राजनीति

Date : 23-Mar-2020

शिवराज सिंह चौहान को ही मिलेगी मध्य प्रदेश की कमान

हेमंद्र शर्मा/रवीश पाल सिंह
भोपाल, 23 मार्च :
मध्य प्रदेश की कमान एक बार फिर शिवराज सिंह चौहान के हाथों में जा सकती है. सूत्रों से खबर है कि शिवराज सिंह चौहान को आज विधायक दल का नाम चुन लिया जाएगा. विधायक दल की इस बैठक की निगरानी ऑब्जर्वर दिल्ली से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए करेंगे.
वहीं मध्य प्रदेश में सियासी घमासान के बाद अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने जा रही है. इसके साथ ही राजभवन ने मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण के लिए रात 9 बजे का वक्त दिया है. रात 9 बजे मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली जाएगी.
इसके बाद शिवराज सिंह चौहान आज शाम चौथीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे. कोरोना वायरस के कारण शपथ ग्रहण सादगी के साथ होगा. राजभवन के भीतर शपथ की तैयारी शुरू हो गई है. उनके साथ मिनी कैबिनेट भी शपथ ले सकती है. माना जा रहा है कि इस शपथ ग्रहण में कम ही लोग हिस्सा लेंगे.
चौथी बार मुख्यमंत्री बनेंगे शिवराज
शिवराज सिंह चौहान अगर आज सीएम पद की शपथ लेते हैं तो वह चौथीं बार मध्य प्रदेश की कमान संभालेंगे. पहली बार वह 29 नवंबर 2005 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे. इसके बाद वह 12 दिसंबर 2008 में दूसरी बार सीएम बने. 8 दिसंबर 2013 को शिवराज ने तीसरी बार सीएम पद की शपथ ली थी.
क्यों गिरी थी कमलनाथ सरकार
हाल में ही मध्य प्रदेश से कमलनाथ सरकार की विदाई हुई है. दरअसल कांग्रेस के 22 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया था. इसमें 6 मंत्री शामिल थे. स्पीकर ने मंत्रियों का इस्तीफा कबूल कर लिया था, लेकिन 16 विधायकों का इस्तीफा कबूल नहीं किया था. विधायकों के इस्तीफे के कारण कमलनाथ सरकार अल्पमत में आ गई थी, लेकिन फ्लोर टेस्ट कराने की बजाए सदन को स्थगित कर दिया गया था.
SC के आदेश के बाद कमलनाथ का इस्तीफा
इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट ने कमलनाथ सरकार को तुरंत फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दिया. आदेश के बाद स्पीकर ने सभी 16 विधायकों का इस्तीफा मंजूर किया और फ्लोर टेस्ट पहले ही कमलनाथ ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया.
सिंधिया ने बिगाड़ा कमलनाथ का खेल
कमलनाथ सरकार पर संकट के बाद उस दिन से मंडराने लगे थे, जब कांग्रेस पार्टी से कद्दावर नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया का मोहभंग हो गया. सिंधिया के करीबी विधायक बेंगलुरु चले गए और सिंधिया दिल्ली आए. फिर उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की. इसके बाद सिंधिया ने बीजेपी ज्वॉइन कर लिया. (aajtak)


Date : 20-Mar-2020

भोपाल, 20 मार्च । पन्द्रह महीनों तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहने के बाद कमलनाथ ने शुक्रवार को अपने पद से इस्तीफे का ऐलान कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने दो दिनों तक चली सुनवाई के बाद कमलनाथ सरकार को शुक्रवार को शाम 5 बजे तक फ्लोर टेस्ट के आदेश दिए हैं। लेकिन कमलनाथ ने फ्लोर टेस्ट से पहले ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया। कोर्ट ने गुरुवार को फैसला सुनाते हुए कहा था कि मध्यप्रदेश विधानसभा का सत्र फिर से बुलाया जाए और कमलनाथ सरकार शुक्रवार शाम 5 बजे बहुमत हासिल करे। हालांकि, रात एक बजे तक विधानसभा की कार्यसूची जारी नहीं हुई थी, नाटकीय घटनाक्रम में नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव देर रात विधानसभा पहुंचे और अध्यक्ष की मेज पर अपनी चिठ्ठी और फैसले की प्रति रखकर आए।

शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कमलनाथ ने कहा, जनता ने पांच साल का मौका दिया था ताकि प्रदेश को सही रास्ते पर लाया जा सके। इसकी नई पहचान बने। मध्य प्रदेश की तुलना बड़े राज्यों से हो। पन्द्रह साल बीजेपी को मिले और मुझे 15 महीने मिले। इन 15 महीनों में प्रदेश की जनता गवाह किया है कि मेरे द्वारा किए गए काम बीजेपी को रास नहीं आए। आप जानते हैं कि जब सरकार बनी तो पहले ही दिन से साजिश शुरू कर दी।

साथ ही उन्होंने कहा कि आज हमारे 22 विधायकों को कर्नाटक में बंधक बनाने का काम किया गया। करोड़ो रुपये खर्च कर खेल खेला गया। एक महाराज और बीजेपी ने लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या की है। प्रदेश के साथ धोखा करने वाले लोभियों और बागियों को जनता माफ नहीं करेगी।  कई बार हमने विधानसभा में बहुमत साबित किया है। सीएम कमलनाथ ने कहा, मेरे साथ विश्वासघात किया गया है मध्य प्रदेश की जनता के साथ विश्वासघात किया गया है। पन्द्रह महीनों में हमने किसानों का कर्जा माफ किया। बीजेपी ने हमारी सरकार के साथ साजिश करके किसानों को धोखा दिया है।(एनडीटीवी)

 


Date : 18-Mar-2020

नई दिल्ली, 18 मार्च । मध्य प्रदेश की राजनीति में बीते कई दिनों से मची उथल-पुथल के बीच कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह आज (बुधवार) सुबह बेंगलुरु के होटल में मौजूद बागी विधायकों से मुलाकात करने पहुंचे। दिग्विजय को होटल के भीतर दाखिल नहीं होने दिया गया, जिसके बाद वह बाहर ही धरने पर बैठ गए। हालांकि, पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया है।
कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह बेंगलुरु के रमाडा होटल पहुंचे थे। इसी होटल में कांग्रेस के 21 बागी विधायक हैं। पुलिस द्वारा रोके जाने के बाद दिग्विजय ने कहा कि विधायक उनसे बात करना चाहते हैं। दिग्विजय ने कहा, मैं मध्य प्रदेश से कांग्रेस का राज्यसभा उम्मीदवार हूं। 26 मार्च को वोटिंग होनी है। मेरे विधायकों को यहां रखा गया है। वह मुझसे बात करना चाहते हैं। लेकिन उनके मोबाइल फोन को छीन लिया गया है। कांग्रेस के राज्यसभा उम्मीदवार दिग्विजय सिंह ने कहा कि पुलिस विधायकों से मुलाकात नहीं करने दे रही है और कह रही है कि उनकी सुरक्षा को खतरा है। होटल के बाहर पार्टी समर्थकों के साथ धरने पर बैठे दिग्विजय सिंह को पुलिस ने हिरासत में ले लिया।  
मध्य प्रदेश के राज्यपाल लालजी टंडन ने कुछ दिन पहले कमलनाथ सरकार को विधानसभा में फ्लोर टेस्ट कराने को कहा था। हालांकि, इसके बाद कोरोना वायरस का हवाला देते हुए स्पीकर ने सदन की कार्यवाही को 26 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी थी। इसके बाद फिर से राज्यपाल ने फ्लोर टेस्ट कराने के निर्देश दिए, जिसे कमलनाथ सरकार ने बागी विधायकों को छुड़ाए जाने तक कराने से इंकार कर दिया।
कांग्रेस बागी विधायकों से संपर्क के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंची
कांग्रेस अपने बागी विधायकों से संपर्क कायम कराने के लिए मंगलवार को शीर्ष न्यायालय पहुंच गई।  मध्य प्रदेश कांग्रेस ने अपनी याचिका में न्यायालय से उसके विधायकों को बेंगलुरु में गैरकानूनी तरीके से बंधक बनाए जाने की केंद्र, कर्नाटक सरकार और प्रदेश की भाजपा इकाई की कार्रवाई को गैरकानूनी घोषित करने का आग्रह किया गया है। 
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार से जवाब मांगा
उच्चतम न्यायालय ने मध्य प्रदेश विधानसभा में तत्काल शक्ति परीक्षण कराने संबंधी याचिका पर कमलनाथ सरकार से बुधवार तक जवाब मांगा है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ओर से दायर इस याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि वह राज्य सरकार को तुरंत बहुमत साबित करने का निर्देश दे। (लाइव हिन्दुस्तान)
 


Date : 17-Mar-2020

नई दिल्ली, 17 मार्च। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने मंगलवार को राज्यपाल को खत लिखा है। मुख्यमंत्री ने खत लिखते हुए खेद जताया कि संसदीय परंपराओं का पालन नहीं करने की उनकी मंशा नहीं थी। कमलनाथ ने राज्यपाल को लिखे खत में कहा है, मैंने अपने 40 साल के लंबे राजनैतिक जीवन में हमेशा सम्मान और मर्यादा का पालन किया है। आपके पत्र दिनांक 16 मार्च 2020 को पढऩे के बाद मैं दुखी हूं कि आपने मेरे ऊपर संसदीय मर्यादाओं का पालन न करने का आरोप लगाया है। मेरी ऐसी कोई मंशा नहीं थी, फिर भी यदि आपको ऐसा लगा है तो, मैं खेद व्यक्त करता हूं।
साथ ही उन्होंने कहा कि आपने अपने पत्र में यह तो लिखा है कि, सदन की कार्यवाही दिनांक 26/03/2020 तक स्थगित हो गई परन्तु स्थगन के कारणों का संभवत: आपने उल्लेख करना उचित नहीं समझा। जैसा कि आप स्वयं जानते हैं कि, हमारा देश व पूरा विश्व कोरोना वायरस के संक्रमण से पीडि़त है और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे एक अंतररराष्ट्रीय महामारी घोषित किया है। भारत सरकार ने इस बारे में एडवाईजरी जारी की है और समारोह अथवा सार्वजनिक स्थान, भीड़ से बचने के निर्देश दिए हैं। इस कारण अध्यक्ष विधानसभा ने सदन की कार्यवाही 26 मार्च 2020 की प्रात: 11 बजे तक स्थगित की है।
साथ ही सीएम ने लिखा है, आपने अपने पत्र मं यह खेद जताया है कि मेरे द्वारा आपने जो समयावधि दी थी उसमें विधानसभा में अपना बहुमत सिद्ध करने के बजाय मैंने आपको पत्र लिखकर फ्लोर टेस्ट कराने में आनाकानी की है। मैं आपके ध्यान में यह तथ्य लाना चाहूंगा कि पिछले 15  महीनों में मैंने सदन में कई बार अपना बहुमत सिद्ध किया है। अब यदि भाजपा यह आरोप लगा रही है तो मेरे पास बहुमत नहीं है तो वे अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से फ्लोर टेस्ट करा सकते हैं। मेरी जानकारी में आया है कि उन्होंने अविश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत कर दिया है जो विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष लंबित है। विधानसभा नियमावली के अनुसार माननीय अध्यक्ष इस पर नियमानुसार कार्यवाही करेंगे तो अपने आप यह सिद्ध हो जाएगा कि हमारा विधानसभा में बहुमत है।
भाजपा पर आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री ने खत में कहा है, मैं बार-बार अपने पत्रों के माध्यम से एवं आपसे व्यक्तिगत रूप से मिलकर उस असाधारण स्थिति के बारे में अवगत करवाता रहा हूं कि जब कांग्रेस के 16 विधायकों को बेंगलुरू में भाजपा के नेताओं द्वारा अपने साथ चार्टर्ड हवाई जहाज में ले जाकर कर्नाटक पुलिस की मदद से होटल/रिसॉर्ट में बंदी जैसी स्थिति में रखा गया है, जहां उनसे कोई मिल नहीं सकता, बात नहीं कर सकता तथा भोपाल आने से रोका जा रहा है, जबकि भाजपा के नेता उनके पास आ-जा रहे हैं और उनके मन-मस्तिष्क पर प्रलोभन, डर, दबाव डालकर प्रभाव डाल रहे हैं और झूठे बयान मीडिया में दिलवा रहे हैं।
इसके अलावा उन्होंने कहा, मैं पुन: आश्वस्त करना चाहता हूं कि मध्यप्रदेश के बंदी बनाए गए 16 कांग्रेसी विधायकों को स्वतंत्र होने दीजिए और पांच-सात दिन खुले वातावरण में बिना किसी डर-दबाव अथवा प्रभाव के उनके घर पर रहने दीजिए ताकि वे स्वतंत्र मन से अपना निर्णय ले सकें। आपका यह मानना कि दिनांक 17 मार्च 2020 तक मध्यप्रदेश विधानसभा में, मैं फ्लोर टेस्ट करवाऊं और अपना बहुमत सिद्ध करूं अन्यथा यह माना जाएगा कि मुझे वास्तव में विधानसभा में बहुमत प्राप्त नहीं है, पूर्णत: आधारहीन होने से असंवैधानिक होगा।
वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश विधानसभा में तत्काल शक्ति परीक्षण कराने की मांग करने वाली, पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की याचिका पर कमलनाथ सरकार से बुधवार तक जवाब मांगा है। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने मंगलवार को कहा कि वह कल सुबह साढ़े 10 बजे के लिए राज्य सरकार और विधानसभा सचिव समेत अन्य को नोटिस जारी करेगी। चौहान और राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता समेत भाजपा के नौ अन्य विधायक सोमवार को उच्चतम न्यायालय पहुंचे थे। उच्चतम न्यायालय अब इस मामले में कल यानि बुधवार को सुनवाई करेगा।
मध्य प्रदेश के राज्यपाल लालजी टंडन ने मुख्यमंत्री कमलनाथ को 16 मार्च को सदन में अपना बहुमत साबित करने का निर्देश दिया था। पूर्व मुख्यमंत्री चौहान ने अपनी याचिका में कहा है कि कमलनाथ सरकार के पास सत्ता में बने रहने का कोई नैतिक, कानूनी, लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकार नहीं रह गया है। 
गौरतलब है कि सोमवार को तेजी से हुए घटनाक्रम में चौहान और भाजपा के नौ विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष एन पी प्रजापति के राज्यपाल लालजी टंडन के निर्देशों का उल्लंघन करते हुए शक्ति परीक्षण कराए बिना 26 मार्च तक विधानसभा की कार्यवाही स्थगित किये जाने के तुरंत बाद शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया।
याचिका की अविलंब सुनवाई के लिये शीर्ष अदालत के संबंधित अधिकारी के समक्ष उल्लेख किया गया जिसमें विधानसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री और विधानसभा के प्रधान सचिव को मध्य प्रदेश विधानसभा में इस अदालत के आदेश देने के 12 घंटे के भीतर राज्यपाल के निर्देशों के अनुसार शक्ति परीक्षण कराने का आदेश देने की मांग की गई है। (एनडीटीवी)

 


Date : 17-Mar-2020

कुबूल अहमद
भोपाल, 17 मार्च । मध्य प्रदेश के सत्ता संघर्ष में राजभवन और स्पीकर के बीच ठन गई है। कमलनाथ सरकार और राज्यपाल लालजी टंडन आमने-सामने आ गए हैं। सत्ता की रस्साकशी में कमलनाथ सरकार के भविष्य पर संकट गहराता जा रहा है। राजभवन जिस तरह का रवैया अपना रहा है, उससे सवाल उठता है कि क्या कमलनाथ सरकार को बर्खास्त करने की दिशा में राज्यपाल कदम बढ़ा रहे हैं?
मध्यप्रदेश विधानसभा के सत्र की शुरुआत सोमवार को राज्यपाल लालजी टंडन के अभिभाषण से हुई और उसके तुरंत बाद स्पीकर एनपी प्रजापति ने विधानसभा की कार्यवाही को 26 मार्च तक स्थगित कर दिया। इसके बाद बीजेपी ने एक तरफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और दूसरी तरफ अपने 106 विधायकों की परेड राज्यपाल के सामने की और कहा कि कांग्रेस सरकार ने राज्यपाल के आदेश का पालन नहीं किया।
सोमवार देर शाम राज्यपाल ने कमलनाथ को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने साफ तौर पर 17 मार्च यानी मंगलवार को बहुमत साबित करने का अल्टीमेटम दिया है। राज्यपाल ने कमलनाथ को पत्र लिख कर कहा कि अगर कमलनाथ सरकार बहुमत साबित नहीं करेगी तो उसे अल्पमत में माना जाएगा। हालांकि, कमलनाथ ने सोमवार देर शाम राजभवन जाकर राज्यपाल से मुलाकात भी की। इसके बाद कमलनाथ ने फिर कहा कि अभी उनके पास बहुमत है, ऐसे में उन्हें साबित करने की कोई जरूरत नहीं है।
दरअसल राज्यपाल लालजी टंडन लखनऊ से भोपाल लौटने के बाद से एक्शन में हैं। शनिवार की रात उन्होंने मुख्यमंत्री कमलनाथ को पत्र भेजकर कहा था, बजट सत्र के पहले दिन राज्यपाल के अभिभाषण के ठीक बाद फ्लोर टेस्ट कराया जाए। राज्यपाल ने कांग्रेस विधायकों के विद्रोह के बाद नंबर गेम में पिछड़ गई कमलनाथ सरकार के अल्पमत में होने का अंदेशा भी जाहिर किया था।
विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापित ने राज्यपाल लालजी टंडन के निर्देशों को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया था। विधानसभा की कार्यसूची में न तो फ्लोर टेस्ट को शामिल किया और न हीं राज्यपाल के अभिभाषण के बाद उस पर अमल किया। इसके चलते राज्यपाल लालजी टंडन ने त्यौरियां चढ़ा ली हैं और मंगलवार को सरकार को बहुमत साबित करने का अल्टीमेटम दे रखा है। वहीं, कमलनाथ सरकार फ्लोर टेस्ट की दिशा में कदम नहीं बढ़ा रही है। राजभवन के तेवर को देखकर सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही पर नजर है।
कमलनाथ सरकार ने राज्यपाल के निर्देशों को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया है। इससे राजभवन और कमलनाथ के बीच टकराव के हालात बन बन गए हैं। ऐसे में ऐसे ही टकराव बढ़ा और राज्यपाल के निर्देशों को ना सुना तो यह सरकार को बर्खास्त करने का ठोस सबब बन सकता है।(आजतक)
 


Date : 17-Mar-2020

शुरैह नियाजी
भोपाल से, 17 मार्च। मध्य प्रदेश की राजनीति पल-पल बदल रही है। बीजेपी 16 मार्च को सदन में फ्लोर टेस्ट करवाना चाह रही थी लेकिन विधानसभा की कार्यवाही 26 मार्च तक के लिए स्थागित कर दी गई और वजह कोरोना वायरस बताई गई।
राज्यपाल लालजी टंडन अपना अभिभाषण पढऩे की जगह मध्य प्रदेश के गौरव का ध्यान रखने और सब लोगों से अपना कर्तव्य निभाने की बात कहकर अपने आसन से उठकर चले गए।
इसके बाद बीजेपी नेता शिवराज सिंह चौहान समर्थक विधायकों की सूची लेकर और बसों में विधायकों को लेकर राज्पयापल के पास पहुँचे, इसके बाद राज्यपाल ने कहा कि नियमों का पालन होगा, उन्होंने भाजपा विधायकों को आश्वसान दिया कि वे निश्चिंत रहें, उनके अधिकार सुरक्षित रहेंगे। कुछ दिन पहले कांग्रेस के 22 विधायकों के इस्तीफा देने की बाद कमलनाथ सरकार पर संकट आ गया था।
कांग्रेस से बागी हुए सदस्य अभी भी बेंगलुरु में है। उन्हें और 10 दिन तक संभालकर रखना भाजपा के लिए मुश्किल होता। अगले कदम के तौर पर भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है, जिस पर सुनवाई मंगलवार को होनी है।
मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सोमवार को विधानसभा सत्र शुरु होने से ठीक पहले, राज्यपाल को पत्र लिखकर अरुणाचल प्रदेश के एक मामले का जिक्र था। पत्र में उन्होंने लिखा, किसी राजनीतिक दल की गतिविधियां जो कि उनके आंतरिक कलह या भेदभाव से संबंधित हों यह राज्यपाल के लिए चिंता का विषय नहीं होना चाहिए।
दरअसल, जिस मामले का उन्होंने जिक्र किया था वो 13 जुलाई 2016 का मामला है जो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था।
अरुणाचल प्रदेश में क्या हुआ था?
अरुणाचल प्रदेश विधानसभा में 2016 में ठीक इसी तरह की स्थिति बन चुकी है, जैसी आज मध्य प्रदेश विधानसभा की है।
अरुणाचल प्रदेश में सत्ता हासिल करने के एक साल के भीतर ही कांग्रेसी मुख्यमंत्री नबाम तुकी को पार्टी के भीतर असंतोष का सामना करना पड़ रहा था। रिपोर्टों के मुताबिक 27 विद्रोही विधायक उन्हें पद से हटवाने के लिए दिल्ली में कैंप कर रहे थे जिनमें से 21 ने उनके खिलाफ दस्तखत भी कर दिए थे।
यदि ये 21 भाजपा से मिल जाते हैं तो अरुणाचल विधानसभा में तुकी सरकार की हार तय थी। हालांकि अरुणाचल विधानसभा का शीत सत्र 2016 में मध्य जनवरी में शुरू होना था। लेकिन राज्यपाल ने शीत सत्र से एक महीना पहले यानी 15 दिसंबर 2015 को ही हस्तक्षेप कर दिया। उनके इस कदम को राज्य में विद्रोही कांग्रेसी विधायकों की मदद से बीजेपी सरकार गठित करवाने के प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा था।
उस वक्त प्रदेश के राज्यपाल ने बहुमत परीक्षण के आदेश मुख्यमंत्री नबाम तुकी को दिये थे।
इसके बाद राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था। इस मामले में अरुणाचल प्रदेश के स्पीकर नबम रेबिया ने सुप्रीम कोर्ट में ईटानगर हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें उस वक्त के राज्यपाल जेपी राजखोआ ने विधानसभा के सत्र को एक महीने पहले बुला लिया था और उसे सही ठहराया गया था।
राज्यपाल ने विपक्ष के सदन के अध्यक्ष नबाम रेबिया को हटाने के प्रस्ताव को शीत सत्र का पहला एजेंडा भी बना दिया। हालांकि विधानसभा अध्यक्ष नबाम रेबिया ने 16 दिसंबर को सदन की कार्रवाई ही नहीं होने दी। उन्होंने 21 बागी विधायकों में से 14 को दलबदल कानून के तहत निलंबित करने का दावा भी किया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल को विधानसभा का सत्र बुलाने का अधिकार नहीं था। वह गैर-कानूनी था।
इसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था और कांग्रेस की नबाम तुकी की सरकार संकट में फंस गई थी। 21 विधायक के बागी होने के बाद उनकी पार्टी के 47 में से सिर्फ 26 विधायक रह गए थे। हालांकि इसके बाद में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला तुकी के खिलाफ ही दिया जब उन्होंने दूसरी सरकार बनने से रोकने की याचिका को नामंजूर कर दिया था।
इसके बाद नाराज हुए कालिखो ने बागी विधायकों और भाजपा विधायकों के साथ सरकार बना लगी थी।
मध्य प्रदेश में स्थिति अरुणाचल की तरह ही बनती नजर आ रही है। कांग्रेस का मानना है कि बागी हुए विधायक अगर बाहर आते हैं तो वह उनके साथ ही खड़े नजर आएँगे। 
वहीं भाजपा प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री और स्पीकर ने राज्यपाल के आदेश की अवहेलना की है। लेकिन यह तय है कि कांग्रेस के मुख्यमंत्री कमलनाथ के लिये आगे का रास्ता आसान नजर नहीं आ रहा है। लेकिन अगर अरुणाचल प्रदेश के मामलें को देखे तो केंद्र सरकार के लिए राष्ट्रपति शासन लगाना भी आसान नहीं होगा। (बीबीसी)
 


Date : 16-Mar-2020

अब्दुल्ला से मिले गुलाम नबी, कहा- 
जम्मू-कश्मीर का पुराना दर्जा वापस हो

श्रीनगर, 16 मार्च।
कांग्रेस के महासचिव और राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद ने नेशनल कांफ्रेंस प्रमुख फारुक अब्दुल्ला से मुलाकात की जिन्हें सात महीने से अधिक समय तक नजरबंद रखने के बाद शुक्रवार को रिहा किया गया था। आजाद ने जम्मू कश्मीर में हिरासत में लिए गए अन्य नेताओं को रिहा करने और लोकतंत्र बहाल करने की मांग की।
आजाद ने शनिवार दोपहर यहां के गुपकर इलाके में अब्दुल्ला से उनके आवास पर दो घंटे तक मुलाकात करने के बाद पत्रकारों से कहा कि जम्मू कश्मीर की प्रगति के लिए नेताओं को रिहा किया जाना चाहिए और उन्हें पिंजड़े में तोते की तरह नहीं रखना चाहिए।
कांग्रेस महासचिव ने पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती सहित अन्य सभी नेताओं को रिहा करने और राजनीतिक प्रक्रिया दोबारा शुरू करने की मांग की।
आजाद ने कहा कि राज्य में चुनाव कराया जाना चाहिए और जम्मू कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल किया जाना चाहिए। उन्होंने हाल में राज्य के पूर्व वित्तमंत्री अल्ताफ बुखारी के नेतृत्व में बनाई गई पार्टी 'जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी' को तवज्जो नहीं देते हुए कहा कि जम्मू कश्मीर को एजेंसी द्वारा गठित पार्टियों के जरिये नहीं चलाया जा सकता।
आजाद ने कहा कि वह कांग्रेस और संसद के अंदर एवं बाहर कश्मीर के नेताओं को रिहा करने के लिए आवाज उठाने वाले सांसदों और पार्टियों की ओर से अब्दुल्ला से मिलने आए हैं। उन्होंने कहा, 'कोई भी राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करने के लिए सबसे पहले जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र बहाल किया जाना चाहिए।'
जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 को बहाल करने के सवाल पर आजाद ने कहा, 'हमें चरणबद्ध तरीके से चलने दीजिए। पहले लोकतंत्र बहाल हो जाए। इसके बाद उस पर (अनुच्छेद 370) पर आएंगे।'
उन्होंने कहा, 'सबसे पहले हमें लोकतंत्र बहाल करनें दें और लोकतंत्र तब ही बहाल हो सकता है, जब खास प्रावधान के तहत जेलों अथवा गेस्ट हाउस में बंद नेताओं को रिहा किया जाए।'
जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री रहे आजाद ने कहा कि राजनीतिक प्रक्रिया जल्द शुरू होनी चाहिए।
उन्होंने कहा, 'जम्मू कश्मीर देश का सबसे बड़ा राज्य है। वर्ष 1947 में 560 रजवाड़ों का 12 राज्यों में विलय किया गया लेकिन जम्मू कश्मीर भारत का एकमात्र राज्य था जिसका किसी अन्य राज्य के साथ विलय नहीं किया क्योंकि यह काफी बड़ा था।'
आजाद ने कहा, 'यह अपमानजनक है, यह जम्मू कश्मीर के लोगों के लिए शर्मनाक है कि उनके राज्य का दर्जा केंद्रशासित प्रदेश में बदल दिया गया है। मैं चाहता हूं कि जम्मू कश्मीर के नेताओं को रिहा किया जाए और राज्य का दर्जा बहाल किया जाए।'
उन्होंने कहा, 'राजनीतिक प्रक्रिया लोकतंत्र का मूल अधिकार है। भारत दुनिया में अपने आकार के कारण नहीं बल्कि लोकतंत्र के लिए जाना जाता है, पर यह वह लोकतंत्र नहीं है जहां पर तीन पूर्व मुख्यमंत्री महीनों तक जेल में रहे और एक पूर्व मुख्यमंत्री उच्चतम न्यायालय की अनुमति लेकर यहां पर आया।'
आजाद ने सवाल किया, 'जब मुख्यमंत्री, सांसद, मंत्री, विधायक, विधान पार्षद जेल में हैं तो लोकतंत्र कहा हैं?'
कांग्रेस नेता ने कहा कि जम्मू कश्मीर के विकास के लिए राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करना जरूरी है। उन्होंने कहा, 'अगर जम्मू कश्मीर को विकास करना है और आगे बढऩा है, अगर हम जम्मू कश्मीर में समृद्धि लाना चाहते हैं तो इसकी कुंजी नेताओं को तोते की तरह पिंजड़े में रखने में नहीं है बल्कि उन्हें रिहा करने और राजनीतिक प्रक्रिया शुरू कर यहां चुनाव कराने में है। जम्मू कश्मीर की जनता द्वारा जो भी सरकार चुनी जाएगी वह यहां के विकास के लिए काम करेगी।'
उन्होंने कहा, 'यह खुशी की बात है कि साढ़े सात महीने बाद मैंने उनसे मुलाकात की। उन्हें इतने समय तक हिरासत में रखा गया जिसके कारणों की हमें जानकारी तक नहीं।'
उन्होंने कहा, 'हालांकि उमर और महबूबा मुफ्ती एवं अन्य को अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने से पहले हिरासत में लिया गया था।'
कांग्रेस नेता ने कहा कि सांसदों की हार्दिक इच्छा थी कि नेशलन कांफे्रंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला की रिहाई हो और उन्हें हिरासत में रखना सरकार की क्रूरता थी।
उन्होंने कहा, 'मैं यहां अकेला नहीं हूं। हम गत 40 साल से मित्र हैं और आगे भी रहेंगे। मैं यहां अपनी पार्टी के साथ-साथ लोकसभा और राज्यसभा के उन सांसदों और पार्टियों की ओर से भी हूं जिन्होंने संसद के भीतर और बाहर इन नेताओं की रिहाई के लिए आवाज उठाई। उन सभी सांसदों की हार्दिक इच्छा थी कि वह रिहा हों।'
मालूम हो कि करीब सात महीनों तक घर पर ही नजरबंद रखने के बाद अब्दुल्ला को शुक्रवार को रिहा किया गया था। सरकार ने जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री अब्दुल्ला के खिलाफ लगे जन सुरक्षा कानून (पीएसए) को भी हटा लिया है। (भाषा)


Date : 13-Mar-2020

नई दिल्ली, 13 मार्च । कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शुमार किए जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया का पार्टी छोडक़र भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना यह बताता है कि एक संगठन के तौर पर कांग्रेस कितनी अधिक संकट में है। ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया कांग्रेस के आला नेताओं में थे। उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि भाजपा की पूर्ववर्ती पार्टी जनसंघ की थी। वे उसे छोडक़र कांग्रेस में आए थे। लेकिन अगर आज यह स्थिति बनी है कि उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस को छोडक़र उसी पार्टी में जा रहे हैं जिसे छोडक़र उनके पिता बाहर निकले थे तो इसका एक स्पष्ट मतलब यह है कि कांग्रेस या तो कुछ बहुत गलत कर रही है या कुछ बेहद जरूरी काम नहीं कर रही है।

दिसंबर, 2018 में जब मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी, तब से ही ज्योतिरादित्य पार्टी के अंदर संघर्ष कर रहे थे और अंतत: जब उन्हें अपने मनमाफिक समाधान नहीं मिला तो उन्होंने कांग्रेस छोडक़र भारतीय जनता पार्टी में जाने का निर्णय कर लिया। कांग्रेस में नेतृत्व के स्तर पर स्पष्टता नहीं होने की वजह से ज्योतिरादित्य सिंधिया की समस्याओं का कोई समाधान या उसका कोई इशारा पार्टी में शीर्ष स्तर पर नहीं दिखा।
दरअसल, कांग्रेस में नेतृत्व का संकट 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद से लगातार गहराता ही जा रहा है। 2014 में भी कांग्रेस की करारी हार हुई थी। लेकिन उस हार को उस समय की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हार के तौर पर देखा गया।
इस पृष्ठभूमि में यह माना गया कि कांग्रेस का भविष्य राहुल गांधी हैं और अब पार्टी को आगे का सफर उनके ही नेतृत्व में तय करना है। इसी क्रम में राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बने। 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में उतरी। लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस अपने प्रदर्शन में कोई खास सुधार नहीं कर पाई। बल्कि खुद राहुल गांधी अमेठी से चुनाव हार गए।
इसके बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद कुछ दिनों तक यही पता नहीं चल रहा था कि कांग्रेस अध्यक्ष का पद किसके पास है। कुछ हफ्तों की माथापच्ची के बाद कांग्रेस के अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर पार्टी की कमान एक बार फिर से सोनिया गांधी ने संभाल ली। इसका मतलब यह निकाला गया कि कांग्रेस ने भविष्य की दिशा में जो कदम उठाए थे, उसे न सिर्फ पीछे लिया गया है बल्कि पार्टी एक बार फिर अपने अतीत में लौट गई है। 2014 में सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बारे में कहा जा रहा था कि अब इनके नेतृत्व का वक्त खत्म हो गया है और ये धीरे-धीरे नेपथ्य में चले जाएंगे।
लेकिन 2020 की कांग्रेस का सबसे कटु सत्य यही है कि आज भी सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को ही कांग्रेस का नेतृत्व करना पड़ रहा है। इसे हाल के एक उदाहरण के जरिए समझा जा सकता है। दिल्ली दंगों के बाद कांग्रेस की ओर से सबसे मजबूत बयान कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने दिया और उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग की। अर्थव्यवस्था की बदहाली और शासन से संबंधित मसलों पर कांग्रेस की ओर से सबसे विश्वसनीय ढंग से बात कहने का जिम्मा अब भी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कंधों पर है। हाल ही में मनमोहन सिंह ने एक लेख के जरिए अर्थव्यवस्था की हालत, सामाजिक वैमनस्य के माहौल और कोरोना वायरस के प्रबंधन जैसे मसलों पर नरेंद्र मोदी सरकार को घेरने का काम किया है।
यह स्थिति दिखाती है कि कांग्रेस भविष्य का सफर किन नेताओं के नेतृत्व में तय करेगी, इसे लेकर पार्टी में अभी कोई निर्णय नहीं लिया गया है। कांग्रेस पार्टी में नेतृत्व के संकट का सवाल न सिर्फ पार्टी के बाहर उठ रहा है बल्कि पार्टी के अंदर से भी पिछले कुछ दिनों में ऐसी कई आवाजें आई हैं। इस संदर्भ में आवाज उठाने वालों में शशि थरूर, संदीप दीक्षित, मनीष तिवारी, मणिशंकर अय्यर, अभिषेक मनु सिंघवी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सलमान सोज और संजय झा जैसे नेता शामिल हैं। इन नेताओं ने अपने-अपने ढंग से इस समस्या को उठाया है लेकिन सबकी बातों के मूल में नेतृत्व के सवाल को लेकर चिंता स्पष्ट है।
अब ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आजाद भारत में सबसे अधिक वक्त तक शासन करने वाली पार्टी को जब पिछले दो लोकसभा चुनावों में इतनी सीटें भी नहीं मिल पा रही हैं कि नेता प्रतिपक्ष का पद भी उसे मिल सके तो फिर इस पार्टी के लिए आगे की राह क्या होगी? लोकसभा के नियमों के हिसाब से नेता प्रतिपक्ष का पद पाने के लिए यह जरूरी है कि मुख्य विपक्षी पार्टी को लोकसभा की कुल सीटों में से दस प्रतिशत सीटें अनिवार्य तौर पर हासिल हों। जबकि पिछले दो लोकसभा चुनावों से कांग्रेस 55 सीटों के आंकड़े तक भी नहीं पहुंच पा रही है।
इन तथ्यों के आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा कि कांग्रेस अपने गठन से लेकर अब तक के सबसे बुरे दौर में है। पार्टी के लिए यह दौर इसलिए और अधिक बुरा है क्योंकि उसकी बुरी स्थिति सिर्फ चुनावी हार-जीत के मामले में नहीं है बल्कि यह भी स्पष्ट नहीं है कि पार्टी की कमान किन हाथों में होगी। यानी कि संकट से निपटने की बात तो दूर अभी यही स्पष्ट नहीं है कि वे कौन लोग होंगे जो पार्टी को इस संकट से निकालने की दिशा में कोशिश करेंगे।
जिन नेताओं ने पार्टी में नेतृत्व संकट का सवाल उठाया है, उन नेताओं ने भी इस संदर्भ में कोई ठोस और स्पष्ट सुझाव नहीं दिया है। लेकिन इनमें से कुछ नेताओं से और कांग्रेस के कुछ अन्य नेताओं से जब सत्याग्रह संवाददाता ने बातचीत की तो इससे यह बात निकलकर आई कि अब पार्टी के नेता प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर देखना चाह रहे हैं। वहीं कुछ ऐसे नेता भी हैं जो यह मानते हैं कि गांधी परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति के हाथों में पार्टी की कमान दे देनी चाहिए। लेकिन ऐसे नेताओं की संख्या और ऐसा होने की संभावना कांग्रेस पार्टी में कम लगती है।
जो नेता प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर देखना चाह रहे हैं, वे इस बात को लेकर उतने स्पष्ट नहीं दिखते कि 2024 के लोकसभा चुनावों को नरेंद्र मोदी बनाम प्रियंका गांधी बनाने पर काम करना चाहिए। इसका मतलब यह हुआ कि पार्टी अध्यक्ष के तौर पर तो प्रियंका गांधी को जो लोग चाह रहे हैं, वे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर प्रियंका गांधी को लेकर सशंकित हैं।
जब इन नेताओं से इस संभावना के बारे में बात की गई कि बतौर कांग्रेस अध्यक्ष प्रियंका गांधी और प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर राहुल गांधी को पेश करने से क्या कांग्रेस के मौजूदा संकट का समाधान हो सकता है तो पार्टी के अधिकांश नेताओं का रुख सकारात्मक दिखा। हालांकि, इस सकारात्मकता में भी कुछ आशंकाएं हैं लेकिन फिर भी ये एक बेहतर समीकरण लगता है। वहीं पार्टी के कुछ ऐसे नेता भी मिले जो कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर तो प्रियंका गांधी को चाहते हैं लेकिन प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर गांधी परिवार से किसी बाहर के व्यक्ति को पेश करने को राजनीतिक तौर पर अधिक उपयोगी मानते हैं।
अब इन बातों को सिलसिलेवार ढंग से समझने की कोशिश करते हैं। दिल्ली विधानसभा चुनावों में लगातार दूसरी बार कांग्रेस का खाता तक नहीं खुलने के बाद पूर्व सांसद संदीप दीक्षित ने यह सवाल उठाया कि कांग्रेस पार्टी की ओर से नेतृत्व संकट के समाधान के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है।
 संदीप दीक्षित दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी के नए अध्यक्ष के चुनाव के लिए कुछ नहीं किया। उन्होंने यह संकेत दिया कि दिल्ली विधानसभा चुनावों में हार की एक वजह यह भी है।
संदीप दीक्षित की बातों का समर्थन पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर ने भी किया। उन्होंने ट्विटर के जरिए कहा, ‘जो बात संदीप दीक्षित ने सार्वजनिक तौर पर कही है, वही बात देश भर के दर्जनों नेता निजी तौर पर कह रहे हैं। इनमें कई वैसे नेता भी हैं जो पार्टी में जिम्मेदार पदों पर हैं। मैं कांग्रेस कार्य समिति से एक बार फिर यह अपील करता हूं कि नेतृत्व का चुनाव पूरा किया जाए ताकि कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचार हो सके और और मतदाता भी उत्साहित हो सकें।’
थरूर ने चुनाव का एक फॉर्मूला भी दिया। वे कहते हैं, ‘कुछ लोग पूछ रहे हैं कि कौन लोग वोट देंगे और किसके लिए। आठ महीने पहले मैंने जो कहा था, उसे ही दोहरा रहा हूं। ये चुनाव 10,000 पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच होना चाहिए। इसमें अखिल भारतीय कांग्रेस समिति और प्रदेश कांग्रेस समिति के सदस्य शामिल हों। ये चुनाव कांग्रेस कार्य समिति की उन सीटों के लिए होना चाहिए जिनका निर्णय चुनाव के जरिए होता है और इसके जरिए ही पार्टी अध्यक्ष का भी चुनाव होना चाहिए।’
थरूर ने समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए एक साक्षात्कार में यह भी कहा कि कांग्रेस पार्टी को एक पूर्णकालिक और सक्रिय अध्यक्ष की जरूरत है, इसके बिना पार्टी को लेकर लोगों में भटकाव की धारणा बन रही है। इसी साक्षात्कार में जब शशि थरूर से प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने संबंधित सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘जो भी पार्टी नेता इस पद के लिए अपना नाम आगे करना चाहते हैं, उनके मैं न तो पक्ष में हूं और न विपक्ष में।  (बाकी पेजï 5 पर)
जब पार्टी अध्यक्ष के लिए चुनावों की आधिकारिक घोषणा होगी तो मुझे उम्मीद है कि वे अपना नाम आगे करेंगी। प्रियंका गांधी में एक प्राकृतिक करिश्मा है और उनके पास सांगठनिक अनुभव भी है। लेकिन अंतिम बात यही है कि यह उनका व्यक्तिगत निर्णय होगा और हमें उनके निर्णय का सम्मान करना चाहिए।’
कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर प्रियंका गांधी की दावेदारी को लेकर शशि थरूर ने जो बातें कहीं, उसमें वे बतौर कांग्रेस अध्यक्ष प्रियंका गांधी का खुलकर पक्ष लेते हुए नहीं दिख रहे हैं लेकिन यह संकेत जरूर दे रहे हैं कि अगर राहुल गांधी अध्यक्ष पद पर वापसी नहीं चाहते हैं तो प्रियंका गांधी एक मजबूत विकल्प हो सकती हैं।
हालांकि कांग्रेस के पुराने नेता कर्ण सिंह कांग्रेस अध्यक्ष के पद के लिए प्रियंका गांधी की खुलकर पैरवी करते हैं। कर्ण सिंह ने पीटीआई को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर प्रियंका गांधी कांग्रेस पार्टी को एकजुट करने वाली साबित होंगी। कर्ण सिंह कहते हैं, ‘पार्टी को नेतृत्वविहीन नहीं छोड़ा जा सकता। यह कांग्रेस के लिए ठीक नहीं है। अगर प्रियंका गांधी पार्टी अध्यक्ष बनने का निर्णय लेती हैं तो मैं इसका स्वागत करुंगा। लेकिन यह निर्णय उन्हें लेना है और उन पर इसके लिए दबाव नहीं बनाया जा सकता। अभी जो स्थितियां हैं और जिस परिवार से वे आती हैं, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि वे कांग्रेस को एकजुट करने का काम करेंगी।’
कर्ण सिंह आगे कहते हैं, ‘वो बहुत समझदार युवा महिला हैं। सोनभद्र मामले में वो वहां गईं और उन्होंने बहुत अच्छा काम किया। बहुत अच्छा बोलती हैं। उनका व्यक्तित्व प्रभावी है। अगर वे कांग्रेस अध्यक्ष बनने के लिए तैयार होती हैं तो उन्हें यह दायित्व क्यों नहीं दिया जाना चाहिए! उनके आने से कांग्रेस के लोगों में उत्साह पैदा होगा।’
जिस स्पष्टता के साथ बतौर कांग्रेस अध्यक्ष प्रियंका गांधी की वकालत कर्ण सिंह जैसे बुजुर्ग कांग्रेस नेता कर रहे हैं, उस तरह की बात पार्टी के वे नेता खुले तौर पर नहीं कह पा रहे हैं जिन्हें आगे भी राजनीति करनी है। जब सत्याग्रह संवाददाता ने कांग्रेस के कुछ वर्तमान नेताओं से इस बारे में बातचीत की तो इनमें से अधिकांश नेता प्रियंका गांधी को बतौर कांग्रेस अध्यक्ष देखना तो चाहते हैं लेकिन वे अपनी पहचान उजागर करके उनका पक्ष लेते हुए नहीं दिखना चाहते हैं। इनकी बातों से ऐसा लगता है कि अगर आज वे मजबूती से सार्वजनिक तौर पर प्रियंका गांधी के साथ खुलकर खड़े हो जाते हैं और कल कोई और नेता कांग्रेस अध्यक्ष बन जाता है तो उनके लिए आगे की राजनीति मुश्किल हो जाएगी। अब भी बतौर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की वापसी की संभावना भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है। साथ ही गांधी परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति को कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने की संभावना को भी सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है।
कांग्रेस के नेतृत्व संकट पर सवाल उठाकर चर्चा में आए पार्टी के एक पूर्व सांसद अपनी पहचान उजागर नहीं करने की शर्त पर सत्याग्रह को बताते हैं, ‘राहुल गांधी के प्रति मेरा पूरा सम्मान है। लेकिन बतौर कांग्रेस अध्यक्ष और बतौर कांग्रेस उपाध्यक्ष उन्होंने जिस तरह की राजनीति की है, उससे उनके प्रति लोगों में एक धारणा यह बनी है कि वे एक अनिच्छुक राजनेता हैं। उनके बारे में यह भी एक धारणा बनी है कि अभी की राजनीति में जितने दांव-पेंच की जरूरत है, उसमें उनका कोई खास यकीन नहीं है। साथ ही उन पर यह आरोप भी लगता है कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की तरह दिन-रात 24 घंटे वाली राजनीति नहीं करते। इसी आधार पर भाजपा के लोग राहुल गांधी को मौसमी नेता कहते हैं। लगातार दो लोकसभा चुनावों में बुरी हार के बाद कांग्रेस नेताओं को भी यह लग रहा है कि मोदी और शाह की भाजपा से निपटने के लिए कुछ अलग ढंग के नेतृत्व की जरूरत है।’
वे आगे कहते हैं, ‘इन नई जरूरतों के हिसाब से प्रियंका गांधी बतौर कांग्रेस अध्यक्ष अधिक उपयोगी दिखती हैं। कांग्रेस महासचिव बनाए जाने के बाद उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया। मैं 2019 लोकसभा चुनावों के परिणामों के संदर्भ में उनके प्रदर्शन को नहीं देखना चाहता। लेकिन आप देखिए कि चुनावों के बाद पूर्वी उत्तर प्रदेश में जनता के स्तर पर जो भी प्रदर्शन हुए और जहां भी यह लगा कि आम लोगों के खिलाफ सरकार अत्याचार कर रही है, प्रियंका गांधी वहां जाकर आम लोगों के साथ खड़ी हो गईं। सोनभद्र का मामला सबको पता है। दरअसल, चुनाव के दौरान तो नेतृत्व की परीक्षा होती ही है लेकिन चुनावों के बाद जो आम लोगों के रोजमर्रा के संघर्ष हैं, उनमें लोगों के साथ खड़ा होना ही नेतृत्व की असली परीक्षा है। प्रियंका गांधी जिस ढंग से पूर्वी उत्तर प्रदेश में आम लोगों के साथ खड़ी दिख रही हैं, उसका सकारात्मक परिणाम पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी दिख रहा है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के जो कांग्रेसी कार्यकर्ता आजकल मिलते हैं, उनमें अलग ढंग का उत्साह दिखता है। इसलिए मुझे लगता है कि संकट की इस घड़ी में अगर प्रियंका गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनती हैं तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में जो प्रयोग उन्होंने किया है, उसी प्रयोग को स्थानीय जरूरतों के हिसाब से संशोधित करके वे पूरे देश में कर सकती हैं। जाहिर तौर पर इससे पार्टी का संकट धीरे-धीरे कम होता जाएगा।’
मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे एक कांग्रेसी नेता प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने के फायदों को गिनाते हुए कहते हैं, ‘हम लोग जमीनी स्तर पर जब जाते हैं तो पाते हैं कि प्रियंका गांधी को लेकर लोगों में काफी क्रेज है। खास तौर पर युवाओं और महिलाओं में। जिस तरह से वे हिंदी बोलती हैं, उससे वे पूरी हिंदी पट्टी के लोगों के साथ संवाद स्थापित करने में सक्षम हैं। गुजरात और महाराष्ट्र जैसे लोगों को भी उनकी हिंदी पसंद आएगी। अंग्रेजी के जरिए वे दक्षिण भारत के लोगों से संवाद स्थापित करने में सक्षम हैं। कार्यकताओं में उनके प्रति उत्साह है। महिला होने के नाते महिलाओं के बीच उनकी खास अपील है। वे जिस भावनात्मक ढंग से संवाद स्थापित करती हैं, उसका फायदा भी पार्टी को मिलेगा। सबको मालूम है कि प्रियंका गांधी के एक बयान से रायबरेली में अरुण नेहरू चुनाव हार गए थे। टेलीविजन और इंटरनेट की दुनिया में जिस तरह से खबरें चलती हैं, उसमें प्रियंका गांधी का आकर्षक दिखना भी एक सकारात्मक पक्ष है।’
प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा पर कुछ आरोप हैं और उनके खिलाफ कुछ मामलों में जांच भी चल रही है। ऐसे में अगर प्रियंका गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनती हैं तो क्या इससे कांग्रेस को परेशानी नहीं होगी? इस सवाल के जवाब में जिस केंद्रीय मंत्री का जिक्र पहले किया गया है, वे कहते हैं, ‘उनके पति रॉबर्ट वाड्रा पर कुछ आरोपों को छोड़ दीजिए तो प्रियंका गांधी पर अब तक कोई दाग नहीं है। रॉबर्ट वाड्रा मामले में भी प्रियंका गांधी ने यह दिखा दिया है कि राजनीतिक तौर पर इसका सामना कैसे करना है। इसलिए अब पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को इसकी कोई खास चिंता नहीं है। सही बात तो यह है कि अगर प्रियंका गांधी कांग्रेस अध्यक्ष रहती हैं और चुनावों से पहले मोदी सरकार उनके पति के खिलाफ कार्रवाई करती है तो इसका चुनावी लाभ लेने में भी वे सक्षम हैं।’
मोटे तौर पर देखें तो पार्टी नेताओं में प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने पर एक राय दिखती है। इसकी वजह उनकी खूबियों के अलावा यह भी है कि अधिकांश कांग्रेसी नेताओं को लगता है कि अब भी गांधी परिवार ही एक ऐसी ताकत है जो पूरी कांग्रेस को एक सूत्र में बांधे रख सकती है। पार्टी नेताओं को यह भी लगता है कि अगर गांधी परिवार से बाहर का कोई व्यक्ति पार्टी अध्यक्ष बनता है तो इससे पार्टी में गुटबाजी अपने चरम पर पहुंच जाएगी।
इस बारे में कांग्रेस के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी कहते हैं, ‘इसे मैं अभी के उदाहरणों के जरिए समझाता हूं। गांधी परिवार केंद्रीय स्तर पर नेतृत्व दे सकता है लेकिन प्रदेश स्तर पर नहीं दे सकता। इसलिए आप देखेंगे कि अभी प्रदेश कांग्रेस के स्तर पर जबर्दस्त गुटबाजी देखने को मिल रही है। मध्य प्रदेश की स्थिति सबके सामने है। और अब तक यहां कांग्रेस के कम से कम तीन प्रमुख कैंप रहे हैं। मुख्यमंत्री कमलनाथ, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के कैंप। ऐसे ही राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट का संघर्ष दिख रहा है। पंजाब में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ संघर्ष की वजह से नवजोत सिंह सिद्धू ने मंत्री पद से इस्तीफा दिया। गुजरात कांग्रेस में भी यही चल रहा है। ऐसे में अगर पार्टी अध्यक्ष के तौर पर गांधी परिवार से बाहर का कोई व्यक्ति आता है तो कांग्रेस में केंद्रीय स्तर पर भी यही स्थिति पैदा हो सकती है। यानी कि राहुल गांधी पहले ही अध्यक्ष पद से हट गए हैं तो प्रियंका गांधी ही एकमात्र विकल्प बचती हैं।’
जिस तरह की सहमति प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने को लेकर दिखती है, उस तरह की सहमति कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने को लेकर नहीं दिखती। लेकिन अधिकांश नेता ऐसा मानते हैं कि इस योजना पर अभी से काम किया जा सकता है और 2024 के लोकसभा चुनावों से साल भर पहले स्थितियों का आकलन करके राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने या नहीं करने का निर्णय लिया जा सकता है। उम्मीदवारी को लेकर भले ही पूरी सहमति नहीं दिखती हो लेकिन अगर कांग्रेस को 2024 के चुनावों में जीत हासिल होती है तो उसके बाद राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने पर पार्टी में सहमति दिखती है।
दिल्ली की ही एक सीट से लोकसभा सांसद रहे और मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री रहे पार्टी के एक नेता इस बारे में कहते हैं, ‘बतौर कांग्रेस अध्यक्ष प्रियंका गांधी और अगर सरकार बनाने की स्थिति बनती है तो बतौर प्रधानमंत्री राहुल गांधी एक ऐसा समीकरण है जिसे कई चुनावों तक परास्त नहीं किया जा सकता। लेकिन मुझे लगता है कि राहुल गांधी को अभी से ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि इससे भाजपा एक बार फिर से चुनाव को मोदी बनाम राहुल कर देगी और इस प्रयोग में भाजपा दो बार सफल भी रही है। परिवारवाद का आरोप भी भाजपा आक्रामक ढंग से लगाएगी। ऐसे में पार्टी की रणनीति यह होनी चाहिए कि अभी प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जाए। लोकसभा के अंदर सरकार को घेरने का काम राहुल गांधी करें। गवर्नेंस से जुड़े मसलों पर मोदी सरकार पर प्रहार का काम वे करें। वहीं दूसरी तरफ सडक़ पर प्रदर्शन का नेतृत्व प्रियंका गांधी करें। चुनावों के पहले राहुल गांधी चुनाव अभियान समिति के प्रमुख बनाए जाएं। अगर चुनावों के बाद सरकार बनाने की स्थिति आती है तो प्रधानमंत्री का पद प्रियंका गांधी को नहीं बल्कि राहुल गांधी को दिया जाए।’
सरकार बनाने की स्थिति आने पर भी प्रियंका गांधी के पार्टी अध्यक्ष बने रहने और राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के फायदों के बारे में वे कहते हैं, ‘अभी के सियासी दांवपेंच आजमाने के मामले में राहुल गांधी से अधिक प्रभावी प्रियंका गांधी हैं। इसलिए अगर सरकार बनाने की स्थिति आती भी है तो प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए प्रदेश स्तर पर पार्टी को सांगठनिक तौर पर मजबूत करने का काम करते रहना चाहिए। जिस तरह का काम अमित शाह ने 2014 के बाद भाजपा के लिए किया। 2019 में भाजपा के अकेले 300 सीटों के पार पहुंचने की एक वजह यह भी थी। जबकि गवर्नेंस के स्तर पर राहुल गांधी अधिक उपयोगी होंगे। उनमें राजनीति को लेकर थोड़ी अनिच्छा का भाव भी है। ऐसे लोग सरकार चलाने में अधिक प्रभावी साबित होते हैं। मनमोहन सिंह का उदाहरण सबके सामने है। पार्टी में आंतरिक स्तर पर जो संघर्ष चलता है, उसके समाधान में भी ऐसे लोग अधिक प्रभावी साबित होते हैं। क्योंकि ऐसे लोग राजनीतिक तौर पर किसी के शत्रु नहीं होते बल्कि सबके प्रति एक ही भाव से काम करते हैं। ऐसे लोग सरकार चलाने के लिए कठोर निर्णय भी ले पाते हैं। प्रधानमंत्री के तौर पर ऐसा व्यक्ति इसलिए भी जरूरी है कि मोदी सरकार जो अर्थव्यवस्था विरासत के तौर पर अगली सरकार को देगी, उसमें समाधान के लिए कई कठोर निर्णय लेने होंगे। प्रधानमंत्री के तौर पर राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष के तौर पर प्रियंका गांधी की जोड़ी मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की तरह साबित हो सकती है। मैं याद दिलाना चाहता हूं कि चाहे जितना भी आरोप लगा हो लेकिन सोनिया और मनमोहन की जोड़ी ने दस साल तक पार्टी और सरकार चलाने का काम प्रभावी ढंग से किया।’
हालांकि, सोनिया-मनमोहन के मुकाबले प्रियंका-राहुल की जोड़ी एक मायने में अलग होगी। इसकी चर्चा किसी कांग्रेसी नेता ने नहीं की। इस बारे में कुरेदने पर भी ये नेता कुछ कहने से बचते हुए ही दिखे। मनमोहन सिंह पर यह आरोप लगता था कि भले ही वे प्रधानमंत्री हों लेकिन उनकी सरकार का रिमोट कंट्रोल सोनिया गांधी के पास था। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के यह आरोप उनकी जोड़ी पर नहीं लग पाएगा।(सत्याग्रह)

 


Date : 13-Mar-2020

नई दिल्ली, 13 मार्च । भारतीय जनता पार्टी को ज्वाइन करने वाले दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया पर अब उनकी पूर्व पार्टी कांग्रेस अलग-अलग तरह के सवाल उठा रहे हैं। मध्य प्रदेश कांग्रेस के ट्विटर हैंडल द्वारा न सिर्फ सवाल पूछे गए, बल्कि लगातार उनपर तंज कस रही है। शुक्रवार को एमपी कांग्रेस ने ट्वीट करते हुए 6 सवाल उठाए। ट्वीट में लिखा, सिंधिया समर्थकों के सवाल- क्या बीजेपी उन सभी को टिकट देगी? क्या बीजेपी का कार्यकर्ता उन्हें स्वीकारेगा? क्या बीजेपी अपने स्थापित नेताओं को छोड़ेगी? क्या मिश्रा-तोमर-झा राजनीतिक क़ुर्बानी देंगे? क्या अब भी सिंधिया पर कोई भरोसा करेगा? क्या क्षेत्र की जनता को क्या मुंह दिखायेंगे?
ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीजेपी में जाने से कांग्रेस का बड़ा झटका लगा है। मध्यप्रदेश कांग्रेस ने ट्विटर के जरिए सिंधिया पर तंज कसते हुए दो ट्वीट किए। 
उन्होंने पहला ट्वीट करते हुए लिखा, तेरी वजह से कम, तेरे लिये ज़्यादा दुखी हैं।।।वहीं दूसरा ट्वीट किया, आज सम्मान की परिभाषा भी अलग है, लोग विभीषण कहलाकर मुस्कुरा रहे हैं। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव एवं मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गुरूवार को प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ  को रावण और कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया को विभीषण बताया था। कांग्रेस ने इस पर ट्वीट करते हुए सिंधिया पर तंज कसा। 
वहीं, ज्योतिरादित्य सिंधिया बीजेपी में आने के बाद भोपाल पहुंचे तो उनका जोरदार स्वागत किया गया। हवाई अड्डे से प्रदेश भाजपा कार्यालय तक रैली निकाली गई। हवाई अड्डे पर आने के बाद सिंधिया को एक बड़ी रैली के रुप में भोपाल के नए शहर में स्थित प्रदेश भाजपा कार्यालय में लाया गया। सिंधिया के साथ विशेष विमान से केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर भी यहां आए।
कर्नाटक में 76 साल के बुजुर्ग की मौत, कोरोना वायरस और आम जुकाम-बुखार में कैसे फर्क पहचानें
नई दिल्ली, 13 मार्च (एनडीटीवी)। भारत में कोरोना वायरस से पहली मौत का सामने आया है। कर्नाटक के कलबुर्गी में सऊदी अरब से लौटे 76 साल के बुज़ुर्ग की कोरोना वायरस से मौत हुई है।
भारत में कोरना वायरस से हुई ये पहली मौत है। कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री बी श्रीरामुलु ने ट्वीट कर इसकी जानकारी दी है। उन्होंने ट्वीट में ये भी लिखा है कि जो भी लोग मृतक बुज़ुर्ग के संपर्क में आए थे, उनकी पहचान की जा रही है और आइसोलेशन समेत तमाम ज़रूरी प्रोटोकॉल का पालन किया जाएगा। उधर  कोरोना वायरस को फ़ैलने से रोकने के लिए सरकार ने कई देशों के वीजा रद्द कर दिए हैं। वीज़ा पाबंदियां दोपहर 12 बजे से  लागू हो जाएगीं। 
भारत में फिलहाल 74 लोग इस वायरस से संक्रमित हैं और इसके प्रसार को रोकने के लिए दिल्ली सहित कुछ अन्य जगहों पर स्कूल, कॉलेज तथा सिनेमाघर बंद करने के आपात उपाय किये गये हैं। कोरोना वायरस से संक्रमित 74 लोगों में 17 विदेशी नागरिक हैं। इनमें 16 इतालवी हैं और कनाडा का एक नागरिक है। इन आंकड़ों में केरल के वे तीन मरीज भी शामिल हैं जिन्हें स्वस्थ होने के बाद पिछले महीने अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी।
मंत्रालय ने राज्यवार आंकड़े बताते हुए कहा कि दिल्ली में गुरुवार तक कोरोना वायरस के छह मामले सामने आ चुके हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में 10 लोग इससे संक्रमित पाए गए हैं। कर्नाटक में चार, महाराष्ट्र में 11 और लद्दाख में तीन मामले सामने आए हैं।
केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने गुरुवार को कहा कि देश में कुल 14 नए मामलों की पुष्टि हुई है जिनमें से नौ महाराष्ट्र में हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय के मुताबिक सरकार ने देश में कोरोना वायरस के संक्रमण का प्रसार होने के मद्देनजर केंद्रीय हेल्पलाइन नंबर 011-23978046 शुरू किया है। इसके अलावा 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी हेल्पलाइन नंबर शुरू किए गए हैं।
क्या फर्क है सामान्य जुकाम-बुखार और कोरोना वायरस में
हालांकि कोरोना वायरस और सामान्य जुकाम-बुखार में फर्क है। इसको लेडी हॉर्डिंग अस्पताल के मेडिसिन विभाग निदेशक प्रोफेसर अनिल गुर्टू बहुत ही आसान शब्दों में बताया है। उन्होंने बताया कि कोरोना वायरस से प्रभावित होने वालों को दो मुख्य लक्षण हैं। पहला पिछले 10 दिन में 104 डिग्री बुखार आया हो, क्योंकि कोरोना वायरस का असर 10 दिन में खत्म हो जाता है और दूसरा लक्षण खांसी। (एनडीटीवी)

 


Date : 13-Mar-2020

नई दिल्ली, 13 मार्च। हाल ही में कांग्रेस का साथ छोड़ बीजेपी में शामिल होकर हलचल मचाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया के कथित जमीन घोटाले मामले में आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ ने फिर से जांच शुरू कर दी है। ये मामला 10 हजार करोड़ की जमीन के घोटाले का है। उनपर एक ही जमीन को कई बार बेचने का आरोप  है। साथ ही सरकारी जमीन को भी बेचने का आरोप है। वर्ष 2014 में मामले की जांच हो चुकी है।
गौरतलब है कि कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल होते वक्त ज्योतिरादित्य सिंधिया पुरानी पार्टी पर खूब बरसे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफों के पुल बांधे। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ड़ता की शिकार हो गई है और नए नेतृत्व के लिए सही वातावरण नहीं है। उन्होंने मध्य प्रदेश की  कांग्रेस सरकार पर किसानों-युवाओं से किए वादे न निभाने तथा भ्रष्टाचार में डूबे रहने का आरोप लगाया। बीजेपी में शामिल करने के लिए मोदी का धन्यवाद देते हुए सिंधिया ने कहा कि देश के इतिहास में शायद किसी को भी इतना बड़ा जनादेश नहीं मिला, जितना कि एक बार नहीं दो बार हमारे प्रधानमंत्रीजी को मिला है। ज्योतिरादित्य सिंधिया को भाजपा की सदस्यता दिलाते हुए पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि राजमाता विजयराजे सिंधिया ने भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी की स्थापना और विस्तार करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। जेपी नड्डा ने  कहा, आज उनके पौत्र हमारी पार्टी में आए हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया परिवार के सदस्य हैं और हम उनका स्वागत करते हैं। 
पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते सिंधिया को निकाला
सिंधिया के इस्तीफा देने के बाद कांग्रेस ने कहा था कि पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते सिंधिया को निष्कासित किया गया है। कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने एक बयान में कहा, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण सिंधिया को तत्काल प्रभाव से निष्कासित करने को स्वीकृति प्रदान की। (लाइव हिन्दुस्तान)
 


Date : 12-Mar-2020

ज्योतिरादित्य से क्या बीजेपी में सभी खुश हैं?

अदिती फडनिस

नई दिल्ली, 12 मार्च। मध्यप्रदेश में 2018 के विधानसभा चुनाव के दौरान खींची गई तस्वीरों में से ज्योतिरादित्य सिंधिया की तस्वीरें, जहन में बिल्कुल अलग और एक स्थायी छाप छोड़ती हैं। इन तस्वीरों में वो पसीने से तर-बतर, मैले कुचैले कपड़ों में और अस्त-व्यस्त नजर आते हैं।
ज्योतिरादित्य सिंधिया को मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों में प्रचार कमेटी का प्रमुख बनाया गया था। और उन्होंने पार्टी को जिताने में अपना खून-पसीना एक कर दिया था। उस चुनाव में जब बीजेपी ने अपना प्रचार अभियान शुरू किया, तो पार्टी ने नारा दिया था - माफ करो महाराज, हमारे नेता शिवराज। इस नारे के साथ ही साथ बीजेपी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया की छवि एक शाही और सामंतवादी नेता के रूप में गढऩे की कोशिश की थी। वहीं, उस वक्त के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान को एक किसान के बेटे के तौर पर प्रचारित किया गया था।
बीजेपी की तरफ से अपनी छवि को धूमिल करने के इस प्रचार के बावजूद, ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस पार्टी की तरफ से प्रचार करने और उसे जिताने में पूरी ताकत झोंक दी थी। उन्हें ये अपेक्षा थी कि जब वक्त आएगा, तो पार्टी उन्हें इस मेहनत का इनाम तो देगी ही।
लेकिन, न तो ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपना खून-पसीना बहाने का कोई फल मिला और न ही उनके खेमे के मंत्रियों को। कमलनाथ सरकार में सिंधिया गुट के छह विधायकों को मंत्री बनाया गया था। इनके नाम हैं-इमरती देवी, गोविंद सिंह राजपूत, प्रद्युम्न सिंह तोमर, तुलसीराम सिलावत, प्रभुराम चौधरी और महेंद्र सिंह सिसोदिया। इसके अलावा, ग्वालियर, चंबल और मालवा इलाके के करीब 22 अन्य विधायक भी ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ थे।
सिंधिया को लगा कि अगर उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया, तो कम से कम उनके एक करीबी को उप-मुख्यमंत्री का पद तो दिया ही जाना चाहिए। लेकिन, कांग्रेस पार्टी का आलाकमान इस मामले में भी हीला-हवाली करता रहा।
इसके बाद ज्योतिरादित्य ने राज्य में अपनी ही पार्टी की सरकार को किसी न किसी मुद्दे पर निशाना बनाना शुरू कर दिया। इसकी शुरुआत उन्होंने अवैध खनन माफिया के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की मांग उठा कर की। इसके बाद उन्होंने ट्विटर पर अपने बायो में से कांग्रेस का नाम हटा दिया।
हाल ही में ज्योतिरादित्य ने कहा कि अगर पार्टी, अपने चुनाव घोषणापत्र में किए गए अपने वादे से पीछे हटेगी, तो वो इसके खिलाफ सड़क पर उतरेंगे।
ज्योतिरादित्य की इस चेतावनी के जवाब में मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा कि, अगर वो सड़क पर उतरना चाहते हैं, तो उतरें।
ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जम्मू-कश्मीर से संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने का भी समर्थन किया। इस मुद्दे पर सिंधिया का ये स्टैंड उनकी अपनी पार्टी के स्टैंड से बिल्कुल उलट था। फिर भी पार्टी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को कोई तवज्जो नहीं दी।
कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के गठजोड़ ने सिंधिया को ये एहसास कराया कि वो पार्टी के विशिष्ट नेताओं के समूह का हिस्सा नहीं हैं। ठीक उसी तरह जैसा करीब 57 साल पहले उनकी दादी के साथ किया गया था।
ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी, विजयाराजे सिंधिया के साथ उस वक्त के कांग्रेसी मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा ने बहुत बुरा बर्ताव किया था।
डीपी मिश्रा, मध्य प्रदेश के पहले कांग्रेसी सीएम थे। इस बेरुखी से आहत राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने अपने समर्थक 37 विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़ दी और जनसंघ में शामिल हो गईं थीं।
आज ऐसा लगता है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी कांग्रेस की तरफ से अपनी उपेक्षा के खिलाफ अपनी दादी जैसा ही स्टैंड लिया है।
1980 में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान ली गई इस तस्वीर में राजमाता विजया राजे सिंधिया बीजेपी नेता अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के साथ हैं।
ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोडऩे के फैसले पर आखिरी मुहर इन अटकलों ने लगाई कि पार्टी की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा को मध्य प्रदेश से राज्यसभा में भेजा जा सकता है। अप्रैल में मध्य प्रदेश की तीन राज्यसभा सीटें खाली हो रही हैं। इनमें से दो सीटें कांग्रेस जीत सकती थी। इनमें से एक सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह का दोबारा राज्यसभा के लिए चुना जाना माना जा रहा था। वहीं, ज्योतिरादित्य सिंधिया दूसरी सीट से खुद राज्यसभा सांसद बनना चाह रहे थे। हाल के कुछ महीनों में अपने कई मजबूत गढ़ गंवाने के बाद, बीजेपी मध्य प्रदेश में अपनी सरकार बनाने को लेकर काफी उत्सुक है।
अभी ज़्यादा दिनों पुरानी बात नहीं है, जब बीजेपी के सांसद गणेश सिंह ने कहा था, ज्योतिरादित्य सिंधिया को न तो कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बनाया और न ही पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का पद दिया। कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं है।
कांग्रेस सरकार ने भी मध्य प्रदेश में कोई बहुत अच्छा काम नहीं किया है। केंद्रीय स्तर पर नेतृत्व के अभाव में जहां कांग्रेस लडख़ड़ा रही है वहीं, मध्य प्रदेश में पार्टी के पास नेताओं की भरमार है।
मुख्यमंत्री के तौर पर कमलनाथ को हर ख़ेमे की मांग को पूरी करने पर मजबूर होना पड़ा है। इसका नतीजा ये हुआ है कि बहुत सी सरकारी योजनाएं अधर में लटकी हुई हैं।
इसके बरअक्स, केंद्रीय शहरी विकास और भूतल परिवहन मंत्री के तौर पर कमलनाथ का रिकॉर्ड बहुत अच्छा रहा है। लेकिन, मुख्यमंत्री के रूप में उनका शासन उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार के लिए बदनाम हो चुका है।
खास तौर से राज्य के अधिकारियों की पोस्टिंग और तबादलों के मामले में तो कमलनाथ सरकार कुछ ज़्यादा ही बदनाम हो गई है।
पिछले हफ्ते सूबे के पर्यावरण और लोक निर्माण मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने अपनी ही सरकार पर हल्ला बोल दिया, जब उन्होंने ट्वीट किया कि, मुख्यमंत्री की किचेन कैबिनेट (अनाधिकारिक सलाहकारों) में वरिष्ठ अधिकारियों का दबदबा है। मुझे इससे बहुत तकलीफ हो रही है क्योंकि हम किसी भी अधिकारी की पोस्टिंग नहीं करा पा रहे हैं। अगर अधिकारियों की पोस्टिंग कुछ गिने चुने अधिकारियों के इशारे पर होती रहेंगी, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे।
सज्जन वर्मा ने अपने इस ट्वीट के बाद इंदौर में एक सार्वजनिक सभा में भी सरकार के कामकाज पर सवाल उठाए। जब उन्होंने कहा कि इंदौर जैसे शहरों में जो अधिकारी मलाईदार पदों पर बैठे हुए हैं, वो किसी राजनेता की सिफारिश की वजह से नहीं हैं। बल्कि, उन्हें ये मलाईदार पद इसलिए मिले हैं, क्योंकि इन अधिकारियों की सीधी पहुंच मुख्यमंत्री कमलनाथ के दफ्तर तक है।
वर्मा ने कहा कि, मुझे सच बोलने में कोई डर नहीं है। मैं मुख्यमंत्री तक उन कार्यकर्ताओं की भावनाओं को निश्चित रूप से पहुंचाउंगा, जिन्होंने इस सरकार को सत्ता में लाने के लिए पंद्रह वर्षों तक संघर्ष किया है। ये सरकार बाकी लोगों के लिए तो है, लेकिन अपने ही कार्यकर्ताओं का काम नहीं कर रही है। पार्टी के कार्यकर्ता अभी भी परेशान हैं।
सज्जन सिंह वर्मा ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की गतिविधियों पर भी अपने विचार सार्वजनिक रूप से रखे।
वर्मा ने कहा, हमने तस्वीरों में देखा है कि किस तरह दिग्विजय सिंह, बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय को भरोसा दे रहे हैं कि चिंता मत कीजिए। ये सरकार हम चला रहे हैं। आप को और आप के साथियों को कुछ नहीं होगा।
इन बयानों के बावजूद सज्जन सिंह वर्मा के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई। अब बीजेपी और कांग्रेस, दोनों पार्टियों ने एहतियात बरतते हुए अपने विधायकों को राज्य से बाहर भेज दिया है।
टूट से रोकने के लिए कांग्रेस के विधायकों को जयपुर में रखा गया है, तो बीजेपी के विधायक गुरुग्राम के होटल में ठहराए गए हैं। लेकिन, आखिर में तो बहुमत का फैसला विधानसभा के पटल पर ही होगा।
क्या मध्य प्रदेश में बदलेगी सरकार?
सवाल ये है कि क्या कांग्रेस में ज्योतिरादित्य सिंधिया के वफ़ादार विधायक भी बीजेपी के पाले में चले जाएंगे?
अगर ऐसा होता है, तो इन कांग्रेसी विधायकों के विधानसभा क्षेत्रों में कार्यरत बीजेपी के कार्यकर्ताओं का क्या होगा?
ये कार्यकर्ता बरसों से कांग्रेस के इन्हीं नेताओं (जो अब बीजेपी में शामिल हो सकते हैं) को हराने के लिए कड़ी मेहनत करते रहे हैं। क्या इन कांग्रेसी नेताओं के बीजेपी में शामिल होने से बीजेपी में खेमेबंदी और नहीं बढ़ेगी?
ज्योतिरादित्य सिंधिया के अपने लोकसभा क्षेत्र गुना को ही लीजिए। ज्योतिरादित्य, 2019 के लोकसभा चुनाव में इस सीट से हार गए थे। उन्हें बीजेपी के कृष्णपाल यादव ने हराया था, जो डॉक्टर हैं और एक वक्त ज्योतिरादित्य सिंधिया के ही कारिंदे के तौर पर जाने जाते थे।
कई मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जब बीजेपी ने गुना सीट से कृष्णपाल यादव को अपना उम्मीदवार बनाने का एलान किया था, तब ज्योतिरादित्य सिंधिया की पत्नी प्रियदर्शिनी राजे सिंधिया ने बीजेपी नेता कृष्णपाल यादव की अपने पति के साथ की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए उनका मजाक उड़ाया था।
प्रियदर्शिनी ने लिखा था कि कभी महाराज के साथ एक सेल्फ़ी के लिए कतार में खड़ा होने वाला आदमी, अब उनके खिलाफ बीजेपी का उम्मीदवार है।
कृष्णपाल यादव कभी ज्योतिरादित्य सिंधिया के बेहद करीबी हुआ करते थे और उनके चुनाव प्रचार की कमान संभाला करते थे। लेकिन, पिछले विधानसभा चुनाव के बाद हालात ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ जाने लगे, जब कृष्णपाल यादव ने कांग्रेस छोडऩे का फैसला किया।
कृष्णपाल ने कांग्रेस छोडऩे का एलान तब किया था, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया उनकी अनदेखी करने लगे थे। कृष्णपाल का कहना था कि पार्टी के नेतृत्व ने इस इलाके में उनकी कड़ी मेहनत की अनदेखी की है। कृष्णपाल के पिता भी कांग्रेस के ही कार्यकर्ता रहे थे। वो कांग्रेस की अशोक नगर जिला इकाई के प्रमुख रहे थे। लेकिन, 2019 के लोकसभा चुनाव में कृष्णपाल यादव ने ज्योतिरादित्य को एक लाख 25 हजार से ज़्यादा वोटों के अंतर से हराया था। अब जाहिर है कि सिंधिया के बीजेपी में आने से कृष्णपाल यादव तो खुश नहीं ही होंगे। (बीबीसी)


Date : 09-Mar-2020

नई दिल्ली, 9 मार्च। मध्यप्रदेश में जारी भारी सियासी उठापटक के बीच सीएम कमलनाथ दिल्ली रवाना हो गए। मुख्यमंत्री कमलनाथ दिल्ली में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात कर सकते हैं। माना जाता है कि उनके इस दौरे में राज्यसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों का फैसला हो सकता है। मध्यप्रदेश में रिक्त हो रहीं तीन राज्यसभा सीटों के लिए 26 मार्च को चुनाव होना है। इसके लिए नामांकन 13 मार्च तक किए जा सकते हैं।
कांग्रेस और बीजेपी की विधानसभा में मौजूदा सीटों को देखते हुए कांग्रेस के खाते में तीन में से दो सीटें आने की संभावना बनी हुई है। कांग्रेस में यह दो सीटें सुनिश्चित करने के लिए उम्मीदवारों के नामों को लेकर मंथन चल रहा है। मध्यप्रदेश से कांग्रेस की ओर से ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह को बड़ा दावेदार माना जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार सीएम कमलनाथ अगले दो दिन तक दिल्ली में रहेंगे। इस दौरान उनकी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात होने की संभावना है। इन मुलाकातों के दौरान ही राज्यसभा के लिए उम्मीदवारों के नाम तय किए जा सकते हैं।
गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में पिछले मंगलवार से सियासी ड्रामा जारी है। बीजेपी पर कांग्रेस का आरोप  है कि उसने उसके चार विधायकों का अपहरण कर लिया। यह कमलनाथ सरकार को अस्थिर करने के लिए किया गया। हालांकि बीजेपी ने इस आरोप से इनकार किया है। बीजेपी के नेता नरोत्तम मिश्रा का कहना है कि यह सरकार खुद ब खुद गिर जाएगी, बीजेपी को उसे गिराने की जरूरत नहीं है। दूसरी तरफ लापता चार विधायकों में से एक निर्दलीय एमएलए सुरेंद्र सिंह शेरा भैया शनिवार को भोपाल लौट आए और उन्होंने अपहरण की बात से इनकार किया।
मध्यप्रदेश में मचे इस सियासी घमासान के बीच राज्यसभा की तीन सीटों के लिए चुनाव हो रहे हैं। इन हालात में कांग्रेस के सामने कमलनाथ सरकार को सुरक्षित रखने और साथ ही राज्यसभा की दो सीटें सुनिश्चित करने की भी चुनौती है। (भाषा)


Date : 08-Mar-2020

नई दिल्ली, 8 मार्च । जम्मू और कश्मीर में रविवार का दिन सियासी तौर पर अहम होने जा रहा है। पूर्व मंत्री अल्ताफ बुखारी रविवार को श्रीनगर के लाल चौक पर अपना राजनीतिक दल लॉन्च करेंगे। इस नए राजनीतिक दल का नाम होगा अपनी पार्टी।
माना जा रहा है कि महबूबा मुफ्ती की पीडीपी और उमर अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस के असंतुष्ट नेता अल्ताफफ बुखारी के झंडे का दामन थाम सकते हैं। अल्ताफ बुखारी ने कश्मीर की स्वायत्ता खत्म करने के केंद्र सरकार के फैसले का स्वागत किया था। सात महीनों के सियासी सन्नाटे के बाद वे कश्मीर की एकमात्री राजनीतिक आवाज होने जा रहे हैं।
अल्ताफ बुखारी को भारतीय जनता पार्टी का करीबी माना जाता है। कई लोगों की राय ये भी है कि अल्ताफ बुखारी कश्मीर की नई सियासत का चेहरा बनने जा रहे हैं। (बीबीसी)


Date : 08-Mar-2020

नई दिल्ली, 8 मार्च । यस बैंक को लेकर सरकार को घेर रही कांग्रेस पार्टी अब प्रियंका गांधी और बैंक के फाउंडर राणा कपूर के बीच सौदे पर सफाई देती फिर रही है तो बीजेपी ने कहा है कि भारत में हर वित्तीय अपराध गांधी परिवार से जुड़ा होता है। राणा कपूर की गिरफ्तारी के बाद यह जानकारी सामने आई है कि कांग्रेस पार्टी की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा की पेंटिंग्स राणा कपूर ने 2 करोड़ रुपये में खरीदी थी। 
शनिवार को ईडी के छापे के बाद राणा कपूर को आज सुबह गिरफ्तार किया गया है। शुक्रवार को बीजेपी ने राणा कपूर के साथ पी. चिदंबरम की तस्वीरें दिखाते हुए कांग्रेस पार्टी को घेरा था। हमारे सहयोगी चैनल टाइम्स नाउ को मिली जानकारी के मुताबिक, यूपीए सरकार के दौरान प्रियंका गांधी की पेंटिंग्स को राणा कपूर ने 2 करोड़ रुपये में खरीदा था। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट भी इस मामले की जांच में जुटा है।
कांग्रेस पार्टी ने प्रियंका गांधी और राणा कपूर के बीच हुए सौदे को स्वीकार किया है। हालांकि, पार्टी इसे दोनों के बीच लिंक मानने से इनकार कर रही है। पार्टी नेता राशिद अल्वी ने कहा, इससे क्या होगा। अगर प्रियंका गांधी ने कोई चीज बेची है और किसी ने खरीदी है, खरीदार को देखा नहीं जाता। जो पैसे देता है वह खरीद लेता है। अगर मोदी जी चाहते तो मोदी जी खरीद लेते। तो क्या आप यह आरोप लगाते कि सारी सरकार प्रियंका गांधीजी चला रही हैं, मोदी जी के जरिए, चूंकि उन्होंने पेटिंग खरीदी है।
बीजेपी के आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने कहा, भारत में हर वित्तीय अपराध गांधीज से जुड़ा होता है। माल्या सोनिया गांधी के फ्लाइट टिकट अपग्रेड करता था। एमएमएस (मनमोहन सिंह) और पीसी (पी चिदंबरम) तक पहुंच थी, अब भगोड़ा है। राहुल ने नीरव मोदी के जूलरी कलेक्शन का उद्घाटन किया, उसने डिफॉल्ट किया। राणा ने प्रियंका गांधी की पेंटिंग्स खरीदी। (नवभारतटाईम्स)


Date : 06-Mar-2020

सरकार बचाने कमलनाथ करेंगे मंत्रिमंडल का विस्तार?
नई दिल्ली, 6 मार्च। मध्यप्रदेश में पिछले पांच-छह दिनों से चल रहे सियासी घटनाक्रमों के बीच कांग्रेस विधायक हरदीप सिंह डंग के इस्तीफे के बाद कभी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का पलड़ा भार दिखता है, तो कभी कमलनाथ सरकार का। कांग्रेस ने जहां एक ओर अपने दिल्ली लाए गए विधायकों को अपने खेमे में वापस लेने के साथ ही पार्टी बीजेपी में सेंधमारी करती दिख रही है। बीजेपी के विधायक शरद कौल ने मुख्यमंत्री कमलनाथ से मुलाकात की है, जिसके बाद मैहर से विधायक नारायण त्रिपाठी ने विधायकी से इस्तीफा दे दिया। वहीं, विधायक त्रिपाठी ने इस्तीफा देने से अभी इंकार किया है। माना जा रहा है कि यह विधायक आज (शुक्रवार को) कांग्रेस में शामिल होंगे। 
कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा है कि बजट सत्र के बाद कैबिनेट का विस्तार किया जाएगा। कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ कांग्रेस के सीनियर नेता केपी सिंह, आदिवासी नेता बिसाहूलाल सिंह और सुमावली के विधायक ऐदल सिंह कंसाना को मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है। ये दिग्विजय सरकार में भी मंत्रिमंडल में रहे थे। बीएसपी और निर्दलीय विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है। आपको बता दें कि मध्य प्रदेश कैबिनेट में अभी पांच मंत्री पद खाली पड़े हैं।
कमलनाथ से देर रात मिले बीजेपी विधायक
बीजेपी विधायक नारायण त्रिपाठी ने मुख्यमंत्री निवास पहुंचकर मुख्यमंत्री कमलनाथ से मुलाकात की। इस दौरान उनके त्यागपत्र की भी खबर उड़ गई, हालांकि मुलाकात के बाद गुरुवार रात लगभग 12 बजे मुख्यमंत्री निवास के बाहर त्रिपाठी ने मीडिया से त्यागपत्र से इंकार किया और दावा किया कि वे अपने विधानसभा क्षेत्र मैहर के विकास के संबंध में मुख्यमंत्री से मिलने गए थे। त्रिपाठी के साथ ही बीजेपी के एक अन्य विधायक के मुख्यमंत्री निवास पहुंचने की खबरें भी आईं। डंग के इस्तीफे के बाद दो बीजेपी विधायकों के मुख्यमंत्री निवास पहुंचने के घटनाक्रम को नहले पर दहले के रूप में देखा जा रहा था, लेकिन मध्य रात्रि में साफ हुआ कि किसी भी बीजेपी विधायक का त्यागपत्र नहीं हुआ है। माना जा रहा है कि इस दौरान ताजा राजनैतिक हालातों पर मंथन हुआ और भविष्य की सत्तारूढ़ दल की रणनीति भी तय की गई।
दिल्ली से भोपाल पहुंचे दिग्विजय सिंह
राजनैतिक घटनाक्रमों के बीच वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह भी शुक्रवार को दिल्ली से भोपाल पहुंच रहे हैं। उनके कार्यालय की ओर से गुरुवार रात ही बताया गया कि दिग्विजय का शुक्रवार का उत्तरी अंचल और ओरछा का दौरा निरस्त कर दिया गया है और वे भोपाल में ही रहेंगे। वहीं मुख्यमंत्री राजधानी में हैं और शाम को उनका ओरछा जाने का कार्यक्रम है।
बीजेपी के सभी नेता दिल्ली में मौजूद
दूसरी ओर भाजपा के वरिष्ठ नेता शिवराज सिंह चौहान और अन्य नेताओं के दिल्ली में ही रहने की खबरें हैं। माना जा रहा है कि कथित ऑपरेशन लोटस दिल्ली से ही संचालित हो रहा है। कांग्रेस के लापता विधायक बिसाहूलाल सिंह, हरदीप सिंह डंग और रघुराज कंसाना तथा निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह शेरा बेंगलुरु में डेरा डाले हुए हैं। वहीं बुधवार को राजधानी दिल्ली से लौटे छह विधायकों में से तीन विधायक बसपा के संजीव कुशवाह और रामबाई तथा सपा विधायक राजेश कुमार शुक्ला के सुर बगावती ही नजर आए। हालांकि इन विधायकों ने इस बात से इंकार किया कि उन्हें बंधक बनाया गया था या कोई प्रलोभन दिया गया। बुधवार को लौटे तीन अन्य विधायकों में ऐदल सिंह कंसाना, रणवीर जाटव और कमलेश लाटव शामिल हैं। 
डंग ने ईमेल से भेजा इस्तीफा
इन छह विधायकों के लौटने के बाद बुधवार को सत्तारूढ़ दल कांग्रेस के रणनीतिकारों ने थोड़ी राहत की सांस ली थी, लेकिन गुरुवार देर शाम सत्तारूढ़ दल कांग्रेस के विधायक डंग के त्यागपत्र के बाद राजनैतिक पारा एक बार फिर बढ़ गया। डंग अज्ञात स्थान पर हैं और उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष को विधायक पद से त्यागपत्र ईमेल के माध्यम से भेजा है। पहले इस त्यागपत्र को फर्जी भी बताया गया, लेकिन इसका घंटों बीत जाने के बावजूद डंग की ओर से खंडन नहीं किया गया। वहीं विधानसभा अध्यक्ष एन पी प्रजापति और मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा कि डंग के त्यागपत्र की खबर आई हैं, लेकिन उन्होंने उनसे मिलकर त्यागपत्र नहीं दिया है। प्रजापति ने कहा कि जब ऐसा होगा, वे इस पर विचार करके अगला कदम उठाएंगे। वहीं डंग के त्यागपत्र के बाद भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा ने तत्काल अपना बयान जारी कर मुख्यमंत्री से जानना चाहा कि डंग का त्यागपत्र क्यों आया है। इस बारे में उन्हें स्पष्ट करना चाहिए। (लाइव हिन्दुस्तान)

 


Date : 06-Mar-2020

शिवराज दिल्ली में, दिग्विजय ने दिया फॉर्मूला
नई दिल्ली, 6 मार्च। ऐसा लग रहा है कि मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार एक बड़े संकट में फंसती नजर आ रही है। सूत्रों के मुताबिक कैबिनेट की बैठक के बाद कुछ और मंत्रियों ने भी इस्तीफे की पेशकश की है। गौरतलब है चार लापता विधायकों में से एक कांग्रेस विधायक हरदीप डंग ने इस्तीफा दे दिया है वहीं देर रात मुख्यमंत्री कमलनाथ से दो बीजेपी विधायकों की मुलाकात के बाद सियासी गहमागहमी तेज हो गई। माना जा रहा है कि बीजेपी और कांग्रेस के बीच शह और मात का खेल जारी है। इसी बीच कांग्रेस के नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सरकार बचाने के लिए एक फॉर्मूला सुझाया है। उन्होंने कहा है कि बजट सत्र के बाद कैबिनेट का तुरंत विस्तार किया जाना चाहिए। सवाल इस बात कि क्या दिग्विजय के फॉर्मूले से कमनाथ सरकार पर आया संकट टल जाएगा।  इसके पहले दिग्विजय सिंह ने दावा किया कि सभी विधायक अपने साथ हैं। विवेक से काम करते है, न कोई उनको बचा रहा है और न ही कोई उनको फंसा रहा है। सरकार पूरी तरह सुरक्षित है। मैं कमलनाथ जी के बुलावे पर आया हूं। विधायक के इस्तीफे पर कहा वो इस्तीफा नहीं स्टेटमेंट है। कोई नाराज़ नहीं है सरकार से सरकार अच्छा काम कर रही है, में राज्यसभा जाऊंगा या नहीं ये फैसला आलाकमान करेगा।
क्या है विधानसभा का गणित
बहुमत के लिए 115 विधायक। कांग्रेस के पास 113 विधायक बचे। अगर डंग का इस्तीफा स्वीकार नहीं होता है तो 114 है।
230 सदस्यों की विधानसभा है। 2 सदस्यों के निधन के बाद संख्या 228
कांग्रेस को 2 बसपा, 1 सपा, 4 निर्दलीयों का समर्थन। 4 निर्दलीयों में एक ग़ायब है
वहीं, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और बीजेपी नेता गोपाल भार्गव और नरोत्तम मिश्रा भी दिल्ली पहुंचे और उन्होंने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के साथ बैठक की। इस बीच, कांग्रेस के दो विधायक पूर्व मंत्री बिसाहूलाल सिंह और रघुराज कनसाना और एक निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह शेरा ने चुप्पी साध रखी है। तीनों विधायक पिछले कुछ दिनों से गायब हैं।  (एनडीटीवी)


Date : 05-Mar-2020

नई दिल्ली, 5 मार्च। मध्य प्रदेश की सियासत में संग्राम छिड़ा हुआ है और इसकी मूल वजह राज्यसभा के चुनाव को माना जा रहा है। कांग्रेस और भाजपा को एक-एक सीट मिलना तय है और दोनों दल तीसरी सीट को हासिल करना चाहते हैं और उसी के चलते गैर भाजपाई और गैर कांग्रेसी विधायकों को अपने पाले में लाने की कवायद चल पड़ी है। राज्यसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस के भीतर की रस्साकसी का भाजपा भले ही लाभ नहीं उठा पाई हो, लेकिन उसके अंदरूनी मतभेदों से भविष्य का संकट टला नहीं है। भाजपा ने इसे कांग्रेस तोडऩे की कोशिश से इंकार किया है। हालांकि उसके प्रदेश के नेताओं का सक्रियता से जाहिर है कि यह दांव असफल रहा है।
मध्य प्रदेश से राज्यसभा में पहुंचे तीन सदस्यों, कांग्रेस के दिग्विजय सिंह, भाजपा के सत्यनारायण जटिया और प्रभात झा का कार्यकाल खत्म हो रहा है और इन तीनों सीटों के लिए इसी महीने चुनाव होना है। इन तीन सीटों में से एक-एक सीट कांग्रेस और भाजपा को मिलना तय है। लेकिन बाकी बची तीसरी सीट के लिए कांग्रेस को दो और भाजपा को नौ विधायकों की जरूरत है। अभी की विधानसभा की स्थिति पर गौर करें तो राज्य में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं है। राज्य की 230 सदस्यीय विधानसभा में फिलहाल 228 विधायक हैं। दो सीटें खाली हैं। कांग्रेस के 114 और भाजपा के 107 विधायक हैं। कांग्रेस की कमलनाथ सरकार चार निर्दलीय विधायकों, दो बसपा और एक सपा विधायक के समर्थन से चल रही है।
तीसरी सीट के लिए दिग्विजय और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच लड़ाई
राज्यसभा के एक सदस्य के लिए 58 विधायकों का समर्थन चाहिए। इस स्थिति में कांग्रेस और भाजपा के एक-एक सदस्य का चुना जाना तय है। बाकी बची तीसरी सीट पाने के लिए दोनों दलों को जोर लगाना होगा और समझा जाता है कि राज्य की सियासत में चल रहा ड्रामा इसी तीसरी सीट के लिए है। इस खरीद-फरोख्त को आगामी राज्यसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है, क्योंकि कांग्रेस के दो दिग्गजों, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और पूर्व मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा के लिए बड़ा दावेदार माना जा रहा है। वहीं भाजपा किसी भी स्थिति में तीसरी सीट भी जीतना चाहती है। कांग्रेस खुले तौर पर भाजपा पर खरीद-फरोख्त का आरोप लगा रही है तो दूसरी ओर भाजपा इसे कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह द्वारा रचा गया पूरा खेल बताने में लगी है। 
13 से होगा राज्यसभा के लिए नामांकन
बीते दो दिनों से कांग्रेस के अलावा बसपा, सपा और निर्दलीय विधायकों की खरीद-फरोख्त का मामला जोर पकड़े हुए है। नौ विधायकों को दिल्ली ले जाने की बात सामने आई। इनमें से सात विधायकों को हरियाणा के गुरुग्राम में एक होटल में रखा गया, जहां से बसपा विधायक रामबाई को मुक्त कराने का कांग्रेस ने दावा किया है। पांच विधायकों को दिल्ली से भोपाल वापस भी लाया गया है।  सूत्रों का कहना है कि अभी तो विधायकों की खरीद-फरोख्त का मसला चर्चा में है, मगर यह सिलसिला अभी थमने वाला नहीं है, क्योंकि नामांकन 13 मार्च तक भरा जाना है और मतदान 26 मार्च को होना है। इसलिए गैर भाजपाई और गैर कांग्रेसी विधायकों पर दोनों दलों की नजर रहने वाली है।  
कांग्रेस को भारी पड़ सकता है असंतोष
सूत्रों के अनुसार, भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व फिलहाल ऐसे किसी ऑपरेशन के पक्ष में नहीं है, जिसमें वह आगे बढ़कर सरकार गिराने की कोशिश करता दिखे। पार्टी का मानना है कि कांग्रेस के अंतर्विरोध इतने ज्यादा है कि सरकार कब तक चलेगी, कह नहीं सकते हैं। हालांकि, उसके प्रदेश के नेता कांग्रेस के भीतर के टकराव को देखते हुए कुछ न कुछ ऑपरेशन चलाते रहते हैं, जिससे कांग्रेस की कमजोरी उजागर हो रही है। पार्टी के एक नेता ने कहा कि कांग्रेस का यह असंतोष और बढ़ेगा और सरकार के लिए भारी पड़ेगा। 
सियासी उथल-पुथल कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई का नतीजा : विजयवर्गीय
भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार को समर्थन दे रहे विधायकों की खरीद-फरोख्त की कथित कोशिशों के मामले में सूबे के प्रमुख विपक्षी दल की कोई भूमिका नहीं है। भाजपा नेता ने कहा कि सियासी उथल-पुथल कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई का परिणाम है। सत्तारूढ़ कांग्रेस विधायकों की कुंठा और मुख्यमंत्री कमलनाथ के प्रति उनका गुस्सा दिखाता है। अपने कार्यकाल का सवा साल पूरा कर चुकी कमलनाथ सरकार के भविष्य के बारे में पूछे जाने पर विजयवर्गीय ने कहा- देखिये, आगे क्या होता है। वैसे भाजपा चाहती, तो राज्य में अपनी सरकार पिछले विधानसभा चुनावों के बाद ही बना सकती थी क्योंकि हमारे पास केवल चार-पांच विधायक कम थे और लोग हमारे पाले में आने को भी तैयार थे, लेकिन हम इन चीजों पर विश्वास नहीं रखते। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस से जुड़े कई नेता अब भी भाजपा के संपर्क में हैं। (लाइव हिन्दुस्तान)

 


Date : 04-Mar-2020

नई दिल्ली, 4 मार्च । मध्य प्रदेश में सियासी उठापटक के बीच मंगलवार देर रात दिल्ली से सटे गुरुग्राम में एक पांच सितारा होटल के बाहर हाई वोल्टेज ड्रामा देखने को मिला, जो कि आज सुबह तक जारी है। कांग्रेस के नेताओं ने बीजेपी पर सरकार को अस्थिर करने के लिए विधायकों को जबरन होटल में रखने का आरोप लगाया है। आनन-फानन में कांग्रेस नेताओं ने बचाव अभियान शुरू किया। कांग्रेस नेता जीतू पटवारी और जयवर्धन सिंह देर रात आईटीसी ग्रांड भारत होटल पहुंचे। दोनों नेता मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार में मंत्री हैं। 
कल रात करीब दो बजे दोनों नेता विधायक रमाबाई के साथ होटल से बाहर आते हुए दिखे। रमाबाई मायावती की बीएसपी से निष्कासित विधायक हैं। 
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह के बेटे और मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री जयवर्धन सिंह ने विधायक को होटल से बाहर निकालने के बाद ट्वीट में कहा, बीजेपी ने भारतीय राजनीति को कलंकित  किया है। विधायकों को परिवार सहित बंधक बनाकर रखा गया! यह लोग सत्ता को धनबल और बाहुबल से हासिल करना चाहते हैं। कमलनाथ सरकार अपना 5 वर्ष का कार्यकाल पूर्ण करेगी।
कहा जा रहा है कि जो विधायक अब भी होटल में मौजूद हैं, उनमें कांग्रेस विधायक एचएस डांग, रघुराज कनसाना, बिसाहूलाल सिंह और निर्दलीय विधायक शेरा भैया शामिल हैं। 
इससे पहले कांग्रेस के वरिष्ठ इससे पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने आरोप लगाया था कि भाजपा राज्य सरकार को अस्थिर करने के लिए उनकी पार्टी के विधायकों को रिश्वत देने की कोशिश कर रही है। दिग्विजय सिंह ने दावा किया था कि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा के एक अन्य वरिष्ठ नेता नरोत्तम मिश्रा 25-35 करोड़ रुपये देकर कांग्रेस के विधायकों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं।
राज्य में सियासी बवाल के बाद कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि कि बीजेपी के रामपाल सिंह, नरोत्तम मिश्रा, अरविंद भदौरिया, संजय पाठक होटल में बंधक बनाए गए विधायकों को पैसे देने जा रहे थे। उन्होंने कहा, अगर कोई छापा पड़ा होता, तो वे पकड़े जाते। हमें लगता है कि 10-11 विधायक थे, केवल 4 अब ही अब उनके साथ हैं, वे भी हमारे पास वापस आ जाएंगे।
दिग्विजय सिंह ने आगे कहा, जब हमें पता चला, तो जीतू पटवारी और जयवर्धन सिंह वहां गए। जिन लोगों के साथ हमारा संपर्क हो सका था, वे हमारे पास वापस आने के लिए तैयार थे। हम बिसाहूलाल सिंह और रमाबाई के संपर्क में थे। रमाबाई वापस आ गईं हैं, तब भी जब भाजपा ने उन्हें रोकने की कोशिश की।
इससे पहले दिग्विजय सिंह ने सोमवार को बीजेपी सरकार पर आरोप लगाया था कि वह एमपी सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रही है। इसके तहत बीजेपी कांग्रेस के कई विधायकों को काफी पैसे देने की पेशकश कर रही है। इसपर पलटवार करते हुए शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस नेता पर गलत बयान देने का आरोप लगाया था। बीजेपी के विधायक रामेश्वर शर्मा ने कहा था कि लोग कांग्रेस के दिग्गज नेता को गंभीरता से नहीं लेते हैं।
5-5 करोड़ का ऑफर
दिग्विजय सिंह ने आरोप लगाया, परसों ही मैंने कहा था कि ये लोग 5 करोड़ पहले, 5 करोड़ राज्यसभा चुनाव के दौरान, बाकि सरकार गिराने पर 5 करोड़ देने का वादा किया था। इसका हमारे पास प्रूफ है। विधायकों को धोखा दे के लाया गया था। 
दिग्विजय सिंह ने कहा, बीजेपी के पास बेहिसाब पैसा है। शिवराज सिंह दिल्ली में हैं और इन विधायकों के साथ उनकी मीटिंग होनी थी। हमारे आने से पहले वो भाग गए। अभी कांग्रेस के तीन और एक निर्दलीय विधायक रह गए है। उनसे भी हमारी कोशिश है कि वापस आ जाएंगे। इसमें रघुराज कंसाना, हरदीप सिंह, बिसाहूलाल सिंह और निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह शामिल हैं। ये दावा कर रहे थे कि 10-15 विधायक उनके पास है पर ऐसा नहीं है। सब वापस आ गए। उनके पास 4 रह गए है।
क्या है विधानसभा का समीकरण
मध्य प्रदेश विधानसभा की स्थिति पर गौर करें तो कुल 230 विधायकों की विधानसभा में से इस वक्त 228 विधायक हैं। दो सीट विधायकों की मौत के चलते खाली हैं। कांग्रेस के इस वक्त 114 विधायक हैं। बीजेपी के 107, दो विधायक बीएसपी के हैं, समाजवादी पार्टी का एक और चार निर्दलीय विधायक हैं।
फिलहाल जादुई आंकड़ा 115 का है, जबकि कांग्रेस को 121 विधायकों का समर्थन हासिल है। फिलहाल कमलनाथ सरकार सुरक्षित है। गुरुग्राम आधी रात को कांग्रेस ने अपनी सक्रियता से तमाम विधायकों को होटल से निकाल कर संकट को टाल दिया है।(एनडीटीवी/आजतक)

 


Date : 24-Feb-2020

मुंबई, 24 फरवरी। डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा को लेकर शिवसेना ने परोक्ष रूप से मोदी सरकार पर हमला बोला। शिवसेना ने सोमवार को सामना में लिखा कि अमेरिकी राष्ट्रपति की करीब 36 घंटे की भारत यात्रा से गरीब और मध्यम वर्गीय भारतीयों के जीवन पर रत्ती भर असर नहीं पड़ेगा।
शिवसेना ने कहा कि ट्रंप ने भारत के लिए रवाना होने से पहले कहा कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से व्यापार पर बातचीत करने जा रहे हैं जिससे साफ होता है कि उनकी यात्रा का उद्देश्य अमेरिकी व्यापार बढ़ाना है।
शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादकीय के अनुसार, ट्रंप की यात्रा से भारत में गरीब और मध्यमवर्गीय लोगों के जीवन पर रत्ती भर भी असर नहीं पडऩे वाला। तो उनकी यात्रा के गुणगान और उस पर उत्साहित होने का सवाल ही कहां उठता है। अगर ट्रंप की यात्रा को लेकर कहीं उत्सुकता है तो वह अहमदाबाद में हो सकती है, जहां वह सबसे पहले पहुंच रहे हैं।
इसमें लिखा गया है कि ट्रंप के दौरे से ज्यादा इस बात की चर्चा हो रही है कि वह जिस सडक़ से गुजरेंगे वहां झुग्गियों को छिपाने के लिए कैसे दीवार बनाई जा रही है। खबर है कि ट्रंप भारत में धार्मिक आजादी पर रोकटोक के मुद्दे पर भी बात कर सकते हैं। ये हमारे आंतरिक विषय हैं। यह देश लोकतांत्रिक तरीके से चुने गये लोगों से चलता है और उन्हें किसी बाहरी से इस पर मार्गदर्शन की जरूरत नहीं है। 
सामना के अनुसार इसके बजाय ट्रंप को अहमदाबाद, आगरा और दिल्ली में पर्यटन का आनंद उठाना चाहिए। शिवसेना ने कहा कि जब ट्रंप अपने आगमन के करीब 36 घंटे बाद भारत से रवाना होंगे तो भारत की धरती पर उनकी यात्रा की कोई छाप नहीं रहेगी। (पीटीआई)