रायपुर

नाम में क्या रक्खा है? बहुत कुछ...
01-Feb-2026 12:26 PM
नाम में क्या रक्खा है? बहुत कुछ...

-गोकुल सोनी

शहर सिर्फ इमारतों, सड़कों और बाजारों से नहीं बनता—वह बनता है अपनी यादों, किस्सों और पहचान से। रायपुर के चौक-चौराहे भी ऐसी ही जीवंत स्मृतियाँ हैं, जिन्होंने समय के साथ अपना रूप बदला, नाम बदले, किन्तु अपने भीतर इतिहास की परतें आज भी सहेजकर रखी हैं। कभी जिन नामों से लोग दिशा पूछते थे, जिन चौकों पर पीढ़ियाँ मिलीं और बिछड़ीं, वे आज नए नामों के साथ हमारे सामने खड़े हैं।

आज मैं आपको रायपुर के कुछ ऐसे ही चौक-चौराहों की यात्रा पर ले चल रहा हूं। यह यात्रा केवल नामों की नहीं, बल्कि बदलते दौर, बदलती सोच और शहर की विकसित होती पहचान की कहानी है। इसके पहले मैंने जयस्तंभ चौक का नाम आजादी से पहले सराय चौक था अपने पूर्व फेसबुक पोस्ट में बता चुका हूं।

रिसाला नाका से राजीव गांधी चौक तक...

जिस चौक को आज हम राजीव गांधी चौक के नाम से जानते हैं, वह कभी रिसाला नाका चौक कहलाता था। उस दौर में शहर की सीमा पर नाका हुआ करता था, जिसे चुंगी नाका भी कहते थे। राज्य परिवहन की बसें शहर में प्रवेश से पहले यहीं रुकती थीं। एक कर्मचारी बस में चढ़कर सवारियों की गिनती करता और उसी हिसाब से कंडक्टर चुंगी अदा करता, तब जाकर बस आगे बढ़ती यह बात तो आपको याद होगी ही।

यहां कुछ कमरों का एक छोटा-सा दफ्तर था। नाका व्यवस्था समाप्त होने के बाद रायपुर पुलिस ने यहां क्राइम स्क्वॉड का कार्यालय खोला। बाद में युवक कांग्रेस के विरोध के पश्चात वह कार्यालय बंद हुआ। दफ्तर को तोड़कर एक विशाल चबूतरा बनाया गया और उस पर स्वर्गीय राजीव गांधी की प्रतिमा स्थापित की गई।

इसके पूर्व नगर निगम ने पास में फायर ब्रिगेड कार्यालय खोला था, जिसके कारण कुछ समय तक यह फायर ब्रिगेड चौक भी कहलाया। इस तरह एक ही स्थान ने तीन-तीन नामों का इतिहास देखा। रिसाला नाका चौक, फायर ब्रिगेड चौक और अब राजीव गांधी चौक।

खजाना तिराहा से नगरघड़ी...

जहां आज नगरघड़ी शहर की पहचान बनकर खड़ी है, वह स्थान कभी खजाना तिराहा कहलाता था। कारण स्पष्ट था। यहां सरकारी ट्रेजरी स्थित थी। सरकारी खजाने की वजह से ही इस चौक को खजाना तिराहा कहा जाने लगा। समय बदला, भवन बदले और नाम भी बदल गया।

जुबली चौक से शास्त्री चौक...

डी.के. अस्पताल बनने से पहले वहां जुबली अस्पताल हुआ करता था, इसलिए लोग उसे जुबली चौक कहते थे। बाद में डी.के. अस्पताल बनने पर कुछ लोग इसे डी.के. अस्पताल चौक भी कहने लगे। किन्तु जब लाल बहादुर शास्त्री जी के निधन के पश्चात वहां उनकी प्रतिमा स्थापित हुई, तब से यह स्थान शास्त्री चौक के नाम से स्थायी पहचान पा गया।

फोकटपारा से मौदहापारा...

आज का मौदहापारा कभी फोकटपारा कहलाता था। कहा जाता है कि मौदहा क्षेत्र से बड़ी संख्या में लोग यहां आकर बसे, तब इस बस्ती का नाम मौदहापारा पड़ गया। नाम के साथ आबादी का इतिहास भी जुड़ा है।

एस.आर.पी. चौक से शहीद भगत सिंह चौक...

आज का शहीद भगत सिंह चौक कभी एस.आर.पी. चौक कहलाता था। यहां रेलवे के एस.पी. साहब का बंगला था, उसी कारण यह नाम प्रचलित हुआ। बाद में देशभक्ति की भावना के साथ जब यहां शहीद भगत सिंह की मूर्ति स्थापित हुई तब से इसका नाम शहीद भगत सिंह चौक रखा गया।

लिली चौक और लोहार चौक...

पुरानी बस्ती में कभी एक ही पान की दुकान थी, जिसे जग्गू प्रसाद पंसारी जी चलाते थे। उनके मित्र उन्हें “लिली” कहकर पुकारते थे, कुछ अंग्रेज भी इसी नाम से संबोधित करते थे। उनके निधन के बाद उस क्षेत्र का नाम लिली चौक पड़ गया। आगे जहां बड़ी संख्या में लोहार परिवार रहते थे, वह स्थान लोहार चौक कहलाने लगा।

आजाद चौक और लाखेनगर...

कहा जाता है कि जहां आज आजाद चौक है, वहां कभी महात्मा गांधी की सभा हुई थी। उसी ऐतिहासिक स्मृति के कारण इसका नाम आजाद चौक पड़ा।

इसी प्रकार वामनराव लाखे जी के 1948 में निधन के बाद उनके सम्मान में उस चौक का नाम लाखे नगर चौक रखा गया।

कादर चौक से गुरुनानक चौक....

आज का गुरुनानक चौक पहले कादर चौक कहलाता था। समय के साथ धार्मिक और सामाजिक परिवर्तनों ने इसका नाम बदल दिया।

फाफाडीह की कथा....

फाफाडीह के बारे में एक रोचक लोककथा प्रचलित है कि यहां रेलवे की बड़ी खुली जमीन थी, जहां कीट-पतंगे बहुत होते थे। छत्तीसगढ़ी में कीट-पतंगों को “फांफा” कहा जाता है, संभवतः इसी कारण इसका नाम फाफाडीह पड़ा। हालांकि इसकी ऐतिहासिक पुष्टि कठिन है। हो सकता है यह केवल लोक-हास्य हो।

तात्यापारा की दिलचस्पी...

तात्यापारा चौक, जिसे यशवंत गोरे चौक भी कहा जाता है, आज भी अपनी बोली-बानी में जीवित है। कई मित्र तो “तात्पर्य” की जगह मज़ाक में “तात्यापारा” कह देते हैं—“मेरे कहने का तात्यापारा यह है कि…।” यही तो शहर की जीवंतता है। नाम इतिहास भी बनते हैं और हास्य का हिस्सा भी।

गांधी बाजार से गोलबाजार...

गोलबाजार का नाम कभी गांधी बाजार था। आज भी नगर निगम के रिकॉर्ड में यह गांधी बाजार ही है। गोल बाजार के दुकानदार जो नगर निगम में प्रॉपर्टी टैक्स पटाते हैं उस टैक्स की रसीद में अभी भी गांधी बाजार लिखा हुआ है।

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रायपुर के ये चौक-चौराहे केवल रास्तों के संगम नहीं हैं, बल्कि समय के संगम भी हैं। हमारी पीढ़ी जिन नामों से उन्हें जानती थी, नई पीढ़ी उन्हें नए नामों से पहचानती है। पर स्मृतियों में पुराने नाम अब भी धड़कते हैं।

यदि आप भी रायपुर के किसी चौक-चौराहे के पुराने नाम या उससे जुड़ी कोई रोचक स्मृति जानते हों, तो अवश्य साझा कीजिए। क्योंकि शहर का इतिहास किताबों में ही नहीं, लोगों की यादों में भी बसता है।(लेखक छत्तीसगढ़ के सबसे लंबे वक़्त से काम कर रहे प्रेस फोटोग्राफर हैं।)


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