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पश्चिम बंगाल एसआईआर: 34 लाख अपील दाखिल, सिर्फ़ 1607 नाम जुड़े-प्रक्रिया पर उठे सवाल
29-Apr-2026 1:16 PM
पश्चिम बंगाल एसआईआर: 34 लाख अपील दाखिल, सिर्फ़ 1607 नाम जुड़े-प्रक्रिया पर उठे सवाल

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण के मतदान से एक दिन पहले, मंगलवार को चुनाव आयोग ने, राज्य की मतदाता सूची में फिर से शामिल किए गए 1,468 मतदाताओं की एक अतिरिक्त सूची जारी की. और पहले मूल लिस्ट से छह मतदाताओं को हटाया गया.

यह सूची सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त ट्रिब्यूनलों के उन फ़ैसलों पर आधारित है, जिनमें विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत मतदाता सूची में किए गए संशोधनों के ख़िलाफ़ अपीलें सुनी गई थीं.

मंगलवार को जारी यह दूसरी अतिरिक्त सूची है. पहली सूची 22 अप्रैल को आई थी- मतदान के पहले चरण से एक दिन पहले. उस सूची में केवल 139 मतदाताओं को जोड़ा गया था और आठ को हटाया गया था.

इस तरह दोनों सूचियों में कुल 1,607 मतदाताओं को जोड़ा गया है, जबकि सिर्फ़ 14 को हटाया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने इस महीने की शुरुआत में अपने आदेश में दर्ज किया था कि ट्रिब्यूनलों में 34 लाख से अधिक अपीलें दायर की गई थीं. ऐसे में ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं.

एसआईआर पर उठ रहे सवाल

विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से लगभग 91 लाख मतदाताओं को हटा दिया गया.
इनमें से 63 लाख को 'ग़ैरहाज़िर, स्थानांतरित, मृत या डुप्लीकेट' के रूप में चिह्नित किया गया. चुनाव आयोग ने कहा कि बाक़ी 27 लाख में 'तार्किक विसंगतियां' थीं- जैसे वर्तनी की ग़लतियां, लिंग दर्ज करने में त्रुटि, माता-पिता या दादा-दादी के साथ उम्र में असामान्य फ़र्क़ आदि.

सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर के तहत मतदाता पात्रता (क्वालिफ़िकेशन) पर चुनाव आयोग के फ़ैसलों पर आपत्तियां सुनने के लिए 19 ट्रिब्यूनल नियुक्त किए थे. पिछले महीने से, जब ये ट्रिब्यूनल बने, तब से उनके पास 34 लाख से ज़्यादा अपीलें दायर की गईं. यह साफ़ नहीं है कि इनमें से कितनी अपीलें अंततः सुनी गईं.

मंगलवार को पत्रकारों से बात करते हुए पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल ने कहा कि उनके पास निपटाए गए मामलों की संख्या का आंकड़ा नहीं है और यह एक 'क़ाग़ज़ी कार्रवाई' है.

लेकिन 1,607 जोड़े गए और 14 हटाए गए मतदाताओं की संख्या मिलाकर कुल 34 लाख अपीलों का 0.05% से भी कम हिस्सा बनती है. इसके अलावा, ट्रिब्यूनलों के ज़्यादातर फ़ैसलों का नतीजा मतदाताओं को शामिल करने में ही निकला है.

हटाए जाने-से-जोड़े जाने जाने का अनुपात लगभग 1:115 है. सरल शब्दों में यानी हर एक नाम हटाए जाने पर 115 नए नाम जोड़े गए.

'ज़्यादातर लोगों को अपील करने के बारे में जानकारी नहीं'

इन आंकड़ों के सामने आने के बाद, कुछ ऐसे लोग भी उलझन में हैं जिन्हें ट्रिब्यूनलों की सुनवाई के बाद फिर से मतदाता सूची में शामिल किया गया है.

मुर्शिदाबाद ज़िले के धुलियान नगरपालिका के अध्यक्ष और तृणमूल कांग्रेस नेता इंजामुल इस्लाम उन 139 मतदाताओं में से एक हैं जिनका नाम पहली अतिरिक्त सूची में जोड़ा गया था. पिछले हफ़्ते उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि भले ही उनका नाम फिर से जुड़ गया है, लेकिन उनके साथ उनके जिन दो भाइयों के नाम कटे थे, उनके बारे में स्थिति अब तक साफ़ नहीं है.

इंजामुल मुर्शिदाबाद के सम्सेरगंज विधानसभा क्षेत्र के मतदाता हैं, जहां 74,775 नाम हटाए गए थे. ये सभी सीटों में सबसे बड़ी संख्या है.

मंगलवार को इंजामुल ने बीबीसी बांग्ला को बताया कि उन्होंने पहले चरण में वोट डाला था, लेकिन और कुछ कहने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा, "मैं 4 मई (नतीजे के दिन) के बाद बोलूंगा."

पश्चिम बंगाल एसआईआर से जुड़ा डेटा विश्लेषण कर रहे सबर इंस्टीट्यूट के मुख्य शोधकर्ता सबीर अहमद ने बीबीसी बांग्ला को बताया कि उन्हें हर दिन उन मतदाताओं के 150 से 200 फ़ोन कॉल आ रहे हैं, जिनके नाम हटाए गए हैं.

सबर इंस्टीट्यूट ने मतदाताओं की अपील दाख़िल करने में निशुल्क मदद करने के लिए एक कानूनी सेल भी बनाया है.

अहमद ने कहा, "ज़्यादातर लोगों को ट्रिब्यूनल में अपील दाख़िल करने की प्रक्रिया की स्पष्ट जानकारी नहीं है."

वह बताते हैं कि अपीलकर्ताओं को अपनी शिकायत का विवरण और पात्रता दस्तावेज़ों की जानकारी 1,000 शब्दों के भीतर लिखनी होती है, जो कई लोगों के लिए कठिन काम है.

राजनीतिक स्तंभकार और अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में विकास अध्ययन के संकाय सदस्य आदिल हुसैन कहते हैं कि उन्होंने कई मामलों में देखा है कि एक ही परिवार के कुछ सदस्य सूची से हटाए गए हैं, जबकि अन्य अब भी मतदाता बने हुए हैं.

उत्तर दिनाजपुर ज़िले के मतदाता हुसैन, पहले चरण में वोट डालने के लिए अपने होमटाउन गए थे. उन्होंने कहा कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से कम से कम 13 लोगों को ट्रिब्यूनल में अपील दाख़िल करने में मदद की.

उन्होंने कहा, "ये लोग ग़रीब हैं और इतने पढ़े-लिखे नहीं हैं कि अपील दाख़िल कर पाएं, और ज़्यादातर कानूनी सहायता केंद्र शहरी इलाक़ों में हैं."

आख़िरी समय में जारी की गई अतिरिक्त सूची पर हुसैन ने कहा कि अगर बूथ स्तर अधिकारी (बीएलओ) न बताए तो जिन मतदाताओं को फिर से शामिल किया गया है, शायद उन्हें इसके बारे में पता भी न चले. वह कहते हैं, "मैंने पहले चरण के मतदान में ऐसे मामले देखे हैं."

कोलकाता की प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर ज़ाद महमूद ने भी कहा कि जिस धीमी गति से ट्रिब्यूनल मामलों का निपटारा कर पा रहे थे, उससे साबित होता है कि एसआईआर प्रक्रिया जल्दबाज़ी में लागू की गई थी और आशंका है कि बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं का अधिकार छिन गया हो.

महमूद ने कहा, "भले ही इस काम का उद्देश्य सही हो, लेकिन इसकी व्यापकता और जिस पैमाने पर दस्तावेज़ों का सत्यापन ज़रूरी है, उसके लिए और समय चाहिए था.

पीठासीन अधिकारियों के नाम भी कटे

ट्रिब्यूनलों के कामकाज पर उठ रहे सवाल पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया को लेकर विवाद का नया बिंदु हैं. लेकिन ये विवाद तब से जारी है जब चुनाव आयोग ने 'तार्किक विसंगतियां' (logical discrepancies) श्रेणी पेश की, जिसके तहत लाखों मतदाताओं को 'विचाराधीन' (under adjudication) कर दिया गया.

यह श्रेणी चुनाव आयोग के शुरुआती आदेशों में नहीं थी और पश्चिम बंगाल से पहले किसी भी राज्य में लागू नहीं की गई थी. शुरुआती दिशा-निर्देशों के अनुसार, कोई भी मतदाता अगर खुद या अपने माता-पिता को 2002 की मतदाता सूची से जोड़कर दिखा पाता (जब पिछली बार एसआईआर हुआ था) तो वह पात्र माना जाता.

लेकिन जब चुनाव आयोग ने 'तार्किक विसंगतियां' श्रेणी पेश की, तो 60 लाख से अधिक मतदाताओं को अपनी पात्रता साबित करने के लिए नोटिस भेजे गए. इनमें से 27 लाख से अधिक को अंततः हटा दिया गया.

एक चौंकाने वाली बात यह रही कि इन 27 लाख में कम से कम 65 लोग ऐसे थे जिन्हें मतदान केंद्रों पर पीठासीन अधिकारी नियुक्त किया गया है.

चुनाव आयोग अपने मैनुअल में पीठासीन अधिकारी को मतदान केंद्र पर 'सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी' बताता है. उनकी नियुक्ति जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत होती है.

फिर भी, मुर्शिदाबाद के सरकारी स्कूल शिक्षक अख़्तर अली जैसे कई लोगों को मतदाता सूची से हटा दिया गया. अली ने बीबीसी बांग्ला को बताया कि उन्होंने पहले चरण में पीठासीन अधिकारी के रूप में काम किया और इससे पहले चार चुनावों में भी वह ऐसा कर चुके हैं.

अली ने कहा कि उन्हें चुनाव आयोग से 'तार्किक विसंगति' का नोटिस मिला, जबकि उनके पिता का नाम 2002 की मतदाता सूची में था.

अली का दावा है कि उन्होंने अपनी पात्रता साबित करने के लिए अपने पिता का वोटर कार्ड और 1951 के ज़मीन के दस्तावेज़ चुनाव आयोग को दिए. फिर भी उनका नाम यह कहकर हटा दिया गया कि उनके पिता के नाम में अलग-अलग दस्तावेज़ों में मेल नहीं खा रहे.

यह दावा करते हुए कि 'वास्तविक मतदाता' होने के बावजूद उनका नाम हटाया गया, वह कहते हैं, "वयस्क और भारतीय नागरिक होने के बावजूद वोट देने का अधिकार छीन लिए जाने से मुझे बहुत तकलीफ़ हुई है."

मुर्शिदाबाद के एक अन्य पीठासीन अधिकारी मोहम्मद मोसेलुद्दीन सुवानी को भी इसी तरह की परेशानी का सामना करना पड़ा. सुवानी ने बीबीसी बांग्ला को बताया कि उनका नाम 'विचाराधीन' कर दिया गया क्योंकि उनके पिता के उनके समेत 6 बच्चे रिकॉर्ड में दर्ज हैं.

चुनाव आयोग के अनुसार, किसी एक व्यक्ति के छह या उससे अधिक बच्चे हों तो वह 'तार्किक विसंगति' माना जाता है.

सुवानी ने कहा कि उन्होंने अपनी पात्रता साबित करने के लिए कई दस्तावेज़, जिनमें उनका 10वीं कक्षा का प्रमाणपत्र भी शामिल है, चुनाव आयोग को जमा किए. फिर भी उन सभी छह भाई-बहनों को सूची से हटा दिया गया.

वह कहते हैं, "यह एक अजीब और दर्दनाक स्थिति है. मुझे नहीं पता कि मेरा मताधिकार कब वापस मिलेगा."

अली और सुवानी, दोनों शम्सेरगंज निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता हैं. उन्होंने अपने नाम हटाए जाने के ख़िलाफ़ ट्रिब्यूनल में अपील दायर की है. लेकिन उन्हें अब तक कोई जवाब नहीं मिला.

दोनों पीठासीन अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर की थी कि उनके मताधिकार बहाल किए जाएं. लेकिन अदालत ने मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे अपनी अपीलें ट्रिब्यूनलों में ही आगे बढ़ाएं.

सुप्रीम कोर्ट का दखल भी काम न आया!

88 वर्षीय सुप्रबुद्धा सेन के मामले में तो सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप भी लगभग अपर्याप्त साबित हुआ. सेन प्रसिद्ध कलाकार नंदलाल बोस के पोते हैं, जिन्होंने भारत के संविधान की मूल प्रति की पांडुलिपि को डिज़ाइन और चित्रित किया था.

चुनाव आयोग ने उनका और उनकी पत्नी का नाम 'विचाराधीन' कर दिया और उनसे पात्रता साबित करने को कहा. सेन ने बीबीसी बांग्ला को बताया कि उन्हें हटाए जाने का कारण पता नहीं था. उन्होंने कहा कि उनका नाम अंततः हटा दिया गया, जबकि उन्होंने पासपोर्ट, ज़मीन के दस्तावेज़ और आधार कार्ड जमा किए थे.

यह मामला सुप्रीम कोर्ट में उठाया गया, जिसने अपीलीय ट्रिब्यूनल को इसे प्राथमिकता से लेने का निर्देश दिया. ट्रिब्यूनल ने सेन और उनकी पत्नी के नामों को जारी कर दिया. लेकिन 23 अप्रैल की सुबह जब वे बोलपुर निर्वाचन क्षेत्र के मतदान केंद्र में वोट डालने गए, तो उन्हें सूची में अपना नाम नहीं मिला.

उन्होंने बीबीसी बांग्ला को बताया, "हमें कहा गया कि ज़िला प्रशासन की लिखित अनुमति के बिना हमें वोट डालने की इजाज़त नहीं मिलेगी. मैंने उम्मीद छोड़ दी, लेकिन मेरे बच्चों ने नहीं. बाद में मैंने लगभग 4:30 बजे वोट डाला.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.


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