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अनुभवहीन कंपनियों को सैकड़ों करोड़ काम देने आरोप
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 23 अक्टूबर। हर गांव-घर में पीने का साफ पानी उपलब्ध कराने की सरकार की करीब साढ़े 7 हजार करोड़ की योजना के कार्य आबंटन पर विवाद खड़ा हो गया है। बताया गया कि प्रदेश से बाहर की पाइप निर्माता, इंजीनियरिंग और कम्प्यूटर निर्माण से जुड़ी अनुभवहीन कंपनी को सैकड़ों करोड़ों का काम मिल गया। इससे खफा स्थानीय ठेकेदारों ने अलग-अलग फोरम में आपत्ति की थी, और इसके बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई है।
मुख्यमंत्री श्री बघेल ने जल जीवन मिशन के अंतर्गत कार्य आबंटन प्रक्रिया के संबंध में प्राप्त हो रही विभिन्न शिकायतों को गंभीरता से लिया है। श्री बघेल ने इन शिकायतों के परीक्षण के लिए मुख्य सचिव, अपर मुख्य सचिव वित्त और सचिव लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग की तीन सदस्यीय टीम गठित की है। मुख्यमंत्री से अनुभवहीन कंपनियों को करोड़ों का काम देने की शिकायत हुई थी।
हालांकि पीएचई के प्रमुख अभियंता एमएल अग्रवाल ने ‘छत्तीसगढ़’ से चर्चा में कहा कि पेयजल योजना के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ऑफर बुलाए गए थे। नियमों में यह साफ है कि यदि किसी कंपनी के पास अनुभव नहीं है, तो वह ज्वाइंट वेंचर कर टेंडर डाल सकती है। कंपनियों को टर्नओव्हर के आधार पर काम आबंटन किया गया है। इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बरती गई है। स्थानीय ठेकेदारों से भेदभाव का सवाल ही पैदा नहीं होता। उनकी शिकायतों को दूर करने के लिए रास्ता निकालने की कोशिश भी हो रही है।
बताया गया कि गांवों में हर घर में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने की महत्वकांक्षी योजना छह माह पिछड़ गई है। इस योजना के लिए 50 फीसदी राशि केन्द्र सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जा रही है। सूत्र बताते हैं कि कई राज्यों में इस योजना पर काफी अच्छा काम हुआ है, लेकिन छत्तीसगढ़ में इसकी शुरूआत तक नहीं हो पाई है। इस पर केन्द्रीय सचिव ने नाराजगी भी जताई थी। अब आनन-फानन में काम शुरू हो रहा है, तो इसके ठेके को लेकर अनियमितताएं प्रकाश में आई है।
गांवों में टंकी और हर घर में नल पहुंचाने के इस काम के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ऑफर बुलाए गए थे। न्यूनतम बोली के आधार पर रेट तय किए गए, और कार्यक्षमता निर्धारण कर काम आबंटित कर दिया गया। बताया गया कि करीब साढ़े 7 हजार करोड़ के काम बांटे गए हैं। नियमों में यह साफ है कि किसी कंपनी के पास अनुभव नहीं है, तो वह अनुभवी कंपनी के साथ ज्वाइंट वेंचर कर ऑफर दे सकती है।
बताया गया कि सरकारी नियम की छूट का फायदा महाराष्ट्र, गुजरात की कई कंपनियों को मिला है। इंजीनियरिंग, कम्प्यूटर निर्माण और पाइप निर्माता कंपनी को भी इस योजना में काम मिला है। कुछ सूत्रों के मुताबिक मैदानी इलाकों के ज्यादातर काम बाहरी कंपनियों को दिया गया है। इनमें पटेल इंजीनियरिंग मुंबई, गाजा इंजीनियरिंग तेलंगाना, लक्ष्मी इंजीनियरिंग कोल्हापुर, क्लासिक नेटवर्थ राजकोट, सुधाकर इंफोटेक हैदराबाद, एनएसटीआई कंट्रक्शन कंपनी हैदराबाद, पीआर प्रोजेक्ट इंफ्रास्क्चर दिल्ली आदि प्रमुख हैं।
कार्य आबंटन में बड़े पैमाने पर अनियमितता की शिकायत हुई है। यह कहा गया कि छत्तीसगढ़ में टेंडर के लिए एकल पद्धति की प्रणाली लागू है। यानी ए श्रेणी के ठेकेदार-कंपनियों को असीमित काम दिया जा सकता है। बी श्रेणी को 10 करोड़, सी श्रेणी को 2 करोड़, डी को 1 करोड़ की ठेके की पात्रता है। परन्तु पीएचई के इस काम में कई डी श्रेणी के ठेकेदारों को 4 करोड़ से लेकर 10 से 12 करोड़ के काम आबंटित किए गए हैं। यह बात भी सामने आई है कि प्रदेश से बाहर की कुल 44 कंपनियां हैं। जिसे तीन चौथाई काम दे दिए गए हैं। ये काम मैदानी इलाकों के हैं। जबकि स्थानीय ठेकेदार-कंपनियों को ज्यादातर संवेदनशील और नक्सल इलाकों में काम दिया गया है। इसके बाद ठेकेदारों ने मुख्यमंत्री से मुलाकात की थी। इसके बाद जांच समिति बनाई गई है। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही कार्यादेश जारी किए जाएंगे।


