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बदायूं की बहनें: छह साल लंबा मुक़दमा, रेप और हत्या के आरोप हटे
29-Oct-2020 1:13 PM 62
बदायूं की बहनें: छह साल लंबा मुक़दमा, रेप और हत्या के आरोप हटे

बदायूं की पीड़िता में से एक की मां

-दिव्या आर्य

2014 की गर्मियाँ थीं. दिल्ली में चलती बस में सामूहिक बलात्कार के बाद 'निर्भया' की मौत और उसके बाद यौन हिंसा के ख़िलाफ़ क़ानूनों को कड़ा किए जाने को एक साल से ज़्यादा हो गया था.

इसी दौरान उत्तर प्रदेश के बदायूं में एक पेड़ पर दो चचेरी बहनों के शव लटके पाए गए और ये भी आरोप लगे कि उनके साथ बलात्कार हुआ था.

दिल्ली से बदायूं के कटरा शहादतगंज गाँव का क़रीब आठ घंटे का सफ़र तय कर वहाँ पहुँचने वाले पहले पत्रकारों में मैं भी थी.

उसी पेड़ के नीचे उन लड़कियों में से एक के पिता ने मुझसे कहा था कि पिछड़ी जाति का होने की वजह से उनकी सुनवाई नहीं हुई, पुलिस ने समय रहते मदद नहीं की और बेटियों की जान चली गई.

यौन हिंसा के ख़िलाफ़ आम लोगों में ख़ूब ग़ुस्सा था. मीडिया का जमावड़ा हुआ, सरकार से सवाल पूछे गए और बलात्कार के मामले में कड़े क़ानूनों और जल्द इंसाफ़ के लिए आवाज़ उठी.

लापरवाही और आपराधिक षडयंत्र के आरोप में दो पुलिसकर्मी और सामूहिक बलात्कार और हत्या के आरोप में उसी गाँव के तीन भाई गिरफ़्तार कर लिए गए. सीबीआई को जाँच सौंपी गई और सुनवाई विशेष पॉक्सो अदालत में हुई.

लेकिन छह साल से ज़्यादा वक़्त बीतने के बाद भी बदायूं की इन बहनों का ये मुक़दमा जारी है.

लड़कियों के पिता को फ़ोन लगाया तो उन्होंने कहा, "न्याय का पता नहीं... अब देखो, क्या बताएँ. हर तारीख़ पर जाते हैं, जाना मजबूरी है. जब तक साँस चलेगी, तब तक जाते रहेंगे. मैं भीख मांगूँ चाहे जो हो, मन में है कि सच की विजय होगी."

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक़ अदालतों में बलात्कार के लंबित मुक़दमों की संख़्या साल 2013 से लगातार बढ़ी है. साल 2019 के अंत में क़रीब डेढ़ लाख मुक़दमे लंबित थे.

लेकिन बदायूं का मुक़दमा इनमें शामिल ही नहीं है. क्योंकि न्यायिक प्रक्रिया के दौरान उसमें से बलात्कार और हत्या की धाराएँ ही हटा दी गईं हैं.

छह साल का बदायूं केस का सफ़र, भारत में बलात्कार के मामलों में इसांफ़ की लंबी, रेंगती लड़ाई की कहानी बताता है.

बलात्कार के पेंडिंग मामले


कैसे हटी बलात्कार की धारा?

लड़कियों के परिवार के स्थानीय पुलिस पर जातिगत भेदभाव और लापरवाही का आरोप लगाने और निष्पक्ष जाँच की मांग करने पर बदायूं केस जून 2014 में ही सीबीआई को सौंप दिया गया था.

सीबीआई ने पीड़िता के परिवारवालों का ही लाई-डिटेक्टर टेस्ट करवाया.

पहले पोस्टमार्टम में बलात्कार और हत्या के साक्ष्य मिलने की बात कही गई थी. लेकिन उसे रात में और कम अनुभवी डॉक्टर द्वारा किए जाने का दावा करते हुए जुलाई में सीबीआई ने दूसरे पोस्टमार्टम की मांग की.

इसके लिए क़ब्र से शव निकलवाने के लिए परिवार से सहमति नहीं ली गई थी. उस समय सीबीआई प्रवक्ता कंचन प्रसाद ने बीबीसी से कहा था कि इसकी ज़रूरत नहीं है.

लेकिन लड़कियों को जहाँ दफ़नाया गया था, उस घाट पर बाढ़ का पानी भर जाने से शव नहीं निकाले जा सके और दोबारा पोस्टमार्टम नहीं हो पाया.

छह महीने से कम समय में अपनी तहक़ीक़ात पूरी करने के बाद दिसंबर 2014 में सीबीआई ने इसे 'आत्महत्या' का मामला बता कर और बलात्कार की पुष्टि ना होने की वजह से 'क्लोज़र रिपोर्ट' दाख़िल कर दी.

पीड़िता के पिता के मन में ग़ुस्सा और दुख दोनों हैं. वो कहते हैं, "हाथरस वाला परिवार भी सीबीआई जाँच से आस लगाए बैठा है, वो कुछ नहीं होने देंगे, हमारा कुछ नहीं किया, बल्कि हत्या को आत्महत्या बता दिया."

वो पेड़ जिस पर दो चचेरी बहनों का शव लटकता पाया गया था.

पीड़ित परिवार ने बदायूं की पॉक्सो अदालत में 'क्लोज़र रिपोर्ट' को ख़ारिज किए जाने की याचिका दाख़िल की.

नौ महीने बाद अदालत ने परिवार के हक़ में फ़ैसला देते हुए अक्तूबर 2015 में सीबीआई की 'क्लोज़र रिपोर्ट' ख़ारिज कर दी और मुख़्य अभियुक्त पप्पू यादव को तलब किया.

लेकिन अब केस काफ़ी कमज़ोर हो गया था. अदालत ने केस चलाने का फ़ैसला तो किया, लेकिन सीबीआई की बात मानते हुए बलात्कार और हत्या की धाराएँ हटा दीं. बाक़ी चार अभियुक्तों के ख़िलाफ़ पर्याप्त साक्ष्य ना होने की वजह से सिर्फ़ पप्पू यादव को बुलाया. कुछ दिन की क़ैद के बाद पप्पू को भी ज़मानत मिल गई.

पीड़ित परिवार के वकील ज्ञान सिंह ने बताया, "अब केस से बलात्कार, हत्या और आपराधिक षडयंत्र की धाराएँ हटा दी गई हैं, सिर्फ़ आईपीसी की 354, 363, 366 और पॉक्सो ऐक्ट की धारा 7 और 8 बची हैं, इसीलिए परिवार ने इस फ़ैसले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में एक और मुक़दमा दायर किया."

बदायूं की पीड़िता में से एक की दादी

शुरू हुआ एक और मुक़दमा

साल 2016 में पीड़िता के परिवार ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दायर कर बदायूं केस में धाराएँ बढ़ाने और सभी पाँच अभियुक्तों को दोबारा तलब किए जाने की मांग की.

धाराएँ बदलने का सीधा संबंध सज़ा की मियाद से है. भारतीय दंड संहिता की धारा 376 यानी बलात्कार के लिए कम से कम सात साल की सज़ा से लेकर अधिकतम उम्र क़ैद का प्रावधान है.

हत्या का आरोप सिद्ध होने पर धारा 302 के तहत अधिकतम मौत की सज़ा का प्रावधान है. वहीं महिला की मर्यादा भंग करने के इरादे से किए हमले की धारा 354 में दो साल, पॉक्सो ऐक्ट की धारा 7 और 8 के तहत तीन से पाँच साल, और अगवा करने से संबंधित धारा 363 और 366 में अधिकतम 10 साल की सज़ा का प्रावधान है.

उधर पप्पू के परिवार ने भी एक याचिका दायर की और कहा कि जब बाक़ी चार अभियुक्तों को छोड़ दिया गया है, तो उन्हें भी बरी कर दिया जाए.

दोनों मामलों को जोड़कर सुनवाई शुरू हुई और चार साल के बाद सुनवाई अब भी चल ही रही है. इस साल कोरोना महामारी के कारण लगे लॉकडाउन ने केस की गति और धीमी कर दी.

हाई कोर्ट में केस की पैरवी कर रहे वकील अमर बहादुर मौर्य ने बताया, "अब हाई कोर्ट में 'अर्जेंट' मामलों की सुनवाई शुरू हुई है लेकिन इस केस के लिए अगली तारीख़ मिलने का इंतज़ार है."

उधर पॉक्सो कोर्ट की कार्रवाई, हाई कोर्ट के फ़ैसले के इंतज़ार में रुक गई.

पोक्सो कोर्ट का आदेश

गाँव में क्या बदला?

पीड़िता के ही बराबर का उनका एक भाई, जिनकी उम्र तब 16 साल थी, वो अब 22 साल के हो गए हैं. एक बड़े शहर में नौकरी करने लगे हैं.

उनसे मिली, तो उन्होंने बताया कि इस पूरे मामले ने उनकी शख़्सियत पर बड़ा असर डाला है और अब वो किसी से डरते नहीं है.

उन्होंने कहा, "मुझे लगता था कि न्याय जल्दी मिलेगा, अब लगता है कि ना जाने कब मिलेगा. बस हासिल ये हुआ कि मुझे किसी चीज़ का डर नहीं है. पढ़ लिख गया हूँ और अनुभव भी हो गए हैं. कहीं भी जा सकता हूं. कचहरी, पुलिस, मीडिया के सामने कहीं भी खड़ा कर दो. मैं नहीं घबराता."

साल 2015 में, सीबीआई की क्लोज़र रिपोर्ट दाख़िल होने को बाद, मैं उनके गाँव कटरा शहादतगंज गई थी. तब वहाँ एक और बदलाव देखने को मिला था.

गाँव के एक-चौथाई घरों में शौचालय बन गए थे. साल 2014 में लड़कियों पर हमले के बारे में कहा गया था कि ये तब हुआ जब वो खेत में शौच करने गईं थीं. उसके बाद सुरक्षा के मद्देनज़र शौचालय बनवाने की मांग उठी.

पीड़िता के भाई के मुताबिक़ बीते सालों में और शौचालय नहीं बने, "बस एक नियम बन गया है कि लड़की घर से बाहर किसी परिवारवाले के बिना नहीं निकलेगी".

जैसा अक़्सर होता है, सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी लड़कियों पर निगरानी रखकर निभाई जाती है. लड़कों के आने-जाने पर रोक-टोक लगाने का कोई चलन नहीं है.

भाई की शादी अब तक नहीं हुई है. वो बताते हैं कि गाँव में अब बाहर से लोग अपनी बेटियाँ देने में कतराते हैं.

वो कहते हैं, "यहाँ लड़कियों की इज़्ज़त नहीं है, उन्हें मार दिया जाता है."

गांव के घरों में अब शौचालय बन गए हैं.

कड़े क़ानून से फ़ायदा मिला?
दिल्ली गैंगरेप से पहले ही साल 2012 में सरकार ने बच्चों के ख़िलाफ़ यौन हिंसा के लिए ख़ास क़ानून पॉक्सो ऐक्ट पारित किया था.

इसके तहत दर्ज किए जानेवाले मामलों के लिए विशेष अदालतों का प्रावधान बनाया गया था और अपराध के कॉग्निज़ेबल यानी संज्ञेय तय होने के बाद, सुनवाई जहाँ तक हो सके, एक साल में पूरी किए जाने की हिदायत दी गई थी.

वकील ज्ञान सिंह से जब मैंने पूछा कि पॉक्सो कोर्ट में अलग क्या होता है तो उन्होंने कहा, "कुछ ख़ास नहीं, ये भी आम कोर्ट की ही तरह होते हैं, वही जज होते हैं, वही वकील. बस अन्य कोर्ट की तुलना में केस थोड़ा जल्दी चलता है."

इस 'थोड़ा' को उन्होंने परिभाषित नहीं किया.

सरकार ने औरतों के ख़िलाफ़ यौन हिंसा के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को तेज़ करने के मक़सद से उनकी सुनवाई के लिए 'फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट' चिन्हित किए हैं.

मानवाधिकारों के उल्लंघन से जुड़े मामलों पर काम करनेवाली संस्था 'लॉयर्स कलेक्टिव' में वकील अमृता नंदा कहती हैं, "इस योजना के तहत कोई नई अदालतें नहीं बनाई गईं, ना ही कोई मूलभूत सुविधाओं में तब्दीली आई है, बस पहले से काम कर रहीं अदालतों को विशेष ज़िम्मेदारी दे दी गई है."

साल 2014-15 में 'पार्टनर्स फ़ॉर लॉ इन डेवलपमेंट' के भारत सरकार के साथ किए गए एक शोध के मुताबिक़ फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के बेहतर काम करने के लिए जाँच प्रक्रिया के कई ढाँचों को बेहतर करने की ज़रूरत है.

मसलन टेस्टिंग की रिपोर्ट जल्दी आएँ, उसके लिए फ़ॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरीज़ की संख्या और स्टाफ़ बढ़ाए जाएँ, जिन सबके बिना सुनवाई की मियाद कम करना मुश्किल है.

अमृता नंदा के मुताबिक़ बलात्कार के सभी मामले फ़ास्ट ट्रैक या पॉक्सो अदालत में भेजे जाएँ, ये ज़रूरी भी नहीं है.

जिन मामलों में हुई सज़ा


इंसाफ़ का इंतज़ार

पिछले साल, जून 2019 में संसद में दिए एक जवाब में क़ानून मंत्रालय ने बताया था कि 20 राज्यों और केंद्र शासित राज्यों में एक भी फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट नहीं था.

इसके बाद मंत्रालय ने 1,023 नए फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाने की योजना का ऐलान किया. इसमें 389 सिर्फ़ पॉक्सो मामलों के लिए और 634 बलात्कार और पॉक्सो दोनों तरह के मामलों के लिए चिन्हित किए गए.

बदायूं में भी मुक़दमों की संख्या ज़्यादा होने की वजह से पॉक्सो अदालत की संख़्या एक से बढ़ाकर तीन कर दी गई है.

लेकिन फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट से न्याय मिल जाए, ये ज़रूरी नहीं.

'सेंटर फ़ॉर लॉ एंड पॉलिसी रिसर्च' ने साल 2013-14 में कर्नाटक के 10 फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में तय हुए 107 और एक पॉक्सो कोर्ट में तय हुए 51 फ़ैसलों का अध्ययन किया है.

उन्हें फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में 'कन्विक्शन रेट' 17 फ़ीसदी और पॉक्सो कोर्ट में 7 फ़ीसदी मिला. एनसीआरबी के मुताबिक़ साल 2014 में बलात्कार के मामलों में 'कन्विक्शन रेट' की राष्ट्रीय औसत 28 फ़ीसदी थी.

रिपोर्ट ने पाया कि गवाहों का पलटना और पर्याप्त मेडिकल सबूत ना मिल पाना इसकी एक बड़ी वजह रही.

बदायूं की चचेरी बहनों के मामले में भी पोस्टमॉर्टम और एफ़एसएल रिपोर्ट में पर्याप्त सबूत ना मिलने और उनके सही तरीक़े से इकट्ठा ना किए जाने के सवाल पर ही बलात्कार की धारा को हटाया गया है.

छह साल से ज़्यादा वक्त से विशेष पॉक्सो कोर्ट के चक्कर लगा रहे पीड़िता के भाई ने कहा, "क़ानून तो बना दिए जाते हैं, लेकिन केस को फिर भी 10-10 साल लग जाते हैं."

"लेकिन हम निर्भया का मामला देखते हैं. वहाँ भी वक़्त लगा, लेकिन न्याय मिला. न्याय पर मेरी उम्मीद भी अब तक क़ायम है." (bbc.com/hindi)

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