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नयी दिल्ली, 9 फरवरी। दिल्ली की एक अदालत ने तुर्कमान गेट स्थित फैज-ए-एलाही मस्जिद के पास पिछले महीने एक अतिक्रमण रोधी अभियान के दौरान पथराव के मामले में आठ आरोपियों की जमानत याचिका पर अपना आदेश सोमवार को सुरक्षित रख लिया।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश भूपिंदर सिंह की अदालत मोहम्मद अदनान, मोहम्मद कैफ़, मोहम्मद कशिफ, समीर हुसैन, मोहम्मद उबैदुल्ला, मोहम्मद आरिब, मोहम्मद नवेद और मोहम्मद अतहर की जमानत याचिका पर फैसला करने के अलावा बृहस्पतिवार को शेष चार आरोपियों से संबंधित बाकी की दलीलों पर भी सुनवाई करेगी।
इस मामले में अन्य चार आरोपियों में अदनान, मोहम्मद इमरान, आमिर हमजा और मोहम्मद आदिल शामिल हैं।
सोमवार को अदालत ने आरोपी मोहम्मद अदनान की दलीलें सुनी थीं। मोहम्मद अदनान के वकील ने उसकी गिरफ्तारी की परिस्थितियों पर सवाल उठाए।
उन्होंने कहा कि प्रारंभिक प्राथमिकी में बीएनएस की धारा 109 (हत्या के प्रयास) का आरोप शामिल नहीं था और प्रारंभिक प्राथमिकी में सभी अपराध जमानती थे, जिनमें सात साल से कम की जेल की सजा का प्रावधान था।
वकील ने दलीन दी कि वर्तमान मामले में अर्नेश कुमार दिशानिर्देश लागू होने चाहिए और आरोपी को जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि मोहम्मद अदनान के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिला है जो यह दर्शाता हो कि वह हिंसा में शामिल था।
वकील ने कहा, ‘‘जब अदनान को गिरफ्तार किया गया, उस समय उसकी मां और बहन को पुलिस ने घर के एक कमरे में बंद कर दिया था। अदनान को गिरफ्तार करने आई टीम में कोई महिला अधिकारी नहीं थी। गिरफ्तारी वारंट पर किसी परिवार के सदस्य द्वारा नहीं बल्कि एक परिचित द्वारा हस्ताक्षर किया गया, जिससे पुलिस ने कहा कि या तो वह उस पर हस्ताक्षर करे या कानूनी कार्रवाई का सामना करने के लिए तैयार रहे।’’
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मोहम्मद अदनान को हिरासत में हिंसा का सामना करना पड़ा।
तेरह जनवरी को एक मजिस्ट्रेट द्वारा जारी आदेश में, सह-आरोपी मोहम्मद इमरान का नया मेडिकल/लीगल परीक्षण (एमएलसी) कराने का निर्देश दिया गया था, क्योंकि न्यायाधीश ने उसके शरीर पर बाहरी चोटें पाईं जो प्रारंभिक एमएलसी में दर्ज नहीं थीं। हालांकि, मोहम्मद अदनान के शरीर पर कोई बाहरी चोट नहीं पाई गई, लेकिन उसने शारीरिक दर्द की शिकायत की।
वकील ने दलील दी कि उस पुलिस सब-यूनिट के पास कोई सीसीटीवी कैमरा नहीं था जिसने मोहम्मद अदनान और मोहम्मद इमरान को पकड़ा था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मोहम्मद अदनान के साथ हिरासत में हिंसा की गई लेकिन उस समय पुलिस सब-यूनिट के सीसीटीवी कैमरे मरम्मत के लिए थे, जिससे कोई वीडियो सबूत उपलब्ध नहीं है।
बचाव पक्ष के वकील ने आरोप लगाया कि आरोपियों के किसी भी वकील को बीएनएस की धारा 109 के तहत आरोप लगाये जाने की सूचना तक नहीं दी गई, इसलिए उन्होंने प्रारंभ में 'प्रथम दृष्टि की अदालत', यानी मजिस्ट्रेट की अदालत का रुख किया, जबकि हत्या के प्रयास के मामले की पड़ताल के लिए यह उचित मंच नहीं था।
हालांकि, अतिरिक्त लोक अभियोजक अतुल श्रीवास्तव ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि आरोपियों के वकीलों को गिरफ्तारी मेमो के माध्यम से बीएनएस की धारा 109 के तहत नए आरोप की सूचना दे दी गई थी।
बचाव पक्ष के वकील ने समानता के आधार पर जमानत का भी अनुरोध किया और दलील दी कि इस मामले में एक अन्य आरोपी उबैदुल्लाह को अलग सत्र अदालत ने जमानत दे दी है।
एक अलग सत्र अदालत ने चौबीस जनवरी को उबैदुल्लाह को जमानत दी, इसके पहले 20 जनवरी के जमानत आदेश को दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा रद्द करके सत्र अदालत को वापस भेज दिया गया था।
यह मामला 6 और 7 जनवरी की रात को रामलीला मैदान क्षेत्र में मस्जिद के पास अतिक्रमण रोधी अभियान के दौरान हुई हिंसा से संबंधित है। पुलिस ने कहा कि सोशल मीडिया पर यह अफवाह फैलाई गई थी कि तुर्कमान गेट के सामने स्थित मस्जिद को ढहाया जा रहा है, जिससे लोग मौके पर जमा हो गए।
आरोप है कि लगभग 150-200 लोगों ने पुलिस और दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के कर्मियों पर पत्थर और कांच की बोतलें फेंकी, जिसमें छह पुलिसकर्मी घायल हुए। घायल हुए व्यक्तियों में क्षेत्र के थाना प्रभारी भी शामिल हैं। (भाषा)


