विचार / लेख

पत्रकारिता का अर्थ ‘मजे ले लो डॉट कॉम’ नहीं होता!
12-May-2026 8:42 PM
पत्रकारिता का अर्थ ‘मजे ले लो डॉट कॉम’ नहीं होता!

-डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी

(भोपाल के भारत भवन में  हिन्दी  पत्रकारिता के 200 साल पूरे होने पर  ‘प्रणाम उदन्त मार्तंड’  के नाम से  तीन दिन चले शानदार आयोजन के समापन समारोह में अध्यक्षता करने का मौका मिला। अपने अध्यक्षीय भाषण में मैंने जो कुछ कहा,  उसकी खास-खास बातें)

* 30 मई 1826 को, 200 साल पहले  हिन्दी   का पहला समाचार पत्र शुरू हुआ था, जिसका नाम था उदन्त मार्तंड. साप्ताहिक अखबार था। संपादक थे पंडित जुगल किशोर शुक्ल।

* जिस जगह से अखबार शुरू हुआ, वह जगह थी कोलकाता। कोलकाता में लोग बांग्ला भाषा बोलते हैं, हिन्दी बोलने वाले कम हंै,  इसलिए उदन्त मार्तण्ड जैसा अखबार निकालना और चलाना बहुत बड़ी चुनौती  थी।

* उदन्त मार्तंड हिन्दी का पहला अखबार था, लेकिन भारतीय भाषाओं में और भी अखबार पहले से छप रहे थे।

* बांग्ला भाषा में 'दिग्दर्शन' नाम का अखबार  1818 से छप रहा था। अखबार ईसाई मिशनरीज़ वाले निकाल रहे थे और उनका लक्ष्य धर्म प्रचार था।

* बांग्ला में ही का एक और अखबार था ‘समाचार दर्पण’। वह भी ईसाई धर्म प्रचार के लिए था।

* 1821 में राजा राममोहन राय ने ‘सम्वाद कौमुदी’  शुरू किया था. राजा राम मोहन राय बड़े क्रांतिकारी व्यक्ति थे और उन्होंने महिलाओं के उत्पीडऩ के खिलाफ जमकर लिखा, बोला और काम किया था.

* 1822 में ही ‘चन्द्रिका’ नाम का अखबार शुरू हुआ और उसकी खास बात यह थी कि वह राजा राममोहन राय के क्रांतिकारी विचारों का विरोध करने वाला अखबार था। यह भी बांग्ला में ही था।

* राजा राममोहन राय ने 1822 में फारसी में एक अखबार शुरू किया था, जिसका नाम था ‘विरात-उल-अखबार’ यानी अखबार का दर्पण!  1822  में ही फारसी में एक और अखबार निकला ‘जाम-ए-जहांनुमा’ मतलब दुनिया को दिखाने वाला दर्पण।

* गुजराती भाषा में 1822 में ‘मुंबई समाचार’ (पहले नाम था बम्बई समाचार) शुरू हुआ था। यह अखबार आज भी छप रहा है और इसका नाम मुंबई समाचार कर दिया गया है।

* राजा राममोहन राय और द्वारकानाथ टैगोर ने1822 में यानी आज से 204 साल पहले ‘बंग दूत’ नाम का अखबार शुरू किया था। मजेदार बात यह है कि यह अखबार चार भाषाओं में था- अंग्रेजी, बांग्ला, फारसी और हिन्दी । अंग्रेजो की हुकूमत थी,  इसलिए अंग्रेजी जरूरी थी,  अखबार बंगाल से  निकला था, इसलिए बांग्ला जरूरी थी। अदालतों की भाषा फारसी हुआ करती थी, उसके लिए फारसी  जरूरी थी और सबसे अंत में हिन्दी  थी, क्योंकि हिन्दी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा तब भी  थी।

* * *

उदन्त मार्तण्ड 30 मई 1826 को शुरू हुआ साप्ताहिक अखबार था, लेकिन  डेढ़ साल के बाद ही 4 दिसंबर 1827 को उसका 79वां अंक निकलते ही बंद कर देना पड़ा।

उदन्त मार्तण्ड को बंद क्यों करना पड़ा?  क्योंकि वह अखबार अंग्रेजी  हुकूमत के खिलाफ ‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत’ था’ उसके पाठक देश भर में थे और वह अखबार डाक से पूरे भारत में भेजा जाता था. डाकखाने सरकारी थे और नीतियां अंग्रेजों की थी, उन्होंने डाक से समाचार पत्र भेजने का जो शुल्क रखा था वह इतना ज्यादा था कि उदन्त मार्तण्ड जैसे अखबार के लिए सर्वाइव  करना मुश्किल हो गया. उदन्त मार्तण्ड  की तरफ से बार-बार इस बारे में अपील की गई कि अगर अंग्रेजी  के और मिशनरीज के अखबारों को भेजने का शुल्क नाम मात्र का है, तो हिन्दी के अखबार को डाक से भेजने पर इतना शुल्क क्यों लिया जाता है? अंग्रेजी  हुकूमत उनकी बात क्यों सुनती,  क्योंकि उदन्त मार्तण्ड  का तो लक्ष्य ही था- ‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत’। 

उदन्त मार्तण्ड  को विज्ञापन का सपोर्ट नहीं था. हिंदुस्तानियों की पर्चेसिंग पावर कम थी। हिन्दी भाषा में साक्षरता का प्रतिशत भी बहुत सीमित था, जाहिर है अखबार का प्रचार-प्रसार आसान काम नहीं था। 

डेढ़ साल के संघर्षों के बाद ‘उदन्त मार्तण्ड’ बंद करना पड़ा। जो सुविधाएँ ईसाई मिशनरीज के अखबारों को थीं, हिन्दी के पहले अखबार को बार-बार की अपील के बाद भी नहीं मिली थी।

हिन्दी का पहला अखबार निकलना एक बड़ी ऐतिहासिक घटना थी, और उसका बंद होना उससे बड़ी ऐतिहासिक दुर्घटना!

* * *

आज 200 साल में हालात बहुत बदल चुके हैं। ‘उदन्त मार्तण्ड’ से शुरू हुआ हिंदी पत्रकारिता का सफर कई मंजिलें तय कर चुका है। भारत की आजादी के बाद हिन्दी पत्रकारिता परवान चढ़ी  और आज अपने पूरे शबाब पर है। 

आज से  40 साल पहले तक देश के टॉप टेन सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबारों में छह अखबार अंग्रेजी के हुआ करते थे, आज टॉप टेन बिकने वाले अखबारों में पांच अखबार हिन्दी के, दो मलयालम के, एक तमिल का, एक तेलुगु का और एक अंग्रेजी  का है। टॉप 10 अखबारों में भी शुरू के टॉप चार यानी  पहले नंबर से लेकर चौथे नंबर तक के, अखबार हिन्दी  के हैं और और अंग्रेजी का सबसे बड़ा अखबार सातवें नंबर पर है।

* * *

 

क्या आपने कभी सोचा है कि उदन्त मार्तण्ड  बंद क्यों हुआ? एक ऐसा अखबार जो हिन्दी  में था। देश की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली आबादी का अखबार बंद करना पड़ा, वह भी केवल डेढ़ साल में!  उसके पहले से निकलने वाले गुजराती, फारसी, बांग्ला के अखबार सर्वाइव कर पाए,  लेकिन हिन्दी का पहला अखबार सर्वाइव नहीं कर पाया। क्यों?

उस अखबार का तो ध्येय वाक्य ही था- हिंदुस्तानियों के हित के हेत! जो भी हिंदुस्तानियों के हित की बात करेगा उसे सरकार का समर्थन नहीं मिलेगा। यह बात तय थी। उदन्त मार्तण्ड ने  ‘हिंदुस्तानियों के हित और हेत’ की बात कही थी, हुकूमत को यह कैसे रास आती?

सरकारी बदलती रहती हैं, नीतियां वही रहती हैं । ‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत’ किए जाने वाले कामों को तवज्जो नहीं दी जाती। हिंदुस्तानियों के हित के लिए जो भी काम करता है,उसे उसका क्रेडिट नहीं मिलती। हम हिन्दुस्तानी  लोग क्रेडिट के लिए काम भी नहीं करते। इतिहास में ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं कि काम हम करते हैं और क्रेडिट कोई और ले जाता है: जैसे 1895 में जगदीशचंद्र बसु ने रेडियो/वायरलेस  बनाया लेकिन क्रेडिट उन्हें नहीं मिली, बल्कि गुग्लिएल्मो मार्कोनी को मिली। उन्हें 1909 में रेडियो की खोज के लिए नोबेल प्राइज भी मिला। टीपू सुल्तान ने जेट इंजन बनाया लेकिन क्रेडिट उन्हें नहीं, विलियम काँग्रीव को मिली।

कैलकुलस की खोज माधव जी ने की थी, लेकिन क्रेडिट मिली  न्यूटन और लेबनीज को। चेचक का टीका भारतीय वैद्यों ने खोजा था जो सुई में चेचक का अंश  लेकर टीकाकरण किया करते थे। ब्रिटिश डॉक्टर के.के. हॉवेल  में इस बारे में अपनी अंग्रेजी सरकार को लिखा और चेचक विरोधी टीका खोजा गया। 

शिवकर बापू तलपड़े में विमानशास्त्र की खोज की थी, 1895 में मुंबई के चौपाटी पर उन्होंने ‘मरुत्सखा’ विमान उड़ा कर दिखाया था। वह अनमैन्ड विमान था, विमान बांस की फ्रेम वाला था और इसमें पारा आधारित इंजन या सोलर-मरकरी टरबाइन का इस्तेमाल  किया गया था। यह विमान करीब  1500 फीट तक उड़ा और कुछ मिनट हवा में रहा, फिर नीचे आया या क्रैश हो गया। इस प्रदर्शन में हजारों लोग शामिल थे, जिनमें महादेव गोविंद रानाडे, बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ आदि शामिल होने की बात कही जाती है। यह घटना भारतीय इंडियन एविएशन की एक रोचक/प्रेरणादायक कड़ी है।  तलपड़े जी को इंडियन एविएशन का अग्रदूत माना जाता है।

लेकिन तलपड़े साहब उसमें और सुधार नहीं कर पाए क्योंकि पैसे की कमी थी। राइट बंधुओ ने विमान के अवशेष/कागजात ब्रिटिश कंपनी रेलीज ब्रदर्स को बेच दिए, जिनसे बाद में राइट ब्रदर्स ने खरीदे और 8 साल बाद 1903 में उन्होंने पेटेंट करा लिया। आज भी हम यही  पढ़ते हैं कि सबसे पहले हवाई जहाज उड़ानेवाले राइट बंधु थे।  तलपड़े साहब को कोई याद नहीं करता है। हां, एक फिल्मकार  विभु वीरेंद्र पुरी  ने 2015 में  उन पर फिल्म ‘हवाईजादा’ जरूर बनाई थी, जिसमें आयुष्मान खुराना हीरो थे, वह फिल्म भी उदन्त मार्तण्ड की तरह घाटे का सौदा रही। प्लास्टिक सर्जरी महर्षि सुश्रुत करते थे, लेकिन क्रेडिट उन्हें कौन देता है?

हिन्दी में हमने 28 साल पहले दुनिया के हिन्दी पहले वेब पोर्टल  वेबदुनिया में अशोक चतुर्वेदी जी के नेतृत्व में और डॉ. बबीता अग्रवाल के सहयोग से ‘वेब खोज’ नाम का हिन्दी का पहला सर्च इंजन बनाया था. जो कंप्यूटर जनरेट नहीं था। एक-एक एंट्री मैन्युअल की जाती थी।  वेब खोज सर्च इंजन की लॉन्चिंग मुंबई में ताज पैलेस होटल में एक प्रेस कांफ्रेंस करके की गई थी. धन अभाव और मध्य प्रदेश के एक शहर से निकलने के कारण और संसाधनों की कमी के कारण वह हिंदी का पहला सर्च इंजन बंद करना पड़ा और अब हमें गूगल जैसे सर्च इंजन की मदद लेनी  पड़ती है।

आज से 50/100 साल बाद जब लोग इस बात के बारे में सोचेंगे कि आखिर हिन्दी को इंटरनेट पर लाने वाले कौन लोग थे? उन्होंने किन हालात में इंटरनेट पर हिन्दी  को स्थापित किया? वह भी उस दौर में, यूनिकोड नहीं था, जब लोड शेडिंग जबरदस्त होता था, वाईफाई जैसी चीज नहीं होती थी, कनेक्टिविटी कंकाल जैसी थी, गिने चुने लोगों के  पास लैपटॉप थे, मोबाइल आ चुका था लेकिन वह इतना महंगा था कि गिने चुने लोग ही उसे अफोर्ड कर पाते थे। उसे दौर में भी हिन्दी  में अपनी जगह बनाई। वैसे ही जैसे कोलकाता में उदन्त मार्तण्ड ने  जगह बनाई थी।

जब कभी भी इंटरनेट पर हिन्दी को आप देखें तो पाएंगे किउस हिन्दी को कागज से स्क्रीन पर  में एक गिलहरी जैसा योगदान हमारा भी रहा है। उदन्त मार्तण्ड  के बहाने हमने आज पुनरावलोकन किया। यहां आकर अच्छा लगए। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता और संचार विश्वविद्यालय के सभी सहयोगियों तथा वीर भारत न्यास के साथियों का आभार!


अन्य पोस्ट