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आज की दुनिया के जलते-सुलगते मुद्दे, अपने धर्मगुरूओं की फिक्र को जरा तौलें!
पिछले कुछ महीनों से लगातार अलग-अलग धर्मगुरूओं की कुछ-कुछ बातों को देखते-सुनते हुए एक खिचड़ी दिमाग मेें पक रही थी। फिर आज सुबह जब खबरों में यह सुना कि अफ्रीका के देशों में एक-एक करके अलग-अलग जगह पर किस तरह समलैंगिकों, और ट्रांसजेंडरों के खिलाफ बहुत कड़े कानून बनते चले जा रहे हैं, तो उसके साथ-साथ यह भी सुनने मिला कि इन देशों में ईसाई धर्म, और इस्लाम, इन दोनों का खूब बोलबाला है, और ये सारे धर्मगुरू समलैंगिकता के खिलाफ इसलिए हैं कि ये उसे अनैतिक मानते हैं क्योंकि इससे अगली पीढ़ी पैदा नहीं होती।
एक तरफ तो काफी बड़ी दुनिया अब एलजीबीटीक्यूआई की परिभाषा में आने वाले हर तरह के यौन पहचान वाले अल्पसंख्यकों के अधिकारों को अधिक से अधिक मान्यता दे रही है, तब ईसाई और मुस्लिम धर्मगुरू समलैंगिकों को और अधिक कड़ी कैद देने वाली सरकारों के हिमायती हैं। यह देखकर लगा कि धर्म क्या अधिकतर दुनिया में पहले की तरह कट्टर, पहले से अधिक कट्टर बना हुआ नहीं है? और क्या अलग-अलग धर्मों की सोच कुछ अलग-अलग है? क्या कुछ धर्मगुरू अपने ही धर्म में प्रचलित सोच से अलग-अलग ऊपर भी कुछ सोच सकते हैं? क्या धर्मगुरुओं में अपने अस्तित्व को खतरे में डालकर भी अलोकप्रिय सच को कहने का हौसला हो सकता है?
ऐसे कई सवालों को पिछले महीनों में सोचते हुए यह देखने मिला कि कौन-कौन से ऐसे धर्म हैं जिनके धर्मगुरू लगातार हजारों बरस पहले जीने में अपने को सुरक्षित पाते हैं? भारत में ही कई हिन्दू धर्मगुरू अपने प्रवचनों में हाल के सैकड़ों बरसों में आना ही नहीं चाहते, क्योंकि इन सैकड़ों बरसों में विज्ञान और टेक्नॉलॉजी ने, लोकतंत्र और संविधानों ने, नए राजनीतिक दर्शन और सिद्धांतों ने धर्म की हजारों बरस पुरानी सोच और व्यवस्था को गहरी चुनौती दी है। इसलिए अधिकतर धर्मगुरू उस युग के बाद, हाल के सैकड़ों बरस में आना ही नहीं चाहते, अपने भक्तों को लाना ही नहीं चाहते, जहां अप्रिय सवाल सिर उठाने लगे हैं। जिस तरह कहा जाता है कि रैबीज कुत्ते के काटे हुए इंसान को हाइड्रोफोबिया हो जाता है, और वे पानी देखते ही करने लगते हैं, उसी तरह का हाल धर्म का लगता है, वह सवालिया निशान, प्रश्नवाचक चिन्ह, और क्वेश्चन मार्क को देखकर डरने लगता है।
अभी हाल के महीनों में रोमन कैथोलिक समुदाय के सबसे बड़े मुखिया बने पोप लियो ने आज के मुद्दों को लेकर जिस तरह की बातें कही हैं, उन्हें पश्चिमी दुनिया में भी अभूतपूर्व और असाधारण माना जा रहा है। वे किसी भी देश में प्रवासियों के अधिकार, दुनिया के देशों की छेड़ी गई जंग, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, और दुनिया के ऐतिहासिक अपराधों पर चर्च की चुप्पी के इतिहास जैसे मुद्दों पर लगातार बोल रहे हैं। और वे किसी समारोह के लंबे भाषण के बीच में दबी-छुपी गोलमोल भाषा में यह सब नहीं बोल रहे, वे सीधे-सीधे अमरीकी सरकार से टकराव लेने का खतरा उठाते हुए भी इस तरह की बात कर रहे हैं। पोप लियो ने एआई के बारे में कहा कि इसे सिर्फ तकनीकी उपलब्धि की तरह नहीं देखा जा सकता, यह सत्ता, निगरानी, और असमानता को खतरनाक रूप से बढ़ा सकता है। उन्होंने कहा कि इसे युद्ध में मानवता के खिलाफ भयावह तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने एआई को लेकर कुछ वैसी ही चेतावनी दी, जैसी चेतावनी कभी परमाणु हथियारों को लेकर दी जाती थी। उन्होंने एआई उद्योग के लिए दुर्लभ खनिज निकालने के लिए खतरनाक परिस्थितियों में काम करने वाले बच्चों का जिक्र भी किया है। उन्होंने खुलकर यह माना कि एआई की मदद से जंग में मशीनों को इंसानों के कत्ल का अधिकार नहीं दिया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि एआई का नियंत्रण लोकतांत्रिक संस्थाओं के बजाय कुछ निजी कंपनियों के हाथ में जा रहा है, और इससे सत्य, लोकतंत्र, और स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। उन्होंने ट्रम्प की नाराजगी और दुश्मनी मोल लेते हुए भी यह कहा कि प्रवासियों के भी मानवीय अधिकारों का सम्मान होना चाहिए, देशों की सरहदों पर होने वाली अमानवीयता खत्म होनी चाहिए, और विस्थापित लोगों के प्रति दया दिखानी चाहिए। उन्होंने आधुनिक गुलामी के खतरे, बाजार व्यवस्था की तानाशाही के खतरे तो गिनाए ही हैं, आज की अमरीकी सरकारी सोच के खिलाफ भी उन्होंने ढेर सारी बातें कही हैं।
भारत में शरण लिए हुए एक बौद्ध गुरू दलाईलामा ने गैरईसाई दुनिया में जमीनी मुद्दों को लेकर कुछ बातें जरूर की हैं। उन्होंने परमाणु हथियारों के खिलाफ कुछ कहा है, जलवायु संकट पर कुछ बोले हैं, और मानसिक स्वास्थ्य के बारे में कुछ कहा है। दक्षिण अफ्रीका में एक पादरी डेसमंड टूटू ने दशकों पहले वहां के रंगभेद के खिलाफ बड़ा संघर्ष किया था, और धर्मगुरू होने के साथ-साथ वे वहां की एक सबसे बड़ी लोकतांत्रिक और राजनीतिक आवाज भी बन गए थे। उन्होंने गोरे अल्पसंख्यक रंगभेदी शासन का विरोध किया था, और लोकतंत्र और मानवाधिकारों की वकालत की थी। उनकी कही बातों में इतना नैतिक और राजनैतिक वजन था कि अफ्रीका के बाहर भी दुनिया भर में उन्हें माना जाने लगा था, और 1984 में उन्हें नोबल शांति पुरस्कार भी दिया गया था।
अब दुनिया भर में अलग-अलग धर्मों के लोगों को यह सोचना चाहिए कि उनके कौन से धर्मगुरू उन्हें कौन से युग में बनाए रखना चाहते हैं? उनमें से कौन से धर्मगुरू हाल के दशकों की बेइंसाफी की बात करते हैं? उनमें से कौन से हैं जो आज समाज की असमानता के खिलाफ सोचते और बोलते हैं, और लोगों को ऐसे संघर्ष के लिए तैयार करते हैं? मैं यहां पर दूसरे धर्म के गुरूओं का नाम और उनकी कही हुई सदियों पुरानी जंग लगी, काई जमी बातों को गिनाना नहीं चाहता। यह तो लोगों को खुद ही देखना होगा कि उनके धर्मगुरू उन्हें कितनी सदी पीछे धकेलकर वहीं पर बनाए रखना चाहते हैं, ताकि आज की वैज्ञानिक-लोकतांत्रिक, और संवैधानिक हवा में कहीं वे सांस न ले लें। अपने-अपने धर्म को अच्छी तरह आंक लेने के बाद वे 21वीं सदी के 25वें बरस में जीने वाले, इसी दशक और बरस, और हाल के हफ्तों की बात करने वाले धर्मगुरूओं को भी देख सकते हैं। यह भी देखने की जरूरत है कि आज कौन से ऐसे धर्मगुरू हैं जिनकी बातें अपने धर्म के अनुयायियों से परे के लोगों के भले की भी हैं, उन्हें भी बचाने के लिए हैं। लोगों को अपनी आस्था-उपासना के बीते मौके के बाद, और अगले मौके के पहले दूसरे धर्मों के लोगों की कही हुई बातों के बारे में भी सोचना चाहिए।
जो धर्म हजारों बरस पहले की लिखी गई, कहीं गई, या सिरे से काल्पनिक किताबों पर आधारित हैं, उनके धर्मगुरूओं का आज की हवा में सांस लेना आसान नहीं रहता है, और न ही वे भक्तजनों को आज की हवा की आदत लगने देना चाहते। फिर भी इतिहास उन्हीं धर्मगुरूओं को बेहतर दर्ज करेगा, जिन्होंने अपने धर्म के उन हमलावरों का विरोध किया जिन्होंने दूसरे धर्म के बेकसूर लोगों पर हमले किए। धर्म का कारोबार चलाते-चलाते इतनी बातें खुलकर कहना भी कोई आसान बात तो रहती नहीं।


