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कुछ लोगों को लग सकता है कि पर्यावरण की बातें फैशन की अधिक रहती हैं, असल जिंदगी में पर्यावरण के कोई खतरे नहीं रहते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान में दिल्ली और आसपास के इलाकों में जिनको रहना पड़ता है, वे जानते हैं कि कुछ पुराणों में, या दूसरी धार्मिक किताबों में लिखे गए कुम्भीपाक नर्क किस तरह के होते होंगे। आज दिल्ली में बहुत से बुजुर्ग और बीमार लोगों को, सांस और फेंफड़े की बीमारी वालों को दिल्ली छोडक़र चले जाने की डॉक्टरी सलाह मिल रही है। प्रदूषण किसी शहर को किस तरह न रहने लायक बना देता है, दिल्ली इसकी एक सबसे बड़ी मिसाल है। आज से दस बरस पहले अगर किसी कल्पनाशील व्यक्ति ने यह सोचा होता कि दिल्ली कैसी बर्बाद होती चल रही है, और यहां का वायु प्रदूषण किस खतरनाक दर्जे तक पहुंच जाएगा, तो हो सकता है कि वे नई संसद को दिल्ली के बाहर किसी और शहर ले जाते, किसी और शहर को उपराजधानी बना देते। आज दिल्ली में आम फेंफड़ों की जो भी बर्बादी होती हो, दसियों लाख आबादी के चुने हुए सांसदों के फेंफड़ों की बर्बादी भी करीब-करीब उतनी ही हो रही है, और देश के वोटरों के चुने हुए लोकसभा सदस्य, और सांसद-विधायकों के चुने हुए राज्यसभा सदस्य भी अपने फेंफड़ों के लिए दिल्ली में बर्बादी पा रहे हैं। और तो और देश के सबसे बड़े जज, देश के तमाम केन्द्रीय मंत्री, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति, दुनिया भर के देशों से आए हुए राजनयिक, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में काम कर रहे लोग एक ऐसे शहर में फंस गए हैं जहां वे खुली हवा में घूमने भी नहीं निकल सकते। दिल्ली एक ऐसा शहर हो गया है जहां किसी खेल मुकाबले में आने से भी अब अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी ओलंपिक संघ, और खेल संघों को लिखकर मना कर दे रहे हैं। आज हालत यह है कि देश भर के वे बीमार लोग जो कि दिल्ली इलाज के लिए जाना चाहते हैं, वे साल के कुछ महीने दिल्ली जाने का सपना नहीं देख सकते, और किसी दूसरे शहर में इलाज के लिए जा रहे हैं।
राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्र, एनसीआर का एक दर्जा होना चाहिए था, उसे देश के एक शोकेस की तरह दुनिया के सामने रहना चाहिए था, अब साल के कई महीने यह राजधानी मास्क लगाए घूमती है। अभी कुछ साल पहले तक के आंकड़े बताते हैं कि देश में आने वाले विदेशी सैलानियों में से अधिकतर ऐसे रहते हैं जो कि दिल्ली, आगरा, और जयपुर के त्रिकोण में घूमकर लौट जाते हैं। लेकिन अब बहुत से लोग बताते हैं कि साल के आधे से अधिक महीने तो सैलानी दिल्ली आना ही नहीं चाहते। इसका मतलब यह है कि दिल्ली में, और दिल्ली से होते हुए भारत के पर्यटन केन्द्रों का जो ढांचा है, वह लगातार खतरे में पड़ता जा रहा है, इंसानों के फेंफड़ों के साथ-साथ पर्यटन-कारोबार के फेफड़े भी खराब होते चल रहे हैं। ऐसे में आज जब यह खबर आती है कि लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेने से इंसानों को मोटर न्यूरॉन बीमारियों का खतरा रहता है, तो सबसे पहले दिल्ली पर मंडराता खतरा सूझता है। फेंफड़ों की बीमारियों से परे, अगर दिमाग के लिए गंभीर खतरा ऐसे प्रदूषण से हो रहा है, तो उसके इलाज की लागत देश पर, सरकार पर, और इंसानों पर कितनी पड़ेगी, यह सोचना भी भयानक है। स्वीडन के एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थान का यह अध्ययन भारत के, दुनिया के सबसे प्रदूषित कई शहरों के लिए एक बड़ी चेतावनी है कि वहां रहने वाले बाशिंदे मौत की तरफ बड़ी तेज रफ्तार से बढ़ रहे हैं, और बाकी की जिंदगी फेंफड़ों से लेकर दिमाग तक की बड़ी-बड़ी बीमारियों का खतरा भी झेल रहे हैं। यह सिलसिला भी अगर किसी देश की राजनीति को नहीं चौंकाता है, तो उस देश के बारे में क्या कहा जाए? धिक्कार कहा जाए, या लानत है कहा जाए?
दिल्ली एक शहर का प्रदेश है, लेकिन वह निर्वाचित राज्य सरकार के सीमित अधिकारों पर केन्द्र सरकार के बहुत सारे अधिकारोंतले दबा-कुचला प्रदेश भी है। इसकी जिम्मेदारी इन दोनों पर है, और केन्द्र सरकार पर कुछ अधिक है। ऐसे में दिल्ली की म्युनिसिपलों से लेकर राज्य सरकार तक हांकने वाले लोग, संसद और न्यायपालिका के तमाम लोग अगर खुद अपने सुरक्षित लगते बंगलों में एयर प्यूरीफायर जैसे उपकरणों के भरोसे, और एयरकंडीशंड कारों में चलते हुए अपने को बचा रहे हैं, तो इसका मतलब यह है कि वे शहर की बाकी 90 फीसदी गरीब जनता को इन सामानों के बिना मरने के लिए छोड़ चुके हैं। नैतिकता की बात तो यह होती कि दिल्ली में बसे हुए देश की किस्मत तय करने का हक रखने वाले कार्यपालिका, न्यायपालिका, और विधायिका के कुछ हजार लोग खुद भी किसी एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल नहीं करते, कारों के शीशे उतारकर चलते, और आम जनता की तरह भुगतकर देखते। हमारा पक्का भरोसा है कि जिस दिन लोकतंत्र की इन तीनों संस्थाओं के दिल्ली में बसे हुए दस-बीस हजार लोग खुली खिड़कियों वाले घरों में, और खुली खिड़कियों वाली कारों में बसने और चलने लगेंगे, दिल्ली का प्रदूषण खत्म हो जाएगा। आज इस भयानक प्रदूषण की एक वजह यही है कि इसके बीच भी सबसे ताकतवर तबका अपने आपको बचाकर चलने की ताकत रखता है, और उसका इस्तेमाल करता है। अगर ये सारे महत्वपूर्ण फेंफड़े भी आम इंसानों की तरह खतरा झेलने लगेंगे, तो हो सकता है कि किसी सर्वदलीय सम्मेलन की तरह दिल्ली में लोकतंत्र के सारे स्तंभों का एक मिलाजुला सम्मेलन हो जाए, पूरा सुप्रीम कोर्ट, पूरी संसद, पूरी केन्द्र सरकार राष्ट्रपति के साथ एक साथ बैठ जाए, और यह तय करे कि उन सबको अपने फेंफड़े कैसे बचाने हैं। हम कोई बहुत क्रांतिकारी सोच सामने नहीं रख रहे हैं, जिस देश-प्रदेश में आम जनता को पीने का साफ पानी नसीब न हो, वहां देश चलाने वाले लोगों को बोतलबंद पानी पीने का हक क्यों होना चाहिए? और पानी के साथ-साथ साफ की गई हवा पाने का हक क्यों होना चाहिए? ऐसे कई असुविधाजनक सवाल खड़े होते हैं, और इनके जवाब में ही दिल्ली के आम इंसानों के फेंफड़ों का हक लिखा हुआ है।
दिल्ली का प्रदूषण अधिक फिक्र की बात नहीं है, उससे अधिक फिक्र की बात यह है कि हमने इस प्रदूषण को नियति मान लिया है। हमने आम जनता को ऐसी ही हवा का हकदार मान लिया है, हमने खास लोगों को फिल्टर की हुई हवा का हकदार मान लिया है। लोकतंत्र के लिए यह नौबत प्रदूषण के खतरे के मुकाबले कई गुना अधिक खतरनाक है। एक गैस चेंबर में धीमी मौत पाने वाली पीढ़ी की तरह, दिल्ली के आम लोग मौत की तरफ फास्ट-फॉरवर्ड होकर बढ़ रहे हैं। जिस तरह कोई रिकॉर्डिंग तेजी से आगे बढ़ाई जा सकती है, उसी तरह दिल्ली के आम लोगों की बाकी जिंदगी फास्ट-फॉरवर्ड हो रही है। इस गैस चेंबर में 20 हजार करोड़ रूपए का संसद भवन, और बाकी दूसरी इमारतें बनाना क्या सचमुच की समझदारी थी? या फिर यह मौका एक ऐसे फैसले का था कि इससे बहुत कम लागत में देश के किसी दूसरे हिस्से में एक उपराजधानी की बुनियाद रखी जा सकती थी जिससे कि दिल्ली को कुछ छरहरा करके जीने लायक बनाया जा सकता था। क्या इस बारे में अभी सोचना शुरू नहीं करना चाहिए? क्या देश के सभी प्रदेशों से उपराजधानी, या विकेन्द्रीकृत राजधानी को बसाने के प्रस्ताव बुलाने चाहिए कि वे इसके लिए कितनी जमीन, और कौन सी सहूलियतें देंगे? दिल्ली को अपने वजन को कम करना होगा, तभी वहां पर गरीबों के जिंदा रहने की कोई संभावना हो सकेगी, आज दिल्ली में सबसे रईस भी दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले बड़े गरीब हैं क्योंकि वे सुबह-शाम खुली हवा में सांस भी नहीं ले सकते। यह जीना भी कोई जीना है लल्लू!


