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चूल्हे का धुआँ महिलाओं के लिए बन रहा है जानलेवा बीमारियों की वजह
चूल्हे का धुआँ महिलाओं के लिए बन रहा है जानलेवा बीमारियों की वजह
15-Jul-2020 1:48 PM

मेहमान लेखक

कहते है कि भारत की आत्मा गांवों में बस्ती है। लेकिन अब इसे संयोग कहें या विडंबना कि गाँवों के केंद्र परिवारों के आधा सदस्य घरेलू प्रदूषण के कारण कई तरह की बीमारियों से जूझ रहे हैं।दरअसल ग्रामीण क्षेत्रों के ज़्यादातर परिवारों का खाना मिट्टी के चूल्हों पर बनता है, जिसमें ठोस ईंधन का इस्तेमाल किया जाता है। शहरी क्षेत्र के झुगी-झोपड़ी वाले इलाकों में भी इस ईंधन का इस्तेमाल कर खाना बनाया जाता हैं। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, भारत 24 करोड़ से अधिक घरों का देश है, जिनमें से क़रीब 10 करोड़ परिवार अभी भी एलपीजी को खाना पकाने के ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने से वंचित हैं और उन्हें खाना पकाने के लिए प्राथमिक स्रोत के रूप में लकड़ी, कोयले, गोबर के उपले, केरोसिन तेल जैसी चीजों का इस्तेमाल करना पड़ता हैं।

ऐसे ईंधन के जलने से उत्पन्न धुआं खतरनाक घरेलू प्रदूषण का कारण बनता है, जिससे कई तरह के श्वसन रोग सम्बन्धी विकारों का प्रतिकूल प्रभाव महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ता है।वैज्ञानिकों का भी मानना है कि लकड़ी जैसे अन्य ठोस ईंधनों का इस्तेमाल खाना बनाने में करने से फेफड़ों में प्रति घंटा चार सौ सिगरेट पीने जितना धुआं भरता है, जो किसी भी स्वस्थ व्यक्ति के लिए बेहद हानिकारक हो सकता है।

साल 2011 की आवास जनगणना डेटा हाइलाइट्स के अनुसार, भारत में खाना पकाने के लिए ईंधन का इस्तेमाल करने वाले 0.2 बिलियन लोगों में से 49 फ़ीसद जलाऊ लकड़ी का,  8.9 फ़ीसद गाय का गोबर केक, 1.5 फ़ीसद कोयला, लिग्नाइट या चारकोल, 2.9 फ़ीसद केरोसीन, 28.6 फ़ीसद लिक्विड पेट्रोलियम गैस (LPG), 0.1 फ़ीसद बिजली, 0.4 फ़ीसद बायोगैस और 0.5 फ़ीसद किसी अन्य साधन का इस्तेमाल करते हैं। 

जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में खाना पकाने के लिए 67.4 फ़ीसद घरों में मुख्य रूप से ठोस ईंधन का इस्तेमाल किया जाता है। यही आंकड़ा ग्रामीण क्षेत्रों में 86.5 फीसद का हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में 26.1 फीसद का। भारत में लगभग सत्तर करोड़ लोग खाना पकाने के लिए पारंपरिक ईंधन जैसे – लकड़ी, कोयला, गोबर के उपले और मिट्टी के तेल आदि का इस्तेमाल करते हैं। इस प्रक्रिया से उत्पन्न कालिख इन घरों में लोगों के जीवन और स्वास्थ्य पर काली छाया डाल रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, खाना पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रदूषणकारी ईंधन की वजह से भारत में हर साल 13 लाख लोगों की मौत होती है।

ठोस ईंधन काफी मात्रा में स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले प्रदूषकों का उत्सर्जन करते हैं, जिससे कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, बेंजीन, फॉर्मलाडेहाइड और पोलीरोमैटिक आदि जैसे विनाशकारी गैसों का उत्सर्जन होता हैं। घरेलू वायु प्रदूषण हानिकारक रसायनों और अन्य सामग्रियों से घरेलू वायु गुणवत्ता को दुष्प्रभावित करने से उत्पन्न होता है। वैज्ञानिकों का मानना हैं कि  यह (घरेलू वायु प्रदूषण) बाहरी वायु प्रदूषण से दस गुना अधिक दुष्प्रभावित कर सकता है।

विकासशील देशों में घरेलू वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य प्रभाव बाहरी वायु प्रदूषण की तुलना में बहुत अधिक हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ठोस ईंधन से उत्पन्न घरेलू वायु प्रदूषण की वजह से साल 2010 में 35 लाख लोगों की मौत हुई और वैश्विक दैनिक-समायोजित जीवन वर्ष (DALY) का दर भी 4.5 फीसद का रहा। इंडियन जर्नल फॉर कम्युनिटी मेडिसिन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, घरेलू वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव से प्रतिवर्ष क़रीब दो मिलियन लोगों की मौत होती हैं, जिसमें 44 फ़ीसद निमोनिया, क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) से 54 फ़ीसद और 2 फ़ीसद फेफड़ों के कैंसर के कारण होते हैं। सबसे अधिक प्रभावित समूह महिलाएं और छोटे बच्चे हैं, क्योंकि वे घर पर अधिकतम समय बिताते हैं।

इसी रिपोर्ट में ग्रामीण क्षेत्रों में ठोस ईंधन के इस्तेमाल से उत्सर्जित होने वाले विभिन्न रासायनिक गैसों और अन्य सामग्रियों से पैदा होने वाले बिमारियों के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, घरेलू वायु प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य दुष्प्रभावित होते हैं। इसके कारण श्वास सम्बन्धी संक्रमण, दीर्घकालिक या स्थायी फेफड़े की सूजन और सीओपीडी का कारण बनता है।

सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड से अस्थमा होने की संभावना होती है। इसके अलावा, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड श्वसन संक्रमण का कारण बनता है और फेफड़ों के कार्यों को बिगड़ता है। सीओपीडी और हृदय रोग के विस्तार में सल्फर डाइऑक्साइड की भी भूमिका होती है। कार्बन मोनोऑक्साइड के संपर्क में आने से गर्भवती महिलाओं के लिए जोखिम बढ़ जाता है। इससे कम वजन के बच्चे होने की संभावना होती है। साथ ही, प्रसवकालीन मृत्यु का डर भी बना रहता है। बायोमास धुआं विशेष रूप से धातु आयनों और पॉलीसाइक्लिक एरोमेटिक्स से मोतियाबिंद होने की भी संभावना बनी रहती है। पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन से फेफड़े, मुंह, नासॉफरीनक्स और स्वरयंत्र के कैंसर भी होता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में लोग गरीबी और जानकारी के अभाव में खाना बनाने में ठोस ईंधनों का इस्तेमाल करते हैं, जिसकी वज़ह से वे खुद को मौत के तरफ धकेल रहे हैं। हालांकि पिछले कुछ सालों में ऐसे घरों में कमी आयी हैं। लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2030 में खाना पकाने के लिए 580 मिलियन भारतीय ठोस ईंधन का इस्तेमाल करेंगे। ज़ाहिर है इससे न सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुँचेगा बल्कि मनुष्य के लिए भी एक गहरा संकट को जन्म देगा। (feminisminindiah)

(यह लेख पहले फेमिनिज्मइनइंडियाडॉटकॉम पर प्रकाशित हुआ है।)

 

 

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