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विशेष रिपोर्ट : जनता से किये वादे हाशिये पर, सिर्फ अपने वर्चस्व की चिंता
-राजेश अग्रवाल
बिलासपुर, 6 जनवरी('छत्तीसगढ़')। बिलासपुर में कांग्रेस नेताओं के बीच का विवाद गहराता जा रहा है। विधायक शैलेष पांडेय के साथ हुई घटना की जांच प्रदेश कांग्रेस कमेटी करा रही है। क्या इसके बाद एक पक्ष की हार होगी और दूसरे पक्ष की जीत? आशंका है कि सावधानी से मामले को नहीं सुलझाया गया तो उठापटक आगे भी जारी रहेगी। इस लड़ाई में किस नेता की चलती है, यह तो बाद में पता चलेगा लेकिन इन घटनाओं से शहर के वे नागरिक जिन्होंने 20 साल बाद बदलाव की उम्मीद में कांग्रेस को मौका दिया वे अपने-आपको हारा हुआ महसूस कर रहे हैं।
सन् 2018 में भाजपा की सरकार को उखाड़ फेंकने के लिये कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जमकर मेहनत की। प्रदेश कांग्रेस के तब महामंत्री अटल श्रीवास्तव की टिकट नहीं मिल पाई लेकिन इसकी भरपाई लोकसभा टिकट देकर की गई। मोदी की लहर में जीत उनके हाथ नहीं लगी। संगठन और प्रशासन दोनों में श्रीवास्तव का पर्याप्त दखल है। सीधे मुख्यमंत्री तक पहुंच और उनसे पुराना रिश्ता होने का दावा करते हैं और यह देखा भी जाता है। इस समय अधिकांश प्रमुख पदों पर बैठे लोग उनके समर्थन में हैं। प्रशासन भी इस प्रभाव के बारे में खबर रखता है।
2018 में बिलासपुर की जीत इसलिये महत्वपूर्ण रही क्योंकि लगातार 20 साल यह प्रदेश के एक मजबूत मंत्री अमर अग्रवाल की सीट रही। यही उपलब्धि शैलेष पांडेय की बिलासपुर में जड़ें जमाने की संभावना पैदा करती है। सन् 2023 के चुनाव में भी उन्हें दुबारा मौका मिल सकता है।
विधायक विरोधियों की पीड़ा यह दिखाई देती है कि बरसों से संगठन के लिये काम करने वाले, जेल जाने, लाठियां खाने वाले देखते रह गये और कुछ साल पहले बिलासपुर आने वाले पांडेय को वह सब कुछ मिल गया जिसे हासिल करने के लिये वे पसीना बहाते रहे।
पर राजनीति में सब अपनी चालें अपनी क्षमता के अनुसार चलते हैं और कई को सफलता मिल जाती है। पांडेय का भाग्य भी कुछ प्रबल रहा कि जब उन्हें टिकट दी गई तो कांग्रेस के पक्ष में माहौल था। विशेषकर तत्कालीन विधायक को कार्यकर्ता, मतदाता एक बार तो हराना चाहते थे। कई बड़े नेताओं के खामोश बैठ जाने के बाद भी वह अपनी टीम बनाकर सीट निकालने में कामयाब हो गये।
बीते दो सालों में अक्सर मौके आये हैं जब विधायक और उनके विरोधी खेमे के बीच शह-मात होती रही है। जब भी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल बिलासपुर आते हैं, एक समानान्तर घटनाक्रम दोनों गुटों में टकराव की भी चलती है। जैसा कि विधायक की ओर से बताया गया है कि सर्किट हाउस में चार जनवरी को जब मुख्यमंत्री मौजूद थे, बाहर ब्लॉक कांग्रेस 1 के अध्यक्ष तैयब हुसैन ने उनकी कॉलर पकड़कर धमकी दी कि अगली बार निपटा देंगे। इधर संगठन प्रवक्ता ने भी तुरंत इसे ‘मीडिया को गुमराह’ करने वाली कांग्रेस विरोधियों की साजिश कहा। कहा कि कॉलर पकड़ने जैसी कोई घटना नहीं हुई।
किसका पक्ष सही है इसकी जांच के लिये प्रदेश कांग्रेस कमेटी की समिति बन गई है। तीन दिन में रिपोर्ट देने की बात भी हुई है, पर सबसे बड़ा सवाल है कि क्या कोई कार्रवाई होगी? यदि ऐसा हुआ तो यह किसी एक पक्ष की तत्कालिक जीत तो होगी पर यह आकलन संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों को करना होगा कि कार्रवाई ऐसी हो कि कांग्रेस नेताओं के बीच सुलह हो, न कि दरार बढ़े। हो सकता है अनुशासनहीनता पर नोटिस देकर, माफीनामा लेकर मामला रफा-दफा कर दिया जाये। जांच समिति के सामने संकट है कि कांग्रेस का एक गुट किसी तरह की कार्रवाई से नाराज हो जायेगा, दूसरा खेमा चाहता है साफ-सफाई की शुरूआत यहीं से हो।
इस सबके बीच बिलासपुर की जनता हाशिये पर है, जिन्होंने कांग्रेस को काफी उम्मीद से मौका दिया। अकेले विधायक को नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी को भी। दो साल से इनके बीच वह झगड़े ही देख रही है। शहर की राजनीति में हावी कौन रहे, यही सवाल सबसे बड़ा हो गया है। सन् 2018 के चुनाव में किये गये वायदों को ताक पर रखकर 2023 में जमीन कौन संभालेगा, यह सवाल तो अभी से और बड़ा हो गया है। लेकिन पैर खींचने की इस राजनीति के चलते फायदे में भाजपा रहेगी क्योंकि हार-जीत का फासला पिछले चुनाव में इतना ज्यादा भी नहीं रहा है, जिसे पाटा न जा सके।
2018 के चुनाव के पहले कांग्रेस नेताओं को शहर की सड़कों पर गड्ढे ही गड्ढे, धूल ही धूल दिखाई देते थे। गौरव पथ और अंडरग्राउन्ड सीवरेज में करोड़ों रुपये का भ्रष्टाचार दिखाई देता था। वह इसलिये क्योंकि वे तकलीफ भोगने वाली जनता की आंखों से समस्याओं को देख रहे थे और इसे भुनाना चाहते थे। आज दो साल होने को आये, न गौरव पथ के भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों पर कोई कार्रवाई हुई न अंडरग्राउण्ड सीवरेज के। सीवरेज योजना में तो दोषी अधिकारियों की गिरफ्तारी, वसूली, सीबीआई जांच जैसी बातें कही गई लेकिन वहां वही अधिकारी उससे ज्यादा मजबूत स्थिति में अपनी कुर्सी पर जमे हुए हैं। स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत एक सड़क, एक लाइब्रेरी, राज्य सरकार की चलित स्वास्थ्य सेवा, अंग्रेजी स्कूल को ही उपलब्धि के रूप में गिना जा सकता है। मगर, अमृत मिशन योजना में करोड़ों रुपये के पाइप बिछाये जा रहे हैं बरसों से अधूरा है। जिस डेम से पानी आना है उसका काम पहले होना था, जो अब तक शुरू नहीं हुआ है। सड़कों की खुदाई जारी है जबकि बनाने का कछुआ रफ्तार से चल रहा है। व्यापार विहार की सड़क और महाराणा प्रताप चौक का फ्लाईओवर अपने तय समय से महीनों देरी से चल रहा है। व्यवसाय को ही नहीं, शहरवासियों व बाहर से आने वाले राहगीरों को भी इसकी काफी आर्थिक क्षति व दिक्कतें झेलनी पड़ रही है। हवाई सेवा की मांग के लिये 210 दिनों से आंदोलन चल रहा है पर केन्द्र तक असरदार आवाज उठे और सेवा शुरू हो इसके लिये चिट्ठी-पत्री को छोड़कर कोई गंभीर प्रयास नहीं किया जा रहा है। लोग अरपा सौंदर्यीकरण का काम भी शुरू होने का बीते दो सालों से इंतजार कर रहे हैं।
2018 में जीत हासिल करने के लिये जो कांग्रेस एकजुट थी, उसके नेताओं ने अब अपना-अपना रास्ता अख्तियार कर लिया है। वे एक कुर्सी के कई टुकड़े कर विराजमान होना चाहते हैं। सब अपने अपने मंत्री तय कर सत्ता का स्वाद ले रहे हैं और भरोसे एक दूसरे को निपटाने की कोशिश कर रहे हैं। बिलासपुर में अतीत फिर से दोहराने की पृष्ठभूमि बनती दिख रही है, जब कांग्रेस के चलते ही कांग्रेस बार-बार हारती गई और भाजपा की जमीन हर बार ज्यादा मजबूत होती गई।


