विचार / लेख

यह गौरव का नहीं चिंता का विषय
22-Feb-2026 10:35 PM
यह गौरव का नहीं चिंता का विषय

-पुष्य मित्र

बीबीसी के संपादक रहे संजीव श्रीवास्तव अगर रिटायरमेंट के बाद कचौड़ी की दुकान खोल लेते हैं तो यह उनके लिये आत्मगौरव का विषय हो सकता है, मगर पत्रकार बिरादरी के लिये चिंता का विषय है।

यह उदाहरण बताता है कि अगर एक पत्रकार रिटायरमेंट के बाद नेताओं और अफसरों की दलाली कर राज्यसभा से लेकर सरकारी ठेकेदारी की राह नहीं बना पाता। वह किसी पार्टी का प्रवक्ता या नेता का सोशल मीडिया मैनेजर नहीं बन पाता तो उसके पास विकल्प यही है कि वह या तो किराने दुकान खोल ले या कचौड़ी की।

अपने जीवन के सुनहरे वर्ष ईमानदार पत्रकारिता के क्षेत्र में खपाने के बाद अगर वह स्वाभिमान के साथ जीना चाहता है तो उसके कितने सीमित विकल्प हैं। आपने किसी सरकारी बाबू, बैंक कर्मी, प्रोफेसर या किसी और फील्ड के लोगों के सामने ऐसी विकल्पहीनता शायद ही देखी हो कि उसके जीवन भर की सेवा के बाद चैन से बुढ़ापा गुजारने के विकल्प कितने सीमित हैं।

संजीव श्रीवास्तव ने दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संस्थान के शीर्ष पद पर अपनी सेवा दी है। खबर यह है कि वे शौकिया तौर पर कचौड़ी की दुकान चलाते हैं। मगर सच यह भी है कि मीडिया फील्ड में काम करने वाले 90 फीसदी पत्रकारों की हालत असंगठित क्षेत्र के मजदूरों जैसी है। अगर वे किसी संस्थान से जुड़े हैं तो उन्हें सैलरी इतनी नहीं मिलती कि ईमानदारी अफोर्ड कर सकें। लिहाजा पहले दिन से 500 रुपये प्रति खबर और विज्ञापन के दस फीसदी कमीशन के जाल में फंस जाते हैं। उनका बुढ़ापा अपने इलाके के नेताओं और थानेदारों की जी हजूरी करते बीतता है। यह बात उन ईमानदार पत्रकारों के लिये नहीं है, जिनकी संख्या बहुत कम है, जो अपवाद हैं।

बचे दस फीसदी जिन्हें ठीक - ठाक सैलरी मिलती है। जिन्हें पीएफ और ग्रेच्युटी मिलता है। उनके पेंशन का भी कोई भरोसेमंद इंतजाम नहीं है। पत्रकारिता एक नाशुकरा पेशा है।

एक पत्रकार के तौर पर आपके पास अलग से कोई अधिकार नहीं है। आप किसी नेता, प्रशासक, सरकार को बयान देने पर मजबूर नहीं कर सकते। आपको धक्के खाते हुए सरकार के पास पहुंचना है। सवाल पूछना है। अब जवाबदेह पर निर्भर है कि वह आपके सवालों के साथ कैसा सलूक करे। उसकी मजबूरी नहीं है।

एक सवाल के जवाब के लिये अफसर अपने केबिन के बाहर आपको घंटों बिठा सकता है। आपके पास संविधान से उतने ही अधिकार हैं, जितने किसी आम व्यक्ति को। आप जो सवाल पूछने का पावर हासिल करते हैं, वह बस अपने रिपोर्ट से।

इसके बाद आप सबसे असुरक्षित बुढ़ापा जीने के लिये मजबूर हैं। यह बात हर ईमानदार पत्रकार को 50 साल पूरे होते ही डराना शुरू कर देती है।

ऐसे में कई होशियार लोग किसी नेता, किसी सरकार, किसी पार्टी की अघोषित सेवा शुरू कर देते हैं। ताकि किसी सभा, किसी आयोग, किसी पार्टी में प्रवक्ता, किसी सडक़ का ठेका या अपने व्यक्तिगत चैनल-अखबार को विज्ञापन दिला सकें। बच्चों का अच्छी जगह एडमिशन हो जाए। कोई नौकरी मिल जाए।

जो पत्रकार जवानी में नहीं झुकता, वह सुरक्षित बुढ़ापे की फिक्र में झुकता है, रेंगता है।

यह किसी सभ्य समाज के लिये अच्छी बात नहीं। इसकी फिक्र सरकार और समाज दोनों को करनी चाहिये।


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