अंतरराष्ट्रीय
पाकिस्तानियों की हरकतें उन्हें चर्चा में ले ही आती है. चाहे नेता हों या कोई गली का शख्स, इन पाकिस्तानियों की बेवकूफी कम होने का नाम नहीं लेती. सोशल मीडिया पर अब पाकिस्तानियों का ऐसा ही एक बेवकूफी भरा वीडियो वायरल हो रहा है. इस वीडियो को देखने के बाद लोगों की हंसी नहीं रुक रही है. जो भी इस वीडियो को देख रहा है, लोटपोट होकर हंसे जा रहे हैं.
वीडियो को पाकिस्तान के सड़क पर कैद किया गया. इसमें एक शख्स कोल्ड ड्रिंक से भरे ट्रक को रोककर हंगामा करता नजर आया. शख्स ने ट्रक ड्राइवर को घेर कर गाड़ी जला देने की धमकी दी. जब भीड़ में से एक शख्स ने उससे ऐसा करने की वजह पूछी तो उसने बेहद मजेदार जवाब दिया. शख्स कोल्डड्रिंक की बोतल पर बने क्यूआर कोड को लेकर खफा था.
pakistani funny videoबोतल के क्यूआर कोड में दिखने लगा अल्लाह
अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर इस क्यूआर कोड से उसे क्या दिकक्त थी? दरअसल, शख्स का कहना था कि इस क्यूआर कोड में अल्लाह का नाम लिखा हुआ है. उसने बोतल से इस कोड को हटाने को लेकर हंगामा करना शुरू कर दिया. साथ ही उसने धमकी दी कि अगर ये कोड नहीं हटा तो वो गाड़ी को जला देगा. लोगों ने इसे समझाने की भी कोशिश कि लेकिन उसने अपनी बेवकूफी का नमूना दिखाने के लिए जिद्द नहीं छोड़ी.
शख्स ने खुलेआम कंपनी को धमकी देते हुए कहा कि अगले दो से तीन दिन में अगर बोतल से ये कोड नहीं हटता है, तो वो कहीं भी कोल्ड्रिंक से लदी गाड़ी देख उसे आग के हवाले कर देगा. जो भी इस वीडियो को देख रहा है अपनी हंसी नहीं रोक पा रहा है. हर कोई हैरान है कि भला कोई इतना बड़ा बेवकूफ कैसे हो सकता है? इस मजेदार वीडियो को अभी तक कई बार देखा जा चुका है.
कजाखस्तान में कई हफ्ते से हो रहे विरोध प्रदर्शनों के चलते केंद्र सरकार ने इस्तीफा दे दिया है. राष्ट्रपति कासिम-योमात तोकायेव ने दो बुधवार सुबह ही देश में दो हफ्ते का आपातकाल लागू कर दिया था.
कजाखस्तान के राष्ट्रपति कासिम-योमात तोकायेव ने कहा है कि उन्होंने सरकार का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है और अलीखान समाईलोव को कार्यवाहक प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया है. साथ ही उन्होंने सरकार से तेल की कीमतें नियमित करने का भी आदेश दिया है.
मंगलवार को देश में जारी विरोध प्रदर्शन उस वक्त और तेज हो गए थे जब अधिकारियों ने एलपीजी की कीमतों पर लगी सीमा को हटा लिया था, जिसके बाद ईंधन कीमतों में तेज वृद्धि देखी गई.
आपातकाल लागू
तेज विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए राष्ट्रपति तोकायेव ने आपातकाल लागू कर दिया. इसके तहत रात 11 से सुबह 7 बजे तक कर्फ्यू रहेगा और लोगों के जमा होने व आने-जाने पर पाबंदी होगी. देश के सबसे बड़े शहर अल्माटी और पश्चिमी प्रांत मांगिस्ताऊ में यह पाबंदी लागू होगी.
हाल ही में तेल की कीमतों में देश में तेज वृद्धि हुई थी जिसके मांगिस्ताऊ में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे. यह प्रांत तेल का केंद्र है जहां हजारों लोगों ने प्रदर्शन किया.
मांगिस्ताऊ क्षेत्र में ज्यादातर लोग ईंधन के लिए एलपीजी पर ही निर्भर हैं. इनमें वाहनों का ईंधन भी शामिल है. एलपीजी की कीमतों की वृद्धि आम जरूरत की चीजों की कीमतें भी प्रभावित करती है. कोरोनावायरस महामारी के कारण पहले से महंगाई झेल रहे लोग इस वृद्धि से परेशान हैं.
राष्ट्रपति मुस्तैद
जल्द ही ये प्रदर्शन दश के बाकी हिस्सों में भी फैल गए और खासतौर पर पश्चिमी प्रांत में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए. इसके चलते पुलिस ने बल प्रयोग करना शुरू कर दिया. मंगलवार को अल्माटी में एक रैली हुई जिसमें पांच हजार से ज्यादा लोग शामिल हुए. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर आंसू गोले छोड़े.
इस विरोध को देखते हुए राष्ट्रपति तोकायेव ने देश के नाम एक संबोधन में कहा, "सरकार और सेना के दफ्तरों पर हमलों का आह्वान पूरी तरह अवैध है. सरकार नहीं गिरेगी लेकिन हम विवाद नहीं आपसी भरोसा और बातचीत चाहते हैं.”
वीके/सीके (एएफपी, रॉयटर्स)
नई दिल्ली, 5 जनवरी| पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) ने विदेशी नागरिकों और कंपनियों से मिले फंड और अपने दर्जनों बैंक खातों की जानकारी छुपाई है। इसकी पुष्टि पाकिस्तान के चुनाव आयोग (ईसीपी) की जांच समिति की संकलित एक रिपोर्ट से सामने आई है।
द डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, पार्टी ने वित्त वर्ष 2009-10 और वित्त वर्ष 2012-13 के बीच चार साल की अवधि में 31.2 करोड़ रुपये की राशि कम बताई है। वर्षिक विवरण से मिली जानकारी के मुताबिक अकेले वित्त वर्ष 2012-13 में 14.5 करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि की सूचना नहीं दी गई थी।
रिपोर्ट के मुताबिक, अभी पीटीआई के खातों पर चार्टर्ड एकाउंटेंट की राय सिद्धांतों और मानकों से अलग नहीं है। यह पीटीआई के अध्यक्ष इमरान खान द्वारा हस्ताक्षरित प्रमाण पत्र पर भी सवाल उठाता है, जिसे पीटीआई के लेखा परीक्षित खातों के विवरण के साथ प्रस्तुत किया गया है।
रिपोर्ट में पीटीआई के चार कर्मचारियों को उनके व्यक्तिगत खातों में फंड प्राप्त करने की अनुमति देने के विवाद का भी उल्लेख है, लेकिन उनका कहना है कि उनके खातों की जांच करना उसके काम के दायरे से बाहर है।
यह रिपोर्ट तब सामने आई जब ईसीपी ने लगभग 9 महीने के अंतराल के बाद मंगलवार को पीटीआई के खिलाफ विदेशी फंडिंग मामले की सुनवाई फिर से शुरू की। यह मामला नवंबर 2014 से लंबित है। (आईएएनएस)
वाशिंगटन, 5 जनवरी| वैश्विक कोरोना के मामले बढ़कर 29.5 करोड़ से ज्यादा हो गए हैं। इस महामारी से अब तक कुल 54.5 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुई है जबकि 9.24 अरब से ज्यादा का वैक्सीनेशन हुआ है। ये आंकड़े जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी ने साझा किए हैं। बुधवार की सुबह अपने नए अपडेट में, यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सिस्टम साइंस एंड इंजीनियरिंग (सीएसएसई) ने बताया कि वर्तमान वैश्विक मामले 295,010,012, मरने वालों की संख्या 5,456,350 और टीकाकरण करवा चुके लोगों की संख्या बढ़कर क्रमश: 9,247,893,026 हो गई है।
सीएसएसई के अनुसार, दुनिया के सबसे ज्यादा मामलों और मौतों 57,048,800 और 830,068 के साथ अमेरिका सबसे ज्यादा प्रभावित देश बना हुआ है।
कोरोना मामलों में भारत दूसरा सबसे प्रभावित देश है, जहां कोरोना संक्रमितों के 34,960,261 मामले हैं जबकि 482,017 लोगों की मौत हुई है, इसके बाद ब्राजील में संक्रमितों के 22,328,252 मामले हैं जबकि 619,654 लोगों की मौत हुई हैं।
सीएसएसई के आंकड़ों के अनुसार, 50 लाख से ज्यादा मामलों वाले अन्य सबसे प्रभावित देश यूके (13,722,759), फ्रांस (10,694,804), रूस (10,390,052), तुर्की (9,654,364), जर्मनी (7,279,037), इटली (6,566,947), स्पेन (6,785,286), ईरान (6,200,296), अर्जेटीना (5,820,536) और कोलंबिया (5,203,374) हैं।
जिन देशों ने 100,000 से ज्यादा मौतों का आंकड़ा पार कर लिया है, उनमें रूस (305,906), मेक्सिको (299,581), पेरू (202,818), यूके (149,417), इंडोनेशिया (144,105), इटली (138,045), ईरान (131,736), कोलंबिया (130,100), फ्रांस (125,551), अर्जेटीना (117,294), जर्मनी (112,707) और यूक्रेन (102,717) शामिल हैं। (आईएएनएस)
इराक में रहने वाली अजहर उन महिलाओं को कानूनी सहायता प्रदान करती हैं जो घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं. उस हिंसा से वे खुद अच्छी तरह से वाकिफ हैं. उनके क्रूर पति के साथ अजहर का कुछ ऐसा ही अनुभव रहा है.
परिवार के दबाव में शादी के लिए मजबूर की गई अजहर ने अपने पति से तलाक के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी है. 56 वर्षीय अजहर ने उस आदमी को तलाक देने के लिए लगभग एक दशक तक अदालत में लड़ाई लड़ी, जो उनकी पिटाई करता था.
पति द्वारा हमले को याद करते हुए अजहर कहती हैं, "मुझे यकीन था कि मैं मरने जा रही हूं." उनके पास शरीर पर चोटों की पुरानी तस्वीरें हैं जो वह दिखा रही हैं.
अजहर कहती हैं, "यही वह क्षण था जब मैंने अपनी जंजीरों को तोड़ने का फैसला किया." आखिरकार अजहर ने अपनी आजादी पाई और इस लड़ाई ने उन्हें कानून का अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया. वे याद करती हैं, "मुझे लगता था कि मैं न्याय प्रणाली के सामने कमजोर हूं."
अजहर अब इराक में एक गैर-सरकारी संगठन की प्रमुख है जो हिंसा के शिकार लोगों को कानूनी सहायता प्रदान करता है और यह संगठन इराकी महिला नेटवर्क गठबंधन का हिस्सा है. अजहर कहती हैं, "मैं किसी भी महिला की मदद करती हूं जो हिंसा की शिकार है या जिन्हें कानूनी सहायता की जरूरत है, ताकि ये महिलाएं अपने अधिकारों के बारे में जागरूक हो सकें और अपना बचाव कर सकें."
नाबालिगों की शादी भी एक समस्या
नाबालिगों की शादी से लेकर आर्थिक दबाव तक अधिकार कार्यकर्ता अत्यधिक पितृसत्तात्मक देश में महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करते हैं. वे प्रमुख बाधाओं के रूप में दमनकारी कानूनों और अधिकारियों की उदासीनता का हवाला देते हैं.
करीब चार करोड़ की आबादी वाले देश में साल 2021 में घरेलू हिंसा के 17,000 मामले दर्ज किए गए थे. एक सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार इराक में नाबालिगों की शादी बढ़ रही है. 18 साल से कम उम्र की लड़कियों की शादी पिछले साल बढ़कर 25.5 फीसदी हो गई, जो 2011 में 21.7 फीसदी थी.
सुरक्षा कारणों से अजहर अपना पूरा नाम नहीं बताना चाहती हैं, वे कहती हैं जब उनकी पहली शादी हुई तो उनकी उम्र 20 साल के करीब थी, लेकिन वह जल्द ही विधवा हो गई और सात साल बाद फिर से शादी के लिए मजबूर हो गई. उन्होंने आखिरकार अपने आठ बच्चों के साथ अपने अपमानजनक दूसरे पति को छोड़ दिया और तलाक के लिए अर्जी दी. उन्होंने बताया कि पहला जज उसके पति को जानता था और तीन चिकित्सा प्रमाणपत्रों में उसकी चोटों को साबित करने के बावजूद अर्जी को खारिज कर दिया. वो याद करती हैं कि कैसे जज ने उनसे कहा, "मैं प्रमाणपत्रों के आधार पर परिवार को नहीं तोड़ूंगा. तो क्या हुआ अगर एक आदमी अपनी पत्नी को पीटता है?"
परिवार संरक्षण इकाई के प्रमुख ब्रिगेडियर अली मोहम्मद ने कहा कि घरेलू दुर्व्यवहार के मामलों में जज अक्सर "सुलह" पर जोर देते हैं. अल-अमल संगठन की प्रमुख हाना एडवर कहती हैं "यह पीड़ित महिलाएं हैं जो कीमत चुकाती हैं." वे कहती हैं, "महिलाओं से जुड़े मामलों के लिए न्याय प्रणाली का विचार न्यायाधीशों के दिमाग पर हावी होने वाले तंत्र की तुलना में बहुत कमजोर है."
इराक में महिलाओं के खिलाफ हिंसा से निपटने के लिए कोई विशेष कानून नहीं है. 1969 की दंड संहिता में एक धारा है जो बलात्कारियों को सजा से बचने की अनुमति देती है अगर वे अपने पीड़ित से शादी करने के लिए सहमत होते हैं.
अधिकार समूह घरेलू दुर्व्यवहार पर एक मसौदा कानून के संसद के समर्थन की मांग कर रहे हैं, लेकिन इसे 2010 से इस्लामी दलों द्वारा अवरुद्ध कर दिया गया है.
एए/सीके (एएफपी)
दुनिया भर में कोविड वैक्सीन की दो डोज के बाद बूस्टर डोज लेने की सलाह दी जा रही है. पर ऐसे भी मामले आ रहे हैं, जिनमें टीका लगवा चुके लोग कोरोना से संक्रमित हो रहे हैं. क्या है इसके पीछे का विज्ञान, आइए जानते हैं.
कोरोना वायरस का टीका लगवाने के बाद भी लोग कोरोना से कैसे संक्रमित हो रहे हैं? पिछले कुछ हफ्तों में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ने के बाद से यह बड़ा सवाल तमाम लोगों के जहन में है.
इसके पीछे कई वजहें हैं. पहली बड़ी वजह तो यही है कि कोरोना का नया वेरिएंट ओमिक्रॉन बेहद संक्रामक साबित हो रहा है. इससे संक्रमित होने पर हालत बेहद गंभीर भले ना हो रही है, लेकिन यह भारी तादाद में लोगों को संक्रमित कर रहा है.
यह भी देखने को मिला है कि जहां ज्यादा संख्या में लोग छुट्टियां मनाने घरों से निकले हैं, वहां ओमिक्रॉन संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं.
कहां मात खा रहे हैं लोग?
अक्सर लोग इस गलतफहमी के शिकार हो जाते हैं कि कोविड-19 का टीका लगवाने से वे संक्रमण से पूरी तरह इम्यून हो गए हैं. मिनिसोटा यूनिवर्सिटी में वायरस पर शोध करने वाले लुईस मैन्स्की बताते हैं कि असल में ये टीके लोगों को गंभीर रूप से बीमार होने से बचाने के लिए हैं.
ऐसा देखा भी जा रहा है कि वैक्सीन अब तक अपने इस मकसद में सफल भी हो रही हैं. खासकर बूस्टर डोज लेने वाले लोगों पर इसके असर का पता चल रहा है.
फाइजर-बायोन्टेक या मॉडेर्ना वैक्सीन के दो डोज या फिर जॉनसन एंड जॉनसन वैक्सीन का एक डोज अब भी ओमिक्रॉन वेरिएंट से गंभीर रूप से संक्रमित होने से बचाने में मददगार साबित हो रहा है.
क्या अचूक उपाय है वैक्सीन?
फाइजर-बायोन्टेक और मॉडेर्ना वैक्सीन के शुरुआती दो डोज भले ओमिक्रॉन वेरिएंट पर तुरंत काबू पाने वाले साबित ना हो रहे हों, लेकिन इसके बूस्टर डोज से निश्चित तौर पर शरीर में एंटीबॉडी की संख्या बढ़ जाती है, जिससे गंभीर रूप से संक्रमित होने से कुछ राहत मिल सकती है.
कोरोना के पिछले वेरिएंट्स की तुलना में ओमिक्रॉन वेरिएंट इंसानी शरीर में अपनी मात्रा या संख्या ज्यादा तेजी से बढ़ाता है. तो अगर किसी संक्रमित व्यक्ति में वायरस का लोड ज्यादा है, तो उनके अन्य लोगों को संक्रमित करने की आशंका भी ज्यादा होगी. वे लोग तो खासतौर से खतरे की जद में होंगे, जिन्होंने अब तक टीका नहीं लगवाया है.
विज्ञान
वैक्सीन लगवाने के बावजूद कैसे कोविड संक्रमित हो रहे हैं लोग?
दुनिया भर में कोविड वैक्सीन की दो डोज के बाद बूस्टर डोज लेने की सलाह दी जा रही है. पर ऐसे भी मामले आ रहे हैं, जिनमें टीका लगवा चुके लोग कोरोना से संक्रमित हो रहे हैं. क्या है इसके पीछे का विज्ञान, आइए जानते हैं.
कोरोना वायरस का टीका लगवाने के बाद भी लोग कोरोना से कैसे संक्रमित हो रहे हैं? पिछले कुछ हफ्तों में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ने के बाद से यह बड़ा सवाल तमाम लोगों के जहन में है.
इसके पीछे कई वजहें हैं. पहली बड़ी वजह तो यही है कि कोरोना का नया वेरिएंट ओमिक्रॉन बेहद संक्रामक साबित हो रहा है. इससे संक्रमित होने पर हालत बेहद गंभीर भले ना हो रही है, लेकिन यह भारी तादाद में लोगों को संक्रमित कर रहा है.
यह भी देखने को मिला है कि जहां ज्यादा संख्या में लोग छुट्टियां मनाने घरों से निकले हैं, वहां ओमिक्रॉन संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं.
कहां मात खा रहे हैं लोग?
अक्सर लोग इस गलतफहमी के शिकार हो जाते हैं कि कोविड-19 का टीका लगवाने से वे संक्रमण से पूरी तरह इम्यून हो गए हैं. मिनिसोटा यूनिवर्सिटी में वायरस पर शोध करने वाले लुईस मैन्स्की बताते हैं कि असल में ये टीके लोगों को गंभीर रूप से बीमार होने से बचाने के लिए हैं.
ऐसा देखा भी जा रहा है कि वैक्सीन अब तक अपने इस मकसद में सफल भी हो रही हैं. खासकर बूस्टर डोज लेने वाले लोगों पर इसके असर का पता चल रहा है.
[Neue Coronavirus Covid 19 SARS-CoV-2 Variante Omicron B.1.1.529]
फाइजर-बायोन्टेक या मॉडेर्ना वैक्सीन के दो डोज या फिर जॉनसन एंड जॉनसन वैक्सीन का एक डोज अब भी ओमिक्रॉन वेरिएंट से गंभीर रूप से संक्रमित होने से बचाने में मददगार साबित हो रहा है.
क्या अचूक उपाय है वैक्सीन?
फाइजर-बायोन्टेक और मॉडेर्ना वैक्सीन के शुरुआती दो डोज भले ओमिक्रॉन वेरिएंट पर तुरंत काबू पाने वाले साबित ना हो रहे हों, लेकिन इसके बूस्टर डोज से निश्चित तौर पर शरीर में एंटीबॉडी की संख्या बढ़ जाती है, जिससे गंभीर रूप से संक्रमित होने से कुछ राहत मिल सकती है.
कोरोना के पिछले वेरिएंट्स की तुलना में ओमिक्रॉन वेरिएंट इंसानी शरीर में अपनी मात्रा या संख्या ज्यादा तेजी से बढ़ाता है. तो अगर किसी संक्रमित व्यक्ति में वायरस का लोड ज्यादा है, तो उनके अन्य लोगों को संक्रमित करने की आशंका भी ज्यादा होगी. वे लोग तो खासतौर से खतरे की जद में होंगे, जिन्होंने अब तक टीका नहीं लगवाया है.
टीका लगवाने के अलावा क्या हैं उपाय?
टीका लगवा चुके लोग अगर वायरस से संक्रमित होते हैं, तो उनमें बेहद मामूली लक्षण देखने को मिलते हैं, क्योंकि टीके की वजह से शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र में पहले ही सुरक्षा की कई तहें तैयार हो जाती हैं. ओमिक्रॉन के लिए इन सारी तहों को भेदना थोड़ा मुश्किल होता है.
लेकिन, इससे सुरक्षित रहने के तौर-तरीकों और सलाहों में कोई बदलाव नहीं आता है. डॉक्टर अब भी सार्वजनिक और निजी, दोनों जगहों पर मास्क लगाने, भीड़-भाड़ में न जाने, वैक्सीन लगवाने और बूस्टर डोज लेने की सलाह दे रहे हैं.
हालांकि, ये टीके आपके संक्रमित ना होने की गारंटी नहीं हैं, लेकिन वैक्सीन निश्चित रूप से आपको गंभीर रूप से बीमार होने से बचाएगी, अस्पताल में भर्ती होने से बचाएगी और मरने के खतरे को कम करेगी.
वीएस/एनआर (एपी)
अफगानिस्तान के गजनी प्रांत में गवर्नर के आवास के अंदर एक नई ऐतिहासिक चीज को प्रदर्शनी पर रखा गया है. यह प्रदर्शनी है उस पूर्व अमेरिकी सैन्य अड्डे की दीवार के टुकड़ों की जिसे तालिबान ने उड़ा दिया था.
कंक्रीट के इन टुकड़ों में से एक पर गजनी में पूर्व में तैनात किए गए अमेरिकी सैनिकों के नाम और उनके रेजिमेंटों के नाम खुदे हुए हैं. जैसा कि इतिहास में अक्सर होता आया है, यहां भी अमेरिकी सैनिक अपने अड्डों और तैनाती के स्थानों की दीवारों पर अपना नाम लिख देते थे.
लेकिन अब 20 साल की लड़ाई के बाद अमेरिकी और दूसरी सेनाओं को हराने की कहानी को और मजबूती देने के लिए इस ऊंची दीवार को नुमाइश के लिए रखा गया है.
इतिहास के लिए
प्रांत में तालिबान के संस्कृति प्रमुख मुल्ला हबीबुल्ला मुजाहिद कहते हैं, "हमें यह दिखाना है ताकि अफगानिस्तान और दुनिया के लोग और आने वाली पीढ़ियां यह जान सकें कि खुद को दुनिया की सबसे बड़ी ताकत कहने वाले अमेरिकियों को हराया है."
गजनी काबुल से 150 किलोमीटर दूर स्थित है और तालिबान के लड़ाकों ने इसे 15 अगस्त 2021 को काबुल पर कब्जा करने से तीन दिन पहले ही फतह कर लिया था. इस इलाके का 3,500 सालों का समृद्ध इतिहास है और अब तालिबान अपनी सैन्य जीत के सबूत की मदद से इसका सबसे नया अध्याय लिख रहा है.
प्रचार के ऐसे नए कदम ऐसे समय में उठाए जा रहे हैं जब अफगानिस्तान के नए शासक लड़ाकों से प्रशासक बनाने की कोशिश में लगे हैं और देश आर्थिक रूप से विनाश के कगार पर है. संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि देश की आधी से ज्यादा आबादी भीषण भूख का सामना कर रही है.
विदेशी साम्राज्यों पर जीत
लेकिन लगभग 2,00,000 की आबादी वाले गजनी शहर के बाहर सड़कों पर तालिबान की जीत की एक और अनौपचारिक स्मारक खड़ी कर दी गई है. यह है नष्ट की हुई अमेरिकी बख्तरबंद गाड़ियों के जंग खाते हुए अवशेष. गाड़ियों से उनके हथियार हटा दिए गए हैं, टायरों की हवा निकल गई है और वे घिस भी गए हैं.
इस कबाड़ में पूर्व में छोड़ दिए गए सोवियत टैंक भी हैं. बच्चे इसके आस पास खेलते हैं और कभी कभी तो गाड़ियों पर चढ़ भी जाते हैं. सोवियत संघ के लिए अफगानिस्तान पर चढ़ाई करने का अंत शर्मिंदगी में हुआ था और अफगान यहां आने वाले लोगों को अब तुरंत याद दिला रहे हैं कि देश ने अब तीन विदेशी साम्राज्यों को हरा दिया है.
19वीं शताब्दी में ब्रिटेन को भी यहां शिकस्त का सामना करना पड़ा था. 18 साल के तालिबान के लड़ाके ओजैर कहते हैं, "हम जब इसे देखते हैं तब हमें अपनी उपलब्धि पर गर्व होता है." ओजैर की तरह देश में कई लोगों का कोई उपनाम नहीं है.
कबाड़ बन चुकी हम्वीयों और जली हुई दूसरी गाड़ियों को देखते हुए वो कहते हैं, "हमने दिखा दिया कि यहीं पैदा हुए अफगान अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश को हरा सकते हैं."
क्या सच, क्या प्रचार
पूरे देश में अमेरिका की दो दशकों की मौजूदगी की याद दिलाने वाली कई चीजें बिखरी पड़ी हैं, जिनमें से कुछ अभी भी इस्तेमाल के लायक हैं. अफगान पुलिस और सैनिकों को भेंट में दिए हुए काफी सैन्य उपकरण अमेरिका समर्थित सरकार के आखिरी के अव्यवस्थित दिनों में तालिबान के पास पहुंच गए.
इन्हीं हथियारों, गाड़ियों और वर्दियों के अप्रत्याशित लाभ ने काबुल के नए शासकों को काफी ठोस लूट का सामान दे दिया है जिसे वे अपनी जीत के सबूत के रूप में दिखा रहे हैं. लेकिन इन सब चीजों को तालिबान की सत्ता में वापसी की विश्वसनीय श्रद्धांजलि के रूप में सजाना एक चुनौती बना हुआ है.
टूटी हुई दीवारों के पास खड़े मुल्ला हबीबुल्ला मुजाहिद गर्व से कहते हैं कि दीवार पर खुदे करीब 20 नामों में लड़ाई में मारे गए "महत्वपूर्ण कमांडरों और जनरलों" के नाम भी शामिल हैं. लेकिन उनके नामों के आगे जो रैंक लिखी है वो सब कनिष्ठ हैं और उनमें से कोई भी नाम युद्ध में मारे गए अमेरिकियों की सूचियों में नहीं है.
सीके/एए (एएफपी)
दुनिया की पांच परमाणु शक्तियों ने सोमवार को एक विरला कदम उठाते हुए ऐसा बयान जारी किया जिसने शांति में दुनिया का भरोसा मजबूत किया. पूर्व और पश्चिम के भेद मिटाते हुए ये पांच परमाणु शक्तियां पहली बार इस तरह साथ आईं.
अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, रूस और चीन ने एक साथ मिलकर कहा कि परमाणु युद्ध ना जीता जा सकता है और ना लड़ा जाना चाहिए. साझा बयान में कहा गया, "हम इस बात को पूरी शिद्दत के साथ मानते हैं कि ऐसे (परमाणु) हथियारों का और प्रसार रोका जाना चाहिए. परमाणु युद्ध जीता नहीं जा सकता और कभी लड़ा नहीं जाना चाहिए.”
यह बयान तब जारी हुआ है जबकि परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) की ताजा समीक्षा को कोविड-19 के कारण बाद के लिए टाल दिया गया है. यह समीक्षा 4 जनवरी को होनी थी लेकिन सुरक्षा परिषद के पांचों स्थायी सदस्यों ने इसे साल बाद में करने के लिए स्थगित कर दिया. एनपीटी 1970 में अस्तित्व में आई थी.
निरस्त्रीकरण का वचन
पांचों ताकतों ने कहा, "परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बीच युद्ध को टालना और रणनीतिक खतरों को कम करना हमारी प्राथमिक जिम्मेदारी है.”
बयान के मुताबिक सभी देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि वे राष्ट्रीय स्तर पर उन उपायों को मजबूत करेंगे जिनसे परमाणु हथियारों का अनधिकृत या अनैच्छिक प्रयोग ना हो. बयान में संधि की उस धारा पर भी प्रतिबद्धता जताई गई जिसके तहत सभी देश भविष्य में पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए वचनबद्ध हैं. साझा बयान में कहा गया है, "हम धारा 6 सहित एनपीटी के प्रति हमारी बाध्यताओं के प्रति वचनबद्ध हैं.”
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 191 देश इस संधि पर हस्ताक्षर कर चुके हैं. इस संधि का एक प्रावधान कहता है कि हर पांच साल पर इसकी समीक्षा होनी चाहिए.
क्यों अहम है यह बयान?
हाल के दिनों में चीन और रूस दोनों के साथ पश्चिमी ताकतों का तनाव बढ़ा है, जिस कारण यह बयान आश्वस्त करने वाला माना जा रहा है. रूस और चीन के साथ अमेरिका का तनाव शीत युद्ध के बाद अब तक के चरम पर है. खासतौर पर रूस द्वारा यूक्रेन सीमा पर बड़े सैन्य जमावड़े के बाद दोनों शक्तियों की ओर से आक्रामक बयानों के चलते तनाव बढ़ गया था.
रूस को आशंका है कि यूक्रेन के रूप में नाटो शक्तियां उसकी सीमा पर अपनी हथियारबंदी बढ़ाना चाहती हैं. उधर अमेरिका और अन्य पश्चिमी ताकतों को लग रहा है कि रूस अपनी प्रसारवादी नीतियों के तहत यूक्रेन पर हमला करने की तैयारी कर रहा है. 10 जनवरी को रूस और अमेरिका के बीच जेनेवा में एक बातचीत होनी है जिसमें यूरोपीय सुरक्षा पर चर्चा होगी.
उधर चीन के साथ अमेरिका का तनाव भी जो बाइडेन के राष्ट्रपति बनने के बाद से लगातार बढ़ रहा है. चाहे वह व्यापारिक आक्रामकता हो या ताइवान को लेकर तनाव, अमेरिका ने कई बार ऐसे बयान दिए हैं जिन्हें चीन ने ‘शीत युद्ध जैसी मानसिकता' बताया.
रूस और चीन दोनों ने सुरक्षा परिषद के इस बयान का स्वागत किया है. रूस ने उम्मीद जताई कि इस बयान से वैश्विक स्तर पर तनाव घटाने में मदद मिलेगी. रूसी विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया, "हम उम्मीद करते हैं कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के मौजूदा मुश्किल हालात में ऐसे राजनीतिक बयान अंतरराष्ट्रीय तनाव का स्तर घटाने में मददगार साबित होंगे.”
चीन के विदेश मंत्रालय ने भी इस बयान को आपसी विश्वास बढ़ाने वाला बताया. चीनी उप विदेश मंत्री मा जाओक्शऊ के हवाले से देश की सरकारी समाचार एजेंसी ने लिखा है कि यह वचन "परस्पर विश्वास और बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा की जगह सामंजस्य और सहयोग बढ़ाने में मदद करेगा.”
बाकी चार देशों का क्या?
परमाणु यद्ध जीता नहीं जा सकता, यह विचार सोवियत संघ के नेता मिखाइल गोर्बाचेव और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन ने 1985 में पेश किया था. जेनेवा सेंटर फॉर सिक्यॉरिटी पॉलिसी में अप्रसार प्रमुख मार्क फिनाउद कहते हैं, "यह पहली बार जब इन पांचों ताकतों ने उस विचार को दोहराया है. गैर-परमाणु शक्ति संपन्न देशों और सामाजिक संस्थाओं की लगातार मांग के बाद उन्होंने आगे कदम बढ़ाया है और उस विचार की ओर लौटे हैं.”
एनपीटी चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका को ही परमाणु शक्ति के रूप में मान्यता देती है जबकि भारत और पाकिस्तान भी परमाणु हथियार विकसित कर चुके हैं. इसके अलावा यह भी माना जाता है कि इस्राएल के पास भी परमाणु हथियार है. तीनों ने ही एनपीटी पर दस्तखत नहीं किए हैं जबकि एक अन्य परमाणु संपन्न देश उत्तर कोरिया ने 2003 में इस संधि से खुद को बाहर कर लिया था.
वीके/एए (एएफपी, एपी)
यूरोपीय आयोग के एक प्रस्ताव को लेकर बहस छिड़ी है जिसमें गैस और परमाणु ऊर्जा में कुछ निवेशों को पर्यावरण के लिए अनुकूल मानने की बात है. जर्मनी और ऑस्ट्रिया ने इसका कड़ा विरोध किया है.
जर्मनी और ऑस्ट्रिया की सरकार के मंत्रियों ने यूरोपीय संघ के उस प्रस्ताव का विरोध किया है जिसमें गैस और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में कुछ निवेश भी पर्यावरण के लिए उपयुक्त निवेशों में शामिल हो जाएंगे.
जर्मनी की विकास मंत्री स्वेन्या शुल्त्से का कहना है, "यूरोपीय संघ में परमाणु ऊर्जा को टिकाऊ ऊर्जा मानना गलत है और यह वैश्विक मानकों के हिसाब से असंगत है." जर्मन मंत्री के मुताबिक, "परमाणु ऊर्जा जरूरत से ज्यादा खतरनाक, महंगी और दुनिया के पर्यावरण को बचाने के लिहाज से अत्यधिक धीमी है. आज दुनिया भर की ऊर्जा में इसकी भागीदारी बमुश्किल पांच फीसदी है जो इससे ज्यादा कभी नहीं होगी." शुल्त्से का यह भी कहना है कि विकासशील देशों के लिए परमाणु ऊर्जा कभी भी अच्छा विकल्प नहीं है. उन्होंने ध्यान दिलाया कि पवन और सौर ऊर्जा बेहतर विकल्प हैं. इससे पहले जर्मन सरकार के प्रवक्ता ने प्रस्ताव का स्वागत किया और प्राकृतिक गैस को इस सूची में डालना उचित बताया लेकिन परमाणु उर्जा का विरोध किया.
यूरोपीय संघ के प्रस्ताव का विरोध करने में ऑस्ट्रिया की पर्यावरण मंत्री लियोनोरे गेवेसलर ने तो एक कदम और आगे जा कर इसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने की धमकी दी है. उन्होंने शनिवार को ट्वीट कर कहा कि अगर इन प्रस्तावों को इसी रूप में लागू किया जाता है तो वह निश्चित रूप से ऐसा करेंगी. गेवेसलर का कहना है कि यूरोपीय आयोग परमाणु ऊर्जा और प्राकृतिक गैस को हरित दिखाना चाहता है. गेवेसलर का कहना है, "परमाणु ऊर्जा खतरनाक है और यह पर्यावरण संकट के खिलाफ संघर्ष में समाधान नहीं है."
यूरोपीय आयोग का प्रस्ताव
यूरोपीय आयोग ने शनिवार को इस प्रस्ताव का ड्राफ्ट पेश किया जिसके बाद यूरोपीय संघ में "स्वच्छ ऊर्जा" के अर्थ को लेकर पहले से चला आ रहा विवाद गहरा गया है. इस प्रस्ताव के समर्थकों का कहना है कि गैस से चलने वाले बिजली संयंत्र कोयले से चलने वाले संयंत्रों की तुलना में स्वच्छ हैं. उनकी दलील है कि इनसे अर्थव्यवस्थाओं को पर्यावरण के अनुकूल रह कर भविष्य की ओर बढ़ने में मदद मिलेगी. उनका यह भी कहना है कि परमाणु ऊर्जा को भी स्वच्छ ऊर्जा माना जाना चाहिए क्योंकि इसमें ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन नहीं होता.
इसका विरोध करने वाले कहते हैं कि गैस से बिजली बनाना पर्याप्त स्वच्छ नहीं है और परमाणु ऊर्जा बनाने में पैदा होने वाला रेडियोधर्मी कचरा लंबे समय के लिए खतरा है.
आयोग के प्रस्ताव में निवेशों को पर्यावरण के उपयुक्त माने जाने से पहले कड़ी शर्तों का पालन जरूरी बनाया गया है. उदाहरण के लिए परमाणु ऊर्जा में निवेश को तभी सही माना जाएगा जब कि सबसे नए तकनीकी मानकों का पालन हो और परमाणु कचरे के निस्तारण की योजना पर अमल 2050 तक जरूर शुरू हो जाए. इसके अलावा नए परमाणु संयंत्रों को बनाने की अनुमति 2045 से पहले लेना भी जरूरी है.
क्या इटली भी परमाणु ऊर्जा की ओर लौटेगा?
आयोग के प्रस्ताव ने इटली में भी बहस छेड़ दी है. यहां धुर दक्षिण पंथी पार्टी लीगा के मातेयो साल्विनी ने एक बार फिर इटली की जमीन पर परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने की संभावना जताई है. इटली ने चेर्नोबिल हादसे के बाद 1980 के दशक में ही परमाणु उर्जा के संयंत्रों को बंद कर दिया था. साल्विनी ने ट्वीट किया है, "इटली चुपचाप खड़ा नहीं रह सकता, लीगा भी जनमतसंग्रह करा कर लोगों के दस्तखत जमा करेगी जिसके बाद हमारा देश एक स्वतंत्र, सुरक्षित और स्वच्छ ऊर्जा के भविष्य में प्रवेश करेगा."
इटली अपनी ऊर्जा जरूरत का एक बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से आयात करता है. 2011 में एक जनमतसंग्रह में इटली के लोगों ने परमाणु ऊर्जा की वापसी के प्रस्ताव को नकार दिया था. फाइव स्टार मूवमेंट जैसी कई राजनीतिक दल भी परमाणु ऊर्जा के विरोध में है. फाइव स्टार मूवमेंट लीगा के साथ इटली की मौजूदा गठबंधन सरकार में शामिल है. हालांकि हाल के महीनों में गैस और बिजली की कीमतें जिस तेजी से बढ़ी हैं उसमें यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है.
इन सब के बीच जर्मनी ने अपने तीन और परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में बिजली का उत्पादन शुक्रवार को बंद कर दिया. 2011 में फुकुशिमा हादसे के बाद जर्मनी ने परमाणु ऊर्जा से छुटकारा पाने का फैसला किया था. उसी को अमल में लाते हुए धीरे धीरे परमाणु ऊर्जा संयंत्र बंद किए जा रहे हैं. साल 2022 के आखिरी दिन बाकी बचे परमाणु बिजली घर भी बंद कर दिए जाएंगे.
एनआर/आरपी (डीपीए, रॉयटर्स)
"बुल्ली बाई" ऐप पर कई प्रभावशाली मुस्लिम महिलाओं की तस्वीरें पोस्ट की गई थीं. महिलाएं सवाल कर रही हैं कि ऐसे लोगों पर सरकार कार्रवाई क्यों नहीं करती है.
डॉयचे वैले पर आमिर अंसारी की रिपोर्ट-
मुस्लिम महिलाओं की तस्वीरें "नीलाम" करने वाले ऐप "बुल्ली बाई" को तो ब्लॉक कर दिया गया है लेकिन जिन महिलाओं की तस्वीरें इस ऐप पर डाली गईं थी वे इस बात से निराश हैं कि सरकार ऐसे लोगों पर सख्ती कब दिखाएगी. दिल्ली और मुंबई पुलिस ने इस ऐप के खिलाफ आईपीसी की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है. डीडब्ल्यू ने दो प्रभावशाली महिलाओं से बात की जिनकी तस्वीरें इस ऐप पर डाली गईं थी. इनमें से द वॉयर की पत्रकार इस्मत आरा हैं और दूसरी जानी मानी रेडियो जॉकी सायमा हैं.
भारत की 100 मुस्लिम महिलाओं समेत इन दोनों की तस्वीरें भी "नीलामी" के लिए ऐप पर डाली गईं थीं. इनका कहना है कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की उम्मीद कम है. "बुल्ली बाई" ऐप पर जिनकी तस्वीरें डाली गईं उनमें प्रसिद्ध अभिनेत्री शबाना आजमी, दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की पत्नी, कई पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनेता शामिल हैं. पत्रकार इस्मत आरा उन महिलाओं में से एक हैं जिनकी तस्वीरें "बुल्ली बाई" पर पोस्ट की गई हैं. उन्होंने उसके खिलाफ दिल्ली पुलिस साइबर सेल में शिकायत दर्ज कराई है.
"सच की आवाज दबाने की कोशिश"
इस्मत आरा कहती हैं कि इस तरह की घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं लेकिन उनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई जिससे ऐसे लोगों का हौसला बढ़ा है. डीडब्ल्यू से बात करते हुए उन्होंने कहा, "ये मामला पहली बार नहीं हो रहा है. एक बार और हो चुका है, उस बार भी लोगों ने यह नहीं कहा था कि बहुत अच्छा हुआ है, लोगों ने इसकी निंदा की थी. सबने कहा था कि बहुत गलत हो रहा है. उस बार भी सभी जिम्मेदार लोगों ने इसकी निंदा की थी. महिला आयोग ने संज्ञान लिया था. संसद में बात उठाई गई थी. गृह मंत्री को खत लिखे गए थे. उसके बावजूद उस केस में निष्कर्ष नहीं दिखा, मामले में प्रगति होती नहीं दिखी."
इस्मत कहती हैं, "इस बार भी दो जगह मामला दर्ज कराया गया है. इस उम्मीद के साथ कि कोई कार्रवाई हो. इस बार भी पुलिस के लिए काफी चुनौती है कि वे लोग भी बार-बार अंगूठा दिखा रहे हैं और कह रहे हैं कि हम करेंगे, आप हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं. तो उनके भीतर डर तो पैदा हो, एक सजा तो मिले ताकि इस तरह की चीजें दोबारा ना हों."
ऐप पर तस्वीर डाले जाने को लेकर उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि सच्चाई की आवाज उठाने वालों को डरा-धमका कर चुप कराया जा सके. इस्मत आरा आगे कहती हैं, "हमारे माता-पिता भी चिंतित हैं, हमारी बहनें भी चिंतित हैं कि सोशल मीडिया तक सीमित यह खतरा वास्तविक खतरा न बन जाए और हम पर सीधा हमला हो सकता है." इस्मत चाहती हैं कि सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए. वे कहती हैं, "लेकिन अभी तक हमने ऐसी कोई प्रगति नहीं देखी है."
"यह बहुत दर्दनाक है"
इसी तरह की एक और घटना पिछले साल जुलाई में हुई थी. "सुल्ली डील्स" नाम के एक ऐप पर 80 से ज्यादा मुस्लिम महिलाओं की तस्वीरें डाली गई थीं. ऐप के खिलाफ दिल्ली और उत्तर प्रदेश में मामले दर्ज किए गए लेकिन अब तक उस मामले में कोई प्रगति नहीं हुई है और ना ही कोई गिरफ्तारी. जानी मानी रेडियो जॉकी सायमा का नाम भी "बुल्ली बाई" की लिस्ट में शामिल है. उन्होंने डीडब्ल्यू से बात करते हुए कहा कि यह बहुत दर्दनाक है. उन्होंने कहा, "पिछले चार पांच साल से सोशल मीडिया पर आपके खिलाफ गाली गलौज, आपकी तस्वीरें बिगाड़ने की एक संस्कृति बनती जा रही है, जिसको आप साइबर बुलिंग कहते हैं, क्योंकि आप मुसलमान है और आज के हिंदुस्तान में ऐसा हो रहा है. मेरे लिए यह शॉकिंग नहीं था और मेरे ख्याल से यही सबसे ज्यादा शॉकिंग चीज है कि यह शॉकिंग नहीं है."
सायमा का कहना है, "सभी को ऐसे अपराधियों के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए क्योंकि कोई भी इनका शिकार हो सकता है. नफरत करने वाले किसी का पीछा नहीं छोड़ते." वे कहती हैं, "ये जो चलन है कि आपकी आंख में आंख मिलाकर वो अपनी सारी हैवानियत दिखाएंगे, यह बहुत तकलीफदेह है. यह साफ साफ बताता है कि आपके देश का कानून मर चुका है. आपके समाज में कानून से चीजें चलती थीं, वह नहीं है." वे सवाल करती हैं, "इन्हें किनका समर्थन हासिल है, ये लोग क्यों नहीं पकड़े जाते हैं. यह खुलकर सामने आते हैं और बताते हैं कि हमने किया है और मुस्कुराते हैं और इनपर खबरें होती हैं लेकिन इनको पकड़ा नहीं जाता है."
"असली जिम्मेदारी सरकार की"
पीड़ितों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि महिलाओं, खासकर मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ रहे हैं क्योंकि उन्हें रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं. सायमा का कहना है, "सबसे बड़ी जिम्मेदारी सरकार और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की है. अगर वे यह सुनिश्चित करते हैं कि गलत काम करने वालों के खिलाफ नरमी ना की जाए तो इस गंभीर समस्या को काफी हद तक हल किया जा सकता है."
उन्होंने कहा कि असली सवाल कानून के शासन का है. सायमा का कहना है, "हमारी सरकार, हमारी पुलिस इस तरह का काम क्यों नहीं करती कि वे लोग डरे. क्या है जो इतना वक्त लगता है कार्रवाई करने में. मुजरिम आपके सामने है. सवाल मेरा कानून से है. किस तरह का कानून हम दे रहे हैं कि हम किसी की सुरक्षा नहीं कर सकते हैं. तो हम जंगल में चले जाएंगे ना. या फिर हमें बता दें कि हम आपका ख्याल नहीं रखेंगे, आप अपनी हिफाजत खुद करें."
सायमा से जब पूछा गया कि मुस्लिम महिलाओं को इस तरह से क्यों निशाना बनाया जा रहा है तो वे कहती हैं कि "बुल्ली बाई"और "सुल्ली डील्स" की तरह काम करने वाले सोचते हैं कि कैसे एक मुस्लिम लड़की सच्चाई के लिए आवाज उठाने की हिम्मत कर सकती है. वह कैसे सफल हो सकती है? वह उदार कैसे हो सकती है?''
कई सामाजिक और राजनीतिक नेताओं ने भी "बुल्ली बाई" मुद्दे की निंदा की है और सरकार से कार्रवाई करने का आह्वान किया है. इस्मत कहती हैं इस तरह के हमले सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहते हैं और वह वास्तव में असली खतरा भी बनकर आ सकते हैं. इस बीच केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा है ऐप के होस्ट प्लेटफॉर्म गिटहब ने ऐप ब्लॉक कर दिया है. उन्होंने कहा है कि ऐप डेवलपर्स के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी. उनके मुताबिक कार्रवाई के लिए इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम और पुलिस समन्वय कर रही है. (dw.com)
शनिवार को हैती की आज़ादी की सालगिरह के मौके पर एक कार्यक्रम के दौरान बंदूकधारियों ने देश के प्रधानमंत्री एरियल हेनरी की हत्या करने की कोशिश की.
हैती के अधिकारियों ने ये जानकारी दी है.
यह घटना तब हुई जब हेनरी उत्तरी शहर गोनावेस में स्थित एक चर्च के समारोह में हिस्सा ले रहे थे.
सामने आए वीडियो में प्रधानमंत्री और उनके दल की कार तेज़ गोलीबारी के बीच बचकर निकलती नज़र आ रही है.
पिछले साल,जुलाई में राष्ट्रपति जोवेनेल मोसे की हत्या के बाद से देश में सुरक्षा की स्थिति बिगड़ती ही जा रही है.
हाल ही में प्रधानमंत्री हेनरी ने देश में अपहरण करने वाले और देश भर में गैस वितरण के अधिकांश हिस्से पर नियंत्रण करने वाले शक्तिशाली गिरोहों पर नकेल कसने का संकल्प लिया था. गैस वितरण के हिस्सों पर कब्ज़े के कारण हैती ईंधन की गंभीर कमी से जूझ रहा है.
प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा कि हत्या की कोशिश के पीछे "लुटेरे और आतंकवादी" थे,और संदिग्धों के लिए गिरफ़्तारी वारंट जारी किया जा चुका है.
समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस के अनुसार,प्रधानमंत्री पर हमला करने वा समूह परदे के पीछे छिप कर काम करता है और उन्होंने चर्च के पादरी को धमकाया और चर्च को चारो ओर से घेर लिया था.
स्थानीय मीडिया के हवाले से बताया गया है कि हमलावरों और सुरक्षा बलों के बीच हुई इस मुठभेड़ में एक व्यक्ति की मौत हो गई और दो लोग घायल हो गए. (bbc.com)
सुमी खान
ढाका, 4 जनवरी| बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने 'गोलियों और ग्रेनेड' के खतरे के बावजूद लोगों के लिए काम करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।
बंगबंधु इंटरनेशनल में आयोजित एक समारोह में उन्होंने कहा, मुझे पता है कि कई गोलियां, बम और हथगोले मेरा इंतजार कर रहे हैं। मुझे उनकी कभी परवाह नहीं है। मैं लोगों के भाग्य को बदलने के लिए काम कर रही हूं और मैं निश्चित रूप से ऐसा करूंगी।
सम्मेलन का आयोजन केंद्र, संयुक्त राष्ट्र द्वारा एक विकासशील राष्ट्र के लिए बांग्लादेश के ग्रैजुएशन की औपचारिक मान्यता का जश्न मनाने के लिए किया गया।
हसीना ने कहा, "मेरे सामने चाहे जो भी बाधा आए .. मैं उन लोगों के रास्ते जानती हूं, जो अपने देश से प्यार करते हैं, और उन्हें कई बाधाओं से गुजरना होगा। उन्होंने कहा, उम्मीद है कि भविष्य की पीढ़ियों के हाथों में विकास जारी रहेगा।
उन्होंने कहा कि कोई भी हमेशा के लिए नहीं रहेगा। नई पीढ़ी को देश के विकास को समृद्धि की ओर ले जाने के लिए जिम्मेदारियां निभानी होंगी।
हसीना ने अपने आधिकारिक आवास गणभवन से वर्चुअल रूप से शामिल होते हुए कहा, "मैं नई पीढ़ी से देश से प्यार करने और यहां के लोगों के लिए काम करने का आह्वान करना चाहती हूं।"
उन्होंने कहा, हमें एक विकसित और समृद्ध देश के निर्माण के लिए राष्ट्रपिता के सपने को साकार करना होगा। हसीना ने अपने सपने को पूरा करने के लिए बंगबंधु के आदर्शो के साथ आगे बढ़ने का संकल्प लिया, चाहे रास्ता कितना भी अंधेरा क्यों न हो।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि उनकी सरकार 2041 तक बांग्लादेश को एक विकसित और समृद्ध राष्ट्र में बदलने के लिए चल रहे विकास की होड़ को जारी रखने के लिए एक चिकनी संक्रमण रणनीति (एसटीएस) बनाने के लिए तैयार है। (आईएएनएस)
दुनिया भर में लगभग 7,000 मान्यता प्राप्त भाषाएं हैं, लेकिन उनमें से कई जल्द ही हमेशा के लिए विलुप्त हो सकती हैं. ऑस्ट्रेलिया के एक अध्ययन के मुताबिक सभी भाषाओं में से लगभग आधी खतरे में हैं.
ऑस्ट्रेलिया में हुए शोध में कहा गया है कि इस सदी के अंत तक 1,500 भाषाएं विलुप्त हो सकती हैं. शोधकर्ताओं ने अपने शोध में लिखा, "हस्तक्षेप के बिना 40 वर्षों के भीतर भाषा की हानि तिगुनी हो सकती है, जिसमें एक भाषा मासिक आधार पर विलुप्त हो सकती है."
शोधकर्ताओं का सुझाव है कि बच्चों के पाठ्यक्रम को द्विभाषी के रूप में विकसित किया जाए और क्षेत्रीय रूप से मजबूत भाषाओं के साथ-साथ प्राचीन भाषाओं के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जाए. शिक्षा, नीति, सामाजिक-आर्थिक संकेतकों और समग्र परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न भाषाओं के इस अध्ययन के लिए कई पैमानों को अपनाया गया.
ऑस्ट्रेलियाई राष्ट्रीय विश्वविद्यालय (एएनयू) के नेतृत्व में यह अध्ययन किया गया और यह शोध नेचर इकोलॉजी पत्रिका में प्रकाशित हुआ है. यह अध्ययन भाषाओं के सामने आने वाले अप्रत्याशित और आश्चर्यजनक खतरों की पड़ताल करता है.
इस अध्ययन रिपोर्ट के सह-लेखक लिंडेल ब्रोमहैम के मुताबिक, "किसी क्षेत्र में बेहतर सड़क अवसंरचना भाषाओं के अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण है. उदाहरण के लिए इनमें एक अच्छी तरह से विकसित सड़क नेटवर्क शामिल है." वे आगे कहते हैं, "हमने देखा कि जितनी अच्छी सड़कें हैं, उतना ही बेहतर क्षेत्र बाकी हिस्सों से जुड़े हैं. सड़कों पर प्रमुख भाषाओं का बोलबाला लगता है. वे मदद करती हैं उन्हें स्थानीय भाषा सीखने के लिए."
अध्ययन में यह भी पाया गया कि विभिन्न भाषाओं के परस्पर संपर्क से स्वदेशी भाषाओं को खतरा नहीं है, बल्कि यह तथ्य है कि अन्य भाषाओं के संपर्क में आने वाली भाषाएं कम खतरे में हैं. अध्ययन रिपोर्ट ऑस्ट्रेलिया की लुप्तप्राय स्वदेशी भाषाओं को कैसे बचाया जाए, इस पर भी सिफारिशें करती है. रिपोर्ट के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया में स्वदेशी और प्राचीन भाषाओं के विलुप्त होने की दर दुनिया में सबसे अधिक है. इस महाद्वीप पर 250 भाषाएं बोली जाती थीं, लेकिन अब केवल 40 हैं.
ब्रोमहैम के मुताबिक, "जब कोई भाषा विलुप्त हो जाती है, या 'सो रही होती है' जैसा कि हम उन भाषाओं के लिए कहते हैं जो अब बोली नहीं जाती हैं, तो हम अपनी मानव सांस्कृतिक विविधता को खो देते हैं."
एए/सीके (डीपीए, एपी)
चीन की साख को देश के भीतर और विदेश में भी भारी धक्का लगा है. रोडिओन एबिगहाउजेन कहते हैं कि यह वैश्विक नेता बनने की चीन की महत्वाकांक्षाओं पर भारी पड़ रहा है.
डॉयचे वैले पर रोडिओन एबिगहाउजेन की रिपोर्ट-
पिछले साल नवंबर में पूर्व उप प्रधानमंत्री झांग गाओली पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वालीं चीनी टेनिस खिलाड़ी पेंग शुआई ने अपने नवीनतम इंटरव्यू में इस मामले पर बहुत कम प्रकाश डाला है. इस वीडियो में वो बहुत ही दिग्भ्रमित और विचलित नजर आ रही हैं.
यह मामला सिर्फ एक उदाहरण है जो दिखाता है कि पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (पीआरसी) की साख कितनी खराब है. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के लिए, यह एक ऐसी समस्या है जो खेल से कहीं आगे तक फैली हुई है.
पीआरसी ने 21वीं सदी के लोकतंत्र का निर्माण करने का दावा किया है. चीन के प्रोपेगेंडा के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप में उदार लोकतंत्र, जिसे लोकलुभावनवाद और अस्थिरता से खतरा है, को एक तकनीकी, सत्तावादी लोकतंत्र से प्रतिस्थापित किया जा रहा है.
"लोगों के लोकतंत्र" को प्राप्त करने के लिए, जैसा कि इसे आधिकारिक शब्दजाल में कहा जाता है, सीसीपी ने लेनिन को समर्पित उद्धरण "विश्वास अच्छा है, नियंत्रण बेहतर है" को आगे बढ़ाया है.
उन्माद को नियंत्रित करें
कठोर सेंसरशिप के माध्यम से सीसीपी मीडिया को नियंत्रित करता है. सीसीपी की ओर से पोस्ट, लाइक, शेयर करने वाले सिविल सेवकों की एक सेना और सोशल मीडिया जैसे वीबो, वीचैट और अन्य आउटलेट्स के माध्यम से जो विशेष रूप से घरेलू बाजार के लिए बनाए गए थे, उन्हें और कड़ाई से नियंत्रित किया जा रहा है.
इस जबरदस्त नियंत्रण के परिणामस्वरूप, पेंग शुआई की पोस्टिंग कुछ ही समय में गायब हो गई. ऐसा नहीं है कि सेंसरशिप ने बहुत हंगामा किया, बल्कि चीन में, यह MeToo मामला कोई खास मुद्दा नहीं बन पाया.
पार्टी अर्थव्यवस्था को भी नियंत्रित करती है. यह अदालतों को नियंत्रित करती है, यह विज्ञान और शिक्षा को नियंत्रित करती है और आखिरकार, जीवन के सभी क्षेत्रों की निगरानी अंतिम स्तर तक की जाती है.
नतीजतन, सीसीपी चीनी नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई करता है. यह सैकड़ों हजारों मुस्लिम उइगरों को शिविरों में पुनर्शिक्षा के अधीन करता है, यह हांगकांग में लोकतंत्र आंदोलन को शांत करने के लिए पुलिस बल और कानूनी साधनों का उपयोग करता है और फिर नकली चुनाव कराता है.
कम्युनिस्ट पार्टी पर कोई नियंत्रण नहीं है
नियंत्रण पर पूरी पकड़ होने के बावजूद, इस तथ्य से नज़र हटाना आसान है कि आखिरकार कोई वास्तविक नियंत्रण नहीं है, क्योंकि कोई भी नियंत्रण करने वालों को नियंत्रित नहीं करता है. सीसीपी और शी जिनपिंग अछूत हैं.
एक सच्चे लोकतंत्र के विपरीत, जिसमें शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत सुनिश्चित करता है कि विभिन्न राज्य अंग एक-दूसरे की जांच और संतुलन करते हैं और जिसमें चुनाव एक वास्तविक विकल्प प्रदान करते हैं, चीन में केवल एक सर्वोच्च अधिकार है. और वह है 25-सदस्यीय पोलित ब्यूरो, जो शी के नेतृत्व में 1.4 अरब लोगों के भाग्य को निर्धारित करता है.
बढ़ता अविश्वास पार्टी की शक्ति की प्रचुरता और वास्तविक नियंत्रण की कमी का परिणाम है. मी टू मामला तो इसका एक उदाहरण है. पीईडब्ल्यू शोध केंद्र के एक अध्ययन के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन की प्रणाली 17 बड़े औद्योगिक देशों की तुलना में कम आकर्षक है. रिपोर्ट के मुताबिक, "ज्यादातर प्रमुख औद्योगिक देशों में चीन को बड़े पैमाने पर नकारात्मक रूप से देखा जाता है."
बड़ी आर्थिक सफलताओं के आधार पर दुनिया को अपनी व्यवस्था की श्रेष्ठता के बारे में समझाने की चीन की उम्मीदें विफल हो गई हैं.
चीन इसे बहुत ही सफाई से करता है
अमेरिका के राजनीति वैज्ञानिक जोसेफ नी ने "सॉफ्ट पावर" शब्द को वैश्विक प्रतिष्ठा और नेतृत्व प्राप्त करने के लिए एक प्रभावी उपकरण के रूप में गढ़ा है. दूसरे शब्दों में, सांस्कृतिक और सामाजिक कौशल के आधार पर अन्य देशों को अपनी स्थिति के बारे में समझाने की क्षमता प्राप्त करना. सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण, इसके लिए विश्वसनीयता की आवश्यकता होती है लेकिन विश्वसनीयता को मजबूर नहीं किया जा सकता है और निश्चित रूप से नियंत्रण द्वारा प्रतिस्थापित भी नहीं किया जा सकता है.
खेल दूसरों पर जीत हासिल करने का एक तरीका हो सकता है. चीन के अधिकारी जिन्होंने साल 2022 शीतकालीन ओलंपिक को सफलतापूर्वक हासिल किया, वे इस बात को जानते हैं. लेकिन यह पूरी तरह से दिखाने के लिए पर्याप्त नहीं है. एक विश्वसनीय छवि पेश करने के लिए एथलीटों, दर्शकों और अन्य लोगों को अपनी मर्जी से ऐसा करना चाहिए. कामवासना को जबरदस्ती किया जा सकता है, प्रेम को नहीं. (dw.com)
दक्षिणपंथियों की आलोचना के बाद फ्रांस सरकार ने पेरिस स्थित आर्क दे ट्रायंफ पर लगा यूरोपीय संघ का झंडा उतार लिया. फ्रांस छह महीने के लिए यूरोपीय संघ का अध्यक्ष बना है.
यूरोपीय संघ की अध्यक्षता शुरू करने के मौके को मनाने के लिए आर्क दे ट्रायंफ पर लगाया गया यूरोपीय संघ का झंडा उतार लिया गया. देश के दक्षिणपंथियों ने इस झंडे को फहराने पर आपत्ति जताई थी जिसके बाद सरकार ने अस्थायी तौर पर लगाया गया यह ध्वज उतारने का फैसला किया.
पेरिस स्थित आर्क दे ट्रायंफ फ्रांस का एक ऐतिहासिक स्मारक है, जहां यह ध्वज अस्थायी तौर पर लगाया गया था. लेकिन देश के दक्षिणपंथियों ने ऐसा करने के लिए राष्ट्रपति माक्रों की आलोचना करते हुए कहा कि वह फ्रांसीसी पहचान को नष्ट कर रहे हैं.
फ्रांस में जल्द ही राष्ट्रपति चुनाव होने हैं जिनमें माक्रों दोबारा किस्मत आजमा सकते हैं. उनके सामने दक्षिणपंथी नेता वैलरी पिक्रेज रिपब्लिकन उम्मीदवार हैं. पिक्रेज ने शुक्रवार को माक्रों से ऐतिहासिक युद्ध स्मारक पर फ्रांसीसी ध्वज वापस लगाने की मांग की थी. उन्होंने कहा, "जिन सैनिकों ने इसके लिए खून बहाया है, उनकी खातिर हमें ऐसा करना चाहिए.”
खुश हुए दक्षिणपंथी
यह ध्वज नव वर्ष की पूर्व संध्या पर वहां लगाया गया था. इस बारे में पिक्रेज ने ट्विटर पर लिखा, "यूरोप की अध्यक्षता, हां. फ्रांसीसी पहचान का क्षरण, नहीं.”
रविवार को यूरोपीय संघ का ध्वज हटाए जाने के बाद अन्य दक्षिणपंथी नेता मरीन ला पेन ने इसे धुर-दक्षिणपंथ की जीत बताया. एक दिन पहले ही ला पेन ने धमकी दी थी कि यदि ध्वज नहीं हटाया गया तो वह फ्रांस की काउंसिल ऑफ स्टेट में शिकायत करेंगी.
ला पेन ने रविवार को कहा, "सरकार को आर्क दे ट्रायंफ से यूरोपीय संघ का ध्वज हटाने के लिए मजबूर कर दिया गया. 2022 की शुरुआत के लिए एक सुंदर देशभक्तिपूर्ण जीत.” उन्होंने ट्विटर पर दावा किया कि लोगों के विशाल लामबंदी ने सरकार को ऐसा करने पर मजबूर किया.
‘हम झुके नहीं'
फ्रांसीसी सरकार ने हालांकि इस बात से इनकार किया है कि किसी मजबूरी में ध्वज उतारने का फैसला लिया गया. पहले शुक्रवार को कहा गया था कि यह ध्वज ‘कई दिन तक' लगा रहेगा. फ्रांस के यूरोपीय मामलों के मंत्री क्लेमां बूने ने कहा कि ध्वज को तयशुदा योजना के तहत ही उतारा गया है.
बूने ने फ्रेंच इंटर रेडियो को बताया, "यह तय था कि ध्वज रविवार को उतारा जाएगा. हमने इसके लिए कोई समय तय नहीं किया था.” बूने ने हालांकि कहा कि सरकार पीछे नहीं हटी है. उन्होंने दक्षिणपंथियों पर बेबुनियाद विवादों के पीछे भागने का आरोप लगाया.
बूने ने कहा, "हम पीछे नहीं हटे हैं. योजना में कोई बदलाव नहीं किया गया. मैं पूरी तरह से मानता हूं कि फ्रांस का भविष्य यूरोप के साथ है.” उन्होंने स्पष्ट किया कि यूरोपीय ध्वज हटाकर फ्रांसीसी ध्वज नहीं लगाया गया है क्योंकि यह कोई स्थायी प्रदर्शन नहीं है.
इमानुएल माक्रों ने 2017 में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव में ला पेन को 34 प्रतिशत के मुकाबले 64 प्रतिशत मतों से हराया था. हालांकि दोबारा चुनाव लड़ने का ऐलान माक्रों ने अब तक नहीं किया है लेकिन इस साल अप्रैल में होने वाले चुनावों में उनकी उम्मीदवारी संभावित है. ला पेन पहले ही अपना अभियान शुरू कर चुकी हैं.
वीके/एए (एएफपी, रॉयटर्स)
यरुशलम, 2 जनवरी | इजराइल ने कथित तौर पर 'फ्लोरोना' के पहले मामले की पुष्टि की है, जो कि कोविड-19 और इन्फ्लूएंजा के साथ-साथ होने वाला संक्रमण है। न्यूज वेबसाइट यनेटन्यूज के मुताबिक, डबल संक्रमण की पहचान सबसे पहले पेटाह टिकवा के राबिन मेडिकल सेंटर में प्रसव पीड़ा के दौरान हुई एक महिला में हुई है।
अस्पताल के अनुसार, महिला को कोई भी टीका नहीं लगाया गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि स्वास्थ्य मंत्रालय अभी भी मामले की जांच कर रहा है और अभी तक यह निर्धारित नहीं किया गया है कि दोनों वायरस के एक साथ होने से अधिक गंभीर बीमारी होती है या नहीं।
स्वास्थ्य अधिकारियों का अनुमान है कि कई अन्य रोगियों में भी दोनों वायरस पाए गए हैं, लेकिन उनका निदान नहीं किया गया है।
एक प्रसूति और स्त्री रोग विशेषज्ञ और अस्पतालों के स्त्री रोग विभाग के निदेशक अर्नोन विजनित्सर के हवाले से कहा गया था, "पिछले साल, हमने गर्भवती या जन्म देने वाली महिलाओं में फ्लू के मामले नहीं देखे।"
"आज, हम कोरोनोवायरस और फ्लू दोनों के मामले देख रहे हैं। हम फ्लू वायरस की चपेट में आने वाली अधिक से अधिक गर्भवती महिलाओं को देख रहे हैं।"
विजनित्सर के अनुसार, "एक ऐसी महिला का इलाज करना एक बड़ी चुनौती है, जिसे बच्चे के जन्म के समय बुखार आता है और आप नहीं जानते कि यह कोरोनावायरस है या फ्लू। ज्यादातर बीमारी सांस की होती है।"
(आईएएनएस)
-अबुल कलाम आज़ाद
लोकतंत्र और मानवाधिकार जैसे मूल्यों को लेकर बांग्लादेश पर प्रतिबंध लगाने के अमेरिका के फ़ैसले को अमेरिकी विदेश नीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है.
बाइडन प्रशासन के इस क़दम को भू-राजनीतिक हितों के चलते रणनीतिक स्थिति में हुए परिवर्तन के तौर पर भी देखा जा रहा है.
इससे पहले अमेरिका ने 2021 के 'लोकतंत्र सम्मेलन' से बांग्लादेश को दूर रखा. उसके विशेष बलों ने मानवाधिकार दिवस (10 दिसंबर) के दिन बांग्लादेश के रैपिड एक्शन बटालियान (RAB) और कई अधिकारियों पर प्रतिबंध लगा दिया.
इसके अलावा, छह साल पहले बांग्लादेश के लेखक अभिजीत रॉय को मारने वाले भगोड़े हत्यारों को पकड़ने के लिए सूचना देने वालों को 50 लाख डॉलर (क़रीब 37 करोड़ रुपये) का इनाम देने का एलान किया.
इस तरह कई वजहों से इन दिनों अमेरिका और बांग्लादेश के संबंधों पर काफ़ी विचार-विमर्श होने लगा है. जानकारों में इस बात को लेकर काफ़ी उत्सुकता है कि बांग्लादेश में लोकतंत्र, मानवाधिकार और क़ानून का शासन जैसे मुद्दों को लेकर अमेरिका आख़िर अब क्यों मुखर हुआ है.
कई लोग अमेरिका के हाल में उठाए गए क़दमों को बांग्लादेश के साथ उसके संबंधों में पैदा हुए तनाव के तौर पर देख रहे हैं.
अंतरराष्ट्रीय मामलों की जानकार प्रोफ़ेसर रुख़साना किबरिया के अनुसार, "दोनों देशों के रिश्तों ने जटिल मोड़ ले लिया है. अमेरिका एक महाशक्ति है, इसलिए जब यह मामला सामने आया तो सरकार बहुत कुछ कर रही है. ज़ाहिर है, अमेरिकी सरकार बांग्लादेश से कई मसलों पर काफ़ी नाराज़ है."
वो कहती हैं कि अमेरिका के उठाए गए क़दम काफ़ी अहम और फ़ैसले राजनीतिक हैं.
किबरिया बताती हैं, "बाइडन प्रशासन के ताज़ा फ़ैसले को देखकर हम कह सकते हैं कि उसकी नीति साफ़ तौर पर बदल रही है. हम देख रहे हैं कि अमेरिका बांग्लादेश में हो रही कई चीज़ों से नाख़ुश है."
हालांकि अमेरिका के ताज़ा फ़ैसलों को बांग्लादेश के साथ उसके संबंधों में आई कमज़ोरी के तौर पर नहीं देखा रहा है, बल्कि इसे उसके रवैये में बदलाव के रूप में देखा जा रहा है.
अमेरिका की इलिनोइस स्टेट यूनिवर्सिटी में 'शासन और राजनीति' के जाने-माने प्रोफ़ेसर अली रियाज़ का मानना है कि बाइडन प्रशासन ने विदेश नीति के केंद्र में मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों को रखा है. हालांकि, इस नीति का इस्तेमाल राष्ट्रीय हित और सुरक्षा के लिए रणनीतिक रूप से किया जा रहा है.
वो कहते हैं, "बाइडन प्रशासन का कहना है कि वह मानवाधिकारों के लोकतांत्रिक मूल्यों को महत्व देता रहेगा. अमेरिका को विदेश नीति के कुछ मसलों से समस्या है. अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय हित उसकी रणनीति है. अमेरिका दो चीज़ें करने की कोशिश कर रहा है- पहला, मानवाधिकार या लोकतंत्र का सवाल है और दूसरा बाइडन प्रशासन शुरू से ही एशिया-प्रशांत क्षेत्र पर फ़ोकस बनाए हुए है."
डॉ. रियाज़ कहते हैं, "इस तरह वो चीन को प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बनने और चीन के बढ़ रहे प्रभाव क्षेत्र को रोकने की कोशिश कर रहा है. इसी वजह से अमेरिका कई देशों की सरकारों पर अपना दबाव बना रहा है."
उनके मुताबिक़, ''चीन बांग्लादेश पर एक तरह का प्रभाव डाल रहा है. इसमें कोई शक़ नहीं है कि अमेरिका ने इसे ध्यान में रखा है. हालांकि वो बांग्लादेश को अलग-थलग नहीं करना चाहता. कम से कम मुझे तो ऐसा नहीं लगता. मुझे लगता है कि अमेरिका स्पष्ट संकेत दे रहा है कि बांग्लादेश को कुछ चीज़ें सुधारने की ज़रूरत है. असल में वो चाहता है कि बांग्लादेश उसके साथ काम करे."
अमेरिका के थिंक टैंक 'रैंड कॉर्पोरेशन' में सेंटर फ़ॉर एशिया-पैसिफ़िक पॉलिसी के निदेशक रफ़ीक़ दोसानी का मानना है कि बांग्लादेश पर अमेरिका का यह क़दम भू-राजनीतिक लिहाज़ से अहम है.
दोसानी कहते हैं कि विकास के लिहाज़ से चीन के लिए बांग्लादेश का चटगांव बंदरगाह और उसके पास का सितवे बंदरगाह अहम हैं.
उनके अनुसार, अमेरिका की नीति और बांग्लादेश के प्रति उसके रवैये में हुए ताज़ा बदलाव का मुख्य लक्ष्य चीन को रोकना है. इस मामले में बाइडन प्रशासन ने विदेश नीति के तरीक़े को बदला है.
रफ़ीक़ दोसानी कहते हैं, "बांग्लादेश शायद दो शक्तियों के बीच चुनाव करने को तैयार नहीं है. लेकिन अमेरिका चाहता है कि बांग्लादेश तुरंत फ़ैसला करे. मुझे लगता है कि बांग्लादेश इस जगह पर आकर फंस गया है."
उन्होंने कहा, "यह सिर्फ़ बांग्लादेश का संकट नहीं है. पूरा एशिया इस समस्या का सामना कर रहा है. अमेरिका इस समय वो तरीक़ा अपना रहा है कि आप या तो मेरे साथ हैं या मेरे ख़िलाफ़. मुझे लगता है कि वहां यही हो रहा है."
बांग्लादेश को भारत पर निर्भर नहीं देखना चाहता अमेरिका
जियोपोलिटिकल लिहाज़ से बांग्लादेश को दक्षिण एशिया में काफ़ी अहम माना जाता है. हालांकि वहां लोकतंत्र सवालों के घेरे में है, लेकिन अमेरिका लंबे समय से इस मसले पर ख़ामोश रहा है.
उसे इस क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगी भारत का भी समर्थन मिलता रहा है. हालांकि डॉ. अली रियाज़ बांग्लादेश के प्रति अमेरिकी नज़रिए में हुए ताज़ा बदलाव को भारत के प्रति अमेरिका की नीति में हुए बदलाव के रूप में भी देखते हैं.
वो कहते हैं, "मैं मानता हूं कि बांग्लादेश का सवाल अब भारत केंद्रित हो गया है. अब यह केवल बांग्लादेश का मामला नहीं रह गया है. मेरा अनुमान है कि भारत और पाकिस्तान को छोड़कर दक्षिण एशिया के देशों जैसे श्रीलंका, मालदीव, नेपाल को लेकर अमेरिका वाक़ई पुनर्विचार कर रहा है.''
दोसानी कहते हैं, "मुझे लगता है कि ट्रेंड बिल्कुल साफ़ है कि अमेरिका, भारत पर बांग्लादेश की निर्भरता घटाना चाहता है. और वो ये भी चाहता है कि इस क्षेत्र पर भारत का प्रभुत्व न रहे."
उनके मुताबिक़, ''भारत जिस तरह चीन से निपट रहा है, उसे लेकर अमेरिका हताश है.'' (bbc.com)
नई दिल्ली, 1 जनवरी| तालिबानी लड़ाके युद्ध के दौरान मारे गए अफगानी सैनिकों व पुलिस कमांडरों की कब्रों को बर्बाद कर रहे हैं। तालिबान ने अपने पिछले कार्यकाल के दौरान समूह के खिलाफ लड़ने वाले योद्धाओं के स्मारकों को भी नुकसान पहुंचाया है।
आरएफई/आरएल की रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले साल अगस्त में सत्ता पर कब्जा करने के बाद से, अफगानिस्तान में तालिबान आतंकवादियों पर अफगान सेना और पुलिस कमांडरों की कब्रों को तोड़ने या नष्ट करने का आरोप लगाया गया है।
तालिबान ने कथित तौर पर 1990 के दशक में सत्ता में अपने पहले कार्यकाल के दौरान समूह से लड़ने वाले लोगों को समर्पित स्मारकों को भी अपवित्र किया है।
जहां कट्टर समूह के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं, वहीं तालिबान ने ऐसी कई घटनाओं के लिए जिम्मेदारी से इनकार किया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ताजा घटनाक्रम में तालिबान लड़ाकों पर 26 दिसंबर को दक्षिणपूर्वी प्रांत पक्तिका में पूर्व पुलिस कमांडर दरया खान तलाश की कब्र पर बमबारी करने का आरोप लगाया गया है।
खान 2020 में पक्तिका के सरोबी जिले में तालिबान द्वारा सड़क किनारे लगाए गए बम विस्फोट से मारा गया था। उसने कथित तौर पर तालिबान के खिलाफ युद्ध में अपने चार भाइयों को खो दिया था।
रिपोर्ट में कहा गया है कि तालिबान लड़ाकों पर 17 दिसंबर को तखर प्रांत में उत्तरी अफगानिस्तान के पूर्व गवर्नर और पूर्व पुलिस प्रमुख मोहम्मद दाऊद की कब्र को अपवित्र करने का भी आरोप लगाया गया है।
दाऊद 2011 में तखर की राजधानी तालोकान में तालिबान के आत्मघाती हमले में मारा गया था। 2001 में अमेरिका के नेतृत्व वाले आक्रमण के बाद, दाऊद ने उत्तरी शहर कुंदुज में हजारों तालिबान लड़ाकों के आत्मसमर्पण प्रक्रिया में अपनी भूमिका निभाई थी। वह जमीयत-ए इस्लामी में एक कमांडर था - एक राजनीतिक-सैन्य इस्लामी समूह - जिसने 1996 से 2001 तक तालिबान शासन का विरोध किया था।
निर्वासित अफगान पत्रकार बिलाल सरवरी ने कहा कि दाऊद के परिवार ने पुष्टि की है कि उसकी कब्र को तोड़ा गया है, लेकिन तालिबान ने इस दावे को खारिज कर दिया।
इस बीच, तालिबान पर 31 अक्टूबर को दक्षिणपूर्वी प्रांत पक्तिका में एक बम विस्फोट में कर्नल अजीजुल्लाह कारवां की कब्र को नष्ट करने का आरोप लगाया गया है।
तालिबान ने जून 2018 में कारवां की हत्या कर दी थी। वह अफगान नेशनल पुलिस की विशेष बल इकाई में कर्नल थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि वह उससे पहले तालिबान की हत्या के दर्जनों प्रयासों से बच गए थे।
सितंबर में ऐसा वीडियो भी सामना आया था, जिसमें तालिबानी लड़ाकों को काबुल के उत्तर में पंजशीर घाटी में प्रतिरोधी नेता अहमद शाह मसूद के मकबरे को नुकसान पहुंचाते हुए दिखा गया था।
सितंबर की शुरूआत में तालिबान द्वारा पहाड़ी घाटी पर कब्जा करने के तुरंत बाद फुटेज सामने आया था, जो आतंकवादियों के लिए एक अल्पकालिक प्रतिरोध का केंद्र बना हुआ था।
यह बर्बरता मसूद की मौत की 20वीं वर्षगांठ पर हुई। मसूद ने 1990 के दशक में तालिबान के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। अमेरिका पर 11 सितंबर के हमले से कुछ दिनों पहले ही अलकायदा ने उनकी हत्या कर दी थी। तालिबान ने हालांकि सार्वजनिक हंगामे के बाद मसूद के मकबरे की मरम्मत भी करानी पड़ी।
तालिबान के आंतरिक मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी के छोटे भाई अनस हक्कानी ने तालिबान लड़ाकों से अपने व्यक्तिगत बदला और ईष्र्या से छुटकारा पाने का आग्रह किया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 27 दिसंबर को अफगानिस्तान पर सोवियत आक्रमण की 42वीं वर्षगांठ के अवसर पर, हक्कानी ने चेतावनी दी थी कि अगर तालिबान शासन क्रूर बल के माध्यम से शासन करने की कोशिश करता है तो वह ध्वस्त हो जाएगा।
उन्होंने कहा था, एक काफिर सरकार के टिकने की संभावना है, लेकिन एक दमनकारी शासन नहीं टिकेगा। (आईएएनएस)
अमेरिका में बिना लक्षण वाले कोरोना पॉजिटिव लोगों को आइसोलेशन में रखने की समयसीमा आधी कर दी गई है. साथ ही, उन्हें इसके बाद जांच कराने की भी जरूरत नहीं है. वैज्ञानिकों को चिंता है कि कहीं इससे महामारी और ना फैले.
डॉयचे वैले पर लुइजा राइट की रिपोर्ट-
अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी ने बिना लक्षण वाले कोरोना पॉजिटिव लोगों को आइसोलेशन में रखने की समयसीमा को कम कर दिया है. स्वास्थ्य एजेंसी के इस फैसले ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इस फैसले से कोरोना वायरस महामारी तेजी से फैलेगी और अस्पतालों पर बोझ बढ़ेगा.
हाल ही में अमेरिकी एजेंसी 'सेंटर फॉर डिजीज ऐंड प्रिवेंशन' (सीडीसी) ने कहा था कि बिना लक्षण वाले कोविड-19 पॉजिटिव लोगों को सिर्फ पांच दिन आइसोलेशन में रहना होगा. इसके बाद, उन्हें पीसीआर या रैपिड एंटीजन की नेगेटिव रिपोर्ट की भी जरूरत नहीं होगी. पांच दिन आइसोलेशन के बाद, उन्हें अगले पांच दिनों तक मास्क पहनना अनिवार्य है.
यह नियम उन लोगों पर भी लागू होगा जिनकी स्थिति आइसोलेशन में पांच दिन रहने के दौरान पहले से बेहतर होती है. सरकार का यह फैसला ऐसी स्थिति में आया है जब स्वास्थ्य और पर्यटन से जुड़े क्षेत्रों में कर्मचारियों की कमी की आशंका जताई जा रही है. देश को हाल के हफ्तों में रैपिड-एंटीजन टेस्ट की कमी का सामना भी करना पड़ा है.
हालांकि सीडीसी का कहना है कि आइसोलेशन से जुड़ा यह फैसला वैज्ञानिक डेटा पर आधारित है. वैज्ञानिक डाटा से पता चलता है कि किसी व्यक्ति में लक्षण दिखने के एक से दो दिन पहले या लक्षण दिखने के एक से दो दिन बाद तक ही वह कोरोना वायरस का प्रसार कर सकता है.
डाटा देखना चाहते हैं वैज्ञानिक
सीडीएस जिस आंकड़े के आधार पर अपने फैसले को सही साबित करना चाहती है वह सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं है. अगस्त महीने में जेएएमए (जामा) इंटरनल मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, किसी व्यक्ति में कोरोना का लक्षण दिखने की शुरुआत से, एक से दो दिन पहले और तीन दिन बाद तक वायरस का प्रसार करने की क्षमता सबसे अधिक थी. हालांकि, इसके बाद भी वह व्यक्ति वायरस का प्रसार कर सकता है.
स्विट्जरलैंड स्थित बर्न विश्वविद्यालय में आण्विक महामारी विशेषज्ञ एमा होडक्रॉफ्ट ने डीडब्ल्यू को बताया, "क्वॉरन्टीन की अवधि इस आधार पर तय होनी चाहिए कि हमारे शरीर में कितने समय तक वायरस जीवित रहता है. दूसरे शब्दों में, संक्रमित व्यक्ति संभावित तौर पर कितने दिनों तक किसी दूसरे व्यक्ति को संक्रमित कर सकता है.
वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया विश्वविद्यालय में महामारी विशेषज्ञ जोई हाइड ने डीडब्ल्यू को बताया, "लक्षण दिखने के शुरुआती कुछ दिनों में संक्रमित लोग तेजी से दूसरे लोगों के बीच वायरस का प्रसार कर सकते हैं. हालांकि, बाद में यह क्षमता कम हो जाती है. इसके बावजूद, आइसोलेशन की अवधि तभी कम करनी चाहिए, जब संक्रमित व्यक्ति की जांच रिपोर्ट नेगेटिव हो."
हाइड ने कहा, "नेगेटिव रिपोर्ट की जरूरत को खत्म करना सही फैसला नहीं है. ऐसा करने पर वायरस का प्रसार तेज हो सकता है. साथ ही बिना लक्षण वाले व्यक्ति के संपर्क में आने से दूसरे लोग भी संक्रमित और बीमार हो सकते हैं. उनकी जान खतरे में पड़ सकती है."
राजनीतिक फैसला
वैज्ञानिकों को आशंका है कि बिना लक्षण वाले और तेजी से ठीक होने वाले रोगियों के लिए आइसोलेशन के समय को आधा करने का फैसला सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं से जुड़ा हुआ नहीं है. जर्मनी की राजधानी बर्लिन स्थित शारिटे अस्पताल में सार्वजनिक स्वास्थ्य और महामारी विज्ञान के प्रोफेसर टोबियास कुर्थ ने कहा, "यह निश्चित तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य दिशानिर्देश नहीं है. यह पक्का करने के लिए कि हम कई चीजों को संभाल सकते हैं, इसलिए यह आर्थिक दिशानिर्देश है. कुछ क्षेत्रों में नियमों में थोड़ी छूट दी जा सकती है, लेकिन इसे सामान्य नियम के तौर पर लागू नहीं किया जाना चाहिए."
हाइड भी कुर्थ की चिंताओं का समर्थन करती हैं. वह कहती हैं, "यह फैसला वैज्ञानिक आधार पर नहीं, बल्कि राजनीतिक आधार पर लिया गया है. यह पूरी तरह राजनीतिक फैसला है." वहीं, एमा होडक्रॉफ्ट का कहना है कि कार्यस्थल पर कर्मचारियों की कमी को दूर करने के लिए कोरोना के प्रसार को रोकना होगा, ताकि कम के कम लोग इसकी चपेट में आएं. उन्होंने कहा, "जो लोग कोरोना वायरस का प्रसार कर सकते हैं उन्हें काम करने की अनुमति देने से ज्यादा लोग संक्रमित हो सकते हैं."
अस्पतालों पर दबाव
अगर बिना लक्षण वाले कोरोना पॉजिटिव लोग लंबे समय तक आइसोलेशन में नहीं रहते हैं और उनकी जांच नहीं होने की वजह से तेजी से संक्रमण फैलता है, तो अस्पताल इस स्थिति को कैसे संभालेंगे? कुर्थ चेतावनी भरे लहजे में कहते हैं कि ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका और जर्मनी जैसे देशों में अगर ओमिक्रॉन तेजी से फैलता है तो स्वास्थ्य से जुड़ी सभी व्यवस्थाएं ध्वस्त हो जाएंगी. हाइड का कहना है ,"यह वाकई डरावना है कि एक ओर ओमिक्रॉन वैरिएंट फैल रहा है और दूसरी ओर पाबंदियों में छूट दी जा रही है."
सीडीसी का यह फैसला तब आया है जब कई देश टीकाकरण की स्थिति के मुताबिक, आइसोलेशन के नियम बदलने पर चर्चा कर रहे हैं. जर्मनी में बिना लक्षण वाले उन लोगों के लिए आइसोलेशन के नियमों में बदलाव पर विचार किया जा रहा है जो किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए हैं. हालांकि, अमेरिका के विपरीत यहां आइसोलेशन में रहने वाले लोगों की जांच होगी और निगेटिव रिपोर्ट आने के बाद ही वे सामान्य रूप से जीवन जी सकते हैं. (dw.com)
यूरोपीय केंद्रीय बैंक की एक गुप्त प्रयोगशाला है, जिसका काम नकली यूरो मुद्रा नोटों को जब्त करना है. यहां काम करने वाले विशेषज्ञ जालसाजों से एक कदम हमेशा आगे रहते हैं.
यूरोपीय केंद्रीय बैंक में बेहतरीन यूरो मुद्राओं में बने नकली नोटों का पता लगाने के लिए एक गुप्त प्रयोगशाला बनाई गई है. इस केंद्र में विशेषज्ञों की टीम है. यूरोपीय केंद्रीय बैंक के विशाल फ्रैंकफर्ट मुख्यालय की 23वीं मंजिल पर सुरक्षा द्वार के दूसरी तरफ, जालसाजी-विरोधी विशेषज्ञ यूरोजोन के कुछ बेहतरीन नकली नोटों की जांच कर रहे हैं.
इस लैब में 3डी माइक्रोस्कोप, अति-संवेदनशील माप और विशेष उपकरण हैं जो वास्तविक यूरो बैंकनोटों में एम्बेडेड लगभग एक दर्जन सुरक्षा विशेषताओं के परीक्षण में प्रभावी हैं, और ये नकली नोटों की पहचान करते हैं. हालांकि लैब में गिनती के विशेषज्ञ हैं, लेकिन उनका काम जालसाजों से एक कदम आगे रहना और यूरोपीय केंद्रीय बैंक को नई जालसाजी तकनीकों से अवगत कराना है.
यूरोपीय संघ के मुद्रा विकास प्रभाग के प्रमुख जीन-मिशेल ग्रीमेल का कहना है कि 20 साल पहले शुरू की गई यूरो मुद्रा की सुरक्षा का स्तर इतना ऊंचा है कि पूरे यूरोजोन में नागरिक के पास नकली नोट होने की संभावना बेहद कम है. उनके मुताबिक सालाना आधार पर यह संभावना और कम होती जा रही है.
नोटों के लिए यूरोपीय सेंट्रल बैंक जिम्मेदार
यूरोपीय सेंट्रल बैंक मुद्रा नोट जारी करने के लिए अधिकृत है, जबकि 19 यूरोजोन सदस्य देशों के केंद्रीय बैंक अपने खुद के सिक्के जारी करते हैं. यूरोपीय बैंक के मुताबिक 2020 में यूरोजोन में नकली नोटों का स्तर अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया. पिछले साल यूरोजोन में 4,60,000 नकली यूरो नोट जब्त किए गए. गौरतलब है कि यूरोजोन में असली नोट 27 अरब हैं और नकली नोटों की संख्या बहुत कम है.
ग्रीमेल के मुताबिक यूरो नोटों की सुरक्षा विशेषताओं ने यूरोजोन नागरिकों के बीच एकल मुद्रा में "मजबूत विश्वास" बढ़ा दिया है. हाल के एक सर्वेक्षण के अनुसार यूरोजोन के 80 प्रतिशत निवासी यूरो मुद्रा में विश्वास करते हैं.
लोहे की अलमारी में नकली नोट
इस लैब में सबसे बड़ा खजाना लोहे की अलमारी में है. जिसमें दो लोगों को दरवाजा खोलने की आवश्यकता होती है, जबकि दोनों ही इस अलमारी के ताले का एक हिस्सा ही जानते हैं. तिजोरी में पांच यूरो से लेकर पांच सौ यूरो तक के 1,000 नकली नोट हैं, जिनका पिछले दो दशकों में निरीक्षण और अध्ययन किया गया है.
नकली नोटों को चलन से रोकने के लिए हर यूरोजोन देश में नकली नोट पहचान केंद्र है. फ्रैंकफर्ट में यूरोपीय सेंट्रल बैंक में स्थित केंद्र ऐसे विशेषज्ञों से बना है जो नोटों का बहुत बारीकी से अध्ययन करते हैं.
एए/सीके (एएफपी)
पूर्व चांसलर अंगेला मैर्केल के टाइम टेबल के अनुसार ही जर्मनी अपने तीन परमाणु संयंत्रों को बंद करने जा रहा है. लेकिन इस समय जर्मनी समेत पूरा यूरोप अपने सबसे बुरे ऊर्जा संकट से गुजर रहा है.
बंद होने वाले संयंत्र ब्रोकडॉर्फ, ग्रोंडे और गुंडरेमिंगन में हैं. बिजली के दाम पहले से ही बढ़ रहे हैं. ऊपर से यूरोप और मुख्य गैस सप्लायर रूस के बीच तनाव भी इतना बढ़ा हुआ है जितना पहले कभी नहीं था.
अब इन संयंत्रों को बंद करने से जर्मनी की बाकी बची परमाणु क्षमता आधी हो जाएगी और ऊर्जा का उत्पादन करीब चार गीगावाट गिर जाएगा. यह 1,000 हवा की टरबाइनों द्वारा बनाई गई ऊर्जा के बराबर है.
बिजली के बढ़ते दाम
2011 में जापान के फुकुशिमा हादसे के बाद होने वाले विरोध प्रदर्शनों की वजह से मैर्केल ने परमाणु ऊर्जा को अलविदा कहने की प्रक्रिया की शुरुआत कर दी थी. अब जर्मनी की योजना 2022 के अंत तक नाभिकीय ऊर्जा को पूरी तरह से बंद कर देने की है.
समयसीमा के अंत तक नेकरवेसथाइम, एस्सेनबाक और एम्सलैंड में बचे आखिरी संयंत्रों को भी बंद कर दिया जाएगा. लेकिन पूरे यूरोप में बिजली के दाम आसमान छू रहे हैं और ऐसे में इस योजना का पूरा होना कठिनाइयों को बढ़ा देगा.
यूरोप में साल की शुरुआत में गैस के जो दाम थे अब वो 10 गुना ज्यादा बढ़ गए हैं. बिजली के दाम भी बढ़ रहे हैं. डार्मस्टाट एप्लाइड साइंसेज विश्वविद्यालय में ऊर्जा नीति के प्रोफेसर सेबास्टियन हेरोल्ड कहते हैं कि जर्मनी में परमाणु ऊर्जा के बंद हो जाने से संभव है कि दाम और बढ़ जाएंगे.
उन्होंने यह कहा, "लंबी अवधि में उम्मीद यह है कि अक्षय ऊर्जा में बढ़ोतरी से एक संतुलन आ जाएगा, लेकिन ऐसा अल्पावधि में नहीं होगा." जब तक जर्मनी अक्षय ऊर्जा को वाकई बढ़ा नहीं लेता तब तक वो परमाणु बंद होने से पैदा हुई कमी को भरने के लिए जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर रहेगा.
अक्षय ऊर्जा की जरूरत
हेरोल्ड ने बताया, "इस से जर्मनी कम से कम अल्पावधि में प्राकृतिक गैस पर और ज्यादा निर्भर हो जाएगा और इस वजह से रूस पर भी उसकी निर्भरता बढ़ जाएगी." अक्षय ऊर्जा तक की यात्रा में भी अनुमान से ज्यादा समय लग सकता है क्योंकि हाल के सालों में ऊर्जा की परियोजनाओं के खिलाफ बड़ा विरोध हुआ है.
आशंका है कि 1997 के बाद पहली बार अक्षय ऊर्जा से बानी बिजली का अनुपात 2021 में गिर कर 42 प्रतिशत पर पहुंच जाएगा. 2020 में यह 45.3 प्रतिशत था. परमाणु संयंत्रों के बंद होने से जर्मनी के महत्वाकांक्षी जलवायु लक्ष्यों पर भी असर पड़ेगा.
फ्रांस समेत यूरोपीय संघ के दूसरे देश अभी भी परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल पर जोर दे रहे हैं और उसे निवेश के योग्य सस्टेनेबल ऊर्जा स्रोतों की संघ की सूची में शामिल किए जाने के लिए अभियान चला रहे हैं.
जर्मनी में परमाणु के प्रति लोगों का मत नर्म हो रहा है. हाल ही में वेल्ट ऐम सोनटाग अखबार के लिए यूगव द्वारा कराए गए एक सर्वे में सामने आया कि करीब 50 प्रतिशत जर्मन लोगों का कहना है कि वो बिजली के बढ़ते दामों की वजह से परमाणु ऊर्जा को बंद करने की योजना को पलटने के पक्ष में हैं. लेकिन जर्मनी की नई सरकार भी इसी योजना पर आगे बढ़ रही है.
सीके/एए (एएफपी)
मौजूदा कोविड महामारी ने वैश्विक आर्थिक बहाली को पीछे धकेल दिया है. लेकिन नये साल में निवेशकों की उम्मीदों और इरादों को झटका दे सकने वाले, कोरोना के अलावा और भी खतरे हैं.
डॉयचे वैले पर आशुतोष पाण्डेय की रिपोर्ट-
महामारी से उपजे हालात के बाद 2021 में वैश्विक अर्थव्यवस्था ने मजबूती से वापसी की थी. साल के दूसरे हिस्से में उसकी तेजी कुछ कम हुई थी और उसकी वजह थी महामारी के नए मामले, सप्लाई चेन के अवरोध, श्रम की किल्लत और कोविड-19 टीकों की सुस्त आमद, खासकर कम आय वाले विकासशील देशों में.
धीमी गति की इस बहाली ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और 38 सदस्यों वाली आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) के अर्थशास्त्रियों को वैश्विक वृद्धि की अपनी भविष्यवाणियों को क्रमशः अक्टूबर और दिसंबर में एक साल के लिए हल्की कटौती करने के लिए बाध्य किया था.
2022 के लिए उन्होंने अपना नजरिया बनाए रखा लेकिन आगाह भी किया कि कोविड वैरिएंट वृद्धि को बाधित कर सकते हैं. उन्होंने वैश्विक आबादी के एक बड़े हिस्से के तेजी से टीकाकरण करने की जरूरत पर जोर दिया था. महामारी अभी भी वैश्विक वृद्धि में एक बड़े खतरे की तरह मौजदू है लेकिन 2022 में निवेशकों की सांसें अटकाने वाला ये अकेला खतरा नहीं है.
टीकानिरोधी कोविड वैरिएंट
नवंबर में वित्तीय बाजार में एक डर फैला था, एक नये कोरानावायरस वैरिएंट ओमिक्रॉन का, जिसका पता साउथ अफ्रीका में चला था. तेजी से फैलने वाले इस वैरिएंट के खौफ से वैश्विक वित्तीय और उत्पाद बाजार हिल गए.
अगले सप्ताह तक वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव चलता रहा. निवेशक नये वैरिएंट के आर्थिक निहितार्थों को समझने की कोशिश में जूझते रहे. आर्थिक बहाली को अवरुद्ध करने वाले वैरिएंट पर काबू रखने के लिए सरकारें कड़े प्रतिबंध लगाती रहीं.
थोड़े बहुत शुरुआती साक्ष्यों और विशेषज्ञों की टिप्पणियों में ओमिक्रॉन की आमद की आशंका व्यक्त की गई थी. उसे डेल्टा वैरिएंट के मुकाबले ज्यादा संक्रामक बताया गया और ये भी कि वह उतना घातक नहीं होगा और मौजूदा टीकों या उपचारों से मुहैया रोग प्रतिरोधक क्षमता को नहीं तोड़ पाएगा. वैज्ञानिक अभी भी डाटा का विश्लेषण कर रहे हैं. इस बीच जेपी मॉर्गन से जुड़े रणनीतिकारों ने कहा है कि ओमिक्रॉन अगर कम मारक पाया गया तब वो महामारी के अंत को ही तेज करने की ओर बढ़ेगा. यानी वो महामारी को स्थानीय बीमारी के रूप में तब्दील कर देगा.
ये संभव है कि ओमिक्रॉन की वजह से आर्थिक बहाली पटरी से नहीं उतरेगी लेकिन भविष्य का कोई वैरिएंट ऐसा खतरा पैदा कर सकता है. जानकार आगाह करते रहे हैं कि अगर महामारी फैली है तो संभव है कि टीकानिरोधी कोविड वैरिएंट का उभार देखने को मिलेगा जो लॉकडाउन जैसे उपाय करने के लिए मजबूर कर सकता है.
आईएमएफ की चीफ इकोनोमिस्ट गीता गोपीनाथ ने अक्टूबर में कहा था कि "अगर कोविड-19 का दीर्घकालीन असर रहा – मध्यम अवधि के दौरान- तो वो वैश्विक जीडीपी में अगले पांच साल के दौरान मौजूदा अनुमान के सापेक्ष 5.3 खरब डॉलर कमी आ सकती है.”
गोपीनाथ कहती हैं, "उच्च नीतिगत प्राथमिकता ये होनी चाहिए कि हर देश में इस साल 40 फीसदी, और मध्य 2022 तक 70 प्रतिशत आबादी का पूर्ण टीकाकरण सुनिश्चित कर लिया जाए. अभी तक कम आय वाले विकासशील देशों में पांच फीसदी से भी कम आबादी का पूर्ण टीकाकरण हो पाया है.”
सप्लाई चेन के अवरोध
इस साल वैश्विक सुधारों की रुकावट में बड़ी भूमिका निभाई है सप्लाई चेन के अवरोधों ने. शिपिंग कंटेनरों की कमी के साथ साथ शिपिंग से जुड़े अवरोधों और महामारी से जुड़े प्रतिबंधों को हल्का करने के बाद मांग में तीखी वापसी ने उत्पादकों में घटकों और कच्चे मालों के लिए भगदड़ सी मचा दी.
ऑटो सेक्टर पर भी गाज गिरी. हाल के दिनों में जर्मनी समेत, यूरो जोन में उत्पादन लड़खड़ा गया. कार निर्माताओं ने एक माध्यमिक उपकरण के रूप में उत्पादन में कटौती की है खासकर सेमीकंडक्टरों की आपूर्ति में कमी बनी हुई है.
इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि सप्लाई की कमी, शिपिंग लागत में गिरावट और चिप निर्यातों में उभार से सुधार आ रहा है. लेकिन इसी के साथ जानकारों का अंदाजा है कि सप्लाई अवरोध अगले साल भी वृद्धि पर भारी गुजरेंगे.
परिवहन और लॉजिस्टिक्स की जर्मन कंपनी डीएसवी एयर एंड सी में प्रबंध निदेशक फ्रांक सोबोट्का ने नजदीकी देश में व्यापार को स्थानांतरित करने के चलन का हवाला देते हुए डीडब्ल्यू को बताया, "हमें पता है कि हालात 2022 में नहीं सुधर पाएंगे और तब तक तो बिल्कुल नहीं जब तक कि 2023 में नई प्रासंगिक महासागरीय परिवहन क्षमताएं विकसित नहीं कर ली जातीं या सप्लाई चेन को नीयरशोरिंग यानी नजदीकी देशों से व्यापार के लिए अनुकूलित नहीं कर लिया जाता.”
बढ़ती मुद्रास्फीति
कच्चे माल और वस्तुओं की आमद में कमी के साथ साथ ऊर्जा की ऊंची लागतों ने यूरो जोन और अमेरिका में मुद्रास्फीति को कई सालों की ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया है. वैश्विक निवेशक इससे विचलित हैं, उन्हें डर है कि ऊंची कीमतों को काबू में करने के लिए केंद्रीय बैंक, निर्धारित समय से पहले ही ब्याज की दरों को बढ़ाने को विवश हो सकते हैं.
यूरोपीय सेंट्रल बैंक का मानना है कि सप्लाई की किल्लत, ऊंची ऊर्जा दरों और बेस प्रभावों जैसे अस्थायी कारकों की वजह से कीमतें बढ़ी हैं. उसे उम्मीद है कि वैश्विक स्तर पर मांग-आपूर्ति असंतुलनों के प्रभाव एकबारगी कम होना शुरू होंगे तो मुद्रास्फीति भी ठंडी पड़ जाएगी.
जैसा कि सोचा जा रहा था उससे उलट, सप्लाई चेन के अवरोध देर तक टिके रहे हैं. ऐसे में मुद्रास्फीति 2022 में भी अधिकांश समय तक कायम ही रहेगी और यूरोपीय सेंट्रल बैंक के अधिकारियों को हैरान परेशान करती रहेगी.
अमेरिका में, मुद्रास्फीति से जुड़ी चिंताएं और बड़ी होने की संभावना है. इसकी गिरावट को रोकने का काम करती है आर्थिक बहाली, टैक्स की दरों में कटौती जैसे बड़े पैमाने पर राजस्व प्रोत्साहन और श्रम और सप्लाई की कमी. अमेरिका के संघीय रिजर्व बैंक का कहना है कि वो अपना बॉन्ड-खरीद की प्रोत्साहन योजना का आकार और तेजी से कम करेगा. उसने 2022 में ब्याज दरें बढ़ाने का संकेत भी दिया है. संघीय दर में बढ़ोत्तरी से कुछ उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के लिए संकट खड़ा हो सकता है, जिनमें साउथ अफ्रीका, अर्जेंटीना और तुर्की भी शामिल हैं. ये स्थिति निवेशकों का भरोसा तोड़ सकती है.
चीन की कड़ी कार्रवाई
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश चीन में 2022 के दौरान मंदी बेशक निवेशकों की चिंताओं में इजाफा करेगी. एशियाई आर्थिक पावरहाउस कहलाने वाले चीन ने 2020 के दरमियान, पूरी दुनिया में अपने इलेक्ट्रॉनिक और चिकित्सा सामान की भारी मांग के सहारे, महामारी से उपजी मंदी से दुनिया को उबारने में मदद की थी. इस साल चीनी अर्थव्यवस्था के कमोबेश आठ फीसदी की दर से बढ़ने की उम्मीद है. इस तरह भारत के बाद सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था चीन की होगी.
लेकिन अपनी दिग्गज टेक कंपनियों पर कड़ी कार्रवाई के जरिए चीन ने महामारी पश्चात की बहाली में गतिरोध भी खड़ा किया है. इन कंपनियों में अलीबाबा और टेनसेंट के अलावा कर्ज में फंसी रिएल इस्टेट कंपनियां जैसे एवरग्रांड और काइसा भी हैं और निजी शिक्षा उद्योग भी शामिल हैं. चीन के उच्च अधिकारियों ने यह कहकर आक्रोश को शांत करने की कोशिश की है कि अर्थव्यवस्था में स्थिरता लाना अगले साल की उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है. इस वजह से माना जा रहा है कि 2022 की शुरुआत में ही चीन, वित्तीय प्रोत्साहन ला सकता है.
जीरो-कोविड के अपने रवैये को न छोड़ने की चीन की जिद भी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा बनी रहेगी. चीन सरकार के इस रवैये की वजह से देश एक साल से भी अधिक समय तक अलग-थलग रहा है और कोविड का एक भी मामला आ जाने पर बहुत ही कड़े और भीषण प्रतिबंध लगाने पर आमादा रहा है.
भू-राजनीतिक तनाव
उत्तरी गोलार्ध में तापमान में भले ही गिरावट दर्ज की जा रही हो लेकिन वहां स्थित देशों के बीच तनाव बढ़ रहा है. अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के साथ रूस के रिश्ते तल्ख होते जा रहे हैं. अमेरिका ने रूस को यूक्रेन पर हमला करने को लेकर आगाह कर दिया है जबकि यूक्रेन सीमा पर रूसी फौज का जमावड़ा बढ़ता ही जा रहा है.
अमेरिका और यूरोपीय देश, रूस के खिलाफ और आर्थिक प्रतिबंधों के बारे में विचार कर रहे हैं. अगर रूस ने अपने पड़ोसी यूक्रेन पर हमला किया तो ये देश विवादास्पद नॉर्ड स्ट्रीम 2 गैस पाइपलाइन को भी बंद करने जैसा कदम उठा सकते हैं.
ओआंडा ट्रेडिंग ग्रुप में वरिष्ठ बाजार विश्लेषक एडवर्ड मोया ने डीडब्ल्यू को बताया, "अमेरिका-रूस तनाव एक बड़ा खतरा है जिसके चलते नाटो के पूर्वी यूरोप के सहयोगी देश युद्ध के मुहाने पर आ सकते हैं.” उन्होंने कहा कि "अगर अमेरिका और यूरोप नॉर्ड स्ट्रीम 2 गैस पाइपलाइन को रोकते हैं तो इससे वैश्विक ऊर्जा संकट खड़ा हो जाएगा और तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाएंगी. बढ़ी हुई ऊर्जा दरें ही वह आखिरी धक्का हो सकती हैं जिससे दुनिया भर के बैंक कड़ी मुद्रा नीति को और तेजी से लागू करने को मजबूर होंगे.”
अमेरिका-चीन संबंध ताइवान को लेकर भी तनावपूर्ण रहे हैं. अमेरिका ने चीन को चेताया है कि वह ताइवान में यथास्थिति को बदलने का एकतरफा निर्णय न करे.अमेरिका ने चीन को इस घोषणा से और भड़का दिया है कि मानवाधिकारों पर चीन के "अत्याचारों” के खिलाफ विरोध जताते हुए अमेरिकी अधिकारी बीजिंग में फरवरी में हो रहे शीतकालीन ओलंपिक खेलों का बहिष्कार करेंगे. चीन ने भी जवाब देते हुए कहा है कि अमेरिका को अपने इस फैसले की "कीमत चुकानी” होगी. (dw.com)
पोलैंड ने लगभग हर तरह के एबॉर्शन पर रोक लगा दी तो अमेरिका में इसके कानून बेहद सख्त होने जा रहे हैं. वहीं थाईलैंड और बेनिन जैसे देशों में कई कानूनों में ढील भी दी गई है.
डॉयचे वैले पर इनेस आइजेले की रिपोर्ट-
बीते दशकों में दुनिया भर में गर्भपात की सुविधाओं तक महिलाओं की पहुंच बढ़ी है. सेंटर फॉर रिप्रोडक्टिव राइट्स की यूरोप निदेशक लेया हॉक्टर बताती हैं कि कुछ अपवादों को छोड़कर पूरा वैश्विक ट्रेंड इस मामले में आए उदारीकरण की ओर इशारा करता है. विश्व के कई देशों में 2021 में भी एबॉर्शन जैसे विवादास्पद मुद्दे पर बड़ी तरक्की हुई तो कहीं कहीं झटके भी लगे.
मेक्सिको
सितंबर में मेक्सिको के सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात पर चले आ रहे पूर्ण प्रतिबंध को असंवैधानिक करार दिया. लैटिन अमेरिका के दूसरे सबसे ज्यादा आबादी वाले देश मेक्सिको में यह महिला अधिकार संगठनों की बड़ी जीत है. कोर्ट ने महिलाओं के अपने शरीर से जुड़े फैसले को अजन्मे भ्रूण की जान से ज्यादा अहमियत दी.
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि गर्भावस्था के शुरुआती चरणों में होने वाले एबॉर्शन, बलात्कार के कारण ठहरे गर्भ को गिराने और बच्चे की जान या उसके कारण मां की जान को खतरा होने की स्थिति में कराए जाने वाले एबॉर्शन को अपराध के दायरे से निकाला जाना चाहिए. नतीजतन देश के 31 राज्यों में से ज्यादातर में गर्भपात कानूनों में ढील लाई गई. लैटिन अमेरिका के कुछ ही और देशों जैसे अर्जेंटीना, उरूग्वे, क्यूबा, गियाना और फ्रेंच गुयाना में ही एबॉर्शन को वैधता मिली है.
एल सल्वाडोर
सेंट्रल अमेरिकी देश एल सल्वाडोर में इस पर प्रतिबंध है. कानून तोड़ने वालों को बहुत लंबे लंबे समय की जेल की सजा मिलती है. लेकिन मानुएला नामकी एक महिला के मामले ने बदलाव के रास्ते दिखाए हैं. 2008 में इस महिला का गर्भपात हो गया था, जिसके लिए उसे जेल में डाल दिया गया. प्रशासन ने उस पर गर्भपात करवाने का आरोप जड़ा था. 30 साल की लंबी जेल काटने के दौरान ही इस महिला की कैंसर के कारण मौत हो गई. इंटर अमेरिकल कोर्ट ऑफ जस्टिस ने इस साल मानुएला के मामले पर कहा कि उसकी मौत जेल में अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं ना मिलने के कारण हुई और यह उसके जीवन, स्वास्थ्य और न्यायिक सुरक्षा के मूलभूत अधिकारों का हनन है.
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सरकार को उस महिला के परिवारजनों को हर्जाना भरना चाहिए और इस तरह की नीतियों में बदलाव लाना चाहिए. मानवाधिकार कार्यकर्ता कहते हैं कि इस आदेश से एल सल्वाडोर और पड़ोसी देशों की महिलाओं के लिए उम्मीद जगी है जहां बेहद सख्त एबॉर्शन कानून हैं. इस मामले की विशेषज्ञ लेया हॉक्टर कहती हैं कि बैन और सख्त कानूनों के कारण गर्भपात की दर कम नहीं होती बल्कि उससे लोगों की जान पर खतरा बढ़ जाता है क्योंकि वे गलत रास्तों का सहारा लेते हैं.
अमेरिका
अमेरिका में अलग अलग राज्यों का इस पर अलग अलग रुख है. कैलिफोर्निया में थोड़ा लिबरल तो टेक्सस में ज्यादा कड़ा. टेक्सस में ही सितंबर में भ्रूण में दिल की धड़कन आने के बाद होने वाले हर गर्भपात को अवैध करार दिया गया. इस कड़े कानून में इसकी भी गुंजाइश नहीं रखी गई कि अगर किसी महिला का गर्भ रेप के कारण या किसी जानने वाले के व्याभिचार के कारण ठहरा हो तो उसे अपवाद माना जाए.
टेक्सस के अलावा मिसीसिपी और कुछ अन्य अमेरिकी राज्यों के ऐसे कानून अब भी सुप्रीम कोर्ट पलट सकती है. 1973 की ऐतिहासिक रूलिंग रो वर्सेज वेड में कोर्ट ने गर्भपात पर गैरजरूरी रोक को असंवैधानिक करार दिया था. उसके अनुसार किसी भ्रूण को तब तक गिराया जा सकता है जब तक वह दुनिया में अपने दम पर जीवित रहने लायक नहीं हो गया हो. यही सीमा करीब 24 हफ्ते मानी जाती है. सुप्रीम कोर्ट में इस समय कंजर्वेटिव जजों की तादाद ज्यादा होने के कारण 2022 के मध्य में आने वाले उसके फैसले से राज्य अदालतों का फैसला बदले जाने की कम ही आशा है.
पोलैंड
पोलैंड के एबॉर्शन कानून पूरे यूरोप में सबसे सख्त हैं. 2021 की शुरुआत से लागू हुए नए कानून में संवैधानिक कोर्ट ने कहा था कि भ्रूण में गड़बड़ी के कारण गर्भ गिराने पर प्रतिबंध होना चाहिए. इसके साथ ही देश में किसी भी हालत में गर्भपात की अनुमति नहीं रह गई है. इसके कड़े विरोध के बावजूद कानून बदला नहीं गया बल्कि इसे और भी सख्त होते जाने का अंदेशा है.
जर्मनी
जर्मन क्रिमिनल कोड के अनुसार गर्भपात अपराध है. लेकिन पहले 12 हफ्तों के दौरान डॉक्टरी सलाह पर ऐसा करवाने वाली महिलाओं को जुर्माना नहीं भरना पड़ता. इसका कारण महिला को स्वास्थ्य से जुड़े खतरे हों या गर्भ बलात्कार के कारण ठहरा हो, तो महिला को इसके लिए अपराधी नहीं माना जाता. देश में इसी साल बनी नई सरकार जर्कीमनी में इस विवादित कानून को बदले जाने की बात कह चुकी है. फिलहाल किसी भी तरीके से गर्भपात का प्रचार करने पर भी रोक है और अगर कोई डॉक्टर ऑनलाइन इसकी सलाह देता पकड़ा जाता है तो उसे भी कानून पचड़े झेलने पड़ते हैं. यानि तकनीकी रूप से देखें, तो जर्मनी में महिलाओं की गर्भपात तक पहुंच तो है लेकिन फिर भी इसकी राह में कई रोड़े हैं.
थाईलैंड और बेनिन
2021 की शुरुआत में थाईलैंड की संसद में 12हफ्ते तक गर्भपात करवाने को मान्यता मिल गई. पहले ऐसा केवल कुछ अपवाद मामलों में ही किया जा सकता था. बाकी सबको अपराध के दायरे में रखा जाता था और पकड़े जाने पर जेल की सजा होती थी. अब भी जेल और जुर्माना देने का प्रावधान है अगर एबॉर्शन 12 हफ्ते के बाद करवाया गया हो.
बेनिन में कैथोलिक चर्च के कड़े विरोध के बावजूद इस साल वहां की संसद ने अक्टूबर में एबॉर्शन की सुवुधा देने वाले एक नए कानून को मंजूरी दे दी. अभी संवैधानिक अदालत में इसे स्वीकृति मिलना बाकी है लेकिन ऐसा होना तय माना जा रहा है. इस पश्चिम अफ्रीकी देश में अब गर्भपात कानूनी दायरे में आएगा अगर गर्भ रखने के कारण मां या होने वाले बच्चे के जीवन में "पैसों, पढ़ाई लिखाई, पेशे या नैतिक रूप से गंभीर संकट" आ सकता हो. अफ्रीका के ही कई पड़ोसी देशों में गर्भपात केवल कुछ अपवाद जैसे मामलों में किया जा सकता है और उसे सामाजिक मान्यता नहीं मिली है. बेनिन के स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि देश में दर्ज कुल माताओं की मृत्यु में से 20 फीसदी असुरक्षित तरीके से हुए गर्भपात के कारण होती हैं.
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तकनीक में एकाएक आई तेजी ने महामारी के दौरान जीवन को ज्यादा आसान और ज्यादा सुरक्षित बनाया है. लेकिन नियामक संस्थाओं की ओर से ये पूछा जाने लगा है कि ऐसा आखिर किस कीमत पर?
डॉयचे वैले पर क्रिस्टी प्लैडसन की रिपोर्ट-
नया साल आ चुका है और महामारी के चलते नये साल की पूर्व संध्या के समारोहों की तैयारियां वीडियो कॉल और डिजिटल हेल्थ पास यानी वैक्सीन सर्टिफिकेट की मदद से की गईं. 2021 में तो यही कायदा बन गया था.
यूरोप में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका को आकार देने वाले अभियान, यूरोपीय एआई फंड के निदेशक और टेक नीति विशेषज्ञ फ्रेडेरिके कलथ्युनर ने डीडब्ल्यू को बताया, "इनमें से कई प्रौद्योगिकियां शुरुआत में तब अमल में लाई गई थीं जब हम सोचते थे कि वो एक लघु आपातकाल था. मैं मानता हूं कि 2022 वो साल होगा जिसमें हमें ये अहसास हो जाएगा कि ये सब अभी जाने वाला नहीं है.”
व्यावहारिक तौर पर इसका अर्थ यह है कि जब खुदरा, सेवा और उद्योग सेक्टर- लॉकडाउन और उलझी हुई सप्लाई चेनों से दबे हुए थे तो उस दौरान बड़ी टेक कंपनियां लाभ कमा रही थीं और फलफूल रही थीं. टेक हार्डवेयर से लेकर डिजिटल एडवर्टाइजिंग और स्वचालित कारों तक- महामारी के दौरान अल्फाबेट, एप्पल, अमेजन, मेटा और माइक्रोसॉफ्ट जैसे सिलिकॉन वैली के दिग्गज एक दूसरे के इलाकों में दाखिल होते रहे. ये कहना है अलेक्जेंडर फैन्टा का- वो डिजिटल स्फीयर को कवर करने वाली जर्मन समाचार संस्था, नेत्सपोलिटिक में ईयू टेक नीति के पत्रकार हैं.
उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "इन कंपनियों की ताकत ये है कि वे इतनी ज्यादा बहुआयामी हैं. वे विभिन्न बाजारों को परे खिसका देती हैं और एक बाजार से हासिल ताकत के सहारे दूसरे बाजार पर अपना सिक्का जमाती हैं.”
आलोचना के घेरे में फेसबुक
सीधी और क्षैतिज वृद्धि की वजह से ये कंपनियां बाजार नियामकों के लिए एक ज्यादा बड़ा मुद्दा बन गई हैं. आज इस बात पर एक नजर रखना और कठिन हो गया है कि एक कंपनी क्या क्या करती है. संपत्ति में निरंतर वृद्धि और सीमित संख्या के इन खिलाड़ियों का प्रभाव, लोगों और ऑनलाइन बिजनेसों के लिए कई समस्याएं खड़ी करता है.
इस वृद्धि ने इन कंपनियों को एक दूसरे के साथ ज्यादा प्रत्यक्ष प्रतिस्पर्धा में भी ला खड़ा किया है. ये बात अप्रैल में ही स्पष्ट हो गई थी जब फेसबुक कहलाने वाली कंपनी, एपल के उस सॉफ्टवेयर अपडेट पर भड़क उठी जिसमें आईफोन यूजर्स को एड ट्रैकिंग का ऑप्श्न चुनने की जरूरत थी जबकि ये सोशल मीडिया महारथी फेसबुक के बिजनेस मॉडल का एक स्तंभ है. हाल में मेटा नाम से आई फेसबुक कंपनी अपनी तीसरी तिमाही में राजस्व लक्ष्य में थोड़ा पीछे रह गई तो इसके लिए कंपनी के सीईओ मार्क जकरबर्ग ने एप्पल को जिम्मेदार ठहराया.
वैसे मेटा पूरे साल ध्यान खींचने की जुगत में ही लगी रही. ये इस बात का सबसे पुख्ता उदाहरण है कि अपने समय की पसंदीदा मानी जाने वाली टेक कंपनियों के खिलाफ हवा का रुख कैसे बदला. कंपनी के बिजनेस क्रियाकलापों के प्रति जनता की बढ़ते असंतोष ने आखिरी चिंगारी को सुलगा दिया जब एक व्हिसलब्लोअर ने कंपनी के विवादास्पद बिजनेस तौरतरीकों का पर्दाफाश कर दिया.
लेकिन रीब्रांडिंग से यानी नये नाम के साथ, अपना ब्रांड बचाने की रणनीति साल के आखिर में जनता का ध्यान भटकाने में सफल रही है. नवंबर में जकरबर्ग ने मेटावर्स का खाका पेश किया, जिसे कंपनी एक आकर्षक और लुभावना ऑनलाइन अनुभव बताते हुए इंटरनेट के अगले उद्भव के तौर पर सामने ला रही है.
लेकिन हर कोई इससे प्रभावित नहीं है. कलथ्युनर कहते हैं कि "कोई मेटावर्स नहीं है. ये मौजूदा समस्याओं के बारे में बात करने का वाकई एक अच्छा तरीका भर है. हम घटनाओं में इसे पहले से देख ही रहे हैं, लोग इस शब्दावली का इस्तेमाल कर ही रहे हैं भले ही इसका मतलब कोई नहीं जानता. अगर मैं फेसबुक होता, मैं भी नाम बदल देता. वो ब्रांड वाकई अच्छा नहीं था.”
मुश्किलों का बखूबी सामना करते नियामक
फिर भी, ये कदम इस सवाल को उभारता है कि नियामक संस्थाओं या सरकारों के पास बड़ी टेक कंपनियों की सोच का मुकाबला करने लायक साधन हैं भी या नहीं. कई उदाहरणों से दिखता है कि उन्होंने कभी कड़ा प्रयत्न नहीं किया.
इस साल यूरोपीय संघ की एंटीट्रस्ट वॉचडॉग मार्ग्रेट वेस्टागर ने इन खिलाड़ियों को नाथने के लिए अपना अभियान छेड़ा है. इसके तहत 2020 के आखिर में डिजिटल मार्केट्स एक्ट (डीएमए) और डिजिटल सर्विसेज एक्ट (डीएसए) जैसे प्रमुख कानून के मसौद पेश किए गए हैं. इस तरह उन्होंने बड़ी तेजी से कानूनी तैयारियां पूरी की हैं.
डीएमए कानून, गूगल जैसी कथित गेटकीपर कंपनियों को मजबूर करने के लिए है कि वे उन प्रतिस्पर्धियों को भी और बराबरी से संचालन का मौका दें जो ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों पर निर्भर हैं. डीएसए के जरिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों पर मौजूद गैरकानूनी सामग्री पर और अधिक नियंत्रण लागू किया जा सकेगा.
आधिकारिक वार्ताएं जनवरी 2022 में शुरू होंगी. वेस्टागेर को उम्मीद है कि 2024 में यूरोपीय संसद का जनादेश पूरा होना से पहले ये ड्राफ्ट कानूनी रूप अख्तियार कर लेंगे.
नवंबर में एफटी-ईटीएनओ टेक ऐंड पॉलिटिक्स फोरम में वेस्टागेर ने कहा, "हर किसी के लिए ये समझना जरूरी है कि इस समय 80 प्रतिशत हासिल हो जाना कभी 100 प्रतिशत न हासिल हो पाने से ज्यादा अच्छा है. कहने का मतलब ये है कि ‘सर्वश्रेष्ठ' को ‘बहुत, ‘बहुत अच्छा' का दुश्मन नहीं होना चाहिए.”
रफ्तार उत्साहजनक है. लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि एक द्रुत टाइमलाइन एक वास्तविक सर्वसम्मति की कीमत पर ही तैयार हुई हो सकती है. जिसका मतलब है कि आगे चलकर और विस्तृत वार्ताएं होंगी.
वैश्विक स्तर पर कड़ी कार्रवाई
बड़ी टेक कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई में यूरोप अकेला नहीं है. चीन में भी प्रमुख कंपनियों को कड़ी कार्रवाई का सामना करना पड़ा था. अमेरिका के संघीय व्यापार आयोग (एफटीसी) की नयी प्रमुख लीना खान ने इस दलील के साथ ध्यान खींचा था कि अमेजन जैसी बड़ी कंपनियों के मामले में एंटीट्रस्ट कानून को और आगे जाने की जरूरत है.
लीना के एफटीसी में पद ग्रहण करने के एक महीने से भी कम समय में जेफ बेजोस, अमेजन के सीईओ पद से रिटायर हो गए थे. ट्विटर के संस्थापक जैक डोरसी ने भी पद से इस्तीफा दे दिया था. प्रमुख अमेरिकी टेक कंपनियों में जुकरबर्ग ही अकेले संस्थापक हैं जो प्रबंधन भूमिका में सक्रिय हैं.
फैंटा का कहना है कि अग्रिम पंक्ति से खुद को हटाना इन दिग्जगों की घबराहट का एक संकेत है. उन्हें उम्मीद है कि अमेरिका में 2022 में एक प्रमुख कानून सामने आ सकता है क्योंकि वहां बड़ी टेक कंपनियों पर नकेल कसना दोदलीय मुद्दा भी बन चुका है.
नया साल और क्या गुल खिलाएगा, कहा तो नहीं जा सकता है लेकिन न तो नियामक संस्थाएं और ना ही बड़ी टेक कंपनियां पीछे हटने का कोई संकेत दे रही है. सार्वजनिक हित में लड़ाई को लेकर टेक स्फीयर में आवाजें और ऊंची हो चली हैं, लेकिन कंपनियों की लॉबी अब भी मजबूत है.
बड़ी टेक कंपनियों के बारे में फैंटा कहते हैं, "उन्हें भी चुनौती का सामना करना पड़ेगा. मैं नहीं समझता कि बाजार में अपनी विशेषाधिकारपूर्ण स्थिति को वे छोड़ देंगे.” (dw.com)
कोविड-19 की वैश्विक महामारी के दौरान कुछ देशों में शराब और सिगरेट पीने की लत बढ़ गई है. इससे सबसे ज्यादा युवा प्रभावित हो रहे हैं. इसकी वजह हैरान करने वाली है.
डॉयचे वैले पर लुइजा राइट की रिपोर्ट-
साल 2020 और 2021 में पूरी दुनिया में तालाबंदी लागू करवा देने वाले कोरोना वायरस से अभी तक निजात नहीं मिली है. दुनिया की एक बड़ी आबादी का टीकाकरण हो गया है. इसके बावजूद, इस वायरस के नए ओमिक्रॉन वैरिएंट की वजह से कई देशों में कोविड-19 महामारी की पांचवीं लहर आने की आशंका जताई जा रही है. संक्रमण के बढ़ते खतरे के बीच शराब और सिगरेट पीने की लत भी बढ़ रही है.
इस साल अगस्त महीने में ‘एडिक्शन' जर्नल में छपे अध्ययन के मुताबिक, इंग्लैंड में लगे पहले लॉकडाउन के दौरान, महामारी से पहले की तुलना में 45 लाख से ज्यादा वयस्कों ने शराब पीना शुरू कर दिया. यह करीब 40 फीसदी की वृद्धि थी.
इस अध्ययन के लेखकों ने प्रेस विज्ञप्ति में कहा, "यह प्रवृति महिलाओं के साथ-साथ निम्न आय वाले लोगों में भी देखने को मिली, जो काफी चिंताजनक है.अध्ययन के मुताबिक, पहले लॉकडाउन के दौरान 6,52,000 युवाओं को धूम्रपान की लत लगी.
तम्बाकू के सेवन में वृद्धि
अक्टूबर 2021 में यूरोपियन जर्नल ऑफ पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित अध्ययन में पाया गया कि फ्रांस में पहली बार मार्च 2020 में लॉकडाउन लगने के बाद, धूम्रपान करने वाले मौजूदा लोगों में 27 फीसदी ने बताया कि उनकी तम्बाकू की खपत बढ़ गई. वहीं, 19 प्रतिशत ने कहा कि उनकी तम्बाकू की खपत कम हो गई है.
जिन लोगों के बीच तम्बाकू की खपत बढ़ी उनमें ज्यादातर की उम्र 18 से 34 साल के बीच थी. साथ ही, वे उच्च शिक्षित लोग भी थे. शराब पीने वाले 11 फीसदी लोगों ने कहा कि लॉकडाउन के बाद से उनकी शराब की खपत बढ़ गई है. वहीं 24.4 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्होंने पीना कम कर दिया है. जिन लोगों के बीच शराब की खपत बढ़ी है उनकी उम्र 18 से 49 साल के बीच है.
जर्मनी में कुछ सिगरेट के विज्ञापनों की अभी भी अनुमति है. यहां भी सिगरेट पीने वाले युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ी है. धूम्रपान की आदतों को लेकर जर्मनी में लंबे समय तक किए गए अध्ययन के मुताबिक, 2019 में 14 साल से ज्यादा उम्र के 27 फीसदी लोग सिगरेट पीते थे. अभी यह संख्या बढ़कर 31 फीसदी हो गई है.
जर्मनी में सिगरेट पीने की वजह से हर साल करीब एक लाख 20 हजार लोगों की मौत होती है. यह करीब उतनी ही संख्या है जितने लोगों की अब तक कोविड-19 की वजह से पिछले दो साल में मौत हुई है.
शराब का असर
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक शराब पीने की वजह से हर साल पूरी दुनिया में करीब 30 लाख लोगों की मौत होती है. दुनिया में होने वाली 5.1 फीसदी बीमारियों के लिए शराब जिम्मेदार है. शराब पीने से स्वास्थ्य पर काफी ज्यादा बुरा असर पड़ता है. अमेरिकी राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसी ‘सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल ऐंड प्रिवेंशन' के मुताबिक, शराब के अत्यधिक सेवन की वजह से हाई ब्लड प्रेशर, ह्रदय से जुड़े रोग, स्ट्रोक, लीवर से जुड़ी बीमारियां सहित कई और तरह की स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं. इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो सकती है. व्यक्ति मानसिक रूप से बीमार हो सकता है. साथ ही, शरीर कैंसर जैसी बीमारियों से ग्रसित हो सकता है.
तंबाकू सेवन की वजह से मरने वाले लोगों की संख्या भी काफी ज्यादा बढ़ गई है. दुनिया भर में हर साल करीब 80 लाख लोगों की मौत तंबाकू सेवन की वजह से होती है. इनमें 12 लाख ऐसे लोग भी शामिल हैं जो धूम्रपान नहीं करते हैं, लेकिन धूम्रपान करने वाले लोगों के आसपास मौजूद रहते हैं. डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, दुनिया में 138 करोड़ लोग तंबाकू का सेवन करते हैं. इनमें से 80 फीसदी लोग निम्न और मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं.
तनाव और उदासी
सामाजिक रूप से पीने के कम मौके होने के बावजूद, जर्मनी में कुछ समूहों में शराब की खपत में वृद्धि हुई है. जर्मन सोसाइटी फॉर एडिक्शन रिसर्च ऐंड एडिक्शन थेरेपी के डॉक्टर और अध्यक्ष फाल्क किएफर ने जर्मन समाचार एजेंसी डीपीए को बताया कि लगभग 25 फ्रतिशत वयस्कों ने महामारी से पहले की तुलना में ज्यादा शराब पी.
किएफर ने कहा, "पहले जो लोग शाम में आनंद के लिए नियमित तौर पर घर पर शराब पीते थे, महामारी के दौरान वे अकेलापन, तनाव, और उदासी की वजह से ज्यादा शराब पीने लगे.
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में इंसानों के व्यवहार से जुड़े मामलों के वैज्ञानिक और एडिक्शन अध्ययन की प्रमुख लेखिका सारा जैक्सन ने कहा कि लॉकडाउन को कई लोगों ने धूम्रपान छोड़ने के अवसर के तौर पर इस्तेमाल किया. वहीं, कई लोग तनाव की वजह धूम्रपान करने लगे. वहीं, कुछ पहले की तुलना में ज्यादा धूम्रपान करने लगे.
जैक्सन ने प्रेस विज्ञप्ति में कहा, "पहली बार लॉकडाउन लगने के दौरान कई लोग काफी ज्यादा तनाव में आ गए थे. जो लोग इस महामारी की वजह से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए उनके बीच शराब और सिगरेट पीने की लत में वृद्धि देखी गई.
अल्कोहल का इस्तेमाल कितना फायदेमंद है?
कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि सीमित मात्रा में शराब का सेवन करने से स्वास्थ्य को लाभ मिलता है. हालांकि, हाल के अध्ययनों के मुताबिक शराब पीने से स्वास्थ्य पर हमेशा नकारात्मक प्रभाव ही पड़ता है.
कई अध्ययनों में बताया गया है कि काफी ज्यादा मात्रा में शराब पीने या एकदम शराब नहीं पीने की तुलना में सीमित मात्रा में शराब पीने से हार्ट अटैक का खतरा कम हो जाता है. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, पेकिंग यूनिवर्सिटी और चाइनीज एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज के शोधकर्ता यह जानना चाहते थे कि क्या इसके पीछे कोई वजह है.
अप्रैल 2019 में द लांसेट में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक वैज्ञानिकों ने 10 वर्षों तक पूर्वी एशिया के पांच लाख लोगों का इंटरव्यू लिया और उनके बारे में जानकारी इकट्ठा की. पूर्वी एशिया में रहने वाले लोग अनुवांशिक तौर पर ऐसे हैं कि जो अल्कोहल से होने वाले असर को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं. इसलिए, यहां अल्कोहल की खपत कम हो जाती है. हालांकि धूम्रपान और अन्य जीवनशैली को लेकर स्थिति इससे बिल्कुल अलग है.
वैज्ञानिकों ने पाया कि अनुवांशिक भिन्नता की वजह से लोगों ने शराब का सेवन कम कर दिया था. इस वजह से उनके बीच ब्लड प्रेशर और स्ट्रोक के खतरे भी कम हो गए थे. शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि अल्कोहल का सेवन करने से स्ट्रोक का खतरा 35 फीसदी बढ़ जाता है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि व्यक्ति सीमित मात्रा में पी रहा है या थोड़ा ज्यादा पी रहा है.
एडिक्शन स्टडी के लिए धन मुहैया कराने वाली संस्था कैंसर रिसर्च यूके की चीफ एक्जीक्यूटिव मिशेल मिचेल ने कहा, "शराब पीने या धूम्रपान करने का कोई ‘सुरक्षित स्तर' नहीं है. अगर कोई व्यक्ति शराब पीना या धूम्रपान करना बंद कर देता है, तो उसे कैंसर होने का खतरा कम हो सकता है.
शराब के ज्यादा सेवन से घरेलू हिंसा में भी वृद्धि होती है. लॉकडाउन के दौरान, कई देशों में यह प्रवृति देखने को मिली. आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) के अनुसार, यूरोपीय संघ के देशों में घरेलू हिंसा को लेकर आने वाली आपातकालीन कॉल में 60 फीसदी की वृद्धि हुई है. (dw.com)


