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क्या बच्चों का मोबाइल और सोशल मीडिया बैन होना चाहिए?
07-Mar-2026 10:24 PM
क्या बच्चों का मोबाइल और सोशल मीडिया बैन होना चाहिए?

भारत के कुछ राज्यों में टीनएजर बच्चों के मोबाइल और सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने के बारे में सोचा जा रहा है। वहीं कई विशेषज्ञों और पेरेंट्स का मानना है कि बैन करने के बजाय एक जिम्मेदार डिजिटल नीति अपनाई जानी चाहिए।

 डॉयचे वैले पर शिवांगी सक्सेना का लिखा-

अर्पिता मुखर्जी मुंबई में एक कंटेंट क्रिएटर हैं। वह फैशन, लाइफस्टाइल और पैरेंटिंग से जुड़े रोजमर्रा के अनुभवों पर रिलेटेबल कंटेंट बनाती हैं। उनके दोनों बच्चे कपड़ों के ब्रांड्स के लिए शूट किया करते थे। लेकिन अर्पिता ने इसे बंद करने का फैसला किया।

उन्हें डर है कि बच्चों की तस्वीरों से आपत्तिजनक कंटेंट बनाकर ऑनलाइन फैलाया जा सकता है। लेकिन अर्पिता यह भी मानती हैं कि अचानक सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने से समस्याएं बढ़ सकती है, क्योंकि अधिकांश किशोर पहले से ही सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और कई इससे कमाई भी कर रहे हैं।

हाल ही में भारत के कुछ राज्यों ने सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करना शुरू कर दिया है। कर्नाटक सरकार ने 16 साल से कम आयु के बच्चों के सोशल मीडिया और मोबाइल उपयोग पर रोक लगाने का प्रस्ताव रखा है। इस विषय पर विभिन्न पक्षों से राय ली जा रही है। एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने चिंता जताते हुए कहा कि डिजिटल उपकरणों के बढ़ते उपयोग के चलते बच्चों की सीखने की क्षमता पर प्रभाव पड़ रहा है। इसी तरह आंध्र प्रदेश और गोवा भी स्कूली छात्रों को सोशल मीडिया से दूर रखने के लिए संभावित कानून पर विचार कर रहे हैं।

भारत से पहले कई देश इस दिशा में महत्वपूर्ण फैसले ले चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों को बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक, यूट्यूब, टिकटॉक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और एक्स पर अकाउंट बनाने और उपयोग करने से रोकने वाला व्यापक कानून लागू किया है। इसके तुरंत बाद स्पेन यूरोप का पहला देश बन गया जिसने भी बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की योजना घोषित की। स्पेनिश प्रधानमंत्री का कहना है कि एज वेरिफिकेशन में सख्ती और कंपनियों की जवाबदेही के जरिए बच्चों को हानिकारक कंटेंट, लत और दुष्प्रभावों से बचाना जरूरी है।

वहीं मेटा का कहना है कि सिर्फ प्रतिबंध लगाना समाधान नहीं है। ऑस्ट्रेलिया के मामले में मेटा ने बताया कि उसने बच्चों के कई अकाउंट हटाए हैं। साथ ही सरकारों से मिलकर काम करने की अपील की है जिससे बच्चों के लिए ऑनलाइन स्पेस को सुरक्षित बनाया जा सके।

विज्ञापन से बच्चों को बचाना जरुरी

अर्पिता ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, ‘शुरू से ही मैंने सोच-समझकर कदम उठाए हैं। मेरे बच्चे कोई भी वीडियो या यूट्यूब हमेशा टीवी पर देखते हैं, ताकि स्क्रीन का उपयोग नियंत्रित हो। मैं उन्हें खाना खाते समय या शांत कराने के लिए मोबाइल नहीं देती। मैं चाहती हूं कि वे अपने आसपास के माहौल से सीखें। न कि एक ही जगह बैठकर स्क्रीन में खो जाएं।’

उनकी मुख्य चिंता विज्ञापनों को लेकर है। रील्स पर एडल्ट कंटेंट और फिल्मों से जुड़े कई विज्ञापन दिखाई देते हैं। यदि सोशल मीडिया पर सख्ती बढ़ेगी, तो ये विज्ञापन गेमिंग प्लेटफॉर्म्स पर शिफ्ट हो सकते हैं। अर्पिता कहती हैं, "उन पर निगरानी व नियंत्रण और भी मुश्किल हो जाएगा। बच्चों में स्वाभाविक जिज्ञासा होती है। जिस काम को उनसे दूर किया जाता है, उसे पाने की इच्छा और बढ़ जाती है। इसलिए केवल प्रतिबंध लगाने के बजाय कंपनियों के लिए स्पष्ट नियम और जवाबदेही तय करना जरुरी है।’

क्यों लग जाती है सोशल मीडिया की लत?

बैन के लिए इसी आयु वर्ग को इसलिए चुना गया है क्योंकि इस उम्र में बच्चों का मस्तिष्क पूरी तरह विकसित नहीं होता। डॉ। नेहा बंसल पेरेंटिंग और बाल्यावस्था विशेषज्ञ हैं। वह समझाती हैं, "दिमाग का एक हिस्सा, जिसे प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स कहा जाता है, वह फैसला लेने, आत्म-नियंत्रण और जोखिम का आकलन करने के लिए जिम्मेदार है। यह हिस्सा किशोरावस्था में विकसित हो रहा होता है।’

इसी कारण ऐसा माना जाता है कि इस आयु वर्ग के बच्चे सोशल मीडिया के दबाव को संभालने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं। उनका लिम्बिक सिस्टम भी अधिक सक्रिय रहता है। जिससे वे भावनात्मक रूप से ज्यादा संवेदनशील होते हैं। ऑनलाइन कंटेंट, तुलना या ट्रोलिंग का उन पर गहरा असर पड़ सकता है। जो बच्चे तीन घंटे से अधिक सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं, उनमें गुस्सा, चिड़चिड़ापन और व्यवहार संबंधी समस्याएं विकसित हो रही हैं। वे खुद को परिवार से अलग कर बातचीत कम कर देते हैं।

नेहा आगे कहती हैं, "माता-पिता डॉक्टर के पास तब आते हैं जब उनके बच्चों पर सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग के दुष्प्रभाव दिखाई देने लगते हैं। मोटापे के मामलों में लगभग 80 प्रतिशत तक वृद्धि देखी जा रही है। बच्चों में नींद से जुड़ी समस्याएं बढ़ रही हैं। माता-पिता की भी जिम्मेदारी है कि वे बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर निगरानी रखें, संतुलन बनाए और उन्हें स्वस्थ डिजिटल आदतें सिखाएं।’

 

क्या चीन का मॉडल अपना सकता है भारत?

भारत के पड़ोसी देश चीन ने रियल-नेम रजिस्ट्रेशन, फेस रिकग्निशन और कंटेंट नियंत्रण के जरिए साल 2021 में ही सोशल मीडिया के इस्तिमाल पर आंशिक रोक लगाई। भारत सरकार भी इसी तरह की तकनीक अपनाने पर विचार कर रही है।

फेस रिकग्निशन टेक्नोलॉजी चेहरे के कई लैंडमार्क पॉइंट्स जैसे आंखें, नाक, होंठ आदि को कैप्चर करती है। सिस्टम चेहरे से एक बॉयोमेट्रिक टेम्पलेट बनाता है। इसे अक्सर एन्क्रिप्ट या हैश (कोड) किया जाता है। ये डाटा अत्यंत संवेदनशील होता है।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ अमित दुबे सरकारी एजेंसियों को साइबर अपराध की जांच में मदद करते हैं। वह बताते हैं कि इस कोड के जरिए किसी यूजर को अलग-अलग डिवाइस पर भी पहचाना जा सकता है। ऐसे में यदि वही व्यक्ति दूसरे डिवाइस पर भी गेम खेले, तो उसका समय जुड़ जाएगा। इसी तकनीक का इस्तेमाल भारत में डिजी यात्रा ऐप में भी होता है।

साथ ही उनका मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को नियंत्रित करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट दिशा-निर्देश होने चाहिए। अमित कहते हैं, "चीन के पास अपने घरेलू सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म हैं। जबकि भारत में लगभग सभी वैश्विक कंपनियां सक्रिय हैं। ऐसे में बच्चे वीपीएन या डार्क नेट के जरिए नियमों को दरकिनार कर सकते हैं। अगर सरकार सख्ती से लागू करना चाहे, तो वीपीएन सेवाओं को ब्लॉक करने की आवश्यकता पड़ सकती है। हालांकि यह एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है।’

क्या आंशिक प्रतिबंध सही है?

रति फॉउंडेशन मुंबई स्थित एक गैर-सरकारी संगठन है, जो बच्चों और लैंगिक हिंसा की शिकार महिलाओं के साथ काम करता है। इसके सह-संस्थापक और निदेशक सिद्धार्थ पिल्लई ने डीडब्ल्यू से बात की। उन्होंने बताया कि बच्चे अक्सर इम्पर्सोनेशन, पेमेंट स्कैम, साइबर बुलिंग और असुरक्षित कंटेंट का शिकार हो जाते हैं। लेकिन इसके लिए कोई डाटा या शोध होना चाहिए और केवल इन खतरों के आधार पर सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाने का तर्क स्पष्ट नहीं है।

सिद्धार्थ बताते हैं, ‘कई बच्चे स्कूल से जुड़े कार्यों के लिए अपने अभिभावकों का व्हाट्सऐप इस्तेमाल करते हैं और लगभग 50 प्रतिशत बच्चे लॉगिन के लिए उनका ही ईमेल आईडी इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा डिजिटल पहुंच में असमानता मौजूद है। छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों के पास पहले से ही निजी उपकरण, डिजिटल कौशल और सुरक्षित इंटरनेट उपयोग के अवसर सीमित हैं। ऐसे में उनसे तुरंत मोबाइल छीन लेना उचित नहीं होगा।’

फेस रिकग्निशन के बारे में बात करते हुए सिद्धार्थ ने कहा, ‘हमारे अपने शोध में पाया गया कि 62 प्रतिशत बच्चों को सोशल मीडिया तक पहुंच माता-पिता के मोबाइल से मिलती है। ऐसे में यदि फेस रिकग्निशन आधारित सत्यापन लागू किया भी जाए, तो डिवाइस माता-पिता के चेहरे से ही प्रमाणित और उनकी पहचान से संचालित होगा। इससे यह व्यवस्था बच्चों की वास्तविक पहचान सुनिश्चित करने में प्रभावी नहीं रह पाएगी।’

अगर ऑस्ट्रेलिया जैसा मॉडल अपनाया जाए, तो वहां भी देखा गया कि बच्चों ने गेमिंग प्लेटफॉर्म्स और डिस्कॉर्ड जैसे माध्यमों पर बातचीत शुरू कर दी। सरकारी हस्तक्षेप और प्रतिबंधों के बावजूद अश्लील सामग्री आज भी ऑनलाइन आसानी से उपलब्ध है। कई बार गूगल प्ले से ओटीटी ऐप हटा दिए जाते हैं, लेकिन उन्हें अन्य स्रोतों से डाउनलोड किया जा सकता है। इसलिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि प्रतिबंध क्यों लगाया जा रहा है, कैसे लागू होगा और क्यों यह वास्तव में बच्चों के हित में है। (dw.com/hi)


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