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नाकाम वन अफसर एटीआर बर्बाद कर रहे, भालू की मौत छिपा दी और चुपचाप दफना दिया
31-Mar-2021 8:54 PM
नाकाम वन अफसर एटीआर बर्बाद कर रहे, भालू की मौत छिपा दी और चुपचाप दफना दिया

वन्यजीवों की लगातार मौतें, निरंतर शिकार, अवैध कटाई और आगजनी, नीचे के ईमानदार अफसरों को सज़ा, नेताओं को वोट बैंक की चिंता  

राजेश अग्रवाल की विशेष रिपोर्ट
बिलासपुर, 31 मार्च (‘छत्तीसगढ़’)।
अचानकमार टाइगर रिजर्व में बीते दिनों चार चीतलों को शिकारियों ने मार डाला था, पर उससे भी बड़ी ख़बर यह है कि भालू को जला डाला गया, वह भी वन अधिकारियों की देखरेख में। ‘छत्तीसगढ़’ अख़बार के पास इसके जीपीएस लोकेशन सहित प्रमाण उपलब्ध हैं। हालांकि एटीआर के उप-संचालक ने “छत्तीसगढ़” से कहा है कि हम जंगल की सुरक्षा के लिये पूरी जिम्मेदारी से काम कर रहे हैं। भालू की मौत की बात झूठी है।

होली मनाने के लिये एटीआर में चार चीतलों का करंट लगाकर शिकार किया गया। वन अधिकारी अपने सरकारी बयान में यह बताने लगे कि उन्हें शिकारियों की हरकत का पता चला तब उन्होंने चार लोगों को रंगे हाथ पकड़ लिया। इस सवाल का वन अधिकारियों के पास कोई जवाब नहीं है कि जब पहले से शिकारियों का पता चल गया तो किन परिस्थितियों में चीतल को मार डाला गया। वहां तैनात अधिकारी क्या चीतलों के शिकार हो  जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे? जबकि ग्रामीण बता रहे हैं कि शिवतराई के पास एक ठिकाने पर शिकारी खुलेआम करंट लगाकर मारे गये चीतलों की मांस को बेचने लगे थे। इसे देख उन्होंने फोन करके वन विभाग के अधिकारियों को सूचना दी, तब पकड़े गये।

इससे जुड़ी हुई बायसन की मौत भी कम हैरानी में डालने वाली बात नहीं है। बायसन की मौत की सूचना मिलने के बाद वन अफसरों ने यह बताने में कोई देर नहीं लगाई कि उसकी मौत स्वाभाविक है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी मनमाफिक आ गई। ग्रामीणों के मुताबिक, जब शिकारी पकड़े गये तो उन्होंने बताया कि बायसन की मौत भी उनके ही बिछाये करंट लगने से हुई है। पर एफआईआर में उनके इस बयान को दर्ज नहीं किया गया।

इसी दौरान यह खबर भी आई कि एक भालू की मौत भी हो गई। यह सूचना वन विभाग तक पहुंची तो भालू की मौत को वन विभाग ने छिपाने पर पूरी ताकत लगा दी। वन अधिकारियों ने उस ग्रामीण को देर रात तीन बजे जगाया गया, जिसने भालू के मर जाने की जानकारी दी थी। अंधेरे में भालू के शव की तलाश नहीं हो पा रही थी, तो सूखे पत्ते, टहनी एकत्र कर आग लगाई गई। भालू का शव रात में ही जला दिया गया, ऐसा आरोप है।

अब शिकारी कह रहे हैं कि शायद भालू भी हमारे बिछाये करंट के जाल से मर गया हो। पर वन अधिकारी भालू के बारे में कोई बात नहीं कर रहे हैं। पता चला है कि शिकारियों का भालू के बारे में दिये गये बयान को भी मृत बायसन की तरह ही दर्ज नहीं किया गया है।

वन विभाग के अफसरों ने प्रेस रिलीज निकालकर अपनी पीठ थपथपाई है। वे इस बात पर अपनी दाद दे रहे हैं कि उन्होंने चीतल मारने वाले शिकारियों को पकड़ डाला।

यह बताना जरूरी है कि जंगल होने के कारण बिजली लाइन 10 किलोमीटर पहले बैगाबाबा में ही खत्म कर दी गई है। फिर शिकारियों ने बीच जंगल में किस तरह करंट पहुंचाया और जानवरों को मारने के लिये प्रबंध किया, इस बारे में वन अधिकारियों ने कुछ नहीं बताया है।

उठे सवालों पर वन विभाग का जवाब

अचानकमार टाइगर रिजर्व के उप संचालक सत्यदेव शर्मा ने कहा कि भालू की मौत की बात झूठी है। बायसन की मौत पहले ही हो गई थी, और तीन डॉक्टरों पर भरोसा करना चाहिये जिन्होंने पोस्टमार्टम कर उसकी मौत को स्वाभाविक बताया है। अचानकमार में बिजली नहीं है पर घटनास्थल शिवतराई, जहां बिजली लाइन है उसी के आसपास की है। भालू की मौत और शव जलाने की बात पूरी तरह गलत है।

फोटोग्राफ और जीपीएस लोकेशन उपलब्ध

‘छत्तीसगढ़’ अख़बार के पास मृत भालू, उसे जलाने और जिस जगह पर मौत तथा जलाने की घटना हुई है, उसकी तस्वीरें उपलब्ध हैं। वन अधिकारी यह जरूर कह रहे हैं कि किसी भालू की मौत नहीं हुई, पर इन तस्वीरों से साफ है कि यह घटना हुई, जिसे अधिकारियों ने छिपा दिया है।

हत्या और वारदात छिपाने की सज़ा

हाईकोर्ट अधिवक्ता संदीप दुबे ने बताया कि भालू शेड्यूल वन के अंतर्गत वन्य जीव है। वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत इस तरह के मामलों में सात साल की सजा और पांच लाख रुपये तक का जुर्माना है। अधिनियम की व्याख्या लम्बी है, जिसके अंतर्गत संरक्षित वन्य क्षेत्र में ज्यादा सज़ा भी दी जा सकती है। किसी भी अपराध को छिपाने पर आईपीसी 120 के अंतर्गत सजा दी जाती है, जो मूल अपराध का एक चौथाई होगा।

लगातार मौतें, किसी का बाल बांका नहीं  

बिलासपुर शहर से लगे कानन पेंडारी मिनी जू में वन्य जीवों की लगातार मौतें हो रही हैं। विगत 15 वर्षों से वन विभाग की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकार सतीश यादव ने कहा कि उनके पास 22 मौतों का बीते एक साल के भीतर आंकड़ा है। इन मौतों में विलुप्त हो रहे गोराल और हिप्पो भी शामिल हैं। हर एक मौत को स्वाभाविक बता दिया जाता है। 400 से अधिक वन्य जीवों के इस मिनी जू में एक भी प्रशिक्षित चिकित्सक नहीं है। आज से सात साल पहले 22 चीतलों की मौत हो गई थी। तब विपक्ष में कांग्रेस थी। जांच दल ने बैटरी कार में घूमकर निरीक्षण किया। पर आज तक उन्होंने अपनी जांच का निष्कर्ष जारी नहीं किया। इन मौतों में तब के एक सत्तारूढ़ विधायक का नाम सामने आया। वे पार्टी करने अपने मित्रों के साथ उसी रात पहुंचे थे। वन विभाग ने एंथ्रेक्स से हुई मौत बताया, जिसे दिल्ली से आई जांच टीम ने गलत बता दिया। आज तक उन मौतों का राज़ नहीं खुला, न ही किसी को सज़ा हुई।  

आये दिन अवैध कटाई और आगजनी के मामले

बिलासपुर, मुंगेली, कोटा और बेलगहना के फर्नीचर व्यवसायी आदिवासियों को जंगल काटने के लिये प्रलोभन देते हैं। वन विभाग ने पिछली बार कब इनके ठिकानों पर छापा मारकर बिलिंग की जांच की इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। एक मिल संचालक का कहना है कि हर माह तय रकम हम भेज देते हैं। जनप्रतिनिधियों ने भी यहां के जंगल और वन्यजीवों को बचाने में कोई रुचि नहीं दिखाई है। छह माह पहले एक रेंजर संदीप सिंह को विधानसभा में सवाल करके यहां से हटा दिया गया था। उन्होंने हथियारों के साथ पेड़ काटने वालों को गिरफ्तार किया था। इसके बाद से मैदानी स्तर पर काम करने वाले वन कर्मचारियों का मनोबल टूटा हुआ है।

जंगल में आगजनी की घटनाओं को रोकने के लिये जो फायर वॉचर तैनात किये गये हैं उनका कुछ भी योगदान दिखाई नहीं देता है। आये दिन महुआ को तोड़ने के बजाय जलाकर गिराने की घटनायें हो रही है। बिलासपुर और मुंगेली पुलिस महुआ से शराब बनाने वालों की धरपकड़ तो कर रही है पर ये महुआ कहां से आ रहा है, इस पर कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।

आईएएस की हरकत याद आई

अगस्त सन् 2015 में तब के प्रशिक्षु एसडीएम रणबीर शर्मा ने एक भालू को गोलियों से यह कहकर मरवा दिया था कि यह आदमखोर हो गया है। जबकि कानूनी रूप से इसका फैसला लेना सिर्फ वन विभाग को है। अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस मामले की जांच के लिये जगह-जगह आवेदन लगाये पर इस मामले में कार्रवाई शून्य रही। इस अधिकारी पर एक अधीनस्थ के माध्यम से रिश्वत लेने का आरोप भी लगा था। अभी वे छत्तीसगढ़ के एक जिले सूरजपुर के कलेक्टर हैं।  


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