राजनीति

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26-Sep-2020 2:38 PM

मनोज पाठक
पटना, 26 सितंबर (आईएएनएस)|
चुनाव आयोग द्वारा बिहार विधानसभा चुनाव की तारीख घोषित होने के बाद यह तय है कि चुनावी दंगल में मुख्य मुकाबला सतारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) और विपक्षी दलों के राजद नेतृत्व वाले गठबंधन में होना है। हालांकि, अब तक इन दोनों गठबंधनों का आकार पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। इस चुनाव में कई ऐसे दल भी ताल ठोंकते नजर आएंगे जिनका खाता अभी विधानसभा में खुलना शेष है। समें वामदल जैसी पार्टी भी शामिल है, जिन्हें पिछले कुछ चुनावों में बहुत कम सीटों पर संतोष करना पड़ा है। इसके अलावा, कई ऐसी पार्टियां भी इस चुनाव में मतदाताओं के सामने होंगी, जिनके निजाम दूसरे दलों में थे और अब खुद की पार्टी बना ली है।

जन अधिकार पार्टी, विकासशील इंसान पार्टी, जनता दल (राष्ट्रवादी), जनतांत्रिक विकास पार्टी (जविपा) सहित कई ऐसी पार्टियां हैं जिनकी प्राथमिकता बिहार विधानसभा में खाता खोलने की है।

पूर्व सांसद पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी इस चुनाव में 150 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुकी है। इसमें कोई शक नहीं कि पूर्व में राजद के नेता रहे पप्पू यादव की बिहार के कई क्षेत्रों में अपनी पहचान है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि पिछले पांच सालों में किए गए परिश्रम का लाभ भी उन्हें कुछ क्षेत्रों में मिलेगा, लेकिन कुछ लोगों के भरोसे को वे सीटों में कैसे तब्दील करेंगे यह देखने वाली बात है।

इधर, पप्पू यादव कहते भी हैं कि सत्ता पक्ष और विपक्ष से बिहार की जनता परेशान है और वह विकल्प के रूप में सामने हैं।

इधर, जविपा प्रमुख अनिल कुमार भी इस चुनाव में 150 सीटों पर अपने प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारने की घोषणा की है। जविपा का बक्सर, भोजपुर और रोहतास जिले में जनाधर माना जाता है।

जविपा के अध्यक्ष अनिल कुमार कहते हैं कि बिहार में जो विकास का दावा किया जाता रहा है, उसकी पोल इस कोरोना काल में खुल गई है और इसी कथित विकास का जनता जवाब मांगने को तैयार है।

राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद के साथ रहे पूर्व सांसद रंजन यादव इस चुनाव में जनता दल (राष्ट्रवादी) पार्टी बनाकर चुनावी मैदान में है। शुक्रवार को कृषि विधेयकों के विरोध में सड़कों पर उतरकर पार्टी के कार्यकर्ता अपनी ताकत दिखा चुके हैं।

पार्टी के संयोजक अश्फाक रहमान बताते हैं कि उनकी पार्टी यूनियन डेमोक्रेटिक अलायंस के घटक दल के रूप में चुनाव मैदान में उतर रही है, जो लोगों को एक विकल्प के रूप में जनता के बीच जा रही है।

वामपंथी पार्टियों की हालत भी बिहार में बेहतर नहीं मानी जाती है। पिछले चुनाव में वामपंथी दलों को मात्र तीन सीटों पर संतोष करना पडा था। इस चुनाव में वामपंथी दल विपक्षी दलों के महागठबंधन के साथ चुनव मैदान में आने की तैयारी में है। हालांकि अब तक तस्वीर साफ नहीं हुई है। वैसे वामपंथी दल इस चुनाव में अपनी सीट को बढ़ाने को लेकर आतुर नजर आ रही है।


25-Sep-2020 4:33 PM

मनोज पाठक 
पटना, 25 सितम्बर (आईएएनएस)|
चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है। 28 अक्टूबर से 7 नवंबर तक तीन चरणों में वोट डाले जाएंगे। लेकिन अब तक मुख्य रूप से दो प्रतिद्वंदी गठबंधनों में सीट बंटवारे को लेकर स्थिति साफ नहीं हुई है। विपक्षी दलों के राष्ट्रीय जनता दल (राजद) नेतृत्व वाले महागठबंधन में प्रमुख घटक दल राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) ने तो तेजस्वी यादव के नेतृत्व पर ही सवाल उठा दिए हैं, तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग ) में भी जदयू और लोजपा कई मुद्दों को लेकर आमने-सामने हैं।

पिछले चुनाव से इस चुनाव में परिस्थितियां बदली हुई हैं। कई दलों के गठबंधन बदलने से उसके 'निजाम' बदल गए हैं। महागठबंधन में शामिल रालोसपा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने राजद के नेतृत्वकर्ता और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद के उतराधिकारी तेजस्वी यादव के नेतृत्व पर ही प्रश्न खड़ा कर दिया है।

रालोसपा ने गुरुवार को पार्टी की बैठक बुलाई थी जिसमें स्पष्टता से कहा गया है कि महागठबंधन में राजद के एकतरफा फैसले लेने के कारण महागठबंधन में शामिल दलों में नेतृत्व को लेकर भी मतभिन्नता बरकरार है। बैठक में सीट बंटवारे को लेकर भी अभी तक अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री कुशवाहा ने बैठक में तेजस्वी के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसे नेतृत्व में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को रोक पाना आसान नहीं है। उन्होंने कहा कि अभी जो चेहरा है वह नीतीश कुमार के सामने कहीं नहीं टिकता।

इधर, महागठबंधन में सीट बंटवारा नहीं होने के कारण विकासशील इंसान पार्टी नाराज बताई जा रही है। वैसे, महागठबंधन में वामपंथी दलों के शामिल होने के प्रयास चल रहे हैं।

इधर, उपेंद्र कुशवाहा द्वारा तेजस्वी के नेतृत्व पर सवाल उठाए जाने पर राजद का कोई नेता कुछ भी खुलकर नहीं बोल रहा। हालांकि राजद के एक नेता ने नाम नहीं प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि किसी को कहीं जाना होगा, तो उसे रोका नहीं जा सकता, लेकिन कुल मिलाकर यह विवाद सीटों की हिस्सेदारी को लेकर है।

इधर, राजग में भी अभी बंटवारे को लेकर मामला अधर में लटका है। राजग के प्रमुख घटक दल लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) और जदयू के बीच काफी दिनों से मनमुटाव चल रहा है। लोजपा के प्रमुख चिराग पासवान लगातार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कायरे पर सार्वजनिक रूप से प्रश्न उठा रहे हैं, जिससे जदयू के नेता भी गाहे-बगाहे लोजपा पर निशाना साधती रही है।

इस बीच लोजपा ने 143 सीटों पर तैयारी करने की बात कहकर राजग से दूरी बना ली। राजग सूत्रों का कहना है कि गुरुवार को भाजपा ने लोजपा को 25 सीट देने के संदेश दिए हैं। उल्लेखनीय है कि लोजपा पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि उनका गठबंधन भाजपा से है।

इधर, जदयू के नेता और बिहार के मंत्री जय कुमार सिंह कहते हैं कि गठबंधन को लेकर कोई भ्रम नहीं है। गठबंधन अटूट है। उन्होंने दावा करते हुए कहा कि दो से तीन दिनों के अंदर सीट बंटवारा हो जाएगा।

इधर, भाजपा के प्रवक्ता निखिल आनंद कहते हैं कि भाजपा कार्यकर्ता वाली पार्टी है। भाजपा चुनाव आयोग के सभी आदेशों का पालन करेगी। उन्होंने कहा कि भाजपा के कार्यकर्ता भाजपा के उम्म्ीदवार को जीताने का काम करेंगे ही, जहां भाजपा के प्रत्याशी नहीं होंगे वहां घटक दल के प्रत्याशी को जीताने का कार्य करेंगे।

उल्लेखनीय है कि 2015 में जो विधानसभा चुनाव हुए थे उसमें राजग में भाजपा, लोजपा, रालोसपा और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा शामिल थे, वहीं महागठबंधन में जदयू, राजद और कांग्रेस शामिल थी।

पिछले चुनाव में भाजपा को 53, लोजपा को 2, रालोसपा को 2 और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) को 1 सीटें मिली थी। महागठबंधन में जदयू के 71 प्रत्याशी विजयी हुए थे जबकि राजद 80 और कांग्रेस 27 सीटें जीती थी।


25-Sep-2020 4:32 PM

संदीप पौराणिक 
भोपाल, 25 सितम्बर (आईएएनएस)|
मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा के उपचुनाव सियासी तौर पर अहम हैं, मगर बुंदेलखंड के सागर जिले की सुरखी विधानसभा सीट ऐसी है जिसके नतीजे इस इलाके की सियासत पर बड़ा असर डालने वाले होंगे।

सागर जिले का सुरखी विधानसभा क्षेत्र इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शिवराज सिंह चौहान सरकार के परिवहन मंत्री गोविंद सिंह राजपूत का भाजपा के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतरना तय है। राजपूत की गिनती पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की करीबियों में होती है। राजपूत उन नेताओं में है जिन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा है।

राजपूत के भाजपा में जाने से कई नेता कांग्रेस की तरफ रुख कर रहे हैं। उन्हीं में से एक पूर्व विधायक पारुल साहू ने भी कांग्रेस की सदस्यता ली है। पारुल साहू ने वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में वर्तमान के भाजपा के संभावित उम्मीदवार गोविंद सिंह राजपूत को शिकस्त दी थी। अब संभावना इस बात की है कि राजपूत के खिलाफ कांग्रेस पारुल साहू को मैदान में उतार सकती है। एक तरफ जहां पारुल साहू ने कांग्रेस की सदस्यता ली है तो कुछ और नेता भाजपा से कांग्रेस की तरफ रुख कर रहे हैं।

कांग्रेस छोड़कर आए राजपूत के लिए व्यक्तिगत तौर पर यह चुनाव अहमियत वाला है तो वहीं इस चुनाव के नतीजों का बुंदेलखंड की राजनीति पर असर होना तय है। इसकी वजह भी है क्योंकि सागर जिले से शिवराज सिंह चौहान मंत्रिमंडल में गोपाल भार्गव भूपेंद्र सिंह और गोविंद सिंह राजपूत मंत्री है। भाजपा भी सुरखी विधानसभा क्षेत्र को लेकर गंभीर है। यही कारण है कि पार्टी जहां घर-घर तक पहुंचने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर राजपूत ने मतदाताओं का दिल जीतने के लिए रामशिला पूजन यात्रा निकाली और भाजपा कार्यकर्ताओं से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश में लगे हैं।

एक तरफ जहां राजपूत भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं में अपनी पैठ बढ़ाने में लगे हैं तो वहीं दूसरी ओर भाजपा के असंतुष्ट कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं। पारुल साहू के कांग्रेस में आने से राजपूत के सामने मुश्किलें खड़ी हो गई हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि पारुल के पिता संतोष साहू भी कांग्रेस से सागर जिले से विधायक रह चुके हैं।

अब एक बार फि र राजपूत और पारुल के बीच सियासी मुकाबला हो सकता है, अगर ऐसा होता है तो चुनाव रोचक और कड़ा होने की संभावनाएं जताई जा रही है। दोनों ही जनाधार व आर्थिक तौर पर मजबूत है, इसलिए यहां का चुनाव चर्चाओं में रहेगा इसकी संभावनाएं बनी हुई है।

राजनीतिक विश्लेषक विनेाद आर्य का कहना है कि, "सुरखी विधानसभा क्षेत्र का उप-चुनाव सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र का चुनाव नहीं बल्कि पूरे अंचल को प्रभावित करने वाला होगा, ऐसा इसलिए क्योंकि राजपूत की गिनती सिंधिया के करीबियों में होती है, उनकी जीत से जहां नया सियासी ध्रुवीकरण हेागा तो उनकी हार से भाजपा के पुराने क्षत्रप मजबूत बने रहेंगे। वहीं पारुल साहू के जरिए कांग्रेस कार्यकर्ताओं को उर्जा मिलेगी, इतना ही नहीं कांग्रेस की जीत से इस क्षेत्र में नया नेतृत्व उभर सकता है।

बुंदेलखंड का सागर वह जिला है जहां से शिवराज सिंह चौहान सरकार में गोविन्द सिंह राजपूत के अलावा भूपेंद्र सिंह और गोपाल भार्गव मंत्री है। यह तीनों सत्ता के केंद्र है, राजपूत के जीतने और हारने से सियासी गणित में बदलाव तय है, यही कारण है कि भाजपा में एक वर्ग राजपूत के जरिए अपनी संभावनाएं तलाश रहा है तो राजपूत के भाजपा में आने से अपने को असुरक्षित महसूस कर रहे नेता नई राह की खोज में लगे है।
 


24-Sep-2020 3:40 PM

मनोज पाठक  
पटना, 24 सितम्बर (आईएएनएस)|
बिहार में इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर ऐसे तो राजनीतिक दलों के बीच जुबानी जंग धीरे-धीरे परवान चढ़ रही है, लेकिन दूसरी ओर राजनीतिक दल सड़कों पर भी एक नई लड़ाई लड़ रहे है। राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप लगाने या कटाक्ष करने के लिए पोस्टरों का सहारा ले रहे हैं।

ये पोस्टर पटना की सड़कों के किनारे लगाए जा रहे हैं, जो आने-जाने वाले लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र भी बने हुए हैं। पिछले एक सप्ताह से यहां की सड़कों पर पोस्टर वार जोरों पर है।

पटना की सड़कों पर गुरुवार को जदयू ने एक पोस्टर लगाया है, जिसके जरिए राजद पर जोरदार कटाक्ष किया गया है। पीले रंग की पृष्ठभूमि वाले इस पोस्टर में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तस्वीर है, जिसमें लिखा गया है, 'पूरा बिहार, हमारा परिवार'। इसी पोस्टर के एक कोने में 'न्याय के साथ तरक्की, नीतीश की बात पक्की' का नारा लिखा हुआ है।

कहा जा रहा है कि इस पोस्टर के जरिए जदयू ने लालू परिवार को निशाना बनाने की कोशिश की है।

इससे पहले शनिवार को पटना की सड़कों पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद के परिवार पर तीखा राजनीतिक प्रहार करते हुए एक पोस्टर लगाया गया था। 'एक ऐसा परिवार, जो बिहार पर भार' शीर्षक से लगे इन पोस्टरों के सबसे ऊपर राजद के अध्यक्ष लालू प्रसाद को बतौर कैदी दिखाया गया।

पोस्टर के निचले हिस्से में तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव की तस्वीर लगाई जिसे विधायक और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी की तस्वीर पर उन्हें विधानपार्षद और मीसा भारती की तस्वीर पर राज्यसभा सांसद लिखा गया है।

इसके एक दिन बाद ही फिर से लालू प्रसाद और उनके परिवार के लोगों पर नए स्लोगन से पोस्टर से 'वार' किया गया है। लालू प्रसाद और तेजस्वी को 'लूट एक्सप्रेस' का संचालक बताया गया। पोस्टर में एक बस को लूट एक्सप्रेस के तौर पर दिखाया गया है, जिसके अंदर पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, तेजप्रताप यादव और मीसा भारती को बैठे हुए दिखाया गया है जबकि लालू और तेजस्वी बस के ऊपर खड़े दिख रहे हैं।

इस पोस्टर के एक छोर पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा गया 'एक परिवार बिहार पर भार'।

इसके बाद बुधवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर निशाना साधते हुए पोस्टर पटना की सड़कों पर चस्पा कर दिए गए।

पोस्टर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तस्वीर है। पोस्टर में प्रधानमंत्री को यह कहते दिखाया गया है, "नीतीश कुमार के डीएनए में ही गड़बड है। मारते रहे पलटी, नीतीश की हर बात कच्ची।"

इसके अलावा एक और पोस्टर लगाया गया है। इस पोस्टर में भी प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की तस्वीर है। जिसमें बिहार की जनता को यह बोलते दिखाया गया है कि भाजपा को तो बिहार की जनता विपक्ष में बैठाई थी, फिर आप सत्ता में कैसे पहुंच गए।

हालांकि पोस्टर जारी करने वाले पोस्टर पर अपने नाम का भी उल्लेख नहीं कर रहे हैं।

जदयू के प्रवक्ता संजय सिंह कहते हैं कि जदयू अपने प्रचार के लिए पोस्टर लगा रहा है। राजद या लालू प्रसाद के परिवार के विरोध में लगाए पोस्टर के विषय में उन्होंने कहा कि यह पोस्टर कौन लगाया है, उन्हें नहीं पता। उन्होंने कहा कि पोस्टर के जरिए चुनाव नहीं जीते जा सकते। पोस्टर लगाकर अगर चुनाव जीते जा सकते, तो कोई बात नहीं।

इधर, राजद के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी कहते हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी पोस्टर से वार कर रही है जबकि लालू प्रसाद को बिहार की जनता दिल में बसाए हुए है। इस चुनाव में ऐसे पोस्टर लगाने वालों को पता चल जाएगा।


24-Sep-2020 1:20 PM

पटना, 24 सितंबर। बिहार के पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय ने अभी तक राजनीति में आने को लेकर अपने पत्ते नहीं खोले हैं लेकिन जल्द ही वो राजनीति में आ सकते हैं। गुप्तेश्वर पांडेय ने एबीपी न्यूज से बात करते हुए कहा कि किस दल के साथ जाऊंगा, यह अभी तय नहीं हैं। उन्होंने कहा कि मेरे चुनाव लडऩे की संभावना प्रबल है। मैं आज शाम लोगों से बात करके फैसला लूंगा।

बिहार के सीएम नीतीश कुमार की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य में काफी काम हुआ है। बाढ़ को लेकर लोगों में पीड़ा है लेकिन 15 साल पहले भी सरकारें थीं, उन्होंने काम नहीं किया। बिहार में हर साल तबाही होती है लेकिन उसके लिए नीतीश कुमार को ही केवल दोष देना ठीक नहीं होगा।

तेजस्वी यादव अभी युवा हैं- गुप्तेश्वर पांडेय
तेजस्वी यादव के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि वो अभी युवा हैं, उनके पास अभी बहुत मौका है। मैंने तेजस्वी के पिता लालू यादव के साथ 15 साल तक काम किया है, वो मुझे बहुत प्यार करते हैं।

पूर्व डीजीपी ने कहा कि 15 साल पहले बिहार में फिरौती और अपहरण व्यवसाय बन गया था। लेकिन आज जो भी अपराधी हैं वो सजायाफ्ता हैं। आज कोई पुलिस के सामने खड़ा नहीं हो सकता है। आज बिहार में कहीं नरसंहार नहीं हो रहा है।


23-Sep-2020 3:00 PM

संदीप पौराणिक 
भोपाल, 23 सितम्बर (आईएएनएस)|
मध्यप्रदेश में विधानसभा के उपचुनाव से पहले किसान को लेकर सियासी दलों में संग्राम छिड़ गया है। दोनों ही दल भाजपा और कांग्रेस अपने को एक दूसरे से बेहतर किसान हितैषी बताने में लग गए हैं।

राज्य में 28 विधानसभा क्षेत्रों में उप चुनाव होने वाले हैं, इनमें अधिकांश सीटें ग्रामीण इलाके से आती हैं और कृषि कार्य से जुड़े लोग ज्यादा मतदाता हैं। यही कारण है कि दोनों दलों ने अपने को किसान का बड़ा पैरोकार बताना शुरू कर दिया है।

राज्य में सत्ता में हुए बदलाव के बाद से कांग्रेस और भाजपा के बीच किसान कर्जमाफी केा लेकर तकरार चली आ रही है, मगर विधानसभा में कृषि मंत्री कमल पटेल द्वारा 27 लाख किसानों का कर्ज माफ किए जाने का ब्यौरा देकर इस तकरार को और तेज कर दिया है।

कृषि मंत्री पटेल द्वारा कर्जमाफी की बात स्वीकारे जाने के बाद से कांग्रेस ने शिवराज सरकार पर हमले तेज कर दिए हैं। पूर्व कृषि मंत्री सचिन यादव का कहना है कि भाजपा और उसके नेता कितना झूठ बोलते हैं यह बात अब सामने आ गई है। कांग्रेस ने किसानों का कर्ज माफ करने का वादा किया था, उस पर अमल हुआ तभी तो 27 लाख किसानों का कर्ज माफ हुआ है। अब भाजपा और शिवराज सरकार इस सवाल का जवाब दे कि झूठ कौन बोलता है।

वहीं दूसरी ओर शिवराज सिंह चौहान सरकार किसानों के हित में कई फैसले ले रही है। एक तरफ जहां प्राकृतिक आपदा से प्रभावित किसानों के खातों में मुआवजा राशि डाली गई है, वहीं किसानों को प्रधानमंत्री सम्मान निधि योजना की ही तरह राज्य के किसानों को चार हजार रूपये प्रतिवर्ष अतिरिक्त सम्मान निधि देने का ऐलान किया गया है। इस तरह राज्य के किसानों को कुल 10 हजार रूपये सम्मान निधि के तौर पर मिलेंगे।

मुख्यमंत्री चौहान ने कहा कि प्रदेश के किसानों को सरकार पूरा सुरक्षा चक्र प्रदान कर रही है। प्रदेश सरकार एक के बाद एक किसानों के हित में फैसले ले रही है। पहले किसानों को शून्य प्रतिशत ब्याज दर पर फ सल ऋण उपलब्ध कराने की योजना प्रारंभ की गई, फि र उनके खातों में गत वषरें की फ सल बीमा की राशि डाली गई। अब सम्मान निधि दी जाएगी।

दोनों ही राजनीतिक दल विधानसभा चुनावों के मद्देनजर किसानों को केंद्र में रखकर चल रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इस वर्ग के मतदाताओं की संख्या बहुत अधिक है। साथ ही खुद को बड़ा हितैषी और दूसरे को किसान विरोधी बताना उनका लक्ष्य हो गया है। सभाओं से लेकर तमाम आयोजनों में किसान बड़ा मुददा होता है।

राजनीतिक विष्लेषक भारत शर्मा का कहना है कि, किसान हमेशा छला गया है, राजनीतिक दल तरह-तरह के वादे कर किसानों को लुभाते है, उनके लिए योजनाओं का ऐलान करते हैं, मगर हकीकत कुछ और होती है। वास्तव में इन राजनीतिक दलों के फैसले किसानों के हित में होते तो आज किसान इस हालत में नहीं होता। किसान इन राजनीतिक जुमलेबाजी को समझ नहीं पाता और उनके जाल में फंस जाता है। वर्तमान में भी ऐसा ही हो रहा है। जिस दिन किसान इन दलों के मंसूबों को पहचान जाएगा, उस दिन हालात बदलने के लिए सरकारों को मजबूर होना पड़ेगा।


22-Sep-2020 2:57 PM

संदीप पौराणिक  
भोपाल, 22 सितंबर (आईएएनएस)|
मध्यप्रदेश में होने वाले विधानसभा के उप-चुनाव में कांग्रेस का सारा दारोमदार नई टीम पर रहने वाला है। इस नई टीम में पिछड़े और आरक्षित वर्ग के नेताओं की भरमार है। इस तरह कांग्रेस उप-चुनाव में मतदाताओं को लुभाने ते लिए जाति का सहारा ले रही है।

राज्य में 28 विधानसभा क्षेत्रों में उप चुनाव होने वाले हैं। कांग्रेस इन उप-चुनाव के जरिए सत्ता में वापसी का सपना संजोए हुए है। यही कारण है कि कग्रेस कई रणनीतियों पर एक साथ काम कर रही है। राज्य के इन 28 विधानसभा क्षेत्रों में पिछड़ा वर्ग और आरक्षित वर्ग की जनसंख्या को ध्यान में रखकर कांग्रेस ने इस वर्ग से जुड़े नेताओं को पहली कतार में रखना शुरू कर दिया है।

राज्य में कांग्रेस की ओर से उपचुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ ही एकमात्र चेहरा रहने वाले हैं। इसके संकेत भी मिलने लगे हैं। पिछले दिनों उन्होंने ग्वालियर का दौरा किया, जिसमें यह बात नजर भी आई। वहीं दूसरी ओर पिछड़े और आरक्षित वर्ग के जनाधार वाले नेताओं में से पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष एन.पी. प्रजापति, पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा, सचिन यादव और लाखन सिंह यादव को आगे रखकर चुनावी रणनीति पर काम तेज कर दिया है।

पार्टी सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस ने पिछड़ा और आरक्षित वर्ग की आबादी को ध्यान में रखकर ही अपनी रणनीति बनाई है और उसी के मददेनजर इन नेताओं को आगे किया जा रहा है। इनका अपने-अपने क्षेत्र में जनाधार तो है ही साथ में समाज में गहरी पैठ भी है।

राजनीतिक विश्लेषक रविंद्र व्यास का कहना है कि चुनाव में राजनीतिक दल हर दांव-पेच आजमाते हैं जिसके जरिए उन्हें जीत मिल जाए। अब कांग्रेस अगर जातिगत आधार पर नेताओं को जिम्मेदारी सौंप रही है तो इसमें अचरज नहीं होना चाहिए। कांग्रेस ने भले ही कुछ भी रणनीति बना ली हो मगर वास्तव में क्या यह नेता मतदाताओं को अपने तरीके से लुभाने में कामयाब हो पाएंगे, यह तो बड़ा सवाल रहेगा ही। वहीं दूसरी ओर अभी तक भाजपा ने अपने पत्ते खोले नहीं हैं इसलिए कांग्रेस की इस रणनीति पर हाल-फि लहाल ज्यादा कयास लगाना ठीक नहीं हेागा। हां, इतना जरुर कहा जा सकता है कि उप-चुनाव राज्य की सियासत में एक पटकथा जरुर लिखेंगे।


22-Sep-2020 12:29 PM

लखनऊ , 22 सितंबर (आईएएनएस)| बिहार विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को समर्थन करेगी। सपा ने इसकी जानकारी अपने अफि शियिल ट्विटर हैंडल के जरिये दी है। सपा ने अपने ट्विटर के माध्यम से लिखा कि, "आगामी बिहार विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी किसी भी पार्टी से गठबंधन ना करते हुए राष्ट्रीय जनता दल के उम्मीदवारों का समर्थन करेगी।"

बिहार विधानसभा में चुनाव की तारीखों की घोषणा जल्द होने वाली है। इस समय वहां के सभी राजनीतिक दल अपने कील कांटे दुरूस्त करके मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। बिहार की मुख्य लड़ाई एनडीए बनाम महागठबंधन के बीच में है। विपक्षी एकता को मजबूत करने के लिए सपा ने यह ऐलान किया है। तेजस्वी यादव के लिए बड़ी खुशखबरी समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव लेकर आए हैं। 

महागठबंधन में शामिल राजद, कांग्रेस और अन्य पार्टियों के बीच सीट शेयरिंग को लेकर लगातार बातचीत जारी है। ऐसे में समाजवादी पार्टी का आरजेडी को समर्थन मिलना महागठबंधन के लिए एक अच्छा संकेत माना जा रहा है। हालांकि बिहार की राजनीति में समाजवादी पार्टी का प्रभाव उतना नहीं है। फि र भी समाजवादी पार्टी कुछ न कुछ फोयदा जरूर पहुंचा सकती है। 

महागठबंधन में शामिल राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस और अन्य पार्टियों के बीच सीट शेयरिंग को लेकर लगातार बातचीत जारी है। ऐसे में समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय जनता दल को समर्थन मिलना महागठबंधन के लिए भी एक अच्छा संकेत माना जा रहा है।

बिहार विधानसभा के लिए 243 सीटों पर चुनाव होने हैं। माना जा रहा है कि चुनाव की तिथियों का जल्द ऐलान हो जाएगा। लेकिन अन्य राज्यों की तरह बिहार में भी कोरोना वायरस के संक्रमण की स्थिति को देखते हुए चुनाव आयोग के सामने चुनाव कराना बड़ी चुनौती है।


21-Sep-2020 3:02 PM

संदीप पौराणिक
भोपाल, 21 सितम्बर (आईएएनएस)|
मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा के उप-चुनाव में कांग्रेस ने अपने से अलग हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को घेरने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। इसके लिए राहुल गांधी के करीबियों को चुनाव प्रचार के मैदान में उतारा जा सकता है।

राज्य में होने वाले विधानसभा के उप-चुनाव सियासी तौर पर कांग्रेस के पूर्व नेता और वर्तमान में भाजपा के सांसद ज्योतिरादित्यसिंधिया के लिए सबसे अहम माने जा रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा तो कमल नाथ की सरकार गिर गई और भाजपा को फिर से सत्ता संभालने का मौका मिला।

राज्य में जिन 28 विधानसभा सीटों पर उप-चुनाव होने वाले हैं उनमें से 16 सीटें ग्वालियर-चंबल इलाके से आती हैं और इन क्षेत्रों की हार-जीत सिंधिया के राजनीतिक भविष्य से जुड़ी हुई है। ऐसा इसलिए, क्योंकि ग्वालियर-चंबल इलाके को सिंधिया का प्रभाव क्षेत्र माना जाता है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इस इलाके में भारी बढ़त मिली थी।

कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि पार्टी ने सिंधिया को घेरने के लिए युवाओं की टीम चुनाव प्रचार में उतारने का मन बनाया है। इस टीम में राहुल गांधी के करीबियों में शामिल सचिन पायलट, आर.पी.एन सिंह, जितेंद्र सिंह सहित कई युवा नेताओं को प्रचार में आगे किया जा सकता है। कांग्रेस युवा नेताओं की जरिए सिंधिया को घेरना चाहती है और उसके लिए कभी सिंधिया के करीबी रहे साथी सबसे ज्यादा उपयोग के लायक लग रहे हैं।

सूत्रों के मुताबिक, बीते रोज प्रदेशाध्यक्ष कमल नाथ के दिल्ली दौरे के दौरान भी चुनाव प्रचार की रणनीति पर चर्चा हुई है। राज्य में कई विधानसभा क्षेत्रों में गुर्जर मतदाता है और वे चुनावी नतीजों को भी प्रभावित करते है। लिहाजा कमल नाथ चाहते हैं कि पायलट को उप-चुनाव के प्रचार में उनका उपयोग किया जाए। कमल नाथ पायलट को प्रचार के लिए राज्य में लाकर दूसरे नेताओं के प्रभाव को भी पार्टी के भीतर कम करना चाह रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषक अरविंद मिश्रा का मानना है कि कांग्रेस में सचिन पायलट की पहचान उर्जावान और अपनी बात को बेवाक तरीके से कहने वाले नेता की तो है ही, साथ ही आमजन के बीच भी पायलट को पसंद किया जाता है। सिंधिया के जाने से कांग्रेस को नुकसान हुआ है, उप-चुनाव में सिंधिया के प्रभाव को रोकने में कांग्रेस का नए और चमकदार चेहरे का उपयोग कारगर हो सकता है। कांग्रेस अगर ऐसा करने में सफ ल होती है तो चुनाव और भी रोचक हो जाएंगे।

कांग्रेस से जुड़े सूत्रों का कहना है कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सियासत के नए समीकरण बन रहे हैं। प्रदेशाध्यक्ष कमल नाथ चाहते हैं कि राज्य के उन नेताओं को ही सक्रिय किया जाए जो उनके करीबी हैं, वही दूसरे राज्यों के उन नेताओं को राज्य में प्रचार के लिए भेजा जाए जिनकी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से नजदीकियां हैं।

कुल मिलाकर राज्य में आगामी विधानसभा के उपचुनाव में नई कांग्रेस देखने को मिल सकती है। वैसे भी उपचुनाव के लिए पार्टी हाईकमान ने चार सचिवों की पहले ही तैनाती की है और वे कमल नाथ के साथ पार्टी हाईकमान के बीच रहकर चुनावी रणनीति को जमीनी स्तर पर उतारने में लगे हैं।


21-Sep-2020 12:43 PM

भोपाल, 21 सितंबर (आईएएनएस)| मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का खुद को टेंपरेरी मुख्यमंत्री कहने वाला बयान सियासी गलियारों में चर्चा का विषय है। ये बयान सोशल मीडिया पर भी वायरल हो रहा है। इस बयान को लेकर कांग्रेस ने भी तंज कसा है। मुख्यमंत्री चौहान रविवार को मंदसौर जिले के सुवासरा विधानसभा क्षेत्र के सीतामऊ में थे। उन्होंने यहां विकास कार्यों का लोकार्पण किया, सुवासरा में आगामी समय में उप-चुनाव भी होने वाले हैं और भाजपा के संभावित उम्मीदवार हरदीप सिंह डंग होंगे जो अभी हाल ही में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए है। डंग शिवराज सरकार में मंत्री भी हैं। 

इस मौके पर चौहान ने जनसमुदाय को संबोधित करते हुए खुद को टेंपरेरी मुख्यमंत्री बताया। उन्होंने कहा कि "अभी टेंपरेरी मुख्यमंत्री हूं, उप-चुनाव में जीत नही मिली तो टेंपरेरी मुख्यमंत्री ही रह जाऊंगा, यहां की जीत के बाद परमानेंट मुख्यमंत्री हो जाऊंगा।"

चौहान का यह बयान सोशल मीडिया पर तो वायरल हो ही रहा है, कांग्रेस ने भी हमला बोला है। कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष कमल नाथ के मीडिया समन्वयक नरेंद्र सलूजा का कहना है, "शिवराज सिंह चौहान ने आखिर मान ही लिया कि अभी वो अस्थायी मुख्यमंत्री हैं इसलिये अभी उनकी ओर से की गयी सारी घोषणाएं भी उनकी तरह से अस्थायी होकर झूठी, चुनावी हवा-हवाई है। यह पूरी नहीं हो सकती क्योंकि वो खुद अस्थायी हैं। उपचुनाव के बाद तो कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की स्थायी सरकार बनेगी।"


19-Sep-2020 4:00 PM

पटना, 19 सितंबर (आईएएनएस)| बिहार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने शनिवार को अभिनेत्री और सांसद जया बच्चन के सदन में दिए गए बयान को लेकर तंज कसा है। बिहार भाजपा के प्रवक्ता डॉ़ निखिल आनंद ने कहा कि बॉलीवुड की थाली में छेद की चिंता करने वाले लोग देश की थाली में छेद करके बेशर्म बने घूमने वालों पर चुप्पी साध लेते हैं।

आनंद ने यहां शनिवार को कहा कि बॉलीवुड में बड़े नामवाले अपने नाम की बुनियाद पर आरोप लगने के बावजूद भी छूटना चाहते है, लेकिन उन्हें मालूम होना चाहिए कि कानून की नजर में सभी बराबर है।

उन्होंने कहा कि करण जौहर हों या कोई भी जिनपर सवाल उठेगा उन सबकी जांच होनी चाहिए। अभिनेता सुशांत सिंह राजूपत की संदेहास्पद मृत्यु के बाद सीबीआई जांच शुरू हुई, फिर एनसीबी और ईडी की जांच में भी बातें सामने आ रही है और चेहरे बेनकाब हो रहे है।

उन्होंने कहा, "अब पता चल रहा है कि ये जो ख्वाबों की दुनिया वाली बॉलीवुड है उसके जन्नत की हकीकत ही कुछ और है। बलीवुड में बाबा- बेबी, मूवी माफिया, ड्रग माफिया और अंडरवर्ल्ड सबके तार एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इन सभी समाज विरोधी और देश विरोधी तत्वो और उनकी गतिविधियों की जांच होनी चाहिए।"

भाजपा नेता ने आरोप लगाते हुए कहा कि महाराष्ट्र सरकार नहीं चाहती की सुशांत और उनकी पूर्व मैनेजर दिशा सालियान के मामले की हकीकत सामने आए, यही कारण है कि महाराष्ट्र सरकार मामले को दूसरा रंग देकर भटकाने में लगी हुई है।


17-Sep-2020 4:53 PM

संदीप पौराणिक 
भोपाल 17 सितंबर (आईएएनएस)|
मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले दल-बदल की पटकथाएं लिखने का दौर जारी है। आने वाले कुछ दिनों में कई नेताओं के दल-बदल की संभावनाएं बढ़ चली हैं।

राज्य में दल-बदल की शुरुआत मार्च में हुई थी, तब 22 तत्कालीन कांग्रेस विधायकों के पाला बदलने के कारण ही कमल नाथ के नेतृत्व वाली सरकार गिरी थी और भाजपा को सरकार बनाने का मौका मिला। इसके बाद कांग्रेस के तीन और विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थाम लिया।

राज्य में आगामी समय में होने वाले विधानसभा के उपचुनाव से पहले भाजपा और कांग्रेस दोनों ही राजनीतिक दल एक दूसरे को बड़ा झटका देने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। दोनों ही दलों के नेताओं की असंतुष्टों से बातचीत चल रही है, और आगामी दिनों में दल-बदल की संभावनाओं को भी नहीं नकारा जा सकता।

राज्य सरकार के मंत्री विश्वास सारंग कहते हैं कि, "कांग्रेस के कई विधायक भाजपा में आना चाहते हैं, मगर अभी भाजपा ने उन्हें पार्टी में शामिल करने से रोक रखा है। विधायकों के पार्टी छोड़ने से कांग्रेस की कहीं ऐसी स्थिति न हो जाए कि, गिनती के विधायक ही कमलनाथ के साथ रह जाएं।"

वहीं कांग्रेस के प्रवक्ता दुर्गेश शर्मा का कहना है कि, "भाजपा का सारा जोर खरीद फरोख्त पर है, और जो लोग इसमें भरोसा रखते हैं, वे ही कांग्रेस छोड़कर गए हैं। आगामी चुनाव में जनता बिकाऊ लोगों को सबक सिखाने में पीछे नहीं रहेगी।"

राजनीति की जानकारों का मानना है कि आगामी विधानसभा के उप-चुनाव काफी अहम हैं, एक तरफ कमल नाथ की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है, तो दूसरी ओर शिवराज सिंह चौहान व ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपना जनाधार साबित करना है। लिहाजा दोनों ही ओर से हर तरह के दाव पेंच आजमाए जा रहे हैं। यही कारण है कि दल-बदल पर दोनों दल जोर लगाने में पीछे नहीं है। इसकी भी वजह है, क्योंकि पार्टियों को लगता है कि दल-बदल से वह अपने वोटबैंक को बढ़ा सकती हैं।


17-Sep-2020 4:52 PM

नई दिल्ली, 17 सितंबर (आईएएनएस)| कांग्रेस पार्टी के संगठन में हुए फेरबदल के बाद उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी महासचिव हरीश रावत को पंजाब का प्रभार दिया गया है। प्रभार लेने के बाद रावत ने पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह से मुलाकात की। रावत ने आईएएनएस को बताया कि नवजोत सिंह सिद्धू पार्टी के लिए एक संपत्ति (असेट) हैं। रावत ने बताया कि उन्होंने अमरिंदर सिंह को पार्टी के घोषणापत्र को लागू करने पर बात की। उनसे ये भी कहा कि जो वादे पूरे नहीं किए गए हैं, वो कैसे पूरे होंगे। रावत ने बताया कि उन्होंने पंजाब में कोविड स्थिति के बारे में भी बात की और इसके चलते पैदा हुई चुनौतियों पर भी चर्चा की।

पंजाब में पार्टी के विभिन्न गुटों के बारे में पूछे गए सवाल के बारे में रावत ने बताया कि अमरिंदर सिंह पंजाब में पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं। नवजोत सिंह पार्टी की एक संपत्ति (असेट) हैं जिनकी उपयोगिता पंजाब में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में है। अगर पार्टी के विभिन्न नेताओं में समन्वय बनाने की बात है तो सभी मिल कर इस बात पर चर्चा करेंगे। बता दें कि मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू एक-दूसरे के विरोधी हैं।

उन्होंने कहा कि वो राज्य का दौरा करेंगे और पार्टी के विभिन्न नेताओं से बात कर जो भी समस्या है उसे सुलझाएंगे।

मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को हटाने को लेकर पार्टी में उठ रही मांग पर रावत ने कहा कि ऐसी कोई मांग नहीं है। अगर कुछ नेताओं में मतभेद हैं तो उसे मिल-बैठकर दूर कर लिया जाएगा।

राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने को लेकर पूछे गए सवाल पर हरीश रावत ने कहा कि वो तो पहले से ही केंद्र सरकार को घेरने में सबसे आगे हैं। वो पार्टी अध्यक्ष तो नहीं हैं, लेकिन विपक्ष का मुख्य चेहरा हैं।


17-Sep-2020 3:54 PM

संदीप पौराणि
भोपाल, 17 सितंबर (आईएएनएस)|
मध्यप्रदेश में होने वाले विधानसभा के उप-चुनाव से पहले कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ के ग्वालियर दौरे ने सियासी पारा चढ़ा दिया है। भाजपा जहां कमलनाथ के दौरे पर तंज कस रही है, वहीं कांग्रेस जनता के बढ़ते रुझान का दावा कर रही है।

राज्य की 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होना है और इनमें सबसे ज्यादा 16 सीटें ग्वालियर-चंबल इलाके से आती हैं। यही कारण है कि दोनों राजनीतिक दलों -- भाजपा व कांग्रेस का सबसे ज्यादा जोर इसी इलाके पर है। यह पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का प्रभाव क्षेत्र भी माना जाता है। यही कारण है कि भाजपा लगातार सक्रियता बढ़ा रही है तो दूसरी ओर कांग्रेस भी सक्रिय हो चली है।

कमल नाथ का दो दिवसीय ग्वालियर दौरा शुक्रवार से शुरू हो रहा है। कांग्रेस इसे मेगा-शो बता रही है, जिसमें कमल नाथ रोड शो करेंगे और इस अंचल की 36 सीटों के कार्यकर्ताओं और नेताओं से संवाद करेंगे। लगभग दो साल में कमल नाथ का यह पहला ग्वालियर दौरा है।

कांग्रेस प्रवक्ता अजय सिंह यादव सियासी तौर पर कमल नाथ के इस दौरे को महत्वपूर्ण मानते हैं। उनका कहना है, पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने के बाद इस क्षेत्र की जनता की कांग्रेस और कमल नाथ से आशाएं बढ़ी है। वास्तव में इस इलाके का मतदाता और आम जनता का बड़ा वर्ग सिंधिया को नापसंद करता है, यह बात बीते कुछ दिनों में सामने भी आ गई है। सिंधिया खुद छह माह तक ग्वालियर नहीं गए और जब गए तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ। इस दौरे के दौरान सिंधिया को भारी विरोध का सामना भी करना पड़ा। इससे साबित होता है कि सिंधिया के खिलाफ जनता में कितना आक्रोश है।

वहीं, भाजपा की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा ने कमल नाथ के ग्वालियर दौरे पर कहा, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की जनता से झूठ बोला है, क्षेत्र के साथ अन्याय किया है। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार ग्वालियर-चंबल क्षेत्र के दम पर ही बनी थी और जनता ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री देखना चाहती थी। लेकिन दिग्विजय-कमलनाथ ने इस क्षेत्र के साथ छल किया और कमलनाथ मुख्यमंत्री बन गए। अब इस क्षेत्र की जनता पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ से यह जानना चाहती है कि उन्होंने ग्वालियर-चंबल क्षेत्र के विकास के लिए क्या काम किया? क्यों इस क्षेत्र के विकास और सम्मान की पीठ में छूरा भोंका?

पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ के दौरे पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कमल नाथ का यह दौरा क्षेत्र की राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह क्षेत्र सिंधिया के प्रभाव का है, कमल नाथ सत्ता में रहते ग्वालियर आए नहीं, अब आ रहे है। कांग्रेस की पहली कतार भाजपा में जा चुकी है, कमल नाथ के सामने नई कतार खड़ी करने की चुनौती है, कमल नाथ का यह दौरा आने वाले उप-चुनावों की तस्वीर पर से कुछ धुंध हटाने वाला हो सकता है।


17-Sep-2020 3:53 PM

मनोज पाठक 
पटना, 17 सितम्बर (आईएएनएस)|
निर्वाचन आयोग की एक टीम बिहार में विधानसभा चुनाव की तैयारियों की समीक्षा कर वापस लौट गई है तथा संभावना जताई जा रही है कि जल्द ही चुनाव की तिथियों की घोषणा भी कर दी जाएगी, लेकिन राज्य के दोनों गठबंधनों में अब तक सीट बंटवारे को लेकर घटक दलों में असमंजस कायम है।

घटक दलों के नेताओं में क्षेत्रों को लेकर ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है। भाजपा नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में अभी भी लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) और जनता दल (युनाइटेड) में सीट बंटवारे को लेकर तानातनी बरकरार है।

लोजपा की बुधवार को नई दिल्ली में हुई बैठक में 143 सीटों पर चुनाव लड़ने के संकेत देकर राजग की बेचैनी बढ़ा दी है। हालांकि, बिहार के सियासी हलकों को इसे केवल दबाव की राजनीति बताई जा रही है।

इधर, भाजपा और जदयू ने भी अभी सीट बंटवारे को लेकर अपने पत्ते नहीं खोले हैं। बिहार भाजपा प्रदेष अध्यक्ष संजय जायसवाल कहते हैं कि भाजपा अपनी परंपरागत सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। उन्होंने हालांकि यह भी कहा कि गठबंधन को लेकर कहीं कोई असमंजस नहीं है।

उन्होंने कहा कि पिछले दिनों पार्टी के अध्यक्ष जे.पी. नड्डा बिहार दौरे पर मुख्यमंत्री और जदयू के अध्यक्ष नीतीश कुमार से मिलकर स्पष्ट कर चुके हैं कि गठबंधन में कहीं कोई समस्या नहीं है।

इधर, विपक्षी दलों के महागठबंधन में सीटों को लेकर अभी भी तानातनी बनी हुई है। महागठबंधन में शामिल छोटे दल -- विकासशील इंसान पार्टी और राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी (रालोसपा) 'वेट एंड वाच' की भूिमका में है।

सूत्रों के मुताबिक, सीट बंटवारे को लेकर अभी तक राजद के नेता तेजस्वी यादव ने बातचीत भी शुरू नहीं की है। घटक दलों के नेता राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह से बात कर रहे हैं।

महागठबंधन में शामिल कांग्रेस के एक नेता ने नाम नहीं प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि पार्टी के हिस्से कौन सी सीटें आएगी, यह भी कांग्रेस को पता नहीं है। ऐसे में प्रत्याशी अपने पसंदीदा क्षेत्र में क्या तैयारी करेंगे। उन्होंने रोष प्रकट करते हुए कहा कि सीट बंटवारे में हुई देरी के कारण ही लोकसभा में महागठबंधन की बुरी तरीके से हार हुई थी, इस चुनाव में भी फि र से वही स्थिति बन रही है।

रालोसपा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा भी सीट बंटवारे में हो रही देरी पर अपनी नाराजगी जताते हुए कह चुके हैं कि सीट बंटवारा जितना जल्दी हो जाए वह अच्छा होगा। पहले ही इसमें काफी देरी हो चुकी है।

उल्लेखनीय है कि महागठबंधन में समन्वय समिति की मांग नहीं माने जाने के कारण पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा पहले ही महागठबंधन को छोड़कर राजग में शामिल हो चुकी है।

बहरहाल, बिहार विधानसभा चुनाव के अक्टूबर और नवंबर महीने में होने की संभावना है। फि लहाल बनी परिस्थितियों में माना जा रहा है कि चुनाव में मुख्य मुकाबला दोनों गठबंधनों के बीच होगा, लेकिन अभी तक सीटों के बंटवारे को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने से दोनों गठबंधनों के नेताओं में मायूसी है।


16-Sep-2020 1:34 PM

मनोज पाठक 
पटना, 16 सितम्बर (आईएएनएस)|
बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा अब तक नहीं हुई है, लेकिन सभी प्रमुख राजनीतिक दल उन चुनावी मुद्दों की तलाश में जुटे हैं जो उन्हें बिहार की सत्ता के करीब पहुंचाने में मदद कर सके। लेकिन सबसे बड़ी बात है कि इस चुनाव में मुद्दा क्या होगा? 

बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में आम लोग जहां क्षेत्रीय समस्याओं को अपने स्तर पर चुनावी मुद्दा बनाने में लगे हैं वहीं कई दल अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार मतदाताओं को आकर्षित करने के जुगाड़ में लगे हुए हैं। 

वैसे बिहार में जातीय समीकरण के आधार पर जोड़-तोड की राजनीति कोई नई बात नहीं है। पिछले विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) विकास के मुद्दे पर चुनावी मैदान में उतरा था, लेकिन मुख्यमंत्री का चेहरा सामने नहीं था। इस बार राजग नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनावी मैदान में उतरने की घोषणा कर चुकी है। 

वैसे इस चुनाव में पिछले चुनाव की तुलना में परिस्थितियां बदली हुई हैं, जद (यू) एक बार फि र राजग में शामिल हो गई है वहीं राष्ट्रीय लेाक समता पार्टी (रालोसपा) विपक्षी दलों के महागठबंधन में कांग्रेस और राजद के साथ है। 

राजनीतिक विश्लेषक सुरेन्द्र किशोर का मानना है कि इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का जीरो भ्रष्टाचार का दावा राजग के लिए प्रमुख मुद्दा होने की संभावना है। 

उन्होंने कहा, इसके अलावे राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न पुरानी समस्याओं के निपटारे को भी राजग के नेता मतदाताओं के बीच लेकर जाएंगें। इसके अलावा बिहार में राजग की सरकार में किए गए विकास कायरें और केंद्र सरकार की मिल रही मदद के जरिए भी राजग के नेता मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश करेंगे। 

इधर, राजद नेतृत्व वाले महागठबंधन के नेता कोरोना काल में प्रवासी मजदूरों को मदद नहीं करने और बेरोजगारी को मुद्दा बनाने में जुटी है। 

किशोर भी मानते हैं कि विपक्ष बेरोजगारी को मुद्दा बनाकर सत्ता पक्ष को घेरने की कोशिश करेगा। 

उन्होंने कहा कि महागठबंधन कोरोना काल में प्रवासी मजदूरों के पैदल आने और उचित सहायता नहीं देने को लेकर चुनाव मैदान में जरूर उतरेगा, लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि राजग के नेता आक्रामक रूप से इसका जवाब भी देंगे। 

किशोर यह भी कहते हैं कि राजग के नेता एक बार फि र से बिहार में 'जंगलराज' की याद दिलाते हुए नजर आएंगें। 

वैसे माना जाता है कि राजग के नेता चुनावी समर में यह भी कहते नजर आएंगे कि बिहार में भी उसी की सरकार बननी चाहिए जिसकी सरकार केंद्र में है। इससे आपसी तालमेल के जरिए विकास करना आसान हो जाता है।

माना जाता है कि विकास के पैमाने पर नीतीश और नरेंद्र मोदी दोनों खरे उतरते हैं। दोनों के राजनीतिक करियर में यही एक समानता है कि जब भी इन्हें मौका मिला, इन्होंने अपने नेतृत्व से विकास की एक ऐसी लकीर खींची, जिसके आम लोगों के साथ-साथ विरोधी भी प्रशंसा करते रहे हैं। 

वैसे, कहा यह भी जा रहा है कि राज्य के कई क्षेत्र में स्थानीय मुद्दे भी इस चुनाव में अहम भूमिका निभाते नजर आएंगे।

बहरहाल, अब देखना होगा कि कौन सा मुद्दा यहां के मतदाताओं को आकर्षित करने में सफ ल होता है। 


15-Sep-2020 1:30 PM

संदीप पौराणिक  
भोपाल, 15 सितम्बर (आईएएनएस)|
मध्यप्रदेश में होने वाले विधानसभा के उप-चुनाव के जरिए पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की राज्य की सियासत में वापसी के आसार बनने लगे हैं। लंबे अरसे बाद उनकी एक बार फि र राज्य में सक्रियता बढ़ी है, साथ में भाजपा के चुनावी मंच पर भी नजर आने लगी हैं।

राज्य में अब 28 विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव होने हैं और भाजपा की कोशिश है कि इन उप-चुनाव में ज्यादा से ज्यादा स्थानों पर जीत दर्ज की जाए और इसके लिए वह हर रणनीति पर काम कर रही है। उसी क्रम में भाजपा ने अब पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की राज्य में सियासी हैसियत का लाभ उठाने की दिशा में कदम बढ़ाना शुरू कर दिया है।

उमा भारती की अगुवाई में भाजपा ने वर्ष 2003 में हुए विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी और वह मुख्यमंत्री भी बनी थी मगर हुगली विवाद के चलते उन्हें अपने पद से इस्तीफो देना पड़ा था। उसके बाद उमा भारती ने अलग पार्टी बनाई और उनकी प्रदेश की सियासत से दूरी बढ़ती गई। उमा भारती की भाजपा में वापसी हुई मगर राज्य की सियासत से उनका दखल लगातार कम होता गया और उन्हें भाजपा ने उत्तर प्रदेश से विधानसभा और लोकसभा का चुनाव लड़ाया और उनमें उन्होंने जीत भी दर्ज की।

उमा भारती को भाजपा की ओर से उत्तर प्रदेश का नेता स्थापित करने की कोशिशें हुई मगर वे खुद मध्य प्रदेश की सियासत में सक्रिय रहना चाहती रही है, परंतु उन्हें यह अवसर सुलभ नहीं हो पाया। राज्य के विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा, सभी में उमा भारती की राज्य से दूरी जगजाहिर रही। अब राज्य की सियासत में नए समीकरण बनने लगे हैं और इन स्थितियों ने शिवराज सिंह चौहान की उमा भारती के बीच नजदीकियां भी बढ़ा दी हैं। इस बात के संकेत उपचुनाव के दौरान नजर आने लगे हैं। बीते एक दशक में कम ही ऐसे अवसर आए है जब चौहान और उमा भारती ने एक साथ चुनाव प्रचार के लिए मंच साझा करते नजर आए हों, मगर अब दोनों की नजदीकी बढ़ी और वे मुंगावली व मेहगांव की सभा में दोनों नेताओं ने एक दूसरे की जमकर तारीफ की।

चौहान ने उमा भारती की तारीफ करते हुए कहा कि आत्मनिर्भर भारत के साथ हमारा संकल्प है कि हम आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश बनायेंगे। राज्य की संबल योजना पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के 'पंच ज' कार्यक्रम पर आधारित है और आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश का ग्राफ भी उमा भारती तैयार करेंगी।

इसी तरह उमा भारती ने भी चौहान की सराहना की और कहा कि प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ऐसा नेतृत्व चाहिए, जो आत्मविश्वास से भरा हो। केंद्र की योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए एक सक्षम हाथ चाहिए। शिवराज िंसंह चौहान में ये सभी खूबियां मौजूद हैं और विकास के काम में कोई कसर बाकी नहीं रखना उनका स्वभाव है। इसलिए प्रदेश को आत्मनिर्भर और मॉडल स्टेट बनाने के लिए आप आने वाले चुनाव में शिवराज को आशीर्वाद दें।

भाजपा के सूत्रों का कहना है की राष्ट्रीय स्तर के कुछ नेताओं के निशाने पर शिवराज सिंह चौहान और उमा भारती हैं, लिहाजा दोनों नेताओं को एक दूसरे के सहयोग और सहारे की जरूरत है। पार्टी के भीतर उभर रहे नए नेतृत्व ने इन नेताओं की चिंता बढ़ा दी है और यही कारण है कि अब चौहान और उमा भारती की नजदीकियां बढ़ गई हैं। अब तक चौहान ही उमा भारती को राज्य में सक्रिय होने से रोक रहे थे। वहीं भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष बी.डी. शर्मा की उमा भारती से काफी नजदीकियां है।

राजनीतिक विश्लेषक शिवम राज पटेरिया का कहना है कि भाजपा में सिर्फ दो पुराने ही ऐसे चेहरे हैं जिनकी राज्य के हर हिस्से में स्वीकार्यता है और वो है चौहान व उमा भारती। उन्हें कोई पसंद करे, नापसंद करें मगर नजरअंदाज (ग्इग्नोर) नहीं किया जा सकता। पार्टी के भीतर जो नए विकल्प सामने आ रहे हैं उनमें ज्योतिरादित्य सिंधिया, नरोत्तम मिश्रा, कैलाश विजयवर्गीय और विष्णु दत्त शर्मा जैसे नाम हैं मगर ये सभी क्षेत्रीय नेताओं के तौर में पहचाने जाते हैं।

राज्य में विधानसभा के उप-चुनाव में पिछड़ा वर्ग मतदाता नतीजों में बड़ी भूमिका निभा सकता है, लिहाजा उमा भारती पिछड़ा वर्ग का बड़ा चेहरा हैं, पार्टी इसका लाभ लेना चाहती है, यही कारण है कि उन्हें राज्य में सक्रिय किया जा रहा है। सियासी तौर पर चर्चा तो यहां तक है कि उमा भारती बड़ा मलेहरा विधानसभा क्षेत्र से उप-चुनाव भी लड़ सकती हैं, क्योंकि उमा भारती के करीबी प्रद्युम्न सिंह लोधी ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफो देकर भाजपा का दामन थामा है। प्रद्युम्न को खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति निगम का अध्यक्ष बनाकर कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया जा चुका है। पार्टी का कोई भी नेता इस मसले पर बात करने को तैयार नहीं है।


15-Sep-2020 1:28 PM

मनोज पाठक 
पटना, 15 सितम्बर (आईएएनएस)|
बिहार में अक्टूबर-नवंबर में संभावित विधानसभा चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ गई है। इधर, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) नेतृत्व वाले विपक्षी दलों के महागठबंधन में अभी तक सीट बंटवारे को लेकर सहमति नहीं बनी है, लेकिन महागठबंधन के 'थिंकटैंक' गठबंधन के कुनबे को बढ़ाने में जुटे हैं।

कहा जा रहा है इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में वामपंथी दल तो महागठबंधन के घटक दलों में शामिल होंगे ही, झारखंड की सत्तारूढ़ पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) भी महागठबंधन में शामिल होकर चुनाव मैदान में उतरने वाली है, जिसके संकेत झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुद दे चुके हैं।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन दो दिन पूर्व रांची में राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद से मिलने के बाद कह चुके हैं कि झामुमो बिहार में राजद के साथ मिलकर चुनाव मैदान में उतरेगी।

उल्लेखनीय है कि झारखंड में झामुमो, कांग्रेस और राजद की सरकार है। सूत्र बताते हैं कि कई छोटे दलों को बड़े दलों में मर्ज करने के लिए भी दबाव बनाया जा रहा है।

सूत्रों का कहना है कि राजद राज्य के सभी 243 सीटों पर घटक दलों के प्रभाव और क्षेत्रों में उम्मीदवारों की लोकप्रियता का भी आकलन कर रही है। कहा जा रहा है कि राजद इस चुनाव को प्रतिष्ठा से जोड़कर देख रही है, यही कारण है कि राजद महागठबंधन में शामिल सभी घटक दलों से इच्छुक सीटों की सूची भी मांग रही है।

राजद नेतृत्व घटक दलों को स्पष्ट संकेत भी भेज चुका है कि इस चुनाव में जिताउ उम्म्ीदवारों को ही चुनाव मैदान में उतारा जाए।

राजद के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी भी कहते हैं कि महागठबंधन का आकार अभी और बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि कई दलों से अभी बात हो रही है। इधर, सूत्र कहते हैं कि राजद ऐसे दलों को ही महागठबंधन में शामिल करना चाहता है जो राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद के उतराधिकारी उनके छोटे पुत्र तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री उम्मीदवार को लेकर उंगली नहीं उठा पाए।

राजद प्रवक्ता तिवारी स्पष्ट कहते हैं कि राजद महागठबंधन में सबसे बड़ा दल है। राजद पूर्व में ही घोषणा कर चुकी है कि पार्टी तेजस्वी यादव के नेतृत्व में चुनाव मैदान में उतरेगी और तेजस्वी ही मुख्यमंत्री के उम्मीदवार होंगे।

उल्लेखनीय है कि पिछले विधनसभा चुनाव में महागठबंधन में शामिल कांग्रेस, राजद और जदयू बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव मैदान में उतरे थे और राजद सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी।

इस चुनाव में जदयू राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल है। ऐसे में कहा जा रहा है कि राजद इस चुनाव में किसी भी हाल में पिछले चुनाव की तुलना में अधिक सीटों पर जीतने की योजना बना रही है, जिससे कोई भी तेजस्वी के नेतृत्व पर उंगली नहीं उठा सके।

सूत्रों का कहना है कि राजद नेतृत्व बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को भी महागठबंधन में लाने को लेकर प्रयासरत है।

बहरहाल, महागठबंधन का नेतृत्व भले ही अपना कुनबा बढ़ाकर खुद को और मजबूत करने में जुटी है, लेकिल कुनबा बढ़ने के बाद सभी की सहमति से सीट बंटवारा हो जाए, यह आसान नहीं होगा।
 


15-Sep-2020 1:27 PM

नई दिल्ली, 15 सितम्बर (आईएएनएस)| समाजवादी पार्टी के सांसद रामगोपाल यादव और कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने मंगलवार को राज्यसभा में बेरोजगारी के कारण लोगों के आत्महत्या करने का मुद्दा उठाया। यादव ने मांग की कि नौकरी गंवाने वाले लोगों को प्रति माह 15,000 रुपये दिए जाएं।

यादव की मांग का समर्थन करते हुए, कांग्रेस सांसद आनंद शर्मा ने कहा कि केंद्र को इस मामले को देखना चाहिए और ऐसे लोगों को वित्तीय सहायता प्रदान करनी चाहिए।

कांग्रेस लॉकडाउन के दौरान प्रवासियों की मौतों का कोई आंकड़ा नहीं होने के लिए पहले ही सरकार की आलोचना कर चुकी है।

कांग्रेस नेता पी.एल. पुनिया ने भी मनरेगा मजदूरों के मामले को उठाया और मांग की कि मजदूरी को बढ़ाकर 300 रुपये प्रतिदिन किया जाए, जबकि कांग्रेस की एक अन्य सदस्य छाया वर्मा ने मनरेगा में एक साल में काम के दिनों की संख्या बढ़ाकर 200 करने की मांग की।

कांग्रेस ने पिछले हफ्ते एशियाई विकास बैंक (एडीबी) और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की रिपोर्ट के हवाले से सरकार पर निशाना साधा था, जिसमें अनुमान लगाया गया है कि कोरोनावायरस के प्रसार के छह महीने में देश में बेरोजगारी की दर 32.5 प्रतिशत होने की आशंका है। इसके आगे, एक रिपोर्ट में कहा गया है कि तीन महीनों में युवा बेरोजगारी की दर 29.5 प्रतिशत होगी। 2019 में यह दर 23.3 प्रतिशत थी।

वहीं, सरकार ने दावा किया कि मनरेगा योजना के तहत, जून में देश भर में औसतन 3.42 करोड़ लोगों को रोजाना काम मिला, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 83.87 प्रतिशत अधिक है।

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, मई में मनरेगा के तहत औसतन 2.51 करोड़ लोगों को काम मिला, जो पिछले साल की इसी अवधि के 1.45 करोड़ के औसत आंकड़े से 73 प्रतिशत अधिक है। इसलिए, इस योजना के तहत मई में रोजगार में 73.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई।


15-Sep-2020 12:18 PM

नई दिल्ली, 15 सितंबर। समाजवार्टी पार्टी की सांसद और दिग्गज अभिनेत्री जया बच्चन ने एक्टर-राजनेता रवि किशन के सोमवार को संसद में दिए बयान पर निशाना साधा। जया बच्चन ने कहा कि सोशल मीडिया पर फिल्म इंडस्ट्री को बदनाम किया जा रहा है। इससे पहले, कल गोरखपुर से बीजेपी सांसद रवि किशन ने कहा था कि ड्रग्स की लत का शिकार बॉलीवुड भी है। सुशांत सिंह राजपूत मामले की जांच में ड्रग्स का एंगल सामने आने के बाद बॉलीवुड में ड्रग्स की चर्चा तेज हो गई है।

जया बच्चन ने आज राज्यसभा में बीजेपी सांसद के बयान को लेकर कहा, कुछ लोगों की वजह से, आप पूरी इंडस्ट्री की छवि खराब नहीं कर सकते हैं। मुझे कल बहुत बुरा लगा जब लोकसभा के एक सदस्य, जो खुद इंडस्ट्री से ताल्लुक रखते हैं, ने फिल्म इंडस्ट्री के बारे में खराब बोला। जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं।

बॉलीवुड में ड्रग्स के मुद्दे की गूंज सोमवार को संसद में भी सुनाई दी। भोजपुरी सुपरस्टार और बीजेपी सांसद रवि किशन ने इस मुद्दे को सदन में उठाया। मानसून सत्र में कार्यवाही के दौरान रवि किशन ने कहा कि ड्रग्स की तस्करी और युवाओं द्वारा इसका सेवन करना हमारे देश के सामने नई चुनौती बनकर सामने आया है। युवाओं को भटकाने के लिए चीन और पाकिस्तान साजिश के तहत पंजाब और नेपाल के जरिए यह ड्रग्स पूरे देश में फैलता है।
 
सांसद रवि किशन ने कहा कि ड्रग्स की लत का शिकार बॉलीवुड भी है। एनसीबी बहुत अच्छा काम कर रहा है। मैं केंद्र सरकार से अनुरोध करुंगा कि दोषियों को जल्द से जल्द पकडक़र सख्त सजा दी जाए ताकि पड़ोसी देशों की साजिश का अंत हो सके।  (khabar.ndtv.com)


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