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कोविड 19 का असर सिर्फ शारीरिक तौर पर ही नहीं पड़ता. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक नए अध्ययन में पता चला है यह संक्रमण लोगों को मानसिक तौर भी बीमार बना सकता है. लोग डिप्रेशन का शिकार हो सकते हैं.
पढ़ें डॉयचे वैले पर कार्ला ब्लाइकर की रिपोर्ट
सांस लेने में तकलीफ, स्वाद और सुगंध का पता न चलना और शारीरिक कमजोरी. ये कुछ ऐसे लक्षण हैं जो पिछले एक साल में कोरोना वायरस से संक्रमित हुए लोगों में देखे गए हैं. जर्मनी के कोलोन शहर की रहने वाली डॉक्टर कैरोलिन ने डॉयचे वेले को बताया कि वह अपनी उम्र से बड़े करीबियोंऔर ऐसे अन्य लोगों को लेकर चिंतित हैं जिनके ऊपर इस महामारी का ज्यादा असर पड़ सकता है. 39 वर्षीय कैरोलिन कहती हैं, "मैंने सोचा कि मैं जवान हूं. मुझे पहले से कोई समस्या नहीं है. मैं एथलेटिक हूं. अगर मैं संक्रमित भी होती हूं, तो शायद मेरे साथ ज्यादा बुरा नहीं होगा. मैं निजी तौर पर कोरोना संक्रमण को लेकर डरी हुई नहीं थी."
जनवरी में कैरोलिन कोरोना वायरस की चपेट में आ गईं. शुरुआत में गंभीर लक्षण नहीं दिखे. बस हल्का बुखार, सिरदर्द और खांसी थी. लेकिन बाद में जो लक्षण उभर कर सामने आए, उसकी उम्मीद कैरोलिन को उम्मीद नहीं थी. वे लक्षण थे पैनिक अटैक और डिप्रेशन.
तीन में एक रोगी मानसिक बीमारी का शिकार
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का एक अध्ययन 'द लैंसेट सकाइट्री' जर्नल में प्रकाशित हुआ है. इस अध्ययन में पाया गया कि कैरोलिन अकेली नहीं हैं जो कोरोना की वजह से मानसिक तौर पर बीमार हुईं. शोधकर्ताओं ने 2,36,000 से अधिक कोरोना से पीड़ित रोगियों के इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड्स की जांच की. इनमें ज्यादातर रोगी अमेरिका के थे. इस जांच में यह बात सामने आई कि कोरोना वायरस से संक्रमित होने के छह महीने के भीतर 34 प्रतिशत रोगियों में किसी न किसी तरह की मानसिक बीमारी दिखी.
हालांकि, स्ट्रोक और डिमेंशिया के मामले काफी कम देखे गए. 17 प्रतिशत कोरोना रोगियों में चिंता से जुड़ी परेशानी देखी गई. वहीं, 14 प्रतिशत में मनोदशा से जुड़ी परेशानी देखी गई, जैसे कि डिप्रेशन.
ऑक्सफोर्ड के शोधकर्ताओं ने मरीजों के दो समूहों पर अध्ययन किया. इनमें एक समूह इन्फ्लूएंजा वालों का था और दूसरा ऐसे रोगियों का जिन्हें सांस लेने से जुड़ी परेशानी (कोरोना को छोड़कर) थी. यह इसलिए था ताकि पक्का किया जा सके कि इन लोगों के बीच कोरोना महामारी से पीड़ित लोगों जैसी समस्याएं नहीं है.
ऑक्सफोर्ड के पॉल हैरिसन ने डॉयचे वेले को बताया, "हमारा डाटा समस्या के स्तर पर ध्यान आकर्षित करता है. यह इस विचार को दिखाता है कि कोरोना का असर लोगों पर काफी ज्यादा होता है, भले ही वे अस्पताल में भर्ती हों या नहीं." हैरिसन इस अध्ययन के मुख्य लेखक हैं.
कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बावजूद कैरोलिन कभी अस्पताल में भर्ती नहीं हुई. लेकिन वह कोरोना संक्रमण के दौरान और बाद में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीर रूप से जूझती रही. इसकी शुरुआत कोरोना संक्रमण के जांच के समय से ही हो गई थी. वह अकेले कोलोन में अंधेरे पार्किंग गैरेज में स्थित एक परीक्षण केंद्र में गईं थी. वह एहतियात के तौर पर मरीजों के साथ काम करने से पहले टेस्ट करा लेना चाहती थीं. उन्हें पूरी उम्मीद थी कि उनकी टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव आएगी. लेकिन जब उनका रिजल्ट पॉजिटिव आया, तो वह हैरान रह गईं.
कैरोलिन कहती हैं, "यह और बदतर हो गया. मेरे शारीरिक लक्षण बुरे नहीं थे. मैं मानसिक तौर पर परेशानियों का सामना कर रही थी." अपने परिवार में सिर्फ कैरोलिन ही कोरोना वायरस से संक्रमित हुई थीं. इसलिए, उन्हें अपने पति और बच्चों से पूरी तरह अलग रहना था. वह बिना दवा के सो नहीं पा रही थीं. उन्होंने कहा कि वह पहले की तुलना में ज्यादा भयभीत और उदास हो गई थीं.
कैरोलिन कहती हैं, "मैं सोचती रहती थी कि तुम उस बीमारी से पीड़ित हो जिससे लोग मर रहे हैं. मैं अचानक रात में उठ जाती थी और डर जाती थी. लगता था कि मुझे स्ट्रोक आ रहा है. मैं हिल नहीं सकती थी. सपने और वास्तविक दुनिया के बीच फंस गई थी. मैं पहले कभी इस तरह से भयभीत नहीं हुई थी."
अमेरिका के वर्जिनिया में रहने वाले 29 साल के लॉरेंस भी कोरोना महामारी से पहले मानसिक तौर पर बीमार नहीं हुए थे. अमेरिका में जब कोरोना तेजी से फैलने लगा, तो लॉरेंस भी चिंतित रहने लगे. उन्होंने डॉयचे वेले को बताया, "उस स्थिति तक तो उसे मैनेज किया जा सकता था." इसके बाद कोरोना की वजह से उनकी सास की मौत हो गई. दिसंबर में लॉरेंस और उनकी पत्नी कोरोना वायरस से संक्रमित हो गए. इससे उनके फेफड़ों पर असर पड़ा.
लॉरेंस कहते हैं, "इसके बाद से मुझे अस्थमा है. जब मुझे सांस लेने में समस्या आनी शुरू हुई, तो मुझे पैनिक अटैक आने लगे. ऐसा मुझे पहले कभी नहीं हुआ था." लॉरेंस हर समय चिंतित रहते हैं और अपने काम पर भी ध्यान नहीं दे पाते. करीब एक महीने के संघर्ष के बाद लॉरेंस आखिरकार अपना इलाज कराने डॉक्टर के पास पहुंचे. वे कहते हैं, "मैं नहीं कह सकता कि यह सीधे तौर पर कोरोना से जुड़ा हुआ था या नहीं लेकिन मैं काफी ज्यादा चिंतित रहने लगा था और आखिरकार मुझे डॉक्टर की मदद लेनी पड़ी."
दूसरी ओर, कैरोलिन को अपनी बहन से मदद मिली. कैरोलिन की बहन मनोचिकित्सक हैं. हालांकि, कैरोलिन भी अपनी चिंता की सही वजह का पता नहीं लगा सकीं. वह कहती हैं, "मैं पक्के तौर पर नहीं बता सकती कि यह सामान्य स्थिति की वजह से हुआ या क्वारंटाइन की वजह से. यह भी नहीं पता कि मेरा इलाज कैसे हुआ. या क्या यह बीमारी के कारण ही हुआ था."
कोरोना को गंभीरता से लेने के अन्य कारण
प्रोफेसर हैरिसन कहते हैं, "दोनों बातें संभव हो सकती हैं. आपको कोरोना संक्रमण है इस तनाव से निपटना, अलग रहना, नौकरी, अपना भविष्य और अपने स्वास्थ्य के बारे में चिंता करना. इन सब वजहों से चिंता और डिप्रेशन हो सकता है."
हैरिसन के अन्य निष्कर्षों से कुछ हद तक इस बात की पुष्टि होती है कि कोरोना वायरस से संक्रमित रोगियों में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति के लिए ज्यादातर बाहरी परिस्थितियां जिम्मेदार हैं. हल्के लक्षण और गंभीर लक्षण, दोनों तरह के रोगियों के बीच चिंता और डिप्रेशन की समस्या लगभग एक समान संख्या में देखी गई.
हैरिसन कहते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर असर को देखते हुए अब कोरोना से और अधिक सतर्क रहने की जरूरत है. हैरिसन अनुरोध करते हैं, "सभी लोग वैक्सीन लें. मेरे हिसाब से कोरोना की तुलना में वैक्सीन में खतरा कम है. और अगर आपको अलग रहने को कहा जाता है, तो मैं आपको सलाह दूंगा कि आप वही करें जो आपसे कहा जाता है. हम तभी बेहतर होंगे." (dw.com)
-करिश्मा वासवानी
बीते सप्ताहांत पर चीन के बड़े अरबपति ई-कॉमर्स बिजनेस कंपनी अलीबाबा पर चीन की सरकार ने 2.8 बिलियन डॉलर का जुर्माना लगाया, कंपनी पर आरोप लगाया गया कि कंपनी ने सालों से बाज़ार में अपनी जगह और क़द का दुरुपयोग किया.
सोमवार को अलीबाबा की सहयोगी कंपनी एंट डिजिटल पेमेंट फ़र्म ने चीनी नियामकों के दबाव में कंपनी की 'नई योजना की घोषणा' की जिसके तहत ये कंपनी एक टेक फ़र्म की तुलना में एक बैंक की तरह कार्य करेगी.
मंगलवार को चीन की 34 टेक कंपनियों के प्रमुखों को चीनी नियामक के अधिकारियों ने समन किया और चेताया कि अलीबाबा इन कंपनियों के लिए एक सबक़ है.
इन कंपनियों को एक महीने का वक़्त दिया गया है ताकि वे 'सोचें-समझें' और प्लेटफ़ॉर्म कंपनियों के लिए बनाए गए चीन के नए नियमों का अनुपालन करें.
ऐसे में अलीबाबा पर जुर्माना लगाना और उसे सरेआम फटकार लगाना अन्य टेक कंपनियों के लिए एक चेतावनी की तरह थी.
अलीबाबा की जाँच में सरकारी अधिकारियों ने पाया है कि उसने व्यापारियों को व्यापार करने या प्रतिद्वंद्वी प्लेटफार्मों पर अपना प्रमोशन करने से रोका और बाज़ार में अपनी स्थिति का सालों तक दुरुपयोग किया.
इसके एवज़ में कंपनी की साल 2019 में हुई कुल घरेलू आय का चार फ़ीसद हिस्सा जुर्माने के तौर पर कंपनी को देना होगा.
इस इंडस्ट्री की बाक़ी कंपनियों ने बीबीसी संवाददाता को बताया कि इस वक़्त वे 'काफ़ी चिंता' में हैं और उन्हें डर है कि अगला निशाना वो होंगे.
टेंसेंट, जेडी डॉट कॉम, माइचुन, बाइटडांस और पिनडुओडुओ जैसी कंपनियां सभी अलीबाबा को देखते हुए अब काफ़ी सोच-समझ क़दम रख रही हैं.
अलीबाबा पर लगने वाला जुर्माना चीन की तेज़ी से बढ़ती टेक इंडस्ट्री पर अधिक से अधिक लगाम लगाने की कोशिश है. कई लोगों के लिए ये एक अच्छा संकेत है और वे मानते है कि बाज़ार अब परिपक्व हो गया है.
चीन की टेक विश्लेषक और पॉडकास्ट टेक बज़ चाइना की को-होस्ट रुई मा कहती हैं, ''यदि आप क़ानूनों को पढ़ते हैं, तो पाएंगे कि चीनी नियामक इस इंडस्ट्री को विनियमित करने की कोशिश कर रही है, तेज़ी से आगे बढ़ती इस इंडस्ट्री के लिए ये कोशिश तेज़ी से की जा रही है.''
''अब ये लोग ना सिर्फ़ मार्केट शेयर के लिए एल्गेरिदम का इस्तेमाल कर रहे हैं बल्कि इस प्लेटफ़ॉर्म की अर्थव्यवस्था को भी समझने की कोशिश में लगे हैं जैसा कि अन्य विकसित अर्थव्यवस्थाएं करती हैं. ''
लेकिन इसे राजनितिक क़दम के तौर पर देखा जा रहा है.
इन कंपनियों ने चीनी लोगों के लिए एक वर्चुअल दुनिया बना दी है और लोगों की ज़िंदगियों पर इनका गहरा असर भी है. लेकिन ऐसा ही असर लोगों की ज़िंदगियों पर कम्युनिस्ट पार्टी का भी है ऐसे में टेक कंपनी और पार्टी के बीच सीधे प्रतिस्पर्धा का माहौल बन गया है.
चीन के वित्तीय हलक़ों के सूत्रों ने बताया है कि उन्हें संदेह है कि जैक मा के पिछले साल दिए गए पारंपरिक बैंकिंग क्षेत्र को ख़ारिज करने वाले भाषण ने "बीजिंग के कई शीर्ष नेताओं को नाराज़ किया था.''
इस भाषण के बाद जैक मा की कंपनी अलीबाबा और एंट ग्रुप की सरकारी मीडिया ने आलोचना की थी, इसके बाद जैक मा और उनकी टीम को समन किया गया था और बहुप्रतिक्षित एंट ग्रुप के शेयर मार्केट लॉन्च को भी रद्द कर दिया गया था.
इस पूरे मामले पर क़रीब से नज़र रखने वाले लोगों ने बीबीसी संवाददाता से बताया है कि जैक मा ने जो कुछ भी अपने उस भाषण में कहा था वह उन्हें काफ़ी मंहगा पड़ा.
इस सप्ताह हुई निवेशकों की एक बैठक में अलीबाबा के एग्ज़िक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट जो साई ने कहा कि ''नियामकों की ओर से जो हुआ...ये हमें एक स्क्रूटनी जैसा महसूस हुआ और हम इस मुद्दे को भुलाकर आगे बढ़ गए हैं. ये एक वैश्विक ट्रेंड हैं जहां नियामकों को लगता है कि प्रतिस्पर्धा अनुचित है वह उस दिशा में जाँच करते हैं.''
'अनियमित' ढंग से आगे बढ़ा चीनी टेक बाज़ार
चीनी टेक कंपनियों का जन्म और विकास ऐसे समय में हुआ जब इससे जुड़े कोई नियम-क़ायदे नहीं थे.
ये पूरा सेक्टर बिना किसी क़ानून के संचालित किया जा रहा था. लंबे वक़्त तक सरकार ने इसे बढ़वा भी दिया.
चीनी क़ानूनों की जानकार और हांगकांग विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफ़ोसर एंजेला झांग बताती हैं कि चीन की सरकार ने नए ऐसे बिज़नेस और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए स्कीम भी लॉन्च की थी.
वह कहती हैं, ''पहले नियामकों का रवैया ढीला था, उन लोगों ने ऐसे नियम बनाए जो टेक कंपनियों के प्रति थोड़े नरम थे.''
लेकिन अब मामला बदल रहा है अब चीन ने इन कंपनियों पर लगाम लगाने की कोशिश तेज़ कर दी है.
प्रोफ़ेसर झांग का कहना है कि चीन इस क्षेत्र में लगाम लगाने का इच्छुक है लेकिन वह अर्थव्यवस्था के सुनहरे मौक़े को ख़त्म नहीं करना चाहेगा.
वह कहती हैं, ''चीन में एक कहावत है- चूज़ों को मारकर बंदर को डराना. इस मामले में यही हो रहा है, यहां अलीबाबा को अन्य कंपनियों के लिए एक उदाहरण की तरह पेश किया गया है और उन्हें एक सबक़ सिखाया गया है.''
यक़ीनन चीन का नेतृत्व चाहता है कि देश आर्थिक रूप से समृद्ध हो और वृद्धि इनका मुख्य उद्देश्य भी है.
अलीबाबा के अनुभव से बाक़ी टेक कंपनियों के लिए ये तय होगा कि वह आगे से नियामकों के बनाए नियमों पर चले और उनके क़ाबू में रहें.
रुई मा भी इससे सहमत दिखती हैं. वह कहती हैं कि नियमों के आने से छोटी कंपनियों को बढ़ने में मदद मिलेगी जिसे अब तक इस दुनिया के बड़े खिलाड़ी आगे बढ़ने नहीं दे रहे थे.
वह कहती हैं, ''छोटी कंपनिया नए नियमों के समर्थन में हैं, उन्हें लगता है कि इससे नई और छोटी कंपनियों को आगे बढ़ने का मौक़ा मिलेगा जो इससे पहले नहीं मिलता था." (bbc.com)
ब्रिटेन में पुलिस से जुड़े एक बिल के विरोध में प्रदर्शनों का दौर जारी है. ये विरोध प्रदर्शन किसी एक संगठन ने आयोजित नहीं किए हैं बल्कि ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया माध्यमों के जरिए कई मानवाधिकार संगठनों ने शुरु किए हैं.
डॉयचे वैले पर स्वाति बक्शी की रिपोर्ट-
लंदन में अप्रैल के शुरू में आयोजित किल द बिल प्रदर्शन में पुलिस ने 100 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया. इससे पहले मार्च में ब्रिस्टल शहर में हुए प्रदर्शनों में पुलिस के साथ झड़पों की खबरें आती रही हैं. प्रदर्शनों का ताजा दौर शनिवार 17 अप्रैल को आयोजित हो रहा है जब लंदन, बाथ, बर्मिंघम, ब्राइटन, कार्डिफ, ब्रिस्टल और मैनचेस्टर समेत ब्रिटेन के कईं दूसरे शहरों में प्रदर्शनकारी एकजुट होंगे. लॉकडाउन खुलने के बाद किल द बिल प्रदर्शनों का ये पहला आयोजन है और इसमें पहले से कहीं ज्यादा लोगों की हिस्सेदारी की उम्मीद है.
मानवाधिकार, श्रमिक अधिकार, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए काम करने वाली संस्थाओं ने इन प्रदर्शनों में बढ़-चढ़ कर हिस्सेदारी की है. प्रदर्शनकारियों की दलील है कि पुलिस को बेहद ताकतवर बनाने वाला ये बिल विरोध-प्रदर्शन के अधिकारों का हनन करता है और सरकार को इस पर दोबारा सोचना चाहिए. बीते कुछ महीनों के दौरान ब्रिटेन और यूरोप में तमाम मसलों पर विरोध-प्रदर्शन आयोजित हुए. ब्लैक लाइव्स मैटर से जुड़े प्रदर्शन, फ्रांस में सुरक्षा कानूनों के विरोध में हुआ प्रदर्शन या फिर लॉक डाउन के विरोध में हुए प्रदर्शन हों, ये सवाल बराबर बना रहा कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कारगर उपाय क्या होने चाहिए और पुलिस किस हद तक जा सकती है. ब्रिटेन के इस बिल में विरोध प्रदर्शनों पर नियंत्रण समेत पुलिस की भूमिका को मजबूत बनाने के प्रावधान है.
क्या कहता है बिल
पुलिस, क्राइम, सेंटेंसिंग एंड कोर्ट बिल, 300 पन्नों का एक अहम और विवादित बिल है जिसमें पुलिस, अपराध और सजा से जुड़े व्यापक प्रस्ताव रखे गए हैं. इसमें गंभीर अपराधों के लिए सजा को कड़ा करने, सजा खत्म होने से पहले जेल से रिहाई की नीति का अंत करने समेत कई सिफारिशें हैं. प्रस्तावित कानून का एक हिस्सा पुलिस और पुलिस की ताकतों से जुड़ा है, जिसमें प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के अधिकार दिए जाने की बात है और इन्हीं पर विरोध हो रहा है. मौजूदा कानूनों के मुताबिक, पुलिस नागरिक प्रदर्शनों को तब तक रोक नहीं सकती जब तक वह ये साबित ना कर दे कि किसी प्रदर्शन से जान-माल और संपत्ति को भयंकर खतरा है या फिर आम जनजीवन के बुरी तरह प्रभावित होने की संभावना है. नया कानून पुलिस को ये अधिकार देता है कि यदि वो किसी प्रदर्शन को आम जीवन के लिए रुकावट मानती है तो उसके खिलाफ कदम उठा सके. उदाहरण के लिए पुलिस को प्रदर्शन का वक्त और आवाज की सीमा तय करने का हक होगा.
बिल के अन्य विवादास्पद पहलुओं में ये प्रस्ताव भी है कि यदि प्रदर्शन के दौरान किसी स्मारक या मूर्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है तो जिम्मेदार व्यक्ति को दस साल तक की सजा हो सकती है. गौरतलब है कि ब्लैक लाइव्स मैटर प्रदर्शनों के दौरान ब्रिस्टल में एक दास व्यापारी एडवर्ड कोलस्टन की मूर्ति को तोड़ा गया था. सरकार की तरफ से लगातार कहा जाता रहा है कि ये बिल पुलिस की सक्रिय भूमिका और आम लोगों की सुविधा का ध्यान रखने की कोशिश है. पिछले हफ्ते संसद में बोलते हुए, गृह मंत्री प्रीति पटेल ने साफ किया कि "अधिकारियों को प्रदर्शनकारियों और आम जनजीवन के बीच संतुलन कायम की करने की जरूरत है.”
विरोध की शुरूआत
पुलिस का बर्ताव यूं तो ब्रिटेन समेत दुनिया भर में बहस का मुद्दा है लेकिन ये बिल अचानक विवाद का मसला बना एक तैंतीस वर्षीय महिला सैरा एवरर्ड की मौत के बाद. एवरर्ड 3 मार्च को लंदन के एक इलाके से लापता हो गईं और बाद में उनका शव बरामद हुआ. उनकी हत्या के मामले में एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ मामला तय हुआ. एवरर्ड की याद में 12 मार्च को एक कैंडिल लाइट सभा आयोजित की गई थी जिसे पुलिस ने तितर बितर कर दिया. वजह थी कोविड लॉकडाउन और लोगों के जमा होने की मनाही के नियम.
पुलिस ने हिंसा का विरोध कर रही महिलाओं को रोका और गिरफ्तारियां की. इस मामले में पुलिस की कड़ी आलोचना हुई और अधिकारियों के बर्ताव की जांच की जा रही है. ये घटनाएं, पुलिस और अपराध बिल पर संसद में हुई बहस से चंद रोज पहले हुई और पुलिस की ताकत और उसके बर्ताव का विरोध, किल द बिल प्रदर्शनों का आधार बन गया. महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ‘सिस्टर्स अनकट' का कहना है ”पुलिस बिल प्रदर्शनों को आपराधिक घोषित करते हुए उन्हें रोकने का अधिकार देता है. वही पुलिस जो अभी प्रदर्शनकारियों को मारती है, वो आगे और भी ताकतवर हो कर ज्यादा हिंसक व्यवहार करेगी.”
ये विवादास्पद बिल संसद के निचले सदन में शुरूआती प्रक्रिया पार कर चुका है. फिलहाल कमेटी स्तर पर इस बिल के विभिन्न पहलुओं पर बातचीत, सुझाव और बहस का दौर शुरू होगा जिसके बाद बिल वापिस निचले सदन मे चर्चा के लिए रखा जाएगा, लेकिन ये सारी प्रक्रिया फिलहाल इस साल के अंत तक के लिए टाल दी गई है. (dw.com)
पिछले कुछ महीने ताइवान के लिए चुनौती और चिंता भरे रहे हैं. जहां चीन ने बार-बार ताइवान के संप्रभु हवाई क्षेत्र में अतिक्रमण कर ताकत दिखाई है, वहीं ताइवान को अमेरिका और जापान समेत कई देशों का समर्थन भी मिला है.
डॉयचे वैले पर राहुल मिश्र की रिपोर्ट-
इस हफ्ते तेजी से बदलते वैश्विक घटनाक्रम में ताइवान चर्चा में रहा है. अमेरिका के दौरे पर गए जापान के प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा की राष्ट्रपति जो बाइडेन से बातचीत में ताइवान बड़ा मुद्दा है. बाइडेन प्रशासन का एक अनौपचारिक शिष्टमंडल अभी अभी ताइवान का दौरा कर वापस गया है. बाइडेन प्रशासन के प्रतिनिधियों की इस यात्रा पर चीन ने कड़ी आपत्ति भी जताई और अमेरिका से कहा कि ताइवान से संबंधों की पींग बढ़ा कर अमेरिका आग से खेलने की गलती कर रहा है.
दरअसल, 2016 में राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन के सत्ता में आने के बाद से ही चीन ताइवान को लेकर कड़ा रुख अपना रहा है. त्साई इंग-वेन सरकार ने 1992 में अंतर-जलडमरूमध्य संबंधों को लेकर हुई सहमति को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था, लिहाजा चीन ने ताइवान के साथ संपर्क बंद कर दिए.
चीनी दबाव के कारण ताइवान को मुख्य रूप से विश्व स्वास्थ्य असेम्बली से भी हटा दिया गया. इसकी वजह यह भी रही कि ताइवान ने चीनी ताइपे नाम से इस सम्मेलन में भाग लेने से इनकार कर दिया था. त्साई इंग-वेन की नीतियों से भड़के चीन ने पिछले कुछ वर्षों में ताइवान के सहयोगियों को एक एक कर उससे दूर करने की कोशिश भी की है. जाहिर है इस बात से ताइवान परेशान है लेकिन उसने चीन की इस आक्रामक नीति के आगे घुटने नहीं टेके हैं. और इसी वजह से चीन और ताइवान के बीच तनाव और सैन्य तनातनी भी बढ़ गयी है.
चीन के लिए ताइवान के हवाई क्षेत्र में विमान वाहक भेजना अब आम बात हो गई है. इस हफ्ते, चीन ने एक ही दिन में ताइवान के एडीआईजेड में 25 लड़ाकू विमानों और परमाणु-सक्षम बमों सहित विमानों को भेजा जो अब तक की सबसे बड़ी संख्या है. कोविड महामारी के बीच ताइवान की बढ़ती लोकप्रियता और चीन के प्रति देशों के असंतोष ने चीन को कूटनीतिक और मानसिक तौर पर असुरक्षित बना दिया है जिसका असर उसके विदेशनीति व्यवहार में बदलाव में साफ दिखता है.
ट्रंप प्रशासन के सख्त रवैए से हलकान हुए चीन को उम्मीद थी कि शायद डेमोक्रेट सरकार आए तो बात पहले जैसी सामान्य हो जाए लेकिन ऐसा हो नहीं हुआ. जो बाइडेन के सत्ता में आने के बाद तो चीन के लिए स्थिति बद से बदतर होती दिख रही है. आर्थिक, जलवायु और पर्यावरण के मुद्दों के अलावा सैन्य सहयोग और सामरिक मामलों पर भी बाइडेन आक्रामकता में ट्रंप से फिलहाल तो कहीं कम नहीं दिख रहे और इस बात ने चीन को झुंझला कर रख दिया है.
चीन को लेकर अमेरिकी प्रशासन की पैनी रणनीति और नीयत दोनों की झलक हमें तब देखने को मिली जब चीन की बढ़ती आक्रामकता पर अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन का मुखर बयान आया कि चीन को पश्चिमी प्रशांत में यथास्थिति बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. अलास्का में विफल वार्ता के वक्त भी यह साफ हो गया था.
रहा सवाल नीयत का, तो बाइडेन प्रशासन के शिष्टमंडल भेजने का अनुमान किसी को भी नहीं था. इस शिष्टमंडल में पूर्व सीनेटर क्रिस डोड और पूर्व उप सचिव रिचर्ड आर्मिटेज और जेम्स स्टाइनबर्ग जैसे कई अनुभवी नेता शामिल थे. जाहिर है बाइडेन प्रशासन ताइवान को लेकर सजग है और चीन को लेकर चौकन्ना भी. इस तरह के कूटनीतिक संदेश दरअसल इसी काम के लिए होते हैं.
चीन की आक्रामकता से निबटने की तैयारी
ताइवान सरकार भी अमेरिका के इस कदम से संतुष्ट दिखती है. राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन ने भी कहा कि अमेरिका और ताइवान इंडो-पैसिफिक में स्थिरता, शांति और समृद्धि सुनिश्चित करने के लिए सहयोग करेंगे. ताइवान के राष्ट्रपति कार्यालय के प्रवक्ता जेवियर चांग ने कहा कि अमेरिकी कदम ताइवान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच चट्टान की तरह मजबूत रिश्तों का परिचायक है. लेकिन ताइवान के लिए यह परेशानियों का अंत नहीं है क्योंकि चीन अनौपचारिक यात्रा का कड़ा जवाब दे रहा है. चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियन ने इस यात्रा की निंदा की और अमेरिका से कहा कि वह ताइवान के अधिकारियों के साथ किसी भी रूप में आधिकारिक बातचीत को तुरंत रोक दे और ताइवान से संबंधित मुद्दे पर समझदारी से पेश आए.
जापानी प्रधानमंत्री सुगा की अमेरिका यात्रा भी इस मामले में महत्वपूर्ण है. दोनों देशों के नेताओं का संयुक्त बयान ताइवान में बढ़ रहे तनाव और इलाके की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है. ताइवान जलडमरूमध्य में संघर्ष किसी भी देश के हित में नहीं है. सभी देशों को यह समझना होगा. चीन की बढ़ती आक्रामकता से निपटने के लिए ताइवान, अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच सामरिक सहयोग और इस बात की प्रतिबद्धता जरूरी कदम है. लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि चीन का ध्यान इस बात की ओर भी दिलाया जाए कि युद्ध किसी भी पार्टी के लिए अच्छी खबर नहीं होगा.
वेलिंगटन, 16 अप्रैल | न्यूजीलैंड में गाड़ी चलाते समय मोबाइल इस्तेमाल करना पड़ेगा भारी पड़ेगा और जेब भी ज्यादा ढीली होगी। शुक्रवार को परिवहन मंत्रालय द्वारा जारी बयान के अनुसार, न्यूजीलैंड में 30 अप्रैल से ड्राइविंग करते समय मोबाइल फोन का उपयोग करते हुए पकड़े गए लोगों के लिए 80 न्यूजीलैंड डॉलर से 150 न्यूजीलैंड डॉलर बढ़ाएगा। सिन्हुआ समाचार एजेंसी ने बयान में कहा कि परिवहन मंत्रालय के आंकड़ों से पता चला है कि 2015 से 2019 के बीच सड़क दुर्घटना में 22 लोगों की मौत हुई है और 73 गंभीर रूप से घायल हुए हैं।
परिवहन मंत्री माइकल वुड ने कहा कि इस आंकड़े के कम होने की संभावना थी क्योंकि दुर्घटनाग्रस्त होने पर पुलिस को फोन के इस्तेमाल का पता लगाना हमेशा मुश्किल होता है।
वुड ने कहा, सुरक्षा हमारी सर्वोच्च परिवहन प्राथमिकताओं में से एक है, लेकिन अभी भी बहुत से लोग ड्राइविंग करते समय फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं।
ड्राइविंग के दौरान मोबाइल चलाते हुए पकड़े पर 20 डिमेरिट प्वाइंट मिलेंग, अगर दो साल में 100 डिमेरिट प्वाइंट हो जाएंगे तो तीन महीने के लिए लाइसेंस कर दिया जाएगा।
परिवहन मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि यह मौजूदा नियमों में बढ़ोत्तरी की गई है, जिसमें ड्राइविंग के दौरान ड्राइवर भी फोन का उपयोग नहीं कर सकता है, एक हाथ से मोबाइल चलाना, कॉल करना, फोन रिसीव करना, फोन काटना, मैसेज भेजना या मेल भेजना, वीडियो बनाना, भेजना, देखना या किसी अन्य तरीके से संवाद करने के लिए सख्त नियम बनाए गये हैं।
लेकिन इसमें कुछ अपवाद हैं जैसे कि नेविगेशन ऐप का उपयोग करना जब फोन कार से जुड़ा होता है। (आईएएनएस)
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा है कि वो चाहते हैं कि सभी अमेरिकी सैनिक 11 सितंबर से पहले अफ़ग़ानिस्तान से वापस आ जाएं. उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप की एक मई 2021 की समयसीमा को आगे बढ़ा दिया है.
बाइडन ने कहा है, 'अब अमेरिका के सबसे लंबे युद्ध को समाप्त करने का समय आ गया है.'
ये युद्ध साल 2001 में शुरू हुआ था.
अमेरिका ने कितने सैनिक अफ़ग़ानिस्तान भेजे थे?
अमेरिका ने तालिबान को सत्ता से बाहर करने के लिए अक्तूबर 2001 में अफ़ग़ानिस्तान पर आक्रमण किया था. अमेरिका का आरोप था कि अफ़ग़ानिस्तान ओसामा बिन लादेन और अल-क़ायदा से जुड़े दूसरे लोगों को पनाह दे रहा है. अमेरिका इन्हें ही सितंबर 2001 के हमले के लिए ज़िम्मेदार मानता है.
अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान से लड़ने के लिए अरबों डॉलर ख़र्च किए और बड़ी संख्या में सैनिक भेजे. अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में पुनर्निर्माण पर भी भारी ख़र्च किया है.
पिछले साल दिसंबर तक अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की संख्या चार हज़ार ही रह गई थी. इस साल सैनिकों की संख्या और भी कम हो गई है.
हालांकि अमेरिका के अधिकारिक डाटा में स्पेशल ऑपरेशन फ़ोर्सेज़ और दूसरी अस्थाई यूनिटों की सही संख्या ज़ाहिर नहीं की जाती है.
युद्ध के दौरान एक समय अमेरिकी सैनिकों की संख्या एक लाख दस हज़ार तक पहुँच गई थी.
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वहीं अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी के लिए निजी सुरक्षा कॉंट्रेक्टर भी अच्छी ख़ासी तादाद में काम कर रहे हैं. अमेरिकी कांग्रेस की रिसर्च के मुताबिक़ साल 2020 की अंतिम तिमाही में 7800 अमेरिकी नागरिक अफ़ग़ानिस्तान में थे.
अमेरिकी सेना ने जब अपना ध्यान आक्रामक कार्रवाइयों के बजाए अफ़ग़ानिस्तानी सुरक्षा बलों के प्रशिक्षण में लगाया तो अमेरिका के ख़र्च में भारी गिरावट आई.
अमेरिकी सरकार के डाटा के मुताबिक़ साल 2010 से 2012 के बीच जब अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की संख्या एक लाख को पार कर गई थी, अफ़ग़ान युद्ध पर अमेरिका का सालाना ख़र्च सौ अरब डॉलर को पार कर गया था.
वहीं 2018 में सालाना ख़र्च 45 अरब डॉलर था. उस साल रक्षा मंत्रालय के एक शीर्ष अधिकारी ने अमेरिकी कांग्रेस को ये जानकारी दी थी.
अमेरिका के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक़ अफ़ग़ानिस्तान युद्ध पर अक्तूबर 2001 से सितंबर 2019 के बीच 778 अरब डॉलर ख़र्च हुए.
इसके अलावा अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय संस्था यूएस एजेंसी फ़ॉर इंटरनेशनल डेवेलपमेंट (यूएसएड) के ज़रिए अफ़ग़ानिस्तान में विकास परियोजनाओं पर 44 अरब डॉलर ख़र्च किए हैं.
अमेरिका के अधिकारिक डाटा के मुताबिक़ साल 2001 से 2019 के बीच अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में कुल 822 अरब डॉलर ख़र्च किए. हालांकि इन आंकड़ों में पाकिस्तान में ख़र्च किया गया पैसा शामिल नहीं हैं.
अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में अपने सैन्य अभियानों के लिए पाकिस्तान को एक अड्डे की तरह इस्तेमाल किया है.
अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में अमरीकी ख़र्च पर ब्राउन यूनिवर्सिटी में साल 2019 में हुए एक शोध के मुताबिक़ अमेरिका ने लगभग 978 अरब डॉलर ख़र्च किए हैं. ब्राउन यूनिवर्सिटी के आकलन में वित्तीय वर्ष 2020 के लिए जारी की गई रक़म भी शामिल है.
इस शोध में ये भी कहा गया है कि ख़र्च का सही आकलन करना मुश्किल है क्योंकि सरकार के अलग-अलग विभागों में ख़र्चों की गणना अलग-अलग तरह से की जाती है. समय के साथ तरीक़े बदलते भी हैं जिससे भी आकलन पर असर होता है.
इतना पैसा गया कहां है?
अफ़ग़ानिस्तान में अधिकतर पैसा चरमपंथ विरोधी अभियानों और सैनिकों की ज़रूरतों पर ख़र्च किया गया है जिसमें उनका खाना-पीना, मेडिकल केयर, विशेष वेतन और रहने की व्यवस्था आदि शामिल हैं.
हालांकि, अधिकारिक डाटा से पता चलता है कि साल 2002 के बाद से अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में पुनर्निर्माण गतिविधियों पर 143.27 अरब डॉलर ख़र्च किए हैं.
इनमें से लगभग आधा पैसा अफ़ग़ानिस्तान के सुरक्षा बलों पर ख़र्च किया गया है जिसमें अफ़ग़ान नेशनल आर्मी और पुलिस बल शामिल हैं.
लगभग 36 अरब डॉलर अफ़ग़ान सरकार और विकास योजनाओं के लिए दिए गए हैं. इसके अलावा ड्रग तस्करी के ख़िलाफ़ और मानवीय मदद पर भी ख़र्चा हुआ है.
इतने सालों के दौरान कुछ पैसा भ्रष्टाचार, घोटालों और दुरुपयोग में भी बर्बाद हुआ है.
अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के पुनर्निर्माण प्रयासों पर नज़र रखने वाली एजेंसी ने अक्तूबर 2020 में अमेरीकी कांग्रेस में पेश अपनी रिपोर्ट में बताया था कि मई 2009 से दिसंबर 2019 के बीच अफ़ग़ानिस्तान में 19 अरब डॉलर का नुक़सान भी हुआ.
और युद्ध की मानवीय क़ीमत का क्या?
2001 में तालिबान के ख़िलाफ़ युद्ध शुरू होने के बाद से 2300 से अधिक अमेरिकी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान में जान गंवा चुके हैं जबकि 20660 सैनिक लड़ाई के दौरान घायल भी हुए हैं.
लेकिन अफ़ग़ानिस्तान के नागरिकों और सुरक्षा बलों के नुक़सान के सामने अमेरिकी आंकड़ें कुछ भी नहीं हैं.
राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने साल 2019 में कहा था कि उनके राष्ट्रपति बनने के पाँच सालों के भीतर अफ़ग़ानिस्तानी सुरक्षा बलों के 45 हज़ार से अधिक जवानों ने अपनी जान गंवाई है.
ब्राउन यूनिवर्सिटी के साल 2019 के शोध के मुताबिक़ अक्तूबर 2001 में युद्ध शुरू होने के बाद से 64100 से अधिक अफ़ग़ानिस्तानी सैनिक और पुलिसकर्मी मारे गए हैं.

अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र के मिशन के मुताबिक साल 2009 में आंकड़े इकट्ठा करने की शुरुआत के बाद से अब तक 111000 से अधिक अफ़ग़ानिस्तान नागरिक मारे गए हैं. (bbc.com)
नई दिल्ली, 16 अप्रैल | इंग्लैंड और राजस्थान रॉयल्स (आरआर) के ऑलराउंडर बेन स्टोक्स भारत से शुक्रवार को स्वदेश पहुंचेंगे और उंगली में लगी चोट के ऑपरेशन कराने के बाद 12 सप्ताह तक एक्शन से दूर रहेंगे। गुरुवार को हुए सीटी स्कैन और रिपीट एक्स-रे से पता चला कि स्टोक्स की बाईं तर्जनी फ्रैक्चर हो गई है। सोमवार को लीड्स में उनकी सर्जरी होगी।
पंजाब किंग्स के खिलाफ आरआर के शुरूआती मैच के दौरान स्टोक्स को चोट तब लगी जब वह वेस्टइंडीज के बल्लेबाज क्रिस गेल का कोच डीप प्वाइंट में लपका था लेकिन इस दौरान वह चोटिल हो गए थे।
पूरे आईपीएल सीजन को मिस करने के अलावा, स्टोक्स को अब न्यूजीलैंड के खिलाफ इंग्लैंड की टेस्ट सीरीज से भी बाहर रहना होगा, जो 2 जून से शुरू हो रही है।
स्टोक्स ने शुरू में मैदान के बाहर से सहारा देने के लिए बाकी सीजन के लिए आरआर के साथ रहने का इरादा बनाया था।(आईएएनएस)
इस्लामाबाद, 16 अप्रैल | फ्रांस में पिछले साल पैगंबर के चित्र प्रकाशित करने के मुद्दे के खिलाफ कट्टरपंथी इस्लामवादी समूह के कार्यकर्ता हिंसक विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं, इस आशंका के साथ पाकिस्तान में शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर रोक लगा दी गई है। डीपीए समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के विवादास्पद ईशनिंदा कानूनों का समर्थन करने वाला समूह तहरीक-ए-लब्बैक के समर्थकों ने सोमवार को शुरू हुए घातक विरोध प्रदर्शनों के बीच सड़कों पर जाम लगा दिया।
उनकी मांग है कि पिछले साल नबी के चित्रण वाले कार्टून के प्रकाशन के मुद्दे पर 20 अप्रैल तक फ्रांसीसी राजदूत को निष्कासित करने के सरकार पहले किए गए अपने वादे को पूरा करे।
देश में हो रहे इन विरोध प्रदर्शनों में दो पुलिस अधिकारियों सहित कम से कम पांच लोगों की मौत हो गई है। हिंसा के माहौल को देखते हुए इस्लामाबाद में फ्रांसीसी दूतावास से कहा गया है कि वह फ्रांस के नागरिकों से अस्थायी रूप से पाकिस्तान छोड़ने की अपील करें।
एक अधिकारी ने डीपीए को बताया, सोशल मीडिया को कुछ घंटे के लिए ब्लॉक कर दिया गया है ताकि प्रदर्शनकारी जुम्मे की नमाज के वक्त कोई हंगामा खड़ा न कर सके।
राजधानी इस्लामाबाद सहित पूरे देश में फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप और टिकटॉक की सेवाएं ब्लॉक हैं।
दरअसल, राजनीतिक दल, इस्लामी समूह और तालिबान जैसे आतंकवादी संगठन अपने अनुयायियों के साथ जुड़ने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मो पर बहुत अधिक भरोसा करते हैं।
(आईएएनएस)
तेल अवीव, 16 अप्रैल | इजरायल में बाहर मास्क पहनने के नियम को रविवार से हटा दिया जाएगा। स्वास्थ्य मंत्री यूली एडेलस्टीन ने गुरुवार को घोषणा की। समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार, एडेलस्टीन ने गुरुवार को एक बयान में कहा कि उन्होंने मंत्रालय के महानिदेशक, हेजी लेवी को प्रतिबंध को रद्द करने के आदेश पर हस्ताक्षर करने का निर्देश दिया था।
मंत्रालय द्वारा सिफारिश पर निर्णय लिया गया था कि, कोविड -19 के मरीजों की संख्या कम होने के कारण अब इजरायल में बाहर मास्क पहनने की जरुरत नहीं है।
उन्होंने हालांकि कहा कि मास्क अभी भी घर के अंदर पहनने की आवश्यकता होगी।
एडेलस्टीन ने कहा, इजराइल में सफल टीकाकरण के कारण मरीजों की संख्या काफी कम है और इसलिए आगे नागरिकों के लिए प्रतिबंधों को और कम कर सकते हैं।
इजरायल ने देश में महामारी की शुरूआत के एक महीने बाद अप्रैल 2020 की शुरूआत में घर के बाहर फेस मास्क पहनना अनिवार्य किया था।
फेस मास्क न पहनने पर पहली बार जुर्माना 200 नए शेकेल ( 61) पर लगाया गया था, जिसे जुलाई 2020 में 500 शेकेल कर दिया गया था। (आईएएनएस)
नई दिल्ली. पाकिस्तान में ट्विटर, फेसबुक, यूट्यूब, वॉट्सऐप, टिकटॉक और टेलीग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को बैन कर दिया गया है. इन सोशल मीडिया ऐप्स पर सुबह 11 बजे से दोपहर 3 बजे तक रोक लगा दी गई है. शुक्रवार को पाकिस्तान के गृह मंत्रालय ने यह जानकारी दी. पाकिस्तान के मंत्रालय ने कहा कि पाकिस्तान टेलीकम्युनिकेशन अथॉरिटी ने दिशा-निर्देश देते हुए इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को बैन कर दिया है. पाकिस्तान के गृह मंत्रालय ने PTA को दिशानिर्देश देते हुए इन ऐप्स को ब्लॉक करने का आदेश दिया.
गौरतलब है कि इन सोशल मीडिया वेबसाइट्स और ऐप्स को 11 बजे से 3 बजे तक के लिए ब्लॉक करने का आदेश दिया गया है. हालांकि अभी तक इसकी वजह नहीं पता है कि ब्लॉक क्यों किया गया है. बता दें, पिछले कुछ दिनों से पाकिस्तान में तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान की तरफ से प्रदर्शन किए जा रहे हैं. बताया जा रहा है कि इसी प्रोटेस्ट की वजह से पाकिस्तान में सोशल मीडिया को ब्लॉक करने का फैसला लिया गया है. सोशल मीडिया बैन से पहले पाकिस्तानी TV चैनल्स से तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान के प्रोटेस्ट की कवरेज को भी बैन कर दिया गया है. Dawn की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान टेलीकॉम अथॉरिटी के चेयरमैन ने कहा है कि उनसे इस मैटर पर तत्काल ऐक्शन लेने को कहा गया है.
दरअसल पाकिस्तान में फ्रांस के खिलाफ कई धार्मिक संगठन प्रदर्शन कर रहे हैं. इनमें TLP भी शामिल है जिसे वहां बैन कर दिया गया है. फ्रांस के खिलाफ प्रदर्शन फ्रांस में पैंगबर मुहम्मद के कार्टून बनाए जाने को लेकर हो रहा है. इसी बीच फ्रांस ने भी अपने सिटिजन्स को पाकिस्तान छोड़ने का आदेश दिया है.
वॉशिंगटन, 16 अप्रैल | अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा 22 अप्रैल को इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से स्पेसएक्स क्रू ड्रैगन की दूसरी उड़ान को लॉन्च करने के लिए पूरी तरह से तैयार है। क्रू—2 को फ्लोरिडा में स्थित केनेडी स्पेस सेंटर के लॉन्च कॉम्प्लेस 39ए से 22 अप्रैल को स्थानीय समयानुसार सुबह 6 बजकर 11 मिनट पर चार अंतरिक्ष यात्रियों के साथ लॉन्च किया जाएगा।
नासा ने अपने दिए एक बयान में कहा है, इस मिशन में स्पेसक्राफ्ट कमांडर और पायलट की जिम्मेदारी नासा के ही अंतरिक्ष यात्री शेन क्रिम्ब्राह और मेगन मैकआर्थर पर है। इनके अलावा मिशन में जाक्सा (जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी) के अंतरिक्ष यात्री अकिहिको होशिदे और ईएसए (यूरोपीय स्पेस एजेंसी) के अंतरिक्ष यात्री थॉमस पेस्केट भी शामिल रहेंगे। ये स्पेस स्टेशन पर मिशन स्पेशलिस्ट की जिम्मेदारी को निभाएंगे।
यह मिशन नासा की छह प्रमाणित क्रू मिशनों में से दूसरा है, जिसमें स्पेसएक्स एजेंसी के कमर्शियल क्रू प्रोग्राम के एक हिस्से के रूप में उड़ान भरेगा। क्रू—1 को पिछले साल नवंबर में सफलतापूर्वक इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में लॉन्च किया गया था। (आईएएनएस)
जर्मनी अपनी दोहरी शिक्षा प्रणाली के लिए जाना जाता है. इसके तहत स्कूली शिक्षा के बाद किशोरों को व्यावसायिक प्रशिक्षण मिलता है. कोरोना महामारी के दौरान बहुत से किशोर प्रशिक्षण से वंचित हैं.
डॉयचे वैले पर महेश झा की रिपोर्ट-
कोरोना महामारी का असर यूं तो दुनिया भर में हुआ है, लेकिन जर्मनी में अर्थव्यवस्था के कुछ इलाके इसके खास चपेट में आए हैं. इसका असर पर्यटन, संस्कृति और रेस्तरां जैसे इलाकों में कारोबार और नौकरी पर हुआ है. इसका प्रभाव बहुत से नौजवानों के भविष्य पर भी पड़ा है, जिन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण की जगह नहीं मिल रही है. आने वाले महीनों में जर्मनी में स्कूली साल खत्म हो रहा है और व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए नया साल शुरू हो रहा है. इस मौके पर पर जो आंकड़े सामने आए हैं उसके अनुसार 2019 के मुकाबले 2020 में व्यावसायिक प्रशिक्षण के कॉन्ट्रैक्ट में करीब 10 फीसदी की कमी देखी गई.
सांख्यिकी कार्यालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार यह कमी अभूतपूर्व है. सांख्यिकी कार्यालय का कहना है कि हालांकि पिछले सालों में व्यावसायिक प्रशिक्षण की सीटों में कमी होती रही है, लेकिन पिछले साल जितनी कमी हुई है उतनी कभी नहीं हुई. पिछले साल 4,65,000 किशोरों ने व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए कॉन्ट्रैक्ट किया. सांख्यिकी कार्यालय के अनुसार उनमें दो तिहाई संख्या पुरुषों की थी. पिछले साल व्यावसायिक प्रशिक्षण की सीटें पाने में महिलाएं पुरुषों से और पीछे रही हैं. उनकी संख्या में 10.2 प्रतिशत की कमी आई.
जर्मनी के विभिन्न प्रांतों में व्यावसायिक प्रशिक्षण में कमी से पता चलता है कि किस प्रांत में अर्थव्यवस्था की क्या हालत है. हैम्बर्ग और जारलैंड में कमी साढ़े 12 प्रतिशत से ज्यादा रही है, जबकि राजधानी बर्लिन से सटे ब्रांडेनबुर्ग में सिर्फ 2.8 प्रतिशत. यह इसलिए भी है कि कृषि क्षेत्र में हालत उतनी खराब नहीं रही. उसमें एक साल पहले के मुकाबले 500 ज्यादा किशोरों को प्रशिक्षण का मौका मिला. उद्योग और व्यापार में 12 प्रतिशत की कमी और कारीगरी में 6.6 प्रतिशत की. कोरोना महामारी का असर खासकर उद्योग और व्यापार पर पड़ा है.
व्यावसायिक प्रशिक्षण का मकसद किशोरों को सैद्धांतिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण के साथ काम के लिए तैयार करना है. दो से तीन साल के व्यावसायिक प्रशिक्षण के दौरान ट्रेनी को तनख्वाह भी मिलती है. 2018 में ट्रेनी की औसत मासिक आय 908 यूरो थी. सबसे अच्छी तनख्वाह वाले व्यवसायों में शिप मैकेनिक, नर्स, राजमिस्त्री और बीमा क्लर्क आते हैं जिन्हें पहले साल करीब 1100 और तीसरे साल में 1500 यूरो से ज्यादा मिलता है. इन नौकरियों में सालाना तनख्वाह 35 से 40 हजार यूरो होती है.
जर्मनी की दोहरी शिक्षा प्रणाली अपने आप में अनूठी है जिसे देश में कम बेरोजगारी दर के लिए जिम्मेदार माना जाता है. तीन साल व्यावसायिक ट्रेनिंग के कारण देश में हमेशा प्रशिक्षित कुशल कर्मी उपलब्ध रहते हैं. जर्मनी के मिटेलश्टांड के नाम से विख्यात छोटे और मझौले उद्यम इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं क्योंकि देश के 10 में 8 ट्रेनी इन्हीं उद्यमों में ट्रेनिंग पाते हैं. इस सिस्टम की वजह से जर्मनी में 2019 में 15 से 24 साल के युवाओं में बेरोजगारी दर सिर्फ 5.8 प्रतिशत थी, जबकि यूरोप में यह दर 15 प्रतिशत थी. ग्रीस और स्पेन जैसे देशों में यह 30 प्रतिशत से ज्यादा है.
व्यावसायिक प्रशिक्षण एक तरह से नौकरी पाने की गारंटी है. 2018 में 71 प्रतिशत ट्रेनी को उन्हीं कंपनियों में नौकरी मिल गई जहां वे ट्रेनिंग पा रहे थे. श्रम बाजार शोध संस्थान के अनुसार 94 प्रतिशत ट्रेनी को तीन महीने के अंदर नौकरी मिल जाती है. जर्मनी में करीब 30 लाख छोटे और मझौले उद्यम हैं. देश के करीब 15 लाख ट्रेनीशिप में 80 प्रतिशत ट्रेनिंग इन्हीं उद्यमों में दी जाती है. प्रशिक्षण का बड़ा खर्च 70 प्रतिशत तक भी वही उठाते हैं. लेकिन उन्हें प्रशिक्षित कर्मचारियों की भर्ती पर कोई खर्च नहीं करना पड़ता क्योंकि 10 में सात ट्रेनी उन्ही कंपनियों में नौकरी कर लेते हैं.
(dw.com)
एक वित्तीय कंपनी के लिए सरकार में लॉबिंग के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल करने के आरोपों से घिरे ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के खिलाफ संसदीय जांच नहीं होगी.
डॉयचे वैले पर स्वाति बक्शी की रिपोर्ट-
ग्रीनसिल कैपिटल नाम की एक कंपनी के हक में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए मंत्रियों और सरकारी अधिकारियों की लामबंदी के मामले में कैमरन फंस गए हैं. उनके खिलाफ लेबर पार्टी ने संसदीय जांच की योजना रखी लेकिन प्रधानमंत्री बॉरिस जॉनसन ने अपने सांसदों से इसके खिलाफ वोट करने को कहा और प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया गया.
बॉरिस जॉनसन ने एक सरकारी वकील नाइजल बोर्डमैन को इस मामले में स्वतंत्र पुनरावलोकन का जिम्मा दिया है. बोर्डमैन अपनी सरकारी भूमिका से अलग रहकर ग्रीनसिल मामले के वित्तीय पहलुओं और लॉबिंग की जांच पूरी करेंगे. लेबर पार्टी ने इसे सत्ताधारी कंजरवेर्टिव पार्टी के भ्रष्टाचार की लीपा-पोती करार दिया है. डेविड कैमरन ने रविवार को एक लंबा बयान जारी करके कहा कि उन्होंने कोई नियम नहीं तोड़ा है लेकिन इतना जरूर है कि उन्हें "सिर्फ औपचारिक तरीकों से संवाद करना चाहिए था ताकि भ्रामक प्रचार की कोई गुंजाइश ना रहे."
क्या है ग्रीनसिल कंपनी का मामला?
इस ताजा विवाद के केंद्र में है ग्रीनसिल कैपिटल और उसकी नींव रखने वाले लेक्स ग्रीनसिल जो उस वक्त डेविड कैमरन के सलाहकार थे, जब वे प्रधानमंत्री पद पर थे. इसके चलते ग्रीनसिल की तमाम सरकारी महकमों में पहुंच बनी जिसके चलते उनकी कंपनी को जबरदस्त आर्थिक फायदा हुआ. हालांकि इस साल मार्च में यह कंपनी ठप हो गई. संडे टाइम्स अखबार की खोजी रिपोर्ट के मुताबिक ग्रीनसिल उस दौर में बनी ऐसी नीतियों के मुख्य कर्ताधर्ता रहे हैं, जिनसे छोटी कंपनियों को तुरत-फुरत में सरकारी सहायता मुहैया कराई जा सके. उनकी अपनी कंपनी ग्रीनसिल कैपिटल भी लाभ पाने वाली ऐसी कंपनियों में शामिल है.
2016 में अपना पद छोड़ने के बाद डेविड कैमरन साल 2018 में ग्रीनसिल से जुड़ गए. आरोप है कि उन्होंने ब्रिटेन के चांसलर ऋषि सुनक को लिखित संदेश भेजे और कई आला अधिकारियों और मंत्रियों तक अपनी पहुंच का इस्तेमाल करते हुए ग्रीनसिल कैपिटल को कोविड कॉरपोरेट वित्तीय सुविधा के तहत तात्कालिक सरकारी मदद दिलवाई.
ऋषि सुनक के संदेशों को बाद में सार्वजनिक किया गया, तो पता चला कि अप्रैल 2019 में उन्होंने डेविड कैमरन को कहा था कि वे उन्हें वित्तीय सुविधा का पूरा लाभ देने के लिए अपनी विभागीय टीम पर दबाव बना रहे हैं. कैमरन ग्रीनसिल कैपिटल से सलाहकार के तौर पर जुड़े और उन्हें इससे लाखों पाउंड का फायदा होने की बात कही जा रही है. 2019 में कैमरन ने ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्री मैट हैनकॉक और ग्रीनसिल के बीच एक निजी बातचीत भी करवाई.
इसके अलावा यह बात भी सामने आई है कि 2018 में ग्रीनसिल ने सप्लाई चेन फाइनैंस सेवा के जरिये राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा यानी एनएचएस से जुड़ा एक कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने में भी सफलता पाई. सप्लाई चेन फाइनैंस सेवा देने वाली कंपनियां एक निश्चित फीस के बदले किसी कंपनी के बिलों का भुगतान तुरंत करने में सहायता करती है.
ग्रीनसिल की सरकारी मंत्रालयों में पैठ और अधिकारियों से संबंधों की परतें धीरे धीरे खुल रही हैं. सांठगांठ का यह संकट इस मंगलवार से और गहराता नजर आया जब यह बात सामने आई कि वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी बिल क्रॉदर्स ने अपना पद छोड़ने से पहले ही ग्रीनसिल कैपिटल के सलाहकार के तौर पर काम करना शुरु कर दिया. चौंकाने वाली बात यह भी है कि उन्हें यह भूमिका निभाने के लिए आधिकारिक सहमति मिली हुई थी.
लॉबिंग के मायने और सवाल
ब्रिटेन में लॉबिंग राजनैतिक प्रक्रिया का मान्य हिस्सा है और सांसदों की लामबंदी आम बात है. लॉबिंग का मतलब है किसी नीति या जनहित के मसले पर सरकारी रुख को प्रभावित करने के लिए लामबंदी. इसके लिए लिखित सामग्री, ईमेल या सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जा सकता है. हालांकि इसके लिए कायदे-कानून तय हैं ताकि सांसदों में भ्रष्ट आचरण और सरकारी महकमों में पहुंच का इस्तेमाल निजी फायदे के लिए ना किया जाए. ब्रिटिश संसद की वेबसाइट के मुताबिक कोई भी व्यक्ति अपने सांसदों और हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्यों को लामबंद कर सकता है. लॉबिंग करने वालों में व्यवसाय, चैरिटी, दबाव गुट, ट्रेड यूनियन और औद्योगिक प्रतिनिधि शामिल हैं.
वर्तमान नियमों के मुताबिक ब्रिटेन में मंत्री और अहम प्रशासनिक अधिकारी पद छोड़ने के बाद दो साल तक लॉबिंग की प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हो सकते. औपचारिक रूप से लॉबिंग करने वाले व्यक्तियों का नाम एक रजिस्टर में दर्ज किया जाता है. डेविड कैमरन ने 2016 में प्रधानमंत्री पद से विदा ली और ग्रीनसिल के साथ 2018 में जुड़े. वे एक स्वतंत्र लॉबिस्ट या किसी लॉबिंग कंपनी के लिए काम नहीं कर रहे थे, बल्कि ग्रीनसिल का हिस्सा थे. इसलिए रजिस्टर में नाम दर्ज करने की बात भी उन पर लागू नहीं हुई.
ग्रीनसिल कैपिटल मामले में लॉबिंग से जुड़े कई अनसुलझे सवाल तो हैं लेकिन मामला कहीं अधिक पेचीदा है. उदाहरण के तौर पर लेक्स ग्रीनसिल डेविड कैमरन की सरकार में इतने भीतर तक पहुंच बनाने में कामयाब कैसे होते चले गए. एक सवाल यह भी है कि सरकार को एनएचएस से जुड़े भुगतान के लिए सप्लाई चेन फिनैंस सेवा लेने की जरूरत क्यों पड़ गई. ऋषि सुनक के संदेश और भूमिका पर सवालिया निशान हैं, तो एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी का अपने पद पर रहते हुए एक निजी कंपनी में काम करना, आला सरकारी अधिकारियों और निजी हितों के बीच गहरी सांठ-गांठ की चिंताजनक स्थिति की ओर इशारा करता है.
उम्मीद जताई गई है कि नाइजल बोर्डमैन ग्रीनसिल मामले में हुए वित्तीय फैसलों और लॉबिंग की प्रक्रिया पर अपनी रिपोर्ट जून के अंत तक देंगे. हालांकि लॉबिंग सरकारी महकमों और पूंजीवादी फायदों के उलझे तारों को यह रिपोर्ट सुलझा देगी, ऐसी उम्मीद बेमानी है.(dw.com)
कोरोना वायरस महामारी को शुरू हुए एक साल से अधिक का समय हो चुका है और इस समय ब्राज़ील में मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ता ही जा रहा है.
ऐसे साक्ष्य हैं जो बताते हैं कि कोरोना वायरस संक्रमण से किशोरों और युवाओं की मौत कम ही होती है लेकिन ब्राज़ील में अब तक इस वायरस के कारण 1,300 बच्चों की मौत हो चुकी है.
एक डॉक्टर ने जेसिका रिकर्ते के कोरोना से संक्रमित एक साल के बेटे को यह कहते हुए देखने से मना कर दिया था कि उसके लक्षण इस वायरस के प्रोफ़ाइल से मिलते जुलते नहीं हैं. दो महीने बाद उस बच्चे की इस वायरस से मौत हो गई.
पेशे से शिक्षक जेसिका ने दो साल तक लगातार फ़र्टिलिटी का इलाज कराया था और उसमें नाकाम होती रही थीं लेकिन आख़िरकार वो गर्भवती हो गईं.
वो कहती हैं, "उसका नाम रोशनी से जुड़ा हुआ था. वो हमारी ज़िदंगी में एक प्रकाश की तरह था. उसने हमें वो ख़ुशी दिखाई जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी."
उन्होंने अपने बेटे लूकस में सबसे पहले भूख न लगने की समस्या को देखा क्योंकि वो पहले अच्छी तरह से खाना खाता था.
जेसिका को पहले लगा कि दांत निकलने की वजह से ऐसा है लेकिन लूकस की गॉडमदर जो उनकी नर्स हैं उन्होंने कहा कि उसके गले में ख़राश हो सकती है लेकिन उसके बाद लूकस को बुख़ार शुरू हो गया और सांस लेने में दिक़्क़त होने लगी.
कोविड टेस्ट ना कराने से बढ़ीं मुश्किलें
जेसिका उसको अस्पताल लेकर गईं और कोविड टेस्ट करने के लिए उन्होंने कहा.
जेसिका कहती हैं, "डॉक्टर ने ऑक्सिमीटर के ज़रिए ऑक्सीजन चेक किया तो उसका स्तर 86% था. अब मैं जानती हूं कि यह साधारण नहीं है."
लेकिन उसे तेज़ बुख़ार नहीं था तो डॉक्टर ने कहा, "चिंता करने की बात नहीं है और कोविड टेस्ट की ज़रूरत नहीं है. शायद यह गले में ख़राश की मामूली दिक़्क़त है."
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डॉक्टर ने जेसिका से कहा कि कोविड-19 बच्चों में बेहद दुर्लभ है और उसने कुछ एंटिबायोटिक्स दवाइयां देकर उन्हें घर भेज दिया. इन संदेहों के बावजूद लूकस का प्राइवेट जगह से टेस्ट कराया जा सकता था.
जेसिका कहती हैं कि 10 दिन के एंटिबायोटिक्स के कोर्स के अंतिम दिन तक उसके लक्षण कम होते चले गए लेकिन उसकी थकान बरक़रार रही जिसके कारण उन्हें कोरोना वायरस की चिंता होने लगी.
वो कहती हैं, "मैंने कई वीडियो उसकी गॉडमदर, अपने परिजनों, मेरी सास और कई लोगों को भेजे तो उनका कहना था कि मैं इसके बारे में बहुत ज़्यादा ही सोच रही हूं. उन्होंने मुझे न्यूज़ देखने से मना किया क्योंकि उनका मानना था कि यह मुझे भ्रम में डाल रहा है. लेकिन मैं जानती थी कि मेरा बेटा ख़ुद से सांस नहीं ले पा रह है."
यह मई 2020 की बात है जब कोरोना वायरस महामारी लगातार फैल रही थी और उत्तर-पूर्व ब्राज़ील के तंबोरिल के सिएरा शहर में दो लोगों की मौत हो चुकी थी.
"हर कोई एक दूसरे को जानता था और पूरा शहर सदमे में था."
जेसिका के पति इसराइल को चिंता थी कि दूसरे अस्पताल में जाने पर संक्रमण का ख़तरा बढ़ जाएगा और जेसिका और लूकस वायरस से संक्रमित हो जाएंगे.
लेकिन कई सप्ताह तक लूकस और अधिक सोने लगा तो आख़िरकार तीन जून को खाना खाने के बाद लूकस को लगातार उल्टियां होने लगीं.
जेसिका स्थानीय अस्पताल में गईं और उन्होंने उसका कोविड टेस्ट कराया.
लूकस की गॉडमदर जो वहां पर काम करती थीं उन्होंने बताया कि लूकस का कोविड टेस्ट पॉज़िटिव आया है.
अधिकतर बच्चों में MIS की स्थिति
जेसिका कहती हैं कि उस समय अस्पताल में रिसस्क्युरेटर (कृत्रिम तरीक़े से सांस देने वाली मशीन) तक नहीं था.
लूकस को सोबराल के पेडिएट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट में भेजा गया जो वहां से दो घंटे की दूरी पर था. वहां पर पता चला की लूकस को मल्टी-सिस्टम इनफ़्लेमेट्री सिंड्रोम (MIS) की शिकायत है.
यह ऐसी स्थिति होती है जिसमें वायरस के ख़िलाफ़ प्रतिरोधक क्षमता चरम पर होती है जिसके कारण महत्वपूर्ण अंगों में सूजन आ जाती है.
विशेषज्ञ कहते हैं कि यह स्थिति छह सप्ताह से अधिक आयु के बच्चों में कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बाद आ सकती है लेकिन यह बेहद दुर्लभ है.
लेकिन साओ पाउलो विश्वविद्यालय की महामारी रोग विशेषज्ञ डॉक्टर फ़ातिमा मारिन्हो का कहना है कि उन्होंने महामारी के दौरान अब तक MIS के सबसे अधिक मामले देखे हैं लेकिन यह सभी मौतों के लिए ज़िम्मेदार नहीं है.
लूकस को जब अस्पताल में भर्ती किया गया तो जेसिका को उसी कमरे में रहने की अनुमति नहीं थी. उन्होंने अपनी ननद को अपने पास बुला लिया.
वो कहती हैं, "हम मशीन की बीप की आवाज़ सुन सकते थे जब तक मशीन बंद नहीं होती है तब तक लगातार बीप की आवाज़ आती रहती है. हम जानते हैं कि कोई व्यक्ति कब मरता है. कुछ मिनटों के बाद मशीन बंद होकर फिर चलने लगी और हमारा रोना शुरू हो गया."
डॉक्टर का कहना था कि लूकस को दिल का दौरा पड़ा था लेकिन वे उसे बचाने में सफल हो गए थे.
बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर मेनुएला मोंते ने एक महीने तक लूकस का सोबराल के आईसीयू में इलाज किया. वो कहती हैं कि उन्हें आश्चर्य है कि लूकस की स्थिति बेहद चिंताजनक थी क्योंकि उसमें इस तरह के गंभीर लक्षण होने का कोई कारण नहीं था.
राज्य की राजधानी फोर्तालेज़ा के अलबर्ट सबिन चिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल में बाल रोग विशेषज्ञ लोहोना तावारेस का कहना है कि जो भी बच्चे कोविड से संक्रमित पाए गए उनमें डायबिटीज़, हृद्य संबंधी और मोटापे जैसी अन्य बीमारियां भी थीं.
लेकिन लूकस के साथ ऐसा बिलकुल नहीं था.
लूकस आईसीयू में 33 दिन तक रहा और जेसिका उसे सिर्फ़ 3 बार ही मिल पाईं. लूकस को उसके दिल के लिए इम्युनोग्लोबुलिन दवाई की ज़रूरत थी जो कि बेहद महंगी है लेकिन सौभाग्य से एक मरीज़ ने उस दवा की एक ख़ुराक को अस्पताल को दे दिया था.
लूकस बेहद बीमार था इसलिए उसे इम्युनोग्लोबुलिन की दूसरी ख़ुराक की ज़रूरत थी. उसके शरीर पर लाल निशान पड़ने लगे और उसे लगातार बुख़ार आने लगा. उसे सांस लेने के लिए सपोर्ट की ज़रूरत थी.
लूकस की जब तबीयत थोड़ी ठीक हुई और वो ख़ुद से सांस लेने लगा तो डॉक्टर ने ट्यूब हटा दी. उन्होंने जेसिका और इज़रायल को वीडियो कॉल किया ताकि होश में आने के बाद लूकस ख़ुद को अकेला न महसूस करे.
जेसिका कहती हैं, "उसने जब हमारी आवाज़ सुनी तो उसने रोना शुरू कर दिया."
यह आख़िरी बार था जब उन्होंने अपने बेटे को कोई प्रतिक्रिया देते हुए पाया था. अगले वीडियो कॉल में 'वो ऐसे था जैसे उसके शरीर में जान ही नहीं है.' अस्पताल ने एक सीटी स्कैन कराने के लिए कहा और पाया कि लूकस को स्ट्रोक हुआ है.
तब तक दोनों पति-पत्नी से कहा गया कि लूकस बेहतर तरीक़े से ठीक हो रहा है और उसे जल्द ही आईसीयू से निकालकर जनरल वॉर्ड में शिफ़्ट कर दिया जाएगा.
जेसिका ने बताया कि वो और इज़रायल जब उसे देखने के लिए पहुंचे तो डॉक्टर पहले की तरह आशावान थे.
उन्होंने कहा, "उस रात मैंने अपने सेल फ़ोन को साइलेंट कर दिया. मैंने सपने में देखा कि लूकस मेरे पास आया है और मेरी नाक को चूम रहा है. वह सपना प्यार, समर्पण की एक बड़ी भावना थी और मैं बहुत ख़ुशी-ख़ुशी सोकर उठी थी. मैंने जब अपना फ़ोन देखा तो पाया कि उसमें डॉक्टर की 10 मिस्ड कॉल थीं."
डॉक्टर ने जेसिका को कहा कि लूकस का हार्ट रेट और ऑक्सीजन लेवल बेहद तेज़ी से गिर रहा था और सुबह को उसकी मौत हो गई.
जेसिका लोगों को कर रही हैं जागरूक
वो मानती हैं कि लूकस का अगर कोविड टेस्ट उनके निवेदन करने के बाद मई की शुरुआत में ही हो चुका होता तो वो आज ज़िंदा होता.
वो कहती हैं, "यह ज़रूरी है कि अगर डॉक्टर यह मानते हैं कि यह कोविड नहीं है तो भी उन्हें इसकी पुष्टि के लिए टेस्ट करना चाहिए."
"एक बच्चा नहीं कह सकता है कि वो कैसा महसूस कर रहा है इसलिए हमें टेस्ट पर निर्भर रहना होता है."
इज़रायल और जेसिका
जेसिका का मानना है कि उचित उपचार में देरी के कारण उसकी स्थिति ख़राब हुई. "लूकस को कई दिक़्क़तें शुरू हो चुकी थीं. फेफड़े 70 फ़ीसदी तक काम कर रहे थे, दिल 40 फ़ीसदी तक फैल चुका था. यह ऐसे स्थिति थी जिससे बचा जा सकता था."
डॉक्टर मोंते कहती हैं कि MIS कभी नहीं रोका जा सकता है इसका उपचार तब सफल होता है जब इसका इलाज शुरुआती चरण में ही शुरू हो जाए.
जेसिका अब उन लोगों को लूकस की कहानी सुनाकर उनकी मदद करना चाहती हैं जो गंभीर लक्षणों को नज़रअंदाज़ कर जाते हैं.
"मैं उन लोगों के लिए यह कर रही हूं जो काश मेरे लिए यह कर पाते. अगर मेरे पास जानकारी होती तब मैं और सतर्क होती."
बच्चों पर कोविड का कम ख़तरा होता है?
डॉक्टर फ़ातिमा मारिन्हो कहती हैं कि यह एक ग़लतफ़हमी है कि बच्चों पर कोविड का कोई ख़तरा नहीं होता है. उनकी रिसर्च में पाया गया है कि इस वायरस से भारी संख्या में बच्चे और शिशु संक्रमित हुए हैं.
ब्राज़ील के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक़, फ़रवरी 2020 से लेकर 15 मार्च 2021 तक कोविड-19 के कारण नौ साल की आयु तक के कम से कम 852 बच्चों और एक साल की आयु तक के 518 बच्चों की मौत हुई है.
हालांकि, डॉक्टर मारिन्हो का अनुमान है कि यह संख्या दोगुनी हो सकती है. उनका मानना है कि कोविड टेस्टिंग कम होने की गंभीर समस्या के कारण भी नंबर कम हैं.
डॉक्टर मारिन्हो का आंकलन है कि महामारी के दौरान अनस्पेसिफ़ाइड अक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम से होने वाली मौतें पिछले साल की तुलना में 10 गुना अधिक हैं.
इन आंकड़ों को जोड़ते हुए वो बताती हैं कि वायरस ने 1,302 शिशुओं समेत 9 साल से कम आयु के 2,060 बच्चों की जान ली है.
आख़िर ऐसा क्यों हो रहा है?
विशेषज्ञों का मानना है कि ब्राज़ील में कोरोना के सबसे अधिक मामले बढ़ने की वजह यहां के शिशुओं और बच्चों के संक्रमित होने के कारण भी हो सकता है.
ब्राज़ीलियन सोसाइटी ऑफ़ पेडिएट्रिक्स के साइंटिफ़िक डिपार्टमेंट ऑफ़ इम्युनाइज़ेशन के अध्यक्ष रेनाटो कफ़ूरी कहते हैं, "हमारे यहां बिलकुल बहुत अधिक मामले आ रहे हैं और बहुत अधिक लोग अस्पताल में भर्ती हो रहे हैं और बच्चों समेत हर आयु के लोगों में अधिक मौतें हो रही हैं. अगर महामारी पर नियंत्रण किया जाता तो इन हालात को कम किया जा सकता था."
ब्राज़ील कोरोना संक्रमण के मामलों में अभी दुनिया में दूसरे नंबर पर है. देश में इसके कारण स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है. पूरे देश में ऑक्सीजन सप्लाई की कमी होती जा रही है, बुनियादी दवाओं की कमी है और देश के कई अस्पताल में आईसीयू बेड्स खाली नहीं हैं.
वहीं, ब्राज़ील के राष्ट्रपति ज़ायर बोलसोनारू ने लॉकडाउन का विरोध किया है और देश में P.1 नामक एक नए वैरिएंट का पता चला है जो कि अधिक संक्रामक समझा जा रहा है. महामारी की शुरुआत से किसी भी महीने की तुलना में पिछले महीने मरने वालों का आंकड़ा दोगुना रहा है.
टेस्टिंग की कमी के कारण बच्चों में इसके अधिक मामले पाए जाने की समस्या सामने आ रही है.
मारिन्हो कहती हैं कि बच्चों में कोविड के बारे में तब पता चल रहा है जब वे गंभीर रूप से बीमार हो जा रहे हैं. वो कहती हैं, "मामलों के पकड़ने की गंभीर समस्या का सामना हमें करना पड़ रहा है. आम जनता के लिए हमारे पास पर्याप्त टेस्ट नहीं हैं और बच्चों के लिए भी बहुत कम हैं. बीमारी के बारे में पता चलने में देरी हो रही है जिसके कारण बच्चों के इलाज में देरी हो रही है."
बच्चों में इस बीमारी के बारे में देर से पता चलने की वजह केवल कम टेस्टिंग ही नहीं है बल्कि कोविड-19 से संक्रमित बच्चों के लक्षण, विभिन्न आयु के युवा वर्ग के लक्षणों से अलग होते हैं जिसके कारण इसका पता लगाने में मुश्किल हो रही है.
वो कहती हैं, "आम कोविड के लक्षणों के मुकाबले बच्चों में डायरिया की अधिक दिक़्क़त है, इसमें उन्हें पेट दर्द और सीने में भी दर्द होता है. इसका पता चलने में देरी होती है तो बच्चा जब तक अस्पताल पहुंचता है तब तक उसकी हालत गंभीर हो चुकी होती है."
इसकी एक वजह ग़रीबी और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी भी है.
20 साल की आयु से कम के 5,857 कोविड-19 मरीज़ों को लेकर किए गए एक शोध से पता चलता है कि बच्चों में कोविड-19 की इतनी बुरी स्थिति के लिए अन्य बीमारियां और सामाजिक-आर्थिक दिक़्क़तें भी बड़ी वजहें हैं.
मारिन्हो इस पर सहमति जताते हुए कहती हैं, "अधिकतर मरीज़ काले बच्चे या फिर वे हैं जो ग़रीब परिवारों से आते हैं या जिनके पास मदद नहीं पहुंच पाती है. इन बच्चों पर भी मौत का अधिक ख़तरा है."
वो कहती हैं कि छोटे घरों में अधिक लोगों के रहने के कारण सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं हो पाता है और ग़रीब समुदायों में स्थानीय स्तर पर आईसीयू की व्यवस्था नहीं होती है.
इसके अलावा इन बच्चों में कुपोषण की भी समस्या होती है जिसके कारण इनकी प्रतिरोधक क्षमता बेहद बुरी होती है.
मारिन्हो कहती हैं, "कोविड के कारण करोड़ों लोगों को ग़रीबी का मुंह देखना पड़ा है. एक साल के अंदर 70 लाख से 2.1 करोड़ लोग ग़रीबी रेखा के नीचे जा सकते हैं. लोग भूखे हैं. ये सब मृत्यु दर पर असर डाल रहा है."
साओ पाउलो स्कूल ऑफ़ मेडिसिन के ब्रायन सूसा कहते हैं कि उनके शोध के अनुसार बच्चों के कुछ समूहों पर अधिक ख़तरा है इसलिए इन्हें कोविड का टीका पहले देना चाहिए. वर्तमान में 16 साल से कम आयु के बच्चों के लिए टीकाकरण की कोई व्यवस्था नहीं है.
कोरोना महामारी की शुरुआत से संक्रमण के डर के कारण आईसीयू में परिजन बच्चों से नहीं मिल सकते हैं.
अलबर्ट सबिन चिल्ड्रेंस हॉस्पिटल में आईसीयू में तैनात डॉक्टर सिनेरा कारनेइरो कहती हैं कि यह बहुत चुनौतीपूर्ण है क्योंकि परिजन ही बता सकते हैं कि उनके बच्चे कब कैसा महसूस करते हैं क्योंकि वे उनके दर्द या मनोवैज्ञानिक पीड़ा को समझ सकते हैं.
वो कहती हैं कि जब परिजन अपनी ग़ैर-मौजूदगी में अपने बच्चों की तबीयत के बारे में सुनते हैं तो वे परेशान हो जाते हैं क्योंकि वे उनके साथ वहां मौजूद रहना चाहते हैं.
डॉक्टर कारनेइरो कहती हैं, "बिना परिजनों की मौजूदगी में एक बच्चे की मौत बेहद पीड़ादायक है."
परिजनों और बच्चों के बीच बातचीत को सुधारने की कोशिश के तौर पर अलबर्ट सबिन हॉस्पिटल ने वीडियो कॉल के लिए फ़ोन और टैबलेट ख़रीदे हैं.
डॉक्टर कारनेइरो कहती हैं कि इसने बहुत मदद की है, "परिजनों और मरीज़ों के बीच में हम 100 से अधिक वीडियो कॉल कर चुके हैं. इस तरह की बातचीत तनाव कम करती है."
वैज्ञानिकों का तर्क है कि इस आयु वर्ग में मौत का ख़तरा अभी भी 'बेहद कम' है. वर्तमान आंकड़े बताते हैं कि ब्राज़ील में कोविड के कारण अब तक हुई 345,287 मौतों में से 0.58% उन लोगों की मौतें थीं जो 0-9 आयु वर्ग के बच्चे थे लेकिन यह संख्या भी 2,000 से अधिक बच्चों की है.
रॉयल कॉलेज ऑफ़ पेडिएट्रिक्स एंड चाइल्ड हेल्थ ने परिजनों को सलाह दी है कि वे आपातकालीन मदद तभी मांगें जब उनके बच्चों को यह दिक़्क़तें हों:
जब उसके शरीर पर लाल निशान दिखने लगे या छूने पर असामान्य रूप से उसका शरीर ठंडा महसूस हो.
सांस लेने में वो रुक रहा हो या अनियमित तरीक़े से सांस ले रहा हो या फिर सांस लेते वक़्त अजीब आवाज़ें निकाल रहा हो.
सांस लेने में दिक़्क़त हो या फिर उत्तेजित हो जाए या किसी बात पर प्रतिक्रिया न दे.
होंठ नीले पड़ जाएं, सुस्त हो या व्याकुल दिखे.
किशोर लड़कों के अंडाकोश में दर्द हो. (bbc.com)
सोफिया, 15 अप्रैल | बुल्गारिया के प्रधानमंत्री बॉयो बोरिसोव ने गुरुवार को अपनी गठबंधन सरकार से इस्तीफा दे दिया, जैसा कि इस महीने की शुरुआत में संसदीय चुनाव के बाद माना जा रहा था। समाचार एजेंसी डीपीए की रिपोर्ट के मुताबिक, नव निर्वाचित संसद के अंतरिम अध्यक्ष मीका साकोवा ने यह घोषणा की।
वह 2017 से प्रधानमंत्री के पद पर काबिज थे।
2020 में गर्मियों में विरोध प्रदर्शनों के दौरान भ्रष्टाचार के आरोपों पर हजारों प्रदर्शनकारियों ने उनके इस्तीफे की मांग की थी।
4 अप्रैल को हुए चुनाव में बोरिसोव समर्थक यूरोपीय पॉपुलिस्ट जीईआरबी पार्टी यूरोपीय संघ और नाटो सदस्य राज्य में 26 प्रतिशत वोट के साथ फिर से सबसे मजबूत पार्टी बनी थी, लेकिन संसद में बहुमत नहीं जुटा पाई।
तीन विपक्षी दलों ने भी नई संसद में पहुंची, जिसके बाद कुल छह राजनीतिक बल बने।
सोफिया की नई संसद ने गुरुवार को अपने कन्स्टिचूअन्ट सत्र के लिए बैठक की।(आईएएनएस)
गुवाहाटी/अगरतला, 14 अप्रैल| अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने रोंगाली बिहू, पोहेला बोइशाख और संक्रांति जैसे त्योहारों को मनाने वाले लोगों को शुभकामनाएं दी हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों, दक्षिण एशियाई और दक्षिण पूर्व एशियाई नागरिकों को सोशल मीडिया के माध्यम से उनके नववर्ष पर शुभकामनाएं दीं।
बाइडेन ने अपने आधिकारिक फेसबुक पेज पर मंगलवार को लिखा, जिल (प्रथम महिला) और मैं (बाइडेन) दक्षिण एशिया एवं दक्षिण पूर्व एशियाई समुदायों को वैशाखी, नवरात्रि और इस सप्ताह आगामी नववर्ष की शुभकामनाएं देते हैं।
इसके साथ ही बाइडेन ने अल्थ अवुरुदा, बिहू, चैती चंद, गुड़ी पड़वा, खमेर नववर्ष, नवरेह, पोइला बोइशाख, पाना संक्रांति, पी माई, पुथंडु, रोंगाली बिहू, सोंगक्रान, तमिल नव वर्ष, उगादी और विशु को लेकर भी अपनी शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने कहा कि आशा के इस मौसम में, हम कामना कर रहे हैं कि यह नव वर्ष आपके और आपके परिवार के लिए समृद्धि और प्रकाश लेकर लाए।
इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लोगों को इन त्योहारों की शुभकामनाएं दीं हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने ओडिशा के लोगों को उड़िया नववर्ष और महा बिशुबा पना संक्रांति पर अपनी शुभकामनाएं दी हैं। एक ट्वीट में मोदी ने सभी को उड़िया नववर्ष की शुभकामनाएं देते हुए कहा, उड़िया नववर्ष और महा बिशुबा पना संक्रांति के पावन अवसर पर ओडिशा के लोगों को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं। मैं प्रार्थना करता हूं कि आने वाले वर्ष में आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हों। प्रत्येक व्यक्ति को स्वस्थ्य और प्रसन्न रहे।
मोदी ने पुथांडु के पावन उत्सव पर दुनिया भर के और तमिलनाडु के तमिल भाइयों और बहनों को अपनी शुभकामनाएं दी हैं।
मोदी ने एक ट्वीट में कहा, तमिल संस्कृति की महानता उज्जवल रहे। इस प्रसन्नतापूर्ण और पावन दिवस पर मैं प्रार्थना करता हूं कि नया वर्ष सभी के जीवन को स्वास्थ्य, प्रसन्नता और समृद्धि से परिपूर्ण कर दे। (आईएएनएस)
न्यूयॉर्क, 14 अप्रैल | दैनिक जीवन में एल्गोरिदम की दखल पर बढ़ती चिंता के बावजूद, एक नए शोध से पता चलता है कि लोग मनुष्यों की तुलना में एल्गोरिदम पर भरोसा करने की अधिक संभावना रखते हैं, खासकर अगर कोई कार्य बहुत चुनौतीपूर्ण हो। अपनी प्लेलिस्ट पर अगला गीत चुनने से लेकर सही आकार की पैंट चुनने तक, लोग रोजमर्रा के निर्णय लेने में मदद करने और अपने जीवन को सुव्यवस्थित करने के लिए एल्गोरिदम की सलाह पर अधिक भरोसा कर रहे हैं।
जॉर्जिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ता एरिक बोगर्ट ने कहा, "एल्गोरिदम बड़ी संख्या में कार्य करने में सक्षम हैं और वह जो कार्य करने में सक्षम है, उसमें हर दिन व्यावहारिक रूप से विस्तार भी हो रहा है।"
बोगर्ट ने यह भी कहा कि ऐसा लगता है कि एल्गोरिदम पर अधिक से अधिक झुकाव के लिए एक पूर्वाग्रह भी है।
जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित अध्ययन के लिए टीम में 1,500 व्यक्ति शामिल रहे और लोगों को एक तस्वीर का मूल्यांकन करने को कहा गया।
टीम ने स्वयंसेवकों को भीड़ की एक तस्वीर में लोगों की संख्या गिनने के लिए कहा और इसके साथ ही अन्य लोगों के समूह द्वारा तैयार किए गए सुझावों और एल्गोरिदम द्वारा उत्पन्न सुझावों को प्रदर्शित करने को कहा।
शोधकर्ता ने कहा कि जैसे ही फोटोग्राफ में लोगों की संख्या का विस्तार हुआ और इनकी गिनती अधिक कठिन हो गई तो लोगों ने खुद से गिनने के बजाय एक एल्गोरिथम की ओर से उत्पन्न सुझाव का पालन करने को तवज्जो दी।
शोधकर्ता के अनुसार, परीक्षण कार्य के रूप में मतगणना का विकल्प काफी महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि फोटो में लोगों की संख्या बढ़ने पर यह कार्य निष्पक्ष रूप से कठिन हो जाता है। यह उस प्रकार का कार्य भी रहा, जिसके लिए लोग कंप्यूटर पर अधिक भरोसे की उम्मीद करते हैं। (आईएएनएस)
चीन में टीकाकरण अभियान की शुरुआत बहुत धीमी रही है. अब, जबकि चीन देश भर में टीकाकरण की दर को बढ़ाना चाहता है, तो लोगों को सुरक्षा और देश में मौजूद टीकाकरण की क्षमता को लेकर आशंकाएं पैदा हो रही हैं.
डॉयचे वैले पर विलियम यांग की रिपोर्ट-
दुनिया भर के तमाम देश जहां कोरोना वायरस के संक्रमण की दूसरी लहर को रोकने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों तक कोरोना वैक्सीन को पहुंचाने की कोशिश में लगे हैं वहीं चीन में टीकाकरण की दर को बढ़ाने के लिए पुरस्कार और दंड का सहारा लेना पड़ रहा है. 11 अप्रैल तक चीन में टीके की सिर्फ 16.73 करोड़ खुराक ही लोगों को दी जा सकी थी जो कि लक्ष्य से बहुत पीछे है. चीन में सरकार का लक्ष्य है कि जून महीने के अंत तक 56 करोड़ लोगों यानी करीब 40 फीसद आबादी का टीकाकरण कर दिया जाए.
इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अलग-अलग शहर और अलग-अलग संस्थाएं अलग-अलग तरीके अपना रही हैं. मसलन, कहीं-कहीं टीका लगवाने वालों को उपहार दिए जा रहे हैं तो कुछ जगहों पर अध्यापकों से कहा जा रहा है कि वो छात्रों के अभिभावकों से पूछें कि उनका टीकाकरण हुआ है या नहीं. यही नहीं, कुछ निजी कंपनियां तो अपने कर्मचारियों पर दबाव डाल रही हैं कि वो टीका लगवाएं अन्यथा उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाएगा.
देश के दक्षिणी हिस्से में स्थित औद्योगिक केंद्र शेनजेन में जगह जगह बैनर लगे हैं जिन पर लोगों को टीका लगवाने की सलाह देने वाले नारे लिखे हुए हैं और एक जगह एक अध्यापक वी चैट ग्रुप में अभिभावकों को अपने टीकाकरण का विवरण देने के लिए दबाव बना रहा है. ली सरनेम वाली एक महिला ने डीडब्ल्यू को बताया, "जब तक किसी व्यक्ति के साथ स्वास्थ्य संबंधी कोई विशेष दिक्कत न हो, तो हर व्यक्ति को टीका लगवाना जरूरी कर दिया गया है.”
शेनजेंग के एक सार्वजनिक अस्पताल में काम करने वाली ली बताती हैं कि उनके तमाम सहयोगियों को यह नहीं बताया गया है कि उन्हें कौन सी वैक्सीन दी गई है. ली कहती हैं कि टीका लगवाने से वो इसलिए बच गईं क्योंकि उन्होंने अपनी ऐसी शारीरिक समस्या का प्रमाण दे दिया था जिसमें टीका लगवाने से दिक्कत हो सकती थी. हालांकि वो ये भी कहती हैं कि तमाम निजी संस्थाओं में इसके बावजूद टीका लगवाना पड़ रहा है क्योंकि वहां कर्मचारियों को टीका न लगवाने पर नौकरी से निकालने की धमकी दी जा रही है.
टीकाकरण प्रोत्साहन के लिए धमकी दी जा रही है
ली कहती हैं, "मेरी एक दोस्त की कंपनी ने पिछले महीने कहा कि यदि वह टीका नहीं लगवाती है तो उसे नौकरी से निकाल दिया जाएगा. जबकि मेरी दोस्त उस समय अपने नवजात शिशु को स्तनपान करा रही थी. तमाम लोग जो पहले चाइनीज वैक्सीन लगवाने से बच गए थे, अब सरकार के दबाव और तमाम धमकियों की वजह से उन्हें भी लगवाना पड़ रहा है.” डीडब्ल्यू के स्रोतों के मुताबिक, कोरोना वायरस संक्रमण के शुरुआती केंद्र रहे वुहान शहर में पिछले कुछ हफ्तों से वहां के नागरिकों को टीकाकरण के लिए तैयार किया जा रहा है. हालांकि तमाम लोग अपने आप भी टीका लगवा रहे हैं, लेकिन बहुत से लोगों का कहना है कि टीकाकरण के बारे में सूचनाएं छिपाई जा रही हैं और लोगों के पास ये जानने के बहुत कम स्रोत हैं कि जिन देशों में चीन में बने टीके लगाए गए हैं, वहां अब क्या स्थिति है.
लिन सरनेम वाले एक व्यक्ति का कहना था, "वुहान में बहुत से लोग सिर्फ यह जानते हैं कि कुछ देश चीन से टीका आयात कर रहे हैं लेकिन वो ये नहीं जानते कि टीकाकरण शुरू होने के बाद इन टीकों की वजह से पॉजिटिव मामलों में कमी आई है या नहीं. वुहान में हर व्यक्ति को सिनोफार्म नाम की वैक्सीन दी जा रही है लेकिन पड़ोसी शहरों में कुछ लोगों को सिनोवैट नाम की वैक्सीन दी जा रही है.”
सबसे ज्यादा चिंता सुरक्षा को लेकर है
कई चीनी नागरिकों ने टीका न लगवाने के पीछे सुरक्षा की चिंता और टीके की क्षमता को वजह बताया है. 11 अप्रैल को चीन में रोग नियंत्रण विभाग के एक बड़े अधिकारी ने कहा कि चीन में मौजूदा टीकों ने निम्न स्तर की सुरक्षा प्रदान की है और ऐसा माना जा रहा है कि इनकी क्षमता को बढ़ाने के लिए विभिन्न टीकों का मिश्रण बनाने की रणनीति अपनाई जा रही है. चीन में सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के डायरेक्टर गाओ फू कहते हैं, "टीकों की बहुत उच्च सुरक्षा दर न होने की समस्या को हम जल्द ही सुलझा लेंगे. अब यह औपचारिक विचार के तहत हो रहा है कि क्या हमें टीकाकरण प्रक्रिया में विभिन्न तकनीक वाले अलग-अलग टीकों का प्रयोग करना चाहिए या नहीं.” बाद में चीन के एक सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स से बातचीत में गाओ कहते हैं, कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उनकी टिप्पणियों की बिल्कुल गलत व्याख्या की.
अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर पॉलिसी, आउटकम्स एंड प्रिवेंशन के डायरेक्टर जैसन वांग ने डीडब्ल्यू को बताया कि चीन ज्यादा से ज्यादा लोगों के टीकाकरण के लिए "दंड और पुरस्कार” की रणनीति अपना रहा है. हालांकि उनका मानना है कि टीकाकरण में तेजी लाने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि टीके को लेकर लोगों की गलतफहमियों को दूर किया जाए. डीडब्ल्यू से बातचीत में वांग कहते हैं, "लोगों को वैक्सीन लेने के लिए प्रेरित करने का एक तरीका यह है कि उन्हें प्रोत्साहन दिया जाए और हर सरकार यह कर सकती है. यदि लोगों को कोई ऐसी चीज लेने के लिए दबाव डाला जाए जिसे वो अपने लिए नुकसानदेह समझ रहे हैं तो इससे लोगों का सरकार पर भरोसा कम हो जाएगा.”
दूसरी ओर, चीन ने पिछले कुछ महीनों में एक आक्रामक "वैक्सीन कूटनीति” कार्यक्रम की शुरूआत की है जिसके तहत दुनिया के कई देशों को वो लाखों टीकों का निर्यात कर रहा है. हालांकि चिली जैसे कई देश चीनी टीकों से देश की बड़ी जनसंख्या का टीकाकरण करने के बावजूद कोविड की एक नई लहर से जूझ रहे हैं.
चीन का टीकों का उत्पादन बढ़ाने पर जोर
कुछ चीनी नागरिक सुरक्षा कारणों से वैक्सीन लेने से हिचक रहे हैं जबकि कई अन्य लोगों को कहना है कि चीन में बनी कोरोनावायरस वैक्सीन की अपेक्षाकृत कमजोर क्षमता कोई बड़ा मुद्दा नहीं है. कुछ लोग जो टीका लगवाने में दिलचस्पी ले रहे हैं, उसके पीछे मुख्य कारण ये लगता है कि देश के एक बड़े हिस्से में पिछले कुछ महीनों में एक भी पॉजिटिव केस नहीं मिला है. बीजिंग में ल्यू सरनेम वाली एक महिला ने डीडब्ल्यू को बताया, "मुझे लगता है कि चीन का ज्यादातर हिस्सा अब वायरस मुक्त हो चुका है. मैं बचाव के तरीकों को शुरू से ही अपना रही हूं इसलिए अब मैं संक्रमित होने से नहीं डर रही हूं. मेरे आस-पास तमाम लोगों ने स्वेच्छा से टीका लगवा लिया है और कुछ लोग इस डर से लगवा रहे हैं कि ऐसा न करने पर कहीं भविष्य में उन्हें अन्य देशों की यात्रा करने से रोक दिया जाए.”
चीन की सरकारी न्यूज एजेंसी शिनहुआ के मुताबिक, देश में ज्यादातर वैक्सीन निर्माताओं ने उत्पादन क्षमता को बढ़ा दिया है और गाओ फू कहते हैं कि चीन का लक्ष्य है कि इस साल के अंत और अगले साल के मध्य तक देश की 70-80 फीसद जनसंख्या को टीका लग जाए. लेकिन जानकारों का कहना है कि इससे तब तक कोई मदद नहीं मिलेगी जब तक ज्यादातर देश भी अपनी अधिकांश आबादी का टीकाकरण नहीं कर लेते. वांग कहते हैं, "अन्यथा, जब सीमा खुल जाएगी और लोग एक-दूसरे देश में आवागमन करने लगेंगे, तो उन देशों के लोग फिर संक्रमित करना शुरू कर देंगे जहां पूरी तरह से टीकाकरण नहीं हुआ होगा.” (dw.com)
ओटावा, 14 अप्रैल | दुनियाभर में कोरोना की तेज रफ्तार जारी है। कनाडा में पिछले हफ्ते से, कोरोना के मामले लगभग 8100 आ रहे हैं, इसी के साथ रोजाना मामले में 33 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। समाचार एजेंसी सिन्हुआ के अनुसार कनाडा के मुख्य सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारी थेरेसा टैम ने मंगलवार को बताया, "कोविड-19 महामारी कई कनाडाई लोगों के लिए तनाव और चिंता पैदा कर रहा है।"
टैम ने कहा, "पिछले सप्ताह से मरीजों की संख्या में वृद्धि जारी है। हर दिन अस्पतालों में कोविड-19 के करीब 3,000 से अधिक मरीजों का इलाज किया जा गया, जिसमें पिछले सप्ताह की तुलना में 29 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।"
इसमें लगभग 970 लोगों को इंटेंसिव केयर यूनिट में इलाज किया गया था, जो कि एक सप्ताह पहले की तुलना में 24 प्रतिशत अधिक था।
इनमें से लगभग 36,000 मामले नए वैरिएंट के हैं, जिसमें से बी.1.1.7 वैरिएंट का लगभग 96 प्रतिशत हिस्सा है।
इसमें बी.1.1.7 वैरिएंट के 34,404 मामले, पी.1 वैरिएंट के 1,222 मामले और बी.1.351 वैरिएंट के 365 मामले हैं।
सीटीवी के अनुसार कनाडा में मंगलवार शाम तक कुल 10,78,562 कोविड-19 मामले दर्ज हो चुके हैं, जिसमें 23,392 मौतें शामिल हैं।(आईएएनएस)
डेनमार्क नहीं चाहता कि वहां भविष्य में नए शरणार्थी आएं. इसलिए अब सीरियाई शरणार्थियों से कहा जा रहा है कि वो सीरिया लौट जाएं क्योंकि सीरिया अब सुरक्षित है. स्थानीय समाज में घुल मिल रहे युवाओं को मुश्किल हो रही है.
अया अबो दाहेर ने डेनमार्क के शहर निबोर्ग के एक हाईस्कूल से हाल ही में स्कूली पढ़ाई पूरी की है और जून के अंत में अपने दोस्तों के साथ वो इस खुशी का उत्सव मनाने वाली थीं तभी उन्हें डेनमार्क के अधिकारियों की ओर से एक ऐसा ईमेल मिला जिसने उनकी खुशियों पर पानी फेर दिया. सीरियाई छात्रों और उनके मां-बाप को भेजे गए ईमेल में लिखा था कि उनके आवासीय परमिट का नवीनीकरण नहीं किया जाएगा.
20 वर्षीया दाहेर कहती हैं, "मैं बहुत दुखी थी, मैंने खुद को इस कदर विदेशी समझा जैसे डेनमार्क की हर चीज मुझसे दूर कर दी गई है. मैं नीचे बैठ गई और जोर से चिल्लाने लगी. रात में, मुझे मेरी एक दोस्त ने मेरे घर छोड़ा क्योंकि मैं सो नहीं पा रही थी.” सीरिया के ज्यादातर शरणार्थियों को यही ईमेल मिला था जो कि दमिश्क के आस-पास के इलाकों के रहने वाले हैं.
‘युद्ध न तो खत्म हुआ है और न ही भुलाया गया है'
पिछली गर्मियों में, जब से डेनमार्क के अधिकारियों ने सीरिया की राजधानी दमिश्क को सुरक्षित घोषित किया है, तब से उस इलाके के हजारों सीरियाई शरणार्थियों के आवासीय परमिट रद्द कर दिए गए हैं या यूं कहें कि उनका नवीनीकरण नहीं किया गया है. डेनिश रिफ्यूजी काउंसिल की महासचिव चार्लोट स्लेंटे कहती हैं, "हालांकि युद्ध न तो खत्म हुआ है और न ही इसे भुलाया गया है लेकिन डेनमार्क के अधिकारी यही मान रहे हैं कि दमिश्क में स्थितियां इतनी अच्छी हो गई हैं कि सीरियाई शरणार्थियों को वहां भेजा जा सकता है.”
डेनमार्क एकमात्र यूरोपीय देश है जो सीरियाई शरणार्थियों के आवासीय परमिट निरस्त कर रहा है. स्लेंटे कहती हैं कि यह एक "गैरजिम्मेदार” फैसला है और वापस लौटने वालों पर हमले और उत्पीड़न का खतरा रहेगा. वो कहती हैं, "वहां लड़ाई नहीं हो रही है, इस आधार पर दमिश्क वापस लौटने वाले शरणार्थियों के लिए एक सुरक्षित शहर नहीं बन जाता.”
डेनमार्क और सीरिया सहयोग नहीं कर रहे हैं
डेनमार्क के इस रवैये के खिलाफ सिर्फ डीआरसी और एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे मानवाधिकार संगठन ही नहीं हैं बल्कि वो वामपंथी पार्टियां भी इस कदम का विरोध कर रही हैं जो कि डेनमार्क की संसद में कभी-कभी प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन के नेतृत्व वाली सोशल डेमोक्रैटिक पार्टी की अल्पमत सरकार का सहयोग करती हैं. सोशल लिबरल पार्टी यानी रेडिकेल वेंस्टर के प्रवक्ता क्रिस्टियान हेगार्ड कहते हैं, "अया अबो दाहेर जैसे छात्रों को निष्कासित करने का फैसला निर्दयी और विवेकहीन है. डेनमार्क कैसे मान सकता है कि सीरिया एक सुरक्षित देश है?” अपने फेसबुक पेज पर हेगार्ड लिखते हैं, "डेनमार्क ने सीरिया में अपना दूतावास इसीलिए बंद कर रखा है क्योंकि वहां स्थितियां ठीक और सुरक्षित नहीं हैं.”
वामपंथी पार्टियों का तर्क है कि चूंकि डेनमार्क सीरियाई शासक बशर अल असद की सरकार के साथ सहयोग नहीं कर रहा है इसलिए इस वक्त शरणार्थियों को जबरन निष्कासित करना ठीक नहीं है. फिलहाल, जिन सीरियाई लोगों के आवासीय परमिट खत्म हो गए हैं और जिन्होंने स्वेच्छा से देश छोड़ने से इनकार कर दिया है उन्हें डेनिश डिपोर्टेशन शिविरों में रखा जाता है.
‘उन्हें योगदान करने दें, काम करने दें और शिक्षा लेने दें'
हेगार्ड कहते हैं कि सीरियाई शरणार्थी अपने देश में परिस्थिति बदलने के लिए सालों यहां बैठकर इंतजार कर सकते हैं. हेगार्ड सुझाव देते हैं कि उन शरणार्थियों से काम लिया जा सकता है, उनके योगदान का लाभ लिया जा सकता है और उन्हें शिक्षा प्राप्त करने में मदद दी जानी जाहिए. इससे डेनमार्क को भी लंबे समय तक फायदा मिलेगा.
अया अबो दाहेर की एक सहपाठी ने डेनमार्क के समेकन मंत्री मतियास तेस्फाइ को एक खुला पत्र लिखा और मांग की कि एक ऐसी लड़की को निष्कासित न किया जाए जो धाराप्रवाह डेनिश भाषा बोल लेती है और यहां के समाज को कुछ देना चाहती है. लेकिन उसकी बात सुनी नहीं गई और तेस्फाइ ने डेनमार्क की मीडिया को बताया कि वो अपने उन अधिकारियों पर भरोसा करते हैं जिन्होंने स्थिति का आकलन किया है और वो सिर्फ इसलिए कोई संशोधन नहीं करेंगे कि कोई टेलीविजन पर आकर कुछ कह रहा है.
दाहेर के स्कूल के डायरेक्टर वेस्टरगार्ड स्टॉकहोम भी अपनी विद्यार्थी को लेकर काफी भावुक हैं. अया अबो दाहेर को वो एक "कर्मठ, ज्ञानपिपासु और स्पष्ट लक्ष्य” वाली लड़की बताते हैं. स्टॉकहोम कहते हैं कि सीरिया वापस लौटने पर उसकी सुरक्षा को खतरा है. वो कहते हैं कि इस लड़की के दो भाई एक साल पहले भागकर डेनमार्क आ गए थे क्योंकि वो असद की सेना में भर्ती होने ही वाले थे. उन्हें निष्कासन की धमकी नहीं दी जा रही है क्योंकि उन्हें विशेष संरक्षण मिला हुआ है.
अया अबो दाहेर कहती हैं, "निष्कासन हमें अपने परिवार से फिर दूर कर देगा जो कि बहुत मुश्किल से एक साथ मिल पाए थे. दमिश्क में वापस जाने पर हमारे पास कुछ भी नहीं रहेगा. अधिकारी मुझे उस जगह कैसे वापस भेज सकते हैं जिसे वो जानते हैं कि मेरे लिए खतरनाक है?”
डेनमार्क एक ‘दुखद उदाहरण' है
स्कूल के डायरेक्टर स्टॉकहोम कहते हैं, "भाइयों के भागने के बाद लोग अया से बार-बार पूछते थे कि वे कहां हैं. जब खाना बंटता था, अया और उसके मां-बाप से कहा जाता था कि उन्हें तब तक खाना नहीं मिलेगा जब तक कि उसके भाई लौटकर नहीं आ जाते.” यूरोप में डेनमार्क के अलावा किसी और देश ने सीरिया की इन परिस्थितियों में किसी शरणार्थी को वापस भेजने के बारे में फैसला नहीं किया है. स्टॉकहोम कहते हैं कि डेनमार्क वास्तव में एक ‘दुखद उदाहरण' पेश कर रहा है.
दरअसल, शरणार्थियों को जल्दी से जल्दी वापस भेजने का फैसला साल 2019 में आए उस अप्रवासन कानून के तहत हो रहा है जिसे पिछली कंजर्वेटिव सरकार लेकर आई थी और अब सोशल डेमोक्रैट्स और दक्षिणपंथी भी संसद में उसी का अनुकरण कर रहे हैं. कानून में साफ कहा गया है कि आवासीय परमिट सिर्फ एक सीमित अवधि के लिए ही जारी किए गए हैं. इस नीति के तहत, जैसे ही परिस्थितियां अनुकूल होने लगेंगी, आवासीय परमिट रद्द कर दिए जाएंगे और शरणार्थियों को उनके देश वापस भेज दिया जाएगा.
शरणार्थियों को हतोत्साहित करना
मेटे फ्रेडरिक्सन वामपंथी झुकाव वाली महिला होने के बावजूद अप्रवासन और शरणार्थी मामलों में दक्षिणपंथी रुझान दिखाने लगती हैं. उनके पास भविष्य में शरणार्थियों को डेनमार्क आने से रोकने की भी एक दीर्घकालीन योजना है. डेनमार्क की सरकार ऐसे शरणार्थियों को वित्तीय मदद भी दे रही है जो स्वेच्छा से अपने देश वापस जा रहे हैं. हालांकि सरकार लगातार शरणार्थियों को अपने देश से बाहर करने की भी कोशिशें कर रही है और जो लोग डेनमार्क में शरण लेने की कोशिश कर रहे हैं उन्हें भी हतोत्साहित कर रही है.
अया अबो दाहेर निष्कासन से डरी हुई हैं लेकिन उन्हें उम्मीद है कि वो गर्मी में अपनी दोस्तों के साथ हाई स्कूल पूरा होने की खुशी मना सकेंगी. अया ने दंत चिकित्सक बनने का ख्वाब देख रखा है और अपने निष्कासन के नोटिस के खिलाफ एक याचिका भी डाल रखी है. उनके स्कूल के डायरेक्टर स्टॉकहोम कहते हैं कि इन सब में कुछ महीने लग जाएंगे और उम्मीद है कि जून महीने में अया अपनी ग्रेजुएशन की खुशी अपने दोस्तों के साथ मना सकेगी.
ईरानी अधिकारियों का कहना है कि रविवार को हुए हमले में ईरान के सबसे अहम परमाणु केंद्र की हज़ारों मशीनें या तो ख़राब हो गई हैं या बर्बाद हो गई हैं.
ईरानी संसद के रिसर्च सेंटर के प्रमुख अलिरेज़ा ज़कानी ने कहा है कि इस घटना से ईरान की परमाणु सामग्री को परिशोधित करने की क्षमता समाप्त हो गई है.
एक अन्य अधिकारी ने बताया है कि नतांज परमाणु केंद्र के जिस हिस्से पर ये हमला हुआ है वो ज़मीन से पचास मीटर नीचे है. ईरान ने इस हमले को 'परमाणु आतंकवाद' बताते हुए इसराइल को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया है.
वहीं इसराइल ने अपनी भूमिका की ना ही पुष्टि की है और न ही इसका खंडन किया है. लेकिन इसराइल के सरकारी रेडियो पर ख़ुफ़िया सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि ये इसराइल की ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद का एक ऑपरेशन था. ईरान का कहना है कि वो प्रभावित सेंट्रीफ्यूज को बदल देगा.
सेंट्रीफ्यूज वो मशीन होती है जिसमें यूरोनियम का संवर्धन किया जाता है जिसे बाद में परमाणु ऊर्जा बनाने के काम में लाया जाता है. अधिक उन्नत सेंट्रीफ्यूज के ज़रिए परमाणु बम भी बनाए जा सकते हैं.
ईरान को कितना नुकसान हुआ है?
ईरान ने शुरूआत में कहा था कि सेंट्रीफ्यूज को नुकसान पहुंचा है लेकिन अतिरिक्त जानकारी नहीं दी थी.
अब सरकारी टीवी चैनल पर बोलते हुए ज़कानी ने बताया है कि परमाणु संयंत्र को भारी नुकसान पहुंचा हैं.
उन्होंने सवाल किया, 'क्या ये सामान्य बात है कि वो हमारे बिजली सिस्टम में घुस जाते हं और एक ही बार में कई हज़ार सेंट्रीफ्यूज को या तो बर्बाद कर देते हैं या नुकसान पहुंचाते है?'
'क्या हमें रविवार को हुई घटना पर संवेदनशील नहीं होना चाहिए जिसने हमारे संवर्धन की क्षमता को ही नष्ट कर दिया है?'
वहीं अमेरिकी ख़ुफ़िया अधिकारियों ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया है कि नाभिकीय संयंत्र पर एक बड़ा धमाका हुआ. इससे भूमिगत संयंत्र के भीतर स्थापित सेंट्रीफ़्यूज़ों को बिजली पहुँचाने वाला पावर सिस्टम पूरी तरह बर्बाद हो गया.
उनका अनुमान है कि इस धमाके के बाद वहां फिर से यूरेनियम का संवर्द्धन शुरू होने में कम से कम नौ महीने लग जाएंगे.
इसराइली जहाज़ पर हमला
इसी बीच इसराइली और अरब मीडिया में आई रिपोर्टों में कहा गया है कि संयुक्त अरब अमीरात के पास हुए एक हमले में एक इसराइली पोत को नुकसान पहुंचा हैं. हालांकि इस हमले में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं हैं.
एक अधिकारी ने इसराइले के चैनल 12 टीवी को बताया है कि इस हमले के पीछे ईरान है. यदि इसकी पुष्टि होती है तो ये दोनों देशों के जहाज़ों पर हुए हमलों और जवाबी हमलों की श्रंखला में एक और हमला होगा.
इसराइल ने दी थी धमकी
हाल ही में इसराइल ने ईरान को चेताया था कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम को दोबारा न शुरू करे. इसराइल बार-बार कहता रहा है कि वह ईरान को परमाणु शक्ति हासिल नहीं करने देगा.
ईरान ने रविवार को हुए हमले से एक दिन पहले ही नतांज परमाणु केंद्र पर उच्च गुणवत्ता के सेंट्रीफ्यूज़ शुरू किए थे. ये सेंट्रीफ्यूज़ साल 2015 के समझौते के तहत प्रतिबंधित थे.
ईरान और विश्व के छह शक्तशाली देशों के बीच साल 2015 में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर समझौता हुआ था. अमेरिका राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अमेरिका को इस समझौते से अलग कर लिया था.
ईरान ने फिर से उच्च गुणवत्ता का यूरेनियम संवर्धन शुरू कर दिया था. ईरान का कहना है कि वह उच्च गुणवत्ता वाले यूरेनियम का संवर्द्धन तभी बंद करेगा जब उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध ख़त्म कर दिए जाएंगे.
पिछले साल इसी परमाणु केंद्र में लगी थी आग
पिछले साल जुलाई में ईरान के इसी भूमिगत परमाणु केंद्र में आग लग गई थी. ईरानी अधिकारियों ने इसे साइबर हमले का नतीजा बताया था.
ईरानी परमाणु केंद्र को ऐसे वक़्त में निशाना बनाया गया है जब अमेरिका के मौजूदा बाइडन प्रशासन की ओर से 2015 के परमाणु समझौते को बहाल करने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं. इसके लिए पिछले हफ़्ते वियना में बातचीत भी हुई.
ईरान के यूरेनियम संवर्धन से चिंतित हैं- अमेरिका
अमेरिका का कहना है कि वह ईरान के अंतरराष्ट्रीय परमाणु समझौते का उल्लंघन करके यूरेनियम को परमाणु हथियार बनाने के स्तर तक संवर्धित करने को लेकर चिंतित है.
ईरान का कहना है कि वो यूरेनियम को 60 प्रतिशत तक संवर्धित करेगा. ये हथियार बनाने लायक यूरेनियम से 30 प्रतिशत नीचे होगा.
अमेरिका ने ईरान के इस क़दम को उकसाने वाला बताते हुए कहा है कि वो ईरान के साथ अप्रत्यक्ष वार्ता जारी रखेगा. (bbc.com)
-शुमायला जाफ़री
पाकिस्तान में धार्मिक नेता साद हुसैन रिज़वी और उनके कई सहयोगियों की गिरफ़्तारी के बाद देश के कई हिस्सों में तनाव है. इसी बीच पुलिस ने साद रिज़वी समेत तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान पार्टी (टीएलपी) के कई नेताओं के ख़िलाफ़ आतंकवाद रोधी क़ानून के तहत मुकद़मा दर्ज कर लिया है.
लाहौर पुलिस ने तहरीक ए लब्बैक पाकिस्तान के मुखिया साद हुसैन रिज़वी और दूसरे नेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं पर पाकिस्तान दंड संहिता की अलग-अलग धाराओं, आतंकवाद विरोधी क़ानून और लोक व्यवस्था अध्यादेश के तहत मामला दर्ज किया है.
ये मामला पुलिस की तरफ से दी गई शिकायत पर लाहौर के शाहदरा टाउन थाने में दर्ज हुआ है. साद रिज़वी के अलावा काज़ी महमूद रिज़वी, पीर सैयद ज़हीर अल हसन शाह, मेहर मुहम्मद क़ासिम, मोहम्मद एजाज़ रसूल, पीर सैयद इनायत अली शाह, मौलामा ग़ुलाम अब्बास फ़ैज़ी, मौलाना ग़ुलाम ग़ौस बग़ददादी का नाम भी रिपोर्ट में दर्ज है. इसके अलावा पाकिस्तान की इस धार्मिक पार्टी के अज्ञात कार्यकर्ताओं पर भी मुकदमा दर्ज किया गया है.
एफ़आईआर में कहा गया है कि इन लोगों ने पूरे पाकिस्तान में लोगों को हिंसा करने और जाम लगाने के लिए उकसाया. इसके लिए लाउडस्पीकर से ऐलान करने और सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के आरोप भी लगाए गए हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है कि अपने नेताओं की गिरफ्तारी का विरोध कर रहे कार्यकर्ताओं ने जान लेने के इरादे से पत्थरबाज़ी की और पुलिसकर्मियों पर हमले किए. एफ़आईआर के मुताबिक प्रदर्शनकारियों ने कई पुलिसकर्मियों को पीटा और सिपाही मोहम्मद अफ़ज़ल की मौत हो गई.
सोमवार को पाकिस्तानी पुलिस ने साद रिज़वी को गिरफ़्तार कर लिया था. इसके बाद से ही देशभर में प्रदर्शन हो रहे हैं जिससे कई इलाक़ों में जनजीवन भी प्रभावित हुआ है.
साद रिज़वी की गिरफ़्तारी के बाद इस्लामाबाद और रावलपिंडी में प्रदर्शनस्थलों पर इंटरनेट भी बंद कर दिया गया था. वहीं गुजरांवाला में प्रदर्शनकारियों पर काबू करने के लिए पुलिस की कबड्डी टीम को भी बुलाया गया था.
साद रिज़वी की गिरफ़्तारी के बाद शुरू हुए प्रदर्शनों से सबसे ज़्यादा प्रभावित लाहौर ही रहा है. बीबीसी संवाददाता शहज़ाद मलिक के मुताबिक केंद्रीय गृह मंत्री शेख राशिद अहमद के नेतृत्व में इस्लामाबाद में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में प्रदर्शनों से प्रभावित राष्ट्रीय राजमार्गों को खोलने का फैसला लिया गया है.
इस बैठक में प्रदर्शनों के बाद पैदा हुए सुरक्षा हालातों पर भी चर्चा की गई है. इसमें पंजाब के पुलिस प्रमुख और मुख्य सचिव वीडियो लिंक के ज़रिए शामिल हुए थे. धार्मिक मामलों के मंत्री नूर उल हक़ क़ादरी भी इस बैठक में शामिल रहे.
इस बैठक के बाद गृहमंत्री ने कहा कि गिरफ़्तार किए गए लोगों को रिहा नहीं किया जाएगा. सोशल मीडिया पर घायल पुलिसकर्मियों के अपुष्ट वीडियो भी शेयर किए जा रहे हैं. वहीं प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्रों में इंटरनेट भी बंद कर दिया है.
इस्लामाबाद और रावलपिंडी के कई इलाक़ों में प्रदर्शन की रिपोर्टें हैं. संवाददाता शहज़ाद मलिक के मुताबिक फ़ैज़ाबाद और भारा काहू इलाक़ों में प्रदर्शन हुए हैं. पुलिस ने आम लोगों से परिवर्तित रूटों पर सफर करने के लिए कहा है.
ट्रैफ़िक पुलिस के मुताबिक मरी रोड पर कई जगह प्रदर्शन हुआ है जिससे जाम की स्थिति हो गई. हालात काबू करने के लिए पुलिस के जवानों के अलावा रेंजर भी तैनात किए गए हैं.
इस्लामाबाद का अथल चौक भारा काहू इलाक़ा पूरी तरह बंद रहा. सौ से अधिक कार्यकर्ता सड़कों पर डटे रहे. उग्र प्रदर्शनकारी नारेबाज़ी कर रहे थे और मंच से उत्तेजक भाषण दे रहे थे. रिपोर्टों के मुताबिक कई जगह हाथों में लाठी लिए लोगों ने सड़कें जाम की हैं.
यहां रह-रहकर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें होती रहीं. पुलिस ने लाठीचार्ज के बाद शहर के चंदा क़िला चौक को खाली कराया. इस्लामाबाद से लाहौर जाने वाले वाहन जीटी रोड पर इसी चौक से होकर गुज़रते हैं. गुजरांवाला पुलिस के मुताबिक पुलिस की कबड्डी टीम के ख़िलाड़ियों को भी भीड़ से निबटने के लिए बुलाया गया था.
प्रदर्शनकारियों ने कबड्डी खिलाड़ियों पर भी पत्थरबाज़ी की है. हालांकि पुलिस ने दावा किया है कि चंदा क़िला चौक को खाली करा लिया गया था.
लाहौर
यहां पुलिस ने फ्लैग मार्च निकाला है. इसमें लाहौर पुलिस की डॉलफ़िन फ़ोर्स और इलीट फ़ोर्स के जवानों ने भी हिस्सा लिया. टीएलपी कार्यकर्ताओं के प्रदर्शनों की वजह से शहर के कम से कम 17 इलाक़े बंद हैं.
यतीमख़ाना चौक से प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया. बीबीसी संवाददाता उमर दराज़ नांगियाना के मुताबिक यहां पुलिस ने कई मदरसों और टीएलपी नेताओं के घरों पर छापेमारी की है. गिरफ्तारी से बचने के लिए कई कार्यकर्ता घरों से भाग गए हैं.
संवाददाता रियाज़ सोहैल के मुताबिक शहर के कई इलाक़ों में टीएलपी कार्यकर्ता धरनों पर बैठे हैं. हालांकि पुलिस की तरफ से लाठीचार्ज और आंसूगैस के गोले छोड़े जाने के बाद कई जगह प्रदर्शन ख़त्म हो गए हैं.
संवाददाता मोहम्मद काज़िम के मुताबिक सोमवार से शुरू हुए प्रदर्शन चल रहे हैं. क्वेटा-कराची हाइवें को खुज़दार शहर में बंद कर दिया गया है जिसकी वजह से लोगों को परेशानी हो रही है.
कराची के पास हब इलाके में भी कार्यकर्ताओं ने क्वेटा-कराची हाईवे को जाम कर दिया है. डेरा जमाल मुराद इलाक़े में भी क्वेटा-जैकबाबाद रोड को जाम कर दिया गया था जिसे पुलिस ने बाद में खाली करा लिया.
पुलिस ने रिज़वी को हिरासत में लेने के बाद कोई कारण नहीं बताया था. साद रिज़वी ईशनिंदा विरोधी फ़ायरब्रांड धर्मगुरू ख़ादिम हुसैन रिज़वी के बेटे हैं.
हालांकी तहरीक-ए-लब्बैक पार्टी के नेता पुलिस के इस क़दम को 20 अप्रैल को प्रस्तावित इस्लामाबाद मार्च को रोकने की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं.
साद रिज़वी जब एक दफ़न में शामिल होने जा रहे थे तब उन्हें पुलिस ने हिरासत में लिया. जैसे ही उनकी गिरफ़्तारी की ख़बर फैली तहरीक-ए-लब्बैक पार्टी के कार्यकर्ताओं ने देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शन शुरू कर दिए.
पाकिस्तान की केंद्रीय सरकार ने तहरीक-ए-लब्बैक के पूर्व प्रमुख ख़ादिम हुसैन रिज़वी के साथ 16 नवंबर 2020 को चार सूत्रीय समझौता किया था. ख़ादिम फ्रांस के राजदूत को देश से निकालने की मांग कर रहे थे. सरकार ने वादा किया था कि वो इस मुद्दे को संसद के सामने ले जाएगी और जैसा संसद में तय होगा वैसा किया जाएगा. ये समझौता ख़ादिम हुसैन रिज़वी को इस्लामाबाद की तरफ मार्च करने से रोकने के लिए किया गया था.
जब इस समझौते का पालन नहीं हुआ तो पार्टी ने सरकार के साथ फ़रवरी 2021 में एक और समझौता किया. इसके तहत टीएलपी ने पाकिस्तान सरकार को फ्रांसीसी राजदूत को वापस भेजने के लिए 20 अप्रैल तक का समय दिया है.
ख़ादिम रिज़वी का पिछले साल निधन हो गया था. उनकी पार्टी की 18 सदस्यीय समिति ने उनके बेटे साद हुसैन रिज़वी को नया प्रमुख चुन लिया है.
ख़ादिम रिज़वी के बेटे साद रिज़वी ने अपने पिता के मिशन को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया है. वो इस समय अपने पिता के बनाए मदरसे में दर्स निज़ामी के अंतिम वर्ष के छात्र हैं. इस्लामी शिक्षा में ये डिग्री स्नातकोत्तर के बराबर होती है. (bbc.com)
जापान ने फैसला किया है कि वह फुकुशिमा परमाणु बिजलीघर की दुर्घटना के दौरान दूषित हुए पानी को प्रशांत सागर में छोड़ेगा. जापान के इस पैसले को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी का समर्थन है लेकिन पड़ोसी चिंतित हैं.
जापान का फैसला इस चिंता से प्रभावित है कि वह रेडियोधर्मी पानी को रखे कहां लेकिन मछुआरों और स्थानीय निवासियों की चिंता है कि समुद्री पानी अगर रेडियोसक्रिय हो जाएगा, तो उनकी रोजी रोटी और सेहत का क्या होगा. जापान के प्रधानमंत्री योशिहिदे सूगा की सरकार के इस फैसले को मंगलवार को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी. सरकार का कहना है कि टोक्यो इलेक्ट्रिक पावर दो साल में रेडियोधर्मी पानी को ट्रीट कर उसे प्रशांत सागर में छोड़ना शुरू करेगी.
फुकुशिमा पावर प्लांट के ऑपरेटर ने करीब 12 लाख टन पानी बिजली घर के परिसर में 1000 विशालकाय टैंकों में जमा कर रखा है. ऑपरेटरों का कहना है कि कैंपस में पानी को जमा करने की जगह 2022 तक खत्म हो जाएगी. हालांकि स्थानीय अधिकारियों और कुछ विशेषज्ञों की राय अलग है.
रेडियोधर्मी ट्रिटियम पर विवाद
दस साल पहले जापान ने अपनी सबसे भयानक परमाणु दुर्घटना झेली थी, फुकुशिमा के दाइची परमाणु बिजलीघर में. उस समय मार्च 2011 में सूनामी की वजह से आए भारी भूकंप के बाद बिजलीघर के छह रिएक्टरों में से तीन में मेल्टडाउन हुआ था. उसके बाद से गले हुए परमाणु ईंधन को ठंडा रखने के लिए उस पर लगातार पानी डाला जा रहा है. लेकिन यह प्रदूषित पानी कंपनी के लिए सिरदर्द बना हुआ है.
हालांकि रेडिएशन से दूषित पानी को एक उन्नत लिक्विड प्रोसेसिंग सिस्टम की मदद से साफ किया जा रहा है लेकिन हाइड्रोजन के एक रेडियोएक्टिव आइसोटोप ट्रिटियम को पानी से अलग नहीं किया जा सका है. सरकार और बिजली घर के संचालकों का कहना है कि कम घनत्व में होने पर ट्रिटियम इंसानी सेहत के लिए खतरा नहीं है. लेकिन टोक्यो स्थित सिटिजन कमिशन ऑन न्यूक्लियर इनर्जी का कहना है कि सरकार को ट्रिटियम को पर्यावरण में नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि वह रेडियोधर्मी पदार्थ है. इस संस्था में बहुत से विशेषज्ञ भी शामिल हैं. उन्होंने सॉलिडेशन तकनीक के इस्तेमाल या जमीन पर स्टोरेज का सुझाव दिया है. लेकिन इन सुझावों को सरकार और स्थानीय मीडिया ने नजरअंदाज कर दिया है.
फैसले की चौतरफा आलोचना
जापान सरकार की योजना की देश के अंदर और बाहर भारी आलोचना हो रही है. जापान के मछुआरों की सहकारी संस्था के प्रमुख किरोशी किशी ने कहा है कि पानी को समुद्र में डालना पूरी तरह अस्वीकार्य है. उन्होंने सरकार से दृढ़ विरोध दर्ज कराया है. कैबिनेट में फैसले से पहले किशी ने पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री सूगा से बातचीत की थी और उन्हें बताया था कि उनका संगठन पूरी तरह इस कदम के खिलाफ है.
कई नागरिक संगठनों और कुछ विशेषज्ञों ने सरकार की इस बात के लिए भी आलोचना की है कि उसने अपनी योजना के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं दी है और न ही समझौते की कोशिश की है. जापान की पर्यावरण संरक्षण संस्था ग्रीनपीस ने सरकार के फैसले की कड़ी आलोचना की है और कहा है कि यह "फुकुशिमा के अलावा जापान और एशिया प्रशांत क्षेत्र के लोगों के मानवाधिकारों और हितों की पूरी अवहेलना" करता है.
पड़ोसी देश भी कर रहे हैं विरोध
चीन ने भी "बिना दूसरे सुरक्षित उपायों पर विचार किए और पड़ोसी देशों तथा अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सलाह लिए बगैर" अकेले फैसला लेने के लिए जापान की आलोचना की है. चीनी विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा, "ये बहुत ही गैरजिम्मेदाराना है और पड़ोसी देशों में लोगों के स्वास्थ्य और फौरी हितों को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा." बयान में कहा गया है कि चीन अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ सारे विकास पर निकट से नजर रखेगा और अन्य प्रतिक्रिया करने का अधिकार सुरक्षित रखता है.
ताइवान के परमाणु ऊर्जा परिषद ने जापान के फैसले को अफसोसजनक बताया है और कहा है कि ताइवान के सांसदों ने भी इस तरह के कदम का विरोध किया था. जापान की क्योडो समाचार एजेंसी के अनुसार दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्रालय ने जापान के राजदूत कोइची आइबोशी को मंत्रालय तलब किया और टोक्यो के फैसले के खिलाफ विरोध दर्ज कराया. दक्षिण कोरिया के सरकारी नीति समन्वय मंत्री कू यून चोल ने कहा कि उनकी सरकार इस फैसले का सख्त विरोध करती है. इसके विपरीत अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा है कि जापान अपने फैसले के बारे पारदर्शी रहा है और अंतरराष्ट्रीय तौर पर स्वीकृत परमाणु सुरक्षा मानकों के हिसाब से रुख अपनाया है. (dw.com)
एमजे/आईबी (डीपीए)
लंदन, 13 अप्रैल| कोरोना वायरस के बी117 वैरिएंट से संक्रमित लोगों को अधिक गंभीर बीमारी का अनुभव नहीं होता और उनके मरने की आशंका अधिक नहीं रहती। यह बात पत्रिका 'लैंसेट' में प्रकाशित संक्रामक रोगों पर हुए शोध के निष्कर्ष में सामने आई है। हालांकि, एनपीआर डॉट ऑर्ग पर जारी रिपोर्ट के अनुसार, वायरस स्ट्रेन जिसे यूके वैरिएंट कहा जाता है, वायरस के मूल उपभेदों की तुलना में अधिक संक्रामक रहता है।
अमेरिका के रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र के मुताबिक, यह वैरिएंट पहली बार सितंबर 2020 में इंग्लैंड में उभरा और अब तो यह अमेरिका में सबसे आम वैरिएंट है।
शोध करने वाली टीम ने 9 नवंबर से 20 दिसंबर, 2020 के बीच यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन अस्पताल और नॉर्थ मिडलसेक्स यूनिवर्सिटी अस्पताल में भर्ती मरीजों से नमूने एकत्र किए थे।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इन अस्पतालों भर्ती 341 मरीजों में से 58 फीसदी बी117 वैरिएंट से और 42 फीसदी एक अलग तरह के स्ट्रेन से संक्रमित थे।
रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों समूहों के बीच लक्षणों की गंभीरता की तुलना करते हुए टीम ने पाया कि बी117 वैरिएंट से संक्रमित मरीजों में भी कथित तौर पर अधिक 'वायरल लोड' था या उनके शरीर में वायरस की मात्रा अधिक थी। (आईएएनएस)
सैन फ्रांसिस्को, 13 अप्रैल | व्यापार और पेशेवर सेवाओं से जुड़े संगठन, खुदरा एवं आतिथ्य, वित्तीय, हेल्थकेयर और उच्च प्रौद्योगिकी ऐसे क्षेत्र रहे हैं, जिन्हें 2020 में साइबर अपराधियों ने विशेष तौर पर टारगेट किया है। मंगलवार को जारी एक नई रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है।
'फायरआई मैंडिएंट एम-ट्रेंड्स 2021' रिपोर्ट के अनुसार, खुदरा और आतिथ्य उद्योग से जुड़े संगठनों को 2020 में अधिक टागरेट (लक्षित) किया गया है, जो कि पिछले साल की रिपोर्ट में 11वें स्थान की तुलना में दूसरे सबसे अधिक लक्षित उद्योग के रूप में सामने आए हैं।
हेल्थकेयर (स्वास्थ्य देखभाल) क्षेत्र में भी साइबर हमलों में काफी वृद्धि हुई है, जो पिछले साल की रिपोर्ट में आठवें स्थान की तुलना में 2020 में तीसरा सबसे अधिक लक्षित उद्योग बन गया है।
चूंकि कोरोनावायरस महामारी के बाद से स्वास्थ्य एक ऐसा क्षेत्र रहा है, जिसकी भूमिका सबसे अधिक देखी गई है। इस बीच थ्रीट एक्टर्स (साइबर हमले में निपुण) द्वारा बढ़ाए गए फोकस को वैश्विक महामारी के दौरान स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका से स्पष्ट किया जा सकता है।
जबकि पिछले वर्ष की रिपोर्ट में तुलनात्मक रूप से इस क्षेत्र में साइबर घुसपैठ में गिरावट देखी गई थी। वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि इस क्षेत्र में अब साइबर हमलों की घटनाएं बढ़ी हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, 2020 में साइबर हमलों की घटनाओं में 59 प्रतिशत का इजाफा हुआ है और 2019 की तुलना में इसमें 12 अंकों की वृद्धि दर्ज की गई है।
साइबर सिक्योरिटी कंपनी फायरआई के सहयोगी मैंडिएंट के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर चार्ल्स कार्मकल ने एक बयान में कहा, "संगठनों के लिए बहुउद्देशीय एक्सटॉर्शन और रैंसमवेयर सबसे अधिक प्रचलित खतरे हैं। इस वर्ष की रिपोर्ट में, प्रत्यक्ष वित्तीय लाभ के लिए कम से कम 36 प्रतिशत घुसपैठ की संभावना है, जिसकी हमने जांच की है।"
उन्होंने कहा कि डेटा की चोरी पीड़ित संगठनों तक अनधिकृत पहुंच अधिक देखी गई है। उन्होंने कहा किरैंसमवेयर एक्टर्स ने बड़े पैमाने पर जबरन वसूली मांगों का भुगतान करने की अधिक संभावना वाले संगठनों को लक्षित किया है।
उन्होंने कहा, "इस वृद्धि को देखते हुए, संभावित प्रभाव को कम करने के लिए संगठनों को सक्रिय कार्रवाई करनी चाहिए।" (आईएएनएस)



