विचार / लेख
(छत्तीसगढ़ के संदर्भ में एक असहज सच)
- पीयूष मिश्रा
प्रदेश के अनेक गांवों में सुबह जल्दी निकलें, तो एक दृश्य दुर्भाग्य से आम होता जा रहा है। कुछ घरों के दरवाजे बंद हैं, कुछ आंगन सूने हैं, और कहीं बच्चों की आंखों में है एक स्थायी इंतजार- यह इंतजार केवल किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस जीवंत दिनचर्या का है, जो कभी इन गांवों की रौनक हुआ करती थी।
आज स्थिति यह है कि गांव धीरे-धीरे खाली हो रहे हैं और शहरों पर बोझ बढ़ता जा रहा है। सरगुजा, जशपुर, महासमुंद, जांजगीर-चांपा, बस्तर और कांकेर जैसे जिलों से बड़ी संख्या में लोग हैदराबाद, सूरत, मुंबई और दिल्ली तथा उसके आस-पास के अर्बन कॉंगलोमेरट्स की ओर जाते हैं। यह प्रवृत्ति नई नहीं है, लेकिन इसका प्रभाव अब पहले से कहीं अधिक गहरा और व्यापक हो चुका है।
शहरों के ग्लैमर को परिभाषित करनेवाली गगनचुंबी इमारतें, कॉर्पोरेट हाइटेक दफ्तर और अपमार्केट मॉल, सभी गाँव से पलायन करनेवाले मजबूर... क्षमा करें... मजदूर ने ही बनाएं हैं। बहुत हद तक भारत में पलायन को एक सामान्य आर्थिक प्रक्रिया मान लिया गया है, परंतु इसके भीतर छिपा सामाजिक यथार्थ कहीं अधिक जटिल और चिंताजनक है। पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) 2020-21 के अनुसार देश में लगभग 28.9त्न जनसंख्या प्रवासी है। 2011 की जनगणना में 45 करोड़ से अधिक लोग अपने मूल स्थान से अलग रह रहे थे और हालिया अनुमान बताते हैं यह संख्या 60 करोड़ के आसपास जा चुकी है। इन प्रवासियों में बड़ी संख्या श्रमिकों की है, जिनके लिए पलायन विकल्प नहीं, परिस्थितिजन्य अनिवार्यता है। छत्तीसगढ़ में ही लगभग 88 लाख लोग किसी न किसी रूप में प्रवासन से जुड़े हैं। यह संकेत है कि यह मुद्दा अब व्यक्तिगत आजीविका नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना को प्रतिबिंबित करता है।
छत्तीसगढ़ जैसे युवा राज्य में, जहां बड़ी जनसंख्या कार्यशील आयु वर्ग में है, यह विषय अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। पलायन व्यक्ति का स्थानांतरण मात्र नहीं, बल्कि गांव की श्रमशक्ति, ऊर्जा और संभावनाओं का विघटन भी है। परिणामस्वरूप एक ओर गांवों की आर्थिक गतिविधियां कमजोर पड़ती हैं और दूसरी ओर शहरों में अवसंरचना पर दबाव, झुग्गी-बस्तियों का विस्तार और असंगठित श्रम का शोषण बढ़ता है। अत: प्रवासन एक साथ ग्रामीण क्षरण और शहरी असंतुलन—दोनों की जननी है।
परंतु इस पूरी प्रक्रिया का सबसे गहरा और अनदेखा प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। गांवों में ऐसे असंख्य बच्चे हैं, जिनके पिता, और कुछ के माता-पिता दोनों, महीनों या वर्षों से बाहर हैं। वे दादा-दादी या अन्य परिजनों के साथ रहते हैं लेकिन उनके जीवन में एक स्थायी भावनात्मक रिक्तता धीरे-धीरे आकार लेने लगती है। बच्चा प्रतिदिन किसी संवाद, किसी स्पर्श, किसी उपस्थिति की प्रतीक्षा करता है। वह जानता है कि पिता दूर हैं, फिर भी हर शाम उसके भीतर एक उम्मीद बनी रहती है। समय के साथ यह प्रतीक्षा असुरक्षा में बदल जाती है-वह कम बोलने लगता है, चिड़चिड़ा हो जाता है और उसका आत्मविश्वास डोल जाता है। यह केवल भावनात्मक समस्या नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण की जड़ में लगने वाली दरार है।
हमारी संस्कृति में परिवार केवल एक सामाजिक इकाई नहीं, अपितु जीवन का आधार माना गया है। संयुक्त परिवार, पीढिय़ों के बीच सतत् संवाद, साथ बैठ कर भोजन करना और दिनभर की घटनाओं को साझा करना, ये सब केवल परंपराएं नहीं, बल्कि मनुष्य के मानसिक संतुलन के स्तंभ हैं। जब पलायन इस संरचना को तोड़ता है, तो उसका प्रभाव केवल एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहता। बच्चे अपने माता- पिता के साथ जो संवाद, अनुशासन और स्नेह सीखते, वह उनसे छूट जाता है। यही कारण है कि आज हमें कुटुंब-प्रबोधन की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है, परिवार को पुन: केंद्र में लाने की आवश्यकता है।
स्वयं एक औद्योगिक इकाई के संचालन के अनुभव से यह द्वंद्व अधिक स्पष्टता से समझ आता है। मेरे गांव के समीप उद्योग स्थापित करने का एक प्रमुख उद्देश्य यह भी था कि स्थानीय लोगों को ऐसी आजीविका मिले, जहां से वे प्रतिदिन अपने परिवार के पास लौट सकें। यहां मजदूरों को मिलने वाली आय शहरी क्षेत्रों की तुलना में कुछ कम हो सकती है, परंतु इसके बदले जो मिलता है, वह है बच्चों के साथ समय, पारिवार के साथ संवाद और सामाजिक संतुलन। दिन कैसा भी गुजरे शाम में घर लौटकर वे और उनका पारिवार एक-दूसरे से वंचित नहीं रहते। यह उनके द्वारा ऐसा अमूर्त निवेश है, जिसका मूल्य किसी मूर्त वेतन से नहीं आंका जा सकता।
लेकिन इसी के साथ एक कड़वी सच्चाई भी सामने आती है। उद्योग में ऐसे श्रमिक भी हैं, जो दूर-दराज से आकर महीनों तक अपने परिवार से दूर रहते हैं। उनकी आंखों से कमाई की मजबूरी स्पष्ट टपकती है, परंतु जीवन में स्थिरता का अभाव भी उतना ही स्पष्ट दिखता है। दूसरी ओर, कई बार यह भी देखने में आता है कि स्थानीय युवा अपने गांव में उतनी उत्पादकता से कार्य नहीं करते, जितनी वे बाहर जाकर करते हैं। वही व्यक्ति, जो गांव में अनुशासन से कार्य नहीं करता, बाहर जाकर लंबे समय तक कठिन परिस्थितियों में काम करता है और कई बार शोषण तक सहन करता है। यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि माइन्ड्सेट का संकट है-अपने परिवेश का अवमूलन और बाहरी अवसरों का अति-मूल्यांकन।
प्रवासी श्रमिकों की स्थिति का एक और पहलू है, जो समाज के लिए चिंताजनक है। परिवार से दूर, अस्थायी, अनियंत्रित और असुरक्षित परिस्थितियों में रहने के कारण कई बार मद्यपान की प्रवृत्ति और पॉर्न की खपत में वृद्धि देखी जाती है, जिसके फलस्वरूप रेप और हत्या जैसे जघन्य अपराध की घटनाएं भी सामने आती हैं। यह केवल व्यक्तिगत पतन नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना के विघटन का संकेत है। जब यही व्यक्ति अपने गांव लौटता है, तो यह व्यवहार भी साथ लाता है, जिससे धीरे-धीरे समाज का मूल स्वरूप प्रभावित होता है।
छत्तीसगढ़ जैसे युवा राज्य, जिसकी माध्य आयु लगभग 24-26 वर्ष के बीच आँकी जाती है, के लिए यह स्थिति विशेष रूप से गंभीर है, क्योंकि यह सीधे-सीधे उसकी मानव संसाधन क्षमता पर चोट करती है।
यदि बच्चे भावनात्मक असुरक्षा, सामाजिक असंतुलन और मार्गदर्शन के अभाव में बड़े होंगे और युवाओं को कार्य-व्यवहार की नैतिक चुनौतियाँ से दो-दो हाथ होते रहना पड़ेगा,
तो यह दीर्घकाल में राज्य की उत्पादकता और सामाजिक स्थिरता दोनों को प्रभावित करेगा। किसी भी राज्य की वास्तविक शक्ति उसके खनिज संपदा या उद्योग नहीं, बल्कि उसकी युवा पीढ़ी की गुणवत्ता में निहित होती है।
समाधान के लिए सबसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि पलायन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक मुद्दा है। सरकार ने मनरेगा (अब व्ही बी जी राम जी), वनोपज आधारित योजनाओं, कौशल विकास कार्यक्रमों और ग्रामीण आजीविका मिशनों के माध्यम से महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं। छत्तीसगढ़ में विशेष रूप से वनोपज मूल्य संवर्धन और ग्रामीण रोजगार के क्षेत्र में पहलें हुई हैं। रोजगारोन्मुख गुणवत्तापूर्ण कौशल विकास तथा प्रशिक्षण में एमपलॉयबिलिटी पर विशेष बल देना अत्यंत आवश्यक है, जिसकी कमी वर्तमान में कई क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। अत: एक यथार्थवादी, बाजार-केंद्रित और एकीकृत दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य है, जो प्रशिक्षण से लेकर रोजगार तक की पूरी श्रृंखला को प्रभावी रूप से संबोधित करे।
इनके अलावा, नई गतिविधियां भी हैं जिन्हें सरकारी एजेनसियों तथा विभागों द्वारा किया जाना वांछनीय है। प्रमुख पलायन वाले जिलों पर जिला स्तरीय माइग्रेशन मैपिंग पायलट परियोजना के तहत अनिवार्य की जानी चाहिए-कौन, कहां और क्यों पलायन कर रहा है, इसका स्पष्ट डेटा तैयार हो।
इसी कड़ी में ग्राम क्लस्टरों में उपलब्ध मानव संसाधन के कौशल-मानचित्रण के आधार पर उद्योगों को प्रोत्साहन एवं उनका विकास सुनिश्चित किया जाए। साथ ही राज्य में स्थापित होनेवाले वृहद और मध्यम तथा लघु उद्योगों में गुणवत्ता युक्त प्रक्षीकक्षण तथा प्रक्षीकक्षण-पश्चात् आजीविका की पुष्टि सुनिश्चित हो। प्रवासी श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा, आवास और परिवार से संपर्क बनाए रखने की व्यवस्था विकसित की जाए। इसी तारतम्य में, सभी नहीं, तो कम से कम चुनिंदा क्षेत्र के स्कूलों में भी स्थायी तौर पर बच्चों के लिए भावनात्मक मूल्यांकन और काउंसलिंग व्यवस्था आवश्यक है।
लेकिन यह सब केवल शासन-प्रशासन की जवाबदेही नहीं है। समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि गांव में कार्य करना कमतर नहीं है, और जीवन का मूल्य केवल आय से नहीं मापा जाता। परिवार के साथ समय बिताना, सामुदायिक जीवन में भागीदारी और संतुलित जीवनशैली-ये सब भी विकास के उतने ही महत्वपूर्ण आयाम हैं।
यदि यह विषय आपको भीतर से विचलित कर रहा है, तो यही संकेत है कि अब समय आ गया है कि हम पलायन को केवल अर्थशास्त्र के चश्मे से नहीं, बल्कि समाजशास्त्र, संस्कृति और मानवीय मूल्यों के दृष्टिकोण से समझें। तभी हम एक ऐसे विकास मॉडल की ओर बढ़ सकेंगे, जो केवल आय नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता, परिवार की स्थिरता और समाज के संतुलन को भी सुनिश्चित करेगा।
(लेखक एक युवा उद्यमी हैं जो पूर्व में छत्तीसगढ़ सरकार में मुख्यमंत्री सुशासन फेलो तथा राज्य नीति आयोग में पॉलिसी कन्सल्टेन्ट रह चुके हैं।)


