रायगढ़

धरमजयगढ़ के चैनपुर कोल ब्लॉकों की नीलामी शुरू
23-Apr-2026 5:15 PM
धरमजयगढ़ के चैनपुर कोल ब्लॉकों की नीलामी शुरू

पेसा कानून की अनदेखी, अब कोर्ट जाने की तैयारी!
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायगढ़, 23 अप्रैल।
कोयला मंत्रालय द्वारा कोल ब्लॉकों की नीलामी प्रक्रिया तेज किए जाने के बाद आदिवासी क्षेत्रों में विरोध तेज हो गया है। सरकार ने कोल माइंस स्पेशल प्रोविजन्स एक्ट के तहत 25वें राउंड और एमएमडीआर एक्ट के तहत 15वें राउंड की नीलामी का ऐलान किया है, जिसमें कुल 17 कोल ब्लॉक शामिल हैं। इनमें रायगढ़ जिले के टेरम और चौनपुर कोल ब्लॉक भी शामिल हैं।

मेसर्स अंबुजा सीमेंट्स (अडानी समूह) से जुड़े भूमिगत कोल ब्लॉक का ग्रामीणों ने पहले ही जबरदस्त विरोध किया था। इसी विरोध के चलते 11 नवंबर 2025 को प्रस्तावित जनसुनवाई को शासन को स्थगित करना पड़ा था। सामाजिक कार्यकर्ता सजल मधु ने उस समय पुरुंगा के हाईस्कूल मैदान में आयोजित सभा में छाल और धरमजयगढ़ रेंज के घने जंगलों में प्रस्तावित 18 कोल ब्लॉकों का मुद्दा उठाया था। उन्होंने बताया था कि इन क्षेत्रों में लगभग 52 ग्राम पंचायतें प्रभावित होंगी।अब एक बार फिर अचानक नीलामी प्रक्रिया शुरू होने से ग्रामीणों में आक्रोश बढ़ गया है। ग्राम पंचायत तेंदूमुड़ी के आश्रित ग्राम चौनपुर कोल ब्लॉक की नीलामी प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है, जबकि अन्य 11 कोल ब्लॉकों की नीलामी अभी बाकी है।यह पूरा क्षेत्र पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून के अंतर्गत आता है, जहां ग्राम सभा की अनुमति अनिवार्य होती है। इसके बावजूद नीलामी प्रक्रिया आगे बढ़ाए जाने पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

बीते 29 दिसंबर 2025 को लगभग 5 हजार ग्रामीणों ने रैली और जुलूस निकालकर धरमजयगढ़ एसडीएम प्रवीण भगत के माध्यम से भारत सरकार के कोयला मंत्रालय, वन मंत्रालय सहित अन्य विभागों को ज्ञापन सौंपा था। ग्रामीणों ने स्पष्ट रूप से अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी, लेकिन अब तक इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि केंद्र और राज्य सरकार पेसा कानून की अनदेखी कर रही है और जबरन कोल ब्लॉकों की नीलामी कर रही है। सामाजिक कार्यकर्ता सजल मधु ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इस पर रोक नहीं लगाई गई, तो मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल या सुप्रीम कोर्ट तक ले जाया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई केवल जमीन की नहीं, बल्कि जंगल, पर्यावरण और बेजुबान वन्य जीवों विशेषकर हाथियों के अस्तित्व की भी है। वहीं ग्रामीणों का कहना है कि यदि शासन-प्रशासन ने उनकी आवाज नहीं सुनी, तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।


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