विचार / लेख

देश की हवा, और देश की हालत
देश की हवा, और देश की हालत
04-Aug-2020 7:39 PM

गिरीश मालवीय

घर में शादी है पैसे नहीं है’ ...जब भी मुझे नोटबंदी के दो दिन बाद जापान में दिया गया मोदीजी का भाषण याद आता है खून खौल जाता है। 8 नवम्बर 2016 के शाम 8 बजे से भारत के दुर्भाग्य की शुरुआत हुई। कल उसके प्रभाव को सरकार ने स्वीकार किया है। वित्त सचिव अजय भूषण पांडे ने मंगलवार को संसदीय स्थायी समिति (वित्त) को बताया कि सरकार मौजूदा राजस्व बंटवारे के फार्मूले के अनुसार राज्यों को उनकी जीएसटी हिस्सेदारी का भुगतान करने की स्थिति में नहीं हैं।

वित्त सचिव के ऐसा कहे जाने पर सदस्यों ने सवाल किया कि सरकार राज्यों की प्रतिबद्धता पर किस तरह से अंकुश लगा सकती है। नाम ना जाहिर करने की शर्त में एक सदस्य ने बताया कि इसके जवाब में अजय भूषण पांडे ने कहा, ‘अगर राजस्व संग्रह एक निश्चित सीमा से नीचे चला जाता है तो जीएसटी एक्ट में राज्य सरकारों को मुआवजा देने के फार्मूले को फिर से लागू करने के प्रावधान हैं।’

दरअसल जीएसटी कानून में साफ है कि राज्यों को 14 प्रतिशत वृद्धि दर के हिसाब से पांच वर्षों तक राजस्व कमी की भरपाई की जाए, लेकिन अब मोदी सरकार इससे मुकर रही हैं, जनवरी, 2019 से मार्च, 2020 की अवधि के दौरान राज्यों को किए जाने वाले मुआवजे का भुगतान करीब 60,000-70,000 करोड़ रुपये बैठ रहा है। केंद्र को इसका भुगतान 2020 की पहली तिमाही तक करना था लेकिन अब तक वह रकम ड्यू है। रेलवे को अपने 15 लाख कर्मचारियों को पेंशन देने 55 हजार करोड़ की जरूरत है वो भी नहीं है देने के लिए जीएसटी से हासिल केंद्रीय राजस्व की बात करें तो वह तय लक्ष्य से करीब 40 फीसदी कम रहा है पिछले साल का, पहले के वर्षों की तुलना में जीएसटी राजस्व घटा है। वहीं उपकर भी जरूरत से कम आया है।

यह कोरोना काल से पहले की बात हो रही है तो ऐसा क्यो हो रहा है हम। सब अच्छी तरह से जानते हैं कि भारत नोटबंदी के बाद से ही आर्थिक मंदी के जाल में फंस चुका है लेकिन सरकार यह स्वीकार ही नही करना चाहती कि देश मे आर्थिक मंदी है जीएसटी संग्रह में कमी का कारण भी आर्थिक सुस्ती है। कब तक बचोगे एक न एक दिन असलियत आपको बताना ही होगी आज वित्त सचिव अजय भूषण पांडे ने यह स्वीकार किया है।

कुछ दिनों पहले ही लिख दिया था कि जल्द ही वह दिन आने वाले हैं जब राज्य सरकारों के पास अपने कर्मचारियों को तनख्वाह देने के पैसे नहीं होंगे। राज्य सरकारों ने अपने सारे सोर्स तो केंद्र सरकार के हवाले कर दिए हैं, जल्द ही सरकारी कर्मचारियों और सरकारी पेंशन धारकों को यह दिन देखना पड़ेगा जो मोदी जी ने बोला था। ‘घर में शादी है पैसे नहीं है।’

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