विचार / लेख

जब सत्ता धर्म का मुखौटा लगाकर चलती है, ट्रंप, युद्ध और ‘ईश्वर’ के नाम पर राजनीति
17-Apr-2026 9:17 PM
जब सत्ता धर्म का मुखौटा लगाकर चलती है, ट्रंप, युद्ध और ‘ईश्वर’ के नाम पर राजनीति

दुनिया की राजनीति में कुछ शब्द बार-बार लौटते हैं, ‘सुरक्षा’, ‘राष्ट्रहित’, ‘लोकतंत्र’, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक और शब्द चुपचाप केंद्र में आ गया है: ‘ईश्वर’। जब बड़े नेता युद्ध, सैन्य कार्रवाई या भू-राजनीतिक टकराव को ‘ईश्वर की इच्छा’ या ‘नैतिक कर्तव्य’ की भाषा में पेश करने लगते हैं, तब सवाल केवल नीतियों का नहीं रह जाता, बल्कि पूरी सभ्यता की दिशा का हो जाता है। डॉनल्ड ट्रम्प के दौर में यह प्रवृत्ति अधिक स्पष्ट होकर सामने आई, जहाँ धार्मिक समूहों, खासतौर पर अमेरिकी इवैंजेलिकल ईसाइयों, का समर्थन केवल राजनीतिक गठजोड़ नहीं, बल्कि एक गहरे वैचारिक समीकरण का हिस्सा था। इस समीकरण में इजऱाइल का समर्थन, ईरान का विरोध, और ‘अच्छाई बनाम बुराई’ की सरल कहानी एक साथ गुँथ जाती है। यही वह जगह है जहाँ राजनीति और धर्म की रेखाएँ धुंधली होने लगती हैं।

ट्रंप ने कई मौकों पर अपने समर्थकों से यह कहा कि अमेरिका ‘ईश्वर की कृपा से महान है’ और यह कि देश का मिशन केवल आर्थिक या सैन्य नहीं, बल्कि नैतिक भी है। उनके करीबी कुछ नेताओं और सलाहकारों ने इससे भी आगे जाकर यह संकेत दिया कि अमेरिका की विदेश नीति ‘दिव्य योजना’ का हिस्सा हो सकती है। उदाहरण के लिए, कुछ धार्मिक-राजनीतिक मंचों पर यह विचार खुलकर सामने आया कि इजऱाइल की सुरक्षा केवल कूटनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि बाइबिल की भविष्यवाणियों से जुड़ा हुआ है। इसी संदर्भ में ईरान को अक्सर ‘दुष्ट सत्ता’ यानी बुराई के प्रतीक के रूप में पेश किया गया। यह भाषा सामान्य कूटनीति की नहीं होती; यह उस मानसिकता की भाषा है जहाँ संघर्ष को नैतिक युद्ध के रूप में देखा जाता है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी, क्या ये नेता सच में धर्म के नाम पर युद्ध को जायज़ मानते हैं, या यह केवल राजनीतिक रणनीति है? जवाब सीधा नहीं है। एक स्तर पर यह साफ़ है कि धार्मिक भाषा लोगों को जोड़ती है। जब कोई नेता ‘ईश्वर’, ‘दैवीय जि़म्मेदारी’, ‘दुष्ट’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता है, तो वह सीधे भावनाओं को छूता है। इससे समर्थकों में एक तरह की नैतिक ऊर्जा पैदा होती है, जो सामान्य राजनीतिक तर्कों से कहीं ज्यादा प्रभावी होती है। लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि अमेरिकी इवैंजेलिकल समुदाय के कुछ हिस्सों में वास्तव में यह विश्वास मौजूद है कि मध्य पूर्व में होने वाली घटनाएँ ‘अंत-काल’, अंत समय, की प्रक्रिया का हिस्सा हैं। इस सोच में इजऱाइल का अस्तित्व और उसकी रक्षा एक धार्मिक जिम्मेदारी बन जाती है।

इसी पृष्ठभूमि में जब अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ता है, तो वह केवल भू-राजनीतिक संघर्ष नहीं रह जाता। उसे एक ऐसी कथा में बदल दिया जाता है जिसमें अमेरिका ‘अच्छाई’ का प्रतिनिधि है और उसका विरोध करने वाले ‘बुराई’ के। यह व्याख्या खतरनाक इसलिए है क्योंकि यह जटिल वास्तविकताओं को सरल नैतिक फ्रेम में बदल देता है। जब कोई संघर्ष ‘भले बनाम बुरे ’ का संघर्ष बन जाता है, तो संवाद, समझौता और कूटनीति के लिए जगह बहुत कम बचती है। यही कारण है कि कई बार ऐसे नेताओं के बयान बेहद आक्रामक और युद्धोन्मुखी लगते हैं, क्योंकि वे केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक युद्ध की भाषा में बात कर रहे होते हैं।

 

दिलचस्प बात यह है कि यही धार्मिक भाषा अक्सर विरोधाभास भी पैदा करती है। एक तरफ ये नेता ‘ईश्वर’ और धर्म की बात करते हैं, दूसरी तरफ कैथोलिक चर्च या पोप जैसी संस्थाओं की आलोचना भी करते हैं। इसका कारण यह है कि सभी धार्मिक परंपराएँ एक जैसी नहीं हैं। इवैंजेलिकल ईसाई दृष्टिकोण और कैथोलिक चर्च की सोच में कई बुनियादी अंतर हैं। जहाँ पोप और वेटिकन अक्सर शांति, संवाद और युद्ध-विरोध की बात करते हैं, वहीं कुछ अमेरिकी धार्मिक समूह अधिक आक्रामक राष्ट्रवाद और ‘मोरल वॉर’ की अवधारणा को स्वीकार करते हैं। इसीलिए जब ट्रंप या उनके समर्थक पोप की आलोचना करते हैं, तो वह केवल व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं होती, बल्कि दो अलग धार्मिक-राजनीतिक दृष्टिकोणों का टकराव होता है।

इतिहास गवाह है कि धर्म का इस्तेमाल युद्ध को वैध ठहराने के लिए नया नहीं है। मध्यकालीन क्रूसेड्स से लेकर औपनिवेशिक विस्तार तक, और आधुनिक समय में भी, ‘ईश्वर की इच्छा’ का तर्क बार-बार सामने आता रहा है। लेकिन आज की दुनिया में यह और खतरनाक इसलिए हो जाता है क्योंकि हमारे पास अभूतपूर्व सैन्य शक्ति है। जब परमाणु हथियारों से लैस देश अपने फैसलों को नैतिक या धार्मिक भाषा में पेश करते हैं, तो उसके परिणाम कहीं अधिक गंभीर हो सकते हैं। यह केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह जाता, बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है।

यह भी समझना जरूरी है कि ट्रंप या उनके जैसे नेता केवल धर्म से प्रेरित नहीं होते। उनके फैसलों के पीछे स्पष्ट राजनीतिक और रणनीतिक हित भी होते हैं। इजऱाइल अमेरिका का एक महत्वपूर्ण सहयोगी है, और मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन बनाए रखना अमेरिकी नीति का हिस्सा रहा है। ईरान के साथ टकराव भी इसी रणनीति का हिस्सा है। लेकिन जब इन नीतियों को धार्मिक भाषा में पेश किया जाता है, तो वे ज्यादा भावनात्मक और कम तर्कसंगत दिखाई देने लगती हैं। इससे न केवल अंतरराष्ट्रीय संबंध प्रभावित होते हैं, बल्कि घरेलू राजनीति भी अधिक ध्रुवीकृत हो जाती है।

सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है जब सत्ता, धर्म और ‘नैतिक युद्ध’ की कहानी एक साथ मिल जाती है। ऐसी स्थिति में नेता अपने फैसलों को केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक और दिव्य बताने लगते हैं। इससे आलोचना की गुंजाइश कम हो जाती है, क्योंकि अगर कोई निर्णय ‘ईश्वर की इच्छा’ बताया जाए, तो उसका विरोध करना मानो ‘ईश्वर’ का विरोध करना हो जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ लोकतंत्र कमजोर पडऩे लगता है, क्योंकि लोकतंत्र सवालों और असहमति पर ही टिका होता है।

आज की दुनिया में हमें इस जटिलता को समझने की जरूरत है। हर युद्ध को धर्म से जोडक़र देखना भी गलत है, और हर धार्मिक बयान को केवल रणनीति मान लेना भी अधूरा है। सच्चाई इन दोनों के बीच कहीं है, जहाँ राजनीति, रणनीति और विश्वास एक-दूसरे में उलझे हुए हैं। लेकिन एक बात स्पष्ट है: जब भी सत्ता धर्म की भाषा में बात करती है, तो हमें और सतर्क हो जाना चाहिए। क्योंकि उस भाषा में आकर्षण भी होता है और खतरा भी।

युद्ध जब ‘ईश्वर’ के नाम पर लड़ा जाने लगे, तो असली सवाल यह नहीं रहता कि कौन जीतेगा, बल्कि यह कि इंसानियत कितना बचेगी।

(chatgpt की मदद से तैयार)                       

-चित्रगुप्त


अन्य पोस्ट