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याचिकाकर्ताओं ने कहा-न्याय से कम कुछ मंजूर नहीं
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 13 मई। छत्तीसगढ़ के सबसे चर्चित भर्ती विवादों में शामिल पीएससी-2003 घोटाला एक बार फिर चर्चा में है। सुप्रीम कोर्ट की विशेष लोक अदालत ने इस मामले के प्रमुख पक्षकारों को बुलाकर आपसी सहमति से समाधान तलाशने की पहल की है। हालांकि मुख्य याचिकाकर्ता वर्षा डोंगरे और अन्य अभ्यर्थियों ने साफ कर दिया है कि वे किसी समझौते के पक्ष में नहीं हैं और अंतिम न्यायिक फैसला ही चाहते हैं।
वर्ष 2003 में छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित भर्ती परीक्षा में आरोप लगे थे कि चयन प्रक्रिया में उत्तर पुस्तिकाओं के अंक बदले गए, स्केलिंग प्रक्रिया में गड़बड़ी की गई और कम अंक पाने वाले उम्मीदवारों को प्रभावशाली तरीके से चयनित कर लिया गया। कई ऐसे उम्मीदवारों को इंटरव्यू में शामिल कर लिया गया जो पात्रता सूची में ही नहीं थे, जबकि अधिक अंक पाने वाले अभ्यर्थियों को बाहर कर दिया गया।
घोटाले को लेकर वर्ष 2006 में अभ्यर्थी वर्षा डोंगरे, रविंद्र सिंह और चमन सिन्हा ने हाईकोर्ट में दायर की थी। लंबे समय तक चली सुनवाई और एसीबी जांच के बाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2017 में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि भर्ती प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं थी और चयन सूची में गंभीर अनियमितताएं हुई थीं। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को पूरी चयन सूची दोबारा तैयार करने और नई मेरिट सूची जारी करने का निर्देश दिया था।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि कई उम्मीदवारों को नियमों के विपरीत लाभ पहुंचाया गया। अदालत के अनुसार 52 ऐसे उम्मीदवार थे जो इंटरव्यू के लिए पात्र ही नहीं थे, लेकिन उन्हें चयनित कर लिया गया। वहीं 17 योग्य अभ्यर्थियों को अंतिम सूची से बाहर रखा गया।
हाईकोर्ट और एसीबी रिपोर्ट में कई चयनित अधिकारियों के नामों का उल्लेख किया गया था। इनमें राजीव सिंह चौहान का मामला सबसे अधिक चर्चित रहा। अदालत ने माना था कि सामान्य वर्ग से होने के बावजूद उन्हें अनुसूचित जाति कोटे में लेखाधिकारी पद पर नियुक्त किया गया। कोर्ट ने उनकी सेवा समाप्त करने तक का निर्देश दिया था।
इसके अलावा ऊषा किरण बरई, सारिका रामटेके, मनोज लारोकर, सुनील कुमार, नेहा पाण्डेय, अजय बिरथरे, भारती सिंह राजपूत, उमेश कुमार अग्रवाल और राजेंद्र नाथ तिवारी जैसे नाम भी विवादित चयन सूची में शामिल बताए गए थे। अदालत ने कहा था कि इनमें से कई उम्मीदवारों का चयन कम अंक होने के बावजूद किया गया।
इस भर्ती से चयनित कई अधिकारी बाद में वरिष्ठ प्रशासनिक पदों तक पहुंच चुके हैं और कुछ को भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रोन्नति भी मिल चुकी है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित होने के कारण अंतिम वैधानिक स्थिति अभी तय नहीं हो सकी है।
दरअसल, हाईकोर्ट के फैसले से प्रभावित अधिकारियों और चयनित उम्मीदवारों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। प्रारंभिक सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी। इसके बाद से मामला वर्षों से लंबित है।
अब सुप्रीम कोर्ट की विशेष लोक अदालत द्वारा सुलह का प्रयास किए जाने से मामला फिर चर्चा में आ गया है। वर्षा डोंगरे की ओर से कहा गया है कि जब हाईकोर्ट पहले ही भर्ती प्रक्रिया को दूषित बता चुका है, तब समझौते का सवाल ही नहीं उठता। उनका कहना है कि राज्य सरकार को हाईकोर्ट के आदेश का पालन करना चाहिए था।
सुप्रीम कोर्ट की पहल के तहत वर्षा डोंगरे, राज्य सरकार और प्रतिवादी पक्षों को मुंगेली तथा कबीरधाम जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों में उपस्थित होने के लिए नोटिस जारी किए गए हैं। इसमें निरुपमा लोनहारे सहित अन्य पक्षकारों को भी बुलाया गया है।


