विचार / लेख

सनातन क्या है ?
14-May-2026 10:11 PM
सनातन क्या है ?

-ध्रुव गुप्त

इन दिनों सनातन का हर तरफ शोर है। इस शोर में अनेक देवी -देवताओं और कुछ  पौराणिक प्रसंगों की मेरी मानवीय और समाजशास्त्रीय व्याख्याओं से नाराज होकर कुछ लोगों ने मुझे सनातन-द्रोही घोषित किया हुआ है। मैं नहीं जानता कि उन्हें सनातन की कितनी समझ है। हमारी संस्कृति में सनातन अर्थात शाश्वत वेदों को कहा गया है। वेदों को मानने वाले लोग सनातनी  कहे जाते हैं। इन  वेदों का सूत्र वाक्य है -  एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति नेह ना नास्ति किंचन'। अर्थात एक ही ईश्वर है और उसके सिवा कोई दूसरा नहीं है -नहीं है, नहीं है, किंचित भी नहीं है। इस एक सत्य के सिवा वेदों में कोई पूजनीय नहीं है। वेदों में प्रकृति की विभिन्न शक्तियों की प्रशंसा या स्तुति गाई गई हैं। जैसे अग्नि, वायु, नदी, सूर्य, उषा, पृथ्वी, सोम, अदिति, पूषा, वनस्पति आदि। स्तुति के पात्र तब के प्रतापी योद्धा इंद्र और चिकित्सा शास्त्र के ज्ञाता अश्विन कुमार जैसे लोग भी हैं। वेदों के सार उपनिषदों में भी शक्तिपुंज के रूप में एक ही ईश्वर की मान्यता है। हम सब उसके अंश हैं। उपनिषदों के अनुसार यदि स्वयं के ऊर्जा की पहचान हो जाय तो ईश्वर की पहचान हो जाएगी। जो पिंड में है, वही ब्रह्मांड में है। समुद्र की एक बूंद को जान लो तो समुद्र को जान लोगे। आज के कई देवी-देवता, उनके असंख्य मंदिर और मूर्तियां  वेदों की नहीं, पुराणों की उपज हैं। पुराण संभवत: हमारे इतिहास के गुप्त काल से लेकर मध्यकाल तक लिखे गए हैं। हमने जो धर्म और पूजा पद्धति आज अपनाई  हुई है  वह सनातन नहीं, बल्कि  पौराणिक धर्म और पूजा पद्धति है।मैं यह नहीं कहता कि पुराणों के सभी देवी -देवता काल्पनिक हैं। इनमें कुछ ऐतिहासिक पात्र भी  रहे होंगे जिनके उज्ज्वल चरित्र या कारनामों के कारण उन्हें देवता या भगवान का दर्जा दिया गया है।

मैं सनातन वेद और उपनिषद वाले ईश्वर को मानता हूं। विशुद्ध और निराकार ब्रह्मांडीय ऊर्जा। उसे जानने या उससे एकाकार होने का रास्ता यह है कि हमें इस सोच को अपने भीतर गहरे उतारना होगा कि हमसब एक ईश्वर या ब्रह्मांडीय ऊर्जा के अंश हैं और इसीलिए यह समूची सृष्टि ही हमारे परिवार का विस्तार है। सृष्टि से संपूर्ण तादात्म्य और उस एकत्व से उत्पन्न संवेदना, प्रेम और करुणा ही ईश्वर से एकाकार होने का एकमात्र रास्ता है।


अन्य पोस्ट