ताजा खबर
जर्मन संसद के निचले सदन, बुंडेसटाग, के 630 सांसदों की तनख्वाह में 497 यूरो (करीब 45 हजार रूपए) की बढ़ोत्तरी होनी थी, लेकिन सरकार ने इसे टाल दिया। सरकार और विपक्ष सबके बीच इस बात पर सहमति हो गई कि जनता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, उसे तकलीफ झेलनी पड़ रही है, ऐसे में सांसदों को अधिक वेतन नहीं लेना चाहिए। सदन के कुछ नेता देश की बाकी अर्थव्यवस्था की वेतन वृद्धि के मुताबिक संसदीय वेतन को तय करने के हिमायती थे, लेकिन सर्वदलीय सहमति इसके खिलाफ बनी, और बात आई-गई हो गई। भारतीय संसद में पिछले बरस मार्च में सांसदों के वेतन 24 फीसदी बढ़ गए, एक लाख से सवा लाख, दैनिक भत्ता, पेंशन, और बाकी सुविधाएं भी बढ़ गईं। भारत के अलग-अलग प्रदेशों में विधायकों के वेतन भी कई बार बढ़े हैं, लेकिन उनमें ऊंच-नीच बहुत अधिक है।
जर्मन संसद के इस ताजा फैसले को देखते हुए हमने अभी भारत में सांसदों के वेतन और मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी की तुलना करके देखी। 1954 में सांसदों को न्यूनतम मजदूरी से 150-200 गुना तनख्वाह मिलती थी। 1980 में भी यही अनुपात बने रहा, और 2000 तक भी। 2010 में सांसदों की तनख्वाह में ऐसी बढ़ोत्तरी हुई कि वह न्यूनतम मजदूरी से 300-400 गुना अधिक हो गई। 2018 में यह बढक़र 400-500 गुना हो गई, और 2025 में यह बढक़र 500-700 गुना हो गई। एक मजदूर की न्यूनतम मजदूरी और सांसद के उतने ही दिनों के वेतन में 500-700 गुना का फर्क हो गया। ये आंकड़े देखकर हमने कुछ और देशों में न्यूनतम मजदूरी और सांसदों के वेतन का अनुपात जानने की कोशिश की। इंटरनेट पर सहज उपलब्ध आंकड़ों को एक एआई, ग्रोक की मदद से देखने पर जो तस्वीर बनी, वह कुछ इस तरह की है। जिस पैमाने पर इस एआई ने सभी देशों के भीतर की तुलना की है, उनके मुताबिक जर्मनी में सांसद को मजदूर से 5.3 गुना अधिक तनख्वाह मिलती है, यूके में 5-7 गुना, फ्रांस में 5 गुना, या उससे कम, कनाडा में 4-5 गुना, ऑस्ट्रेलिया में 4 गुना, जापान में 4-5 गुना, अमरीका में 9-10 गुना। इस जोड़-घटाने के पैमाने पर भारत में सांसद को न्यूनतम मजदूरी पाने वाले मजदूर से 200-350 गुना अधिक वेतन मिलता है। जर्मनी में सांसदों की तनख्वाह अपने आप बढऩे का प्रावधान है, लेकिन इस बार आर्थिक स्थिति देखकर सांसदों ने खुद होकर इसे छोड़ दिया। यूरोप के कई देशों में सांसदों की तनख्वाह एक स्वतंत्र आयोग तय करता है, लेकिन भारत में सांसद खुद ही अपनी तनख्वाह और अपनी सहूलियतें तय करते हैं, और इसीलिए संसद की केंटीन में मिट्टी के मोल मिलने वाले शानदार खाने को लेकर खराब माहौल बने रहता है। इसके बाद हमने भारत के अगल-बगल के देशों का हाल देखा, क्योंकि अड़ोसी-पड़ोसी देशों की संस्कृतियां एक जैसी हो सकती हैं। नेपाल में सांसद को मजदूर की तुलना में 50-60 गुना अधिक वेतन मिलता है। इसके बाद की बारी श्रीलंका की है जहां यह 120-140 गुना तक अधिक है। फिर बांग्लादेश आता है जहां सांसद मजदूर से 130-140 गुना अधिक पाते हैं। और भारतीय उपमहाद्वीप में भारत इस मामले में सबसे ऊपर है जहां सांसद मजदूर से 200-350 गुना अधिक वेतन पाते हैं।
भारत के अलग-अलग राज्यों में विधायकों की तनख्वाह को उन्हीं राज्यों में न्यूनतम मजदूरी के साथ मिलाकर देखा गया। इसमें सबसे ऊपर झारखंड है जहां विधायक को मजदूर से 300 गुना अधिक मिलता है। इसके बाद महाराष्ट्र है जहां यह 180-200 गुना तक है। तेलंगाना भी 200 गुना वाला है। दिल्ली में 140 गुना अधिक वेतन विधायक मजदूरी के मुकाबले है। भारत के राज्यों का औसत देखें तो यह 150-250 गुना अधिक विधायक-वेतन बताता है। लेकिन अभी-अभी जिस केरल में नई सरकार बनी है, वहां पर मजदूर के मुकाबले विधायक को 50-60 गुना वेतन मिलता है, जो कि देश में सबसे कम है। केरल की आर्थिक स्थिति देश के बहुत से दूसरे राज्यों के मुकाबले बेहतर है, लेकिन जहां झारखंड के विधायक को 2 लाख 90 हजार तनख्वाह मिलती है, वहां केरल के विधायक 70-80 हजार रूपए ही मिलती है। हमने अलग-अलग राज्यों में किसी विचारधारा की पार्टी के शासन के बारे में देखा, तो बड़ा दिलचस्प नजारा दिखा। भाजपा के शासन वाले राज्यों में विधायकों की तनख्वाह औसत से ज्यादा है, देश में सबसे अधिक वेतन इसी पार्टी के राज में है। कांग्रेस, और आम आदमी पार्टी के राज्यों में मध्यम से उच्च वेतन विधायकों का है। तमिलनाडु में औसत, यानी मध्यम वेतन है। लेकिन वामपंथी शासन वाले राज्यों में किफायत और सादगी पर जोर रहता है, और वहां पर वेतन सबसे कम रहता है।
भारत में सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन तय करने के लिए वेतन आयोग बनते हैं। केन्द्र सरकार यह काम करती है, और आयोग की जो रिपोर्ट केन्द्र मंजूर करता है, प्रदेश भी धीरे-धीरे अपनी क्षमता के मुताबिक उसी को मान लेते हैं। ऐसे में यह बात समझ से कुछ परे है कि सांसदों और विधायकों को उनके अपने वेतन-भत्ते, सहूलियतें तय करने का अधिकार क्यों दिया गया है? इससे इनके बीच हितों के टकराव की एक बात भी आती है। भला कौन सा ऐसा तबका हो सकता है जिसके नफे-नुकसान का फैसला करने का हक उसे ही दे दिया जाए? जब देश में दसियों लाख कर्मचारियों का भविष्य एक वेतन आयोग तय करता है, तो पांच हजार के करीब सांसद-विधायक के वेतन-भत्ते वेतन आयोग क्यों तय नहीं कर सकता?
वैसे हम सांसदों और विधायकों को कम तनख्वाह देने के हिमायती नहीं हैं। हमारा मानना है कि उनमें से कुछ या कई लोग भले ही भ्रष्ट क्यों न हों, उन्हें इतनी तनख्वाह और पेंशन मिलनी चाहिए कि अगर वे चाहें, तो ईमानदार बने रह सकें। उनसे जनसेवा के नाम पर परिवार की जरूरतों के त्याग की उम्मीद नहीं करना चाहिए। जिन देशों से हमने तुलना की है, हो सकता है कि वहां न्यूनतम मजदूरी काफी अधिक हो। फिर भी किसी देश-प्रदेश में मजदूर और नेता की मजदूरी, और तनख्वाह में जमीन-आसमान जैसा फर्क नहीं होना चाहिए। हम जिन प्रमुख देशों के साथ भारत की तुलना कर पाए हैं, उनमें भारत में निर्वाचित नेताओं की तनख्वाह आसमान पर है, और भारतीय मजदूर जमीन के भी नीचे गहरे गड्ढे में हैं। दूसरी तरफ भारत के भीतर केरल अकेला ऐसा प्रदेश है जहां मजदूरी खासी अधिक है, और विधायकों का वेतन देश में सबसे कम। अब इससे देश की जनता को जो समझना हो, समझ लें, अपने नेताओं से जो पूछना हो, पूछ लें।


