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मासूम नजरिए से मणिपुर की हकीकत की पड़ताल करती है 'बूंग'
24-Feb-2026 12:54 PM
मासूम नजरिए से मणिपुर की हकीकत की पड़ताल करती है 'बूंग'

मणिपुरी फिल्म 'बूंग' ने इस साल का बाफ्टा पुरस्कार जीत कर इतिहास रच दिया है. लक्ष्मीप्रिया देवी के निर्देशन में बनी नब्बे मिनट की यह फीचर फिल्म एक मासूम के नजरिए से हिंसा, विस्थापन और अधूरे परिवारों का दर्द बयां करती है

 डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी की रिपोर्ट –

बेस्ट चिल्ड्रेंस एंड फैमिली फिल्म कैटेगरी में यह इस अवार्ड को जीतने वाली पहली भारतीय फिल्म है. यह अवार्ड लेते समय निर्देश लक्ष्मीप्रिया देवी की राज्य में शांति बहाल होने और मई, 2023 से ही जारी हिंसा के कारण विस्थापित बच्चों की मासूमियत, खुशी और सपने वापस लौटने की मार्मिक अपील की.

आखिर इस फिल्म में ऐसा क्या है जिसके कारण इसे सुर्खियां मिल रही हैं? इसमें कोई स्थापित कलाकार नहीं है. फरहान अख्तर के प्रोडक्शन हाउस के बैनर तले बनी यह फिल्म दरअसल एक मासूम ब्रजेंद्र बूंग सिंह के मन में चल रहे उथल-पुथल की कहानी है. हिंसा और विस्थापन का उसके बालसुलभ मन पर क्या असर पड़ता है और पिता को खोने के बाद वह किसी स्थिति से गुजर रहा है, इसे इस फिल्म में बखूबी दर्शाया गया है.

एक बच्चे के निगाह से दिखाया है मणिपुर का हाल

मणिपुर की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में राज्य के सामाजिक और राजनीतिक ताने-बाने को एक मासूम के नजरिए से दिखाया गया है. फिल्म में 'बूंग' की भूमिका गुगेन किपगेन ने निभाई है. उस बच्चे का पिता म्यांमार की राजधानी से सटे कस्बे मोरे में फर्नीचर की दुकान चलाता है. लेकिन अचानक उसका फोन आना बंद हो जाता है और वह लापता हो जाता है.

मणिपुर में सरकार तो बहाल, लौटेगी शांति भी?

पिता जयकुमार के लापता होने के बाद 'बूंग' अपनी मां मंदाकिनी के साथ राजधानी इंफाल में रह रहा है. पिता के मोबाइल नंबर पर भेजे गए वायस नोट का भी कभी कोई जवाब नहीं आता. इससे बूंग में हताशा और नाराजगी बढ़ती है. वह सोचना है कि लापता पिता को तलाशने के बाद उनके जीवन से रूठी खुशियां दोबारा लौट आएंगी. पति के लापता होने के कारण बूंग की मां अकेले उसे पाल रही है. बूंग चाहता है कि लापता पिता को घर लौटाकर वह अपनी मां को सबसे अच्छा उपहार दे. पिता की तलाश में वह अपने एक दोस्त राजू के साथ मणिपुर के विभिन्न इलाकों के अलावा सीमावर्ती कस्बे मोरे और उसके पार म्यांमार तक का सफर करता है.

निर्देशक ने अपनी फिल्म में 'बूंग' के इस सफर के जरिए राज्य की जटिल सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति के साथ ही उग्रवाद, जातीय तनाव और पहचान की लड़ाई जैसे संवेदनशील मुद्दों की पड़ताल करते हुए क्षेत्रीय संघर्ष के प्रभाव को एक बच्चे के निगाह से दिखाया है.

'बूंग' को पिता की तलाश के लिए की गई यात्रा के दौरान ही जीवन की कड़वी हकीकत का सामना करना पड़ता है. यह उसे समय से पहले ही परिपक्व बना देता है.यानी यह फिल्म कम उम्र में ही एक बच्चे की परिपक्वता की ओर बढ़ने की भी कहानी है.

मैतेई मूल के बूंग और मारवाड़ी राजू के बीच गहरी दोस्ती से दिया संदेश

लक्ष्मीप्रिया देवी ने पहली बार किसी फीचर फिल्म का निर्देशन किया है. हालांकि इससे पहले वो लक्ष्य और पीके जैसी फिल्मों में सहायक निर्देशक के तौर पर काम कर चुकी है. फिल्म की कहानी भी उन्होंने ही लिखी है.

वर्ष 2024 के टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में प्रीमियर के बाद बीते साल सितंबर में इसे भारतीय सिनेमाघरों में रिलीज किया गया था. लक्ष्मीप्रिया को श्रेष्ठ निर्देशन के लिए भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के अलावा गोवा में आयोजित बुलबुल चिल्ड्रेंस इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भी सम्मानित किया जा चुका है.

आजादी के करीब आठ दशक बाद किस हाल में है पूर्वोत्तर?

सामाजिक पूर्वाग्रहों के बावजूद मैतेई मूल के बूंग और मारवाड़ी यानी बाहरी राजू के बीच गहरी दोस्ती के जरिए फिल्म में यह बताने का प्रयास किया गया है कि लोग जाति व धर्म के खांचे में बंटने और भौगोलिक सीमाओं से परिभाषित होने से पहले एक इंसान हैं.

मणिपुर में मुख्यमंत्री वाई. खेमचंद के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने बाफ्टा अवार्ड को सिनेमा के साथ उम्मीद के लिए भी एक जीत और एक जुझारू मातृभूमि को श्रद्धांजलि बताते हुए इसकी सराहना की है.

फिल्म के कई लोकेशन हुए हिंसा में नष्ट

मणिपुर के एक फिल्म आलोचक सरोज कुमार शर्मा डीडब्ल्यू से कहते हैं, "बूंग में किरदार भी असली हैं और कहानी भी. फिल्म में इन किरदारों ने मणिपुर की कहानी को उसकी मूल भाषा में बयां किया हैं. इसमें काम करने वाले कई बच्चे विस्थापन का शिकार रहे हैं.यह फिल्म उनकी भावनाओं को सहजता से परदे पर उकेरती है."

शर्मा कहते हैं कि यह फिल्म एक अहम दस्तावेज भी है. वर्ष 2023 की हिंसा से ठीक पहले फिल्माई गई इस फिल्म के कई लोकेशन हिंसा के दौरान नष्ट हो गए हैं. उनका कहना है कि अपने लापता पिता को तलाशने वाले पुत्र के जरिए निर्देश ने एक ऐसे इलाके की कहानी बयां की है जो उपेक्षित महसूस कर रहा है.

मणिपुर के सामाजिक कार्यकर्ता के. राजेश्वर डीडब्ल्यू से कहते हैं, "यह फिल्म बताती है कि ‘बाहरी' होने की समस्या मणिपुर ही नहीं, पूरी दुनिया में है. भारत जैसे देश में आप हर जगह एक जैसे नहीं रह सकते. कई बार कुछ सौ किलोमीटर की यात्रा ही आपको बाहरी बना सकती है. इसकी वजह यह है कि वहां भाषा, संस्कृति और खान-पान बदल जाता है."

राजेश्वर कहते हैं, "विस्थापन और संघर्ष की कड़वी हकीकत को मानवीय रूप देने के लिए एक बच्चे के नजरिए से बूंग मणिपुर के उस दौर की यादें ताजा करती है जब विभिन्न समुदाय शांति और सद्भाव से रहते थे. फिल्म इस बात की पड़ताल करती है कि मानवीय भावना जटिल सामाजिक-राजनीतिक तनावों और जातीय विभाजनों से कैसे अछूती रह सकती है."

आलोचकों का कहना है कि 'बूंग' दरअसल, एक ऐसे बच्चे की कहानी है जिसे हालात के कारण अपनी इच्छा के विपरीत समय से पहले परिपक्व बनना पड़ता है. निर्देशक ने इस फिल्म को अपनी मातृभूमि के प्रति श्रद्धांजलि करार दिया है. उन्होंने अधूरे परिवार को पूरा करने की एक अकेली मां और बच्चे के दृढ़संकल्प के जरिए यह संदेश देने का प्रयास किया है कि मणिपुर में फिलहाल शांति और ध्यान दिए जाने की जरूरत है.


 


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