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तिरुपति लड्डू विवाद: उच्चतम न्यायालय ने स्वतंत्र एसआईटी का गठन किया
04-Oct-2024 4:53 PM
तिरुपति लड्डू विवाद: उच्चतम न्यायालय ने स्वतंत्र एसआईटी का गठन किया

नयी दिल्ली, 4 अक्टूबर उच्चतम न्यायालय ने तिरुपति लड्डू बनाने में पशु चर्बी के इस्तेमाल के आरोपों की जांच के लिए पांच सदस्यीय ‘‘स्वतंत्र’’ विशेष जांच दल (एसआईटी) का शुक्रवार को गठन करने के साथ ही स्पष्ट किया कि वह अदालत का ‘‘राजनीतिक युद्ध के मैदान’’ के रूप में इस्तेमाल किए जाने की अनुमति नहीं देगा।

यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शीर्ष अदालत द्वारा नियुक्त जांच दल उस एसआईटी का स्थान लेगा जिसका गठन आंध्र प्रदेश सरकार ने तिरुपति लड्डुओं को बनाने में पशु चर्बी के इस्तेमाल के आरोपों की जांच के लिए 26 सितंबर को किया था।

न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि एसआईटी में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) और आंध्र प्रदेश पुलिस के दो-दो अधिकारियों के अलावा एफएसएसएआई (भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण) का एक वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल होगा।

पीठ ने कहा, ‘‘हम स्पष्ट करते हैं कि हम न्यायालय का राजनीतिक युद्ध के मैदान के रूप में इस्तेमाल नहीं होने देंगे लेकिन करोड़ों लोगों की भावनाओं को शांत करने के लिए हम चाहते हैं कि जांच एक स्वतंत्र एसआईटी द्वारा की जानी चाहिए जिसमें राज्य पुलिस एवं सीबीआई के प्रतिनिधि और एफएसएसएआई का एक प्रतिनिधि शामिल हों।’’

पीठ ने निर्देश दिया कि यह उचित होगा कि जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक की निगरानी में की जाए।

उसने सुनवाई के दौरान कहा, ‘‘हम नहीं चाहते कि यह राजनीतिक नाटक बन जाए। दुनिया भर में करोड़ों लोगों की भावनाएं इससे जुड़ी हैं।’’

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने इस महीने की शुरुआत में आरोप लगाया था कि राज्य में वाई एस जगन मोहन रेड्डी के नेतृत्व वाली पिछली सरकार के दौरान तिरुपति मंदिर के लड्डू तैयार करने में पशु चर्बी का इस्तेमाल किया गया था। इससे बड़े पैमाने पर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है।

युवजन श्रमिक रायथू (वाईएसआर) कांग्रेस पार्टी ने आरोप लगाया है कि नायडू ने राजनीतिक लाभ के लिए ये ‘‘निंदनीय आरोप’’ लगाए और राज्य में सत्तारूढ़ तेलुगु देशम पार्टी (तेदेपा) ने अपने दावे के समर्थन में एक प्रयोगशाला रिपोर्ट जारी की।

पीठ ने इस मामले में न्यायालय की निगरानी में जांच कराए जाने का अनुरोध करने वाली याचिकाओं सहित कई याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान यह आदेश पारित किया।

पीठ ने स्पष्ट किया कि उसने दोनों याचिकाओं में लगाए गए आरोपों और राज्य सरकार सहित प्रतिवादियों के रुख पर गौर नहीं किया है।

उसने यह भी स्पष्ट किया कि उसके आदेश को राज्य द्वारा नियुक्त एसआईटी के अधिकारियों की निष्पक्षता पर किसी प्रकार के सवाल के तौर पर नहीं देखा जाए।

पीठ ने कहा कि न्यायालय देवता में आस्था रखने वाले करोड़ों लोगों की भावनाओं को शांत करने के लिए एक स्वतंत्र एजेंसी को जांच सौंपने का आदेश दे रहा है।

उसने कहा, ‘‘राज्य सरकार द्वारा नियुक्त एसआईटी को बदला जाता है...।’’

उसने कहा कि सीबीआई के दो अधिकारियों को जांच एजेंसी के निदेशक द्वारा नामित किया जाएगा, जबकि आंध्र प्रदेश राज्य पुलिस के दो अधिकारियों को राज्य सरकार द्वारा नामित किया जाएगा।

पीठ ने याचिकाओं का निपटारा करते हुए कहा कि एफएसएसएआई के अध्यक्ष स्वतंत्र एसआईटी में शामिल करने के लिए प्राधिकरण के एक वरिष्ठ अधिकारी को नामित करेंगे।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से कहा कि अगर आरोपों में जरा भी सच्चाई है, तो यह बात अस्वीकार्य है।

उन्होंने सुझाव दिया कि एसआईटी द्वारा जांच की निगरानी केंद्र सरकार के किसी वरिष्ठ अधिकारी द्वारा की जा सकती है।

उच्चतम न्यायालय ने 30 सितंबर को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से यह निर्णय लेने में सहायता करने को कहा था कि क्या राज्य सरकार द्वारा गठित एसआईटी की जांच जारी रहनी चाहिए या किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जानी चाहिए।

शीर्ष अदालत ने शीर्ष विधि अधिकारी से इस मुद्दे पर विचार करने और इस संबंध में सहायता करने को कहा था।

न्यायालय ने 30 सितंबर को कहा था कि कम से कम देवताओं को तो राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए। साथ ही न्यायालय ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू के इस सार्वजनिक बयान पर सवाल उठाया कि वाई एस जगनमोहन रेड्डी के नेतृत्व वाली पूर्ववर्ती सरकार के शासन के दौरान तिरुपति मंदिर के लड्डू बनाने में कथित तौर पर पशुओं की चर्बी का इस्तेमाल किया गया।

शीर्ष अदालत ने कहा था कि प्रयोगशाला जांच रिपोर्ट ‘‘बिलकुल भी स्पष्ट नहीं’’ है और प्रथम दृष्टया संकेत मिलता है कि ‘अस्वीकृत घी’ की जांच की गई।

उसने कहा था कि राज्य सरकार के अनुसार, मामले में प्राथमिकी 25 सितंबर को दर्ज की गई और एसआईटी का गठन 26 सितंबर को किया गया।

पीठ ने कहा था , ‘‘इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया बयान 26 सितंबर को प्राथमिकी दर्ज होने और एसआईटी गठित होने से भी पहले का है। मुख्यमंत्री 18 सितंबर को जनता के बीच जा चुके हैं।’’

उसने कहा था, ‘‘हमारा प्रथम दृष्टया यह मानना है कि जब जांच प्रक्रिया जारी है, तो एक उच्च संवैधानिक पदाधिकारी के लिए सार्वजनिक रूप से जाकर ऐसा बयान देना उचित नहीं है, जो करोड़ों लोगों की भावनाओं को प्रभावित कर सकता है।’’ (भाषा) 


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