विचार / लेख
डिस्क्लेमर: इस ख़बर में गांव के नाम में जाति-सूचक शब्द का उल्लेख केवल सामाजिक भेदभाव की वास्तविकताओं को सामने लाने के लिए किए गए हैं. इनका उद्देश्य किसी भी प्रकार के जातिगत भेदभाव या पूर्वाग्रह को बढ़ावा देना, उसका समर्थन करना या उसे सामान्य मानना या बनाना नहीं है.
"आप कहां रहती हैं?"
इस सवाल के जवाब में मेनका भारती कुछ क्षण के लिए रुकती हैं.
उनके पीछे खेतों की ओर जाता एक कच्चा रास्ता है. घर के पीछे खड़े आम के पेड़ की छांव में बैठी मेनका फिर जवाब देती हैं, "हम अपने गांव का नाम बदलना चाहते हैं."
मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले के बगौता ग्राम पंचायत में बसे चमरुआपुरवा गांव की गलियों में रोजमर्रा की ज़िंदगी अपनी रफ्तार से चलती है.
राजधानी भोपाल से लगभग 330 किलोमीटर दूर बसे इस गांव से बच्चे स्कूल जाते हैं, लोग काम पर निकलते हैं और गांव के मुहाने पर बना प्राथमिक स्कूल यहां आने वालों को इसका नाम बताता है.
लेकिन यहां रहने वाले लोगों का कहना है कि यह "सिर्फ़ एक नाम" नहीं है.
उनके मुताबिक, गांव का नाम सुनते ही कई लोग उनकी जाति का अनुमान लगाते हैं. और इसका असर उनकी रोज़मर्रा की जिंदगी के कई पहलू जैसे पढ़ाई, किराये के मकान की तलाश और हर दिन की बातचीत तक में दिखाई देता है.
मेनका सकुचाते हुए बताती हैं कि उन्हें पहली बार इसका एहसास स्कूल में हुआ था.
"स्कूल में जो भैया थे, गाड़ी वाले, वो स्कूल के बाहर खड़े होकर जब बच्चों को बुलाते थे कि फलाना गांव के बच्चे जल्दी आओ तो सुनने में ही बहुत बुरा लगता था. उस वक्त तो ऐसा लगता था जैसे कोई गाली दे रहा हो."
जब हमने उनसे पूछा कि क्या लोग उनके गांव का नाम सुनकर किसी तरह की राय बना लेते हैं या उन्हें जज करते हैं, तो वह कहती हैं, "हां, जज तो करते हैं. यह नाम एक पहचान जैसा है. गांव का नाम ही एक तरह की पहचान बन जाता है."
मेनका अकेली नहीं हैं.
गांव के रहने वाले संजय अहिरवार कहते हैं कि उन्होंने पहली बार इसका असर तब महसूस किया जब वह उच्च शिक्षा के लिए उज्जैन गए.
वो कहते हैं, "वहां मेरे साथियों ने मुझसे पूछा कि मैं कहां से हूं. मैंने बताया कि मैं छतरपुर से हूं. फिर उन्होंने पूछा कि छतरपुर में कहां से, तो मैंने कहा कि बगौता से हूं. उन्होंने पूछा भाई ये तुम्हारे गांव का नाम है ? मैं चुप रहा, लेकिन उसके बाद मैंने आगे नहीं बताया कि मैं किस गांव से हूं."
संजय कहते हैं कि यह सिर्फ़ एक घटना नहीं थी.
किसी नए व्यक्ति को अपनी क्या पहचान बताएं?
संजय के पड़ोस में रहने वाले प्रवेश अहिरवार कहते हैं, "चार लोगों के बीच कोई नया आए, पूछे कि कहां से हो. तो वो बात आ ही जाती है. मैं नहीं बोलूं तो सामने वाला बोल देता है कि फलाने गांव से हैं. तब अच्छा नहीं लगता."
उनके लिए रोज़मर्रा का यह आम सवाल सिर्फ़ एक गांव के नाम का सवाल नहीं है.
संजय कहते हैं, "ये सिर्फ़ नाम नहीं है, बल्कि एक सिंबल यानी कि एक तरह की पहचान है. जाति गाली के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाली पहचान. जैसे आप अगर इतिहास देखें, तो चमार शब्द को गाली के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था, आज भी उसी तरह इसे गाली के तौर पर यूज़ किया जाता है. तो हमारे अंदर एक फीलिंग आती है कि सामने वाला हमें गाली दे रहा है."
मेनका, प्रवेश और संजय जैसे इस गांव के कई लोगों को इसी समस्या का सामना करना पड़ता है.
संजय बताते हैं कि अब उन्होंने इससे बचने का अपना तरीका बना लिया है.
"इसका कोई परमानेंट उपाय तो नहीं है. मैं कोशिश करता हूं कि पहले अपने जिले का नाम बता दूं. अगर फिर भी लोग पूछें तो पंचायत का नाम बता देता हूं. जितना हो सके, कोशिश करता हूं कि मेरे गांव का नाम न आए."
प्रवेश अहिरवार भी कहते हैं कि गांव का नाम सामने आते ही लोगों का रवैया बदल जाना असामान्य नहीं है.
'गांव का नाम सुनकर फोन काट दिया'
कमरा तलाशने के दौरान हुई एक घटना का जिक्र करते हुए वह कहते हैं, "जैसे मैंने अपना नाम बताया, अपना परिचय दिया, अपने गांव का नाम बताया, तुरंत फोन काट दिया."
जब हमने पूछा कि क्या यह अनुभव उन्हें कई बार हुआ तो वो कहते हैं, "अभी आपके सामने करता हूं कुछ लोगों को फोन, आप खुद देख लीजिए".
इसके बाद प्रवेश ने हमारे सामने किराए के मकान के लिए एक व्यक्ति को फोन लगाया. बातचीत सामान्य तरीके से शुरू हुई.
दूसरी तरफ़ मौजूद व्यक्ति ने उनसे अगले दिन आकर कमरा देखने के लिए कहा.
लेकिन कुछ देर बाद जब प्रवेश ने अपना परिचय दिया और बताया कि वह किस गांव से हैं, तो फोन कट गया.
प्रवेश ने दोबारा फोन लगाया.
फिर एक बार और.
लेकिन इस बार कॉल का जवाब नहीं मिला.
प्रवेश का कहना है कि कई बार लोग सीधे कुछ नहीं कहते, लेकिन व्यवहार बदल जाता है.
उन्होंने कहा, "जब मैं अपना पूरा पता बताता हूं, तो सामने वाले व्यक्ति का व्यवहार बदल जाता है. गांव का नाम सुनते ही उनके बात करने का तरीका, देखने का नजरिया और समझने का ढंग सब अलग हो जाता है. कई बार तो लोग मुझसे बात करना ही कम कर देते हैं या बिल्कुल बंद कर देते हैं."
यह समस्या सिर्फ़ एक समुदाय तक ही सीमित नहीं है.
गांव में रहने वाली प्रियंका साहू और उनके पति ने करीब तीन साल पहले यहां मकान बनवाया था.
उनके मकान के एक हिस्से में मरम्मत का काम चल रहा है.
प्रियंका ने शहर के करीब रहने के लिए यहां घर बनाया. लेकिन वो कहती हैं कि गांव के नाम से जुड़ी धारणाएं उनके भी हर दिन के कामकाज को कठिन बनाती हैं.
प्रियंका ने पीछे चल रही मशीनों को बंद करवाते हुए कहा. "यहां के लिए रिक्शा नहीं मिलता है. या तो तालाब के पास छोड़ देंगे या फिर रोड पर. जो यहां के रिक्शावाले हैं, वो ही यहां आते हैं. मेरा यह मानना है कि किसी व्यक्ति को उसकी जाति से जोड़कर देखना या पुकारना अपमानजनक है. लेकिन हमें हर दिन यही अपमान झेलना पड़ता है".
इसी गांव से कुछ दूर रहने वाले रुद्र प्रताप सिंह का भी मानना है कि ऐसे नामों को बोलने या बताने में दिक्कत होती है.
उन्होंने कहा, "जातिसूचक नाम तो बहुत सारी जगहों के हैं, जैसे चौबेपुर कॉलोनी. ये यहीं छतरपुर शहर में है, शायद इस नाम को लेने से किसी को अपनमानजनक न महसूस हो. लेकिन बगौता ग्राम पंचायत में जो गांव है उसका नाम लेने में वहां के लोगों को भी बुरा लगता है और हम लोगों को भी. इसका नाम तुरंत बदला जाना चाहिए और ऐसे नाम जहां जहां हैं उन सबको बदल देना चाहिए. इस से भेदभाव कम होगा".
गांव का नाम लेने में असहजता अब गांव के बुजुर्गों को भी होती है जिन्होंने पहले कभी इस पर कुछ खास विचार नहीं किया.
गांव के बुजुर्गों की राय भी हमेशा ऐसी नहीं रही.
67 साल के भुल्ली अहिरवार बताते हैं कि पहले उन्हें गांव के नाम में कुछ गलत नहीं लगता था.
हमने उनसे पूछा कि क्या उन्हें पहले भी यह नाम असहज करता था. वह हंसते हुए कहते हैं, "नहीं, नहीं... उस वक्त नहीं लगता था."
फिर कुछ देर रुककर कहते हैं, "पहले तो ऐसा ही होता था. हमारे जात बिरादरी के आधार पर यह नाम रखा गया. लेकिन धीरे-धीरे आदमी को ज्ञान हुआ. बच्चे पढ़ने लिखने लगे तो उन्हें परेशानी होने लगी. तब हमें भी ज्ञान हुआ और यह लगा कि यह गलत है. गांव के नाम ऐसा नहीं होने चाहिए."
कुछ स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसे नाम बहुत पुराने हैं और यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें किन परिस्थितियों में रखा गया था. लेकिन उनका मानना है कि अगर किसी नाम को बताने में लोगों को असहजता महसूस होती है तो उस पर विचार होना चाहिए.
एक स्थानीय निवासी कहते हैं, "ये नाम आज से तो हैं नहीं, कई सालों से चले आ रहे हैं. लेकिन अगर कहीं बताने में बुरा लगता है, तो ऐसे कई नाम हैं, उनको समय के हिसाब से बदलना चाहिए."
हालांकि ऐसे नाम सिर्फ़ इसी गांव तक सीमित नहीं हैं.
देश के कई हिस्सों में मौजूद हैं ऐसे गांव
देश के कई हिस्सों में ऐसे गांव, सड़कें और बस्तियां मौजूद हैं जिनके नाम जातिसूचक हैं.
साल 2025 में महाराष्ट्र सरकार ने ऐसे गांवों, सड़कों और आवासीय बस्तियों के नाम बदलने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे. नए दिशा-निर्देशों में ऐसे नामों की जगह लोकतांत्रिक मूल्यों या प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों के नाम अपनाने की बात कही गई.
इसी तरह अक्तूबर 2025 में तमिलनाडु सरकार ने जातिसूचक या भेदभावपूर्ण माने जाने वाले नामों की पहचान और उन्हें बदलने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए.
तमिलनाडु सरकार ने कहा कि ऐसे नामों वाले सड़कों, गलियों, आवासीय इलाकों, बस स्टैंडों, बाजारों, जल निकायों और ग्राम पंचायतों में भी बदलाव किया जाएगा.
उत्तर प्रदेश में भी यह मुद्दा राजनीतिक स्तर पर उठ चुका है. मार्च 2026 में सत्तारूढ़ बीजेपी के विधान परिषद सदस्य लालजी प्रसाद निर्मल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाक़ात कर ऐसे गांवों और कस्बों की सूची सौंपी जिनके नाम दलित समुदायों से जुड़े हैं. उन्होंने राज्य भर में ऐसे गांवों और कस्बों की पहचान कर सूची तैयार करने और उनके नाम बदलने की मांग की थी.
गांव का नाम बदलने की मांग उठी
छतरपुर के इस गांव के लोगों ने भी कई बार नाम बदलने की मांग उठाई है.
ग्रामीणों के अनुसार, हाल के समय में उन्होंने साल 2022 में ज़िला कलेक्टर और तहसीलदार को नाम बदलने के लिए ज्ञापन सौंपा था. हालांकि अब तक कोई बदलाव नहीं हुआ है.
छतरपुर ज़िला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी नमः शिवाय अरजरिया कहते हैं कि ज़िले में ऐसे कई गांव हैं जिनके नाम जातिसूचक हैं और ऐसे गांवों की सूची तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है.
उनका कहना है, "जो भी इस प्रकार के नाम वाले गांव मौजूद होंगे, उनको सूचीबद्ध कराया जाएगा. फिर ग्राम पंचायत के प्रस्ताव और तय प्रक्रिया के अनुसार आगे कार्रवाई की जाएगी."
इलाके के ज़िला कलेक्टर पार्थ जायसवाल ने भी इस बात पर खेद प्रकट करते हुए कहा, "आज एक दौर में भी ऐसे नाम होना उचित नहीं है. हम अपनी तरफ़ से भी कोशिश करेंगे कि ऐसे गांवों को चिन्हित करके और तय प्रक्रिया के अनुसार ग्रामीणों की सहमति से नाम बदले जाएं".
लेकिन सवाल यही है कि क्या गांव का नाम बदलने से सचमुच कुछ बदलेगा?
संजय को ऐसा लगता है. वो कहते हैं, "नाम बदल जाएगा तो बहुत कुछ बदलेगा. लोगों का नज़रिया बदलेगा. आगे आने वाले बच्चे जब बाहर जाएंगे तो बिना झिझक के अपनी पहचान बता पाएंगे."
मेनका की भी यही उम्मीद है. वो कहती हैं, "शायद तब, आप कहां रहती हैं जैसे एक साधारण सवाल का जवाब देने में मुझे झिझक नहीं होगी. मैं खुलकर अपनी पहचान बता पाऊंगी".
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.


