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हेट स्पीच पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या है और क्या होगा इसका असर
08-May-2026 7:21 PM
हेट स्पीच पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या है और क्या होगा इसका असर

-उमंग पोद्दार

सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने हेट स्पीच यानी नफरती भाषण के मामले में बुधवार 29 अप्रैल को एक अहम फैसला दिया है। जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के सामने कई याचिकाएँ थीं।

कुछ याचिकाओं में माँग थी कि हेट स्पीच के मुद्दे पर कानून में संशोधन होना चाहिए। ऐसे नए प्रावधान लाने चाहिए जिससे हेट स्पीच को रोका जा सके।

कुछ की माँग थी कि कोर्ट को विशेष जाँच टीम बना कर हेट स्पीच की घटनाओं पर जाँच की निगरानी रखनी चाहिए। वहीं, कई याचिकाएँ कुछ कथित हेट स्पीच की घटनाओं के खिलाफ थीं। इसमें याचिका दायर करने वालों की माँग थी कि ऐसे नफरती भाषण देने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हेट स्पीच के लिए क़ानून में फिलहाल कई प्रावधान मौजूद हैं और कोर्ट इसमें कोई नया संशोधन लाने के लिए आदेश नहीं दे सकता।

कई मामलों में कार्रवाई की भी माँग थी। इनमें अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा के भाषणों, हरिद्वार और दिल्ली में धर्म संसद से जुड़े केस, कोरोना काल में तबलीग़ी जमात के बारे में दिए गए बयान जैसे मामले शामिल हैं। कोर्ट ने इन सभी मामलों को भी ख़ारिज कर दिया। सिर्फ चार याचिकाओं पर अभी सुनवाई जारी रखी है।

आइए समझते हैं, इस फैसले में क्या हुआ और सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला क्यों अहम है।

कौन-कौन से मामले कोर्ट के सामने थे?

कोर्ट के सामने एक दर्जन से ज़्यादा याच?िकाएँ थीं। इनमें पिछले कुछ सालों के सबसे बड़े मामले भी थे जिनमें आरोप था कि किसी समुदाय, ख़ासकर मुसलमानों के खिलाफ नफरती भाषण दिए गए हैं।

एक मामला सुदर्शन टीवी चैनल से जुड़ा था। अगस्त 2020 में सुदर्शन टीवी के मुख्य संपादक सुरेश चव्हाणके ने कथित ‘यूपीएससी जिहाद’ के बारे में ट्विटर (अब एक्स) पर टिप्पणी की थी।

उन्होंने कहा था कि कुछ दिनों में वे टीवी पर अपने कार्यक्रम में यह बात करने वाले हैं कि संघ लोक सेवा आयोग या यूपीएससी की परीक्षा में मुसलमानों को हिंदुओं के मुकाबले बढ़ावा दिया जाता है।

उन्होंने दावा किया कि उन्हें ज़्यादा उम्र तक परीक्षा देने की इजाजत और परीक्षा देने के ज़्यादा मौके दिए जाते हैं। इसके खिलाफ कई लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की। इनका कहना था कि ये सारी बातें झूठी हैं और भारत में टीवी चैनलों से जुड़े नियमों के खिलाफ हैं।

यही नहीं, इस कथित मुद्दे से जुड़े चार एपिसोड टीवी पर प्रसारित हुए थे। इसके पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को यह तय करने के लिए कहा था कि इस कार्यक्रम का प्रसारण रुकना चाहिए या नहीं। हालाँकि, सरकार ने इस प्रसारण को रोका नहीं था।

उसके कुछ वक्त बाद साल 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने बाक़ी बचे एपिसोड के प्रसारण पर रोक लगा दी थी। उसके बाद से यह मामला कोर्ट में लंबित था। साथ ही, और भी याचिकाएँ थीं, जो कथित तौर पर ‘कोरोना जिहाद’ से जुड़ी रिपोर्टिंग के खिलाफ थीं। साल 2020 में कोरोना काल के दौरान कई चैनलों ने खबरें चलाई थीं कि तबलीगी जमात ने भारत में कोरोना वायरस फैलाया है।

बाद में, इस बात को झूठ पाया गया था। इसके खिलाफ भी याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से कार्रवाई की माँग की थी।

इसके अलावा, दिसंबर 2021 में दिल्ली और हरिद्वार में हिंदू धर्म संसद हुए थे। इसमें कई वक्ता धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाने, मुस्लिम प्रधानमंत्री न बनने देने, मुस्लिम आबादी न बढऩे देने समेत धर्म की रक्षा के नाम पर विवादित भाषण देते हुए दिखाई दिए।

साथ ही, कुछ याचिकाकर्ताओं ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ आंदोलन के दौरान भाजपा के नेताओं, अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा के दिए गए बयानों पर कार्रवाई की माँग की थी।

कई ऐसी भी याचिकाएँ थीं जिनका कहना था कि हिंदुओं के खिलाफ हेट स्पीच दी गई है।

इन मामलों में द्रविड़ मुनेत्र कडग़म (डीएमके) के नेता उदयनिधि स्टालिन की सनातन धर्म की कई कथित टिप्पणी भी शामिल थी।

इनमें कई याचिकाओं में यह माँग की गई थी कि सुप्रीम कोर्ट पुलिस को एफ़आईआर दायर करने का आदेश दे और उसके बाद तहकीकात और कार्रवाई पर निरंतर निगरानी रखें।

कई याचिकाएं थीं जिनमें कहा गया था कि हेट स्पीच के मामलों में पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। यह कोर्ट की अवमानना है। साथ ही, कुछ याचिकाओं की माँग थी कि कोर्ट सरकारों को मॉब लिंचिंग रोकने के साल 2018 के अपने दिशा-निर्देश को लागू करने का आदेश दे।

सुप्रीम कोर्ट ने किन चार मामलों को जारी रखा?

पिछले महीने 29 अप्रैल के फैसले में कोर्ट ने इनमें से कई याचिकाओं को खारिज कर दिया। यानी, अब ये मामले सुप्रीम कोर्ट के सामने नहीं हैं। अब इन मामलों में जहाँ पर पुलिस की तहकीकात या कोर्ट में कानूनी प्रक्रिया चल रही, वे जारी रहेंगी। फिलहाल केवल चार मामले हैं, जिनमें सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी रहेगी।

इनमें केरल के स्पीकर ऐन। शमशीर, उदयनिधि स्टालिन समेत कुछ नेताओं के खिलाफ अवमानना याचिकाएँ थीं। इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि उन्होंने कथित तौर पर हिंदू भगवानों का अपमान किया था। इससे समाज में सांप्रदायिक शांति भंग हो सकती थी।

एक मामला गुंटूर के मेयर कवाती मनोहर नायडू के कुछ बयानों के खिलाफ है। वहीं, एक दूसरा केस अजमेर शरीफ दरगाह के खिलाफ एक व्यक्ति के बयान से जुड़ा है। इन सब याचिकाओं में कहा गया है कि पुलिस ने शिकायत के बाद भी कोई एफ़आईआर दायर नहीं की। यह कोर्ट के दिशा-निर्देश के खिलाफ जाता है।

कोर्ट ने कहा कि इन चार याचिकाओं में प्रशासन ने कोर्ट के सामने अपना जवाब दायर नहीं किया था कि उन्होंने क्या कार्रवाई की। इसलिए वे इन केस में आगे सुनवाई जारी रखेंगे।

बाक़ी मामलों के लिए कोर्ट ने कहा कि उन्होंने राज्यों से एक ‘स्टेटस रिपोर्ट’ माँगी थी। कोर्ट ने कहा कि उन मामलों में एफआईआर दायर हो चुकी है।

परवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर के बयानों पर कोर्ट ने कहा कि उनके भाषणों से किसी प्रकार की हिंसा के लिए उकसाया नहीं गया था।

हालाँकि, कोर्ट ने एक बिंदु पर दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले से असहमति जताई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एफआईआर दायर करने के लिए किसी की अनुमति की जरूरत नहीं है। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि हेट स्पीच से जुड़े प्रावधानों के तहत एफआईआर दायर करने के लिए उचित अधिकारियों से अनुमति लेने की जरूरत होती है।

हेट स्पीच से जुड़े इस फैसले के क्या मायने हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारत के कानून और कोर्ट के पहले के फैसलों से यह साफ है कि अगर किसी संज्ञेय जुर्म (कॉग्निज़ेबल ऑफेंस) की जानकारी पुलिस को दी जाती है तो पुलिस को एफआईआर दायर करना जरूरी है। संज्ञेय जुर्म यानी ऐसे अपराध जिसमें पुलिस बिना वारंट के किसी अभियुक्त को गिरफ़्तार कर सकती है। साथ ही, कोर्ट ने कहा कि अगर ऐसा नहीं हो तो किसी व्यक्ति के पास अनेक कानूनी विकल्प हैं। वे वरिष्ठ पुलिस अफसर के पास शिकायत कर सकते हैं।

उसके बाद मजिस्ट्रेट के पास जा सकते हैं। अगर मजिस्ट्रेट भी मामले में कार्रवाई करने से मना कर दे तो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी जा सकते हैं।

पुलिस में एफआईआर दायर करने के बाद मजिस्ट्रेट के पास शक्ति होती है कि वे अलग-अलग पड़ाव में जाँच पर निगरानी रख सकें। इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि हेट स्पीच के मुद्दे पर भारत में अनेक कानून हैं। यही नहीं, साल 2017 में विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कानून में संशोधन लाने के लिए सुझाव दिया था।

लॉ कमीशन के सुझावों पर अमल करना है या नहीं, ये संसद की जिम्मेदारी है और उसमें सुप्रीम कोर्ट को दख़ल नहीं देना चाहिए।

साथ ही कोर्ट ने कहा कि अगर किसी मुद्दे पर कोई क़ानून नहीं है तो कोर्ट कुछ निर्देश जारी कर सकता है, जैसे कोर्ट ने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीडऩ को रोकने के लिए किया था।

हेट स्पीच के मामले में इससे पहले क्या हुआ है

हालाँकि, पिछले अप्रैल का यह आदेश इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के अपने पहले के आदेशों से अलग है। पहले सुप्रीम कोर्ट ने ख़ुद भी हेट स्पीच के कई मामलों की जाँच की निगरानी की है।

हेट स्पीच के मुद्दे पर एक बड़ी दिक्कत कानून को लागू करवाने की होती है। नफरती भाषण के लिए कानून में प्रावधान है लेकिन यह देखा गया है कि इन प्रावधानों के तहत एफआईआर, गिरफ्तारी और क़ानूनी प्रक्रिया को शुरू करने में लोगों को दिक्कतें होती हैं।

नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन के दौरान भाजपा नेता कपिल मिश्रा के बयानों के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज करवाने के लिए साल 2020 से कोर्ट में याचिकाएँ चल रही हैं।

हेट स्पीच से जुड़े मामलों में भी देखा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले क़ानून होते हुए भी आदेश जारी किए हैं। कोर्ट ने कहा था कि अगर हेट स्पीच से जुड़े मामले सामने आते हैं तो किसी शिकायत का इंतज़ार किए बिना पुलिस को ख़ुद से कार्रवाई करनी पड़ेगी।

पुलिस और कार्यपालिका ने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी के कारण कुछ कार्रवाई भी की है। जैसे एफआईआर दायर करना और एक धर्म संसद को रोकना।

ऐसे में भारत की सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी, ऐसे मामलों में पुलिस और निचली अदालतों को कार्रवाई करने के लिए मजबूर करती है।

साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज डॉ। बलबीर सिंह चौहान ने विधि आयोग के सुझाव भेजते हुए तत्कालीन कानून मंत्री को लिखा था, ‘अगर कार्यपालिका किसी भी कारण से कोई कार्रवाई नहीं करती तो अदालत ने हमेशा क़ानून लागू करने के अपने संवैधानिक दायित्व को पूरा करने के लिए कदम उठाया है।’

सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट को देखें तो नफरती भाषण के मामले में भी कोर्ट साल 2022 और साल 2023 से लगातार सुनवाई कर रहा था और निर्देश दे रहा था। हालाँकि, उसके मुकाबले साल 2024 से 2026 तक मामले की सुनवाई कम हुई। साथ ही, इन मामलों की सुनवाई कर रहे जज भी बदल गए थे। नई बेंच ने इस मामले में नया रुख ले लिया।

हालाँकि, अभी हाल के कुछ फैसलों में कोर्ट ने बाकी मामलों में भी ऐसा रुख अपनाया। साल 2025 में मॉब लिंचिंग या भीड़ के हाथों हुई हत्या से जुड़े एक मामले में कोर्ट ने कहा कि वह सारे मामलों पर निगरानी नहीं रख सकता।

साल 2026 में भी ऐसी ही एक याचिका पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने कहा था कि कोर्ट को ऐसे निर्देश जारी नहीं करने चाहिए जिसे वह खुद लागू नहीं कर सकते।

कानून के जानकारों का क्या कहना है?

कोर्ट के हाल के फैसले की आलोचना भी हुई है। खासकर उस भाग की जिसमें हेट स्पीच के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने केस को खारिज कर दिया।

वरिष्ठ पत्रकार भारत भूषण ने अपने एक लेख में कहा, ‘इस फैसले को इतिहास इस चीज़ के लिए याद रखेगा कि सुप्रीम कोर्ट ने एक केंद्रीय मंत्री के खिलाफ कानून लागू नहीं किया जिन्होंने ‘देश के गद्दारों को, गोली मारो...’ कहा था।’

फैजान मुस्तफा चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के कुलपति हैं। उन्होंने अपने एक वीडियो में कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने क़ानून में संशोधन करने के लिए सरकार को आदेश न देकर ‘कानून के सिद्धांतों के हिसाब से सही फैसला है।’ हालाँकि, उन्होंने आगे कहा कि हेट स्पीच को रोकने के लिए ‘जो चीज़ें करने की दरकार थीं, वे नहीं की गईं।’

उन्होंने अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा के मामले में कहा कि हाईकोर्ट ने पुलिस की रिपोर्ट देखते हुए मान लिया था कि इसमें कोई ‘कॉग्निजेबल ऑफेंस’नहीं है और सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात को मान लिया। उन्होंने कहा, ‘हेट स्पीच की जितनी जटिल और गंभीर समस्या देश के समक्ष है, शायद इसमें थोड़ा गहराई से जाने की जरूरत थी, जहाँ कोर्ट इस मामले में नहीं गई।’

उन्होंने आगे कहा कि अगर कोर्ट इस हेट स्पीच के मुद्दे पर निगरानी रखती, ‘तो शायद जो लोग नफरत फैलाते हैं, उनके दिल में कोई डर होता।’ (bbc.com/hindi)


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