल्यू 4 से 5 अरब अमेरिकी डॉलर तक बढ़ सकती है. 2024 तक भारत का ई-कॉमर्स मार्किट 99 अरब डॉलर का हो जाने का अनुमान है.
वीके/एए (रॉयटर्स)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति परेश उपाध्याय ने एक स्थानीय मामले में ऐसी बात कह दी है, जिससे सिर्फ गुजरात ही नहीं, संपूर्ण भारत का लोकतंत्र मजबूत होता है। उन्होंने गोधरा के एक नागरिक प्रवीणभाई को तो न्याय दिलवाया ही, साथ-साथ उन्होंने देश के नेता और पुलिसतंत्र के कान भी खींच दिए हैं। हुआ यह कि गोधरा के विधायक और जिलाधीश को प्रवीणभाई पर यह गुस्सा था कि वे बार-बार उन पर आरोप लगाते हैं कि वे आम लोगों की शिकायतें भी सुनने को तैयार नहीं होते।
जनता के आवश्यक और वैधानिक काम को पूरा कराना तो और भी दूर की बात है। गोधरा के विधायक और सरकारी अधिकारी उनसे इतने ज्यादा नाराज हुए कि विधायक सी.के. राओलजी के पुत्र से उनके खिलाफ एक प्रथम सूचना रपट (एफआईआर) थाने में दर्ज करवा दी गई। उसी रपट के आधार पर उन्हें एक पुलिस एक्ट के तहत जिला बदर या तड़ीपार या देसनिकाले का आदेश दे दिया गया। प्रवीणभाई को अदालत की शरण में जाना पड़ा। अभी अदालत ने इस मामले में अपना अंतिम फैसला नहीं सुनाया है लेकिन पहली सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति उपाध्याय ने सरकार से कहा है कि ''आपको रजवाड़े नहीं चलाने हैं। यह लोकतंत्र है। आप लोगों को बोलने से नहीं रोक सकते।ÓÓ उन्होंने जिलाधीश और स्थानीय विधायक को फटकार लगाई और कहा कि आपके स्थानीय लोग यदि आपसे सवाल नहीं पूछेंगे तो किससे पूछेंगे?
अपने नागरिकों का पक्ष लेने के बजाय जिलाधीश ने विधायक के बेटे के दबाव में आकर तड़ीपार का आदेश जारी कैसे कर दिया? इस आदेश को जो कि गुजरात पुलिस एक्ट (1951) की धारा 56 (9) के तहत जारी किया गया था, अदालत ने निरस्त कर दिया है। इस धारा के अंतर्गत उन लोगों को शहर या गांव-निकाला दे दिया जाता है, जिनके वहां रहने से सांप्रदायिक दंगों, गुंडई या अराजकता फैलने की आशंका हो। अब इन नेताओं और नौकरशाहों से कोई पूछे कि नागरिकों की शिकायतों, आग्रहों या आरोपों से उनके शहर की कौनसी शांति भंग होती है? हां, उनकी मानसिक शांति जरुर भंग होती है।
इसीलिए किसी मतदाता की व्यक्तिगत शिकायत सुनना और उसे दूर करना तो बड़ी बात है, आजकल जनता दरबार की परंपरा भी लगभग समाप्त है। मैं तो कहता हूं कि प्रधानमंत्री और सभी मुख्यमंत्री सप्ताह में एक-दो दिन खुला जनता-दरबार जरुर लगाएं, ऐसा पक्का प्रावधान सारे देश में लागू किया जाए। चुने जाने के बाद सभी नेताओं का रंग बदल जाता है। वे जनसेवक से जनमालिक बन जाते हैं। वे जनता के नौकर बनने की बजाय नौकरशाहों के नौकर बन जाते हैं। नौकरशाहों और नेताओं की जुगलबंदी के नक्कारखाने में जनता की आवाज मरियल तूती बनकर रह जाती है। अगर कोई तूती थोड़ा भी बोल पड़ती है तो नेता और नौकरशाह की मिलीभगत उसका गला दबाने के लिए टूट पड़ते हैं।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-एकलव्य
अस्ल में भारतीय दर्शक 'कुछ ऐसा कर कमाल कि मैं तेरा हो जाऊं' मोड में रहने वाले दर्शक हैं। काश कुछ ऐसा कमाल हो जाता कि पुरुष हॉकी टीम जीत जाती, काश कुछ ऐसा कमाल हो जाता कि महिला हॉकी टीम जीत जाती, काश नीरज चोपड़ा एक हजार मीटर दूर भाला फेक देते, काश कोई कमाल हो जाता और रवि दहिया रूस के पहलवान को फाइनल में ऐसा पटकते कि वो चारो खाने चित्त हो जाता!
हमारे इस 'काश' और 'कमाल' की सूची अंतहीन है और प्रत्येक ओलंपिक में दरअसल बस यही एक एक काश आह में बदलकर हमें निराश करता है।
महिला हॉकी टीम की एक प्लयेर के घर टीवी नहीं है, आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इन्हें कितनी विश्वस्तरीय सुविधाएं मिल रही होंगी लेकिन काश कुछ ऐसा कमाल हो कि टीम जीत जाए।
ओलंपिक में मनु भाकर की पिस्टल का बैरल टूट जाता है/ट्रिगर में खराबी आ जाती है, कोच और खिलाड़ियों के बीच समन्वय की इतनी कमी होती है कि वो एक दूसरे को देखना तक नहीं चाहते लेकिन काश कोई कमाल हो जाता और वो जीत जातीं।
मीराबाई चानू को एक समय तक डाइट के बारे में ही नहीं पता होता है, वो बताती हैं कि घर पर सबको लगता था कि सब्जी रोटी अपने आप में पूरी डाइट है। अब इससे समझिए कि सरकार इन खिलाड़ियों पर कितना समय और कितना पैसा खर्च करती है। लेकिन नहीं, काश कोई ऐसा कमाल हो जाता कि मीराबाई एक ही बार में इतना वजन उठा देंती कि कोई अन्य खिलाड़ी सौ पचास सालों तक उनके करीब न पहुंच पाता।
खिलाड़ियों के अभाव के किस्से जिनपर हमें लज्जित होकर नजरें झुका लेनी चाहिए उनका हम पोस्टर बनाकर फेसबुक, ट्विटर रंग देते हैं। मने आप सोचिए कि कायदे से अभी इस देश ने यह तक नहीं सीखा है कि कौन सी बात शर्म की है और कौन गर्व की।
देश की बेशर्म सरकार खेलों के लिए आवंटित राशि कम कर देती है जो कि पहले ही अपर्याप्त थी लेकिन काश कोई कमाल हो जाता और गोल्ड मेडल की बारिश हो जाती और फिर प्रधानमंत्री सबके साथ कुल्फी खाते हुए फ़ोटो पोस्ट करते।
खैर, आप भारतीय महिला टीम के प्रत्येक खिलाड़ी के बारे में पढ़िए और सरकार ने इन खिलाड़ियों पर कितना खर्च किया यह पता करिये अंत में आपको लगेगा कि इन लड़कियों का यहां तक का सफर अजूबा वाला ही रहा है जो इन्होंने केवल और केवल अपने दम पर तय किया है।
अब तक भारत के लिए टोक्यो ओलंपिक में पदक हासिल करने वाली सभी खिलाड़ी महिलाएं हैं. इतना ही नहीं ओलंपिक में भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन की पूरी सूची देखें तो पिछले 8 में से 6 ओलंपिक मेडल लड़कियों ने जीते हैं.
डॉयचे वैले पर अविनाश द्विवेदी की रिपोर्ट
भारत ने अब तक टोक्यो ओलंपिक में तीन मेडल सुरक्षित कर लिए हैं. भारोत्तोलन में साइखोम मीराबाई चानू ने रजत पदक जीता. इसके बाद बैडमिंटन में लगातार दूसरी बार पीवी सिंधू ने पदक जीता. इस बार सिंधू को कांस्य से संतोष करना पड़ा हालांकि साल 2016 के रियो ओलंपिक में उन्होंने रजत पदक हासिल किया था. तीसरा पदक सुनिश्चित करने वाली खिलाड़ी हैं, मुक्केबाज लवलीना बोरगोहेन.
इसका मतलब कि अब तक भारत के लिए टोक्यो ओलंपिक में पदक हासिल करने वाली सभी खिलाड़ी महिलाएं हैं. वहीं महिला हॉकी टीम ने तो पहली बार ओलंपिक के सेमीफाइनल में पहुंचकर इतिहास रच दिया है. इतना ही नहीं ओलंपिक में भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन की पूरी सूची देखें तो पिछले 8 में से 6 मेडल लड़कियों ने जीते हैं जबकि अब भी ओलंपिक में भेजे जाने वाले भारतीय दल में महिलाओं और पुरुषों की संख्या बराबर नहीं हुई है.
भारत की ओर से भी जिन खिलाड़ियों का दल ओलंपिक में भेजा गया है, उसके 127 खिलाड़ियों में से 56 महिलाएं और 71 पुरुष खिलाड़ी हैं. यानी महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 45 फीसदी है. वहीं अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी (IOC) ने बताया है कि ओलंपिक में इस बार कुल खिलाड़ियों में से 49 फीसदी महिलाएं हैं, जबकि रियो ओलंपिक में 45 फीसदी खिलाड़ी महिलाएं थीं. ग्रेट ब्रिटेन जैसे देशों ने तो इस बार पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा महिलाओं को ओलंपिक में भेजा है.
मानसिक मजबूती
जानकार कहते हैं कि अगर प्रैक्टिस की बात करें तो ओलंपिक के लिए पुरुष और महिला एथलीट्स की प्रैक्टिस एक ही तरह से हुई है. सभी को एक जैसी सुविधाएं ही उपलब्ध कराई जा रही हैं. हालांकि खेल पत्रकार प्रत्यूषराज कहते हैं, "फिर भी एक वजह हो सकती है, जहां थोड़ा अंतर आ सकता है. वह है, मानसिक मजबूती. हम जानते हैं कि 'ओलंपिक' खेल की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा है और इसमें खिलाड़ियों पर जबरदस्त दबाव होता है. यह दबाव कई बार गलतियां भी करवाता है लेकिन जो खिलाड़ी इससे पार पा जाता है, वह बेहतरीन प्रदर्शन करता है. पीवी सिंधू के लगातार दो ओलंपिक खेलों में मेडल हासिल करने के मामले में हम यह बात देख सकते हैं."
हालांकि वह यह भी कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि सभी महिला खिलाड़ियों पर मानसिक दबाव का असर नहीं होता. उनके मुताबिक तीरंदाज दीपिका कुमारी को कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में बेहतरीन प्रदर्शन करते देखा गया है लेकिन ओलंपिक में वह इतनी प्रभावशाली होकर नहीं उबर पातीं. ऐसा ही मनु भाकर और कमलप्रीत कौर के साथ हुआ है.
कमलप्रीत कौर ने क्वॉलिफायर में जो प्रदर्शन किया वह उनका व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था और उन्हें मेडल दिलाने के लिए पर्याप्त था लेकिन वे इसे फाइनल में नहीं दोहरा सकीं. फिर भी काफी हद तक पुरुष खिलाड़ियों की अपेक्षा महिला खिलाड़ियों ने मानसिक मजबूती का बेहतर परिचय दिया है.
बढ़ी प्रतिभागिता भी जिम्मेदार
खेल पत्रकार नीरू भाटिया जरा अलग रुख रखती हैं. वह कहती हैं, "सबसे बड़ा अंतर प्रतिभागिता का है. जैसे-जैसे एथलीट्स में महिलाओं की संख्या बढ़ रही है, उसी हिसाब से उनके मेडल भी बढ़ रहे हैं. हर साल किसी एक खेल प्रतियोगिता में महिलाएं पहली बार आ रही हैं. ऐसा भी नहीं कि वे वाइल्ड कार्ड एंट्री हैं, वे इसलिए आ रही हैं क्योंकि उन्होंने क्वॉलीफाई किया है. इस साल जो काम तलवारबाजी में भवानी देवी ने किया, पिछली बात जिम्नास्टिक्स में दीपिका कर्माकर ने किया था. उससे पहले मुक्केबाजी के लिए मैरीकॉम ने किया था. उससे पहले रेसलिंग के लिए फोगाट बहनों ने किया था जबकि तब महिलाओं के लिए कुश्ती जैसे खेल अच्छी नजरों से नहीं देखे जाते थे."
भाटिया कहती हैं, "ऐसे में अगर अभी तक अगर सिर्फ महिलाओं ने ही मेडल जीते हैं तो यह उनकी बढ़ी प्रतिभागिता का नतीजा है और एक संयोग मात्र है." नीरू भाटिया सहित ज्यादातर जानकार मानते हैं कि महिलाओं के मेडल उनके समाज में हर तरह से हो रहे विकास और शिक्षा में बढ़ोतरी से भी जुड़े हुए हैं. अब कई तरह की रुढ़ियां धीरे-धीरे मिट रही हैं.
हरियाणा से आने वाली लड़कियों के मेडल इसका नतीजा हैं. वहीं पहले के मुकाबले अब कई आर्थिक रूप से कमजोर घरों की लड़कियां भी ओलंपिक में जबरदस्त प्रदर्शन कर रही हैं. कमलप्रीत कौर, सविता पूनिया, रानी रामपाल और नेहा गोयल जैसी खिलाड़ी ऐसे ही परिवारों से आती हैं.
बराबरी के अलावा अवसर भी
जानकार बताते हैं कि पहले जहां ओलंपिक में भारत के पदकों को 'हिट बाई ट्रायल' यानी तुक्का मान लिया जाता था, अब ऐसा नहीं रहा. स्थिति काफी बदल चुकी है. जो खिलाड़ी पदक हासिल कर रहे हैं, वे लगातार बड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपना प्रदर्शन दोहरा रहे हैं. खिलाड़ियों की फिटनेस और डाइट की ट्रेनिंग भी अच्छी हुई है. ओलंपिक के लिए अब सालों-साल तैयारी होती है.
जानकारों के मुताबिक महिला एथलीट भी इस प्रक्रिया से लाभ पा रही हैं. और अगर वे बहुत अच्छा प्रदर्शन करती हैं तो उन्हें पर्सनल कोच और अन्य सुविधाएं भी सरकार की ओर से उपलब्ध कराई जाती हैं. पीवी सिंधू और एमसी मैरीकॉम जैसे खिलाड़ी इसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं. हालांकि उनके मुताबिक अब भी भारत को इस दिशा में लंबी दूरी तय करनी है. ऐसा नहीं होता तो इस बार टेनिस के महिला सिंगल्स प्रतियोगिता के लिए ओलंपिक में भेजने के लिए कोई न कोई महिला खिलाड़ी जरूर मौजूद होती. (dw.com)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीशकुमार बड़े मजेदार नेता हैं। वे कई ऐसे अच्छे काम कर डालते हैं, जिन्हें करने से बहुत-से नेता डरते रहते हैं। अपने देश में कितने मुख्यमंत्री हैं, जो जनता दरबार लगाने की हिम्मत करते हैं? आम आदमी का तो उनसे मिलना ही मुश्किल होता है। उनके टेलिफोन ऑपरेटर और निजी सचिव ही ज्यादातर लोगों को टरका देते हैं लेकिन एक जमाना था जबकि इंदिरा गांधी, चौधरी चरणसिंह, चंद्रशेखर, विश्वनाथप्रताप सिंह और राजीव गांधी प्रधानमंत्री निवास पर अक्सर जनता दरबार लगाते थे। कोई भी नागरिक वहां पहुंचकर अपने दिल का दर्द बयान कर देता था।
न सिर्फ उसकी शिकायत को ध्यान से सुना जाता था, बल्कि उसके समाधान के आदेश भी तुरंत जारी किए जाते थे। कल पटना में नीतीश के जनता दरबार में ऐसे कई किस्से सामने आए। कुछ नागरिकों ने कहा कि अफसरों ने हमसे रिश्वतें मांगी और जब हमने कहा कि ये बात हम मुख्यमंत्री को बताएंगे तो अफसरों ने कहा कि जाओ, चाहे जिसको बताओ। यहां तो पैसा धरो और काम करवाओ। नीतीश ने अपनी सरकार के मुख्य सचिव और अन्य अधिकारियों से ऐसे सभी मामलों पर तुरंत सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए। करीब तीन साल पहले पटना में नीतीशजी से मैंने कहा भाई, आपने सारे बिहार में शराबबंदी लागू कर दी लेकिन पटना के पांच सितारा होटल में मद्यपान जारी है।
अब गरीब ग्रामीण लोग लुटेंगे और मंहगी शराब पीने के लिए पटना आएंगे। उन्होंने तुरंत आदेश देकर पटना में भी शराबबंदी लागू करवा दी। इसी प्रकार जब वे रेलमंत्री थे तो इन्होंने मेरे सुझाव पर रेल के हर कार्य में हिंदी को पहले और अंग्रेजी को पीछे कर दिया। इसी तरह से पत्रकारों के पूछने पर उन्होंने पेगासस-जासूसी पर भी ऐसी बात कह दी, जिस पर सभी भाजपा-गठबंधन के नेता चुप्पी साधे हुए हैं। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर संसद में बहस क्यों न हो? उन्होंने टेलिफोनी-जासूसी पर अपनी बात इस अदा से कही जैसे प्रदेशों में ऐसी कोई जासूसी होती ही नहीं है। वे संयुक्त संसदीय समिति की छानबीन को भी टाल गए लेकिन उनके यह कहने के ही कई अर्थ लगाए जा रहे हैं।
कुछ लोगों की राय है कि नीतीश अब कहीं विपक्ष से हाथ मिलाने की तैयारी तो नहीं कर रहे हैं ? उनको पल्टा खाने में जऱा भी देर नहीं लगती! वे कब किसके साथ हो जाएं, कुछ पता नहीं। उनकी सबके साथ पट जाती है। उनकी जातीय जनगणना की मांग का भी अर्थ यही लगाया जा रहा है कि वे देश के सभी अनुसूचितों और पिछड़ों को अपने साथ जोडऩा चाहते हैं। उनके इसी तेवर की व्याख्या करते हुए कुछ लोग उन्हें अगला प्रधानमंत्री घोषित करने की कोशिश कर रहे हैं। अच्छा हुआ कि नीतीश ने इस कपोल-कल्पना का दो-टूक खंडन कर दिया, वरना बिहार में उनका मुख्यमंत्री पद भी खटाई में पड़ सकता था।
(नया इंडिया की अनुमति से)
- राजेंद्र चतुर्वेदी
1- विशाखापट्टनम स्टील प्लांट में 35 हजार कर्मचारी हैं, और उसकी परिसंपत्ति लगभग 3 लाख करोड़ रुपए की है। यह कंपनी लगभग तीन हजार करोड़ सालाना का मुनाफा कमाती है। इसे मोदी सरकार केवल 1300 करोड़ में बेच रही है।
2- भारतीय जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी में करीब डेढ़ लाख कर्मचारी हैं। एलआईसी के पास लगभग सात लाख करोड़ की प्रॉपर्टीज हैं। एलआईसी लगभग 50 हजार करोड़ रुपए का सालाना मुनाफा कमाती है। मोदी सरकार इसकी 25 फीसदी हिस्सेदारी 74 हजार करोड़ में बेचेगी, अगले साल मार्च तक आईपीओ आ जाएगा।
3- भारत पेट्रोलियम कारपोरेशन लिमिटेड यानी बीपीसीएल के पास 10 लाख करोड़ से ज्यादा की प्रॉपर्टीज हैं। लगभग 5 हजार लोग इसमें प्रत्यक्ष नौकरी करते हैं, जबकि अपने 7986 (सात हजार नौ सौ छियासी) पेट्रोल पंप और लगभग 10 हजार एलपीजी एजेंसियों के जरिए ये कंपनी कितने लोगों को रोजगार देती होगी, इसका गणित लगाते रहिए। ये कंपनी बिकने के लिए तैयार है। ये कंपनी ज्यादा से ज्यादा चार लाख करोड़ में बिकेगी।
विकास की ये तीनों कहानियां मार्च-2022 तक पूरी हो जाएंगी।
नोट-इरडा की वेबसाइट पर जाकर सर्च कर लीजिएगा। निजी बीमा कंपनियों का क्लेम सेटलमेंट का रेशियो अधिकतम 62 परसेंट है।
यानी, अगर 100 पॉलिसीहोल्डर क्लेम करते हैं तो निजी बीमा कंपनियां केवल 62 लोगों का क्लेम स्वीकार करती हैं, 38 लोगों को टरका देती हैं।
जबकि एलआईसी का क्लेम सेटलमेंट रेशियो 99.97 फीसदी है। यानी एक हजार में से तीन लोग ऐसे होते हैं, जिनका क्लेम एलआईसी सैटिल नहीं करती।
क्लेम और पॉलिसी के मैच्योर होने का फर्क तो आप जानते ही हैं। यहां मैच्योरिटी की नहीं, क्लेम की बात की जा रही है।
ये बात इसलिए की गई है, ताकि निजीकरण का सपोर्ट करने अगर कोई पॉलिसीहोल्डर सज्जन इस पोस्ट पर पधारें तो उन्हें एक बार यह सोचने का मौका मिले कि कहीं ऐसा न हो कि वे भी असमय अनंत की यात्रा निकल जाएं और इधर मृत्यु लोक में उनके बीवी बच्चों को क्लेम के सैटिलमेंट के लिए धक्के खाने पड़ें और फिर भी हाथ में कुछ न आए।
भाई, जीवन का क्या ठिकाना। ऐसा भी नहीं है कि आप सपोर्टर हैं, तो निजी बीमा कंपनियां आपके बीवी बच्चों का क्लेम सैटिल कर देंगी। न, उनके लिए सब धान 22 पसेरी है।
-डॉ. राजू पाण्डेय
जैसे जैसे चुनाव निकट आते हैं साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने वाले कुछ गैर जरूरी मुद्दे विमर्श में तैरने लगते हैं।पहले सत्ताधारी दल के नेताओं-मंत्रियों के भड़काने वाले आक्रामक बयान आते हैं। फिर उन पर विरोधी दलों के नेताओं एवं अन्य कट्टरपंथी धर्मगुरुओं द्वारा सतही व उग्र प्रतिक्रियाएं दी जाती हैं। इस प्रकार मीडिया समूहों को मुर्गों और तीतरों की लड़ाईनुमा बहसों के आयोजन का अवसर मिल जाता है। कभी कभी इस प्रहसन को अधिक विश्वसनीय बनाने के लिए सरकार कुछ विवादित नीति संबंधी घोषणाएं करती है। हम सब इस प्रक्रिया के अभ्यस्त हो चुके हैं।
किंतु वर्तमान उत्तरप्रदेश चुनाव एक ऐसा अवसर है जब जनसंख्या नियंत्रण जैसे आवश्यक मुद्दे का चुनावी उपयोग करने की कोशिश में उसे विवादित और गैरजरूरी बना दिया गया है। इससे यह बोध होता है कि सरकार जनसंख्या स्थिरीकरण के प्रति जरा भी गंभीर नहीं है और उसका सारा ध्यान वोटों की राजनीति पर है।
मोदीजी ने 6 फरवरी 2013 को दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा था- 'मेरा देश दुनिया का सबसे नौजवान देश है। हमारी 65 प्रतिशत जनसंख्या 35 साल से नीचे है। यूरोप बूढ़ा हो चुका है, चीन बूढ़ा हो चुका है। भारत विश्व में सबसे नौजवान देश है, इतने बड़े अवसर का हम उपयोग नहीं कर पा रहे हैं, यह सबसे बड़ी चुनौती है।" तब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद नवंबर 2014 में अपनी ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान उन्होंने कहा-"मुझे विश्वास है 35 साल से कम उम्र के 80 करोड़ भारतीय युवाओं के हुनर और ऊर्जा से हर भारतीय के भविष्य को बेहतर बनाया जा सकता है।" हाल ही में 16 जनवरी 2021 को कोविड टीकाकरण अभियान का शुभारंभ करते हुए आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने कहा कि जिस बड़ी आबादी को लोग भारत की सबसे बड़ी कमजोरी बता रहे थे वही सबसे बड़ी ताकत बन गयी। पुनः 17 फरवरी 2021 को नैसकॉम के टेक्नोलॉजी एवं लीडरशिप फोरम को संबोधित करते हुए मोदी जी ने कहा- भारत की इतनी बड़ी आबादी आपकी बहुत बड़ी ताकत है।बीते महीनों में हमने देखा है कि कैसे भारत के लोगों में टेक सॉल्यूशन्स के लिए बेसब्री बढ़ी है।"
प्रधानमंत्रीजी के इन सारे संबोधनों में हमारी जनसंख्या और विशेषकर युवा जनसंख्या को हमारी शक्ति बताया गया है। अपवाद स्वरूप स्वतन्त्रता दिवस 2019 का उद्बोधन है जिसमें उन्होंने कहा- "चुनौतियों को स्वीकार करने का वक्त आ चुका है। उसमें एक विषय है जनसंख्या वृद्धि। हमारे यहाँ बेतहाशा जनसंख्या विस्फोट हो रहा है। यह हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए नए संकट पैदा कर रहा है। हमारे देश में एक जागरूक वर्ग है जो इसे भली भांति समझता है।…….ये सभी सम्मान के अधिकारी हैं, ये आदर के अधिकारी हैं। छोटा परिवार रखकर भी वह देश भक्ति को ही प्रकट करते हैं।…...समाज के बाकी वर्ग, जो अभी भी इससे बाहर हैं, उनको जोड़कर जनसंख्या विस्फोट- इसकी हमें चिंता करनी ही होगी।"
क्या इन उद्धरणों को पढ़ने के बाद हमें यह मान लेना चाहिए कि जनसंख्या के महत्वपूर्ण और जटिल प्रश्न पर प्रधानमंत्री जी दुविधा में हैं। अभी तक वे यह तय नहीं कर पाए हैं कि हमारी विशाल जनसंख्या वरदान है या अभिशाप। यदि इन परस्पर विरोधी कथनों में प्रधानमंत्री जी को कोई सामंजस्य दिखाई देता है तो उन्हें इस बारे में विस्तार से बताना चाहिए। क्या यह प्रधानमंत्री जी के असमंजस का ही परिणाम है कि वर्तमान परिस्थितियों के मद्देनजर जनता के साथ संवाद करके राष्ट्रीय स्तर पर जनसंख्या स्थिरीकरण की कोई व्यापक, दबाव रहित, सर्वस्वीकृत नीति तैयार नहीं की गई है? 2020 में सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर केंद्र सरकार ने कहा कि सन 2000 की जनसंख्या नीति के अनुसार 2018 में टोटल फर्टिलिटी रेट 3.2 फीसदी से घटकर 2.2 फीसदी रह गई है। इस कमी के कारण देश में दो बच्चों की नीति नहीं आ सकती है। क्या केंद्र सरकार का अभिमत अब बदल गया है? क्या देश में जनसंख्या वृद्धि के पैटर्न में कोई ऐसा असाधारण बदलाव आया है जिससे केंद्र सरकार ही परिचित है? कहीं ऐसा तो नहीं है कि आदरणीय प्रधानमंत्री जी जानते हैं कि जनसंख्या स्थिरीकरण का लक्ष्य जल्द ही प्राप्त हो जाएगा किंतु चुनावी राजनीति की मजबूरियां उन्हें इस मुद्दे को जीवित रखने पर मजबूर कर रही हैं? उत्तरप्रदेश सरकार की जनसंख्या नीति क्या केंद्र की सहमति से बनाई गई है और क्या यह पूरे देश की नीति बन सकती है? देश के अनेक राज्यों यथा- राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, ओडिशा आदि में अधिक संतानें होने पर विभिन्न स्तर के स्थानीय चुनावों में भाग लेने पर प्रतिबंध, सरकारी नौकरी की पात्रता गंवा देना तथा सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित कर दिया जाना जैसे प्रावधान पिछले अनेक वर्षों से हैं। किंतु केवल उत्तरप्रदेश की जनसंख्या नीति को ही चर्चा में बनाए रखने का मकसद क्या है?
यदि हम पिछले कुछ वर्षों में सत्ताधारी दल और उसकी विचारधारा का समर्थन करने वाले नेताओं-बुद्धिजीवियों-धर्मगुरुओं के बयानों का अध्ययन करें तो हमें जनसंख्या विषयक उनके दृष्टिकोण का ज्ञान होगा।
फरवरी 2015 में साध्वी प्राची ने अपने पूर्व के विवादित बयान जिसमें उन्होंने प्रत्येक हिन्दू महिला को चार बच्चे पैदा करने की सीख दी थी पर स्पष्टीकरण दिया। उन्होंने किसी समुदाय विशेष का नामोल्लेख किए बिना ही कहा कि जो लोग जो 35-40 पिल्ले पैदा करते हैं, फिर लव जेहाद फैलाते हैं। उन पर कोई बात नहीं करता है। किंतु मेरे बयान के बाद इतना बवाल मच गया।
अगस्त 2016 में आगरा में प्राध्यापकों के प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने जनसंख्या के बारे में एक बयान दिया था जिस पर काफी विवाद हुआ। बाद में संघ ने ट्विटर पर अपनी सफाई में कहा- एक सवाल पूछा गया था कि भारत में हिंदुओं की ग्रोथ 2.1 प्रतिशत है और मुसलमानों की 5.3 प्रतिशत। अगर जनसंख्या की यही रफ़्तार जारी रही तो अगले 50 साल में क्या ये देश इस्लामिक देश नहीं बन जाएगा? भागवत जी ने इसका जवाब दिया, भारत में कौन सा क़ानून हिंदुओं को अधिक बच्चे पैदा करने से रोकता है?"
प्रश्न में दिए गए आंकड़े भ्रामक थे और आदरणीय भागवत जी का उत्तर अनेकार्थक।
अक्टूबर 2016 में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा हिंदुओं की जनसंख्या में लगातार कमी आ रही है। हमें जनसंख्या बढ़ाने के लिए कोई भी कानून रोक नहीं सकता।देश के आठ राज्यों में हिन्दुओं की जनसंख्या निरन्तर घटती जा रही है। हिन्दुओं को अपनी जनसंख्या को बढ़ाने की जरूरत है।
दिसंबर 2016 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के समर्थन से नागपुर में आयोजित तीन दिवसीय धर्म संस्कृति महाकुंभ में ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य वासुदेवानंद सरस्वती ने कहा कि देश में हिंदुओं की जनसंख्या तेजी से घट रही है। ऐसे में प्रत्येक हिंदू दंपत्ति को 10-10 बच्चे पैदा करना चाहिए।
जनवरी 2017 में साक्षी महाराज ने मेरठ में एक संत सम्मेलन में कहा था- देश में बढ़ती जनसंख्या के कारण समस्याएं खड़ी हो रही हैं। लेकिन इसके लिए हिन्दू जिम्मेदार नहीं हैं, इसके लिए वे लोग जिम्मेदार हैं जो चार बीवियों और चालीस बच्चों की बात करते हैं। जनवरी 2015 में भी उन्होंने ऐसे ही विचार व्यक्त किए थे तब उन्होंने कहा था कि चार बीवियों और 40 बच्चों का चलन भारत में चलने वाला नहीं है। अब समय आ गया है कि हिंदू धर्म को बचाने के लिए हर हिंदू महिला कम से कम चार बच्चे पैदा करे।
जनवरी 2018 में अलवर राजस्थान से भाजपा के विधायक श्री एम एल सिंघल ने कहा- हिन्दू केवल एक या दो बच्चों को जन्म दे रहे हैं और इस बात के लिए चिंतित हैं कि उनका लालन पालन कैसे करें जबकि मुसलमान देश पर कब्जा करने के ध्येय से ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा कर रहे हैं।
उत्तरप्रदेश के भाजपा विधायक श्री सुरेंद्र सिंह ने जुलाई 2018 में "हम दो हमारे पांच" का नारा दिया। उन्होंने हिंदुओं को जनसंख्या नियंत्रण के खिलाफ सतर्क करते हुए कहा कि जनसंख्या नियंत्रण में यदि संतुलन नहीं रहा तो वह दिन दूर नहीं जब जनसंख्या के आधार पर भारत में हिन्दू अल्पसंख्यक हो जाएंगे।
भोपाल से भाजपा सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने दिसंबर 2020 में सीहोर में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि यह कानून उन लोगों पर लागू होना चाहिए जो राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में शामिल रहते हैं। राष्ट्र की रक्षा क्षत्रिय करते हैं, उन्हें अधिक से अधिक संख्या में बच्चे पैदा करना चाहिए। साध्वी ने क्षत्रियों से अधिक संतानें पैदा करने की अपील की।
फरवरी 2021 में बिहार के बिस्फी विधानसभा क्षेत्र के विधायक हरिभूषण ठाकुर ने कहा कि बिहार में प्रजनन दर में कमी अवश्य आई है किंतु ऐसा केवल हिन्दू परिवारों में हुआ है। कुछ लोग अपनी जनसंख्या बढ़ा कर देश पर कब्जा कर उसे इस्लामिक राष्ट्र में तब्दील करना चाहते हैं।
जून 2021 में असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व शर्मा ने कहा हमारे प्रदेश में मुस्लिम आबादी 29 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है जबकि हिंदुओं के लिए यह दर 10 प्रतिशत है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि मुस्लिम समुदाय जनसंख्या नियंत्रण के उपायों को अपनाए।
जुलाई 2021 में मध्यप्रदेश के मंदसौर के भाजपा सांसद सुधीर गुप्ता ने कहा कि देश की आबादी को असंतुलित करने में आमिर खान जैसे लोगों का हाथ है।
जुलाई 2021 में ही करणी सेना प्रमुख सूरज पाल अमू ने हरियाणा के पटौदी शहर में एक महापंचायत में युवाओं से अपील करते हुए कहा कि वे जनसंख्या नियंत्रण क़ानून की चिंता न करें और मुसलमान समुदाय की जनसंख्या के जवाब में 20 बच्चे पैदा करें।
इसी जुलाई 2021 में बीजेपी नेता ज्ञानदेव आहूजा ने जनसंख्या नियंत्रण बिल पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि एक समुदाय विशेष ने जनसंख्या बढ़ाने का निश्चय कर लिया है। हमें दिल्ली और बंगलोर के दंगे जैसी घटनाओं को यदि रोकना है तो हमें जनसंख्या पर नियंत्रण करना ही होगा।
16 जुलाई 2021 को विहिप महासचिव मिलिंद परांडे ने मीडिया से चर्चा करते हुए कहा ‘जब हम जनसंख्या नियंत्रण के विषय में चर्चा करते हैं, तो देश में हिंदू समाज का प्रभुत्व बरकरार रहना चाहिए। हिंदू आबादी के प्रभुत्व के कारण देश में राजनीति, धर्मनिरपेक्षता और सहिष्णुता के समस्त सिद्धांतों का पालन किया जा रहा है।’
क्या सरकार इन बयानों से सहमत है? यदि नहीं तो क्या वह इनकी निंदा करेगी और बयान देने वालों को पार्टी से बाहर किया जाएगा?
कट्टरपंथी शक्तियां पिछले कुछ वर्षों से सुनियोजित रूप से जनसंख्या विषयक भ्रम फैलाती रही हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं-
मुस्लिम समुदाय अपनी जनसंख्या योजनाबद्ध रूप से बढ़ा रहा है। उसका इरादा भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने का है। हिन्दू अब देश में अल्पसंख्यक हो जाएंगे।
मुस्लिम समुदाय अपनी आबादी के अनुपात में सरकारी योजनाओं, सरकारी नौकरियों तथा प्राकृतिक संसाधनों का अधिक फायदा उठा रहा है।
जिन स्थानों पर मुस्लिम आबादी अधिक है वहाँ मुस्लिम जनप्रतिनिधि ही जीतते हैं। जबकि हिन्दू बहुल आबादी वाले स्थानों में दोनों को बराबर मौका मिलता है।
देश के पिछड़े और वंचित समुदाय के लोग अधिक बच्चे पैदा करते हैं। देश के आम(सवर्ण) करदाता के पैसों पर इन्हें मुफ्त भोजन-आवास-चिकित्सा मिलती है और आरक्षण के बल पर नौकरी। यह सवर्णों का हक मारते हैं। जब तक इन्हें मिलने वाली सरकारी सहायता बन्द नहीं होगी तब तक न जनसंख्या नियंत्रित हो सकती है न देश का विकास हो सकता है।
देश में बेरोजगारी के लिए वंचित समुदाय और मुस्लिम समुदाय जिम्मेदार हैं क्योंकि यह अधिक बच्चे पैदा करते हैं। सरकार कितना भी रोजगार पैदा करे कम पड़ जाता है।
देश के पिछड़ेपन और गरीबी के लिए देश की तेजी से बढ़ती जनसंख्या उत्तरदायी है न कि सरकार की नीतियां।
इन भ्रमों का निवारण करने के लिए हमें कुछ तथ्यों का ज्ञान होना चाहिए। भारत अब जनसंख्या विस्फोट की स्थिति से बाहर आ चुका है। वैश्विक स्तर पर जनसंख्या को स्थिर करने हेतु 2.1 प्रतिशत की प्रजनन दर को रिप्लेसमेंट रेट माना गया है। अर्थात यदि एक महिला औसतन 2.1 बच्चे पैदा करेगी तो विश्व की जनसंख्या स्थिर बनी रहेगी।
हमारे पास एनएफएचएस 5 के नवीनतम आंकड़े आ चुके हैं। एनएफएचएस 5 के तहत प्रथम चरण में जिन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों का सर्वेक्षण किया गया उनमें से लगभग सभी में एनएफएचएस 4 के बाद से कुल प्रजनन दर में कमी आई है। एनएफएचएस-5 के अनुसार देश की कुल प्रजनन दर 2.2 है।
कुल 22 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में से 19 में प्रजनन दर घटकर (2.1) पर आ गई है। केवल 3 राज्यों- मणिपुर (2.2), मेघालय (2.9) और बिहार (3.0) में यह दर अभी भी निर्धारित प्रतिस्थापन स्तर से ऊपर है।
गर्भनिरोधक प्रसार दर में अधिकांश राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में काफी वृद्धि हुई है। यह हिमाचल प्रदेश और पश्चिम बंगाल (74%) सर्वाधिक है। प्रायः समस्त राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में गर्भनिरोध के आधुनिक तरीकों के उपयोग में वृद्धि देखी गई है।
एनएफएचएस 5 के आंकड़े कट्टरपंथी ताकतों द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम को पूरी तरह खंडित कर देते हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के अनुसार नौ राज्यों(आंध्र प्रदेश, गोआ, गुजरात, बिहार, हिमाचल प्रदेश,जम्मू कश्मीर, कर्नाटक एवं केरल) में से सिर्फ दो राज्यों में ही मुस्लिम समुदाय में प्रजनन दर रिप्लेसमेंट रेट से अधिक है। ये राज्य केरल (2.3) और बिहार (3.6) हैं।
हेमंत बिस्व शर्मा के दावे के विपरीत एनएफएचएस 2005-06 की तुलना में 2019-20 में असम में मुस्लिमों की प्रजनन दर में असाधारण कमी देखने को मिली है। असम में मुस्लिम समुदाय में कुल प्रजनन दर 2.4 है, जबकि साल 2005-06 में यह 3.6 थी। वर्तमान प्रजनन दर रिप्लेसमेंट स्तर से जरा सी ही अधिक है।
एनएफएचएस के नवीनतम आंकड़े उस उक्ति को सिद्ध करते हैं कि विकास सर्वश्रेष्ठ गर्भनिरोधक है। बिहार जैसे राज्यों में खराब विकास सूचकांकों के कारण हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के लिए प्रजनन दर अधिक है। बेहतर विकास सूचकांकों के साथ जम्मू कश्मीर में दोनों समुदायों की प्रजनन दर कम है। साक्षरता एवं सामाजिक आर्थिक पिछड़ेपन का स्तर, ग्रामीण अथवा शहरी इलाकों में निवास ऐसे कारक हैं जिनका प्रजनन दर से सीधा संबंध है। यह सौभाग्य की बात है कि हमारे देश के निवासी परिवार बढ़ाने के विषय में कट्टर धर्मगुरुओं की बिल्कुल नहीं सुनते।
यदि किसी राज्य में मुसलमानों की प्रजनन दर अधिक है तो इससे केवल यह सिद्ध होता है कि वे विकास के हर मानक पर पीछे हैं। उनका पिछड़ापन न कि धार्मिक कट्टरता उनकी अधिक प्रजनन दर का कारण है। सरकारी नौकरियों और संसद-विधानसभाओं में उनकी भागीदारी उनकी जनसंख्या के अनुपात में नहीं है। मुस्लिम बहुल इलाकों से मुस्लिम जनप्रतिनिधियों के जीतने की वायरल पोस्ट्स फैक्ट चेक में अधिकांशतया झूठी पाई गई हैं। इनमें कहीं जनसंख्या के प्रतिशत से छेड़छाड़ की गई है तो कहीं जनप्रतिनिधियों के नाम से। उन बहुत से निर्वाचन क्षेत्रों का जिक्र नहीं है जहाँ मुस्लिम बहुल आबादी से हिन्दू जनप्रतिनिधि जीतते रहे हैं। कई इलाकों में दोनों समुदायों के जनप्रतिनिधि बारी बारी से जीतते हैं क्योंकि जनता हर चुनाव में दूसरे दल को चुनती है।
2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में मुस्लिम आबादी 14.2 प्रतिशत थी। 2019 के लोकसभा चुनावों में राजनीतिक दलों ने केवल 8 प्रतिशत मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट दिया था। यह 2014 के 10 प्रतिशत से भी कम है। मई 2019 के पूर्व देश के सभी 28 राज्यों में हुए अंतिम दौर के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने केवल 22 मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट दिया था जिसमें से केवल 3 को जीत मिली। इन राज्यों में बीजेपी के 1282 विधायक हैं।
एनएफएचएस 5 के आंकड़े अप्रत्याशित नहीं हैं। पूर्व के आंकड़ों से तुलना करने पर दोनों समुदायों की प्रजनन दर में लगातार क्रमिक गिरावट दिखाई देती है। 2011 की जनगणना के आंकड़े भी यही संकेत देते हैं। स्वयं केंद्र सरकार की इकॉनॉमिक सर्वे रिपोर्ट 2018-19 में “वर्ष 2040 में भारत की जनसंख्या” नामक अध्याय में यह बताया गया है कि भारत के दक्षिणी राज्यों एवं पश्चिम बंगाल, ओडिशा, महाराष्ट्र, असम, पंजाब, हिमाचल प्रदेश में जनसंख्या वृद्धि की दर 1 प्रतिशत से कम है। जिन राज्यों में जनसंख्या वृद्धि की दर अधिक थी, वहां भी इसमें कमी देखने में आई है। बिहार, उत्तरप्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में तो खासकर जनसंख्या वृद्धि दर में अच्छी गिरावट आई है। आने वाले दो दशकों में जनसंख्या वृद्धि की दर तेजी से कम होगी और अनेक राज्य तो वृद्धावस्था की ओर अग्रसर समुदाय का स्वरूप ग्रहण कर लेंगे। यह सर्वे रिपोर्ट नीति निर्माताओं को यह सुझाव देती है कि वे वृद्धावस्था की ओर अग्रसर समाज के लिए नीतियां बनाने हेतु तैयार रहें।
जहां तक मुस्लिम समुदाय के इस देश में बहुसंख्यक बनने का प्रश्न है प्यू इंटरनेशनल की 2015 की जिस रिपोर्ट का हवाला कट्टरपंथियों द्वारा दिया जाता है उसके अनुसार भी वर्ष 2050 तक मुस्लिम जनसंख्या देश की कुल आबादी के 18.4 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी।
देश की जनसंख्या नीति अब तक सहमति और जनशिक्षण पर आधारित थी, यदि इसका स्वरूप दंडात्मक बना दिया जाएगा तो यह स्त्रियों के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। कन्या भ्रूण की हत्या के मामलों में वृद्धि तथा असुरक्षित गर्भपात के मामले बढ़ सकते हैं, लिंगानुपात गड़बड़ा सकता है।
उत्तर प्रदेश सरकार की जनसंख्या नीति विभिन्न समुदायों के मध्य "जनसंख्या संतुलन" स्थापित करने का लक्ष्य रखती है। क्या सरकार तथ्यों के आधार पर नहीं बल्कि उस परसेप्शन के आधार पर चल रही है जो उसकी राजनीति के अनुकूल है। यह आशंका बनी रहेगी कि "जनसंख्या संतुलन" लाने के बहाने अल्पसंख्यक समुदाय को प्रताड़ित किया जा सकता है। चरम निर्धनता के शिकार, अशिक्षित, सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों से सब्सिडी छीनना, उन्हें राशन से वंचित करना तथा उन पर जुर्माना लगाना अनुचित एवं अमानवीय है।
जनसंख्या नियंत्रण के संबंध में जो भी नीति बनाई जाती है उसका आधार प्रादेशिक विकास परिदृश्य होना चाहिए न कि कुछ धार्मिक समुदायों के विरुद्ध तथ्यहीन दुष्प्रचार।
यह दुष्प्रचार बहुसंख्यक समुदाय के कुछ कट्टरपंथियों को परपीड़क आनंद अवश्य दे सकता है। वे इस कल्पना से आनंदित हो सकते हैं कि अल्पसंख्यक समुदाय ऐसी किसी जनसंख्या नीति से अधिक पीड़ित होगा।
सरकार को यह समझना होगा कि जनसंख्या के विमर्श में धर्म की एंट्री का एक ही परिणाम हो सकता है, वह है जनसंख्यात्मक वर्चस्व स्थापित करने के लिए अपने धार्मिक समुदाय की आबादी बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा।
सभी धर्मों में गर्भ निरोधकों आदि के प्रयोग और संतानोत्पत्ति पर वैज्ञानिक नियंत्रण का निषेध किया गया है। विभिन्न धर्मों के कुछ प्रगतिशील व्याख्याकारों ने जनसंख्या नियंत्रण विषयक कुछ धार्मिक दृष्टान्त तलाशे हैं किंतु यह उन धर्मों के मूल भाव से असंगत हैं और इनसे उन प्रगतिशील व्याख्याकारों की सदिच्छा ही झलकती है।
महिलाएं अपने परिवार के आकार और दो संतानों के बीच अंतर को तय करने की निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखी जाती हैं। परिवार नियोजित रखने की पूरी जिम्मेदारी महिलाओं पर थोप दी गई है। चाहे वह गर्भनिरोधकों के प्रयोग के आंकड़े हों या फिर नसबंदी के आंकड़े - जनसंख्या नियंत्रण में पुरुषों की भागीदारी नगण्य है। यहाँ तक कि सरकारी बजट में भी पुरुष नसबंदी हेतु नाममात्र का प्रावधान किया जाता है। सरकार को जनसंख्या के विमर्श को पितृसत्ता की जकड़ से बाहर निकालना चाहिए।
सरकार को यह स्वीकारना होगा कि भारत के जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम का स्वैच्छिक प्रजातांत्रिक स्वरूप भारत की जनसंख्या में एक संतुलित कमी लाने में सहायक रहा है, यही कारण है कि हमारी 65 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम आयु की है। जबकि चीन में जहाँ पर दबाव आधारित वन चाइल्ड पालिसी अपनाई गई वहां की जनसंख्या असंतुलित रूप से कम हो गई और एक बड़ी आबादी समृद्धि के दर्शन करने से पूर्व ही वृद्ध होने वाली है।
(रायगढ़, छत्तीसगढ़)
-अपराजिता
सोनीपत की रहने वाली हॉकी खिलाड़ी निशा अहमद वारसी उस टीम का हिस्सा हैं जो ओलंपिक के लिए चुनी गई है लेकिन यहां तक पहुंचने का उनका सफर आसान नहीं रहा है। बेहद कड़े संघर्ष के बाद वह यहां तक पहुंची हैं।
वे ऐसे परिवार से ताल्लुक रखती हैं जहां बेटियों को घर से बाहर निकलने की इजाजत नहीं होती थी लेकिन कड़ी मेहनत और संघर्ष के बाद निशा बेड़ियां तोड़कर ओलंपिक पहुंच चुकी हैं। निशा एक मुस्लिम परिवार की बेटी है और प्रैक्टिस के शुरुआती दिनों में उन्हें हिजाब पहनकर मैदान पर भेजा जाता था लेकिन कोच प्रीतम के कहने पर परिवार ने उन्हें बाकी लड़कियों की तरह खेलने की इजाजत दी। उसके बाद उनकी जिंदगी बदल गई।
निशा के परिवार पर वर्ष 2016 में ऐसा संकट आया कि रोटी तक के लाले पड़ गए। इस वर्ष निशा के पिता पैरालाइज हो गए, जिसके बाद एक बार खुद शबराज अहमद को लगा कि बेटी का खेलना छूट जाएगा, लेकिन इस बार जिम्मेदारी निशा की मां ने उठाई। उनकी मां के सामने चार बच्चों का पेट पालने का संकट खड़ा हो गया। निशा की मां महरूम ने हिम्मत नहीं हारी और फैक्ट्री में कार्य जारी रखा। साथ ही निशा की प्रैक्टिस भी चलती रही। निशा के पिता 2016 के बाद से कोई कार्य नहीं कर पा रहे हैं।
ओलंपिक के लिए महिला हॉकी टीम में चुनी गई महिला खिलाड़ियों में से एक इस निशा का परिवार शहर के कालूपुर में महज 25 गज जमीन बने मकान में रहता है। इससे पहले निशा का परिवार महिला हॉकी की स्टार खिलाड़ी नेहा गोयल के पड़ोस में किराए पर रहता था। उस समय नेहा का भी संघर्ष का दौर था। नेहा की मां और निशा की मां एक साथ फैक्ट्री में कार्य करती थी। इस बीच नेहा ने निशा को भी हॉकी मैदान पर ले जाना शुरू कर दिया। निशा ने एक बार हॉकी स्टिक संभाली तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।
निशा के पिता एक कपड़े की दुकान पर दर्जी का काम करते थे। निशा ने हॉकी स्टिक संभाली तो मां-पिता दोनों ने अपनी जरूरतों व ख्वाबों का त्याग कर दिया। पिता किराए के मकान की बजाय खुद का घर खरीदना चाहते थे लेकिन बेटी को हॉकी खिलाड़ी बनाने के लिए उन्होंने इस सपने को छोड़ दिया।
पिता शबराज अहमद की मानें तो उनका सपना था कि बेटी टीवी पर खेलती दिखाई दे, जिसे पूरा देश देखे, उनका यह सपना अब पूरा होने जा रहा है।
नौ जुलाई 1997 को सोनीपत के कालूपुर में जन्मीं निशा रेलवे में बतौर क्लर्क के पद पर तैनात हैं और रेलवे की तरफ से ही वो हॉकी खेलती हैं। वह 2017 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे बड़े टूर्नामेंट में भारतीय हॉकी टीम का हिस्सा रह चुकी हैं। निशा रेलवे की टीम में मिड फील्डर और कवर के रूप में खेलती हैं। वह डिफेंडर और एग्रेसिव खेल के लिए जानी जाती हैं। उनके एग्रेसिव खेल के आगे विरोधी टीम के खिलाड़ी पस्त हो जाते हैं।
निशा की मां का कहना है कि उन्हें अपनी बेटी की इस उपलब्धि पर बहुत गर्व है और अब वो देश के लिए गोल्ड मेडल जरूर लेकर आएंगी।
-दिनेश श्रीनेत
अगर आपका लिखा चोरी होने लगे तो यह सोचकर खुश हुआ जा सकता है कि आखिरकार आप लोकप्रिय होने लगे हैं। तारीफ करने की बजाय लोग आपकी तारीफ को खुद के लिए हासिल करना चाहें और उसके लिए उनके पास सबसे अच्छा शॉर्टकट आपका लेखन हो तो क्या ही बात है।
वैसे भी अपने लिखे पर स्वामित्व इतना आसान नहीं है, जब जमीनों पर इतनी लिखा-पढ़ी और बाउंड्री खींचने के बाद कब्जा हो जाता है तो भला शब्दों की क्या औकात है। दार्शनिक नजरिए से देखें तो एक मतलब यह भी हुआ कि आपके लिखे में कुछ ऐसा है जो आपको अमरत्व की तरफ ले जा सकता है। आपको तो लोग भूल जाएंगे मगर आपका लिखा ऐसे ही चुराते रहे तो कब से कम वो तो जि़ंदा रहेगा। शंकर शैलेंद्र के शब्दों में कहें, ‘मैं न रहूँगी तुम न रहोगे, फिर भी रहेंगी निशानिय’ आपकी भाषा, शैली, विचार इस तरह दूसरों की भाषा, शैली और विचार में घुलमिल जाएंगे जैसे पानी में ऑक्सीजन। यह सोचकर संतोष होगा कि चलो अब मैं अपनी वॉल तक सीमित नहीं रहा। अपनी चुराई पोस्ट को पढ़ते हुए ‘गाइड’ फिल्म का डायलॉग दुहरा सकते हैं, ‘सिर्फ मैं हूँ, मैं हूँ, मैं सिर्फ मैं।’
लेकिन हम सब हैं तो अंतत: इंसान ही। इतना बड़ा दिल हर किसी का नहीं होता है। अपने लिखे पर किसी और का नाम देख कलपने लगता है। जिन छोटे शहरों में टूरिस्ट ज्यादा आते हैं, वहां लस्सी, लड्डू और पेठे की लोकप्रिय दुकानों का तो ये हाल होता है कि मिलते-जुलते नामों की ढेरों दुकानें खुल जाती हैं। थक हार कर असली वालों को लिखना पड़ता है-‘यह है असली वाली दुकान’ या फिर ‘नक्कालों से सावधान।’ मजा यह है कि जो नक्काल होते हैं वो भी बोर्ड ठोंक देते हैं, ‘नक्कालों से सावधान।’ अब करते रहिए असली और नकली का फर्क।
पहले पॉपुलर जासूसी और सामाजिक उपन्यास लिखने वालों के साथ भी यही दिक्कत होती थी। उसी लेखक के नाम से कई और किताबें बाजार में आ जाती थीं। असली लेखक की पहचान के लिए किताबों पर उसकी टोपी वाली या चश्मे वाली फोटो लगाई जाती थी। बाद के दौर में ‘होलोग्राम स्टीकर’ आ गए। मगर सोशल मीडिया में तो होलोग्राम लग नहीं सकता। वैसे हाल के दिनों के एक बेहद लोकप्रिय साहित्यिक लेखक ने अपना खुद का लोगो भी बना लिया है। वे संभवत: दुनिया के इकलौते लेखक हैं जिनका अपना लोगो भी है।
प्रिंट से निकलकर ब्लॉगिंग का दौर आया तो चोरियां और आसान हो गईं। बिजली के बल्ब और भाप के इंजन के बाद अगर कोई सबसे क्रांतिकारी आविष्कार हुआ तो वह था ‘कंट्रोल सी’। इसने लेखकों और पत्रकारों का जीवन बहुत आसान कर दिया। न कहीं आना न जाना, न जानकारी जुटाने का झंझट, न किताबें के पन्ने पलटना, न सोचने विचारने की जहमत उठाना... बस ‘कंट्रोल सी’ और फिर ‘कंट्रोल वी’।
जिन दिनों मैं लखनऊ एक अखबार में काम करता था, वहां के एक रिपोर्टर ने ‘कंट्रोल सी’ को बहुत अच्छे से साध रखा था। उसने सबसे कोने की सीट चुनी थी। वह कंप्यूटर के पीछे बैठा चुपचाप आने-जाने वालों को देखता रहता था। और देखते-देखते उसकी 700 शब्दों की स्टोरी इंचार्ज के पास पहुँच जाती थी। मगर हर जगह कुछ खुराफाती तत्व होते हैं। उन्होंने इंटरनेट से निकाले गए प्रिंट आउट को अखबार में छपी स्टोरी के साथ नत्थी करके संपादक तक पहुँचा दिया।
हालांकि इस तरह की हरकतों से वे उसकी प्रतिभा को दबा नहीं सके। वह बहुत जल्दी सब एडीटर से डीएनई बन गया। वहीं पुराने घिसे-पिटे तरीके से एक-एक खबर पर मेहनत करने वाले यूँ ही घिसते रहे। ‘कंट्रोल सी’ से बचने के लिए लोगों ने ‘कॉपीस्केप’ और ‘राइट क्लिक डिसएबल’ जैसे युक्तियां अपनाईं मगर कोई लाभ नहीं हुआ। एक वक्त तो ऐसा आया कि इंटरनेट की दुनिया में ‘कंट्रोल सी जेनरेशन’ एक बहुत ही पॉपुलर शब्द बन गया था।
अगर कोई यह सोचता है कि नकल करना बहुत आसान काम है तो यह गलतफहमी है। नकल करने के लिए जितने धैर्य और सूझबूझ की जरूरत होती है, वह आसान नहीं है। पुरानी हिंदी फिल्में जब हॉलीवुड की नकल करती थीं, तो हीरो के घूंसे पर हॉलीवुड वाला विलेन जितनी बार पलटी खाता था, क्या मजाल कि हमारा विलेन उससे एक कम या ज्यादा पलटी खा जाए। यह आसान काम नहीं था। नकल पकड़ में न आए इसके लिए जो युक्तियां लगाई जाती हैं, उन पर तो अच्छी खासी सस्पेंस थ्रिलर बन जाएगी।
दरअसल सारा खेल क्रेडिट देने और न देने का है। इसके लिए यह भी जरूरी है कि कोई मौलिक न हो और मौलिक जैसा दिखना चाहे और आवश्यक मेहनत या प्रतिभा दोनों का उसमें अभाव हो। कुछ लोग संदर्भों के लिए रात-दिन एक कर देते हैं। जैसे कि बेचारे विश्वविद्यालय के शोधार्थी, 15 पेज में सात पेज का लेख लिखते हैं और आठ पेज में संदर्भ सामग्री की लिस्ट होती है। वहीं एक विश्वविद्यालय के शिक्षक ने कॉपी-पेस्ट की प्रतिभा से ऐसी किताबें लिखीं कि वे ‘चोर गुरू’ कहलाए। न तो यूजीसी ने उनकी प्रतिभा को समझा और न ही विश्वविद्यालय ने। नहीं तो आज हमारे शिक्षण संस्थानों के शोध प्रबंधों का स्तर कुछ और ही होता।
अगर संदर्भ काट दिए जाते तो टीएस एलियट की महान कविता ‘वेस्टलैंड’ पर सबसे ज्यादा नकल के आरोप लगते। इसमें 30 से ज्यादा लेखकों के संदर्भ हैं। इसे साहित्यिक भाषा में ‘अलूशन’ कहते हैं, यानी कि संकेत, इशारा। जब ऑस्कर में भेजी गई ‘बर्फी’ के बारे में पता लगा कि उसके सीन सिंगिंग इन द रेन (1952), प्रोजेक्ट ए (1983), कॉप्स (1922) और द नोटबुक (2004) से उठाए गए हैं तो अनुराग बसु ने कहा कि नहीं मैंने कोई नकल नहीं की है, मैंने तो उन लोगों को श्रद्धांजलि दी है, उनके प्रति कृतज्ञता जताई है। तो नकल का मतलब हमेशा गलत नहीं होता है, हो सकता है कि आपकी चीजें चुराकर लोग आपके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना चाहते हों।
इन झंझटों से छुटकारा पाने के लिए ही कुछ लोग कॉपीराइट फ्री कंटेंट लिखते हैं। कह देते हैं, ‘ले जाओ, चुरा लो, लूट लो, बेच दो, क्रेडिट भी मत दो, जो मन में आए करो, बस मुझे माफ करो...’। ऐसा कहने वालों का कंटेंट लोग नहीं चुराते हैं, यह सीधे-सीधे चुराने वालों के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाना है। हद है, इन्होंने तो चोरी का सारा थ्रिल ही खत्म कर दिया!
मेरा यह अनुरोध है कि इस पोस्ट को भी चुराया जाए। इससे न सिर्फ चुराने वाले को प्रेरणा मिलेगी बल्कि उनके जैसे तमाम दूसरे चुराने वालों के लिए ये लाइनें प्रेरणा देंगी। कुछ लोग जो उनकी वॉल से चुराएंगे, कुछ लोग मेरी वॉल से चुराने वालों की वॉल से चुराएंगे और कुछ चुराने वालों के चुराने वालों के चुराने वालों के यहां से चुराएंगे। इस तरह चोरी को लेकर हमारी सोसाइटी में जो एक टैबू बन गया है, जो एक स्टीरियोटाइप बन गया है, उसे तोडऩे में मदद मिलेगी। (फेसबुक से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पहले जातीय आरक्षण बढ़ाने की मांग उठी, अब धर्म याने मजहब के आधार पर भी आरक्षण की मांग होने लगी है। यह मांग हमारे मुसलमान, ईसाई और यहूदी नहीं कर रहे हैं। यह मांग रखी है राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने। यह एक सरकारी संगठन है और यह मांग उसने सिर्फ हवा में ही नहीं उछाल दी है बल्कि सर्वोच्च न्यायालय में उसने एक याचिका भी ठोक दी है। अपनी मांग के समर्थन में उसने संविधान की धारा 46 का हवाला दिया है। यह धारा कहती है कि राज्य का कर्तव्य है कि वह कमजोर वर्गो के शैक्षणिक और आर्थिक हितों को प्रोत्साहित करे। जरुर करे। संविधान निर्माताओं ने कहीं भी जाति, मजहब या भाषा के आधार पर विशेष रियायतें या आरक्षण देने की बात नहीं कही है।
लेकिन जब संविधान बना तब यह पता ही नहीं था कि देश में कमजोर तबके के लोग कौन हैं और कितने हैं। इसीलिए सुविधा की दृष्टि से वर्गों को जातियों में बदल लिया गया। यदि किसी जाति को कमजोर मान लिया गया तो उसके बाहर होनेवाला व्यक्ति कितना ही गरीब, कितना ही असहाय, कितना ही अशिक्षित हो, उसे कमजोर वर्ग में नहीं गिना जाएगा। कोई अनुसूचित या पिछड़ा व्यक्ति जो मालदार और सुशिक्षित हो, वह भी आरक्षण के मजे लूट रहा है। यही लूट-पाट का काम जो पहले जात के नाम पर चल रहा था, अब वह मजहब के नाम पर चले, यह बिल्कुल राष्ट्रविरोधी काम है। वह कर भी रही है लेकिन यह जो शब्द 'वर्गÓ है न, इसका घनघोर दुरुपयोग हो रहा है, हमारे देश में! आश्चर्य है कि कोई सरकारी आयोग इस तरह की मांग कैसे रख सकता है?
इस आयोग का यह तर्क तो ठीक है कि जब जातीय आरक्षण हिंदुओं, सिखों और बौद्धों को दिया जा रहा है तो मुसलमानों, ईसाइयों, पारसियों और जैनों आदि को क्यों नहीं दिया जाता है? क्या उनमें जातियां नहीं है? लेकिन यहां भी वही बुनियादी सवाल उठ खड़ा होता है। इन मजहबों में जो मालदार और सुशिक्षित हैं, वे भी पदों और अवसरों की लूटमार में शामिल हो जाएंगे। उससे बड़ी चिंता यह है कि इस देश के भावनात्मक स्तर पर टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे। जैसे आज जातिवाद के आगे हमारे सभी वामपंथी और दक्षिणपंथी अपनी नाक रगड़ते हैं, उससे भी ज्यादा उन्हें मजहबी शैतान के आगे अपनी दुम हिलानी होगी। मजहब के आधार का अंजाम हम 1947 में देख ही चुके हैं, अब आप भारत को संप्रदायों में बांटने की मांग क्यों कर रहे हैं?
यदि हम भारत को सबल और संपन्न बना हुआ देखना चाहते हों तो कमजोर आदमी, जिस भी जाति या धर्म, संप्रदाय, भाषा या प्रदेश का हो, उसे विशेष सुविधाएं देने का इंतजाम हमें करना होगा। सैकड़ों सालों से चले आ रहे जातीय, मजहबी और भाषिक (अंग्रेजी) अत्याचारों से हमारी जनता को मुक्त करने का सही समय यही है। इसीलिए नौकरियों से आरक्षण का काला टीका हटाइए और कमजोर वर्गों को शिक्षा और चिकित्सा मुफ्त दीजिए और देखिए कि हमारे कमजोर वर्ग शीघ्र ही शक्तिशाली होते हैं या नहीं ? यदि हमारे नेता साहसी और दृष्टिसंपन्न होते तो यह काम अब से 30-40 साल पहले ही हो जाता।
(नया इंडिया की अनुमति से)
“मैं अपने जीवन से भागना चाहती थी; बिजली की कमी से, सोते समय हमारे कानों में भिनभिनाने वाले मच्छरों से, बमुश्किल दो वक्त का खाना जुटाने की तंगी से लेकर बारिश होने पर घर में पानी भरते हुए देखने तक। मेरे माता-पिता ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की, लेकिन वे इतना ही कर सकते थे-पापा एक गाड़ी चलाने वाले थे और माँ एक नौकरानी के रूप में काम करती थीं।
मेरे घर के पास एक हॉकी अकादमी थी, इसलिए मैं घंटों खिलाड़ियों को अभ्यास करते हुए देखती थी-मैं वास्तव में खेलना चाहती थी। पापा प्रतिदिन 80 रुपये कमाते थे और मेरे लिए एक हॉकी स्टिक नहीं खरीद सकते थे। हर दिन, मैं कोच से मुझे भी सिखाने के लिए कहती। उन्होंने अस्वीकार कर दिया क्योंकि मैं कुपोषित थी। वे कहते थे, 'तुम अभ्यास-सत्र के तनाव को झेलने लिए पर्याप्त मजबूत नहीं हो।'
मुझे मैदान पर एक टूटी हुई हॉकी स्टिक मिली और उसी के साथ अभ्यास करना शुरू किया। मेरे पास प्रशिक्षण के कपड़े नहीं थे, इसलिए मैं सलवार कमीज में इधर-उधर भागती। मैंने खुद को साबित करने की ठान ली थी। मैंने कोच से मौका मांगा- बहुत मुश्किल से कायल किया उन्हें आखिरकार!

लेकिन जब मैंने अपने परिवार को बताया, तो उन्होंने कहा, 'लड़कियां घर के काम ही करती हैं "और हम तुम्हारे स्कर्ट पहनने नहीं देंगे।' मैंने उनसे यह कहते हुए विनती की, 'प्लीज मुझे जाने दो। अगर मैं असफल होती हूं, तो आप जो चाहेंगे, मैं करूंगी।’ मेरे परिवार ने अनिच्छा से हार मान ली।
प्रशिक्षण सुबह से शुरू होता। हमारे पास घड़ी भी नहीं थी, इसलिए माँ उठती और आसमान की ओर ताकतीं कि क्या यह मुझे जगाने का सही समय है? अकादमी में प्रत्येक खिलाड़ी के लिए 500 मिलीलीटर दूध लाना अनिवार्य था। मेरा परिवार केवल 200 मिली दूध ही खरीद सकता था; बिना किसी को बताए मैं दूध में पानी मिलाकर पी लेती क्योंकि मैं खेलना चाहता थी।
मेरे कोच ने मेरी मदद की; वे मुझे हॉकी किट और जूते खरीद देते थे। उन्होंने मुझे अपने परिवार के साथ रहने दिया और मेरी आहार संबंधी जरूरतों का भी ध्यान रखा। मैं कड़ी मेहनत करती और अभ्यास का एक भी दिन नहीं छोड़ती। मुझे अपनी पहली तनख्वाह याद है; मैंने एक टूर्नामेंट जीतकर 500 रुपये जीते और पापा को दिए। इतना पैसा उनके हाथ में पहले कभी नहीं आया था।
एक दिन जब मैं अपने घर पर थी, पापा के एक दोस्त हमारे घर आए। वे अपनी पोती को साथ लाए थे और मुझसे कहा, 'वह तुमसे प्रेरित है और हॉकी खिलाड़ी बनना चाहती है!' मैं बहुत खुश थी; मैं बस रोने लगी।"
(रानी रामपाल, द इंडियन एक्सप्रेस)
-गिरीश मालवीय
बहुत से लोगो ने ध्यान दिया होगा कि रूस टोक्यो ओलंपिक प्रतियोगिता से गायब है, कुछ लोग जानते हैं कि उसके गायब रहने की वजह वाडा द्वारा लगाए गए प्रतिबंध है लेकिन चंद लोग ही जानते हैं कि इसके पीछे की पूरी कहानी क्या है?
546, यह संख्या है रूस के ओलंपिक में जीते गए पदकों की। इनमें 148 स्वर्ण ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में और 47 स्वर्ण शीतकालीन ओलंपिक में जीते गए थे। ओलंपिक में भाग लेने वाले 60 से ज्यादा देशों के कुल पदकों को जोड़ भी लिया जाए, तो भी इस नंबर के आधे तक नहीं पहुंच पाएंगे।
तो फिर यह सब कैसे शुरू हुआ ? यह सब शुरू हुआ कुछ बहादुर खोजी पत्रकारो द्वारा जो खेल को साफ सुथरा बनाए रखना चाहते थे
जर्मनी के टेलीविजन चैनल एआरडी ने 2014 में एक डॉक्यूमेंट्री के जरिए रूस के डोपिंग कांड का भंडाफोड़ किया जिसमें खुद रूस के खेल अधिकारियों ने भी मदद की। रूस की 800 मीटर रेस की एथलीट यूलिया स्टेपानोवा और रूसी एंटी डोपिंग एजेंसी के पूर्व कर्मचारी रहे उनके पति विटाले ने इस डॉक्यूमेंट्री में रूस में चल रही गड़बड़ी से पर्दा उठाया, जो बाद में रूसी डोपिंग कार्यक्रम के रूप में सामने आया था।
इसके बाद वाडा यानी अंतरराष्ट्रीय डोपिंग नियंत्रण संस्था ने इसकी जांच कराई और 2015 में रूस के खिलाडिय़ों पर अनिश्चित काल के लिए प्रतिबंध लग गया। बाद में वाडा ने इस शर्त पर प्रतिबंध हटा लिया कि रूस अपने मॉस्को प्रयोगशाला से एथलीटों के डेटा को डोपिंग नियामक संस्था को सौंप देगा।
2016 में हुए रियो ओलंपिक में रूस ने हिस्सा लिया और विश्व चौथे स्थान पर रहा।
यह मामला लगभग सुलझ ही गया था लेकिन एक भूचाल आया जिसने खेलो की दुनिया मे विश्व स्तर पर बनी रूस की साख को एक झटके में धूल में मिला दिया।
2017 में एक डॉक्यूमेंट्री ‘इकारस’ रिलीज हुई ओर रूस की सारी पोल खुल गयी, एक साइकिलिस्ट ब्रायन फोगेल ने यह डॉक्यूमेंट्री बनाई थी, ब्रायन एक खिलाड़ी थे और वह खुद भी इस चीट के शिकार हुए, उसके बाद उन्होंने एक योजनाबद्ध तरीके से इस डोपिंग के खेल को पूरी तरह से बेनकाब करने का फ़ैसला किया। निर्देशक ब्रायन फोगेल ने 2014 से 2015 के बीच डोपिंग के प्रभाव को समझने के लिए स्वयं पांच महीने तक शक्तिवर्धक दवाईयों के इंजेक्शन लिए ओर टूर डी फ्रांस जैसी बड़ी प्रतियोगिता में हिस्सा लिया।
उन्होंने डोपिंग के लिए ग्रेगॉरी रॉडशेनकॉफ़ की मदद ली, और यह पूरी डाक्यूमेंट्री उन्ही की गतिविधियों पर बेस है ग्रेगॉरी रॉडशेनकॉफ़ 2014 सोची विंटर ओलंपिक के दौरान रूस की एंटी-डोपिंग लेबोरेटरी के डायरेक्टर थे।
2014 में हुए सोची शीतकालीन ओलंपिक में लगभग सभी रूसी खिलाडिय़ों ने डोप किया और यह सब रूसी सरकार के इशारे पर यह सब कुछ किया गया, इस ओलंपिक में रूस टॉप पर रहा और राष्ट्रपति पुतिन ने इस सफलता का पूरा श्रेय लिया, पुतिन इन खेलों का आयोजन के बाद लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच गए, और इसके ठीक बाद उन्होंने यूक्रेन पर आक्रमण कर दिया, इस डाक्यूमेंट्री में रूस की एंटी-डोपिंग लेबोरेटरी के डायरेक्टर रह चुके ग्रीगोरी रॉडशेनकॉफ ने खुलासा किया कि उन्होंने ऐसे पदार्थ बनाए थे, जिससे रूसी ओलंपिक एथलीटों को बेहतर खेलने में मदद मिले। उसके बाद डोपिंग की जाँच में वह यूरिन के नमूनों की सेल्फ-लॉकिंग ग्लास बोतलों को बदल देते थे जिससे, जाँच में ड्रग का पता नहीं चलता था।
डाक्यूमेंट्री में उदाहरण के साथ बताया गया है कि किस तरह अलग-अलग खेलों के खिलाडिय़ों ने टेस्ट टाले और वाड्रा के डोपिंग नियंत्रण अधिकारियों को चकमा देने की कोशिश की गई।
इस डॉक्यूमेंट्री के रिलीज होने पर हंगामा मच गया इसके बाद अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति, वाडा और अन्य महासंघों ने इस पर जाँच बिठाई। इसके बाद रूसी एथलीटों के नमूनों की दोबारा जाँच हुई और खिलाडिय़ों पर प्रतिबंध लगाए गए और मेडल वापस लिए गए।
2019 में वल्र्ड एंटी डोपिंग एजेंसी (वाडा) ने रूस को सभी तरह के प्रमुख खेलों से चार साल के लिए बैन कर दिया है। बाद में डोपिंग मामलों को लेकर रूस पर लगे चार साल का प्रतिबंध हटाकर दो साल कर दिया गया। अब ये पाबंदी दिसंबर 2022 तक ही है। वैसे रूस के जिन खिलाडिय़ों पर कोई आरोप नहीं थे। उन्हें टोक्यो ओलंपिक में भाग लेने की अनुमति दी गई है और ये ही वो खिलाड़ी हैं जो आरओसी के बैनर तले इस साल टोक्यो ओलंपिक खेलों में भाग ले रहे हैं।
ओलंपिक में डोपिंग पर आधारित ब्रायन फोगेल की ‘इकारस’ को सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री का एकेडमी अवार्ड मिला था। (यह फिल्म नेटफ्लिक्स पर मौजूद है) निर्देशक ब्रायन फोगेल ने पिछले साल पत्रकार जमाल खाशोगी की हत्या पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘द डिसिडेंट’ भी रिलीज की है जिसे दिखाने की हिम्मत बड़े बड़े मीडिया हाउस की भी नही है अब डोपिंग के मामले में भारत की स्थिति भी जान लीजिए डोपिंग में भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है। साल 2014 की रिपोर्ट के मुताबिक रूस और इटली के बाद सबसे ज्यादा डोपिंग भारत में होती है यहाँ तक कि क्रिकेट में भी...
-प्रकाश दुबे
जाति, उपजाति, अंधविश्वास, रूढिय़ों, कुरीतियों के विरोधी बसवेश्वर गुरु को मानने वालों का अलग पंथ बना। उनके नाम वाले बसवराज बोम्मई को कर्नाटक की कुर्सी जाति के कारण मिली। जातीय संतुलन बिठाने की खातिर दिल्ली में विराजमान महापंडितों ने दो गौड़ा (वोक्कालिगा) सांसद केन्द्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किए। येदियुरप्पा के अंदरूनी विरोधियों ने हंगामा मचाया कि एक दलबदलू है और दूसरी मुख्यमंत्री (अब भूतपूर्व) की सहेली। अब उपजाति विवाद रहरा गया। बोम्मई समेत येदियुरप्पा के चार-पांच सजातीय वारिस बनने की होड़ में शामिल थे। बसव संप्रदाय में सौ से अधिक उपजातियां हैं। सर्वाधिक आबादी वाली पंचमशाली उपजाति के बजाय बोम्मई को राज्य की कमान सौंपने से कई सजातीय कुपित हैं। कुछ नाखुश उपजातीय नेताओं ने मंत्रिमंडल में शामिल न होने की धमकी दी है।
उपजाति का अक्स
देश की राजधानी में कुछ फोटोग्राफरों की जीविका नेताओं के भरोसे चलती है। देश भर से आए लोग नेताओं के साथ तस्वीर खिंचवाते हैं। छाया चित्रकार कमाते हैं। सांसद और विधायक इस बीमारी से अछूते नहीं हैं। लोकसभा सदस्य डा थिरुमावलन का नाम भी इस चपेट में आ गया। थिरु यानी माननीय। चिदंबरम लोकसभा क्षेत्र से विजयी सांसद विज्ञान में शिक्षित भी हैं और अपनी पार्टी वीसीके के एकछत्र नेता भी। अपराध विज्ञान का अध्ययन किया है। लाड़ भरे नाम थोल से संबोधित किए जाते हैं। जाति आधारित भेदभाव का विरोध करने के कारण केन्द्र में मंत्री रह चुके अन्बुमणि रामदास की पीएमके पार्टी के साथ कई बार टकराव हुआ। झड़पें और हिंसा हुई। संवैधानिक पद पर विराजमान व्यक्ति को थोल ज्ञापन देने गए। सांसद की शिकायत है कि हमारे साथ तस्वीर नहीं खिंचवाई। दूसरी शिकायत-केन्द्र में सत्ताधारी दल के पदाधिकारी नेता के साथ तस्वीर खिंचा ली। पदाधिकारी सजातीय है। ज्ञापन किस बात के लिए था? अपनी उपजाति के व्यक्ति को शिक्षा क्षेत्र में बड़ा पद देने की मांग की गई थी।
बहुमत बिरादरी
लोकसभा हो या राज्यसभा। इस बिरादरी का दबदबा कायम हैं। जिस संसद ने उनके विरुद्ध संविधान में संशोधन करवा दिया, उसमें उनकी मंत्रिमंडल से लेकर हर जगह तूती बोलती है। यहां तक कि बड़े-बड़े मुद्दों पर बहस नहीं हो पाती। उनकी तरफ से रखे विधेयक पर कोई विरोध नहीं होता। उन्होंने बोलना तक नहीं पड़ता। इस हफ्ते पशुपति कुमार ले सार्वजनिक आपूर्ति पर बिना मुंह खोले विधेयक पारित करा लिया। भाई रामविलास के जीते जी वे राम के शत्रुघ्न तक की हैसियत नहीं रखते थे। दो और नाम गिना देते हैं। एक ने बहुत पहले असम गण परिषद से त्यागपत्र दिया। मुख्यमंत्री रहा। जहाज का पंछी पुनि जहाज पर आकर केन्द्रीय मंत्री बना। दूसरे ने दलबदल कर राज्य सरकार गिरवा दी। हवाई अड्डों से संबंधित विधेयक पर मंत्री को संसद में मीठी वाणी में भाषण करने की जरूरत नहीं पड़ी। सदन में गुहार लगाता दुखियारा सांसद नहीं हैं। सत्तादल और विपक्ष मत तलाश करो। जासूसी कांड, किसान आंदोलन, महंगाई पर बहस का अवसर देने का बार बार अनुरोध करने वाले दुखी जीव राज्यसभा के सभापति वेंकय्या नायडू हैं।
जाति देख गुर्रायं
धर्म, पंथ, जाति, उपजाति, भाषा, क्षेत्र, पहनावे के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं किया जा सकता-ऐसा भारत के संविधान में लिखा है। आजाद देश के कुछ अधिक आजाद नागरिक इसे मानें या न मानें। संविधान की इस धारा का पालन करने और न करने में जिस बिरादरी ने नाम कमाया और गंवाया है, वह है पत्रकारों की बिरादरी। अमेरिका के गृह सचिव को संपादकों और वरिष्ठ पत्रकारों की संस्था इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट यानी आइपीआइ ने पत्र लिखा-भारत दौरे में पत्रकारिता की स्वतंत्रता के बारे में बातचीत जरूर करना।
भारतीय पत्रकारों के एक वर्ग ने इसे अमेरिका की दखलंदाजी माना। गृह सचिव ने इस बारे में बात की या नहीं? कौन जाने। अंतरराष्ट्रीय संस्था की मांग पर कसीदे पढ़ डाले। आइपीआइ का मुख्यालय अमेरिका में नहीं है। पत्रकार जगत के कुछ लोगों के लिए हर परदेसी फिरंगी है। तरक्की पाने के बाद सूचना-प्रसारण मंत्रालय का दायित्व संभालने वाले ठाकुर जानते हैं कि किस किस पत्रकार का वित्त और मंत्रालय से कितना अनुराग है? उनके मन की बात औरों के मुख और कलम से झरती है। वसुधैव कुटुम्बकम।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)


