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नयी दिल्ली, 22 मई। केंद्र सरकार ने शुक्रवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि उसने निर्वासित करके बांग्लादेश भेजे गए कुछ लोगों को भारत वापस लाने का फैसला किया है और उसके बाद उनकी भारतीय नागरिकता के दावे की पुष्टि की जाएगी।
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया कि मामले के विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए और इसे अन्य मामलों में अनुकरणीय मिसाल न मानते हुए, सरकार ने उन्हें वापस लाने का निर्णय लिया है।
मेहता ने न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की सदस्यता वाली पीठ से कहा, ‘‘सरकार उन्हें वापस लाएगी और उसके बाद उनकी स्थिति की जांच करेगी। परिणाम के आधार पर, हम तदनुसार कदम उठाएंगे।’’
शीर्ष विधि अधिकारी ने कहा कि इन व्यक्तियों को भारत वापस लाने में 8-10 दिन लग सकते हैं।
पीठ ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख जुलाई में तय की है।
उच्चतम न्यायालय केंद्र सरकार की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें कलकत्ता उच्च न्यायालय के 26 सितंबर, 2025 के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें उच्च न्यायालय ने सुनाली खातून और अन्य को बांग्लादेश निर्वासित करने के केंद्र सरकार के फैसले को रद्द कर दिया था और इसे ‘अवैध’ करार दिया था।
पिछले साल तीन दिसंबर को शीर्ष अदालत ने ‘मानवीय आधार’ पर खातून और उनके आठ वर्षीय बच्चे को बांग्लादेश भेजे जाने के महीनों बाद भारत में प्रवेश की अनुमति दी थी।
अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार को बच्चे की देखभाल करने का निर्देश दिया था और बीरभूम जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी को गर्भवती खातून को मुफ्त प्रसव की सुविधा सहित हर संभव चिकित्सा सहायता प्रदान करने का निर्देश दिया था।
न्यायालय ने 24 अप्रैल को केंद्र सरकार को अंतिम अवसर दिया और उसके अधिवक्ता को इस मामले में निर्देश लेकर अदालत को अवगत कराने को कहा।
खातून के पिता भोदु शेख की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और संजय हेगड़े ने कहा कि केंद्र सरकार का यह रवैया ‘कुछ हद तक अनुचित’ है, जिसने इस मामले में न्यायालय को अपने विचार नहीं बताए हैं।
इससे पहले उच्चतम न्यायालय ने मेहता की इस दलील पर गौर किया था कि सक्षम प्राधिकारी ने महिला और उसके बच्चे को विशुद्ध मानवीय आधार पर, अधिकारों और आपत्तियों पर बिना किसी पूर्वाग्रह के, देश में प्रवेश की अनुमति देने पर सहमति जताई थी और उन्हें निगरानी में रखा जाएगा।
शेख ने आरोप लगाया कि दिल्ली के रोहिणी क्षेत्र के सेक्टर 26 में दो दशकों से अधिक समय से दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम कर रहे इन परिवारों को पिछले साल 18 जून को बांग्लादेशी होने के संदेह में पुलिस ने हिरासत में लिया और बाद में 27 जून को सीमा पार धकेल दिया।
पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले की निवासी खातून और स्वीटी बीबी को उनके परिवारों सहित ‘अवैध प्रवासी" करार देकर निर्वासित करके बांग्लादेश भेजने के केंद्र के फैसले को पिछले साल 26 सितंबर को उच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया था।
उच्च न्यायालय ने केंद्र को निर्देश दिया था कि निर्वासित किए गए छह नागरिकों को एक महीने के भीतर भारत वापस लाया जाए और आदेश पर अस्थायी रोक लगाने की सरकार की अपील को खारिज कर दिया था।
उच्च न्यायालय ने शेख द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के संबंध में दो आदेश पारित किए थे, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि उसकी बेटी और उसके पति दानिश शेख और पांच वर्षीय बेटे को दिल्ली में हिरासत में लिया गया और बांग्लादेश भेज दिया गया।
बीरभूम के उसी इलाके से दायर एक अन्य याचिका में आमिर खान ने भी इसी तरह का दावा किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि उसकी बहन स्वीटी बीबी और उसके दो बच्चों को दिल्ली पुलिस ने उसी इलाके से हिरासत में लिया और पड़ोसी देश भेज दिया। इसके बाद कथित तौर पर इन लोगों को बांग्लादेश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।
उच्च न्यायालय ने इस बात पर गौर किया था कि केंद्र ने अपने हलफनामे में कहा है कि दिल्ली स्थित विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (एफआरआरओ) एक नागरिक प्राधिकरण होने के नाते, केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा दो मई, 2025 को जारी ज्ञापन के निर्देशानुसार बांग्लादेश के अवैध प्रवासियों को वापस भेज रहा है।
निर्वासन के लिए अपनाए जाने वाले प्रोटोकॉल का विवरण देते हुए, ज्ञापन में कहा गया है कि किसी विशेष राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में अनधिकृत तरीके से रह रहे बांग्लादेश/म्यांमार के नागरिकों के संबंध में, संबंधित राज्य सरकार या केंद्र शासित प्रदेश द्वारा एक जांच की जाएगी, जिसके बाद निर्वासन की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। (भाषा)


